Sunday, July 5, 2026

700 साल पुरानी विरासत: मुल्तान से नागौर तक मुल्तानी समाज की गौरवशाली दास्तान

तोपसाज़ी, लोहे की दस्तकारी और सूफ़ी रिवायतों से जुड़ी एक ऐतिहासिक विरासत

विशेष संवाददाता | मुल्तानी समाज न्यूज़

राजस्थान के ऐतिहासिक शहर नागौर की सरज़मीन केवल सूफ़ी बुज़ुर्गों, किलों और सल्तनतों की वजह से ही मशहूर नहीं रही, बल्कि यह शहर सदियों से मुल्तानी समाज की मेहनत, दस्तकारी और इल्म-ओ-हुनर का भी गवाह रहा है। इतिहास, स्थानीय परंपराओं और समाज की मौखिक विरासत (Oral Traditions) के अनुसार, आज नागौर, राजस्थान और मध्य प्रदेश में बसे मुल्तानी समाज के अधिकांश परिवारों की जड़ें मुल्तान (वर्तमान पाकिस्तान) से जुड़ी मानी जाती हैं।

करीब 600 से 700 वर्ष पूर्व, जब उत्तर भारत में सल्तनत का दौर था, तब मुल्तान अपने लोहे के उद्योग, हथियार निर्माण और तोपसाज़ी के लिए पूरे हिंदुस्तान में प्रसिद्ध था। उसी दौर में अनेक कुशल लोहार, धातु-शिल्पी और तोप बनाने वाले कारीगर नागौर पहुँचे और यहीं की मिट्टी में हमेशा के लिए बस गए।


मुल्तान से नागौर तक का ऐतिहासिक सफ़र

इतिहासकारों के अनुसार 13वीं से 15वीं शताब्दी के बीच नागौर एक महत्वपूर्ण सैन्य, व्यापारिक और सूफ़ी केंद्र बन चुका था। किलों की सुरक्षा और सेना को मज़बूत बनाने के लिए कुशल तोपसाज़ों और हथियार बनाने वाले कारीगरों की आवश्यकता थी।

उसी समय मुल्तान से आए मुस्लिम लोहारों और धातु-शिल्पियों को नागौर के शासकों ने सम्मानपूर्वक बसाया। यही परिवार आगे चलकर "मुल्तानी लोहार" अथवा "मुल्तानी समाज" के नाम से पहचाने जाने लगे।


नागौर में बसने के तीन प्रमुख ऐतिहासिक चरण

पहला चरण – सूफ़ी सिलसिलों का दौर (13वीं शताब्दी)

इतिहास में यह उल्लेख मिलता है कि मुल्तान और नागौर के बीच आध्यात्मिक संबंध सूफ़ी संतों के माध्यम से अत्यंत प्रगाढ़ थे। क़ाज़ी हमीदुद्दीन नागौरी, हज़रत बहाउद्दीन ज़करिया और सूफ़ी सिलसिलों के माध्यम से अनेक विद्वान, मुरीद और कारीगर मुल्तान से नागौर पहुँचे। यही मुल्तानी समाज के आगमन की प्रारंभिक नींव मानी जाती है।


दूसरा चरण – खिलजी और तुगलक काल (14वीं शताब्दी)

अलाउद्दीन खिलजी और बाद में मुहम्मद बिन तुगलक के शासनकाल में नागौर एक विशाल सैन्य केंद्र के रूप में विकसित हुआ। किलों के विस्तार और हथियार निर्माण के लिए मुल्तान से दक्ष लोहारों और तोपसाज़ों को आमंत्रित किया गया।

इसी काल को मुल्तानी समाज के बड़े पैमाने पर नागौर में बसने का सबसे महत्वपूर्ण समय माना जाता है।


तीसरा चरण – नागौर सल्तनत का दौर (15वीं शताब्दी)

सन 1407 ईस्वी के बाद नागौर के शासकों ने अपनी सेना को आधुनिक स्वरूप देने के उद्देश्य से मुल्तान और गुजरात से विशेष रूप से तोपसाज़ों तथा लोहे के विशेषज्ञ कारीगरों को बुलाया और उन्हें किले के आसपास स्थायी रूप से बसाया।


बाबा हाजी सुलेमान मुल्तानी – समाज के आदि पुरुष

समाज की स्थानीय परंपराओं और बुज़ुर्गों के अनुसार बाबा हाजी सुलेमान मुल्तानी को नागौर में बसने वाले मुल्तानी समाज का प्रथम पूर्वज माना जाता है।

बताया जाता है कि वे एक कुशल धातु-शिल्पी, हथियार निर्माता और सूफ़ी विचारधारा से जुड़े हुए व्यक्तित्व थे। उन्होंने अपने साथ कई परिवारों को नागौर लाकर पहली भट्टी और कार्यशाला स्थापित की, जहाँ से इस समाज की नई पहचान शुरू हुई।


तोपखाने से कृषि उपकरणों तक का सफ़र

समय के साथ युद्धों का दौर समाप्त हुआ, लेकिन मुल्तानी समाज का हुनर कभी समाप्त नहीं हुआ।

जिन हाथों ने कभी तलवारें, तोपें और हथियार बनाए, उन्हीं हाथों ने आगे चलकर खेती-किसानी के लिए फावड़े, कुल्हाड़ियाँ, कल्टीवेटर, लोहे के औज़ार और घरेलू उपयोग की वस्तुएँ बनाकर पूरे देश में अपनी अलग पहचान स्थापित की।

आज भी नागौर का लोहा बाज़ार और वहाँ बनने वाले कृषि उपकरण इस ऐतिहासिक विरासत की जीवंत मिसाल माने जाते हैं।


सूफ़ी रिवायतों से जुड़ा रिश्ता

मुल्तान और नागौर का संबंध केवल व्यापार या दस्तकारी तक सीमित नहीं था, बल्कि सूफ़ी सिलसिलों ने भी दोनों शहरों को एक आध्यात्मिक डोर में बाँधा।

इतिहास में क़ाज़ी हमीदुद्दीन नागौरी और हज़रत बहाउद्दीन ज़करिया के बीच गहरे धार्मिक संबंधों का उल्लेख मिलता है। वहीं सूफ़ी हमीदुद्दीन नागौरी की फ़क़ीरी और इल्तुतमिश का उनके प्रति सम्मान आज भी नागौर की ऐतिहासिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।


तारकीन का बुलंद दरवाज़ा – अदब और अकीदत की निशानी

नागौर स्थित सूफ़ी हमीदुद्दीन नागौरी की दरगाह का ऐतिहासिक बुलंद दरवाज़ा सुल्तान शम्सुद्दीन इल्तुतमिश द्वारा बनवाया गया माना जाता है। बाद में मुहम्मद बिन तुगलक के दौर में दरगाह परिसर के अन्य निर्माण और विस्तार कार्य हुए।

यह इमारत आज भी सूफ़ी परंपरा, अदब और सल्तनती इतिहास की एक अनमोल धरोहर है।


आज भी ज़िंदा है 700 साल पुरानी पहचान

मुल्तानी समाज ने सदियों तक अपने पूर्वजों की दस्तकारी, मेहनत और ईमानदारी की परंपरा को जीवित रखा है। बदलते दौर के बावजूद समाज ने अपने हुनर को नई पीढ़ियों तक पहुँचाया और देश के औद्योगिक तथा कृषि विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

आज राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश सहित देश के अनेक राज्यों में बसे मुल्तानी समाज के लोग अपने पूर्वजों की इसी ऐतिहासिक विरासत पर गर्व करते हैं।


संपादकीय टिप्पणी

यह इतिहास स्थानीय लोक-परंपराओं, समाज की मौखिक विरासत और विभिन्न ऐतिहासिक उल्लेखों पर आधारित है। इनमें से कुछ विवरण व्यापक रूप से स्वीकार किए जाते हैं, जबकि कुछ दावों (जैसे किसी एक व्यक्ति को समाज का पहला पूर्वज मानना या कुछ विशिष्ट घटनाएँ) के लिए स्वतंत्र समकालीन ऐतिहासिक स्रोत सीमित हैं। इसलिए इन्हें समाज की परंपरागत मान्यताओं के रूप में प्रस्तुत करना अधिक उपयुक्त है।

"जिस कौम ने कभी सल्तनतों की तोपें गढ़ीं, वही कौम आज अपने हुनर, मेहनत और ख़िदमत से समाज की पहचान गढ़ रही है। मुल्तानी समाज की यह 700 वर्ष पुरानी विरासत केवल इतिहास नहीं, बल्कि आने वाली नस्लों के लिए फ़ख्र, पहचान और प्रेरणा का अमूल्य ख़ज़ाना है।"

No comments:

Post a Comment