कभी-कभी एक फैसला सिर्फ दो लोगों का नहीं होता — वह पूरे परिवार की ज़िंदगी की दिशा बदल देता है।
आज की यह बात उन बेटियों और बेटों के नाम है जो घर से भागकर शादी करने का फैसला कर लेते हैं… और उन माँ-बाप के नाम भी, जो बाहर से भले सख्त दिखाई दें, लेकिन अंदर से हर रोज़ टूटते रहते हैं।
जब एक बेटी घर छोड़ती है…
जब कोई बेटी घर की चौखट पार करती है, तो वह अकेली नहीं जाती। उसके साथ जाता है घर का सुकून, बरसों की परवरिश का भरोसा, समाज में बना सम्मान और रिश्तों की नाज़ुक डोर।
माँ की आँखें दरवाज़े पर टिक जाती हैं। हर आहट पर दिल धड़कता है —
“शायद मेरी बच्ची वापस आ जाए…”
पिता बाहर से चुप रहते हैं, मगर भीतर ही भीतर शर्म, गुस्से और दर्द की आग में जलते रहते हैं।
भाई-बहन स्कूल, कॉलेज और मोहल्ले में तानों का सामना करते हैं। समाज सवाल कम पूछता है, फैसले ज़्यादा सुनाता है। रिश्तेदार सहारा देने के बजाय दूरी बना लेते हैं। हर शादी-ब्याह, हर समारोह में परिवार खुद को झुका हुआ महसूस करता है।
प्यार गुनाह नहीं… तरीका मायने रखता है
मोहब्बत इंसानी फितरत है, इसमें कोई बुराई नहीं। लेकिन मोहब्बत का तरीका, उसका वक्त और उसका असर — ये सब बहुत अहम होते हैं।
जब फैसला घरवालों को बताए बिना, उनसे रिश्ता तोड़कर लिया जाता है, तो वह सिर्फ एक शादी नहीं होती — वह भरोसे के टूटने की आवाज़ भी होती है।
भविष्य के दुष्परिणामों पर भी सोचना जरूरी है। रिश्ते सिर्फ दो दिलों के नहीं होते, दो परिवारों के भी होते हैं।
कानून, अधिकार और माँ-बाप की बेबसी
आज के दौर में जैसे ही लड़का या लड़की बालिग होते हैं, कानून उन्हें अपने फैसले लेने का पूरा अधिकार देता है। पुलिस थाने में गर्दन झुकाए खड़े पिता को अक्सर यही जवाब मिलता है —
“दोनों बालिग हैं, अपनी मर्जी से गए हैं… हम कुछ नहीं कर सकते।”
कानून कहता है — व्यक्ति की स्वतंत्रता सर्वोपरि है।
यह बात सही भी है, क्योंकि अधिकारों की रक्षा जरूरी है।
लेकिन सवाल यह भी है कि क्या स्वतंत्रता का अर्थ यह है कि परिवार की प्रतिष्ठा, भावनाएं और वर्षों का विश्वास एक पल में तोड़ दिया जाए?
कानून आँसू नहीं देखता, वह माँ की टूटी रातें नहीं गिनता। वह केवल उम्र और सहमति देखता है।
मगर एक माँ-बाप के लिए यह घटना उम्र की नहीं, रिश्ते की होती है।
अधिकार के साथ कर्तव्य भी जरूरी
यह सच है कि हर इंसान को अपनी ज़िंदगी चुनने का अधिकार है। लेकिन अधिकार के साथ कर्तव्य भी आते हैं।
स्वतंत्रता का मतलब यह नहीं कि घरवालों को अंधेरे में रखकर फैसला लिया जाए।
अगर बच्चे अपने माता-पिता से संवाद करें, समझाएँ, धैर्य रखें — तो कई बार रास्ते निकल आते हैं।
माँ-बाप भी यह समझें कि बदलते समय के साथ बच्चों की भावनाएँ बदलती हैं।
और बच्चों को यह समझना होगा कि माँ-बाप की इज़्ज़त और भावनाएँ भी उतनी ही अहम हैं जितनी उनकी अपनी पसंद।
समाधान संवाद में है, टकराव में नहीं
घर से भाग जाना आख़िरी रास्ता नहीं होना चाहिए।
अगर रिश्ते की नींव सच्ची है, तो उसे मजबूती संवाद से मिलती है, छुपकर लिए गए फैसलों से नहीं।
समाज को भी बदलना होगा — तानों की जगह समझ, और फैसलों की जगह सहानुभूति देनी होगी।
तभी परिवार टूटने से बचेंगे और रिश्ते बचेंगे।
आख़िर में बस इतना —
मोहब्बत कीजिए, मगर अपने माँ-बाप की इज़्ज़त और उनके दिल का ख्याल रखते हुए।
क्योंकि दुनिया में सबसे सच्चा प्यार वही होता है, जो आपकी हर गलती के बाद भी आपके लौट आने का इंतजार करता है।
सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा पंजीकृत
देश की राजधानी दिल्ली से प्रकाशित
मुस्लिम मुल्तानी लोहार, बढ़ई बिरादरी को समर्पित देश की एकमात्र पत्रिका
“मुल्तानी समाज” के लिए
ज़मीर आलम की खास रिपोर्ट
#multanisamaj
📞 8010884848
🌐 www.multanisamaj.com
🌐 www.msctindia.com
📧 multanisamaj@gmail.com