Wednesday, September 23, 2026

बिना चंदा-ए-आम व ख़ास लिए, महज़ ₹250 की मेंबरशिप फ़ीस से बिरादरी को डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर मुत्तहिद करने की अनोखी पहल

मुल्क भर में मुस्लिम मुल्तानी लोहार और बढ़ई बिरादरी के अफ़राद को तलाश कर एक डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर जोड़ने का काम — मुल्तानी समाज चैरिटेबल ट्रस्ट के फ़ाउंडर ज़मीर आलम की क़यादत में एक नई मिसाल

नई दिल्ली/उत्तर प्रदेश डेस्क।
मुस्लिम मुल्तानी लोहार और बढ़ई बिरादरी की फ़लाह, तरक़्क़ी, इत्तेहाद और पहचान के लिए मुख़्तलिफ़ तंजीमें अपने-अपने अंदाज़ में काम करती रही हैं। मगर बिरादरी को किसी बड़े चंदा-ए-आम या चंदा-ए-ख़ास के सहारे के बग़ैर, महज़ मामूली मेंबरशिप फ़ीस के ज़रिए एक मुकम्मल डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर मुल्क के मुख़्तलिफ़ हिस्सों से तलाश कर जोड़ने की कोशिश अपने आप में एक नई और ग़ौरतलब पहल है।

"मुल्तानी समाज चैरिटेबल ट्रस्ट" के फ़ाउंडर ज़मीर आलम की क़यादत में शुरू की गई इस पहल का मक़सद सिर्फ़ एक तंजीम की तामीर करना नहीं, बल्कि मुल्क के मुख़्तलिफ़ शहरों, क़स्बों और इलाक़ों में रहने वाले मुस्लिम मुल्तानी लोहार और बढ़ई बिरादरी के अफ़राद को एक ऐसे डिजिटल निज़ाम से जोड़ना है, जहाँ उनकी पहचान, हुनर, कारोबार, सामाजिक सरोकार और बिरादराना ताल्लुक़ात को एक नई पहचान मिल सके।

इस पहल की सबसे अहम बात यह है कि इसमें चंदा-ए-आम या चंदा-ए-ख़ास को बुनियादी सहारा बनाने के बजाय महज़ ₹250 की मेंबरशिप फ़ीस को आधार बनाया गया है। यानी बिरादरी के अफ़राद अपनी हैसियत के मुताबिक़ मामूली मेंबरशिप फ़ीस अदा करके इस डिजिटल मिशन का हिस्सा बन सकते हैं।

पहली मर्तबा लोहार और बढ़ई बिरादरी को एक साथ लेकर चलने की कोशिश

मुल्तानी समाज चैरिटेबल ट्रस्ट की ओर से दिए गए हालिया पैग़ाम में एक और अहम पहलू की तरफ़ तवज्जो दिलाई गई है।

मुल्क में अब तक बनी मुख़्तलिफ़ बिरादराना तंजीमों का तआरुफ़ और उनकी सरगर्मियों का अपना-अपना दायरा रहा है। लेकिन मुल्तानी लोहार और मुल्तानी बढ़ई बिरादरी को एक साथ लेकर चलने और दोनों की सामाजिक व मआशी तरक़्क़ी को एक ही बिरादराना प्लेटफ़ॉर्म पर अहमियत देने की कोशिश को मुल्तानी समाज चैरिटेबल ट्रस्ट अपनी अहम ख़िदमत के तौर पर पेश कर रहा है।

यहाँ यह वाज़ेह करना भी ज़रूरी है कि मुल्तानी लोहार और मुल्तानी बढ़ई एक ही बिरादराना विरासत से जुड़े हुए हैं, मगर दोनों के पेशे, हुनर, कारोबार और रोज़गार के अंदाज़ में फ़र्क़ मौजूद है। लिहाज़ा दोनों बिरादरियों के मआशी और कारोबारी मसाइल, उनके हुनर और उनकी ज़रूरतों को अलग-अलग समझना भी उतना ही ज़रूरी है।

मुल्तानी समाज चैरिटेबल ट्रस्ट का कहना है कि अगर बिरादरी की तरक़्क़ी को मुकम्मल और जामे अंदाज़ में आगे बढ़ाना है तो लोहार के साथ बढ़ई और बढ़ई के साथ लोहार—दोनों को बराबर की अहमियत और नुमाइंदगी देना ज़रूरी है।

"हमने बढ़ई बिरादरी को कभी नज़रअंदाज़ नहीं किया"

ट्रस्ट की तरफ़ से यह भी कहा गया है कि इस मौज़ू पर आने वाले दिनों में मुख़्तलिफ़ तंजीमों और अफ़राद की तरफ़ से बहस हो सकती है। कोई इस पहल की मुख़ालिफ़त करे या अपने-अपने अंदाज़ में इसकी तफ़्सीर करे, मगर एक सवाल अपनी जगह रहेगा कि क्या मुल्तानी बढ़ई बिरादरी की तरक़्क़ी, पहचान और मआशी मज़बूती को उतनी ही अहमियत दी गई, जितनी दी जानी चाहिए थी?

मुल्तानी समाज चैरिटेबल ट्रस्ट का मौक़िफ़ है कि उसने इस सवाल को पहली बार खुलकर बिरादरी के सामने रखने की कोशिश की है और बढ़ई बिरादरी को बिरादराना निज़ाम का बराबर का हिस्सा मानते हुए उसे दरकिनार करने के बजाय साथ लेकर चलने की राह इख़्तियार की है।

ट्रस्ट का कहना है कि इसका मक़सद किसी तंजीम या शख़्स की तन्क़ीद करना नहीं, बल्कि बिरादरी के उन तमाम अफ़राद को एक साथ लाना है जो इल्म, हुनर, कारोबार, रोज़गार और समाजी तरक़्क़ी में अपना किरदार अदा कर रहे हैं।

"पैदायशी इंजीनियर" — बिरादरी के हुनर को नई पहचान देने की कोशिश

मुल्तानी समाज चैरिटेबल ट्रस्ट की तरफ़ से बिरादरी के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले एक ख़ास अल्क़ाब में "पैदायशी इंजीनियर" भी शामिल है।

ट्रस्ट का नज़रिया है कि सदियों से लोहे, लकड़ी, औज़ार, मशीनरी, दस्तकारी और तकनीकी हुनर से जुड़े रहने वाली इस बिरादरी के पारंपरिक फ़न और कारीगरी को सिर्फ़ एक पेशा समझने के बजाय उसके अंदर मौजूद तकनीकी सलाहियत और हुनर को भी पहचान मिलनी चाहिए।

इसी सोच के तहत बिरादरी के लिए "पैदायशी इंजीनियर" का अल्क़ाब इस्तेमाल किया गया, ताकि नई नस्ल को अपने बुज़ुर्गों के हुनर, मेहनत और दस्तकारी की विरासत पर फ़ख़्र महसूस हो और वह आधुनिक तालीम व तकनीक के साथ इस विरासत को आगे बढ़ा सके।

₹250 की मेंबरशिप — डिजिटल इत्तेहाद की तरफ़ एक क़दम

मुल्तानी समाज चैरिटेबल ट्रस्ट की यह डिजिटल पहल सिर्फ़ मेंबरशिप जमा करने तक महदूद नहीं बताई जा रही, बल्कि इसके ज़रिए बिरादरी के अफ़राद को एक-दूसरे से जोड़ने, उनकी पहचान को डिजिटल तौर पर दर्ज करने और मुल्क के मुख़्तलिफ़ हिस्सों में मौजूद बिरादराना नेटवर्क को मज़बूत करने की कोशिश की जा रही है।

एक तरफ़ जहाँ बड़ी-बड़ी तंजीमों के लिए चंदा जमा करना और बड़े इज्लास करना आम बात है, वहीं इस पहल में छोटी मेंबरशिप फ़ीस के ज़रिए ज़्यादा से ज़्यादा अफ़राद को सीधे डिजिटल नेटवर्क का हिस्सा बनाने का तसव्वुर सामने रखा गया है।

यही वजह है कि यह पहल बिरादरी के अंदर एक नई बहस और नई उम्मीद दोनों पैदा कर रही है।

"बिरादरी की ताक़त उसके अफ़राद हैं"

मुल्तानी समाज चैरिटेबल ट्रस्ट का पैग़ाम साफ़ है कि किसी भी बिरादरी की असल ताक़त सिर्फ़ उसकी तादाद में नहीं बल्कि उसके मुत्तहिद, बा-इल्म, हुनरमंद और एक-दूसरे से जुड़े हुए अफ़राद में होती है।

अगर मुल्क के मुख़्तलिफ़ राज्यों और शहरों में रहने वाला एक-एक मुल्तानी अपने दूसरे मुल्तानी से डिजिटल तौर पर जुड़ जाए, एक-दूसरे के कारोबार को जाने, एक-दूसरे के हुनर से वाक़िफ़ हो, नौजवानों को रोज़गार के मौक़े मिलें और बिरादरी के मसाइल को एक साझा प्लेटफ़ॉर्म पर उठाया जा सके, तो यह सिर्फ़ एक डिजिटल डायरेक्टरी नहीं बल्कि बिरादराना इत्तेहाद का एक नया निज़ाम साबित हो सकता है।

23 सितंबर 2026 की ख़बर के बाद सामने आईं कुछ अहम बातें

गुज़िश्ता रोज़ 23 सितंबर 2026 को "मुल्तानी समाज" राष्ट्रीय समाचार पत्रिका के ज़रिए एक ख़बर बिरादरी के सामने रखी गई थी। अब उसी सिलसिले में उस ख़बर से मुताल्लिक़ कुछ अहम और ख़ास पहलुओं को तफ़्सील से पेश किया जा रहा है, ताकि बिरादरी के अफ़राद इस पहल के मक़सद और इसके पीछे की सोच को बेहतर तौर पर समझ सकें।

मुल्तानी समाज चैरिटेबल ट्रस्ट की तरफ़ से कहा गया है कि आने वाले वक़्त में इस डिजिटल मिशन से जुड़ी और भी अहम मालूमात, नए प्रोग्राम, बिरादराना रिकॉर्ड, डिजिटल सहूलियतें और तरक़्क़ी के मंसूबे बिरादरी के सामने रखे जाएंगे।

यह सफ़र किसी एक शख़्स का सफ़र नहीं, बल्कि उन तमाम अफ़राद का साझा सफ़र है जो अपनी बिरादरी को इत्तेहाद, इल्म, हुनर, कारोबार और नई तकनीक के ज़रिए मज़बूत देखना चाहते हैं।

मुल्तानी समाज चैरिटेबल ट्रस्ट का पैग़ाम है कि बिरादरी को सिर्फ़ याद करने की नहीं, बल्कि उसे जोड़ने, समझने और आगे बढ़ाने की ज़रूरत है।

और शायद इसी सोच के साथ एक नया सवाल भी सामने आता है—

क्या वक़्त आ गया है कि मुल्क के हर शहर, हर क़स्बे और हर इलाक़े में रहने वाला मुल्तानी लोहार और बढ़ई अपने दूसरे बिरादर से डिजिटल तौर पर जुड़े और अपनी बिरादरी की एक नई, मुत्तहिद और मज़बूत पहचान का हिस्सा बने?

इस मुहिम का अगला सफ़र क्या होगा और आने वाले दिनों में "मुल्तानी समाज" बिरादरी के लिए कौन-कौन सी नई डिजिटल सहूलियतें लेकर सामने आएगा—इसकी तफ़्सीलात के लिए जुड़े रहिए।


सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार से पंजीकृत, मुल्क की राजधानी नई दिल्ली से शाया होने वाली पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी की क़ौमी समाचार पत्रिका, न्यूज़ पोर्टल और यूट्यूब चैनल "मुल्तानी समाज" के लिए उत्तर प्रदेश डेस्क से प्रधान संपादक ज़मीर आलम की ख़ास रिपोर्ट।

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"मुल्तानी समाज"

अपनी बिरादरी की आवाज़ — अपनी पहचान।

बिरादरी का इकलौता और अनोखा संगठन—जहाँ कोई चौधरी नहीं, सिर्फ़ ख़िदमतगार हैं

2011 में रखी गई एक ऐसी तहरीक की बुनियाद, जिसने पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार-बढ़ई बिरादरी को तंजीम, सहाफ़त और डिजिटल प्लेटफॉर्म से जोड़ने का सफ़र शुरू किया

नई दिल्ली/उत्तर प्रदेश।

किसी भी बिरादरी की तरक़्क़ी सिर्फ़ बड़े-बड़े दावों, जलसों और नारों से नहीं होती, बल्कि इसके लिए ख़ुलूस, सब्र, मेहनत, तंजीमी सोच और लगातार ख़िदमत का जज़्बा दरकार होता है। तारीख़ गवाह है कि जब किसी एक शख़्स के दिल में अपनी क़ौम और बिरादरी के लिए कुछ कर गुजरने का अज़्म पैदा होता है, तो वही छोटी-सी कोशिश आगे चलकर एक बड़ी तहरीक की शक्ल अख़्तियार कर सकती है।

पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार-बढ़ई बिरादरी में ऐसी ही एक तंजीमी कोशिश का आग़ाज़ साल 2011 में हुआ, जब गढ़ी पुख़्ता, ज़िला शामली, उत्तर प्रदेश से ताल्लुक़ रखने वाले और उस वक़्त दिल्ली में मुकीम ज़मीर आलम ने बिरादरी के लिए मुल्कगीर सतह पर काम करने वाली एक तंजीम की बुनियाद रखने का अज़्म किया।

ज़मीर आलम उस वक़्त भी मुख़्तलिफ़ समाजी तंजीमों और अख़बारात से जुड़े हुए थे। उन्होंने दिल्ली में रहने वाले बिरादरी के कई तजुर्बेकार और असरदार अफ़राद से मशवरा किया। मगर हर मशवरा हौसला बढ़ाने वाला नहीं था।

कुछ लोगों ने उन्हें यहाँ तक मशवरा दिया कि "आप भी ख़ामोशी से घर बैठ जाइए। इस बिरादरी के लिए आज तक कोई कुछ नहीं कर सका, बड़े-बड़े सेठ और असरदार लोग मिलकर भी कुछ नहीं कर पाए, फिर आप क्या कर लेंगे?"

लेकिन ज़मीर आलम ने मायूसी को अपने रास्ते की दीवार नहीं बनने दिया।

उन्होंने यह तय किया कि अगर कोई काम आज तक नहीं हुआ, तो इसका मतलब यह नहीं कि वह आगे भी नहीं हो सकता।

17 जून 2011—एक तंजीमी सफ़र का आग़ाज़

इसी अज़्म और ख़िदमत के जज़्बे के साथ 17 जून 2011 को "मुल्तानी समाज चैरिटेबल ट्रस्ट" के नाम से तंजीम की बुनियाद रखी गई।

बाद में यही तारीख़ बिरादरी के लिए "यौमे-तासीस" यानी स्थापना दिवस की हैसियत से अहम होती चली गई। हर साल 17 जून को बिरादरी के अफ़राद अपने-अपने गाँव, क़स्बों और शहरों में पौधारोपण करके इस दिन को मनाते हैं और मुल्क को हरा-भरा रखने का पैग़ाम देते हैं।

यह उस दौर की बात है जब आज की तरह सोशल मीडिया का बोलबाला नहीं था। किसी भी खबर या जानकारी को लोगों तक पहुँचाने के लिए अख़बार और पत्रिकाएँ ही सबसे बड़ा ज़रिया हुआ करती थीं।

सहाफ़त को बनाया बिरादरी की आवाज़

ज़मीर आलम का ताल्लुक़ सहाफ़त से पहले ही था। मुख़्तलिफ़ अख़बारात में काम करने के बाद उन्होंने अपने कई अख़बार भी रजिस्टर्ड कराए।

इसी सहाफ़ती तजुर्बे को बिरादरी की ख़िदमत के साथ जोड़ते हुए 12 नवंबर 2013 को "मुल्तानी समाज" के नाम से पत्रिका का रजिस्ट्रेशन कराया गया।

मक़सद साफ़ था—बिरादरी के मुख़्तलिफ़ हिस्सों में होने वाली सामाजिक, तालीमी, तंजीमी और ख़िदमाती सरगर्मियों की खबरें बिरादरी के हर फ़र्द तक पहुँचाना।

इसी सिलसिले ने आगे चलकर "मुल्तानी डे" की शक्ल अख़्तियार की, जिसे पत्रिका के राष्ट्रीय अधिवेशन के तौर पर बिरादरी में मनाए जाने की रवायत बनी।

एक शहर से पूरे मुल्क तक पहुँचने की कोशिश

तंजीम का दायरा धीरे-धीरे बढ़ता गया। गुजरात, राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, उत्तराखंड, दिल्ली और उत्तर प्रदेश के मुख़्तलिफ़ शहरों में बिरादरी के अफ़राद से राब्ता किया गया।

जहाँ-जहाँ बिरादरी के लोग मिले, वहाँ तंजीम के मक़सद और प्लेटफॉर्म के बारे में बताया गया और उन्हें एक साझा तंजीमी प्लेटफॉर्म से जोड़ने की कोशिश की गई।

वक़्त बदला, दौर बदला और फिर सोशल मीडिया का ज़माना आया।

इस बदलते हुए दौर को समझते हुए बिरादरी को भी डिजिटल दुनिया से जोड़ने की पहल की गई।

बिरादरी का अपना डिजिटल नेटवर्क

बिरादरी की खबरों और जानकारी को डिजिटल तौर पर एक जगह उपलब्ध कराने के लिए "मुल्तानी समाज डॉट कॉम" वेबसाइट तैयार की गई।

रिश्ते-नातों के सिलसिले को आसान बनाने के लिए "रिश्तों की दुनिया डॉट कॉम" के नाम से प्लेटफॉर्म तैयार किया गया, ताकि शादी के लिए मुनासिब रिश्तों की तलाश को आसान बनाया जा सके।

बिरादरी का डिजिटल सर्वे करने और बिरादरी के आंकड़े जमा करने के मक़सद से "मुल्तानी घराना डॉट कॉम" के नाम से भी प्लेटफॉर्म की पहल की गई।

यानी कोशिश सिर्फ़ एक तंजीम बनाने तक महदूद नहीं रही, बल्कि बिरादरी को तंजीम, सहाफ़त, डिजिटल प्लेटफॉर्म और आपसी राब्ते से जोड़ने की कोशिश की गई।

तालीम को फ़रोग़ देने की कोशिश

तंजीम की सरगर्मियों में तालीम को भी अहमियत दी गई।

दसवीं और बारहवीं जमाअत में बेहतर कारकर्दगी करने वाले बिरादरी के बच्चों को "मुल्तानी गौरव अवॉर्ड" से नवाज़ने की रवायत शुरू की गई, ताकि बच्चों में तालीमी मैदान में आगे बढ़ने का हौसला पैदा हो और उनके माता-पिता भी बच्चों की पढ़ाई को लेकर मुतमइन और पुरउम्मीद रहें।

कोरोना वबा के दौर में भी बिरादरी और समाज के लिए अपनी जिम्मेदारियाँ निभाने वाले सैकड़ों कोरोना योद्धाओं को सम्मानित किया गया।

"एकजुटता बढ़ाओ अभियान"—इत्तिहाद का पैग़ाम

बिरादरी में आपसी राब्ता और इत्तिहाद बढ़ाने के लिए हर साल 31 जनवरी से 28 फरवरी तक "एकजुटता बढ़ाओ अभियान" चलाने की पहल की गई।

मक़सद यही था कि बिरादरी के अफ़राद एक-दूसरे के करीब आएँ, आपसी राब्ता मजबूत हो और बिरादरी की सामूहिक तरक़्क़ी के लिए मिल-जुलकर काम किया जाए।

इसी के साथ बिरादरी की खबरों को तेज़ी से पहुँचाने के लिए न्यूज़ चैनल और न्यूज़ पोर्टल की शुरुआत की गई।

सबसे दिलचस्प बात—बिना चंदे के तंजीमी सफ़र

इस तंजीम के बारे में जो बात इसे मुख़्तलिफ़ बनाती है, वह यह दावा किया जाता है कि इसकी बहुत-सी सरगर्मियाँ चंदे के बजाय सालाना सदस्यता शुल्क के ज़रिये चलाने की कोशिश की गईं।

सदस्यता शुल्क 250 रुपये सालाना रखा गया।

यानी कोशिश यह रही कि बिरादरी के अफ़राद अपनी हैसियत के मुताबिक़ मामूली सदस्यता शुल्क के ज़रिये तंजीम का हिस्सा बनें और तंजीमी काम को एक व्यवस्थित आर्थिक आधार मिले।

हर तीन साल बाद नई क़यादत

इस तंजीम की एक और अहम तंजीमी ख़ूबी यह बताई जाती है कि राष्ट्रीय सदर समेत पूरी कार्यकारिणी को हर तीन साल बाद बदलने की व्यवस्था रखी गई।

इसका मक़सद यह है कि तंजीम किसी एक शख़्स या एक ही क़यादत के इर्द-गिर्द महदूद न रहे, बल्कि नई नस्ल और नए लोगों को भी आगे आने का मौक़ा मिले।

90 फ़ीसद काम ऑनलाइन—वक़्त और पैसा दोनों बचाने की कोशिश

डिजिटल दौर के मुताबिक़ तंजीम की ज़्यादातर सरगर्मियों को ऑनलाइन रखने की कोशिश की गई।

बताया जाता है कि तंजीम के लगभग 90 फ़ीसद काम ऑनलाइन किए जाने की नीति अपनाई गई, ताकि बिरादरी के लोगों का कीमती वक़्त और तंजीम का पैसा अनावश्यक बैठकों, सफ़र और दूसरी फिज़ूलखर्चियों में ज़ाया न हो।

तंजीम के फाउंडर ज़मीर आलम की सोच रही कि अगर डिजिटल दौर में कोई काम ऑनलाइन आसानी से हो सकता है तो सिर्फ़ रस्म निभाने के लिए लोगों को दूर-दराज़ से बुलाकर उनका वक़्त और पैसा क्यों खर्च कराया जाए।

"हम ओहदेदार नहीं, ख़िदमतगार हैं"

शायद इस पूरी तंजीमी सोच की सबसे अहम और अलग पहचान यही जुमला है—

"आप बिरादरी के ओहदेदार नहीं, बल्कि ख़िदमतगार हैं।"

तंजीम से जुड़े लोगों को हमेशा यह एहसास दिलाने की कोशिश की जाती है कि किसी ओहदे का मतलब हुक्म चलाना नहीं, बल्कि जिम्मेदारी उठाना है।

सदर होना ख़िदमत है, सेक्रेटरी होना ख़िदमत है, किसी कमेटी का हिस्सा होना ख़िदमत है और बिरादरी का आम फ़र्द होना भी अपनी जगह एक जिम्मेदारी है।

यही वजह है कि इस तंजीमी सोच में "चौधरी" बनने के बजाय "ख़िदमतगार" बनने पर ज़ोर दिया जाता है।

फाउंडर का अपना अलग उसूल

तंजीम के फाउंडर ज़मीर आलम के बारे में यह भी कहा जाता है कि उन्होंने बिरादरी के मुख़्तलिफ़ मंचों पर बुलाए जाने के बावजूद अपनी तंजीमी सोच के मुताबिक़ आम तौर पर डिजिटल प्लेटफॉर्म को प्राथमिकता दी।

उनका मानना रहा कि अगर आज के दौर में लोगों तक अपनी बात पहुँचाने के लिए डिजिटल ज़रिया मौजूद है, तो हर काम के लिए बड़े जलसे, लंबे सफ़र और भारी खर्च की ज़रूरत नहीं होनी चाहिए।

उनकी सोच का केंद्र यही रहा कि बिरादरी का पैसा बिरादरी के काम आए और बिरादरी का वक़्त बिरादरी की तरक़्क़ी में लगे।

एक तंजीम से बढ़कर—एक सोच

आज "मुल्तानी समाज" की कहानी को सिर्फ़ एक तंजीम या एक पत्रिका की कहानी के तौर पर देखना मुकम्मल तस्वीर पेश नहीं करता।

यह सफ़र दरअसल उस सोच की कहानी है जिसमें एक बिरादरी को तंजीम से जोड़ने, सहाफ़त के ज़रिये आवाज़ देने, तालीम को बढ़ावा देने, रिश्तों को आसान बनाने, डिजिटल प्लेटफॉर्म उपलब्ध कराने और आपसी इत्तिहाद को मज़बूत करने की कोशिश की गई।

2011 में जिस सफ़र का आग़ाज़ एक छोटे से तंजीमी ख़याल से हुआ था, वह आगे चलकर मुख़्तलिफ़ डिजिटल और सहाफ़ती प्लेटफॉर्म तक पहुँचा।

इस सफ़र की सबसे अहम बात शायद यही है कि—

ओहदा बड़ा नहीं, ख़िदमत बड़ी होनी चाहिए।

कुर्सी नहीं, जिम्मेदारी अहम होनी चाहिए।

चौधराहट नहीं, ख़िदमतगारी बिरादरी की पहचान होनी चाहिए।

और शायद इसी सोच को तंजीम का सबसे बड़ा पैग़ाम कहा जा सकता है—

"बिरादरी पर हुकूमत करने के लिए नहीं, बिरादरी की ख़िदमत करने के लिए तंजीम बनाई जाती है।"


"मुल्तानी समाज"—बिरादरी की आवाज़, बिरादरी की पहचान

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार से पंजीकृत, मुल्क की राजधानी नई दिल्ली से शाया होने वाली पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार-बढ़ई बिरादरी की क़ौमी समाचार पत्रिका "मुल्तानी समाज", इसके न्यूज़ पोर्टल और यूट्यूब चैनल के ज़रिये बिरादरी की सामाजिक, तालीमी, तंजीमी और दीगर सरगर्मियों को बिरादरी तक पहुँचाने की कोशिश की जाती है।

उत्तर प्रदेश डेस्क से
प्रधान संपादक — ज़मीर आलम
"मुल्तानी समाज" राष्ट्रीय समाचार पत्रिका

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"मुल्तानी समाज"

अपनी बिरादरी की आवाज़ — अपनी पहचान

Tuesday, September 22, 2026

बिरादरी में खुशी की लहर: मुल्तानी समाजसेवी संगठन में बड़ा फेरबदलशाहनवाज मिर्ज़ा बने जनरल सेक्रेटरी, साजिद मिर्ज़ा (दभेड़ी वाले) को मुख्य सलाहकार की ज़िम्मेदारी

नई दिल्ली/उत्तर प्रदेश।
पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी के बीच उस वक़्त खुशी की लहर दौड़ गई, जब “मुल्तानी समाजसेवी संगठन” में संगठनात्मक ज़िम्मेदारियों को लेकर अहम तब्दीली करते हुए शाहनवाज मिर्ज़ा साहब को जनरल सेक्रेटरी और साजिद मिर्ज़ा साहब (दभेड़ी वाले) को मुख्य सलाहकार के ओहदे पर नियुक्त किए जाने का ऐलान किया गया।

बताया गया है कि यह फैसला बिरादरी के कामकाज को और बेहतर तरीके से आगे बढ़ाने, संगठन की गतिविधियों में तेज़ी लाने तथा तमाम साथियों के बीच बेहतर तालमेल और मशवरे को मज़बूत करने की नीयत से लिया गया है।

संगठन से जुड़े ज़िम्मेदारान के मुताबिक़, संगठन के व्हाट्सऐप ग्रुप में एक हज़ार से ज़्यादा साथी जुड़े हुए हैं। इतनी बड़ी तादाद में बिरादरी के लोगों की मौजूदगी अपने आप में संगठन के लिए एक अहम ताक़त है। हालांकि, कुछ ज़िम्मेदार साथियों की किसी वजह से गैर-मौजूदगी के कारण बिरादरी से जुड़े कामों की रफ़्तार प्रभावित न हो और संगठनात्मक ज़िम्मेदारियाँ बेहतर ढंग से निभाई जाती रहें, इसी मक़सद से यह अहम फैसला लिया गया।

मशवरे और इत्तेहाद के साथ लिया गया फैसला

संगठन की ओर से यह भी स्पष्ट किया गया कि नई ज़िम्मेदारियों का फैसला किसी व्यक्ति विशेष को पीछे करने या किसी की हैसियत कम करने की नीयत से नहीं, बल्कि बिरादरी की खिदमत, संगठन की बेहतरी और सामूहिक काम को आगे बढ़ाने के मक़सद से लिया गया है।

बताया गया कि इस सिलसिले में साथियों के साथ मशवरा किया गया और आपसी राय एवं सहमति को सामने रखते हुए नई ज़िम्मेदारियों का ऐलान किया गया है। बिरादरी के बड़े-बुज़ुर्गों, समाजसेवियों और संगठन से जुड़े तमाम साथियों से उम्मीद की गई है कि वे नई ज़िम्मेदारियाँ संभालने वाले दोनों साथियों का सहयोग करेंगे और उन्हें अपनी नेक दुआओं से नवाज़ेंगे।

शाहनवाज मिर्ज़ा को जनरल सेक्रेटरी की अहम ज़िम्मेदारी

शाहनवाज मिर्ज़ा साहब को जनरल सेक्रेटरी की ज़िम्मेदारी सौंपे जाने के बाद उनसे उम्मीद की जा रही है कि वह संगठन के रोज़मर्रा के कामकाज, साथियों के बीच तालमेल, बिरादरी से जुड़े मसाइल और संगठनात्मक गतिविधियों को बेहतर अंदाज़ में आगे बढ़ाने में अपनी भूमिका अदा करेंगे।

जनरल सेक्रेटरी का ओहदा संगठन में अहम ज़िम्मेदारी का ओहदा माना जाता है। लिहाज़ा बिरादरी की उम्मीद है कि शाहनवाज मिर्ज़ा साहब तमाम साथियों को साथ लेकर, आपसी इत्तेहाद और भाईचारे की फ़िज़ा को क़ायम रखते हुए संगठन की ख़िदमत को आगे बढ़ाएंगे।

साजिद मिर्ज़ा को मुख्य सलाहकार की ज़िम्मेदारी

इसी के साथ साजिद मिर्ज़ा साहब (दभेड़ी वाले) को मुख्य सलाहकार की ज़िम्मेदारी सौंपी गई है। उनसे उम्मीद की गई है कि वह अपने तजुर्बे, मशवरे और रहनुमाई के ज़रिए संगठन को आगे बढ़ाने में अपनी अहम भूमिका निभाएंगे।

मुख्य सलाहकार की हैसियत से उनकी ज़िम्मेदारी संगठन से जुड़े अहम मामलों में मशवरा देना, बेहतर फैसलों के लिए अपनी राय पेश करना और बिरादरी के व्यापक हित में ज़िम्मेदारान की रहनुमाई करना होगी।

बिरादरी की तरक़्क़ी के लिए मिल-जुलकर काम करने की अपील

मुल्तानी बिरादरी से जुड़े लोगों का कहना है कि किसी भी सामाजिक संगठन की असल ताक़त उसके ओहदेदारों से ज़्यादा उसके इत्तेहाद, भाईचारे, आपसी एतमाद और सामूहिक सोच में होती है। इसलिए तमाम बिरादराना हज़रात से अपील की गई है कि वह छोटी-बड़ी बातों को आपसी बहस का सबब बनाने के बजाय बिरादरी की तरक़्क़ी और आने वाली नस्लों के बेहतर मुस्तक़बिल के लिए मिल-जुलकर काम करें।

संगठन की ओर से यह उम्मीद भी जताई गई कि नई ज़िम्मेदारियों के बाद संगठन की सरगर्मियों में और तेज़ी आएगी तथा बिरादरी के सामाजिक, तालीमी और फलाही मामलों को बेहतर तरीके से उठाया जा सकेगा।

अल्लाह तआला नई ज़िम्मेदारियाँ संभालने वाले तमाम साथियों को बिरादरी की ख़िदमत करने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए और उनके नेक इरादों में कामयाबी अता करे। आमीन।

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✍️ ख़ास रिपोर्ट

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार से पंजीकृत, मुल्क की राजधानी नई दिल्ली से प्रकाशित/प्रसारित, पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी की क़ौमी समाचार पत्रिका, न्यूज़ पोर्टल और यूट्यूब चैनल “मुल्तानी समाज” के लिए उत्तर प्रदेश डेस्क से प्रधान संपादक ज़मीर आलम की ख़ास रिपोर्ट।

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“मुल्तानी समाज”

अपनी बिरादरी की आवाज़ — अपनी पहचान।

बिरादरी की ख़िदमत का जज़्बा रखने वालों के लिए खुला रास्ता—मुल्तानी समाज चैरिटेबल ट्रस्ट से जुड़कर अपने शहर में समाजी मिशन को आगे बढ़ाएँ

पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार-बढ़ई बिरादरी के लोगों से अपील—भीड़ नहीं, ख़िदमत के जज़्बे से सरशार चुनिंदा और साफ़-सुथरी छवि वाले लोगों की ज़रूरत

नई दिल्ली। पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार-बढ़ई बिरादरी के सामाजिक, शैक्षिक और सामुदायिक विकास के लिए काम कर रहे मुल्तानी समाज चैरिटेबल ट्रस्ट (रजि.) ऑल इंडिया से जुड़ने के इच्छुक बिरादराना हज़रात लगातार जानकारी हासिल करने के लिए संपर्क कर रहे हैं। बहुत से लोगों का सवाल है कि वे अपने शहर और कस्बे में रहते हुए ट्रस्ट के मिशन का हिस्सा किस तरह बन सकते हैं।

इसी सिलसिले में ट्रस्ट के फाउंडर ज़मीर आलम मुल्तानी की ओर से बिरादरी के लोगों को एक अहम इत्तिला दी गई है कि जो हज़रात अपने शहर या कस्बे में ट्रस्ट के साथ मिलकर समाजी ख़िदमत करना चाहते हैं, वे अपने क्षेत्र के 7, 9 या 11 ज़िम्मेदार लोगों की एक कमेटी गठित कर सकते हैं।

कमेटी में कौन लोग शामिल हों?

ट्रस्ट की ओर से यह कोशिश रहेगी कि कमेटी में ऐसे लोग शामिल हों जो आपस में बेहतर तालमेल रखते हों, बिरादरी की भलाई के लिए एक जैसी सोच और सकारात्मक विचार रखते हों तथा समाजी ख़िदमत के लिए वक़्त देने का जज़्बा रखते हों।

कमेटी में ऐसे लोगों को प्राथमिकता दी जाए जो:

  • समाजी और बिरादराना कामों में दिलचस्पी रखते हों।
  • अपने क्षेत्र में अच्छी और सम्मानजनक पहचान रखते हों।
  • आपसी भाईचारे और इत्तेहाद को अहमियत देते हों।
  • जिम्मेदारी को ईमानदारी और ख़ुलूस के साथ निभाने का जज़्बा रखते हों।
  • बिरादरी के बच्चों की तालीम, रोज़गार, सामाजिक जागरूकता और दूसरे सकारात्मक कार्यों में सहयोग करने के इच्छुक हों।
  • ट्रस्ट के नियमों और नीतियों के मुताबिक काम करने के लिए तैयार हों।

कमेटी बनने के बाद क्या करना होगा?

अपने शहर या कस्बे में कमेटी गठित करने के बाद कमेटी में शामिल सभी सदस्यों की पासपोर्ट साइज़ तस्वीर, आधार कार्ड की दोनों तरफ़ की स्पष्ट तस्वीर और मोबाइल नंबर ट्रस्ट को निर्धारित माध्यम से भेजे जा सकते हैं।

दस्तावेज़ प्राप्त होने और आवश्यक प्रक्रिया पूरी होने के बाद ट्रस्ट के हेड ऑफिस की ओर से संबंधित सदस्यों के लिए आईडी कार्ड, मेंबरशिप सर्टिफिकेट और अथॉरिटी लेटर आदि की प्रक्रिया पूरी की जाएगी।

इसके पश्चात ट्रस्ट की टीम आपसी सहमति से तय किए गए दिन और तारीख़ पर संबंधित शहर या कस्बे में पहुँचकर कमेटी के सदस्यों से मुलाक़ात करेगी और उन्हें ट्रस्ट की नीतियों, उद्देश्यों तथा समाजी मिशन की विस्तृत जानकारी दी जाएगी।

इस मौक़े पर कमेटी के सदस्यों का पगड़ी/साफ़ा पहनाकर और फूल-मालाओं से इस्तक़बाल भी किया जाएगा तथा उन्हें बिरादरी की ख़िदमत और समाजी कार्यों को आगे बढ़ाने के लिए ज़िम्मेदारियाँ सौंपी जाएँगी।

भीड़ नहीं, ख़िदमत का जज़्बा रखने वाले लोग चाहिए

ट्रस्ट के फाउंडर ज़मीर आलम मुल्तानी ने कहा कि हमारा मक़सद किसी भी शहर में महज़ भीड़ इकट्ठा करना नहीं है। हमारी कोशिश यह है कि हर शहर और कस्बे से ऐसे चुनिंदा, ज़िम्मेदार और समाजी ख़िदमत का जज़्बा रखने वाले लोग सामने आएँ जो अपनी ज़िम्मेदारी को पूरी ईमानदारी, ख़ुलूस और लगन के साथ निभा सकें।

उन्होंने कहा कि बिरादरी की तरक़्क़ी केवल किसी एक व्यक्ति या संस्था की कोशिश से मुमकिन नहीं, बल्कि इसके लिए समाज के ज़िम्मेदार लोगों को आगे आकर अपना किरदार अदा करना होगा। अगर हर शहर से कुछ ख़ुलूस रखने वाले लोग समाजी कामों को अपना मिशन समझकर आगे बढ़ें, तो बिरादरी के लिए सकारात्मक और दूरगामी काम किए जा सकते हैं।

हर शहर से उठे ख़िदमत की एक नई आवाज़

मुल्तानी समाज चैरिटेबल ट्रस्ट की कोशिश है कि बिरादरी के अलग-अलग शहरों और कस्बों में ऐसे लोगों का नेटवर्क तैयार हो जो स्थानीय स्तर पर समाजी और बिरादराना गतिविधियों को आगे बढ़ाने में अपना योगदान दे सकें।

इस मुहिम का मक़सद आपसी भाईचारा, इत्तेहाद, तालीम, समाजी जागरूकता और बिरादरी के बेहतर मुस्तक़बिल के लिए सकारात्मक माहौल तैयार करना है।

बिरादरी के तमाम हज़रात से गुज़ारिश है कि अगर आपके अंदर समाजी ख़िदमत का जज़्बा है और आप अपने शहर में बिरादरी के लिए कुछ बेहतर करना चाहते हैं, तो अपने भरोसेमंद साथियों के साथ मशवरा करके एक छोटी और ज़िम्मेदार कमेटी तैयार करें तथा ट्रस्ट से संपर्क करें।

याद रखिए—बिरादरी की ख़िदमत किसी ओहदे की मोहताज नहीं, बल्कि नीयत, ख़ुलूस और अमल की मोहताज है।


ख़ास रिपोर्ट

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार से पंजीकृत, मुल्क की राजधानी नई दिल्ली से प्रसारित पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी की क़ौमी समाचार पत्रिका, न्यूज़ पोर्टल एवं यूट्यूब चैनल "मुल्तानी समाज" के उत्तर प्रदेश डेस्क से प्रधान संपादक ज़मीर आलम की ख़ास रिपोर्ट।

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"मुल्तानी समाज"

अपनी बिरादरी की आवाज़ — अपनी पहचान

Monday, September 21, 2026

जनाब ज़लील अहमद का इंतिक़ाल, बिरादरी में ग़म की लहर, इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन —

नगीना (बिजनौर)। निहायत ही रंज-ओ-ग़म और अफ़सोस के साथ तमाम बिरादराना हज़रात को यह इत्तिला दी जाती है कि मोहल्ला लुहारी सराय, क़स्बा नगीना, ज़िला बिजनौर, उत्तर प्रदेश निवासी जनाब ज़लील अहमद वल्द जनाब शब्बीर अहमद, उम्र तक़रीबन 50 साल, आज मंगलवार, 22 सितंबर 2022 को क़ज़ा-ए-इलाही से इंतिक़ाल फ़रमा गए।

इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन।

मरहूम के इंतिक़ाल की ख़बर से खानदान, रिश्तेदारों, अहबाब और बिरादरी के लोगों में गहरा रंज-ओ-ग़म पाया जा रहा है। इस मुश्किल घड़ी में हम तमाम अहले-खानदान के ग़म में बराबर के शरीक हैं और बारगाह-ए-रब्बुल-आलमीन में मरहूम के लिए ख़ास दुआ-ए-मग़फ़िरत करते हैं।

या अल्लाह! मरहूम जनाब ज़लील अहमद की मुकम्मल मग़फ़िरत फ़रमा, उनकी ख़ताओं और कोताहियों से दरगुज़र फ़रमा, उनकी क़ब्र को नूर से मुनव्वर फ़रमा, क़ब्र को कुशादा और आराम की जगह बना, उन्हें जन्नतुल-फ़िरदौस में आला मुक़ाम अता फ़रमा और उनके तमाम गुनाहों को अपने फ़ज़्ल-ओ-करम से माफ़ फ़रमा। आमीन या रब्बुल-आलमीन।

दफ़्न और नमाज़-ए-जनाज़ा की जानकारी बाद में

ख़बर लिखे जाने तक मरहूम की नमाज़-ए-जनाज़ा और दफ़्न का वक़्त व मुक़ाम ज़िम्मेदारान की जानिब से तय नहीं हो पाया था। जैसे ही नमाज़-ए-जनाज़ा और दफ़्न से मुताल्लिक़ कोई जानकारी हासिल होगी, उसे ख़बर में फ़ौरन अपडेट कर दिया जाएगा।

तमाम बिरादराना हज़रात से गुज़ारिश है कि जानकारी मिलने पर नमाज़-ए-जनाज़ा में शिरकत फ़रमाएँ, मरहूम के लिए दुआ-ए-मग़फ़िरत करें और दफ़्न के मौक़े पर शरीक होकर सवाब-ए-दारैन हासिल करें।

क़ब्र में उतारते और मिट्टी देते वक़्त दुआ

मरहूम को क़ब्र में उतारते वक़्त तमाम हाज़िरीन अल्लाह तआला को याद करते हुए उनके लिए दुआ-ए-मग़फ़िरत करें। मिट्टी देते वक़्त यह आयत पढ़ना मुनासिब है:

مِنْهَا خَلَقْنَاكُمْ وَفِيهَا نُعِيدُكُمْ وَمِنْهَا نُخْرِجُكُمْ تَارَةً أُخْرَىٰ

"इसी मिट्टी से हमने तुम्हें पैदा किया, और इसी में तुम्हें वापस लौटाएँगे, और इसी से दोबारा तुम्हें निकालेंगे।"

या अल्लाह! इस क़ब्र को मरहूम के लिए जन्नत के बाग़ों में से एक बाग़ बना दे, इसे जहन्नम के गड्ढों में से कोई गड्ढा न बना। मरहूम को क़ब्र के सवालात में आसानी अता फ़रमा और उन्हें अपने रहमत व मग़फ़िरत के साये में जगह अता फ़रमा।

आमीन या रब्बुल-आलमीन।

अल्लाह तआला तमाम अहले-ख़ानदान को यह सदमा बर्दाश्त करने का हौसला, सब्र-ए-जमील और अज़्रे-अज़ीम अता फ़रमाए तथा मरहूम के लिए सदक़ा-ए-जारीया और नेक औलाद के ज़रिये उनके दरजात बुलंद फ़रमाए।

आमीन सुम्मा आमीन।


ख़ास रिपोर्ट

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार से पंजीकृत, मुल्क की राजधानी नई दिल्ली से प्रसारित, पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी की क़ौमी समाचार पत्रिका, न्यूज़ पोर्टल और यूट्यूब चैनल "मुल्तानी समाज" के लिए उत्तर प्रदेश डेस्क से प्रधान संपादक ज़मीर आलम की ख़ास रिपोर्ट।

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"मुल्तानी समाज"

अपनी बिरादरी की आवाज़ — अपनी पहचान

निहायत ही रंज-ओ-ग़म के साथ रिहाना बी के इंतक़ाल की इत्तिला

ग़ाज़ियाबाद/सरधना। निहायत ही रंज-ओ-ग़म और अफ़सोस के साथ तमाम मुस्लिम मुल्तानी लोहार, बढ़ई बिरादराना हज़रात को यह इत्तिला दी जाती है कि जनाब शमीम अहमद साहब, वल्द जनाब शब्बीर अहमद साहब, निवासी डबल चक्के, सरधना, ज़िला मेरठ, उत्तर प्रदेश, हाल मुक़ाम पसौंडा, गरिमा गार्डन, ज़िला ग़ाज़ियाबाद, उत्तर प्रदेश, निकट गोल चक्कर, दिल्ली, की अहलिया रिहाना बी का आज मंगलवार, 22 सितंबर 2026 को दिल्ली के सफ़दरजंग अस्पताल में इलाज के दौरान सुबह लगभग 9:00 बजे क़ज़ा-ए-इलाही से इंतक़ाल हो गया।

इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन।

मरहूमा के इंतक़ाल की ख़बर से खानदान, रिश्तेदारों, अज़ीज़-ओ-अक़ारिब और बिरादरी में गहरे रंज-ओ-ग़म की लहर दौड़ गई। इस मुश्किल और सदमे की घड़ी में तमाम बिरादराना हज़रात से गुज़ारिश है कि मरहूमा के लिए ख़ुसूसी तौर पर दुआ-ए-मग़फ़िरत फ़रमाएँ और अल्लाह तआला उनके तमाम सगीरा-ओ-कबीरा गुनाहों को माफ़ फ़रमाकर अपनी रहमत-ए-कामिला में जगह अता फ़रमाए।

नमाज़-ए-जनाज़ा और सुपुर्द-ए-ख़ाक

मिली हुई इत्तिला के मुताबिक़ मरहूमा रिहाना बी की नमाज़-ए-जनाज़ा नमाज़-ए-असर के बाद पसौंडा, गरिमा गार्डन, ज़िला ग़ाज़ियाबाद में अदा की जाएगी और इसके बाद मरहूमा को सुपुर्द-ए-ख़ाक किया जाएगा।

तमाम बिरादराना हज़रात से गुज़ारिश है कि अपनी मसरूफ़ियत में से वक़्त निकालकर जनाज़े में शिरकत फ़रमाएँ, मरहूमा के लिए दुआ-ए-मग़फ़िरत करें और ग़मज़दा खानदान के साथ शरीक-ए-ग़म हों।

जनाज़े में शिरकत के दौरान

जनाज़े में शामिल होने वाले हज़रात से गुज़ारिश है कि मरहूमा के लिए दिल से दुआ करें और अपनी ज़बान को ज़िक्र-ओ-दुआ से तर रखें।

नमाज़-ए-जनाज़ा के बाद दुआ:

اللّٰهُمَّ اغْفِرْ لَهَا وَارْحَمْهَا وَعَافِهَا وَاعْفُ عَنْهَا، وَأَكْرِمْ نُزُلَهَا وَوَسِّعْ مُدْخَلَهَا، وَاغْسِلْهَا بِالْمَاءِ وَالثَّلْجِ وَالْبَرَدِ۔

तर्जुमा:
ऐ अल्लाह! इसकी मग़फ़िरत फ़रमा, इस पर रहमत फ़रमा, इसे आफ़ियत अता फ़रमा और इससे दरगुज़र फ़रमा। इसके लिए अपनी मेहमाननवाज़ी को इज़्ज़त वाली बना और इसकी क़ब्र को कुशादा फ़रमा। इसे पानी, बर्फ़ और ओलों से धोकर पाक फ़रमा।

कब्र में उतारते वक़्त

जब मरहूमा को कब्र में उतारा जाए तो यह पढ़ना मस्नून है:

بِسْمِ اللّٰهِ وَعَلَىٰ مِلَّةِ رَسُولِ اللّٰهِ ﷺ

तर्जुमा:
अल्लाह के नाम के साथ और अल्लाह के रसूल ﷺ के दीन और तरीक़े पर।

कब्र में मरहूमा को रखने के बाद तमाम हाज़रीन उनके लिए दुआ-ए-मग़फ़िरत करें और अल्लाह तआला से सवाल करें कि वह कब्र के सफ़र को आसान फ़रमाए, कब्र को नूर से भर दे और उसे जन्नत के बाग़ों में से एक बाग़ बना दे।

मिट्टी देते वक़्त

सुपुर्द-ए-ख़ाक के मौक़े पर मिट्टी डालते हुए यह आयत पढ़ना मुनासिब है:

مِنْهَا خَلَقْنَاكُمْ وَفِيهَا نُعِيدُكُمْ وَمِنْهَا نُخْرِجُكُمْ تَارَةً أُخْرَىٰ

तर्जुमा:
हमने तुम्हें इसी मिट्टी से पैदा किया, इसी में तुम्हें वापस लौटाएँगे और इसी से दोबारा तुम्हें निकालेंगे।

इसके बाद मरहूमा के लिए दुआ की जाए:

ऐ अल्लाह! मरहूमा रिहाना बी की मग़फ़िरत फ़रमा, उनकी क़ब्र को नूर से मुनव्वर फ़रमा, उसे कुशादा और रौशन फ़रमा, उनकी तन्हाई को अपनी रहमत से दूर फ़रमा, कब्र के सवालात में आसानी अता फ़रमा, उनकी तमाम ख़ताओं से दरगुज़र फ़रमा और उन्हें जन्नतुल फ़िरदौस में आला मुक़ाम अता फ़रमा।

ऐ अल्लाह! जनाब शमीम अहमद साहब और तमाम पसमान्दगान को सब्र-ए-जमील अता फ़रमा। इस सदमे को बर्दाश्त करने की ताक़त अता फ़रमा और मरहूमा के लिए किया गया हर दुआ, सदक़ा और नेक अमल अपनी बारगाह में क़ुबूल फ़रमा।

आमीन या रब्बुल आलमीन।

तमाम मुस्लिम मुल्तानी लोहार, बढ़ई बिरादराना हज़रात से ख़ुसूसी गुज़ारिश है कि मरहूमा के लिए सूरह-ए-फ़ातिहा, सूरह-ए-इख़लास और दुआ-ए-मग़फ़िरत का एहतिमाम फ़रमाएँ और ग़मज़दा खानदान के साथ हमदर्दी का इज़हार करें।


ख़ास रिपोर्ट

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार से पंजीकृत, मुल्क की राजधानी नई दिल्ली से प्रसारित, पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी की मुल्क की इकलौती क़ौमी समाचार पत्रिका, न्यूज़ पोर्टल और यूट्यूब चैनल — “मुल्तानी समाज”

उत्तर प्रदेश डेस्क से
प्रधान संपादक — ज़मीर आलम की ख़ास रिपोर्ट


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“मुल्तानी समाज”

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मुल्तानी-डे की तारीख़ पर बढ़ता इख़्तिलाफ़, 12 नवंबर की रवायत या अक्टूबर में अलग-अलग कार्यक्रम ?—मुल्तानी बिरादरी में उठ रहे सवालों पर गौर करने की ज़रूरत

नई दिल्ली/उत्तर प्रदेश डेस्क।

पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी में इन दिनों एक सामाजिक और तंजीमी मसले को लेकर चर्चा तेज़ होती जा रही है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश समेत मुल्क के मुख़्तलिफ़ शहरों में काम कर रही कई सामाजिक तंजीमों की ओर से अक्टूबर माह में “मुल्तानी-डे” के नाम से कार्यक्रम आयोजित किए जाने की घोषणाओं के बाद बिरादरी के एक तबके में यह सवाल उठ रहा है कि आखिर “मुल्तानी-डे” की तारीख़ क्या है और इसकी असल रवायत किस तारीख़ से जुड़ी हुई है?

कुछ तंजीमों की ओर से 15 अक्टूबर, 19 अक्टूबर और अक्टूबर माह की अन्य तारीख़ों में कार्यक्रम आयोजित करने की घोषणाएं सामने आने के बाद यह बहस और भी ज़ोर पकड़ रही है। दूसरी तरफ़ “मुल्तानी समाज” राष्ट्रीय समाचार पत्रिका से जुड़े आयोजकों का कहना है कि उनके द्वारा 12 नवंबर को “जश्ने मुल्तानी-डे” मनाने की रवायत लंबे अरसे से चली आ रही है।

12 नवंबर की रवायत का क्या है दावा?

“मुल्तानी समाज” की ओर से उपलब्ध कराई गई जानकारी के मुताबिक, मुल्तानी समाज चैरिटेबल ट्रस्ट (रजि.), जो नई दिल्ली से संचालित समाजसेवी संगठन है, ने वर्ष 2011 में अपनी बिरादरी के नाम पर “मुल्तानी समाज” नामक पत्रिका के पंजीकरण की प्रक्रिया पूरी की थी।

उस दौर में सोशल मीडिया आज की तरह आम नहीं था। बिरादरी के लोगों के बीच सामाजिक गतिविधियों, शादी-ब्याह, ताज़ियत, ख़ुशी और दूसरे सामाजिक मामलों की जानकारी पहुंचाने में पत्रिकाओं और समाचार-पत्रों का अहम किरदार हुआ करता था।

इसी सिलसिले में “मुल्तानी समाज” राष्ट्रीय समाचार पत्रिका से जुड़े पदाधिकारियों के मुताबिक, पत्रिका के राष्ट्रीय अधिवेशन और बिरादरी की एकजुटता के प्रतीक के तौर पर हर वर्ष 12 नवंबर को “जश्ने मुल्तानी-डे” मनाने की रवायत शुरू की गई।

इस जश्न की ख़ास बात क्या रही?

“मुल्तानी-डे” के इस जश्न की एक ख़ास बात यह बताई जाती है कि इसके लिए किसी एक शहर, मैदान या हॉल को स्थायी आयोजन स्थल नहीं बनाया गया।

बल्कि बिरादरी के लोगों को यह पैग़ाम दिया गया कि मुल्क के किसी भी हिस्से में रहने वाला मुल्तानी भाई—चाहे वह गांव में हो, कस्बे में हो, शहर में हो या विदेश में—अपने घर और अपने इलाके में अपनी सहूलियत के मुताबिक इस दिन को मनाए।

कहीं क़ुरआन-ए-पाक की तिलावत के साथ दुआ की जाती है, कहीं सामाजिक बैठक होती है, कहीं मिठाई तक़सीम की जाती है और कुछ नौजवान इस दिन को अपने अंदाज़ में केक काटकर भी मनाते हैं।

यानी इस जश्न को किसी एक मंच या किसी एक शहर तक महदूद रखने के बजाय इसे पूरी बिरादरी से जोड़ने की कोशिश किए जाने का दावा किया जाता है।

फिर अक्टूबर की तारीख़ों पर क्यों उठ रहे हैं सवाल?

बिरादरी में मौजूदा बहस का असल केंद्र यही सवाल है।

“मुल्तानी समाज” से जुड़े लोगों का कहना है कि जब 12 नवंबर को “मुल्तानी-डे” के नाम से एक रवायत पहले से चली आ रही है और बिरादरी के लोगों को इसकी जानकारी भी है, तो अक्टूबर में इसी नाम से अलग-अलग कार्यक्रम आयोजित करने की ज़रूरत और वजह क्या है?

वहीं दूसरी ओर, अक्टूबर में कार्यक्रम आयोजित करने वाली तंजीमों के अपने सामाजिक और तंजीमी कारण हो सकते हैं। इसलिए इस मामले में किसी भी पक्ष की मंशा पर अंतिम राय कायम करने के बजाय तारीख़, इतिहास और कार्यक्रम की रवायत को सामने रखकर बिरादरी के बुज़ुर्गों और जिम्मेदार लोगों के बीच बातचीत होना ज़रूरी दिखाई देता है।

बुज़ुर्गों के किरदार पर भी उठ रहे सवाल

मुल्तानी बिरादरी में जब भी किसी मामले को लेकर इख़्तिलाफ़ पैदा होता रहा है, बुज़ुर्गों, उलेमा, सामाजिक कार्यकर्ताओं और जिम्मेदार लोगों से यह उम्मीद की जाती रही है कि वे दोनों पक्षों को बैठाकर बातचीत के ज़रिए कोई रास्ता निकालें।

लेकिन मौजूदा विवाद को लेकर कुछ लोगों का कहना है कि जिन बुज़ुर्गों और सामाजिक हस्तियों से बीच-बचाव की उम्मीद की जा रही थी, उनकी तरफ़ से अभी तक कोई ऐसा साझा प्रयास सामने नहीं आया जिससे इस मसले को आपसी बातचीत से हल किया जा सके।

ऐसे में सवाल यह भी है कि अगर एक ही बिरादरी के लोग एक ही नाम से अलग-अलग तारीख़ों पर कार्यक्रम करेंगे, तो इससे इत्तेहाद बढ़ेगा या इख़्तिलाफ़?

मसला तारीख़ से ज़्यादा बिरादरी के इत्तेहाद का है

दरअसल, “मुल्तानी-डे” की बहस को केवल तारीख़ का विवाद समझना शायद इस पूरे मामले को छोटा कर देना होगा।

मुल्तानी बिरादरी देश के अलग-अलग हिस्सों में आबाद है और बड़ी संख्या में लोग रोज़गार, कारोबार और दूसरी वजहों से मुल्क के मुख़्तलिफ़ शहरों के अलावा विदेशों में भी रहते हैं।

ऐसे में किसी भी सामाजिक जश्न की असल खूबसूरती उसी वक्त कायम रह सकती है जब वह इत्तेहाद, भाईचारे, मोहब्बत और आपसी एहतराम का ज़रिया बने।

अगर एक ही बिरादरी के अलग-अलग संगठन एक ही नाम को अलग-अलग तारीख़ों और अलग-अलग बैनरों के साथ मनाएंगे, तो स्वाभाविक रूप से बिरादरी के आम लोगों के बीच यह सवाल पैदा होगा कि आखिर असल रवायत क्या है?

क्या दोनों पक्ष एक साथ बैठ सकते हैं?

मौजूदा हालात में सबसे अहम सवाल यही है कि क्या मुल्तानी बिरादरी की तमाम तंजीमें इस मसले को अनाना और तंजीमी मतभेद बनाने के बजाय आपसी मशवरे से हल कर सकती हैं?

अगर अक्टूबर में कार्यक्रम आयोजित करने वाली तंजीमें और 12 नवंबर की रवायत का दावा करने वाले आयोजक एक मेज़ पर बैठकर इतिहास, दस्तावेज़, पुरानी रवायत और कार्यक्रम की शुरुआत से संबंधित रिकॉर्ड सामने रखें, तो शायद इस बहस का कोई सम्मानजनक रास्ता निकाला जा सकता है।

आख़िरकार जश्न किसी एक शख़्स, संस्था या शहर की मिल्कियत नहीं होता; बिरादरी की तारीख़ और रवायत पूरी बिरादरी की अमानत होती है।

बिरादरी से एक सीधा सवाल

आज मुल्तानी बिरादरी के सामने सवाल यह नहीं होना चाहिए कि कौन किसके साथ है?

सवाल यह होना चाहिए कि—

“मुल्तानी-डे” की बुनियादी रवायत कब शुरू हुई?
उसकी तारीख़ का दस्तावेज़ी आधार क्या है?
और अगर 12 नवंबर से यह जश्न मनाया जाता रहा है तो अक्टूबर में उसी नाम से नए कार्यक्रम शुरू करने की ज़रूरत क्यों महसूस हुई?

इन सवालों का जवाब बहस, तकरार या इल्ज़ाम से नहीं, बल्कि दस्तावेज़, तारीख़ और आपसी मशविरे से मिलना चाहिए।

हमारा मक़सद टकराव नहीं, तजवीज़ और इत्तेहाद है

“मुल्तानी समाज” की ओर से कहा गया है कि इस रिपोर्ट का मक़सद किसी तंजीम, शख़्स या बिरादरी के किसी फर्द की तौहीन करना नहीं, बल्कि एक ऐसे सामाजिक मसले को सामने लाना है जिस पर बिरादरी के लोग चर्चा कर रहे हैं।

अगर किसी दूसरी तंजीम के पास “मुल्तानी-डे” की तारीख़, उसके आरंभ या उसके कार्यक्रम की कोई अलग दस्तावेज़ी रवायत मौजूद है, तो उसे भी बिरादरी के सामने लाया जाना चाहिए।

क्योंकि सच अगर दस्तावेज़ में मौजूद है तो उसे सामने आने से किसी को डर नहीं होना चाहिए।

बिरादरी का इत्तेहाद तारीख़ की बहस से बड़ा है और आपसी भाईचारा हर तंजीमी इख़्तिलाफ़ से ऊपर है।

अब फैसला मुल्तानी बिरादरी के संजीदा, समझदार और जागरूक अफ़राद को करना है कि “मुल्तानी-डे” की इस रवायत को एक तारीख़ और एक साझा मंच के तहत आगे बढ़ाया जाए या अक्टूबर और नवंबर में अलग-अलग कार्यक्रमों के रूप में मनाया जाए।

आपकी राय क्या है? अपनी बेबाक लेकिन तहज़ीब के दायरे में राय कमेंट में ज़रूर दें।


विशेष रिपोर्ट
उत्तर प्रदेश डेस्क
ज़मीर आलम, प्रधान संपादक

“मुल्तानी समाज”
सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार से पंजीकृत, मुल्क की राजधानी नई दिल्ली से प्रसारित, पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी की क़ौमी समाचार पत्रिका, न्यूज़ पोर्टल एवं यूट्यूब चैनल।

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