✍️ ज़मीर आलम | प्रधान संपादक, मुल्तानी समाज
जलालाबाद (जनपद शामली, उत्तर प्रदेश)।
समाज की असली ख़ूबसूरती सिर्फ़ रिश्ते बनाने में नहीं, बल्कि टूटते हुए रिश्तों को फिर से जोड़ने में होती है। जब नफ़रत, ग़ुस्सा और मुक़दमेबाज़ी रिश्तों पर हावी होने लगें, तब कुछ ऐसे लोग सामने आते हैं जो अपनी हिकमत, सब्र, अख़लाक़ और ख़ुलूस से बिखरते घरों को फिर आबाद कर देते हैं। क़स्बा जलालाबाद में पेश आया एक ऐसा ही वाक़िया आज पूरे समाज के लिए एक मिसाल बन गया।
जनपद शामली के एक युवक और क़स्बा जलालाबाद की एक युवती के बीच काफ़ी समय से घरेलू विवाद चला आ रहा था। दोनों परिवारों के बीच लगभग डेढ़ वर्ष से मुक़दमेबाज़ी जारी थी। रिश्तेदारों, बिरादरी के ज़िम्मेदार लोगों और स्थानीय गणमान्य नागरिकों ने कई बार दोनों पक्षों के बीच सुलह कराने की कोशिश की। यह मामला तीन बार स्थानीय विधायक तक भी पहुँचा, मगर तमाम कोशिशों के बावजूद कोई स्थायी हल नहीं निकल सका।
मामले ने उस समय और भी दर्दनाक मोड़ ले लिया जब इस दौरान दुल्हन के सिर से उसके वालिद का साया उठ गया और वह यतीम हो गई। इस हादसे ने हर दर्दमंद दिल को झकझोर दिया, लेकिन इसके बावजूद विवाद समाप्त नहीं हो सका।
अल्हम्दुलिल्लाह, जब यह मामला जलालाबाद के वरिष्ठ समाजसेवी हाजी नज़ीर अहमद साहब तक पहुँचा तो उन्होंने इसे महज़ एक पारिवारिक झगड़ा नहीं, बल्कि समाज की अमानत समझा। उन्होंने रामपुर (ज़िला सहारनपुर) निवासी जनाब अमीर हसन साहब, इज़हार मेंबर साहब तथा हाजी मसीउल्लाह साहब (जलालाबाद) के साथ मिलकर दोनों पक्षों को आमने-सामने बैठाया।
लंबी बातचीत, आपसी मशवरे, सब्र, हिकमत और इस्लामी उसूलों के मुताबिक़ सुलह-सफ़ाई की कोशिशों के बाद आख़िरकार दोनों पक्ष आपसी रज़ामंदी से समझौते पर राज़ी हो गए। सबसे ख़ुशी की बात यह रही कि दोनों परिवारों ने एक-दूसरे के विरुद्ध दर्ज सभी मुक़दमे भी वापस लेने का फ़ैसला किया। इस तरह एक लंबे समय से चला आ रहा विवाद भाईचारे, मोहब्बत और समझदारी के साथ समाप्त हो गया।
इस्लाम हमेशा अमन, मोहब्बत, माफ़ी और सुलह की तालीम देता है। क़ुरआन-ए-करीम और हदीस-ए-पाक में भी लोगों के दरमियान सुलह कराने को बड़ी नेकी और अज़ीम अमल बताया गया है। ऐसे में जलालाबाद के समाजसेवियों की यह पहल न सिर्फ़ दोनों परिवारों के लिए राहत लेकर आई, बल्कि पूरे समाज के लिए यह पैग़ाम भी दे गई कि बातचीत और आपसी समझदारी से बड़े से बड़ा विवाद भी ख़त्म किया जा सकता है।
आज ज़रूरत इस बात की है कि समाज में मुक़दमेबाज़ी, कटुता और नफ़रत की बजाय आपसी मशवरे, सुलह और भाईचारे की संस्कृति को बढ़ावा दिया जाए। जब समाज के ज़िम्मेदार लोग अपनी ज़िम्मेदारी ईमानदारी से निभाते हैं तो न सिर्फ़ परिवार बचते हैं, बल्कि आने वाली नस्लों के लिए भी बेहतर माहौल तैयार होता है।
अल्लाह तआला से दुआ है कि वह दोनों परिवारों के दरमियान हमेशा मोहब्बत, अमन, बरकत और इत्तेहाद क़ायम रखे तथा इस नेक पहल में शामिल सभी समाजसेवियों को दुनिया और आख़िरत में बेहतरीन अज्र-ओ-सवाब अता फ़रमाए। आमीन या रब्बुल आलमीन।
✍️ ख़ास रिपोर्ट: ज़मीर आलम, प्रधान संपादक (उत्तर प्रदेश डेस्क)
सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा पंजीकृत, देश की राजधानी दिल्ली से प्रसारित, पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार-बढ़ई बिरादरी की देश की इकलौती राष्ट्रीय समाचार पत्रिका, न्यूज़ पोर्टल एवं यूट्यूब चैनल "मुल्तानी समाज" के लिए विशेष रिपोर्ट।
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