Saturday, October 17, 2026

🏆 मुल्तानी समाज के होनहार जीशान मिर्ज़ा का कैरम में शानदार कारनामा, उत्तर प्रदेश की 30वीं राज्य चैंपियनशिप में बने एकल विजेता!

मुज़फ्फरनगर के जीशान मिर्ज़ा ने अपनी प्रतिभा, मेहनत और शानदार खेल से हासिल किया ख़िताबी मुक़ाम, मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी और उत्तर प्रदेश का नाम किया रोशन

नई दिल्ली। मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी के लिए यह ख़ुशी और फ़ख़्र का मौक़ा है कि उत्तर प्रदेश के ज़िला मुज़फ्फरनगर से ताल्लुक़ रखने वाले होनहार खिलाड़ी जीशान मिर्ज़ा ने कैरम के मैदान में अपनी शानदार प्रतिभा का लोहा मनवाते हुए 30वीं उत्तर प्रदेश राज्य कैरम चैंपियनशिप की एकल स्पर्धा का ख़िताब अपने नाम कर लिया। जीशान मिर्ज़ा की इस शानदार कामयाबी से न सिर्फ़ मुज़फ्फरनगर और उत्तर प्रदेश का नाम रोशन हुआ है, बल्कि मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी के लोगों में भी ख़ुशी और फ़ख़्र की लहर दौड़ गई है।

जीशान मिर्ज़ा की यह कामयाबी इस बात की मिसाल है कि मेहनत, लगन, सब्र और लगातार कोशिश के ज़रिए इंसान अपनी मंज़िल हासिल कर सकता है। उनकी जीत नौजवानों के लिए एक हौसला-अफ़ज़ा पैग़ाम है कि अपनी सलाहियत को पहचानकर मैदान में उतरने वाले लोग अपनी मेहनत से नई पहचान बना सकते हैं।

30वीं उत्तर प्रदेश राज्य कैरम चैंपियनशिप का शानदार समापन

उत्तर प्रदेश कैरम एसोसिएशन एवं गौतम बुद्ध नगर कैरम एसोसिएशन के संयुक्त तत्वावधान में हरिकिशन सिंह सुरजीत भवन, इंद्रजीत गुप्ता में आयोजित 30वीं उत्तर प्रदेश राज्य कैरम चैंपियनशिप का समापन हुआ। इस प्रतियोगिता में प्रदेश के विभिन्न जनपदों से आए खिलाड़ियों ने अपनी खेल प्रतिभा का शानदार प्रदर्शन किया और ख़िताबी मुक़ाबलों में अपनी जगह बनाने के लिए भरपूर मेहनत की।

टीम चैंपियनशिप में प्रयागराज की टीम ने शानदार प्रदर्शन करते हुए पहला स्थान हासिल किया, जबकि मुरादाबाद की टीम दूसरे और झांसी की टीम तीसरे स्थान पर रही। फ़ाइनल मुक़ाबले में प्रयागराज ने मुरादाबाद को तथा झांसी ने गोरखपुर को 3-0 से शिकस्त दी।

इसी चैंपियनशिप की एकल स्पर्धा में मुज़फ्फरनगर के जीशान मिर्ज़ा ने अपनी बेहतरीन खेल रणनीति, एकाग्रता और शानदार प्रदर्शन के दम पर ख़िताबी जीत दर्ज की।

जीशान मिर्ज़ा ने फ़ाइनल में मोहम्मद ताबिश को दी शिकस्त

एकल स्पर्धा के फ़ाइनल मुक़ाबले में जीशान मिर्ज़ा का सामना प्रयागराज के खिलाड़ी मोहम्मद ताबिश से हुआ। इस अहम मुक़ाबले में जीशान ने शानदार खेल का प्रदर्शन करते हुए मोहम्मद ताबिश को 24-1 और 25-18 के स्कोर से हराकर चैंपियन बनने का गौरव हासिल किया।

जीशान मिर्ज़ा की यह जीत उनके खेल कौशल, एकाग्रता और दबाव में बेहतर प्रदर्शन करने की क्षमता को दर्शाती है। राज्य स्तर की प्रतिष्ठित प्रतियोगिता में ख़िताब जीतना किसी भी खिलाड़ी के लिए बड़ी उपलब्धि है। ऐसे में मुज़फ्फरनगर के इस होनहार खिलाड़ी की कामयाबी को बिरादरी के लिए भी एक यादगार उपलब्धि के तौर पर देखा जा रहा है।

प्रतियोगिता में वाराणसी के कृष्ण दयाल यादव ने तीसरा और झांसी के पद्म सौरभ सिंहारिया ने चौथा स्थान हासिल किया।

सेमीफ़ाइनल से फ़ाइनल तक जीशान का शानदार सफ़र


चैंपियनशिप के सेमीफ़ाइनल मुक़ाबले में जीशान मिर्ज़ा ने वाराणसी के कृष्ण दयाल यादव को कड़े मुक़ाबले में 25-8 और 24-6 से पराजित कर फ़ाइनल में अपनी जगह पक्की की। वहीं दूसरे सेमीफ़ाइनल में प्रयागराज के मोहम्मद ताबिश ने झांसी के पद्म सौरभ सिंहारिया को 19-24, 25-16 और 25-17 के स्कोर से हराकर फ़ाइनल में प्रवेश किया।

क्वार्टर फ़ाइनल मुक़ाबलों में भी खिलाड़ियों के बीच दिलचस्प प्रतिस्पर्धा देखने को मिली। जीशान मिर्ज़ा ने शहादत को, कृष्ण दयाल यादव ने जमशेद आलम को, पद्म सौरभ सिंहारिया ने मोहम्मद आसिफ को और मोहम्मद ताबिश ने मीजान अंसारी को हराकर अगले दौर में जगह बनाई।

इन तमाम मुक़ाबलों के बाद जीशान मिर्ज़ा ने अपनी शानदार फ़ॉर्म बरक़रार रखते हुए फ़ाइनल में जीत हासिल की और राज्य चैंपियन बनने का सम्मान प्राप्त किया।

विजेताओं को ट्रॉफ़ी, मेडल और प्रमाणपत्र देकर किया गया सम्मानित

चैंपियनशिप के समापन समारोह में अंतरराष्ट्रीय कैरम महासंघ के महासचिव वी.डी. नारायण, आयोजन सचिव एवं नेशनल कैरम फेडरेशन की महासचिव भारती नारायण, उत्तर प्रदेश कैरम एसोसिएशन के अध्यक्ष बैजनाथ सिंह तथा प्रदेश सचिव एडवोकेट सिराजुद्दीन ने विजेता खिलाड़ियों को ट्रॉफ़ी, मेडल और प्रमाणपत्र देकर सम्मानित किया।

इस मौक़े पर वी.डी. नारायण ने कैरम को एक वैज्ञानिक खेल बताते हुए कहा कि इसमें खिलाड़ियों की मानसिक और शारीरिक क्षमताओं की परीक्षा होती है। उन्होंने उम्मीद जताई कि आने वाले समय में कैरम देश और दुनिया के लोकप्रिय इंडोर खेलों में अपनी एक मज़बूत पहचान बनाएगा।

समारोह को दिल्ली कैरम एसोसिएशन के फारुख अहमद, जाहिद भाई तथा मध्यप्रदेश कैरम एसोसिएशन के काशीराम ने भी संबोधित किया। कार्यक्रम का संचालन एडवोकेट सिराजुद्दीन ने किया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन उपाध्यक्ष अनिल सहमद ने प्रस्तुत किया।

प्रतियोगिता के मैचों का संचालन इंटरनेशनल रेफ़री काशीराम, रमेश वर्मा एवं टेक्निकल डायरेक्टर सरदार रणवीर सिंह के नेतृत्व में हुआ। आयोजकों के अनुसार, प्रतियोगिता में सभी मुक़ाबले कैरम बोर्ड पर बिना अंपायर के खेले गए, जिसे खिलाड़ियों ने एक नए प्रयोग के तौर पर सराहा।

मुज़फ्फरनगर, उत्तर प्रदेश और मुल्तानी बिरादरी के लिए फ़ख़्र का मौक़ा

जीशान मिर्ज़ा की इस कामयाबी को केवल एक खेल प्रतियोगिता में मिली जीत तक सीमित नहीं समझा जाना चाहिए। यह कामयाबी इस बात का पैग़ाम भी है कि हमारे समाज के नौजवानों में प्रतिभा की कोई कमी नहीं है। ज़रूरत है उनकी सलाहियत को पहचानने, उन्हें आगे बढ़ने के मौक़े देने और उनकी मेहनत की हौसला-अफ़ज़ाई करने की।

मुज़फ्फरनगर के जीशान मिर्ज़ा ने राज्य स्तर की चैंपियनशिप में एकल ख़िताब जीतकर अपने ज़िले और उत्तर प्रदेश को गौरवान्वित किया है। उनकी इस उपलब्धि से मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी के नौजवानों को भी खेल और दूसरे क्षेत्रों में आगे बढ़ने की प्रेरणा मिलेगी।

हमारी बिरादरी के ऐसे होनहार नौजवान समाज की असल पूँजी हैं। जब हमारे बच्चे और नौजवान अपनी मेहनत, हुनर और क़ाबिलियत से कामयाबी हासिल करते हैं, तो उनका यह सफ़र आने वाली नस्लों के लिए उम्मीद की नई राहें खोलता है।

अख़बार की ओर से पैग़ाम: जीशान मिर्ज़ा की कामयाबी पर उन्हें दिली मुबारकबाद। दुआ है कि अल्लाह तआला उन्हें इसी तरह कामयाबी, इज़्ज़त और तरक़्क़ी अता फ़रमाए तथा वे भविष्य में भी अपने वालिदैन, अपने ज़िले मुज़फ्फरनगर, उत्तर प्रदेश और मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी का नाम रोशन करते रहें। आमीन।


मुल्तानी समाज की ख़ास रिपोर्ट

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार से पंजीकृत, मुल्क की राजधानी नई दिल्ली से प्रसारित, पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी की मुल्क की इकलौती क़ौमी समाचार पत्रिका, न्यूज़ पोर्टल और यूट्यूब चैनल ‘मुल्तानी समाज’ के लिए उत्तर प्रदेश डेस्क से प्रधान संपादक ज़मीर आलम की ख़ास रिपोर्ट।

अपनी ख़बर क़ौमी सतह पर प्रकाशित एवं प्रसारित करवाएँ

अगर आप भी अपनी ख़बर, मज़मून (आर्टिकल), पैग़ाम, मुबारकबाद, ताज़ियती इश्तिहार, दिलचस्प वाक़ियात, तहरीर, अफ़साना (कहानी) या अपने कारोबार का इश्तिहार (विज्ञापन) क़ौमी सतह पर शाया (प्रकाशित) या प्रसारित करवाना चाहते हैं, तो बराए मेहरबानी नीचे दिए गए नंबरों पर राब्ता फ़रमाएँ।

📞 9410652990

📞 8010884848

आपका एतमाद ही हमारी सबसे बड़ी ताक़त है।

“मुल्तानी समाज” — अपनी बिरादरी की आवाज़, अपनी पहचान।

सर सैयद अहमद ख़ानؒ की यौम-ए-पैदाइश पर ख़िराज-ए-अक़ीदत तालीम, तहज़ीब और इस्लाह-ए-मुआशरा के अलमबरदार की याद में मुल्तानी समाज का ख़ुसूसी पैग़ाम

मुल्तानी समाज राष्ट्रीय समाचार पत्रिका | 17 अक्टूबर 2026

अलीगढ़/नई दिल्ली। हिंदुस्तान की तारीख़ में कुछ शख़्सियतें ऐसी होती हैं जिनकी ख़िदमात का नूर आने वाली नस्लों के लिए मशाल-ए-राह बन जाता है। सर सैयद अहमद ख़ान उन्हीं अज़ीम शख़्सियात में से एक थे, जिन्होंने तालीम, शऊर, तहज़ीब और समाजी इस्लाह के ज़रिये मुस्लिम मुआशरे को नई राह दिखाने की कोशिश की। 17 अक्टूबर 1817 को दिल्ली में पैदा होने वाले सर सैयद अहमद ख़ान ने अपनी ज़िंदगी का एक बड़ा हिस्सा मुस्लिम समाज में इल्म की अहमियत उजागर करने और आधुनिक तालीम को फ़रोग़ देने के लिए वक़्फ़ कर दिया।

मुल्तानी समाज राष्ट्रीय समाचार पत्रिका की ओर से इस अज़ीम मुस्लिह-ए-क़ौम की यौम-ए-पैदाइश के मौक़े पर उन्हें ख़िराज-ए-अक़ीदत पेश किया जाता है और उनकी तालीमी व समाजी ख़िदमात को याद किया जाता है।

सर सैयद अहमद ख़ान: इल्म की रोशनी से मुआशरे को मुनव्वर करने वाली शख़्सियत

सर सैयद अहमद ख़ान का नाम हिंदुस्तान में आधुनिक मुस्लिम तालीम की तारीख़ में ख़ास अहमियत रखता है। उन्होंने उस दौर में शिक्षा की ज़रूरत पर ज़ोर दिया, जब समाज के एक बड़े हिस्से को आधुनिक तालीम की तरफ़ लाने के लिए लगातार कोशिशों की ज़रूरत थी। उनका मक़सद नौजवानों को इल्म, दानिश, तर्क़ और नए ज़माने के ज्ञान से आरास्ता करना था, ताकि वे बदलते हुए दौर में अपनी सलाहियतों का भरपूर इस्तेमाल कर सकें।

उन्होंने 1863 में साइंटिफिक सोसाइटी क़ायम की, जिसके ज़रिये आधुनिक इल्म और वैज्ञानिक विचारों को भारतीय समाज तक पहुँचाने की कोशिश की गई। इसके बाद उन्होंने तहज़ीब-उल-अख़लाक़ के माध्यम से समाजी इस्लाह, अख़लाक़ी बेदारी और बेहतर सामाजिक रवैये की हिमायत की।

तहरीक-ए-अलीगढ़: मुस्लिम तालीम की तारीख़ का अहम बाब

सर सैयद अहमद ख़ान की सबसे अहम तालीमी कोशिशों में से एक अलीगढ़ में मोहम्मडन एंग्लो-ओरिएंटल कॉलेज की स्थापना थी। वर्ष 1875 में शुरू होने वाली इस तहरीक ने आगे चलकर भारतीय मुस्लिम समाज में आधुनिक शिक्षा के प्रसार को एक नई पहचान दी। वर्ष 1920 में यही संस्थान अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के रूप में स्थापित हुआ।

अलीगढ़ की यह तालीमी विरासत आज भी इस बात की याद दिलाती है कि किसी भी क़ौम की तरक़्क़ी के लिए स्कूल, कॉलेज, किताबें, इल्म और तालीमी इदारों की अहमियत बुनियादी होती है।

मुस्लिम मुआशरे की तरक़्क़ी का रास्ता: तालीम, हुनर और शऊर

आज के दौर में सर सैयद अहमद ख़ान की तालीमी सोच से सबक़ लेते हुए मुस्लिम समाज को अपने बच्चों और नौजवानों की शिक्षा पर विशेष तवज्जोह देने की ज़रूरत है। दीनी तालीम के साथ-साथ आधुनिक शिक्षा, तकनीकी ज्ञान, रोज़गारपरक हुनर और साइंस के मैदान में आगे बढ़ना भी वक़्त की अहम ज़रूरत है।

वालिदैन की ज़िम्मेदारी है कि वे अपने बच्चों की तालीम को प्राथमिकता दें, उन्हें अच्छे स्कूलों और कॉलेजों तक पहुँचाने की कोशिश करें तथा उनकी सलाहियतों को पहचानकर आगे बढ़ने में मदद करें। समाज के ज़िम्मेदार अफ़राद, तंजीमें और ख़ैराती इदारे भी ज़रूरतमंद और होनहार विद्यार्थियों की मदद के लिए आगे आएँ।

किसी भी बिरादरी की असल ताक़त सिर्फ़ उसकी आबादी या तारीख़ी पहचान में नहीं, बल्कि उसके बच्चों के इल्म, अख़लाक़, हुनर और किरदार में होती है।

मुल्तानी समाज का पैग़ाम: अपनी नस्लों को तालीम से जोड़िए

मुल्तानी समाज राष्ट्रीय समाचार पत्रिका का मानना है कि बिरादरी की बेहतरी के लिए तालीमी बेदारी, समाजी इत्तेहाद और एक-दूसरे की मदद का जज़्बा बेहद ज़रूरी है। हमें चाहिए कि हम अपने बच्चों को तालीम के मैदान में आगे बढ़ाएँ, बेटियों की शिक्षा को भी पूरी अहमियत दें, नौजवानों को हुनरमंद बनाएँ और ज़रूरतमंद परिवारों के बच्चों की पढ़ाई में अपनी हैसियत के मुताबिक़ मदद करें।

सर सैयद अहमद ख़ान की ज़िंदगी हमें यह पैग़ाम देती है कि समाजी बेदारी के लिए दूरअंदेशी, मेहनत और इल्म से मोहब्बत ज़रूरी है। अगर हम अपनी आने वाली नस्लों को तालीम और अच्छे अख़लाक़ का तोहफ़ा देंगे, तो यही हमारे समाज के बेहतर मुस्तक़बिल की मज़बूत बुनियाद बनेगा।

सर सैयद साहब को सच्चा ख़िराज-ए-अक़ीदत

सर सैयद अहमद ख़ान की यौम-ए-पैदाइश पर उन्हें याद करना केवल एक रस्मी अमल नहीं, बल्कि उनके तालीमी मिशन से सबक़ लेने का मौक़ा भी है। आइए, हम सब मिलकर यह अहद करें कि अपने घरों, मोहल्लों और बिरादरी में तालीम की अहमियत को आम करेंगे, बच्चों की पढ़ाई में मदद करेंगे और समाज में इल्म, तहज़ीब, अख़लाक़ तथा भाईचारे को फ़रोग़ देंगे।

इल्म से शऊर, शऊर से तरक़्क़ी और तरक़्क़ी से रोशन मुस्तक़बिल की राह निकलती है।

मुल्तानी समाज राष्ट्रीय समाचार पत्रिका की ओर से सर सैयद अहमद ख़ान को ख़िराज-ए-अक़ीदत और तमाम अहले-वतन को तालीम, अमन, इत्तेहाद और भाईचारे का पैग़ाम।


मुल्तानी समाज — अपनी बिरादरी की आवाज़, अपनी पहचान

आपका एतमाद ही हमारी सबसे बड़ी ताक़त है। आपकी बिरादरी, आपकी ख़बरें, आपकी कामयाबियाँ और आपके समाजी मसाइल हमारी तवज्जोह का मरकज़ हैं। मुल्तानी समाज राष्ट्रीय समाचार पत्रिका का मक़सद बिरादरी की आवाज़ को ज़िम्मेदारी के साथ सामने लाना, समाजी बेदारी को फ़रोग़ देना और आपसी राब्ते को मज़बूत बनाना है।

राब्ते के लिए:

📞 9410652990
📞 8010884848

मुल्तानी समाज राष्ट्रीय समाचार पत्रिका
अपनी बिरादरी की आवाज़, अपनी पहचान।

🥀 इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन 🥀गाँव बिनौली में छाया मातम: मिस्त्री हसीनुद्दीन उर्फ़ हसीनू का इंतिक़ाल, तीन बेटों और अहलो-अयाल को रोता-बिलखता छोड़ दुनिया-ए-फ़ानी से हुए रुख़्सत

बागपत (उत्तर प्रदेश)। निहायत ही रंज-ओ-ग़म, दिली सदमे और अश्कबार आँखों के साथ तमाम अहले-इस्लाम, मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादराना हज़रात को यह दर्दनाक इत्तिला दी जाती है कि गाँव बिनौली, तहसील बड़ौत, ज़िला बागपत, उत्तर प्रदेश के साकिन मिस्त्री हसीनुद्दीन उर्फ़ हसीनू वल्द जनाब अलीमुद्दीन साहब, उम्र तक़रीबन 55 साल, का आज दिन शनिचर, बा-तारीख़ 17 अक्टूबर 2026 को सुबह तक़रीबन 10 बजे क़ज़ा-ए-इलाही से इंतिक़ाल हो गया है।

मरहूम के इंतिक़ाल की ख़बर से घर-ख़ानदान, अज़ीज़-ओ-अक़ारिब, दोस्त-अहबाब और पूरी बिरादरी में ग़म की लहर दौड़ गई है। इस दर्दनाक ख़बर ने हर उस दिल को ग़मज़दा कर दिया है, जो मरहूम को जानता और उनसे वाबस्ता था।

मरहूम हसीनुद्दीन उर्फ़ हसीनू अपने पीछे अपनी अहलिया, तीन साहिबज़ादों और भरे-पूरे कुनबे-ख़ानदान समेत तमाम अज़ीज़-ओ-अक़ारिब को ग़मगीन, अश्कबार और रोता-बिलखता छोड़कर इस दुनिया-ए-फ़ानी से हमेशा-हमेशा के लिए रुख़्सत हो गए। इंसानी ज़िंदगी की यही हक़ीक़त है कि हर जान को एक दिन अपने रब की बारगाह में लौटकर जाना है। मगर किसी अपने का यूँ अचानक बिछड़ जाना दिलों पर ऐसा ज़ख़्म छोड़ जाता है, जिसे अल्फ़ाज़ में बयान करना बेहद मुश्किल है।

🥀 नमाज़-ए-जनाज़ा और तदफ़ीन की इत्तिला

मिली जानकारी के मुताबिक़ मरहूम की नमाज़-ए-असर के बाद आज शाम तक़रीबन 5 बजे नमाज़-ए-जनाज़ा अदा की जाएगी और उसके बाद सुपुर्द-ए-ख़ाक किया जाएगा।

तमाम बिरादराना हज़रात, अज़ीज़-ओ-अक़ारिब, दोस्त-अहबाब और अहले-गाँव से गुज़ारिश है कि वक़्त पर पहुँचकर नमाज़-ए-जनाज़ा में शिरकत फ़रमाएँ, मरहूम के लिए दुआ-ए-मग़फ़िरत करें और उनके ग़मज़दा अहलो-अयाल को सब्र-ओ-तसल्ली दें। किसी मुसलमान के जनाज़े में शरीक होना, उसके हक़ में दुआ करना और आख़िरी सफ़र में साथ देना बड़ी नेकी और सवाब का काम है।

🤲 मरहूम की मग़फ़िरत के लिए दुआ

ऐ अल्लाह! मिस्त्री हसीनुद्दीन उर्फ़ हसीनू मरहूम की मुकम्मल मग़फ़िरत फ़रमा। उनकी ख़ताओं, ग़लतियों और कोताहियों को अपने फ़ज़्ल-ओ-करम से माफ़ फ़रमा। उनकी तमाम नेकियों को क़ुबूल फ़रमा और उन्हें अपनी रहमत के साये में जगह अता फ़रमा।

ऐ हमारे परवरदिगार! मरहूम की क़ब्र को नूर से मुनव्वर फ़रमा, उसे जन्नत के बाग़ों में से एक बाग़ बना दे। उनकी क़ब्र की तंगी और वहशत को दूर फ़रमा और उन्हें क़ब्र के तमाम मराहिल में आसानी अता फ़रमा।

ऐ अल्लाह! मरहूम को सवालात-ए-क़ब्र के वक़्त साबित-क़दम फ़रमा और उनके लिए क़ब्र को आराम, सुकून और रहमत का मुक़ाम बना दे। उन्हें अपने नेक बंदों में शामिल फ़रमा, उनके दर्जात बुलंद फ़रमा और जन्नतुल-फ़िरदौस में आला मुक़ाम अता फ़रमा।

ऐ रब्बे-करीम! मरहूम के अहलो-अयाल, तीनों साहिबज़ादों, घरवालों और तमाम अज़ीज़-ओ-अक़ारिब को इस सदमे को बर्दाश्त करने की ताक़त अता फ़रमा। उनके दिलों को सब्र-ए-जमील से भर दे, उनकी आँखों के आँसुओं को अपनी रहमत से सुकून में बदल दे और इस मुश्किल घड़ी में उनका हामियो-नासिर बन जा।

आमीन या रब्बुल आलमीन।

🤲 सुपुर्द-ए-ख़ाक के वक़्त मिट्टी देने की सुन्नत और दुआ

जब मरहूम को क़ब्र में उतारा जाए और मिट्टी दी जाए, तो इस मौक़े पर मौत और आख़िरत को याद करते हुए अल्लाह तआला से मरहूम के लिए रहमत, मग़फ़िरत और साबित-क़दमी की दुआ की जाए।

क़ब्र में मिट्टी देते वक़्त यह क़ुरआनी आयत पढ़ना मशरूअ है:

مِنْهَا خَلَقْنَاكُمْ وَفِيهَا نُعِيدُكُمْ وَمِنْهَا نُخْرِجُكُمْ تَارَةً أُخْرَىٰ

तर्जुमा: “इसी ज़मीन से हमने तुम्हें पैदा किया, इसी में तुम्हें लौटाएँगे और इसी से तुम्हें दोबारा निकालेंगे।” (सूरह ताहा, आयत 55)

ऐ अल्लाह! आज हम अपने भाई को तेरे सुपुर्द कर रहे हैं। तू उनकी क़ब्र को सुकून और रहमत का घर बना। उन्हें अपनी रहमत से ढाँप ले, उनके दर्जात बुलंद फ़रमा और क़यामत के दिन उन्हें अपने नेक बंदों के साथ उठाना।

इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन।

बेशक हम अल्लाह ही के हैं और उसी की तरफ़ हमें लौटकर जाना है।

📞 मैय्यत के सिलसिले में मालूमात

मरहूम की मैय्यत, नमाज़-ए-जनाज़ा और सुपुर्द-ए-ख़ाक से मुताल्लिक़ मज़ीद मालूमात हासिल करने के लिए मोहम्मद राशिद साहब से नीचे दिए गए मोबाइल नंबर पर राब्ता क़ायम किया जा सकता है।

मोबाइल नंबर: 8755912851

📰 मुल्तानी समाज — अपनी बिरादरी की आवाज़, अपनी पहचान

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार से पंजीकृत, मुल्क की राजधानी नई दिल्ली से प्रसारित, मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी की क़ौमी समाचार पत्रिका, न्यूज़ पोर्टल और यूट्यूब चैनल “मुल्तानी समाज” के लिए उत्तर प्रदेश डेस्क से प्रधान संपादक ज़मीर आलम की ख़ास रिपोर्ट।

अगर आप भी अपनी ख़बर, मज़मून (आर्टिकल), पैग़ाम, मुबारकबाद, ताज़ियती इश्तिहार, दिलचस्प वाक़ियात, तहरीर, अफ़साना (कहानी) या अपने कारोबार का इश्तिहार क़ौमी सतह पर शाया व प्रसारित करवाना चाहते हैं, तो बराए मेहरबानी नीचे दिए गए नंबरों पर राब्ता फ़रमाएँ।

📞 9410652990

📞 8010884848

आपका एतमाद ही हमारी सबसे बड़ी ताक़त है।

“मुल्तानी समाज” — अपनी बिरादरी की आवाज़, अपनी पहचान।


🥀 आख़िरी पैग़ाम

दुनिया की ज़िंदगी आरज़ी है और आख़िरत की ज़िंदगी हमेशा रहने वाली है। आज एक शख़्स अपने घरवालों और अज़ीज़ों से जुदा होकर अपने रब की तरफ़ लौट गया। आइए, हम सब मिलकर मरहूम के लिए दिल की गहराइयों से दुआ करें कि अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त उनकी मग़फ़िरत फ़रमाए, उनकी क़ब्र को नूर से भर दे, उन्हें जन्नतुल-फ़िरदौस में आला मक़ाम अता फ़रमाए और तमाम पिछड़े हुए अहलो-अयाल को सब्र-ए-जमील अता फ़रमाए।

आमीन सुम्मा आमीन, या रब्बुल आलमीन।

🥀 इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन 🥀ग्राम बावली, ज़िला बागपत में ग़म की लहर — मिस्त्री अज़ीज़ के साहबज़ादे अब्दुल शकूर ट्रैक्टर वाले का इंतिक़ाल, आज रात साढ़े आठ बजे होगा सुपुर्द-ए-ख़ाक

बिरादरी ने एक मिलनसार, ख़िदमतगुज़ार और कुनबे को जोड़कर रखने वाली शख़्सियत को खो दिया

बागपत, उत्तर प्रदेश। निहायत ही रंज-ओ-ग़म और दिली अफ़सोस के साथ तमाम अहले मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी को इत्तिला दी जाती है कि ग्राम बावली, ज़िला बागपत, उत्तर प्रदेश के रहने वाले मिस्त्री अज़ीज़ साहब के साहबज़ादे, मरहूम अब्दुल शकूर साहब (ट्रैक्टर वाले) का आज दिन शनिचर, 17 अक्टूबर 2026 को दोपहर तक़रीबन पौने एक बजे क़ज़ा-ए-इलाही से इंतिक़ाल हो गया। मरहूम की उम्र तक़रीबन 62 बरस थी।

इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन।

बेशक हम अल्लाह ही के हैं और हमें उसी की तरफ़ लौटकर जाना है।

मरहूम के इंतिक़ाल की दर्दनाक ख़बर से उनके अहल-ओ-अयाल, ख़ानदान, रिश्तेदारों, अज़ीज़ों, दोस्तों और पूरी बिरादरी में ग़म की लहर दौड़ गई है। हर आँख अश्कबार और हर दिल इस सदमे से बोझिल है। अल्लाह तआला की मर्ज़ी के आगे किसी का ज़ोर नहीं चलता। दुनिया की ज़िंदगी फ़ानी है और हर जान को एक दिन अपने रब की तरफ़ लौटकर जाना है।

💔 दो साहबज़ादों और भाई का रो-रोकर बुरा हाल

मरहूम अब्दुल शकूर साहब अपने पीछे दो साहबज़ादों, मुहम्मद शहज़ाद और मुहम्मद अनस समेत भरा-पूरा ख़ानदान, रिश्तेदारों और चाहने वालों को ग़मगीन छोड़कर इस फ़ानी दुनिया से रुख़्सत हो गए।

इस दुख की घड़ी में उनके दोनों साहबज़ादों और उनके भाई अब्दुल ग़फ़ूर नेताजी का रो-रोकर बुरा हाल है। जिस घर में कल तक अपनों की आवाज़ें, मेल-मिलाप और ज़िंदगी की रौनक़ें थीं, वहाँ आज जुदाई का ग़म और मरहूम की यादें हर दिल को रुला रही हैं।

अल्लाह तआला तमाम अहल-ए-ख़ानदान को इस अज़ीम सदमे को बर्दाश्त करने की हिम्मत, सब्र-ए-जमील और अज़्र-ए-अज़ीम अता फ़रमाए। आमीन।

🕊️ पिछले वर्ष भाई मुहम्मद जहूर का भी हुआ था इंतिक़ाल

ग़ौरतलब है कि मरहूम अब्दुल शकूर साहब के भाई मुहम्मद जहूर साहब का भी पिछले वर्ष इंतिक़ाल हो गया था। वहीं मरहूम, बिरादरी की आन-बान और शान माने जाने वाले इसहाक़ ख़ान (स्पीकर साहब) के चचेरे भाई भी थे।

एक ही ख़ानदान में लगातार अपनों की जुदाई का दर्द कितना गहरा होता है, इसे वही लोग महसूस कर सकते हैं जिनके घर से कोई अपना हमेशा के लिए रुख़्सत हो जाता है। अल्लाह तआला मरहूम अब्दुल शकूर साहब और उनके भाई मुहम्मद जहूर साहब, दोनों की मग़फ़िरत फ़रमाए और उन्हें अपनी बेपनाह रहमतों के साये में जगह अता फ़रमाए। आमीन या रब्बुल आलमीन।

🕌 मस्जिद, क़ब्रिस्तान और ख़ानदानी इत्तेहाद से थी ख़ास दिलचस्पी

मरहूम अब्दुल शकूर साहब के बारे में बताया जाता है कि उन्हें मस्जिद और क़ब्रिस्तान को साफ़-सुथरा रखने, अपने घर-परिवार और पूरे कुनबे को एक साथ जोड़कर रखने तथा आपसी मेल-मुहब्बत और भाईचारे को क़ायम रखने की ख़ास सलाहियत हासिल थी।

ऐसी ख़ूबियाँ इंसान को लोगों के दिलों में ज़िंदा रखती हैं। किसी इंसान की असल पहचान सिर्फ़ उसके नाम या माल-ओ-दौलत से नहीं, बल्कि उसके अख़लाक़, उसके किरदार, उसके लोगों से रिश्तों और समाज के लिए उसकी ख़िदमात से होती है।

मरहूम की ज़िंदगी से जुड़ी इन अच्छी बातों को याद करते हुए दुआ है कि अल्लाह तआला उनकी नेकियों को क़ुबूल फ़रमाए, उनकी ख़ताओं और कोताहियों से दरगुज़र फ़रमाए और उनकी क़ब्र को नूर से भर दे।

🕯️ आज रात पौने आठ बजे होगा सुपुर्द-ए-ख़ाक

विश्वसनीय ज़राए से मिली इत्तिला के मुताबिक़, मरहूम अब्दुल शकूर साहब की नमाज़-ए-जनाज़ा और तदफ़ीन का अमल आज ही रात, दिन शनिचर, 17 अक्टूबर 2026 को तक़रीबन रात पौने आठ बजे, ग्राम बावली में बिजलीघर के सामने स्थित क़ब्रिस्तान में अदा किया जाएगा।

तमाम अहले बिरादरी, अज़ीज़-ओ-अक़ारिब, दोस्तों और अहबाब से गुज़ारिश है कि जनाज़े में शरीक होकर मरहूम के लिए दुआ-ए-मग़फ़िरत करें और ग़मज़दा अहल-ए-ख़ानदान के साथ हमदर्दी का इज़हार फ़रमाएँ।

अल्लाह तआला तमाम हाज़िरीन की हाज़िरी और दुआओं को क़ुबूल फ़रमाए। आमीन।

🤲 मरहूम के लिए दुआ-ए-मग़फ़िरत

اللَّهُمَّ اغْفِرْ لَهُ وَارْحَمْهُ وَعَافِهِ وَاعْفُ عَنْهُ

तर्जुमा: ऐ अल्लाह! मरहूम की मग़फ़िरत फ़रमा, उन पर रहम फ़रमा, उन्हें आफ़ियत अता फ़रमा और उनसे दरगुज़र फ़रमा।

ऐ अल्लाह! मरहूम अब्दुल शकूर साहब की तमाम छोटी-बड़ी ख़ताओं को माफ़ फ़रमा। उनकी नेकियों को अपनी बारगाह में क़ुबूल फ़रमा। उनकी क़ब्र को जन्नत के बाग़ों में से एक बाग़ बना दे। उनकी क़ब्र को वसीअ, रोशन और मुनव्वर फ़रमा। क़ब्र की तन्हाई को अपनी रहमत से दूर फ़रमा और उन्हें सवालात-ए-क़ब्र में साबित-क़दम रहने की तौफ़ीक़ अता फ़रमा।

या रब्बुल आलमीन! मरहूम को जन्नतुल फ़िरदौस में आला मक़ाम अता फ़रमा। उन्हें अपने महबूब हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा ﷺ की शफ़ाअत नसीब फ़रमा। उनके दर्जात बुलंद फ़रमा और उन्हें अपने नेक बंदों की जमाअत में शामिल फ़रमा।

ऐ अल्लाह! मरहूम के दोनों साहबज़ादों, भाई, तमाम घरवालों और रिश्तेदारों को सब्र-ए-जमील अता फ़रमा। उनके दिलों को सुकून दे और इस सदमे को बर्दाश्त करने की ताक़त अता फ़रमा। आमीन सुम्मा आमीन।

🤲 क़ब्र में उतारते वक़्त और मिट्टी देते समय की मस्नून दुआएँ

मरहूम को क़ब्र में उतारते वक़्त यह दुआ पढ़ना मसनून है:

بِسْمِ اللَّهِ وَعَلَى مِلَّةِ رَسُولِ اللَّهِ ﷺ

तर्जुमा: अल्लाह के नाम के साथ और रसूलुल्लाह ﷺ के दीन व तरीक़े पर।

दफ़न के बाद हाज़िरीन को चाहिए कि मरहूम के लिए मग़फ़िरत और साबित-क़दमी की दुआ करें। नबी करीम ﷺ से दफ़न के बाद मरहूम के लिए मग़फ़िरत और साबित-क़दमी की दुआ करने की तालीम साबित है।

اللَّهُمَّ اغْفِرْ لَهُ، اللَّهُمَّ ثَبِّتْهُ

तर्जुमा: ऐ अल्लाह! उनकी मग़फ़िरत फ़रमा और उन्हें साबित-क़दम रख।

मिट्टी देते वक़्त क़ुरआन मजीद की इस आयत को याद रखना भी मुनासिब है:

مِنْهَا خَلَقْنَاكُمْ وَفِيهَا نُعِيدُكُمْ وَمِنْهَا نُخْرِجُكُمْ تَارَةً أُخْرَىٰ

तर्जुमा: इसी ज़मीन से हमने तुम्हें पैदा किया, इसी में तुम्हें वापस लौटाएँगे और इसी से तुम्हें दोबारा निकालेंगे।

दफ़न के बाद कुछ देर ठहरकर मरहूम की मग़फ़िरत, रहमत और आख़िरत में कामयाबी के लिए ख़ुलूस-ए-दिल से दुआ करना चाहिए।

📌 जनाज़े और ताज़ियत के मौक़े पर कुछ ज़रूरी हिदायतें

  1. अदब और संजीदगी का ख़याल रखें: मरहूम के घर ताज़ियत के लिए जाएँ तो हँसी-मज़ाक, ऊँची आवाज़ और ग़ैर-ज़रूरी गुफ़्तगू से परहेज़ करें।

  2. ग़मज़दा परिवार पर बोझ न बनें: ताज़ियत के नाम पर अहल-ए-ख़ानदान पर खाने-पीने और मेहमानदारी का बोझ न डालें। उनकी ज़रूरतों का ख़याल रखें और मुमकिन हो तो उनकी मदद करें।

  3. जनाज़े के साथ दुनियावी बातों से परहेज़ करें: जनाज़े के पीछे चलते हुए ख़ामोशी, संजीदगी और आख़िरत की फ़िक्र को तरजीह दें।

  4. मोबाइल फ़ोन का इस्तेमाल न करें: जनाज़े के साथ चलते हुए मोबाइल पर बातचीत, ग़ैर-ज़रूरी मैसेजिंग और दूसरी मशग़ूलियतों से बचें।

  5. ज़िक्र और दुआ का एहतिमाम करें: कलिमा-ए-तौहीद, इस्तिग़फ़ार और मरहूम के लिए दुआ करें। किसी ख़ास ज़िक्र को हर हाल में लाज़िम समझने के बजाय जनाज़े के अदब और सुन्नत का ख़याल रखें।

  6. दफ़न के बाद दुआ करें: मरहूम के लिए मग़फ़िरत, रहमत और सवालात-ए-क़ब्र में साबित-क़दमी की दुआ करें।

  7. अहल-ए-ख़ानदान की दिलजोई करें: उन्हें सब्र की तलक़ीन करें, मरहूम की अच्छी बातें याद दिलाएँ और उनकी ज़रूरत के वक़्त साथ खड़े रहें।

  8. दुनिया की बे-सबाती को याद रखें: मौत एक हक़ीक़त है। जनाज़े में शिरकत हमें अपनी आख़िरत की तैयारी, नेक अमल और इंसानों के साथ अच्छे सुलूक की याद दिलाती है।

📞 मरहूम के बारे में मालूमात के लिए राब्ता

  • डॉ. शमशाद साहब, बावली: 9058647438
  • हाजी ख़ालिद साहब: 7984844198

📰 मुल्तानी समाज — अपनी बिरादरी की आवाज़, अपनी पहचान

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार से पंजीकृत, मुल्क की राजधानी नई दिल्ली से प्रसारित, पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी की मुल्क की इकलौती क़ौमी समाचार पत्रिका, न्यूज़ पोर्टल और यूट्यूब चैनल “मुल्तानी समाज” के लिए उत्तर प्रदेश डेस्क से प्रधान संपादक ज़मीर आलम की ख़ास रिपोर्ट।

अगर आप भी अपनी ख़बर, मज़मून (आर्टिकल), पैग़ाम, मुबारकबाद, ताज़ियती इश्तिहार, दिलचस्प वाक़ियात, तहरीर, अफ़साना (कहानी) या अपने कारोबार का इश्तिहार क़ौमी सतह पर शाया या प्रसारित करवाना चाहते हैं, तो बराए मेहरबानी नीचे दिए गए नंबरों पर राब्ता फ़रमाएँ।

📞 9410652990

📞 8010884848

आपका एतमाद ही हमारी सबसे बड़ी ताक़त है।

“मुल्तानी समाज” — अपनी बिरादरी की आवाज़, अपनी पहचान।


🥀 आख़िरी दुआ

ऐ अल्लाह! मरहूम अब्दुल शकूर साहब की मग़फ़िरत फ़रमा, उनकी क़ब्र को नूर से भर दे, उन्हें जन्नतुल फ़िरदौस में आला मक़ाम अता फ़रमा और उनके तमाम अहल-ए-ख़ानदान को सब्र-ए-जमील नसीब फ़रमा।

आमीन या रब्बुल आलमीन।

इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन।

🥀 इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन 🥀गांव बावली में जनाब अब्दुल शकूर साहब (ट्रैक्टर वाले) का इंतिक़ाल, मुस्लिम मुल्तानी बिरादरी में ग़म की लहर

मरहूम हाजी अज़ीज अहमद साहब के साहबज़ादे 62 साल की उम्र में दुनिया-ए-फ़ानी से रुख़्सत — दो साहबज़ादों और चार साहबज़ादियों समेत पूरा खानदान ग़मज़दा

बागपत, उत्तर प्रदेश। निहायत ही रंज-ओ-ग़म और दिली अफ़सोस के साथ तमाम मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादराना हज़रात को यह इत्तिला दी जाती है कि आज दिन शनिचर, बा-तारीख़ 17 अक्टूबर 2026 को दोपहर तक़रीबन साढ़े 12 बजे गांव बावली, तहसील बड़ौत, ज़िला बागपत, उत्तर प्रदेश के रहने वाले जनाब अब्दुल शकूर साहब वल्द मरहूम हाजी अज़ीज अहमद साहब (ट्रैक्टर वाले) का तक़रीबन 62 साल की उम्र में क़ज़ा-ए-इलाही से इंतिक़ाल हो गया।

इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन।

बेशक हम सब अल्लाह तआला ही के हैं और उसी की तरफ़ लौटकर जाने वाले हैं। मरहूम का इस दार-ए-फ़ानी से हमेशा के लिए रुख़्सत हो जाना उनके अहल-ए-खाना, खानदान, रिश्तेदारों, अज़ीज़-ओ-अक़ारिब और तमाम जानने वालों के लिए गहरे सदमे और रंज-ओ-अलम का बाइस है।

मरहूम जनाब अब्दुल शकूर साहब अपने पीछे दो साहबज़ादों और चार साहबज़ादियों समेत पूरा कुनबा, खानदान और अज़ीज़-ओ-अक़ारिब को ग़मगीन छोड़कर इस दुनिया से रुख़्सत हो गए। उनके इंतिक़ाल की ख़बर से बिरादरी में अफ़सोस की लहर दौड़ गई है। इस मुश्किल घड़ी में तमाम अहबाब और बिरादराना हज़रात मरहूम के अहल-ए-खाना के ग़म में शरीक हैं और अल्लाह तआला की बारगाह में मरहूम की मग़फ़िरत के लिए दुआगो हैं।

नमाज़-ए-जनाज़ा और तदफ़ीन की इत्तिला

मिली जानकारी के मुताबिक़ मरहूम की नमाज़-ए-जनाज़ा आज बाद नमाज़-ए-ईसा गांव बावली में अदा किए जाने और उसके बाद वहीं के कब्रिस्तान में पौने 8 बजे सुपुर्द-ए-ख़ाक किए जाने की इत्तिला दी गई है।

तमाम अहबाब, रिश्तेदारों और बिरादराना हज़रात से गुज़ारिश है कि जनाज़े में शरीक होकर मरहूम के लिए दुआ-ए-मग़फ़िरत फ़रमाएं और इस नेक अमल के ज़रिए सवाब-ए-दारैन हासिल करें।

नोट: जनाज़े और तदफ़ीन के वक़्त की तस्दीक़ संबंधित अहल-ए-खाना से ज़रूर कर लें, क्योंकि दी गई इत्तिला में वक़्त का ज़िक्र स्पष्ट नहीं है।

मरहूम के लिए दुआ-ए-मग़फ़िरत

या अल्लाह! जनाब अब्दुल शकूर साहब की मग़फ़िरत फ़रमा, उनकी तमाम ख़ताओं और लग़ज़िशों को माफ़ फ़रमा। उनकी क़ब्र को नूर से मुनव्वर फ़रमा और उसे जन्नत के बाग़ों में से एक बाग़ बना दे।

या रब्बुल आलमीन! मरहूम पर अपनी ख़ास रहमत नाज़िल फ़रमा, उनकी क़ब्र को वसीअ और कुशादा फ़रमा, सवालात-ए-क़ब्र में आसानी अता फ़रमा और उन्हें अपनी रहमत के साए में जगह नसीब फ़रमा।

ऐ अल्लाह! मरहूम को जन्नतुल फ़िरदौस में आला मक़ाम अता फ़रमा, उनकी नेकियों को क़ुबूल फ़रमा और उनकी कोताहियों से दरगुज़र फ़रमा। उन्हें नबी-ए-करीम हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा ﷺ की शफ़ाअत नसीब फ़रमा।

मिट्टी देने और दफ़्न के वक़्त पढ़ी जाने वाली दुआ

मरहूम को क़ब्र में उतारते वक़्त यह दुआ पढ़ना मसनून है:

بِسْمِ اللَّهِ وَعَلَى مِلَّةِ رَسُولِ اللَّهِ ﷺ

तर्जुमा: अल्लाह के नाम के साथ और रसूलुल्लाह ﷺ के दीन और तरीक़े पर।

क़ब्र में मिट्टी डालते वक़्त क़ुरआन-ए-करीम की यह आयत पढ़ना भी मसनून है:

مِنْهَا خَلَقْنَاكُمْ وَفِيهَا نُعِيدُكُمْ وَمِنْهَا نُخْرِجُكُمْ تَارَةً أُخْرَىٰ

तर्जुमा: इसी ज़मीन से हमने तुम्हें पैदा किया, इसी में तुम्हें वापस लौटाएंगे और इसी से तुम्हें दोबारा निकालेंगे।
(सूरह ताहा, आयत 55)

क़ब्र पर मिट्टी डालते वक़्त यह आयत पढ़ी जा सकती है। दफ़्न के बाद मरहूम के लिए मग़फ़िरत, साबितक़दमी और सवालात-ए-क़ब्र में आसानी की दुआ करना चाहिए।

अहल-ए-खाना के लिए सब्र-ए-जमील की दुआ

या अल्लाह! मरहूम के दोनों साहबज़ादों, चारों साहबज़ादियों, तमाम अहल-ए-खाना, खानदान और रिश्तेदारों को इस सदमे को बर्दाश्त करने की ताक़त अता फ़रमा। उनके दिलों को सब्र-ओ-सुकून अता फ़रमा और इस मुश्किल वक़्त में उन्हें अपनी रहमत और हिफ़ाज़त के साए में रख।

ऐ अल्लाह! ग़मज़दा परिवार को सब्र-ए-जमील अता फ़रमा, उनके लिए आसानी के रास्ते खोल दे और मरहूम की जुदाई के सदमे को बर्दाश्त करने का हौसला नसीब फ़रमा।

आमीन या रब्बुल आलमीन।


ख़ास रिपोर्ट: ज़मीर आलम, प्रधान संपादक
उत्तर प्रदेश डेस्क — ‘मुल्तानी समाज’

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार से पंजीकृत, मुल्क की राजधानी नई दिल्ली से प्रसारित मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी की क़ौमी समाचार पत्रिका, न्यूज़ पोर्टल और यूट्यूब चैनल ‘मुल्तानी समाज’ की जानिब से मरहूम के तमाम अहल-ए-खाना और अज़ीज़-ओ-अक़ारिब की ख़िदमत में ताज़ियत पेश की जाती है।

अपनी ख़बर, मज़मून या इश्तिहार क़ौमी सतह पर शाया कराएं

अगर आप भी अपनी ख़बर, मज़मून (आर्टिकल), पैग़ाम, मुबारकबाद, ताज़ियती इश्तिहार, दिलचस्प वाक़ियात, तहरीर, अफ़साना (कहानी) या अपने कारोबार का इश्तिहार क़ौमी सतह पर शाया या प्रसारित करवाना चाहते हैं, तो बराए मेहरबानी नीचे दिए गए नंबरों पर राब्ता फ़रमाएं।

📞 9410652990
📞 8010884848

आपका एतमाद ही हमारी सबसे बड़ी ताक़त है।

‘मुल्तानी समाज’ — अपनी बिरादरी की आवाज़, अपनी पहचान।

बागपत में यूसुफ़ साहब और जियाउर रहमान साहब की सरपरस्ती में मुस्लिम मुल्तानी बिरादरी का यादगार इज्तिमा, तीन गरीब बच्चियों के निकाह और कब्रिस्तान के लिए ज़मीन के ऐलान ने जीता सबका दिल

मरहूम हाजी इकराम उल्ला साहब की समाजसेवा की विरासत को आगे बढ़ाने की राह पर जियाउर रहमान साहब — बिरादरी में खिदमत, इत्तेहाद और फलाह-ओ-बहबूद की नई उम्मीद जगी

बागपत, उत्तर प्रदेश। मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी में इत्तेहाद, भाईचारे, समाजी बेदारी और इंसानियत की खिदमत को फरोग देने की गरज़ से 15 अक्टूबर 2026 को बागपत में एक निहायत शानदार, पुरवकार और यादगार प्रोग्राम का इनइकाद किया गया। पूर्व राष्ट्रपति मरहूम डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम साहब की यौमे पैदाइश के मुबारक मौके पर मुनअकिद इस प्रोग्राम ने अपनी शानदार कामयाबी, समाजी पैगाम और खिदमत-ए-खल्क के जज़्बे के सबब बिरादरी के लोगों के दिलों में खास जगह बनाई।

इस यादगार प्रोग्राम के इनइकाद में बिरादरी के उभरते हुए नौजवान जनाब जियाउर रहमान साहब का अहम किरदार रहा, जिन्होंने कम उम्र में ही समाजी फलाह-ओ-बहबूद के मैदान में अपनी दिलचस्पी, मेहनत और जज़्बे का शानदार मुज़ाहिरा किया। बिरादरी के लोगों की बड़ी तादाद में शिरकत और प्रोग्राम के दौरान सामने आए समाजी खिदमत के अहम ऐलानात ने इस इज्तिमा को और भी यादगार बना दिया।

तीन गरीब बच्चियों के निकाह का इंतजाम बना प्रोग्राम की सबसे दिलनशीं बात

इस प्रोग्राम की सबसे खास, काबिल-ए-तारीफ और दिलों को छू लेने वाली बात यह रही कि मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी से ताल्लुक रखने वाले दिल्ली-एनसीआर के मशहूर उद्योगपतियों ने तीन गरीब बच्चियों के निकाह का इंतजाम कराया। निकाह की यह तकरीब निहायत सादगी, वकार और इस्लामी रस्म-ओ-रिवाज के मुताबिक मुकम्मल कराई गई।

आज के दौर में जब गरीब और जरूरतमंद खानदानों के लिए बच्चियों की शादी के अखराजात पूरे करना एक बड़ा मसला बना हुआ है, ऐसे में बिरादरी के साहिब-ए-हैसियत अफराद का आगे बढ़कर जरूरतमंद परिवारों का सहारा बनना यकीनन एक मिसाली समाजी खिदमत है।

इस अमल ने यह पैगाम दिया कि दौलत और हैसियत की असल खूबसूरती जरूरतमंदों के काम आने में है। अगर बिरादरी के साहिब-ए-हैसियत अफराद मिलकर ऐसे नेक कामों को अपना शिआर बना लें, तो न जाने कितने गरीब परिवारों की परेशानियां दूर हो सकती हैं और कितनी ही बेटियों के घर आबाद हो सकते हैं।

बागपत में कब्रिस्तान के लिए जमीन देने के ऐलान से बिरादरी में खुशी की लहर

इस प्रोग्राम को एक और अहम और ऐतिहासिक पहलू उस वक्त हासिल हुआ, जब जनाब जियाउर रहमान साहब की दावत पर उनके पड़ोसी और खानदानी ताल्लुकात रखने वाले जनाब नवाब अहमद हमीद साहब ने प्रोग्राम में शिरकत की और बागपत शहर में मुस्लिम मुल्तानी लोहार बिरादरी की एक पुरानी और अहम जरूरत को सामने रखते हुए कब्रिस्तान के लिए जमीन देने का ऐलान किया।

बागपत शहर में बिरादरी के लिए कब्रिस्तान की जमीन का मसला एक अहम समाजी जरूरत के तौर पर देखा जाता रहा है। ऐसे में जनाब नवाब अहमद हमीद साहब की जानिब से किया गया यह ऐलान प्रोग्राम की अहम पेशरफ्त साबित हुआ और इसने इज्तिमा की खुशी को दोगुना कर दिया।

कब्रिस्तान जैसी बुनियादी जरूरत के लिए जमीन मुहैया कराने की पहल को बिरादरी की आने वाली नस्लों के लिए एक अहम समाजी कदम के तौर पर देखा जा रहा है। इस तरह के नेक इरादे न सिर्फ मौजूदा जरूरतों को पूरा करने में मददगार साबित होते हैं, बल्कि बिरादरी में आपसी हमदर्दी, भाईचारे और इत्तेहाद की बुनियाद को भी मजबूत करते हैं।

जज्बा-ए-खिदमत, पुख्ता इरादा और लगातार मेहनत से मिलती है कामयाबी

कहा जाता है कि जब किसी नेक मकसद के लिए सच्चे दिल से कोशिश की जाती है, तो रास्ते खुद-ब-खुद आसान होने लगते हैं। बागपत का यह प्रोग्राम भी इसी हौसले, मेहनत और समाजी जिम्मेदारी की एक अच्छी मिसाल बनकर सामने आया।

किसी भी तंजीम या समाजी मंच की कामयाबी का असल पैमाना सिर्फ बड़े जलसे या भीड़ नहीं होते, बल्कि यह होता है कि उस कोशिश से समाज के जरूरतमंद तबके को क्या फायदा पहुंचा, लोगों के दरमियान कितना इत्तेहाद पैदा हुआ और बिरादरी की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए कितने कारगर कदम उठाए गए।

बागपत में मुनअकिद इस प्रोग्राम के दौरान गरीब बच्चियों के निकाह का इंतजाम और कब्रिस्तान के लिए जमीन देने का ऐलान इस बात की तरफ इशारा करता है कि अगर समाजी प्रोग्रामों को सही मकसद और खिदमत के जज्बे के साथ मुनअकिद किया जाए, तो उनसे दूरगामी और फायदेमंद नतीजे बरामद हो सकते हैं।

दादा मरहूम हाजी इकराम उल्ला साहब की विरासत को आगे बढ़ाने का जज्बा

जनाब जियाउर रहमान साहब की समाजी सरगर्मियों का जिक्र हो और उनके दादा, बिरादरी के मोअज्जिज और काबिल-ए-एहतराम शख्सियत मरहूम हाजी इकराम उल्ला साहब की याद ताजा न हो, ऐसा मुमकिन नहीं।

हाजी इकराम उल्ला साहब को बिरादरी में इज्जत और एहतराम की निगाह से याद किया जाता है। उनके खानदान से ताल्लुक रखने वाले जनाब जियाउर रहमान साहब की समाजी सरगर्मियों को देखकर बिरादरी के लोगों में यह उम्मीद पैदा हो रही है कि वह अपने बुजुर्गों की नेक रवायतों को आगे बढ़ाते हुए समाजी खिदमत के मैदान में अपना किरदार अदा करते रहेंगे।

जनाब जियाउर रहमान साहब के लिए यह प्रोग्राम कोई पहली समाजी कोशिश नहीं था। इससे पहले भी वह बिरादरी के नौजवानों में खेलों के प्रति दिलचस्पी बढ़ाने, उनकी सलाहियतों को उभारने और आपसी भाईचारे को फरोग देने की गरज़ से बड़े पैमाने पर क्रिकेट टूर्नामेंट मुनअकिद कराते रहे हैं। इसके अलावा बिरादरी की तरक्की और समाजी बेदारी के लिए मुख्तलिफ किस्म की सरगर्मियों में भी दिलचस्पी लेते रहे हैं।

खेलों के मैदान से लेकर समाजी फलाह-ओ-बहबूद के प्रोग्रामों तक उनकी सरगर्मियां इस बात की निशानदेही करती हैं कि बिरादरी के नौजवानों को अगर सही रहनुमाई, मुनासिब मौके और हौसला-अफजाई मिले, तो वह समाज की बेहतरी में अहम किरदार अदा कर सकते हैं।

बिरादरी के लोगों में यह चर्चा भी है कि जनाब जियाउर रहमान साहब अपने दादा मरहूम हाजी इकराम उल्ला साहब के नक्श-ए-कदम पर चलते हुए समाजी खिदमत के इस सिलसिले को आगे बढ़ाने के लिए पुरअज्म हैं।

‘मुल्तानी समाज चैरिटेबल ट्रस्ट’ से जुड़ने की भी चर्चाख़बर की

सूत्रों से मिलने वाली जानकारी के मुताबिक जनाब जियाउर रहमान साहब आने वाले दिनों में दिल्ली-एनसीआर से ताल्लुक रखने वाले अपने कुटुंबियों, रिश्तेदारों और अजीज दोस्तों के साथ ‘मुल्तानी समाज चैरिटेबल ट्रस्ट’ की रुक्नियत हासिल करने की तैयारी में हैं।

अगर यह पेशरफ्त अमली शक्ल इख्तियार करती है, तो बिरादरी के समाजी और फलाही कामों को एक मुनज्जम प्लेटफॉर्म पर आगे बढ़ाने के नए रास्ते खुल सकते हैं। दिल्ली-एनसीआर में रहने वाले बिरादरी के ताजिरों, उद्योगपतियों, नौजवानों और समाजी खिदमतगारों की सलाहियतों को एक जगह जमा करके जरूरतमंद परिवारों की मदद, तालीम की फरोग, गरीब बच्चियों की शादियों में तआवुन और बिरादरी की बुनियादी जरूरतों के हल के लिए मुनज्जम कोशिशें की जा सकती हैं।

अलबत्ता, रुक्नियत के सिलसिले में सामने आई इस जानकारी की औपचारिक तस्दीक और अमली पेशरफ्त का इंतजार रहेगा।

बिरादरी के लिए एक पैगाम — इत्तेहाद, तालीम और खिदमत को बनाएं अपना शिआर

बागपत का यह यादगार इज्तिमा मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी के लिए कई अहम पैगाम छोड़कर गया है। गरीब बच्चियों के निकाह का इंतजाम, कब्रिस्तान के लिए जमीन देने का ऐलान और नौजवानों की समाजी सरगर्मियों में दिलचस्पी, ये तमाम पहलू इस बात की तरफ इशारा करते हैं कि बिरादरी की तरक्की के लिए सिर्फ तकरीरों की नहीं, बल्कि अमली कदमों की जरूरत है।

अगर बिरादरी के ताजिर, उद्योगपति, तालीमयाफ्ता अफराद, नौजवान और समाजी रहनुमा एक-दूसरे के साथ मिलकर काम करें, तो तालीम, रोजगार, गरीबों की मदद, बच्चियों की शादियों, खेलों और दीगर समाजी जरूरतों के सिलसिले में कई बेहतर पहल की जा सकती हैं।

समाज की असल तरक्की उस वक्त मुमकिन होती है, जब साहिब-ए-हैसियत अफराद जरूरतमंदों का सहारा बनें, नौजवान अपनी सलाहियतों को समाज की बेहतरी के लिए इस्तेमाल करें और बुजुर्गों की नेक रवायतों को नई नस्ल तक पहुंचाया जाए।

बागपत का यह प्रोग्राम इसी जज्बा-ए-खिदमत, आपसी इत्तेहाद और बिरादराना हमदर्दी की एक काबिल-ए-तारीफ मिसाल बनकर सामने आया है।


खास रिपोर्ट: ज़मीर आलम, प्रधान संपादक
उत्तर प्रदेश डेस्क — ‘मुल्तानी समाज’

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार से पंजीकृत होने तथा मुल्क की राजधानी नई दिल्ली से प्रसारित होने वाली मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी की क़ौमी समाचार पत्रिका, न्यूज़ पोर्टल और यूट्यूब चैनल ‘मुल्तानी समाज’ की जानिब से बिरादरी की समाजी, फलाही, तालीमी और तंज़ीमी सरगर्मियों को क़ौमी सतह पर पेश करने का सिलसिला जारी है।

अपनी खबर, मजमून या इश्तिहार क़ौमी सतह पर शाया कराएं

अगर आप भी अपनी खबर, मजमून (आर्टिकल), पैगाम, मुबारकबाद, ताज़ियती इश्तिहार, दिलचस्प वाकियात, तहरीर, अफसाना (कहानी) या अपने कारोबार का इश्तिहार क़ौमी सतह पर शाया या प्रसारित करवाना चाहते हैं, तो बराए मेहरबानी नीचे दिए गए नंबरों पर राब्ता फरमाएं।

📞 9410652990
📞 8010884848

आपका एतमाद ही हमारी सबसे बड़ी ताकत है।

‘मुल्तानी समाज’ — अपनी बिरादरी की आवाज़, अपनी पहचान।

Friday, October 16, 2026

🕊️ इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन 🕊️💔 इंतिक़ाल की बेहद ग़मगीन ख़बर 💔

गाँव बुढ़पुर, ज़िला बागपत (उत्तर प्रदेश) में एक और फ़ानी दुनिया से रुख़्सत

निहायत ही रंज-ओ-ग़म और दिली अफ़सोस के साथ तमाम अहले-मुस्लिम मुल्तानी लोहार, बढ़ई बिरादराना हज़रात को इत्तिला दी जाती है कि आज दिन शनिचर, बा-तारीख़ 17 अक्टूबर 2026 को गाँव बुढ़पुर, ज़िला बागपत, उत्तर प्रदेश के रहने वाले शौकत अहमद वल्द जनाब फकरुद्दीन साहब हाल मुक़ाम गोल मस्जिद के पास मोहल्ला पठानकोट क़स्बा बड़ौत जिला बागपत, उत्तर प्रदेश का बीती रात ढाई बजे के क़रीब क़ज़ा-ए-इलाही से इंतिक़ाल हो गया है।

इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन।

(बेशक हम अल्लाह ही के हैं और बेशक हमें उसी की तरफ़ लौटकर जाना है।)

मरहूम के इंतिक़ाल की ख़बर से अहले-ख़ानदान, अज़ीज़-ओ-अक़ारिब और बिरादराना हज़रात में ग़म की लहर दौड़ गई है। यह दुनिया फ़ानी है और हर जान को एक दिन अपने रब के हुज़ूर वापस लौटना है। मौत एक ऐसी हक़ीक़त है, जिससे किसी को फ़रार नहीं, मगर किसी अपने के बिछड़ जाने का सदमा दिल को ग़मगीन कर देता है। ऐसे मुश्किल वक़्त में अल्लाह तआला ही सब्र देने वाला और टूटे हुए दिलों को सुकून अता फ़रमाने वाला है।

हम बारगाह-ए-इलाही में दुआगो हैं कि अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त मरहूम की मुकम्मल मग़फ़िरत फ़रमाए, उनकी ख़ताओं और लग़ज़िशों को माफ़ फ़रमाए, उनकी नेकियों को क़ुबूल फ़रमाए और उन्हें जन्नतुल फ़िरदौस में आला मक़ाम अता फ़रमाए। आमीन या रब्बुल आलमीन।

🕌 नमाज़-ए-जनाज़ा और सुपुर्द-ए-ख़ाक की इत्तिला

मिली जानकारी के मुताबिक़ मरहूम की नमाज़-ए-जनाज़ा आज बाद नमाज़-ए-मग़रिब अदा की जाएगी और उसके बाद उन्हें सुपुर्द-ए-ख़ाक किया जाएगा।

तमाम बिरादराना हज़रात, अज़ीज़-ओ-अक़ारिब और अहले-मोहल्ला से गुज़ारिश है कि वक़्त पर पहुँचकर नमाज़-ए-जनाज़ा में शरीक हों, मरहूम के हक़ में दुआ-ए-मग़फ़िरत करें और इस आख़िरी सफ़र में शरीक होकर अपने दीनी और इंसानी फ़र्ज़ को अदा करें।

🤲 क़ब्र में उतारते वक़्त और मिट्टी देते समय की मस्नून दुआएँ

1. मरहूम को क़ब्र में उतारते वक़्त की दुआ

क़ब्र में उतारते वक़्त यह दुआ पढ़ना मस्नून है:

بِسْمِ اللّٰهِ وَعَلَىٰ مِلَّةِ رَسُولِ اللّٰهِ ﷺ

तर्जुमा: अल्लाह के नाम के साथ और रसूलुल्लाह ﷺ के दीन व तरीक़े पर।

2. दफ़्न के बाद मरहूम के लिए दुआ

दफ़्न से फ़ारिग़ होने के बाद मरहूम के लिए मग़फ़िरत और सवालात-ए-क़ब्र में साबित-क़दमी की दुआ करनी चाहिए। रसूलुल्लाह ﷺ ने दफ़्न के बाद अपने भाई के लिए मग़फ़िरत और साबित-क़दमी की दुआ करने की तालीम दी है।

اللّٰهُمَّ اغْفِرْ لَهُ وَثَبِّتْهُ عِنْدَ السُّؤَالِ

तर्जुमा: ऐ अल्लाह! इनकी मग़फ़िरत फ़रमा और सवाल के वक़्त इन्हें साबित-क़दम रख।

3. मिट्टी देते वक़्त पढ़ी जाने वाली आयत

मिट्टी देते वक़्त क़ुरआन-ए-करीम की यह आयत पढ़ना जायज़ है:

مِنْهَا خَلَقْنَاكُمْ وَفِيهَا نُعِيدُكُمْ وَمِنْهَا نُخْرِجُكُمْ تَارَةً أُخْرَىٰ

तर्जुमा: इसी ज़मीन से हमने तुम्हें पैदा किया, इसी में तुम्हें वापस लौटाएँगे और इसी से तुम्हें दोबारा निकालेंगे।

(सूरह ताहा, आयत 55)

मिट्टी देते वक़्त इस आयत को पढ़ना क़ुरआन की तिलावत है। इसे तीन बार अलग-अलग मिट्टी डालने के साथ पढ़ने का तरीक़ा भी बयान किया जाता है; इसे हर हाल में लाज़िमी समझना ज़रूरी नहीं।

🤲 मरहूम की मग़फ़िरत और घर वालों के लिए ख़ुसूसी दुआ

ऐ अल्लाह! मरहूम पर अपनी ख़ास रहमत नाज़िल फ़रमा। उनकी क़ब्र को नूर से भर दे, उसे जन्नत के बाग़ों में से एक बाग़ बना दे और क़ब्र की तंगी, तन्हाई और हर तकलीफ़ से महफ़ूज़ फ़रमा।

ऐ मेरे परवरदिगार! मरहूम की तमाम छोटी-बड़ी ख़ताओं को माफ़ फ़रमा, उनकी नेकियों को अपनी बारगाह में क़ुबूल फ़रमा, उनकी क़ब्र को वसीअ और रोशन फ़रमा और उन्हें जन्नतुल फ़िरदौस में आला दर्जा अता फ़रमा।

ऐ अल्लाह! उनके अहले-ख़ानदान, बच्चों, अज़ीज़ों और तमाम ग़मज़दा लोगों को सब्र-ए-जमील अता फ़रमा। उनके दिलों को सुकून दे, इस सदमे को बर्दाश्त करने की हिम्मत अता फ़रमा और तमाम घर वालों को अपनी हिफ़ाज़त व रहमत के साये में रख।

اللّٰهُمَّ اغْفِرْ لَهُ وَارْحَمْهُ وَعَافِهِ وَاعْفُ عَنْهُ

तर्जुमा: ऐ अल्लाह! इनकी मग़फ़िरत फ़रमा, इन पर रहम फ़रमा, इन्हें आफ़ियत अता फ़रमा और इन्हें माफ़ फ़रमा।

आमीन या रब्बुल आलमीन।

📞 मय्यत के बारे में मज़ीद मालूमात

मरहूम के बारे में और ज़्यादा जानकारी, जनाज़े के वक़्त और दीगर तफ़सीलात के लिए सुहैब साहब के मोबाइल नंबर पर राब्ता क़ायम किया जा सकता है।

📱 मोबाइल नंबर: 9871864616

📰 मुल्तानी समाज — अपनी बिरादरी की आवाज़, अपनी पहचान

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार से पंजीकरण संबंधी विवरण के अनुसार, मुल्क की राजधानी नई दिल्ली से प्रसारित, पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी की क़ौमी समाचार पत्रिका, न्यूज़ पोर्टल और यूट्यूब चैनल “मुल्तानी समाज” के लिए उत्तर प्रदेश डेस्क से प्रधान संपादक ज़मीर आलम की ख़ास रिपोर्ट।

अगर आप भी अपनी ख़बर, मज़मून (आर्टिकल), पैग़ाम, मुबारकबाद, ताज़ियती इश्तिहार, दिलचस्प वाक़ियात, तहरीर, अफ़साना (कहानी) या अपने कारोबार का विज्ञापन क़ौमी सतह पर शाया व प्रसारित करवाना चाहते हैं, तो नीचे दिए गए नंबरों पर राब्ता फ़रमाएँ।

📞 9410652990
📞 8010884848

आपका एतमाद ही हमारी सबसे बड़ी ताक़त है।

“मुल्तानी समाज” — अपनी बिरादरी की आवाज़, अपनी पहचान।

अल्लाह तआला मरहूम की मग़फ़िरत फ़रमाए, उन्हें जन्नतुल फ़िरदौस में आला मक़ाम अता फ़रमाए और तमाम पसमान्दगान को सब्र-ए-जमील अता फ़रमाए। आमीन सुम्मा आमीन।