Tuesday, October 6, 2026

🌹 अक़्द-ए-मसनून की पुरनूर महफ़िल 🌹

अब्दुल गफ्फार पँवार की साहबज़ादी नूर चश्मी आलेमा नूर का निकाह 6 नवंबर को अजमेर शरीफ़ में

बज़्म-ए-निशात में सजेगी खुशियों की महफ़िल, मुल्तानी लोहार बिरादरी के अज़ीज़ो-अक़ारिब को शिरकत की दावत

अजमेर शरीफ़।
मुन्तज़िरे-चश्म भी, क़ल्ब भी, जान भी है,
आपके आने की हसरत भी है, अरमान भी है।

अल्हम्दुलिल्लाह! बफ़ज़्ले रब्बे-करीम और रहमतुल्लिल-आलमीन हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा ﷺ के सदक़े से खुशियों का एक पुरनूर मौक़ा दस्तक दे रहा है। हमारे हरदिल-अज़ीज़ भाई जनाब अब्दुल गफ्फार पँवार, अजमेर शरीफ़ की साहबज़ादी नूर चश्मी आलेमा नूर सलमहल्लाह का अक़्द-ए-मसनून, इंशाअल्लाह, बड़ी खुशी और दुआओं के माहौल में होने जा रहा है।

इस मुबारक मौक़े पर नूर चश्म मुहम्मद उमैर सलमहू, साहिबज़ादा हाजी सरफराज हुसैन साहब, होटल वाले, इंदौर के साथ निकाह की यह पुरमसर्रत तक़रीब आयोजित की जा रही है।

इस खुशी के मौक़े पर तमाम अज़ीज़ो-अक़ारिब, दोस्तों, अहबाब और मुस्लिम मुल्तानी लोहार बिरादरी के हज़रात की शिरकत मेज़बान ख़ानदान के लिए न सिर्फ़ बाइसे-फ़ख़्र बल्कि बाइसे-मसर्रत भी होगी।

🌹 रसम-ए-हल्दी

31 अक्टूबर 2026, बरोज़ शनिवार
बाद नमाज़-ए-असर

💐 हार-फूल व तआम

4 नवंबर 2026, बरोज़ बुधवार
बाद नमाज़-ए-असर

बमुक़ाम: सकीना पैलेस, अंदरकोट, अजमेर शरीफ़

🌹 तक़रीब-ए-निकाह — 6 नवंबर 2026

बरोज़ जुमा, मुताबिक़ 25 जमादी-उल-अव्वल 1448 हिजरी

💐 इस्तक़बाल-ए-बारात: बाद नमाज़-ए-असर
💐 अक़्द-ए-मसनून: बाद नमाज़-ए-मग़रिब
🌹 दावत-ए-तआम: बाद-अज़-निकाह

बमुक़ाम: अजमेर बाग, फाई सागर रोड, अजमेर शरीफ़

इस पुरमसर्रत मौक़े पर तमाम हज़रात से गुज़ारिश है कि अपनी मसरूफ़ियात में से वक़्त निकालकर इस मुबारक तक़रीब में शिरकत फ़रमाएँ और नवविवाहित जोड़े को अपनी ख़ुलूस भरी दुआओं से नवाज़ें। आपकी आमद हमारे लिए इज़्ज़त, आपकी दुआ हमारे लिए सबसे क़ीमती तोहफ़ा और आपकी ख़िदमत का मौक़ा हमारे लिए बाइसे-सआदत होगा।

🌹 अद्दाईयान

नूर मोहम्मद, शकील अहमद, अहमद नूर, अब्दुल जब्बार, अब्दुल खालिक, मुहम्मद रफ़ीक
पँवार अजमेर वाले

🌹 अल-मुकल्लफ़ीन

फ़ज़लुर्रहमान, निज़ामुद्दीन, फ़ख़रुद्दीन, अब्दुल समद, अब्दुल बारी, अल्ताफ़ हुसैन, अब्दुल अज़ीज़, अब्दुल गफ्फार
व जुमला अज़ीज़ो-अक़ारिब, मुल्तानी लोहार

🌹 मुंतज़िरीन-ए-आमद

मोहम्मद अली, शब्बीर अहमद, मोहम्मद हुसैन, नबी अहमद, ज़ाकिर हुसैन, शाकिर हुसैन, मोहम्मद इम्तियाज़, मोहम्मद मुज़म्मिल, मोहम्मद मुदस्सिर, मोहम्मद उवेस, मोहम्मद दानिश, मोहम्मद अयान, मोहम्मद उबैद, अबूबकर एवं अली हमज़ा।

अब्दुल गफ्फार मुल्तानी लोहार
वल्द मरहूम हाजी अब्दुल करीम साहब

पता: सकीना पैलेस, नई सड़क, अंदरकोट, अजमेर शरीफ़

राब्ता: 9828684855, 9414017861, 9928574786, 9783928345


🌹 दूल्हा-दुल्हन के लिए दुआ

अल्लाह तआला इस पाकीज़ा रिश्ते को अपनी रहमतों और बरकतों से मालामाल फ़रमाए, दोनों को एक-दूसरे के लिए सुकून, मोहब्बत और वफ़ा का ज़रिया बनाए तथा इनके घर को ख़ुशियों, बरकतों और नेमतों से आबाद फ़रमाए।

बारकल्लाहु लकुमा व बारका अलैकुमा व जमअा बैनकुमा फी ख़ैर।

अल्लाह रब्बुल-इज़्ज़त इस नए सफ़र को ख़ैर, आफ़ियत और कामयाबी से हमकिनार फ़रमाए। आमीन या रब्बल-आलमीन। 🤲


📰 मुल्तानी समाज — अपनी बिरादरी की आवाज़, अपनी पहचान

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार से पंजीकृत तथा देश की राजधानी नई दिल्ली से प्रसारित मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी की क़ौमी समाचार पत्रिका, न्यूज़ पोर्टल और यूट्यूब चैनल "मुल्तानी समाज" के लिए राजस्थान डेस्क से प्रधान संपादक ज़मीर आलम की ख़ास रिपोर्ट।

अगर आप भी अपनी ख़बर, मज़मून (आर्टिकल), पैग़ाम, मुबारकबाद, ताज़ियती इश्तिहार, दिलचस्प वाक़ियात, तहरीर, अफ़साना या कारोबार का इश्तिहार क़ौमी सतह पर शाया या प्रसारित करवाना चाहते हैं, तो राब्ता फ़रमाएँ।

📞 9410652990
📞 8010884848

आपका एतमाद ही हमारी सबसे बड़ी ताक़त है।

🌹 "मुल्तानी समाज" — अपनी बिरादरी की आवाज़, अपनी पहचान। 🌹

दीन अपनी जगह मुकम्मल, दुनियावी मामलात अपनी जगह

‘मुल्तानी-डे’ को लेकर जारी बहस पर ज़मीर आलम की दो टूक—हर दुनियावी मामले को मज़हब से जोड़कर देखना मुनासिब नहीं

नई - दिल्ली 
दीन-ए-इस्लाम, शरीयत और मज़हबी उसूल अपनी जगह मुकम्मल और मोअज़्ज़म हैं। उनमें किसी भी तरह की तब्दीली, तहरीफ़ या मनमानी की न तो गुंजाइश है और न ही ऐसा किया जाना चाहिए। वहीं दुनियावी ज़िंदगी के मामलात, सामाजिक रिश्ते, बिरादरी की गतिविधियां, तालीमी व इज्तिमाई प्रोग्राम और खुशी के मौके मनाने के तौर-तरीके अलग-अलग हो सकते हैं। इसलिए हर दुनियावी मामले को सीधे दीन और मज़हब से जोड़कर देखना भी मुनासिब नहीं।

इन दिनों मुस्लिम मुल्तानी लोहार-बढ़ई बिरादरी में जश्न-ए “मुल्तानी-डे” को लेकर बहस छिड़ी हुई है। इसी सिलसिले में बिरादरी के एक फर्द की करीब नौ मिनट की ऑडियो सामने आई, जिसमें उन्होंने ‘मुल्तानी-डे’ के आयोजन को मज़हब और दीन से जोड़ते हुए आयोजकों के इस्लाम के साथ छेड़छाड़ करने तक की बात कही और दारुल उलूम का हवाला भी दिया।

इस संबंध में ज़मीर आलम ने कहा कि दीन और दुनियावी मामलात के बीच फर्क को समझना बेहद ज़रूरी है। उन्होंने कहा कि हर मसले को दीन के आईने से देखना और हर सामाजिक गतिविधि को मज़हबी मामला बना देना सही रवैया नहीं है। अगर किसी कार्यक्रम में कोई ऐसा अमल हो जो शरीयत के खिलाफ हो, तो उस पर एहतिसाब और इस्लाही बातचीत जरूर होनी चाहिए, लेकिन उससे पहले यह मालूम करना भी जरूरी है कि असल कार्यक्रम की हक़ीक़त और मकसद क्या है।

हमारे बुज़ुर्गों ने जो नहीं किया, क्या हम वह सब छोड़ दें?

अक्सर यह दलील दी जाती है कि हमारे बुज़ुर्गों ने ऐसा नहीं किया, इसलिए हमें भी नहीं करना चाहिए। इस पर गौर करने की जरूरत है कि हमारे बुज़ुर्गों के दौर और आज के दौर में जमीन-आसमान का फर्क है।

हमारे बुज़ुर्गों ने डिजिटल दुनिया नहीं देखी थी। उनके दौर में मोबाइल फोन, इंटरनेट, लैपटॉप और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसी तकनीकें मौजूद नहीं थीं। हवाई जहाज का सफर भी आम ज़िंदगी का हिस्सा नहीं था। तो क्या आज हम इन तमाम दुनियावी सहूलियतों से सिर्फ इसलिए किनारा कर लें कि हमारे बुज़ुर्गों ने इनका इस्तेमाल नहीं किया?

बेशक, दीन के उसूल अपनी जगह अटल हैं, लेकिन दुनियावी ज़िंदगी लगातार बदलती रहती है। इसलिए दीन और दुनिया के दायरे को समझना और दोनों को एक-दूसरे के साथ गड्डमड्ड न करना जरूरी है।

बिरादरी, खानदान और रिश्तेदारी भी दुनियावी मामलात हैं

इंसान की ज़िंदगी सिर्फ व्यक्तिगत इबादत तक महदूद नहीं है। कुनबा, खानदान, रिश्तेदार, पड़ोसी, बिरादरी, कारोबार, तालीम, सामाजिक रिश्ते और इज्तिमाई तरक्की—ये सब दुनियावी ज़िंदगी के अहम पहलू हैं।

हर शख्स चाहता है कि उसकी बिरादरी तरक्की करे, उसके नौजवान आगे बढ़ें, उसकी नई नस्ल तालीम हासिल करे और उसकी बिरादरी की पहचान मुल्क और दुनिया में बेहतर तरीके से सामने आए।

इसी मकसद से अगर कोई जायज़ सामाजिक और बिरादराना कार्यक्रम आयोजित किया जाता है तो उस पर अपनी राय रखना और किसी जायज़ पहलू पर एहतिराज़ जताना अपनी जगह ठीक है, लेकिन हर बात को सीधे इस्लाम और शरीयत के साथ जोड़ देना मामले को जरूरत से ज्यादा पेचीदा बना सकता है।

‘मुल्तानी-डे’ का मकसद क्या है?

जहां तक ‘मुल्तानी-डे’ का सवाल है, आयोजकों की ओर से स्पष्ट किया गया है कि यह किसी जीवित या मरहूम शख्स की याद में मनाया जाने वाला दिन नहीं है।

बताया गया है कि 15 अक्टूबर ‘World Students’ Day’ के अवसर और 12 नवंबर को ‘मुल्तानी समाज’ राष्ट्रीय समाचार पत्रिका के रजिस्ट्रेशन की खुशी में जश्न-ए ‘मुल्तानी-डे’ मनाया जाता है। इसे किसी व्यक्ति की पैदाइश, वफात या शख्सियत से जोड़ना इसका मकसद नहीं है, बल्कि इसे पत्रिका के सालाना जश्न और बिरादरी की सामाजिक पहचान से जोड़कर देखा जाता है।

इसी तरह खुशी के मौके पर जायज़ खाने-पीने की चीज़ें—मसलन मिठाई, शीर, फिरनी, केक, पेस्ट्री या दूसरी हलाल व जायज़ चीज़ें—खाने-खिलाने को भी अपने आप में मज़हबी रस्म करार देना सही नहीं होगा। किसी भी अमल का हुक्म उसके मकसद, तरीके और वास्तविक स्वरूप को देखकर ही तय किया जाना चाहिए।

‘मुल्तानी-डे’ का डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम से कोई संबंध नहीं

यह बात भी साफ कर देना जरूरी है कि ‘मुल्तानी-डे’ का पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम साहब की शख्सियत, उनकी पैदाइश या वफात से कोई ताल्लुक नहीं है। इसे किसी जीवित या मरहूम शख्स की याद के तौर पर पेश करना भी सही जानकारी नहीं होगी।

इसी तरह ‘मुल्तानी-डे’ को किसी मज़हबी त्योहार के तौर पर पेश करना भी आयोजकों के घोषित उद्देश्य के मुताबिक नहीं है। यह ‘मुल्तानी समाज’ राष्ट्रीय समाचार पत्रिका के सालाना सफर और उसकी सामाजिक-पत्रकारीय गतिविधियों से जुड़ा हुआ कार्यक्रम है।

तारीख तय करने की बात पर भी स्थिति साफ हो

ऑडियो में ‘मुल्तानी-डे’ की तारीख तय न किए जाने की बात कही गई है। इस पर भी स्थिति स्पष्ट है कि अगर यह किसी मज़हबी त्योहार का नाम नहीं बल्कि किसी समाचार पत्रिका का सालाना कार्यक्रम है, तो इसकी तारीख आयोजक संस्था अपनी सुविधानुसार पहले से तय कर सकती है।

मज़हबी त्योहारों की तारीख और दुनियावी सामाजिक कार्यक्रम की तारीख—दोनों को एक ही पैमाने से देखना मुनासिब नहीं होगा।

राय देने से पहले मुकम्मल जानकारी जरूरी

बिरादरी में किसी भी मसले पर राय रखना हर शख्स का हक है। लेकिन किसी भी मामले को दीन, शरीयत या इस्लाम से जोड़कर कोई गंभीर बात कहने से पहले उसके तमाम पहलुओं की तहकीक, सही जानकारी और वास्तविक मकसद को समझना भी उतना ही जरूरी है।

दीन की हिफाज़त अपनी जगह हमारी जिम्मेदारी है और बिरादरी की इज्तिमाई तरक्की भी हमारी जिम्मेदारी है। दोनों को आमने-सामने खड़ा करने के बजाय उनके-अपने दायरे को समझना ही बेहतर रास्ता है।

इसलिए ‘मुल्तानी-डे’ को लेकर अगर किसी भाई को कोई शरीयत संबंधी एतराज़ है तो वह इल्मी, तहज़ीबी और दलीली अंदाज़ में अपनी बात रख सकता है। मगर किसी सामाजिक कार्यक्रम को बिना उसकी पूरी हक़ीक़त जाने सीधे इस्लाम के साथ छेड़छाड़ करार देना न तो बिरादराना एकता के लिए मुफीद है और न ही किसी मसले का मुनासिब हल।

इख़्तिलाफ़ हो सकता है, मगर अदब के साथ। राय अलग हो सकती है, मगर तहक़ीक़ और हक़ीक़त के साथ। और सबसे बढ़कर—दीन का अदब भी कायम रहे और बिरादरी की इत्तेहाद व इज्तिमाई तरक्की भी।


📍 विशेष रिपोर्ट

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार से पंजीकृत, मुल्क की राजधानी नई दिल्ली से प्रसारित, पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी की मुल्क की इकलौती क़ौमी समाचार पत्रिका, न्यूज़ पोर्टल और यूट्यूब चैनल ‘मुल्तानी समाज’ के लिए उत्तर प्रदेश डेस्क से प्रधान संपादक ज़मीर आलम की ख़ास रिपोर्ट।

📢 अपनी खबर हमें भेजें

अगर आप भी अपनी ख़बर, मज़मून (आर्टिकल), पैग़ाम, मुबारकबाद, ताज़ियती इश्तिहार, दिलचस्प वाक़ियात, तहरीर, अफ़साना (कहानी) या अपने कारोबार का इश्तिहार (विज्ञापन) क़ौमी सतह पर शाया या प्रसारित करवाना चाहते हैं, तो बराए मेहरबानी नीचे दिए गए नंबरों पर राब्ता फ़रमाएँ।

📞 9410652990
📞 8010884848

आपका एतमाद ही हमारी सबसे बड़ी ताक़त है।

“मुल्तानी समाज”

अपनी बिरादरी की आवाज़, अपनी पहचान।

Monday, October 5, 2026

🕊️ इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊननिहायत ही रंज-ओ-ग़म के साथ मुस्लिम मुल्तानी बिरादरी के लिए दुःखद ख़बर

टिकरोल/नानौता। निहायत ही रंज-ओ-ग़म और अफ़सोस के साथ तमाम मुस्लिम मुल्तानी, लोहार, बढ़ई बिरादराना हज़रात को यह इत्तिला दी जाती है कि गाँव टिकरोल, तहसील नानौता, ज़िला सहारनपुर, उत्तर प्रदेश निवासी जनाब मोहम्मद यामीन वल्द नामालूम का बीती रात लगभग 2 बजे क़ज़ा-ए-इलाही से इंतिक़ाल हो गया।

इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन।

मरहूम के इंतिक़ाल की ख़बर सुनकर खानदान, रिश्तेदारों, अज़ीज़-ओ-अक़ारिब और बिरादरी में गहरे रंज-ओ-ग़म की लहर दौड़ गई। मरहूम अपने पीछे अपनी अहलिया, दो साहबज़ादे और पाँच साहबज़ादियों समेत पूरा कुनबा, खानदान, रिश्तेदार और तमाम अज़ीज़-ओ-अक़ारिब को ग़मज़दा छोड़कर इस फ़ानी दुनिया से हमेशा-हमेशा के लिए रुख़्सत हो गए।

🕌 नमाज़-ए-जनाज़ा और तदफ़ीन

मिली जानकारी के मुताबिक मरहूम की नमाज़-ए-जनाज़ा आज बाद नमाज़-ए-ज़ोहर अदा की जाएगी, जिसके बाद उन्हें उनके आबाई क़ब्रिस्तान में सुपुर्द-ए-ख़ाक किया जाएगा।

तमाम बिरादराना हज़रात से गुज़ारिश है कि मरहूम के नमाज़-ए-जनाज़ा में शरीक होकर उनके लिए दुआ-ए-मग़फ़िरत करें और सवाब-ए-दारेन हासिल करें।

🤲 मरहूम के लिए दुआ-ए-मग़फ़िरत

ऐ अल्लाह! मरहूम मोहम्मद यामीन साहब की मुकम्मल मग़फ़िरत फ़रमा। उनकी तमाम ख़ताओं और गुनाहों को माफ़ फ़रमा। उनकी क़ब्र को नूर से मुनव्वर फ़रमा, उसे कुशादा और रोशन फ़रमा। उन्हें क़ब्र के अज़ाब से महफ़ूज़ फ़रमा और जन्नतुल फ़िरदौस में आला मुक़ाम अता फ़रमा।

ऐ परवरदिगार! मरहूम की नेकियों को क़ुबूल फ़रमा, उनकी लग़ज़िशों से दरगुज़र फ़रमा और उन्हें अपने ख़ास रहमत व करम के साये में जगह अता फ़रमा।

🤲 क़ब्र में उतारते वक़्त दुआ

जब मरहूम को क़ब्र में उतारा जाए तो अल्लाह तआला उनके लिए क़ब्र के सफ़र को आसान फ़रमाए और उन्हें अपनी रहमत से नवाज़े।

ऐ अल्लाह! इस बंदे को अपनी रहमत के हवाले फ़रमा। उसकी क़ब्र को जन्नत के बाग़ों में से एक बाग़ बना दे। उसे तन्हाई में अपनी रहमत, नूर और इत्मीनान अता फ़रमा और सवालात-ए-क़ब्र के वक़्त उसके लिए आसानी फ़रमा।

🤲 मिट्टी देते वक़्त दुआ

मिट्टी देते हुए तमाम हाज़िरीन मरहूम के लिए मग़फ़िरत की दुआ करें:

ऐ अल्लाह! जिस मिट्टी में आज हमारे भाई को सुपुर्द किया जा रहा है, उसे उनके लिए सुकून और रहमत का ज़रिया बना दे। उनकी क़ब्र को नूर से भर दे, क़यामत के दिन उनकी मग़फ़िरत फ़रमा और उन्हें अपने महबूब बंदों में शामिल फ़रमा।

ऐ अल्लाह! मरहूम के तमाम अहल-ए-ख़ाना को, उनकी अहलिया, दोनों बेटों, पाँच बेटियों और तमाम खानदान व रिश्तेदारों को सब्र-ए-जमील अता फ़रमा। उन्हें इस सदमे को बर्दाश्त करने का हौसला दे और मरहूम के लिए सदक़ा-ए-जारीया बनने वाले नेक अमल की तौफ़ीक़ अता फ़रमा।

आमीन या रब्बुल आलमीन।

📿 बिरादराना हज़रात से ख़ास गुज़ारिश

तमाम मुस्लिम मुल्तानी, लोहार, बढ़ई बिरादरी के हज़रात से ख़ास गुज़ारिश है कि मरहूम के लिए सूरह-ए-फ़ातिहा, सूरह-ए-इख़लास और दुआ-ए-मग़फ़िरत फ़रमाएँ तथा उनकी तदफ़ीन में शरीक होकर ग़मज़दा खानदान की दिलजोई करें।

अल्लाह तआला मरहूम की मग़फ़िरत फ़रमाए, उनकी क़ब्र को नूर से भर दे और तमाम पसमान्दगान को सब्र-ए-जमील अता फ़रमाए।

आमीन सुम्मा आमीन।

📞 मय्यत के सिलसिले में राब्ता

मय्यत, नमाज़-ए-जनाज़ा और तदफ़ीन के सिलसिले में मज़ीद मालूमात के लिए मोहम्मद इमरान साहब से इस नंबर पर राब्ता क़ायम किया जा सकता है:

📞 8219318604


सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार से पंजीकृत, मुल्क की राजधानी नई दिल्ली से प्रसारित, पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी की मुल्क की इकलौती क़ौमी समाचार पत्रिका, न्यूज़ पोर्टल और यूट्यूब चैनल "मुल्तानी समाज" के लिए उत्तर प्रदेश डेस्क से प्रधान संपादक ज़मीर आलम की ख़ास रिपोर्ट।

अगर आप भी अपनी ख़बर, मज़मून (आर्टिकल), पैग़ाम, मुबारकबाद, ताज़ियती इश्तिहार, दिलचस्प वाक़ियात, तहरीर, अफ़साना (कहानी) या अपने कारोबार का इश्तिहार (विज्ञापन) क़ौमी सतह पर शाया या प्रसारित करवाना चाहते हैं, तो बराए मेहरबानी नीचे दिए गए नंबरों पर राब्ता फ़रमाएँ:

📞 9410652990
📞 8010884848

आपका एतमाद ही हमारी सबसे बड़ी ताक़त है।

"मुल्तानी समाज"

अपनी बिरादरी की आवाज़, अपनी पहचान।

मुल्तानी-डे की हक़ीक़त क्या है? तारीख़ बदलने से इतिहास नहीं बदलता

गलत तारीख़ और ग़लत मालूमात से बिरादरी की तारीख़ नहीं बदली जा सकती—ख़ामोशी भी कभी-कभी ग़लतफ़हमी को मज़बूत कर देती है

मुस्लिम मुल्तानी लोहार, बढ़ई बिरादरी के नौजवानों में कई दिनों से "मुल्तानी-डे" को लेकर सोशल मीडिया पर बहस जारी—कोई इसे डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम की पैदाइश से जोड़ रहा है तो कोई उनके विसाल से; आख़िर 12 नवंबर को "मुल्तानी-डे" क्यों मनाया जाता है? पेश है पूरी हक़ीक़त।

नई दिल्ली/उत्तर प्रदेश डेस्क।
बिरादरी की तारीख़ और पहचान कोई ऐसी चीज़ नहीं जिसे अपनी मर्ज़ी के मुताबिक़ बदला या नई तारीख़ के साथ पेश किया जा सके। अगर किसी तारीख़ के पीछे कोई हक़ीक़त, दस्तावेज़ और पुरानी रिवायत मौजूद हो तो उसे छिपाने या उसके बारे में ग़लतफ़हमी पैदा करने से इतिहास नहीं बदल जाता।

आज सोशल मीडिया के ज़रिए "मुल्तानी-डे" को लेकर मुस्लिम मुल्तानी लोहार, बढ़ई बिरादरी के नौजवानों के बीच बहस चल रही है। कोई इसे पूर्व राष्ट्रपति और महान वैज्ञानिक डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम की जयंती से जोड़कर देख रहा है, कोई उनकी पैदाइश का हवाला दे रहा है और कोई उनके विसाल से इसका ताल्लुक़ जोड़कर मुख़ालफ़त कर रहा है।

दिलचस्प बात यह है कि बिरादरी का एक तबक़ा आज इस सवाल का जवाब तलाश रहा है कि आख़िर "मुल्तानी-डे" क्यों मनाया जाता है और इसकी तारीख़ 12 नवंबर ही क्यों है?

ऐसे में ज़रूरी हो जाता है कि अफ़वाह, ग़लतफ़हमी और सोशल मीडिया की बहस से अलग हटकर असल हक़ीक़त बिरादरी के सामने रखी जाए।

जानी-मानी हस्तियां ख़ामोश क्यों?

बिरादरी की रहनुमाई करने वाली तंजीमों, बुज़ुर्गों और जानी-पहचानी शख़्सियात से उम्मीद की जाती है कि जब नई नस्ल किसी सवाल का जवाब तलाश कर रही हो तो वे आगे बढ़कर सही मालूमात फराहम करें।

अगर बिरादरी के नौजवानों को सही तारीख़ और सही वजह नहीं बताई जाएगी तो वे हक़ीक़त तक कैसे पहुंचेंगे?

झूठ या ग़लत मालूमात का पर्दाफ़ाश करना किसी की दुश्मनी नहीं, बल्कि हक़ीक़त को सामने लाने की ज़िम्मेदारी है। सामने वाला चाहे कितना ही क़रीबी क्यों न हो, बिरादरी के इतिहास और पहचान के मामले में सही बात कहना ज़रूरी है।

आख़िर 12 नवंबर को ही "मुल्तानी-डे" क्यों?

इस सवाल का जवाब बेहद सादा और साफ़ है।

12 नवंबर किसी इंसान का जन्मदिन या मरण-दिवस नहीं है।

12 नवंबर का "मुल्तानी-डे" किसी सियासी शख़्सियत, वैज्ञानिक, राष्ट्रपति या किसी फ़र्द-ए-वाहित से जुड़ा हुआ दिवस नहीं है।

बल्कि उपलब्ध जानकारी के मुताबिक़ यह दिन मुस्लिम मुल्तानी लोहार, बढ़ई बिरादरी की राष्ट्रीय समाचार पत्रिका "मुल्तानी समाज" के सालाना उत्सव के तौर पर मनाया जाता है।

बिरादरी की राष्ट्रीय पत्रिका "मुल्तानी समाज" का रजिस्ट्रेशन 12 नवंबर 2013 को हुआ था। इसी तारीख़ की सालाना खुशी को "मुल्तानी समाज चैरिटेबल ट्रस्ट" की तरफ़ से "मुल्तानी-डे" के तौर पर मनाने की रिवायत क़ायम हुई।

यानी—

12 नवंबर = "मुल्तानी समाज" की सालाना खुशी

और

"मुल्तानी-डे" = किसी शख़्स की पैदाइश या विसाल का दिन नहीं।

नौजवानों के लिए यह बात समझना बेहद ज़रूरी है

आज सोशल मीडिया का दौर है। कोई भी शख़्स कोई भी तारीख़ और कोई भी कहानी लिखकर सैकड़ों लोगों तक पहुंचा सकता है। लेकिन सोशल मीडिया पर बार-बार कही गई बात अपने आप इतिहास नहीं बन जाती।

हमारी नई नस्ल का हक़ है कि उसे अपनी बिरादरी की तारीख़ और रिवायत के बारे में सही और मुसद्दक़ मालूमात मिलें।

इसलिए अगर कोई पूछे—

"मुल्तानी-डे कब मनाया जाता है?"

तो जवाब है—

हर साल 12 नवंबर को।

और अगर कोई पूछे—

"क्यों मनाया जाता है?"

तो जवाब है—

मुस्लिम मुल्तानी लोहार, बढ़ई बिरादरी की राष्ट्रीय समाचार पत्रिका "मुल्तानी समाज" के सालाना उत्सव की खुशी के तौर पर।

यह किसी एक शहर या राज्य का कार्यक्रम नहीं

"मुल्तानी-डे" की एक और ख़ास बात यह है कि इसे किसी एक गांव, कस्बे, शहर या राज्य तक महदूद रखने के बजाय बिरादरी के लोग अपने-अपने घरों में अपनी खुशी के मुताबिक़ मनाते हैं।

इसके लिए किसी ख़ास हॉल, मैरिज होम, होटल, रेस्टोरेंट या क्लब में जमा होना लाज़िमी नहीं है।

यह किसी एक शख़्स की मिल्कियत या किसी एक शहर का प्रोग्राम नहीं, बल्कि बिरादरी की राष्ट्रीय पत्रिका की सालाना खुशी से जुड़ी एक रिवायत के तौर पर पेश किया जाता है।

12 नवंबर की खुशी को ख़िदमत से जोड़ने का इरादा

"मुल्तानी समाज" राष्ट्रीय समाचार पत्रिका के प्रधान-संपादक ज़मीर आलम ने बताया कि "मुल्तानी-डे" की खुशी को सिर्फ़ जश्न तक महदूद रखने के बजाय उसे ख़िदमत-ए-ख़ल्क़ से जोड़ने का इरादा है।

इसी सिलसिले में हर साल 12 नवंबर की खुशी के मौक़े पर 12 ज़रूरतमंद बेटियों की इज्तिमाई शादी कराने की योजना है, जिसे बिरादरी के सहयोग से जल्द शुरू करने का इरादा है।

क्यों न हमारी खुशियां किसी ज़रूरतमंद के घर की ख़ुशी बनें?

क्यों न हमारी बिरादरी की सालाना खुशी किसी बेटी के निकाह और उसके नए घर की शुरुआत का सबब बने?

यही जज़्बा "मुल्तानी-डे" की खुशी को एक बेहतर और ख़िदमतगार मक़सद दे सकता है।

आइए, बहस नहीं—हक़ीक़त को आम करें

हमारी गुज़ारिश है कि इस ख़बर को ज़्यादा से ज़्यादा बिरादरान-ए-वतन तक पहुंचाया जाए, ताकि अगर कोई आपसे पूछे—

"मुल्तानी-डे कब और क्यों मनाया जाता है?"

तो आप अंदाज़े या सुनी-सुनाई बात के बजाय सही जानकारी के साथ जवाब दे सकें।

तारीख़ बदल देने से इतिहास नहीं बदलता।
ख़ामोशी से हक़ीक़त मिटती नहीं।
और सोशल मीडिया की बहस से दस्तावेज़ी हक़ीक़त बदलती नहीं।

हमारी ज़िम्मेदारी है कि अपनी बिरादरी की तारीख़, पहचान और रिवायत को आने वाली नस्ल तक सही मालूमात के साथ पहुंचाएं।


"मुल्तानी समाज" — अपनी बिरादरी की आवाज़, अपनी पहचान

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार से पंजीकृत, नई दिल्ली से प्रकाशित/प्रसारित मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी की क़ौमी समाचार पत्रिका, न्यूज़ पोर्टल और YouTube चैनल "मुल्तानी समाज" के लिए उत्तर प्रदेश डेस्क से प्रधान-संपादक ज़मीर आलम की ख़ास रिपोर्ट।

अपनी ख़बर हम तक पहुंचाएं

अगर आप भी अपनी ख़बर, मज़मून, पैग़ाम, मुबारकबाद, ताज़ियती इश्तिहार, दिलचस्प वाक़ियात, तहरीर, अफ़साना या अपने कारोबार का इश्तिहार क़ौमी सतह पर शाया या प्रसारित करवाना चाहते हैं, तो बराए मेहरबानी राब्ता फ़रमाएं।

📞 9410652990
📞 8010884848

आपका एतमाद ही हमारी सबसे बड़ी ताक़त है।

"मुल्तानी समाज"
अपनी बिरादरी की आवाज़, अपनी पहचान।

Sunday, October 4, 2026

World Students Day या “Multani Day”? डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम की यौमे पैदाइश को बिरादरी के नाम से जोड़कर पेश किए जाने पर उठे गंभीर सवाल

मुज़फ्फरनगर/शामली, उत्तर प्रदेश।

मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी के तमाम बिरादरान-ए-वतन की ख़िदमत में यह सवाल पेश करना ज़रूरी हो गया है कि क्या किसी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचाने जाने वाले दिवस को किसी बिरादरी विशेष के नाम से पेश किया जाना मुनासिब है?

मामला 15 अक्टूबर का है—वह तारीख़ जो महान वैज्ञानिक, मिसाइल मैन और भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम की यौमे पैदाइश है और जिसे भारत सहित विभिन्न स्थानों पर World Students Day के रूप में याद किया जाता है।

बताया जा रहा है कि क़स्बा खतौली, ज़िला मुज़फ्फरनगर से संचालित बिरादरी की एक प्रदेश स्तरीय सोसाइटी द्वारा पिछले कुछ वर्षों से डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम की यौमे पैदाइश के अवसर पर कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। मुज़फ्फरनगर शहर और फिर खतौली में कार्यक्रमों के बाद अब सोशल मीडिया के ज़रिए 15 अक्टूबर को “Multani Day” के नाम से प्रचारित किए जाने पर बिरादरी के भीतर कई सवाल उठ रहे हैं।

सवाल यह नहीं कि डॉ. कलाम को याद क्यों किया जा रहा है—सवाल यह है कि नाम क्या दिया जा रहा है?

डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम किसी एक बिरादरी, मज़हब या क्षेत्र की शख्सियत नहीं थे। वह पूरे हिंदुस्तान के गौरव, नौजवानों के प्रेरणास्रोत और शिक्षा व विज्ञान के पैरोकार थे।

अगर कोई संस्था उनकी यौमे पैदाइश पर कार्यक्रम आयोजित करना चाहती है तो इसका स्वागत होना चाहिए। लेकिन सवाल यह है कि एक ऐसे दिवस को, जो विद्यार्थियों और युवाओं की प्रेरणा से जुड़ा हुआ है, क्या किसी एक बिरादरी की विशेष पहचान के साथ प्रचारित करना उचित है?

बिरादरी के लोगों के सामने यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि “Multani Day” नाम का अपना एक अलग सामाजिक और ऐतिहासिक संदर्भ बताया जाता रहा है। ऐसे में किसी दूसरी तारीख़ को उसी नाम से प्रचारित किए जाने पर स्वाभाविक रूप से यह भ्रम पैदा होता है कि आखिर बिरादरी के बीच “Multani Day” की पहचान क्या है और इसकी तारीख़ क्या मानी जाए?

इंजीनियर साहब से बिरादरी का सीधा सवाल

जिस सोसाइटी के सदर साहब अपने नाम के साथ “इंजीनियर” का लक़ब इस्तेमाल करते हैं, उनसे बिरादरी के पढ़े-लिखे नौजवानों और बुज़ुर्गों का अदब के साथ सवाल है—

अगर 15 अक्टूबर को डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम की यौमे पैदाइश के तौर पर कार्यक्रम आयोजित किया जा रहा है तो उसे “World Students Day” अथवा डॉ. कलाम की यौमे पैदाइश के नाम से ही क्यों न आयोजित किया जाए?

अगर मक़सद बिरादरी के नौजवानों में शिक्षा, विज्ञान, तरक़्क़ी और देशप्रेम का जज़्बा पैदा करना है तो कार्यक्रम को पूरे समाज के लिए खुला रखा जाए और डॉ. कलाम के विचारों तथा उनकी ज़िंदगी से नई नस्ल को रोशनी हासिल करने का मौक़ा दिया जाए।

किसी महान राष्ट्रीय शख्सियत को किसी एक बिरादरी तक सीमित करना उनकी विरासत को छोटा करना होगा।

बिरादरी को भ्रम में रखने के बजाय साफ़-साफ़ तारीख़ और इतिहास बताया जाए

मुल्तानी बिरादरी के लोग सीधे-सादे, मोहब्बत करने वाले और अपनी बिरादरी की पहचान से बेपनाह मोहब्बत रखने वाले हैं। यही वजह है कि बिरादरी से जुड़े किसी भी आयोजन को लोग भरोसे के साथ स्वीकार कर लेते हैं।

लेकिन यही भरोसा हमारी सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी भी है।

बिरादरी के ज़िम्मेदार लोगों से गुज़ारिश है कि तारीख़, नाम और इतिहास को लेकर कोई ऐसा प्रचार न किया जाए जिससे आने वाली नस्लें भ्रमित हों।

अगर “Multani Day” के लिए कोई पुरानी परंपरा, तारीख़ या दस्तावेज़ मौजूद है तो उसे बिरादरी के सामने सार्वजनिक किया जाए। अगर 15 अक्टूबर को डॉ. कलाम की यौमे पैदाइश पर कार्यक्रम है तो उसे उसी हवाले से आयोजित किया जाए।

दोनों को मिलाकर पेश करने से आख़िर हासिल क्या होगा?

बिरादरी के बुद्धिजीवी आगे आएँ

आज ज़रूरत इस बात की है कि बिरादरी के पढ़े-लिखे नौजवान, सामाजिक कार्यकर्ता, बुज़ुर्ग और बुद्धिजीवी इस मसले पर ख़ामोशी इख़्तियार करने के बजाय तथ्यों के साथ अपनी राय सामने रखें।

हम किसी शख्सियत या संस्था की मुख़ालफ़त नहीं कर रहे, बल्कि नाम, तारीख़, इतिहास और बिरादरी की पहचान को लेकर साफ़गोई की बात कर रहे हैं।

डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम का सम्मान कीजिए, उनकी तालीमी और वैज्ञानिक सोच को नई नस्ल तक पहुँचाइए, उनके सपनों का हिंदुस्तान बनाने की बात कीजिए—मगर किसी राष्ट्रीय शख्सियत की यौमे पैदाइश को बिरादरी की पहचान के साथ इस तरह न जोड़ा जाए कि आम लोगों के बीच असल तथ्य ही धुंधले पड़ जाएँ।

बिरादरी का सवाल सीधा है—
15 अक्टूबर को डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम की यौमे पैदाइश मनानी है, World Students Day मनाना है या “Multani Day” के नाम से एक अलग पहचान कायम करनी है?

अगर मक़सद नेक है तो नाम और तारीख़ को लेकर इतनी साफ़गोई भी ज़रूरी है।

इसी का नाम बिरादरी की अमानत, इतिहास की हिफ़ाज़त और आने वाली नस्लों के प्रति हमारी ज़िम्मेदारी है।

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार से पंजीकृत, मुल्क की राजधानी नई दिल्ली से प्रसारित, मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी की क़ौमी समाचार पत्रिका, न्यूज़ पोर्टल एवं YouTube चैनल “मुल्तानी समाज” के लिए उत्तर प्रदेश डेस्क से प्रधान संपादक ज़मीर आलम की ख़ास रिपोर्ट।

अपनी ख़बर हम तक पहुँचाइए

अगर आप भी अपनी ख़बर, मज़मून (आर्टिकल), पैग़ाम, मुबारकबाद, ताज़ियती इश्तिहार, दिलचस्प वाक़ियात, तहरीर, अफ़साना या अपने कारोबार का इश्तिहार (विज्ञापन) क़ौमी सतह पर शाया या प्रसारित करवाना चाहते हैं, तो बराए मेहरबानी नीचे दिए गए नंबरों पर राब्ता फ़रमाएँ।

📞 9410652990
📞 8010884848

आपका एतमाद ही हमारी सबसे बड़ी ताक़त है।

“मुल्तानी समाज”

अपनी बिरादरी की आवाज़ — अपनी पहचान

मुल्तानी बिरादरी की डिजिटल जनगणना के लिए बड़ा डिजिटल प्लेटफॉर्म तैयार

“मुल्तानी घराना” के ज़रिए हर घर, हर कुनबे और हर खानदान को डिजिटल शिजरे में जोड़ने की पहल — अपने घराने की एंट्री खुद करें या अपने कस्बे-शहर में जनगणना अधिकारी बनने के लिए अपनी जानकारी भेजें

नई दिल्ली/उत्तर प्रदेश डेस्क।
मुस्लिम मुल्तानी लोहार एवं बढ़ई बिरादरी की सामाजिक एकजुटता, डिजिटल पहचान और आने वाली नस्लों के लिए बिरादरी का मुकम्मल रिकॉर्ड महफूज़ करने की दिशा में एक अहम और दूरअंदेशाना पहल सामने आई है। बिरादरी की राष्ट्रीय संस्था “मुल्तानी समाज चैरिटेबल ट्रस्ट” ने डिजिटल दौर की जरूरतों को समझते हुए बिरादरी की डिजिटल जनगणना के लिए एक बड़े सॉफ्टवेयर प्लेटफॉर्म “मुल्तानी घराना” को बिरादरी के सामने पेश किया है।

इस डिजिटल प्लेटफॉर्म का मकसद सिर्फ नाम और मोबाइल नंबर इकट्ठा करना नहीं, बल्कि हर परिवार, कुनबे, खानदान और रिश्तेदारी के सिलसिले को एक मुकम्मल डिजिटल शिजरे की शक्ल में सुरक्षित करना है, ताकि आज का तैयार किया गया रिकॉर्ड आने वाली नस्लों के लिए भी एक अहम सामाजिक दस्तावेज़ साबित हो सके।

सोशल मीडिया के शुरुआती दौर से डिजिटल सफर की कहानी

आज जब सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुके हैं, उस दौर को भी याद करना जरूरी है जब इन तकनीकों का इस्तेमाल भारत में अभी शुरुआती मरहले में था।

मुल्तानी समाज चैरिटेबल ट्रस्ट ने बिरादरी को डिजिटल प्लेटफॉर्म पर एकजुट करने की कोशिश उस समय शुरू की, जब व्हाट्सऐप का इस्तेमाल भारत में तेजी से शुरू ही हुआ था। वर्ष 2011 के आसपास बिरादरी के लोगों को व्हाट्सऐप ग्रुपों के माध्यम से जिला और राज्यवार जोड़ने की कोशिश की गई। उस दौर में एक व्हाट्सऐप ग्रुप में सदस्यों की संख्या बेहद सीमित हुआ करती थी, जिसकी वजह से बड़ी तादाद में बिरादरी के अफराद को एक ही प्लेटफॉर्म पर जोड़ना अपने आप में एक चुनौती था।

इसके बाद टेलीग्राम के सामने आने पर बिरादरी के लिए टेलीग्राम ग्रुप और चैनल तैयार किए गए, ताकि ज्यादा से ज्यादा लोगों को एक साथ जोड़ा जा सके। इसके साथ-साथ फेसबुक पर बिरादरी के लोगों को तलाश कर विभिन्न ग्रुपों और पेजों से जोड़ा गया तथा दूसरे डिजिटल प्लेटफॉर्मों पर भी बिरादरी की मौजूदगी दर्ज कराने की कोशिश की गई।

बिरादरी के लोगों को एक-दूसरे के करीब लाने और सामाजिक संपर्क को मजबूत करने के लिए ऑनलाइन डायरेक्टरी प्लेटफॉर्म पर भी संस्था की मौजूदगी दर्ज कराई गई।

खबरों से लेकर रिश्तों तक — डिजिटल पहचान बनाने की कोशिश

इसी डिजिटल सफर को आगे बढ़ाते हुए बिरादरी की राष्ट्रीय समाचार पत्रिका “मुल्तानी समाज” का न्यूज़ पोर्टल, डिजिटल प्लेटफॉर्म और यूट्यूब चैनल तैयार किया गया, ताकि बिरादरी के लोगों की खुशियों, ग़मों, सामाजिक गतिविधियों, कामयाबियों और अहम खबरों को मुल्क के कोने-कोने तक पहुंचाया जा सके।

बिरादरी की डिजिटल पहचान को और मजबूत करने के लिए “मुल्तानी समाज” नाम से वेबसाइट तैयार की गई। वहीं बिरादरी में निकाह के लिए मुनासिब रिश्तों की तलाश को आसान बनाने के उद्देश्य से “रिश्तों की दुनिया” जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म की शुरुआत की गई।

इन तमाम कोशिशों के पीछे बुनियादी सोच यही रही कि बिरादरी का कोई भी अफ़राद एक-दूसरे से बेखबर न रहे और दूर-दराज़ इलाकों में रहने वाले मुल्तानी परिवार भी आपसी राब्ते और इत्तेहाद के एक मजबूत सिलसिले से जुड़े रहें।

अब जनगणना की तरफ बड़ा कदम — “मुल्तानी घराना”

इसी लंबे डिजिटल सफर का अगला और अहम मरहला अब बिरादरी की डिजिटल जनगणना है।

मुल्तानी समाज चैरिटेबल ट्रस्ट द्वारा तैयार किया गया “मुल्तानी घराना” सॉफ्टवेयर बिरादरी के हर परिवार को अपनी जानकारी खुद दर्ज करने का मौका देता है। इसके माध्यम से कोई भी परिवार अपने घर के अफराद के साथ-साथ अपने कुनबे, खानदान और रिश्तेदारों की जानकारी दर्ज कर अपने परिवार का डिजिटल शिजरा तैयार कर सकता है।

यानी एक परिवार से शुरू होकर जानकारी आगे बढ़ते हुए पूरे कुनबे और खानदान को एक डिजिटल सामाजिक नक्शे में जोड़ा जा सकता है।

यह पहल आने वाले समय में बिरादरी की सामाजिक ताकत, परिवारों की संख्या, अलग-अलग शहरों और कस्बों में आबादी की मौजूदगी तथा आपसी रिश्तेदारी के सिलसिले को समझने में बेहद उपयोगी साबित हो सकती है।

हर घर बने डिजिटल जनगणना का हिस्सा

ट्रस्ट की अपील है कि बिरादरी का हर परिवार इस मुहिम को सिर्फ एक संस्था की मुहिम समझकर न देखे, बल्कि इसे अपनी बिरादरी और अपनी आने वाली नस्लों के लिए एक सामाजिक जिम्मेदारी समझे।

हर परिवार अपने घराने की जानकारी दर्ज करे, अपने माता-पिता, भाई-बहन, औलाद, खानदान और रिश्तेदारों को इस डिजिटल शिजरे से जोड़े और कोशिश करे कि उसका पूरा कुनबा इस जनगणना का हिस्सा बने।

“मुल्तानी घराना” को देखने और अपनी डिजिटल एंट्री की प्रक्रिया शुरू करने के लिए आज ही वेबसाइट पर जाएँ:

मुल्तानी घराना डॉट कॉम

सॉफ्टवेयर को इस्तेमाल करने के दौरान किसी तरह की परेशानी या रहनुमाई की जरूरत हो तो हेल्पलाइन नंबर की जानकारी भी प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध कराई गई है।

क्या आप अपने शहर या कस्बे के “जनगणना अधिकारी” बनना चाहते हैं?

बिरादरी की डिजिटल जनगणना को ज्यादा व्यापक बनाने के लिए ऐसे जिम्मेदार, सक्रिय और समाजी खिदमत का जज़्बा रखने वाले अफराद की भी जरूरत है, जो अपने कस्बे, शहर, ब्लॉक, तहसील या इलाके में बिरादरी के परिवारों को इस डिजिटल जनगणना से जोड़ने में अपना किरदार अदा कर सकें।

अगर आप अपने इलाके में “मुल्तानी बिरादरी डिजिटल जनगणना अधिकारी” के तौर पर काम करने के इच्छुक हैं तो अपनी पूरी जानकारी ट्रस्ट/सम्बंधित टीम तक भेज सकते हैं।

आपका नाम, शहर/कस्बा, जिला, मोबाइल नंबर और बिरादरी के लिए किए जाने वाले काम का संक्षिप्त विवरण भेजकर इस मुहिम से जुड़ा जा सकता है।

एक-एक घर जुड़ेगा, तभी पूरी बिरादरी का मुकम्मल डिजिटल रिकॉर्ड तैयार होगा।

आने वाले दौर में रिश्तों के लिए भी नया डिजिटल प्लेटफॉर्म

मुल्तानी समाज चैरिटेबल ट्रस्ट की ओर से यह भी संकेत दिया गया है कि बिरादरी के बीच रिश्ते-नाते आसान बनाने के लिए एक और डिजिटल सॉफ्टवेयर जल्द पेश किया जाएगा।

इसका मकसद बिरादरी के परिवारों को मुनासिब रिश्तों की तलाश में आधुनिक तकनीक का फायदा पहुंचाना और खास तौर पर हमारी बहन-बेटियों और नौजवानों के लिए रिश्तों की तलाश के सिलसिले को ज्यादा व्यवस्थित और आसान बनाना होगा।

“बड़े अल्फाज़” नहीं, काम का इतिहास देखिए

बिरादरी के कुछ अफराद कभी-कभी संस्था के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले अल्फाज़ जैसे “पैदायशी इंजीनियर”, “क्रांतिकारी तंजीम”, “राष्ट्रीय स्तर की संस्था” आदि पर सवाल या नापसंदगी का इज़हार करते हैं।

लेकिन किसी भी संस्था की पहचान सिर्फ उसके अल्फाज़ से नहीं, बल्कि उसके काम, उसके सफर और उसकी लगातार मेहनत से होती है।

अगर किसी तंजीम ने उस दौर में बिरादरी को डिजिटल प्लेटफॉर्म पर जोड़ने की कोशिश की, जब सोशल मीडिया भारत में अपनी शुरुआती मंजिलें तय कर रहा था; अगर उसने बिरादरी की खबरों को डिजिटल माध्यम से घर-घर पहुंचाने की कोशिश की; अगर उसने वेबसाइट, न्यूज़ पोर्टल, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और रिश्तों के डिजिटल प्लेटफॉर्म तैयार किए; और आज बिरादरी की डिजिटल जनगणना तथा डिजिटल शिजरे की तरफ कदम बढ़ाया है, तो इन तमाम कामों का जायज़ा लेकर ही उसके सफर की अहमियत को समझा जाना चाहिए।

अल्फाज़ पर बहस अपनी जगह, मगर काम का हिसाब भी अपनी जगह।

मुल्तानी समाज चैरिटेबल ट्रस्ट का कहना है कि यह सफर अभी खत्म नहीं हुआ, बल्कि असल में एक नए डिजिटल दौर की शुरुआत है।

बिरादरी की जनगणना, डिजिटल शिजरा, रिश्तों का डिजिटल प्लेटफॉर्म, बिरादरी की खबरों का राष्ट्रीय नेटवर्क और आने वाली नस्लों के लिए सामाजिक रिकॉर्ड — यह सब मिलकर मुल्तानी बिरादरी को एक मजबूत डिजिटल सामाजिक नेटवर्क की शक्ल दे सकता है।

आज जो जानकारी हम महफूज़ करेंगे, वही कल हमारी आने वाली नस्लों के लिए हमारी पहचान और हमारे खानदानों की कहानी बनेगी।

इसलिए तमाम अहले बिरादरी से गुज़ारिश है कि इस मुहिम में बढ़-चढ़कर हिस्सा लें और अपने घराने को “मुल्तानी घराना” से जरूर जोड़ें।

अपने घराने की एंट्री खुद करें — या अपने इलाके में डिजिटल जनगणना अधिकारी बनकर बिरादरी की खिदमत का हिस्सा बनें।

इंशाअल्लाह, अगली कड़ी में मुल्तानी समाज चैरिटेबल ट्रस्ट की ओर से बिरादरी के लिए किए गए दूसरे अहम कामों और आने वाले डिजिटल प्रोजेक्ट्स की तफसील भी बिरादरी के सामने रखी जाएगी।


सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार से पंजीकृत, मुल्क की राजधानी नई दिल्ली से प्रसारित, मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी की क़ौमी समाचार पत्रिका, न्यूज़ पोर्टल और यूट्यूब चैनल “मुल्तानी समाज” के लिए उत्तर प्रदेश डेस्क से प्रधान संपादक ज़मीर आलम की ख़ास रिपोर्ट।

अपनी खबर, मज़मून और इश्तिहार हमें भेजें

अगर आप भी अपनी ख़बर, मज़मून (आर्टिकल), पैग़ाम, मुबारकबाद, ताज़ियती इश्तिहार, दिलचस्प वाक़ियात, तहरीर, अफ़साना (कहानी) या अपने कारोबार का इश्तिहार (विज्ञापन) क़ौमी सतह पर प्रकाशित या प्रसारित करवाना चाहते हैं, तो नीचे दिए गए नंबरों पर राब्ता फरमाएँ।

📞 9410652990
📞 8010884848

आपका एतमाद ही हमारी सबसे बड़ी ताक़त है।

“मुल्तानी समाज”

अपनी बिरादरी की आवाज़ — अपनी पहचान।

Saturday, October 3, 2026

इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन सलीमन बी का इंतिक़ाल, मुल्तानी बिरादरी में पसरा ग़म — आज ईशा की नमाज़ के बाद होगी तदफ़ीन

अल्लाह तआला मरहूमा की मग़फिरत फ़रमाए और उन्हें जन्नतुल फ़िरदौस में आला मुक़ाम अता फ़रमाए। आमीन।

निहायत ही रंज-ओ-ग़म और अफ़सोस के साथ तमाम मुस्लिम, मुल्तानी लोहार एवं बढ़ई बिरादराना हज़रात को यह इत्तिला दी जाती है कि आज दिन इतवार, बा-तारीख़ 04 अक्टूबर 2026 को क़स्बा अंबेहटा पीर, ज़िला सहारनपुर, उत्तर प्रदेश में जनाब रिजवान साहब वल्द जनाब सुल्तान साहब की अहलिया सलीमन बी, जिनका मायका गाँव पुरमाफ़ी, ज़िला शामली, उत्तर प्रदेश में है, आज सुबह तक़रीबन 09 बजे क़ज़ा-ए-इलाही से वफ़ात पा गईं।

इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन।

मरहूमा के इंतिक़ाल की ख़बर से अहल-ए-ख़ाना, अज़ीज़-ओ-अक़ारिब और बिरादराने-मिल्लत में गहरा रंज और सदमा है। यह दुनिया फ़ानी है और हर ज़ी-रूह को एक दिन अपने रब की तरफ़ लौटकर जाना है। अल्लाह तआला मरहूमा की तमाम ख़ताओं और कोताहियों से दरगुज़र फ़रमाते हुए उनकी मग़फिरत फ़रमाए, क़ब्र को नूर से मुनव्वर करे और उन्हें अपनी रहमत के साए में जगह अता फ़रमाए।

नमाज़-ए-जनाज़ा और तदफ़ीन

मिली हुई जानकारी के मुताबिक़ मरहूमा की नमाज़-ए-जनाज़ा आज बाद नमाज़-ए-ईशा अदा की जाएगी, जिसके बाद उन्हें सुपुर्द-ए-ख़ाक किया जाएगा।

तमाम बिरादराना हज़रात से गुज़ारिश है कि अगर मुमकिन हो तो नमाज़-ए-जनाज़ा में शिरकत फ़रमाएँ, मरहूमा के लिए मग़फिरत की दुआ करें और अहल-ए-ख़ाना के ग़म में शरीक होकर उन्हें तसल्ली दें।

मय्यत को क़ब्र में उतारते वक़्त

जब मय्यत को क़ब्र में उतारा जाए तो दुआ की जाए:

اللّٰهُمَّ اغْفِرْ لَهَا وَارْحَمْهَا، وَعَافِهَا وَاعْفُ عَنْهَا۔

तर्जुमा:
ऐ अल्लाह! इसकी मग़फिरत फ़रमा, इस पर रहम फ़रमा, इसे आफ़ियत अता फ़रमा और इससे दरगुज़र फ़रमा।

क़ब्र में मय्यत को रखते वक़्त यह पढ़ना भी मसनून है:

بِسْمِ اللّٰهِ وَعَلَىٰ مِلَّةِ رَسُولِ اللّٰهِ ﷺ

तर्जुमा:
अल्लाह के नाम के साथ और अल्लाह के रसूल ﷺ के दीन व तरीक़े पर।

मिट्टी देते वक़्त

मय्यत पर मिट्टी डालते वक़्त यह आयत पढ़ी जा सकती है:

مِنْهَا خَلَقْنَاكُمْ وَفِيهَا نُعِيدُكُمْ وَمِنْهَا نُخْرِجُكُمْ تَارَةً أُخْرَىٰ

तर्जुमा:
हमने तुम्हें इसी मिट्टी से पैदा किया, इसी में तुम्हें वापस लौटाएँगे और इसी से दोबारा तुम्हें निकालेंगे।

क़ब्र पर मिट्टी देने के बाद मरहूमा के लिए दिल से दुआ-ए-मग़फिरत की जाए:

ऐ अल्लाह! मरहूमा सलीमन बी की मग़फिरत फ़रमा। उनकी तमाम ख़ताओं और गुनाहों को माफ़ फ़रमा। उनकी क़ब्र को कुशादा और नूरानी फ़रमा। क़ब्र की तंगी और अज़ाब से महफ़ूज़ फ़रमा। उन्हें सवालात-ए-क़ब्र में कामयाबी अता फ़रमा। उनकी क़ब्र को जन्नत के बाग़ों में से एक बाग़ बना दे। उन्हें जन्नतुल फ़िरदौस में आला मुक़ाम अता फ़रमा और अपने प्यारे हबीब हज़रत मुहम्मद ﷺ की शफ़ाअत नसीब फ़रमा।

या अल्लाह! अहल-ए-ख़ाना को सब्र-ए-जमील अता फ़रमा, इस सदमे को बर्दाश्त करने की ताक़त दे और मरहूमा के लिए किए गए तमाम नेक अमल और दुआओं को उनके हक़ में क़बूल फ़रमा। आमीन या रब्बुल आलमीन।

राब्ता

मय्यत के सिलसिले में मज़ीद मालूमात के लिए मरहूमा के फ़रज़ंद जनाब परवेज़ साहब से इस मोबाइल नंबर पर राब्ता क़ायम किया जा सकता है:

📞 9719929191

तमाम हज़रात से ख़ुसूसन गुज़ारिश है कि मरहूमा के लिए फ़ातिहा-ख़्वानी और दुआ-ए-मग़फिरत फ़रमाएँ।

अल्लाह तआला मरहूमा को जन्नतुल फ़िरदौस में आला मुक़ाम अता फ़रमाए और तमाम पसमान्दगान को सब्र-ए-जमील अता फ़रमाए।
आमीन सुम्मा आमीन।


सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार से पंजीकृत, मुल्क की राजधानी नई दिल्ली से प्रसारित, पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी की मुल्क की इकलौती क़ौमी समाचार पत्रिका, न्यूज़ पोर्टल एवं यूट्यूब चैनल “मुल्तानी समाज” के लिए उत्तर प्रदेश डेस्क से प्रधान संपादक ज़मीर आलम की ख़ास रिपोर्ट।

अपनी ख़बर हमें भेजें

अगर आप भी अपनी ख़बर, मज़मून (आर्टिकल), पैग़ाम, मुबारकबाद, ताज़ियती इश्तिहार, दिलचस्प वाक़ियात, तहरीर, अफ़साना (कहानी) या अपने कारोबार का इश्तिहार (विज्ञापन) क़ौमी सतह पर शाया या प्रसारित करवाना चाहते हैं तो बराए मेहरबानी नीचे दिए गए नंबरों पर राब्ता फ़रमाएँ।

📞 9410652990
📞 8010884848

आपका एतमाद ही हमारी सबसे बड़ी ताक़त है।

“मुल्तानी समाज”

अपनी बिरादरी की आवाज़ — अपनी पहचान