Monday, July 6, 2026

😭 जवान बेटे की असमय जुदाई ने बड़ौत को ग़म में डुबो दिया — जीशान की दर्दनाक सड़क दुर्घटना में इंतिकाल, अल्लाह मरहूम की मग़फ़िरत फ़रमाए 🤲

मुल्तानी समाज उत्तर प्रदेश डेस्क

"इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन।"

निहायत ही अफ़सोस और गहरे रंजो-ग़म के साथ मुस्लिम मुल्तानी लोहार, बढ़ई बिरादरी और तमाम अहबाब को इत्तिला दी जाती है कि जनाब दिलशाद साहब (पूर्व सभासद, नगर पालिका परिषद बड़ौत), निवासी गांव तुगाना, हाल निवासी मोहल्ला पठानकोट, बड़ौत, जनपद बागपत (उत्तर प्रदेश) के जिगर के टुकड़े जनाब जीशान (उम्र लगभग 20–22 वर्ष) का मंगलवार, 7 जुलाई 2026 की बीती रात लगभग 3 बजे एक दर्दनाक सड़क हादसे में कज़ा-ए-इलाही से इंतिकाल हो गया।

मिली जानकारी के अनुसार मरहूम जीशान दिल्ली से बाइक द्वारा अपने घर बड़ौत लौट रहे थे। इसी दौरान सरूरपुर एरिया में उनकी बाइक दुर्घटनाग्रस्त हो गई। हादसा इतना भीषण था कि वह ज़िंदगी की जंग हार गए और अपने रब के हुक्म से इस फ़ानी दुनिया को अलविदा कह गए।

मरहूम अपने वालिदैन की उम्मीदों का सहारा थे। बताया जाता है कि उनकी तीन बहनें हैं और उन्हीं का इकलौता भाई थे। इस दर्दनाक हादसे की खबर जैसे ही बड़ौत पहुंची, घर में मातम छा गया। मोहल्ले और शहर में जिसे भी यह दुखद समाचार मिला, वह ग़मज़दा परिवार के घर ताज़ियत के लिए पहुंचने लगा। हर आंख अश्कबार है और हर ज़ुबान पर मरहूम की मग़फ़िरत की दुआ है।

परिजनों के अनुसार मरहूम के नाना और मामा मूल रूप से गांव कोताना के रहने वाले बताए जाते हैं, जो वर्तमान में गांव बावली, तहसील बड़ौत, जनपद बागपत में निवास करते हैं।

बाद नमाज़ असर मरहूम की नमाज़-ए-जनाज़ा  होगी और बड़ौत के ही कब्रिस्तान मैं किए जायेंगे तदफ़ीन सपूर्दे ख़ाक लिहाज़ा आप हजरात भी जनाजे में शरीक होकर सवाबे दारेन हासिल करें।

हम अल्लाह तआला की बारगाह में दुआगो हैं कि अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त मरहूम जीशान की मग़फ़िरत फ़रमाए, उनकी क़ब्र को जन्नत के बाग़ों में से एक बाग़ बनाए, उन्हें जन्नतुल फ़िरदौस में आला मक़ाम अता फ़रमाए और तमाम लवाहिक़ीन को सब्र-ए-जमील अता फ़रमाए। आमीन या रब्बल आलमीन।

दुआ की गुज़ारिश:
तमाम अहबाब से गुज़ारिश है कि मरहूम के लिए सूरह फ़ातिहा, इस्तिग़फ़ार और दुआ-ए-मग़फ़िरत का एहतमाम फ़रमाएं तथा उनके अहल-ए-ख़ाना के लिए सब्र और हिम्मत की दुआ करें।

नोट: मरहूम के संबंध में अधिक जानकारी के लिए उनके चाचा जनाब मईनुद्दीन साहब से मोबाइल नंबर 7455844715 पर संपर्क किया जा सकता है।

— प्रेस लाइन —
सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा पंजीकृत, देश की राजधानी दिल्ली से प्रसारित मुस्लिम मुल्तानी लोहार, बढ़ई बिरादरी की राष्ट्रीय समाचार पत्रिका / न्यूज़ पोर्टल / यूट्यूब चैनल "मुल्तानी समाज" के लिए उत्तर प्रदेश डेस्क से प्रधान संपादक ज़मीर आलम की विशेष रिपोर्ट।

Sunday, July 5, 2026

700 साल पुरानी विरासत: मुल्तान से नागौर तक मुल्तानी समाज की गौरवशाली दास्तान

तोपसाज़ी, लोहे की दस्तकारी और सूफ़ी रिवायतों से जुड़ी एक ऐतिहासिक विरासत

विशेष संवाददाता | मुल्तानी समाज न्यूज़

राजस्थान के ऐतिहासिक शहर नागौर की सरज़मीन केवल सूफ़ी बुज़ुर्गों, किलों और सल्तनतों की वजह से ही मशहूर नहीं रही, बल्कि यह शहर सदियों से मुल्तानी समाज की मेहनत, दस्तकारी और इल्म-ओ-हुनर का भी गवाह रहा है। इतिहास, स्थानीय परंपराओं और समाज की मौखिक विरासत (Oral Traditions) के अनुसार, आज नागौर, राजस्थान और मध्य प्रदेश में बसे मुल्तानी समाज के अधिकांश परिवारों की जड़ें मुल्तान (वर्तमान पाकिस्तान) से जुड़ी मानी जाती हैं।

करीब 600 से 700 वर्ष पूर्व, जब उत्तर भारत में सल्तनत का दौर था, तब मुल्तान अपने लोहे के उद्योग, हथियार निर्माण और तोपसाज़ी के लिए पूरे हिंदुस्तान में प्रसिद्ध था। उसी दौर में अनेक कुशल लोहार, धातु-शिल्पी और तोप बनाने वाले कारीगर नागौर पहुँचे और यहीं की मिट्टी में हमेशा के लिए बस गए।


मुल्तान से नागौर तक का ऐतिहासिक सफ़र

इतिहासकारों के अनुसार 13वीं से 15वीं शताब्दी के बीच नागौर एक महत्वपूर्ण सैन्य, व्यापारिक और सूफ़ी केंद्र बन चुका था। किलों की सुरक्षा और सेना को मज़बूत बनाने के लिए कुशल तोपसाज़ों और हथियार बनाने वाले कारीगरों की आवश्यकता थी।

उसी समय मुल्तान से आए मुस्लिम लोहारों और धातु-शिल्पियों को नागौर के शासकों ने सम्मानपूर्वक बसाया। यही परिवार आगे चलकर "मुल्तानी लोहार" अथवा "मुल्तानी समाज" के नाम से पहचाने जाने लगे।


नागौर में बसने के तीन प्रमुख ऐतिहासिक चरण

पहला चरण – सूफ़ी सिलसिलों का दौर (13वीं शताब्दी)

इतिहास में यह उल्लेख मिलता है कि मुल्तान और नागौर के बीच आध्यात्मिक संबंध सूफ़ी संतों के माध्यम से अत्यंत प्रगाढ़ थे। क़ाज़ी हमीदुद्दीन नागौरी, हज़रत बहाउद्दीन ज़करिया और सूफ़ी सिलसिलों के माध्यम से अनेक विद्वान, मुरीद और कारीगर मुल्तान से नागौर पहुँचे। यही मुल्तानी समाज के आगमन की प्रारंभिक नींव मानी जाती है।


दूसरा चरण – खिलजी और तुगलक काल (14वीं शताब्दी)

अलाउद्दीन खिलजी और बाद में मुहम्मद बिन तुगलक के शासनकाल में नागौर एक विशाल सैन्य केंद्र के रूप में विकसित हुआ। किलों के विस्तार और हथियार निर्माण के लिए मुल्तान से दक्ष लोहारों और तोपसाज़ों को आमंत्रित किया गया।

इसी काल को मुल्तानी समाज के बड़े पैमाने पर नागौर में बसने का सबसे महत्वपूर्ण समय माना जाता है।


तीसरा चरण – नागौर सल्तनत का दौर (15वीं शताब्दी)

सन 1407 ईस्वी के बाद नागौर के शासकों ने अपनी सेना को आधुनिक स्वरूप देने के उद्देश्य से मुल्तान और गुजरात से विशेष रूप से तोपसाज़ों तथा लोहे के विशेषज्ञ कारीगरों को बुलाया और उन्हें किले के आसपास स्थायी रूप से बसाया।


बाबा हाजी सुलेमान मुल्तानी – समाज के आदि पुरुष

समाज की स्थानीय परंपराओं और बुज़ुर्गों के अनुसार बाबा हाजी सुलेमान मुल्तानी को नागौर में बसने वाले मुल्तानी समाज का प्रथम पूर्वज माना जाता है।

बताया जाता है कि वे एक कुशल धातु-शिल्पी, हथियार निर्माता और सूफ़ी विचारधारा से जुड़े हुए व्यक्तित्व थे। उन्होंने अपने साथ कई परिवारों को नागौर लाकर पहली भट्टी और कार्यशाला स्थापित की, जहाँ से इस समाज की नई पहचान शुरू हुई।


तोपखाने से कृषि उपकरणों तक का सफ़र

समय के साथ युद्धों का दौर समाप्त हुआ, लेकिन मुल्तानी समाज का हुनर कभी समाप्त नहीं हुआ।

जिन हाथों ने कभी तलवारें, तोपें और हथियार बनाए, उन्हीं हाथों ने आगे चलकर खेती-किसानी के लिए फावड़े, कुल्हाड़ियाँ, कल्टीवेटर, लोहे के औज़ार और घरेलू उपयोग की वस्तुएँ बनाकर पूरे देश में अपनी अलग पहचान स्थापित की।

आज भी नागौर का लोहा बाज़ार और वहाँ बनने वाले कृषि उपकरण इस ऐतिहासिक विरासत की जीवंत मिसाल माने जाते हैं।


सूफ़ी रिवायतों से जुड़ा रिश्ता

मुल्तान और नागौर का संबंध केवल व्यापार या दस्तकारी तक सीमित नहीं था, बल्कि सूफ़ी सिलसिलों ने भी दोनों शहरों को एक आध्यात्मिक डोर में बाँधा।

इतिहास में क़ाज़ी हमीदुद्दीन नागौरी और हज़रत बहाउद्दीन ज़करिया के बीच गहरे धार्मिक संबंधों का उल्लेख मिलता है। वहीं सूफ़ी हमीदुद्दीन नागौरी की फ़क़ीरी और इल्तुतमिश का उनके प्रति सम्मान आज भी नागौर की ऐतिहासिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।


तारकीन का बुलंद दरवाज़ा – अदब और अकीदत की निशानी

नागौर स्थित सूफ़ी हमीदुद्दीन नागौरी की दरगाह का ऐतिहासिक बुलंद दरवाज़ा सुल्तान शम्सुद्दीन इल्तुतमिश द्वारा बनवाया गया माना जाता है। बाद में मुहम्मद बिन तुगलक के दौर में दरगाह परिसर के अन्य निर्माण और विस्तार कार्य हुए।

यह इमारत आज भी सूफ़ी परंपरा, अदब और सल्तनती इतिहास की एक अनमोल धरोहर है।


आज भी ज़िंदा है 700 साल पुरानी पहचान

मुल्तानी समाज ने सदियों तक अपने पूर्वजों की दस्तकारी, मेहनत और ईमानदारी की परंपरा को जीवित रखा है। बदलते दौर के बावजूद समाज ने अपने हुनर को नई पीढ़ियों तक पहुँचाया और देश के औद्योगिक तथा कृषि विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

आज राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश सहित देश के अनेक राज्यों में बसे मुल्तानी समाज के लोग अपने पूर्वजों की इसी ऐतिहासिक विरासत पर गर्व करते हैं।


संपादकीय टिप्पणी

यह इतिहास स्थानीय लोक-परंपराओं, समाज की मौखिक विरासत और विभिन्न ऐतिहासिक उल्लेखों पर आधारित है। इनमें से कुछ विवरण व्यापक रूप से स्वीकार किए जाते हैं, जबकि कुछ दावों (जैसे किसी एक व्यक्ति को समाज का पहला पूर्वज मानना या कुछ विशिष्ट घटनाएँ) के लिए स्वतंत्र समकालीन ऐतिहासिक स्रोत सीमित हैं। इसलिए इन्हें समाज की परंपरागत मान्यताओं के रूप में प्रस्तुत करना अधिक उपयुक्त है।

"जिस कौम ने कभी सल्तनतों की तोपें गढ़ीं, वही कौम आज अपने हुनर, मेहनत और ख़िदमत से समाज की पहचान गढ़ रही है। मुल्तानी समाज की यह 700 वर्ष पुरानी विरासत केवल इतिहास नहीं, बल्कि आने वाली नस्लों के लिए फ़ख्र, पहचान और प्रेरणा का अमूल्य ख़ज़ाना है।"

Wednesday, July 1, 2026

जलालाबाद में सुलह की मिसाल: जब हिकमत, सब्र और ख़ुलूस ने डेढ़ साल पुराने पारिवारिक विवाद का कर दिया ख़ातिमा


✍️ ज़मीर आलम | प्रधान संपादक, मुल्तानी समाज

जलालाबाद (जनपद शामली, उत्तर प्रदेश)।

समाज की असली ख़ूबसूरती सिर्फ़ रिश्ते बनाने में नहीं, बल्कि टूटते हुए रिश्तों को फिर से जोड़ने में होती है। जब नफ़रत, ग़ुस्सा और मुक़दमेबाज़ी रिश्तों पर हावी होने लगें, तब कुछ ऐसे लोग सामने आते हैं जो अपनी हिकमत, सब्र, अख़लाक़ और ख़ुलूस से बिखरते घरों को फिर आबाद कर देते हैं। क़स्बा जलालाबाद में पेश आया एक ऐसा ही वाक़िया आज पूरे समाज के लिए एक मिसाल बन गया।

जनपद शामली के एक युवक और क़स्बा जलालाबाद की एक युवती के बीच काफ़ी समय से घरेलू विवाद चला आ रहा था। दोनों परिवारों के बीच लगभग डेढ़ वर्ष से मुक़दमेबाज़ी जारी थी। रिश्तेदारों, बिरादरी के ज़िम्मेदार लोगों और स्थानीय गणमान्य नागरिकों ने कई बार दोनों पक्षों के बीच सुलह कराने की कोशिश की। यह मामला तीन बार स्थानीय विधायक तक भी पहुँचा, मगर तमाम कोशिशों के बावजूद कोई स्थायी हल नहीं निकल सका।

मामले ने उस समय और भी दर्दनाक मोड़ ले लिया जब इस दौरान दुल्हन के सिर से उसके वालिद का साया उठ गया और वह यतीम हो गई। इस हादसे ने हर दर्दमंद दिल को झकझोर दिया, लेकिन इसके बावजूद विवाद समाप्त नहीं हो सका।

अल्हम्दुलिल्लाह, जब यह मामला जलालाबाद के वरिष्ठ समाजसेवी हाजी नज़ीर अहमद साहब तक पहुँचा तो उन्होंने इसे महज़ एक पारिवारिक झगड़ा नहीं, बल्कि समाज की अमानत समझा। उन्होंने रामपुर (ज़िला सहारनपुर) निवासी जनाब अमीर हसन साहब, इज़हार मेंबर साहब तथा हाजी मसीउल्लाह साहब (जलालाबाद) के साथ मिलकर दोनों पक्षों को आमने-सामने बैठाया।

लंबी बातचीत, आपसी मशवरे, सब्र, हिकमत और इस्लामी उसूलों के मुताबिक़ सुलह-सफ़ाई की कोशिशों के बाद आख़िरकार दोनों पक्ष आपसी रज़ामंदी से समझौते पर राज़ी हो गए। सबसे ख़ुशी की बात यह रही कि दोनों परिवारों ने एक-दूसरे के विरुद्ध दर्ज सभी मुक़दमे भी वापस लेने का फ़ैसला किया। इस तरह एक लंबे समय से चला आ रहा विवाद भाईचारे, मोहब्बत और समझदारी के साथ समाप्त हो गया।

इस्लाम हमेशा अमन, मोहब्बत, माफ़ी और सुलह की तालीम देता है। क़ुरआन-ए-करीम और हदीस-ए-पाक में भी लोगों के दरमियान सुलह कराने को बड़ी नेकी और अज़ीम अमल बताया गया है। ऐसे में जलालाबाद के समाजसेवियों की यह पहल न सिर्फ़ दोनों परिवारों के लिए राहत लेकर आई, बल्कि पूरे समाज के लिए यह पैग़ाम भी दे गई कि बातचीत और आपसी समझदारी से बड़े से बड़ा विवाद भी ख़त्म किया जा सकता है।

आज ज़रूरत इस बात की है कि समाज में मुक़दमेबाज़ी, कटुता और नफ़रत की बजाय आपसी मशवरे, सुलह और भाईचारे की संस्कृति को बढ़ावा दिया जाए। जब समाज के ज़िम्मेदार लोग अपनी ज़िम्मेदारी ईमानदारी से निभाते हैं तो न सिर्फ़ परिवार बचते हैं, बल्कि आने वाली नस्लों के लिए भी बेहतर माहौल तैयार होता है।

अल्लाह तआला से दुआ है कि वह दोनों परिवारों के दरमियान हमेशा मोहब्बत, अमन, बरकत और इत्तेहाद क़ायम रखे तथा इस नेक पहल में शामिल सभी समाजसेवियों को दुनिया और आख़िरत में बेहतरीन अज्र-ओ-सवाब अता फ़रमाए। आमीन या रब्बुल आलमीन।


✍️ ख़ास रिपोर्ट: ज़मीर आलम, प्रधान संपादक (उत्तर प्रदेश डेस्क)

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा पंजीकृत, देश की राजधानी दिल्ली से प्रसारित, पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार-बढ़ई बिरादरी की देश की इकलौती राष्ट्रीय समाचार पत्रिका, न्यूज़ पोर्टल एवं यूट्यूब चैनल "मुल्तानी समाज" के लिए विशेष रिपोर्ट।

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Monday, June 29, 2026

बागपत की नामवर शख्सियत मरहूम हाजी इकरामुल्ला साहब की अहलिया कनीज बी का इंतिक़ाल, बिरादरी में दौड़ गई ग़म की लहर, इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन

बागपत (उत्तर प्रदेश) | उत्तर प्रदेश डेस्क

निहायत ही रंज-ओ-ग़म के साथ मुस्लिम मुल्तानी लोहार, बढ़ई बिरादराना हज़रात को यह इत्तिला दी जाती है कि आज, दिन पीर, 29 जून 2026 को उत्तर प्रदेश के जनपद बागपत की हमारी बिरादरी की नामचीन, खिदमतगार और मशहूर उद्योगपति रहे मरहूम जनाब हाजी इकरामुल्ला साहब की अहलिया कनीज बी उम्र तकरीबन 85 साल का लंबी बीमारी के बाद कज़ा-ए-इलाही से इंतिक़ाल हो गया। मरहूमा अपने पीछे चार साहेबजादे जनाब अनीस- उर - रहमान, नफीस - उर - रहमान, शफ़ीक़ - उर - रहमान और खलील - उर - रहमान और समेत पौते, पोतियां और नाते नातिन समेत कुनबा, खानदान, रिश्तेदारों और तमाम अज़ीज़-ओ-अक़ारिब को ग़मज़दा छोड़कर इस फ़ानी दुनिया से हमेशा-हमेशा के लिए पर्दा फरमा गईं। उनके इंतिक़ाल की खबर सुनते ही बिरादरी और जानने वालों में गहरे दुख और अफ़सोस की लहर दौड़ गई। लोग मरहूमा की मग़फ़िरत और उनके घरवालों के लिए सब्र-ओ-हिम्मत की दुआएँ कर रहे हैं।

इस मौके पर "मुल्तानी समाज" परिवार मरहूमा के तमाम अहल-ए-ख़ाना के ग़म में बराबर का शरीक है और अल्लाह तआला की बारगाह में दुआगो है कि वह मरहूमा की तमाम ख़ताओं को माफ़ फरमाए, उनकी क़ब्र को जन्नत के बाग़ों में से एक बाग़ बना दे, उन्हें जन्नतुल फ़िरदौस में आला मुकाम अता फरमाए और तमाम लवाहिकीन को सब्र-ए-जमील अता फरमाए।

दुआ:

اللهم اغفر لها وارحمها وعافها واعف عنها، وأكرم نزلها ووسع مدخلها، واجعل قبرها روضة من رياض الجنة. آمين يا رب العالمين۔

नोट : नमाज़ मैय्यत को आज रात 11 बजे किया जाएगा सपुर्द - ए - ख़ाक, लिहाज़ा आप हज़रात भी जनाज़े में शरीक होकर सवाबे दारेन हासिल करें।


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Sunday, June 28, 2026

शामली की मरहूमा रूकसाना बी का इंतिक़ाल, आज बाद नमाज़-ए-जौहर सुपुर्द-ए-ख़ाक की जाएँगी, इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन

शामली (उत्तर प्रदेश) | मुल्तानी समाज न्यूज़ डेस्क

निहायत ही रंज-ओ-ग़म के साथ तमाम बिरादरान-ए-इस्लाम को इत्तिला दी जाती है कि मोहल्ला नानूपुरा, नज़दीक राम रहीम बारात घर, क़स्बा शामली की साकिना मरहूमा रूकसाना बी, अहलिया मरहूम जनाब मोहम्मद यासीन साहब (असल साकिन गाँव भैसानी, थाना भवन, ज़िला शामली) का आज दिन पीर, 29 जून 2026 को लगभग 65 वर्ष की उम्र में क़ज़ा-ए-इलाही से इंतिक़ाल हो गया।

इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन।

मरहूमा का मायका क़स्बा चरथावल, ज़िला मुज़फ्फरनगर में था। उन्होंने अपने पीछे दो बेटे, दो बेटियाँ, अहल-ओ-अयाल, रिश्तेदारों और अज़ीज़-ओ-अक़ारिब का भरा-पूरा ख़ानदान ग़मज़दा छोड़ दिया है। उनके इंतिक़ाल की ख़बर से पूरे परिवार और जानने वालों में गहरा रंज-ओ-मलाल पाया जा रहा है।

मरहूमा की नमाज़-ए-जनाज़ा आज बाद नमाज़-ए-जौहर, दोपहर 1:30 बजे अदा की जाएगी। इसके बाद मोहल्ला गुलशन नगर, टायर मार्किट स्थित क़ब्रिस्तान में उन्हें सुपुर्द-ए-ख़ाक किया जाएगा।

तमाम अहबाब, अज़ीज़-ओ-अक़ारिब और बिरादराना हज़रात से गुज़ारिश है कि जनाज़े में शरीक होकर मरहूमा के लिए दुआ-ए-मग़फ़िरत फ़रमाएँ और उनके लवाहिक़ीन के लिए सब्र-ए-जमील की दुआ करें।

दुआ

ऐ अल्लाह! मरहूमा रूकसाना बी की मग़फ़िरत फ़रमा, उनकी क़ब्र को जन्नत के बाग़ों में से एक बाग़ बना दे, क़ब्र की तमाम मंज़िलों को आसान फ़रमा, उन्हें जन्नतुल फ़िरदौस में आला मुक़ाम अता फ़रमा और तमाम लवाहिक़ीन को सब्र-ए-जमील अता फ़रमा। आमीन या रब्बुल आलमीन।

मज़ीद मालूमात के लिए:
मिस्त्री अख़्तर अली साहब
📞 9756274223


प्रेस लाइन

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हज की सआदत से वापसी पर जनाब हाजी इक़बाल साहब का इस्तक़बाल, छह बच्चों व पोता-पोती के अकीके की दावत में बिरादरी ने दी मुबारकबाद

अलीगढ़, संवाददाता (मुल्तानी समाज):
हज-ए-बैतुल्लाह की मुक़द्दस सआदत हासिल कर 13 जून को हरमैन शरीफ़ैन से वतन वापस लौटने वाले जनाब हाजी इक़बाल साहब एवं उनकी अहलिया के इस्तक़बाल और हज की ख़ुशी के मौके पर अलीगढ़ में एक शानदार और पुरवक़ार तक़रीब का आयोजन किया गया। यह खुशनुमा कार्यक्रम धर्मपुर कोर्टयार्ड, मैरिस रोड, अलीगढ़ में बड़े ही अदब, एहतराम और पुरजोश माहौल में संपन्न हुआ।

इस मौके पर हाजी इक़बाल साहब ने अपनी हज की सआदत की ख़ुशी को अपने परिवार की खुशियों के साथ जोड़ते हुए अपने छह बच्चों तथा पोता-पोती के अकीके की दावत का भी स्पेशल प्रोग्राम रखा। प्रोग्राम में मुल्तानी बिरादरी के रसूखदार लोग, रिश्तेदार, अज़ीज़-ओ-अक़ारिब, समाजसेवी एवं अलग अलग क्षेत्रों की मशहूर हस्तियों ने बड़ी तादाद में शिरकत की।

महफ़िल का माहौल मोहब्बत, भाईचारे और मुसर्रत से सराबोर रहा। मेहमानों ने हाजी इक़बाल साहब और उनकी अहलिया को हज की मुकम्मल अदायगी पर दिली मुबारकबाद पेश की और उनकी इबादतों की क़ुबूलियत, सेहत, सलामती तथा पूरे ख़ानदान की खुशहाली के लिए दुआएँ कीं।

प्रोग्राम के दौरान मेहमानों की शानदार मेहमाननवाज़ी की गई और आपसी मेल-मिलाप तथा बिरादराना यकजहती का ख़ूबसूरत मंज़र देखने को मिला। प्रोग्राम में मौजूद लोगों ने इस आयोजन को सामाजिक एकता, पारिवारिक मोहब्बत और दीनी रिवायतों का बेहतरीन संगम बताते हुए मेज़बान परिवार की भरपूर सराहना की।

यह तक़रीब न सिर्फ़ हज की सआदत की ख़ुशी का इज़हार थी, बल्कि मुल्तानी बिरादरी के आपसी इत्तेहाद, मोहब्बत और भाईचारे की भी एक शानदार मिसाल बनकर सामने आई।

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✍️ ख़ास पेशकश | मुल्तानी समाज

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार से पंजीकृत, मुल्क की राजधानी नई दिल्ली से प्रसारित, पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार–बढ़ई बिरादरी की देश की इकलौती राष्ट्रीय समाचार पत्रिका, न्यूज़ पोर्टल एवं यूट्यूब चैनल "मुल्तानी समाज" के लिए उत्तर प्रदेश डेस्क से प्रधान संपादक ज़मीर आलम की यह ख़ास रिपोर्ट।

अगर आप भी अपनी बिरादरी से मुतअल्लिक़ किसी ख़ुशनुमा तक़रीब, दीनी, समाजी या तालीमी प्रोग्राम, ख़बर, मक़ाला (आर्टिकल), पैग़ाम, ताज़ियती इत्तिला, मुबारकबाद, किस्से, कहानियाँ या तिजारती इश्तिहार को मुल्क भर में प्रकाशित व प्रसारित कराना चाहते हैं, तो बेझिझक हमसे राब्ता फ़रमाएँ।

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जयपुर में अब्दुल समद साहब (नेता जी) का इंतेकाल, मुस्लिम मुल्तानी लोहार-बढ़ई बिरादरी में ग़म की लहर, इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन

जयपुर (राजस्थान)।

निहायत ही रंजो-ग़म के साथ यह इत्तेला दी जाती है कि आज दिन इतवार, 28 जून 2026 को बट्टा बस्ती, गुजराती पार्क, जयपुर (राजस्थान) के रहने वाले, मुस्लिम मुल्तानी लोहार-बढ़ई बिरादरी की एक सम्मानित शख्सियत जनाब अब्दुल समद साहब (नेता जी) का क़ज़ा-ए-इलाही से इंतेकाल हो गया।

"इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन"
(बेशक हम अल्लाह ही के हैं और उसी की तरफ़ लौटकर जाने वाले हैं।)

मरहूम के इंतेकाल की खबर मिलते ही परिवार, रिश्तेदारों, दोस्तों और बिरादरी के लोगों में गहरा दुख और अफ़सोस व्याप्त हो गया। हर शख्स अल्लाह तआला से उनकी मग़फिरत, बुलंदी-ए-दरजात और जन्नतुल फ़िरदौस में आला मुकाम की दुआ कर रहा है।

अल्लाह तआला मरहूम की तमाम ख़ताओं को माफ़ फरमाए, उनकी क़ब्र को जन्नत के बाग़ों में से एक बाग़ बनाए, मुनकर-नकीर के सवालात आसान फरमाए, क़ब्र की तमाम मंज़िलें आसान करे और उन्हें अपनी रहमत के साए में जगह अता फरमाए। आमीन।

साथ ही अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त मरहूम के तमाम अहलेख़ाना, रिश्तेदारों और चाहने वालों को इस सदमे को बर्दाश्त करने की तौफ़ीक़ दे तथा सब्र-ए-जमील अता फरमाए। आमीन।

प्राप्त जानकारी के अनुसार, मरहूम की नमाज़-ए-जनाज़ा एवं तदफ़ीन आज रात 10:00 बजे नारी का नाका कब्रिस्तान, जयपुर (राजस्थान) में अदा की जाएगी। तमाम अहबाब, अज़ीज़-ओ-अक़ारिब और बिरादराने इस्लाम से गुज़ारिश है कि जनाज़े में शरीक होकर मरहूम के लिए मग़फिरत की दुआ करें और इस दुख की घड़ी में परिवार का हौसला बढ़ाएँ।

मरहूम के संबंध में अधिक जानकारी के लिए निम्नलिखित नंबरों पर संपर्क किया जा सकता है—

अब्दुल सलाम: 9352667963
बिलाल अहमद: 9166339486
अब्दुल वहिद: 8005850484


राजस्थान डेस्क से विशेष रिपोर्ट

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा पंजीकृत तथा देश की राजधानी दिल्ली से प्रसारित, पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार-बढ़ई बिरादरी की राष्ट्रीय समाचार पत्रिका, न्यूज़ पोर्टल एवं यूट्यूब चैनल "मुल्तानी समाज" के लिए यह विशेष रिपोर्ट प्रधान संपादक ज़मीर आलम के निर्देशन में राजस्थान डेस्क से प्रस्तुत की गई है।

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9410652990
8010884848

दुआ:
ऐ अल्लाह! मरहूम जनाब अब्दुल समद साहब (नेता जी) की मग़फिरत फरमा, उन्हें जन्नतुल फ़िरदौस में आला मुकाम अता फरमा, उनकी क़ब्र को नूर से भर दे और उनके तमाम अहलेख़ाना को सब्र-ए-जमील अता फरमा। आमीन या रब्बुल आलमीन।