इस्लाम हमें यह तालीम देता है कि
“जिसने अपने अस्ल को पहचाना, उसने अपने रब को पहचाना।”
आज अफ़सोस के साथ कहना पड़ता है कि हम रोज़ आगे तो बढ़ रहे हैं,
मगर अपने पीछे छूटे बुज़ुर्गों को भूलते जा रहे हैं।
वो दादा, दादी, नाना, नानी…
जिनकी दुआओं से हमारी ज़िंदगियाँ आबाद हैं,
जिनकी मेहनत और कुर्बानियों से हमारी पहचान बाक़ी है।
इस्लाम सिर्फ़ नमाज़, रोज़ा और इबादत का नाम नहीं —
इस्लाम नसब की हिफ़ाज़त, रिश्तों को ज़िंदा रखने
और अपनी नस्लों को पहचान देने का नाम भी है।
इसी दीन की रौशनी में, इसी एहसास के साथ
पैदाइशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार–बढ़ई बिरादरी की
देश की सबसे बड़ी और ख़िदमतगुज़ार तंजीम
“मुल्तानी समाज चैरिटेबल ट्रस्ट” (रजिस्टर्ड ऑल इंडिया)
एक ऐसा काम शुरू करने जा रही है
जो न सिर्फ़ क़ाबिले-फ़ख़्र है
बल्कि क़ाबिले-सवाब भी है।
SIR (Social Information Register) — “मुल्तानी घराना”
यह सिर्फ़ एक रिकॉर्ड नहीं,
यह हमारी नस्लों की अमानत है।
“मुल्तानी घराना” दरअसल हमारी बिरादरी का
मुकम्मल शिजरा-ए-नसब (Family Tree) है —
जिसके ज़रिए हम अपने पर-परदादा, पर-परदादी, परदादा, परदादी,
परनाना, परनानी और तमाम बुज़ुर्गों को
फिर से ज़िंदा कर रहे हैं —
कम से कम यादों में, दुआओं में और इतिहास में।
इस्लाम क्या चाहता है हमसे ?
इस्लाम चाहता है कि:
- हम अपने बुज़ुर्गों को भूलें नहीं
- उनकी पहचान मिटने न दें
- और आने वाली नस्लों को यह बता सकें
कि तुम किस खानदान से हो, तुम्हारा अस्ल क्या है
आज अगर हमने अपने बुज़ुर्गों के फ़ोटो, नाम और रिश्ते
महफूज़ नहीं किए,
तो कल हमारी आने वाली नस्लें
सिर्फ़ नाम की मुसलमान होंगी —
नसब की पहचान से महरूम।
आपकी ज़िम्मेदारी — एक दीनि अमानत
आज आपसे गुज़ारिश है,बल्कि दीन के वास्ते अपील है कि:
- अपने तमाम बुज़ुर्गों के फ़ोटो
- चाहे वे इस दुनिया में हों या अल्लाह को प्यारे हो चुके हों
- अपनी पूरी फैमिली, कुनबा, खानदान और रिश्तेदारों
के नाम और रिश्तों की मुकम्मल लिस्ट
आज ही तैयार कर लें।
क्योंकि बहुत जल्द
“मुल्तानी घराना” की टीम
आपके दरवाज़े पर दस्तक देने वाली है।
उस वक़्त अगर आपने तैयारी कर रखी होगी,
तो समझिए आपने:
- अपने बुज़ुर्गों का हक़ अदा किया
- अपनी नस्लों को पहचान दी
- और एक नेक काम में शरीक होकर
सवाब का ज़खीरा जमा किया।
यह काम एक इंसान का नहीं — पूरी उम्मत का है
यह सिर्फ़ ट्रस्ट का मिशन नहीं,
यह पूरी मुल्तानी बिरादरी की
दीनि और अख़लाक़ी ज़िम्मेदारी है।
और यक़ीन जानिए —
अल्लाह उस कौम को कभी ज़वाल नहीं देता
जो अपनी जड़ों से जुड़ी रहती है।
तो आइए,
दीन के नाम पर,
इस्लाम की तालीम के नाम पर,
अपने बुज़ुर्गों की याद और पहचान को
हमेशा के लिए महफूज़ कर लें।
“मुल्तानी घराना” — नस्लों की पहचान, दुआओं की अमानत
सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा पंजीकृत
देश की राजधानी दिल्ली से प्रकाशित
पैदाइशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार–बढ़ई बिरादरी को समर्पित
देश की एकमात्र पत्रिका “मुल्तानी समाज” के लिए
ज़मीर आलम की ख़ास रिपोर्ट
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