यह न्यूज़ चैनल समर्पित है पैदाइशी इंजीनियर लोहार बढ़ई ( मुल्तानी समाज) को , इस बिरादरी ने राजा महाराजाओं को युद्ध में लड़ने के लिए अस्त्र शस्त्र से लेकर देश के किसानों को खेती करने के लिए आधुनिक यंत्र बनाकर इस देश को सोने की चिड़िया बनाने में मुल्तानी समाज की अहम भूमिका रही है लेकिन मुल्तानी समाज की हर सरकार ने अनदेखी ही की है सरकारों को मुल्तानी समाज का देशभक्त चेहरा दिखा कर इस चैनल के माध्यम से समाज की मुख्यधारा में शामिल कराना ही हमारा अहम मकसद है।
Friday, June 12, 2026
शंकरपुर, देहरादून के जनाब मुहम्मद मूसा साहब का इंतिक़ाल, आज बाद नमाज़-ए-ईशा अदा की जाएगी नमाज़-ए-जनाज़ा
Thursday, June 11, 2026
मुल्तानी लोहार बिरादरी के बुज़ुर्ग हाजी मुहम्मद चमन साहब का इंतिकाल, पूरे क्षेत्र में शोक की लहर
मरहूम मूल रूप से खेड़ा हटाने वाले परिवार से संबंध रखते थे तथा वर्तमान में गौरीपुर, जनपद बागपत , उत्तर प्रदेश में निवास कर रहे थे। अपने लंबे जीवनकाल में उन्होंने समाज और परिवार के बीच सम्मान, मोहब्बत और भाईचारे की मिसाल कायम की। उनके इंतिकाल की खबर सुनते ही रिश्तेदारों, मित्रों और बिरादरी के लोगों में गहरा दुख व्याप्त हो गया।
हाजी मुहम्मद चमन साहब अपने पीछे अज़ीज़ो-अक़ारिब, चाहने वालों और एक बड़ा परिवार छोड़ गए हैं, जो उनकी कमी को हमेशा महसूस करेगा। उनकी सादगी, नेकनीयती और मिलनसार स्वभाव की यादें हमेशा लोगों के दिलों में ज़िंदा रहेंगी।
ख़बर लिखे जाने तक मरहूम की मय्यत के दफ़नाने का समय तय नहीं हो पाया था। जैसे ही दफ़न से संबंधित जानकारी हासिल होगी, उसे बिरादरी और आम लोगों तक पहुंचाया जाएगा।
मुस्लिम मुल्तानी लोहार बिरादरी तथा समस्त अहले-ईमान से गुज़ारिश है कि मरहूम के लिए दुआ-ए-मग़फिरत करें और अल्लाह तआला से उनकी बख्शिश की दुआ मांगें।
दुआ:
"ऐ अल्लाह! मरहूम हाजी मुहम्मद चमन साहब की मग़फिरत फरमा, उनकी कब्र को जन्नत के बाग़ों में से एक बाग़ बना दे, उनकी तमाम खताओं को माफ़ फरमा और उन्हें जन्नतुल फिरदौस में आला मकाम अता फरमा। उनके अहले-ख़ाना, रिश्तेदारों और तमाम चाहने वालों को सब्र-ए-जमील अता फरमा। आमीन सुम्मा आमीन। मैय्यत को बाद नमाज़ असर की नमाज़ 5:30 बजे गौरीपुर में ही गौरीपुर के कब्रस्तान में किए जाएगा सपुर्द - ए - ख़ाक, लिहाजा आप हजरात भी जनाजे में शरीक हॉकर सवाबे दारेन हासिल करें।
मरहूम के बारे में संबंधित जानकारी के लिए संपर्क करें:
📞 8630433158
📞 9457567860 (मुहम्मद रिज़वान, सुभान मेडिकल स्टोर)
— ज़मीर आलम
प्रधान संपादक, मुल्तानी समाज
बागपत, उत्तर प्रदेश
Wednesday, June 10, 2026
इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन: मोहल्ला नौ-कुआँ शामली में शोक की लहर, जनाब मोहम्मद इस्लाम साहब का इंतकाल
इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन, शामली के मोहल्ला नौ-कुआँ में शोक की लहर, जनाब मोहम्मद इस्लाम साहब अपने रब से जा मिले
शामली, उत्तर प्रदेश। मौत एक ऐसी हकीकत है जिससे कोई इंकार नहीं कर सकता। हर जान को एक न एक दिन अपने पैदा करने वाले रब की बारगाह में हाजिर होना है। इसी हकीकत के साथ आज शामली जनपद से एक बेहद गमगीन खबर सामने आई है, जिसने परिवार, रिश्तेदारों, बिरादरी और जानने वालों की आंखों को नम कर दिया।
मिली जानकारी के अनुसार गांव हाथी करौदा, जिला शामली के मूल निवासी तथा वर्तमान में मोहल्ला नौ-कुआँ, शामली में रह रहे जनाब मोहम्मद इस्लाम साहब पुत्र जनाब मोहम्मद मजीद साहब का बुधवार, 10 जून 2026 को लगभग दोपहर 2 बजे क़ज़ा-ए-इलाही से इंतकाल हो गया। मरहूम की उम्र लगभग 75 वर्ष बताई गई है।
जनाब मोहम्मद इस्लाम साहब अपने पीछे एक भरा-पूरा परिवार छोड़ गए हैं। उनके परिवार में दो बेटे जनाब मोहम्मद इकराम एवं जनाब मोहम्मद इरफान सहित बेटियां और अन्य परिजन शामिल हैं। इसके अलावा पौते-पोतियां, नाती-नातिन तथा अज़ीज़-ओ-अकारिब की बड़ी तादाद है, जो आज इस दुखद पलों में गहरे सदमे और गम में डूबी हुई है।
मरहूम के इंतकाल की खबर फैलते ही मोहल्ले और आसपास के क्षेत्र में शोक की लहर दौड़ गई। ताज़ियत पेश करने वालों का सिलसिला लगातार जारी है। हर जुबान पर मरहूम के लिए दुआ और हर आंख में उनके बिछड़ने का गम दिखाई दे रहा है।
परिवार और परिचितों के अनुसार जनाब मोहम्मद इस्लाम साहब एक नेक, शरीफ, मिलनसार और खुशमिजाज इंसान थे। उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी रिश्तों को निभाने, लोगों की इज्जत करने और परिवार को जोड़कर रखने में गुजारी। यही वजह है कि उनके इंतकाल की खबर ने अनेक लोगों को भावुक कर दिया।
मिली जानकारी के अनुसार मरहूम की नमाज़-ए-जनाज़ा आज बाद नमाज़ ईशा अदा की जाएगी। इसके बाद मोहल्ला गुलशन नगर, शामली स्थित कब्रिस्तान में उन्हें सुपुर्द-ए-ख़ाक किया जाएगा। परिवार की ओर से तमाम बिरादरान, दोस्तों और अज़ीज़-ओ-अकारिब से जनाज़े में शिरकत कर मरहूम के लिए दुआ-ए-मग़फिरत करने की गुजारिश की गई है।
इस दुखद मौके पर "मुल्तानी समाज" परिवार मरहूम के परिजनों के साथ अपनी गहरी हमदर्दी रखता है और अल्लाह तआला से दुआ करता है कि वह मरहूम की तमाम खताओं को माफ फरमाए, उनकी क़ब्र को नूर से भर दे, उन्हें जन्नतुल फिरदौस में आला मुकाम अता फरमाए तथा उनके पीछे रह जाने वाले परिवार को सब्र-ए-जमील अता फरमाए।
दुआ-ए-मग़फिरत
"ऐ अल्लाह! मरहूम मोहम्मद इस्लाम साहब की मग़फिरत फरमा, उनकी क़ब्र को जन्नत के बागों में से एक बाग बना, उनके दर्जात बुलंद फरमा, उन्हें हिसाब-किताब में आसानी अता फरमा और जन्नतुल फिरदौस में आला से आला मुकाम नसीब फरमा। आमीन।"
दुआ-ए-दफ़्न
"ऐ अल्लाह! मरहूम की मंज़िल आसान फरमा, क़ब्र की तन्हाई को रहमत से भर दे, उसे नूर का घर बना दे और हश्र के दिन उन्हें अपने नेक बंदों के साथ उठाना। आमीन।"
इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन।
— ज़मीर आलम
प्रधान संपादक
"मुल्तानी समाज" राष्ट्रीय समाचार पत्रिका / न्यूज़ पोर्टल / यूट्यूब चैनल
मौत बरहक है: जनाब खलील अहमद साहब के इंतकाल पर बिरादरी में गम का माहौल
इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन, खतौली के जनाब खलील अहमद साहब का इंतकाल, इलाके में गम की लहर
खतौली/मुजफ्फरनगर। जिंदगी और मौत का मालिक केवल अल्लाह तआला है। जब उसका हुक्म आता है तो हर जान को अपने रब की तरफ लौटना होता है। इसी हकीकत के साथ आज क्षेत्र के लोगों को एक दुखद समाचार प्राप्त हुआ, जिसने परिवार, रिश्तेदारों और जानने वालों को गमगीन कर दिया।
प्राप्त जानकारी के अनुसार गांव कल्याणपुर वाले, हाल निवासी आलू मिल के पास, बुढ़ाना रोड, क़स्बा खतौली निवासी जनाब खलील अहमद साहब का बुधवार 10 जून 2026 को सुबह लगभग 10 से 11 बजे के बीच इंतकाल हो गया। उनकी उम्र लगभग 65 वर्ष बताई गई है।
मरहूम के इंतकाल की खबर मिलते ही परिवार, रिश्तेदारों, मित्रों और बिरादरी के लोगों में शोक की लहर दौड़ गई। घर पर ताजियत पेश करने वालों का सिलसिला जारी है। हर आंख नम है और हर जुबान पर उनके लिए दुआएं हैं।
जनाब खलील अहमद साहब अपने सरल स्वभाव, मिलनसार व्यक्तित्व और सामाजिक व्यवहार के लिए जाने जाते थे। उनके इंतकाल से परिवार ही नहीं बल्कि उन्हें जानने वाले अनेक लोग भी गहरे सदमे में हैं।
परिजनों के अनुसार मरहूम की नमाज़-ए-जनाज़ा आज बाद नमाज़ असर अदा की जाएगी, जिसके बाद क़स्बा खतौली, जिला मुजफ्फरनगर, उत्तर प्रदेश में उन्हें सुपुर्द-ए-ख़ाक किया जाएगा। बिरादरी और क्षेत्र के लोगों से अपील की गई है कि जनाज़े में शिरकत कर मरहूम के लिए दुआ-ए-मग़फिरत करें और उनके परिजनों को सब्र दिलाने की दुआ करें।
इस मौके पर हम सभी पाठकों से भी गुजारिश करते हैं कि मरहूम जनाब खलील अहमद साहब के लिए दुआ करें कि अल्लाह तआला उनकी तमाम खताओं को माफ फरमाए, उनकी मग़फिरत फरमाए, उनकी क़ब्र को जन्नत के बागों में से एक बाग बनाए और उन्हें जन्नतुल फिरदौस में आला मकाम अता फरमाए।
अल्लाह तआला मरहूम के तमाम अहल-ए-खाना, अज़ीज़-ओ-अकारिब और चाहने वालों को सब्र-ए-जमील अता फरमाए और इस सदमे को बर्दाश्त करने की तौफीक प्रदान करे।
दुआ:
"ऐ अल्लाह! मरहूम की मग़फिरत फरमा, उनकी क़ब्र को रौशन फरमा, उनके दर्जात बुलंद फरमा, उनकी तमाम खताओं को माफ फरमा और उन्हें जन्नतुल फिरदौस में जगह अता फरमा। आमीन।"
इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन।
— ज़मीर आलम
प्रधान संपादक
मुल्तानी समाज राष्ट्रीय समाचार पत्रिका/न्यूज़ पोर्टल
Saturday, June 6, 2026
हर नेक सलाह का अंजाम नेक नहीं होता: एक बकरे, घोड़े और इंसानी फितरत की दिलचस्प दास्तान
बिना मांगे सलाह देने से पहले एक बार जरूर सोचें
ज़िंदगी में अक्सर हम दूसरों की परेशानियों को देखकर उनकी मदद करने के लिए आगे बढ़ जाते हैं। कई बार हमारी नीयत बिल्कुल साफ होती है, हम किसी का भला चाहते हैं, लेकिन हर अच्छे इरादे का नतीजा अच्छा ही निकले, यह जरूरी नहीं होता। यही हकीकत एक दिलचस्प कहानी के जरिए समझी जा सकती है।
एक व्यक्ति के पास एक घोड़ा और एक बकरा था। दोनों जानवर उसके लिए बेहद अज़ीज़ थे। वह उनकी खूब देखभाल करता था और उन्हें अपने परिवार का हिस्सा मानता था।
एक दिन अचानक घोड़ा गंभीर रूप से बीमार पड़ गया। हालत इतनी खराब हो गई कि वह खड़ा तक नहीं हो पा रहा था। मालिक बहुत परेशान हुआ और उसने तुरंत एक डॉक्टर को बुलाया।
डॉक्टर ने घोड़े का अच्छी तरह मुआयना किया और फिर गंभीर लहजे में कहा,
"घोड़े को खतरनाक बीमारी है। मैं लगातार चार दिन तक इसका इलाज करूंगा। अगर चौथे दिन तक यह अपने पैरों पर खड़ा हो गया तो इसकी जान बच सकती है। लेकिन अगर यह खड़ा नहीं हुआ, तो मजबूरन इसे मारना पड़ेगा।"
यह सुनकर मालिक का दिल बैठ गया। वह अपने प्यारे घोड़े को खोना नहीं चाहता था, लेकिन हालात उसके हाथ में नहीं थे।
डॉक्टर के जाने के बाद पास खड़ा बकरा सारी बातें सुन चुका था। उसने सोचा कि अगर घोड़ा हिम्मत कर ले तो उसकी जान बच सकती है।
अगले दिन जब डॉक्टर आया तो घोड़ा वैसे ही पड़ा रहा। डॉक्टर दवा देकर चला गया। बकरे ने घोड़े को समझाया,
"दोस्त, थोड़ी हिम्मत करो। कोशिश करो खड़े होने की। तुम्हारी जान बच सकती है।"
लेकिन घोड़े ने उसकी बात पर ध्यान नहीं दिया।
दूसरे दिन भी यही हुआ। बकरे ने फिर समझाया, मगर कोई असर नहीं पड़ा।
तीसरे दिन डॉक्टर ने चेतावनी देते हुए कहा,
"अगर कल तक यह नहीं उठा तो फिर इसे बचाना मुश्किल होगा।"
डॉक्टर के जाने के बाद बकरे ने आखिरी बार घोड़े को समझाया,
"जिंदगी अल्लाह की बहुत बड़ी नेमत है। एक बार पूरी ताकत लगाकर कोशिश तो करो। शायद तुम्हारी मेहनत रंग ले आए।"
इस बार घोड़े ने बकरे की बात पर गौर किया। उसने सोचा कि कोशिश करने में क्या नुकसान है।
अगले दिन जैसे ही डॉक्टर घोड़े के पास पहुंचा, घोड़ा अचानक उठ खड़ा हुआ और धीरे-धीरे दौड़ने लगा।
डॉक्टर बेहद खुश हुआ और मालिक से बोला,
"मुबारक हो! आपका घोड़ा अब खतरे से बाहर है।"
मालिक की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। उसने उत्साह में कहा,
"आज तो बहुत बड़ी खुशखबरी मिली है। इस खुशी में आज दावत होगी!"
और फिर उसने बकरे की ओर इशारा करते हुए कहा,
"आज बकरा कटेगा!"
यह सुनकर बकरा अवाक रह गया। जिस घोड़े की जान बचाने के लिए उसने इतनी मेहनत की थी, उसी खुशी का सबसे बड़ा नुकसान उसे खुद उठाना पड़ा।
कहानी का सबक
यह कहानी हमें सिखाती है कि दुनिया में हर काम सोच-समझकर करना चाहिए। दूसरों की मदद करना नेक काम है, लेकिन हर परिस्थिति को समझे बिना बीच में पड़ना कभी-कभी हमारे लिए मुश्किलें भी पैदा कर सकता है।
इस्लाम भी हमें हिकमत (बुद्धिमानी) के साथ काम करने की तालीम देता है। नेक नीयत के साथ-साथ सही समझ और दूरअंदेशी भी जरूरी है। हर सलाह सही समय, सही जगह और सही तरीके से दी जाए, तभी उसका वास्तविक फायदा होता है।
निष्कर्ष
दूसरों की मदद जरूर करें, लेकिन हालात को समझकर। नेक इरादे के साथ हिकमत भी जरूरी है। कई बार जो इंसान दूसरों की भलाई के लिए सबसे ज्यादा कोशिश करता है, वही अनजाने में खुद मुश्किल में पड़ जाता है।
इसलिए जिंदगी का एक अहम उसूल याद रखिए—
"नेकी कीजिए, लेकिन समझदारी और दूरदर्शिता के साथ।"
सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा पंजीकृत, देश की राजधानी नई दिल्ली से प्रसारित, पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार-बढ़ई बिरादरी की देश की इकलौती राष्ट्रीय समाचार पत्रिका/न्यूज पोर्टल/यूट्यूब चैनल "मुल्तानी समाज" के लिए नई दिल्ली से प्रधान संपादक ज़मीर आलम की विशेष प्रस्तुति।
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Friday, June 5, 2026
हाजी शौकत साहब का इंतिकाल | अग्रवाल मंडी टटीरी बागपत में शोक की लहर
इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन: मुस्लिम मुल्तानी लोहार बढ़ई बिरादरी के बुजुर्ग हाजी शौकत साहब का इंतिकाल
बागपत (उत्तर प्रदेश)। मुस्लिम मुल्तानी लोहार बढ़ई बिरादरी के लिए बेहद दुखद ख़बर सामने आयी है। अग्रवाल मंडी टटीरी, जिला बागपत निवासी बिरादरी के सम्मानित बुजुर्ग हाजी शौकत साहब वल्द मरहूम हाजी सद्दीक साहब (बढ़ई) का आज दिन शनिचर, 6 जून 2026 को लंबी बीमारी के बाद कजा- ए - ईलाही से इंतिकाल हो गया। उनकी उम्र लगभग 76 वर्ष बताई गई है।
मरहूम के इंतिकाल की खबर से परिवार, रिश्तेदारों, दोस्तों और बिरादरी में गहरा शोक व्याप्त है। हाजी शौकत साहब अपने नेक अख़लाक, सादगी और सामाजिक व्यवहार के लिए जाने जाते थे। उनके अचानक हुए इन्तेकाल से इलाके में शोक की लहर दौड़ गई है।
परिजनों से प्राप्त जानकारी के अनुसार, मरहूम को शनिवार, 6 जून 2026 को अग्रवाल मंडी टटीरी स्थित बागपत रोड कब्रिस्तान में सुपुर्द-ए-खाक किया गया। जनाजे में इलाके के सैकड़ों लोगों द्वारा शिरकत कर मरहूम को नम आंखों से अंतिम विदाई देंगे।
हाजी शौकत साहब अपने पीछे तीन पुत्र—मोहम्मद इरशाद, मोहम्मद इरफान और मोहम्मद इमरान सहित भरा-पूरा परिवार छोड़ गए हैं। परिवार और करीबी रिश्तेदारों के लिए यह नुकसान बहुत ही पीड़ादायक है।
इस अवसर पर बिरादरी और क्षेत्र के लोगों ने मरहूम के लिए दुआ-ए-मगफिरत की और अल्लाह तआला से उनकी बख्शिश की दुआओं की दरखास्त की है।
दुआ-ए-मगफिरत
अल्लाह तआला मरहूम हाजी शौकत साहब की मगफिरत फरमाए, उनकी तमाम खताओं को माफ फरमाए, उनकी क़ब्र को जन्नत की क्यारीयों में से एक क्यारी बनाए, जन्नतुल फिरदौस में आला मकाम अता फरमाए और तमाम अहलेखाना को सब्र-ए-जमील नसीब फरमाए।
आमीन सुम्मा आमीन।
इस मौके पर सामाजिक और धार्मिक जिम्मेदारियों को निभाते हुए लोगों से अपील की गई कि गमगीन परिवार के साथ संवेदनशील व्यवहार करें, उन्हें सांत्वना दें और मरहूम के लिए दुआ करते रहें।
दुनिया एक फानी सराय है और हर इंसान को एक दिन अपने रब की बारगाह में हाज़िर होना है। मरहूम हाजी शौकत साहब का इंतिकाल भी हमें यही याद दिलाता है कि नेक अमल, इंसानियत और अच्छे व्यवहार ही वह पूंजी हैं जो इंसान अपने पीछे छोड़कर जाता है।
इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन।
— ज़मीर आलम, प्रधान संपादक
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17 जून: मुल्तानी समाज स्थापना दिवस — एकता, सेवा और पर्यावरण संरक्षण का अनूठा संदेश
17 जून: मुल्तानी समाज स्थापना दिवस — एकता, सेवा और पर्यावरण संरक्षण का अनूठा संदेश
भारत की विविध सांस्कृतिक और सामाजिक विरासत में अनेक ऐसे समाज और बिरादरियां हैं, जिन्होंने अपनी मेहनत, हुनर और सामाजिक सेवाओं के माध्यम से देश की तरक्की में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। पैदायशी इंजीनियर कहे जाने वाले मुस्लिम मुल्तानी लोहार एवं बढ़ई समाज की पहचान भी इसी मेहनतकश परंपरा, कौशल और सामाजिक जिम्मेदारी से जुड़ी हुई है।
देश की सबसे बड़ी और क्रांतिकारी सामाजिक संस्था "मुल्तानी समाज चैरिटेबल ट्रस्ट (रजि.)" का स्थापना दिवस प्रत्येक वर्ष 17 जून को पूरे देश में बड़े उत्साह और सम्मान के साथ मनाया जाता है। यह दिन केवल एक संगठन की स्थापना का प्रतीक नहीं है, बल्कि समाज की एकता, जागरूकता, सामाजिक सरोकार और पर्यावरण संरक्षण के संकल्प का भी प्रतीक बन चुका है।वृक्षारोपण के माध्यम से समाज सेवा का संदेश
मुल्तानी समाज चैरिटेबल ट्रस्ट के संस्थापक जनाब ज़मीर आलम द्वारा वर्ष 2011 में शुरू की गई एक अनूठी पहल ने आज राष्ट्रीय स्तर पर एक जनआंदोलन का रूप ले लिया है। हर वर्ष 17 जून को "मुल्तानी समाज स्थापना दिवस" के अवसर पर देशभर में फैले मुस्लिम मुल्तानी लोहार एवं बढ़ई बिरादरी के लोग अपने-अपने क्षेत्रों में छायादार और पर्यावरण के लिए उपयोगी वृक्ष लगाकर प्रकृति संरक्षण में अपना योगदान देते हैं। इस मुहिम की सबसे विशेष बात यह है कि समाज के लोग वृक्षारोपण के बाद अपनी तस्वीरें और गतिविधियों को सोशल मीडिया एवं अन्य जनसंचार माध्यमों के जरिए साझा करते हैं, जिससे पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता का संदेश दूर-दूर तक पहुंचता है। बीते वर्षों में यह अभियान राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा, महाराष्ट्र सहित देश के अनेक राज्यों में सफलतापूर्वक संचालित हुआ है।जिम्मेदारियों का वितरण और तैयारियां शुरू
इस वर्ष भी स्थापना दिवस को यादगार बनाने के लिए संगठन के वरिष्ठ पदाधिकारियों को विभिन्न क्षेत्रों की जिम्मेदारियां सौंपी गई हैं। संस्था के पूर्व राष्ट्रीय चेयरमैन जनाब मोहम्मद आलम, वरिष्ठ राष्ट्रीय उपाध्यक्ष जनाब हाजी मोहम्मद इक़बाल काजी (भीलवाड़ा, राजस्थान), अब्दुल सत्तार साहब (सत्तार बॉस, इंदौर) तथा उज्जैन से जनाब फारूख साहब , महबूब खान करनाल, हरियाणा से और मोहम्मद इरफ़ान चमोली, उत्तराखंड से और फारूख साहब बागपत, उत्तर प्रदेश को हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी कार्यक्रम के सफल संचालन की जिम्मेदारी दी गई है। समाज के जिम्मेदारों का मानना है कि वृक्षारोपण केवल पौधे लगाने तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि उनकी देखभाल और संरक्षण की जिम्मेदारी भी समाज के प्रत्येक सदस्य को निभानी चाहिए, ताकि आने वाली पीढ़ियों को स्वच्छ और सुरक्षित पर्यावरण मिल सके।एकता और पहचान का प्रतीक बन चुका है स्थापना दिवस
आज 17 जून का दिन केवल एक समारोह नहीं बल्कि मुल्तानी समाज की पहचान, एकता और सामाजिक चेतना का प्रतीक बन चुका है। देश के विभिन्न हिस्सों में रहने वाले समाज के लोग इस दिन को आपसी भाईचारे, सामाजिक सहयोग और पर्यावरण संरक्षण के संकल्प के साथ मनाते हैं। समाज के बुजुर्गों और युवाओं का मानना है कि जिस प्रकार उनके पूर्वजों ने अपने हुनर और मेहनत से समाज में सम्मान अर्जित किया, उसी प्रकार वर्तमान पीढ़ी को भी सामाजिक जिम्मेदारियों का निर्वहन करते हुए सकारात्मक बदलाव की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए।
निष्कर्ष
मुल्तानी समाज चैरिटेबल ट्रस्ट द्वारा शुरू किया गया वृक्षारोपण अभियान इस बात का प्रमाण है कि यदि किसी समाज की सोच सकारात्मक हो तो वह केवल अपने समुदाय तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरे देश और मानवता के लिए प्रेरणा का स्रोत बन जाता है। 17 जून का स्थापना दिवस इसी प्रेरणा, सेवा भावना और पर्यावरण संरक्षण के संकल्प का जीवंत उदाहरण है।आइए, इस स्थापना दिवस पर हम सभी एक पौधा लगाकर और उसकी देखभाल का संकल्प लेकर प्रकृति को सुरक्षित रखने में अपना योगदान दें।
विशेष संवाददाता: अज़हर मुल्तानी, नई दिल्ली
प्रकाशन: मुल्तानी समाज (राष्ट्रीय समाचार पत्रिका / न्यूज पोर्टल / यूट्यूब चैनल)
संपर्क: 📞 9410652990 📞 8010884848
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