खतौली की पंजीकृत सोसाइटी के कार्यक्षेत्र, राष्ट्रीय ओहदों की तक़सीम और चुनावी रकम पर उठे संगीन सवाल! आखिर कब मिलेगा बिरादरी को अपने सवालों का जवाब?
ख़ास तहक़ीक़ाती रिपोर्ट | उत्तर प्रदेश डेस्क | अज़हर ख़ान
मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी की एक तंजीम, जिसका रजिस्टर्ड दफ़्तर उत्तर प्रदेश के ज़िला मुज़फ्फरनगर के क़स्बा खतौली में बताया जाता है और जिसका पंजीकरण सहारनपुर मंडल से हुआ है, आजकल अपनी संगठनात्मक हैसियत, राष्ट्रीय दायरे, ओहदों की तक़सीम और चुनावी अमल को लेकर बिरादरी के दरमियान कई सवालों के घेरे में है।
यह वही बिरादरी है जिसके बुजुर्गों ने अपनी मेहनत, हुनर, ईमानदारी और खुद्दारी से मुल्क के मुख्तलिफ सूबों में अपनी पहचान बनाई। दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, उत्तराखंड और दीगर रियासतों में रहने वाले हमारे बिरादरी भाई हमेशा से अपने हक़, अपनी इज़्ज़त और अपने सामाजिक वक़ार को लेकर संजीदा रहे हैं।
मगर अफसोस! आज इसी बिरादरी के कुछ लोग एक ऐसी संगठनात्मक सूरतेहाल को लेकर परेशान और हैरान नज़र आ रहे हैं, जिसके बारे में उनका कहना है कि उन्हें तंजीम की असल कानूनी हैसियत और उसके पंजीकृत दायरे की मुकम्मल जानकारी पहले नहीं दी गई।
आखिर ऐसा क्या हुआ कि जिन लोगों ने एक राष्ट्रीय तंजीम समझकर अपना वक़्त, पैसा और एतमाद लगाया, आज वही लोग अपने फैसले पर दोबारा गौर करने को मजबूर हैं?
इंजीनियर साहब का रौब या दस्तावेज़ों की असल हैसियत?
बिरादरी में अपने नाम के आगे 'इंजीनियर' लिखकर अपना तआरुफ कराने वाले तंजीम के सदर साहब की शख्सियत से शायद ही कोई अनजान हो। बिरादरी के कुछ तालीमयाफ्ता और सरकारी मुलाज़िमों का उनके साथ खड़ा होना भी किसी सामाजिक संगठन के लिए हौसला-अफ़ज़ाई की बात हो सकती है।
लेकिन यहां एक बुनियादी सवाल पैदा होता है।
क्या किसी शख्स की तालीमी पहचान, उसका ओहदा, उसका असर-ओ-रसूख या कुछ सरकारी मुलाज़िमों की हिमायत किसी तंजीम के पंजीकृत दस्तावेज़ों से बढ़कर हो सकती है?
बिरादरी के कुछ लोगों का कहना है कि सदर साहब को कुछ असरदार और तालीमयाफ्ता लोगों की हिमायत हासिल रही, जिसके चलते संगठन के कामकाज पर उठने वाले सवालों को उतनी अहमियत नहीं मिल सकी, जितनी मिलनी चाहिए थी।
हमारा मानना है कि किसी भी तंजीम में शख्सियत से ज्यादा अहमियत उसके दस्तूर, क़वायद और कानूनी हैसियत की होती है। ओहदा चाहे कितना ही बड़ा क्यों न हो, जवाबदेही से कोई भी ऊपर नहीं हो सकता।
उत्तर प्रदेश की सोसाइटी और मुल्कभर में राष्ट्रीय ओहदे! यह कैसा निज़ाम?
इस पूरे मामले की सबसे अहम कड़ी सोसाइटी के पंजीकृत कार्यक्षेत्र से जुड़ी है।
बिरादरी में उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, संबंधित सोसाइटी का पंजीकृत कार्यक्षेत्र उत्तर प्रदेश तक महदूद बताया जा रहा है। यदि पंजीकृत उपविधियों में वास्तव में यही सीमा निर्धारित है, तो फिर यह सवाल अपनी जगह बेहद अहम है कि दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, उत्तराखंड और मुल्क की दूसरी रियासतों में रहने वाले बिरादरी भाइयों को राष्ट्रीय अध्यक्ष, प्रदेश अध्यक्ष, ज़िला अध्यक्ष और दीगर राष्ट्रीय ओहदों पर किस कानूनी बुनियाद पर नियुक्त किया गया?
क्या सोसाइटी के दस्तूर में राष्ट्रीय स्तर पर काम करने की गुंजाइश मौजूद थी?
क्या इसके लिए रजिस्ट्रार के यहां कोई संशोधन दर्ज कराया गया?
क्या सोसाइटी की जनरल बॉडी ने इस सिलसिले में कोई बाकायदा प्रस्ताव पास किया?
अगर तमाम कानूनी और दस्तावेज़ी कार्रवाई मुकम्मल है तो उसे बिरादरी के सामने लाने में क्या परेशानी है?
और अगर ऐसा कोई दस्तावेज़ मौजूद नहीं है, तो फिर इतने बड़े पैमाने पर राष्ट्रीय ओहदों की तक़सीम का आधार क्या था?
यह सवाल किसी की तौहीन के लिए नहीं, बल्कि बिरादरी के उन लोगों के हक़ के लिए हैं जिन्होंने राष्ट्रीय संगठन के नाम पर अपनी वाबस्तगी कायम की।
बिरादरी के अधिवक्ताओं को भी ओहदे दिए गए, मगर असल हक़ीक़त कब सामने आई?
इस मामले में एक और पहलू बेहद गौरतलब है।
बिरादरी के कई अधिवक्ता भी इस तंजीम से जुड़े और उन्हें मुख्तलिफ ओहदों से नवाज़े जाने की जानकारी सामने आई है।
किसी भी बिरादरी के लिए यह फख्र की बात है कि उसके नौजवान कानून की तालीम हासिल करके वकालत जैसे जिम्मेदार पेशे से जुड़े हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या उन्हें तंजीम की मुकम्मल कानूनी हैसियत और पंजीकृत कार्यक्षेत्र से आगाह कराया गया था?
कुछ लोगों का दावा है कि उन्हें बाद में मालूम हुआ कि संबंधित सोसाइटी का पंजीकृत दायरा उत्तर प्रदेश तक सीमित है।
अगर यह जानकारी सही है तो फिर सवाल उठता है कि राष्ट्रीय ओहदे स्वीकार करने से पहले संबंधित दस्तावेज़ क्यों सामने नहीं रखे गए?
क्या किसी भी तंजीम में ओहदा हासिल करने वाले शख्स को उसके संगठन की असल कानूनी हैसियत जानने का हक़ नहीं?
बिरादरी के वकीलों और दीगर तालीमयाफ्ता लोगों से भी गुज़ारिश है कि वे इस मामले को किसी शख्स की हिमायत या मुखालफत के बजाय दस्तावेज़ों और कानून की रोशनी में देखें।
'मुल्तानी समाज' की खबरें विरोध या बिरादरी को आगाह करने की कोशिश?
राष्ट्रीय समाचार पत्रिका 'मुल्तानी समाज' ने इस मसले को लेकर पहले भी कई बार बिरादरी के सामने सवाल रखे हैं।
पत्रिका का कहना है कि जब भी इस सिलसिले में खबरें प्रकाशित की गईं, तो कुछ लोगों द्वारा उन्हें विरोधियों की कार्रवाई बताकर सदस्यों से यह कहा गया कि ऐसे लोग हमेशा हमारे खिलाफ लिखते हैं, आप तंजीम के लिए अपना काम जारी रखिए।
हम पूछना चाहते हैं कि अगर खबरों में उठाए गए सवाल बेबुनियाद थे तो दस्तावेज़ों के साथ उनका जवाब क्यों नहीं दिया गया?
अगर सोसाइटी का राष्ट्रीय स्तर पर काम करना कानूनी तौर पर मुमकिन था, तो उसकी प्रमाणित उपविधियां और संबंधित संशोधन बिरादरी के सामने क्यों नहीं रखे गए?
किसी अखबार या समाचार पत्रिका से इख्तिलाफ रखना हर किसी का हक़ है, लेकिन सवाल का जवाब देने के बजाय सवाल उठाने वाले को विरोधी करार देना क्या किसी जिम्मेदार तंजीम की पहचान हो सकती है?
'मुल्तानी समाज' का मकसद किसी की शख्सियत को निशाना बनाना नहीं, बल्कि बिरादरी के सामने उन सवालों को रखना है जिनका ताल्लुक हर उस शख्स से है जिसने इस तंजीम पर एतमाद किया।
600 से 3100 रुपये तक की वसूली? वोट के नाम पर जमा रकम का हिसाब कौन देगा?
अब आते हैं इस पूरे मामले के सबसे अहम और नाज़ुक पहलू पर।
बिरादरी के कुछ सदस्यों की शिकायतों के मुताबिक, सोसाइटी के चुनाव और वोट बनाने के नाम पर उनसे 600 रुपये से लेकर 3100 रुपये तक की रकम जमा कराई गई।
शिकायत यह भी है कि रकम सोसाइटी के आधिकारिक बैंक खाते के बजाय एक निजी बैंक खाते में जमा कराई गई।
अगर यह शिकायतें सही हैं तो सदस्यों के कई सवाल अपनी जगह बिल्कुल जायज़ हैं।
- वोट बनवाने के नाम पर कितनी रकम जमा की गई?
- कुल कितने लोगों ने अपनी रकम जमा कराई?
- रकम जमा करने वालों को रसीद दी गई या नहीं?
- निजी बैंक खाते में रकम जमा कराने की वजह क्या थी?
- जमा की गई रकम का कितना हिस्सा वोटर लिस्ट तैयार करने पर खर्च हुआ?
- जिन लोगों ने रकम जमा की, उनके वोट वास्तव में बनाए गए या नहीं?
- रकम का पूरा हिसाब सदस्यों को कब दिया जाएगा?
यहां एक बात बिल्कुल साफ होनी चाहिए कि बिरादरी के किसी भी शख्स की जेब से निकला हुआ पैसा उसकी मेहनत की कमाई है।
सामाजिक खिदमत के नाम पर जमा की गई रकम किसी की निजी मिल्कियत नहीं, बल्कि एक अमानत होती है। अमानत का तकाज़ा है कि उसका हिसाब भी साफ और शफ़्फ़ाफ़ होना चाहिए।
राष्ट्रीय चुनाव का इंतजार या अभी एक साल और सब्र?
बिरादरी के कुछ लोगों के पास तंजीम के सदर साहब की एक कथित ऑडियो रिकॉर्डिंग पहुंचने की बात कही जा रही है।
बताया जा रहा है कि इस ऑडियो में सदर साहब अपने सदस्यों को अपने-अपने शहरों में चुनाव कराकर स्थानीय कमेटियां गठित करने की बात समझाते सुनाई देते हैं। साथ ही राष्ट्रीय कार्यकारिणी के चुनाव के लिए अभी लगभग एक साल का इंतजार करने की बात भी सामने आने का दावा किया जा रहा है।
अगर यह ऑडियो असली है और इसमें कही गई बातें सही हैं तो फिर सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिन बिरादरी भाइयों ने राष्ट्रीय चुनाव की उम्मीद में रकम जमा कराई, उन्हें चुनाव की इस समय-सीमा से पहले ही पूरी तरह आगाह क्यों नहीं किया गया?
क्या उन्हें बताया गया था कि पहले शहरों की कमेटियां बनेंगी, फिर आगे चलकर राष्ट्रीय कार्यकारिणी का चुनाव होगा?
क्या यह चुनावी कार्यक्रम सोसाइटी के पंजीकृत दस्तूर और बाकायदा प्रस्ताव पर आधारित है?
सवाल यह भी है कि अगर राष्ट्रीय चुनाव में अभी एक साल बाकी है, तो वोट बनाने के नाम पर जमा की गई रकम और अब तक की गई कार्रवाई का पूरा ब्यौरा सदस्यों को क्यों न दिया जाए?
सदर साहब को समझना चाहिए कि बिरादरी के लोग सिर्फ ऑडियो सुनकर और मौखिक तसल्ली से अपने सवाल खत्म नहीं करेंगे। उन्हें अपने हक़ का हिसाब चाहिए।
ट्रस्ट और ISO प्रमाणपत्र का जिक्र, आखिर क्या है आगे का मंसूबा?
इसी कथित ऑडियो को लेकर यह भी चर्चा है कि सदर साहब ने अपने पास एक अलग ट्रस्ट के पंजीकरण और ISO प्रमाणपत्र होने का जिक्र किया है।
ट्रस्ट का पंजीकरण कराना या ISO प्रमाणपत्र हासिल करना अपने आप में कोई गलत काम नहीं है। हर शख्स को कानून के दायरे में रहकर संस्था कायम करने और सामाजिक काम करने का अधिकार है।
लेकिन बिरादरी के सामने सवाल यह है कि जब मौजूदा सोसाइटी की कार्यप्रणाली और चुनावी प्रक्रिया को लेकर सवाल उठ रहे हैं, तब अलग ट्रस्ट और ISO प्रमाणपत्र का जिक्र किस सिलसिले में किया गया?
क्या दोनों संस्थाओं का कामकाज अलग-अलग है?
क्या उनके बैंक खाते, सदस्यता, पदाधिकारी और आर्थिक गतिविधियां अलग हैं?
क्या सदस्यों को दोनों संस्थाओं की वास्तविक स्थिति और उनके आपसी संबंधों की जानकारी दी गई है?
बिरादरी को यह जानने का पूरा हक़ है कि जिस नाम पर उससे वाबस्तगी और आर्थिक सहयोग मांगा जा रहा है, उस संस्था की असल हैसियत क्या है।
सदर साहब से बिरादरी के सीधे सवाल!
हम संबंधित सदर साहब और तमाम जिम्मेदार पदाधिकारियों से अदब के साथ, मगर पूरी संजीदगी से पूछना चाहते हैं:
- सोसाइटी का असल पंजीकृत कार्यक्षेत्र क्या है?
- क्या उत्तर प्रदेश से बाहर राष्ट्रीय और प्रदेश स्तर की कमेटियां बनाने की वैधानिक अनुमति हासिल की गई?
- क्या संबंधित उपविधियों में कोई संशोधन कराया गया?
- राष्ट्रीय पदाधिकारियों की नियुक्ति किस प्रस्ताव और किस अधिकार से हुई?
- वोट बनाने के नाम पर जमा की गई कुल रकम कितनी है?
- रकम निजी बैंक खाते में जमा कराने का क्या कारण था?
- जिन सदस्यों ने रकम दी, उनके वोट कब बनाए जाएंगे?
- जमा रकम का पूरा हिसाब कब सार्वजनिक होगा?
- राष्ट्रीय कार्यकारिणी के चुनाव की सही तारीख और लिखित कार्यक्रम क्या है?
- यदि किसी सदस्य की रकम लेने के बाद संबंधित प्रक्रिया पूरी नहीं हुई है तो उसे नियमानुसार रकम वापस करने की व्यवस्था क्या है?
इन सवालों के जवाब देना किसी पर एहसान नहीं, बल्कि संगठन के सदस्यों के प्रति उसकी जिम्मेदारी है।
बिरादरी को अब किसी के रौब की नहीं, हक़ीक़त की जरूरत है!
हमारे बुजुर्गों ने हमेशा हमें इत्तेहाद, भाईचारे, ईमानदारी और अमानतदारी का सबक दिया है। हमारी बिरादरी में मेहनतकश लोग भी हैं, कारोबारी भी, तालीमयाफ्ता नौजवान भी और कानून व सरकारी सेवाओं से जुड़े जिम्मेदार लोग भी।
ऐसी बिरादरी को किसी एक शख्स की शख्सियत या ओहदे के इर्द-गिर्द नहीं घूमना चाहिए।
किसी भी सदर को यह समझना होगा कि सदर का ओहदा बिरादरी की खिदमत के लिए होता है, बिरादरी पर हुकूमत करने के लिए नहीं।
किसी भी राष्ट्रीय पदाधिकारी को यह याद रखना चाहिए कि ओहदा मिलने से जवाबदेही खत्म नहीं होती, बल्कि और बढ़ जाती है।
और जो लोग अपनी मेहनत की कमाई से संगठन को मजबूत बनाने के लिए रकम देते हैं, उन्हें यह पूछने का पूरा हक़ है कि उनका पैसा कहां खर्च हुआ।
हम किसी के खिलाफ नहीं, बल्कि बिरादरी के हक़ में सवाल उठा रहे हैं।
आखिरी बात: एतमाद टूटने से पहले जवाब दे दीजिए!
सदर साहब! बिरादरी के लोग आपसे कोई गैरमुनासिब मांग नहीं कर रहे। वे सिर्फ अपनी सोसाइटी की कानूनी हैसियत जानना चाहते हैं। अपने वोट का हक़ चाहते हैं। अपनी जमा रकम का हिसाब चाहते हैं और उस राष्ट्रीय संगठन की वास्तविक स्थिति जानना चाहते हैं, जिसके नाम पर उन्होंने आपसे उम्मीदें बांधी थीं।
अगर सब कुछ दस्तूर और कानून के मुताबिक हुआ है तो दस्तावेज़ सामने रखिए।
अगर रकम सही मद में खर्च हुई है तो हिसाब दीजिए।
अगर राष्ट्रीय कमेटियां कानूनी तौर पर गठित हुई हैं तो उनका आधार बताइए।
और अगर कहीं कोई कमी रह गई है तो उसे दुरुस्त करने के लिए आगे आइए।
याद रखिए, बिरादरी के लोग किसी के दुश्मन नहीं हैं। लेकिन अपनी मेहनत की कमाई, अपनी इज़्ज़त और अपने हक़ के मामले में किसी को भी सवाल करने से रोका नहीं जा सकता।
कुर्सियां आती-जाती रहती हैं, ओहदे बदलते रहते हैं, मगर बिरादरी का एतमाद एक बार टूट जाए तो उसे दोबारा हासिल करना आसान नहीं होता।
कौम की खिदमत का दावा करने वालों को पहले कौम के सामने जवाबदेह होना सीखना चाहिए।
पत्रिका का पक्ष एवं कानूनी स्पष्टीकरण
यह रिपोर्ट बिरादरी के सदस्यों से प्राप्त शिकायतों, उपलब्ध कराई गई जानकारियों और संगठनात्मक पारदर्शिता से जुड़े सवालों के आधार पर तैयार की गई है। इसमें व्यक्त आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि और संबंधित दस्तावेज़ों की जांच आवश्यक है। किसी भी व्यक्ति या संस्था को दोषी घोषित करना इस रिपोर्ट का उद्देश्य नहीं है।
संबंधित सोसाइटी के सदर साहब, पदाधिकारियों और अन्य जिम्मेदार लोगों को अपना पक्ष रखने का पूरा अवसर दिया जाएगा। उनका जवाब और उपलब्ध कराए गए दस्तावेज़ प्राप्त होने पर उन्हें भी उचित स्थान दिया जाएगा।
सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार से पंजीकृत, मुल्क की राजधानी नई दिल्ली से प्रसारित, पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी की मुल्क की इकलौती क़ौमी समाचार पत्रिका, न्यूज़ पोर्टल एवं यूट्यूब चैनल — 'मुल्तानी समाज'
उत्तर प्रदेश डेस्क | ख़ास रिपोर्ट: अज़हर ख़ान
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