मुल्क भर में मुस्लिम मुल्तानी लोहार और बढ़ई बिरादरी के अफ़राद को तलाश कर एक डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर जोड़ने का काम — मुल्तानी समाज चैरिटेबल ट्रस्ट के फ़ाउंडर ज़मीर आलम की क़यादत में एक नई मिसाल
नई दिल्ली/उत्तर प्रदेश डेस्क।
मुस्लिम मुल्तानी लोहार और बढ़ई बिरादरी की फ़लाह, तरक़्क़ी, इत्तेहाद और पहचान के लिए मुख़्तलिफ़ तंजीमें अपने-अपने अंदाज़ में काम करती रही हैं। मगर बिरादरी को किसी बड़े चंदा-ए-आम या चंदा-ए-ख़ास के सहारे के बग़ैर, महज़ मामूली मेंबरशिप फ़ीस के ज़रिए एक मुकम्मल डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर मुल्क के मुख़्तलिफ़ हिस्सों से तलाश कर जोड़ने की कोशिश अपने आप में एक नई और ग़ौरतलब पहल है।
"मुल्तानी समाज चैरिटेबल ट्रस्ट" के फ़ाउंडर ज़मीर आलम की क़यादत में शुरू की गई इस पहल का मक़सद सिर्फ़ एक तंजीम की तामीर करना नहीं, बल्कि मुल्क के मुख़्तलिफ़ शहरों, क़स्बों और इलाक़ों में रहने वाले मुस्लिम मुल्तानी लोहार और बढ़ई बिरादरी के अफ़राद को एक ऐसे डिजिटल निज़ाम से जोड़ना है, जहाँ उनकी पहचान, हुनर, कारोबार, सामाजिक सरोकार और बिरादराना ताल्लुक़ात को एक नई पहचान मिल सके।
इस पहल की सबसे अहम बात यह है कि इसमें चंदा-ए-आम या चंदा-ए-ख़ास को बुनियादी सहारा बनाने के बजाय महज़ ₹250 की मेंबरशिप फ़ीस को आधार बनाया गया है। यानी बिरादरी के अफ़राद अपनी हैसियत के मुताबिक़ मामूली मेंबरशिप फ़ीस अदा करके इस डिजिटल मिशन का हिस्सा बन सकते हैं।
पहली मर्तबा लोहार और बढ़ई बिरादरी को एक साथ लेकर चलने की कोशिश
मुल्तानी समाज चैरिटेबल ट्रस्ट की ओर से दिए गए हालिया पैग़ाम में एक और अहम पहलू की तरफ़ तवज्जो दिलाई गई है।
मुल्क में अब तक बनी मुख़्तलिफ़ बिरादराना तंजीमों का तआरुफ़ और उनकी सरगर्मियों का अपना-अपना दायरा रहा है। लेकिन मुल्तानी लोहार और मुल्तानी बढ़ई बिरादरी को एक साथ लेकर चलने और दोनों की सामाजिक व मआशी तरक़्क़ी को एक ही बिरादराना प्लेटफ़ॉर्म पर अहमियत देने की कोशिश को मुल्तानी समाज चैरिटेबल ट्रस्ट अपनी अहम ख़िदमत के तौर पर पेश कर रहा है।
यहाँ यह वाज़ेह करना भी ज़रूरी है कि मुल्तानी लोहार और मुल्तानी बढ़ई एक ही बिरादराना विरासत से जुड़े हुए हैं, मगर दोनों के पेशे, हुनर, कारोबार और रोज़गार के अंदाज़ में फ़र्क़ मौजूद है। लिहाज़ा दोनों बिरादरियों के मआशी और कारोबारी मसाइल, उनके हुनर और उनकी ज़रूरतों को अलग-अलग समझना भी उतना ही ज़रूरी है।
मुल्तानी समाज चैरिटेबल ट्रस्ट का कहना है कि अगर बिरादरी की तरक़्क़ी को मुकम्मल और जामे अंदाज़ में आगे बढ़ाना है तो लोहार के साथ बढ़ई और बढ़ई के साथ लोहार—दोनों को बराबर की अहमियत और नुमाइंदगी देना ज़रूरी है।
"हमने बढ़ई बिरादरी को कभी नज़रअंदाज़ नहीं किया"
ट्रस्ट की तरफ़ से यह भी कहा गया है कि इस मौज़ू पर आने वाले दिनों में मुख़्तलिफ़ तंजीमों और अफ़राद की तरफ़ से बहस हो सकती है। कोई इस पहल की मुख़ालिफ़त करे या अपने-अपने अंदाज़ में इसकी तफ़्सीर करे, मगर एक सवाल अपनी जगह रहेगा कि क्या मुल्तानी बढ़ई बिरादरी की तरक़्क़ी, पहचान और मआशी मज़बूती को उतनी ही अहमियत दी गई, जितनी दी जानी चाहिए थी?
मुल्तानी समाज चैरिटेबल ट्रस्ट का मौक़िफ़ है कि उसने इस सवाल को पहली बार खुलकर बिरादरी के सामने रखने की कोशिश की है और बढ़ई बिरादरी को बिरादराना निज़ाम का बराबर का हिस्सा मानते हुए उसे दरकिनार करने के बजाय साथ लेकर चलने की राह इख़्तियार की है।
ट्रस्ट का कहना है कि इसका मक़सद किसी तंजीम या शख़्स की तन्क़ीद करना नहीं, बल्कि बिरादरी के उन तमाम अफ़राद को एक साथ लाना है जो इल्म, हुनर, कारोबार, रोज़गार और समाजी तरक़्क़ी में अपना किरदार अदा कर रहे हैं।
"पैदायशी इंजीनियर" — बिरादरी के हुनर को नई पहचान देने की कोशिश
मुल्तानी समाज चैरिटेबल ट्रस्ट की तरफ़ से बिरादरी के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले एक ख़ास अल्क़ाब में "पैदायशी इंजीनियर" भी शामिल है।
ट्रस्ट का नज़रिया है कि सदियों से लोहे, लकड़ी, औज़ार, मशीनरी, दस्तकारी और तकनीकी हुनर से जुड़े रहने वाली इस बिरादरी के पारंपरिक फ़न और कारीगरी को सिर्फ़ एक पेशा समझने के बजाय उसके अंदर मौजूद तकनीकी सलाहियत और हुनर को भी पहचान मिलनी चाहिए।
इसी सोच के तहत बिरादरी के लिए "पैदायशी इंजीनियर" का अल्क़ाब इस्तेमाल किया गया, ताकि नई नस्ल को अपने बुज़ुर्गों के हुनर, मेहनत और दस्तकारी की विरासत पर फ़ख़्र महसूस हो और वह आधुनिक तालीम व तकनीक के साथ इस विरासत को आगे बढ़ा सके।
₹250 की मेंबरशिप — डिजिटल इत्तेहाद की तरफ़ एक क़दम
मुल्तानी समाज चैरिटेबल ट्रस्ट की यह डिजिटल पहल सिर्फ़ मेंबरशिप जमा करने तक महदूद नहीं बताई जा रही, बल्कि इसके ज़रिए बिरादरी के अफ़राद को एक-दूसरे से जोड़ने, उनकी पहचान को डिजिटल तौर पर दर्ज करने और मुल्क के मुख़्तलिफ़ हिस्सों में मौजूद बिरादराना नेटवर्क को मज़बूत करने की कोशिश की जा रही है।
एक तरफ़ जहाँ बड़ी-बड़ी तंजीमों के लिए चंदा जमा करना और बड़े इज्लास करना आम बात है, वहीं इस पहल में छोटी मेंबरशिप फ़ीस के ज़रिए ज़्यादा से ज़्यादा अफ़राद को सीधे डिजिटल नेटवर्क का हिस्सा बनाने का तसव्वुर सामने रखा गया है।
यही वजह है कि यह पहल बिरादरी के अंदर एक नई बहस और नई उम्मीद दोनों पैदा कर रही है।
"बिरादरी की ताक़त उसके अफ़राद हैं"
मुल्तानी समाज चैरिटेबल ट्रस्ट का पैग़ाम साफ़ है कि किसी भी बिरादरी की असल ताक़त सिर्फ़ उसकी तादाद में नहीं बल्कि उसके मुत्तहिद, बा-इल्म, हुनरमंद और एक-दूसरे से जुड़े हुए अफ़राद में होती है।
अगर मुल्क के मुख़्तलिफ़ राज्यों और शहरों में रहने वाला एक-एक मुल्तानी अपने दूसरे मुल्तानी से डिजिटल तौर पर जुड़ जाए, एक-दूसरे के कारोबार को जाने, एक-दूसरे के हुनर से वाक़िफ़ हो, नौजवानों को रोज़गार के मौक़े मिलें और बिरादरी के मसाइल को एक साझा प्लेटफ़ॉर्म पर उठाया जा सके, तो यह सिर्फ़ एक डिजिटल डायरेक्टरी नहीं बल्कि बिरादराना इत्तेहाद का एक नया निज़ाम साबित हो सकता है।
23 सितंबर 2026 की ख़बर के बाद सामने आईं कुछ अहम बातें
गुज़िश्ता रोज़ 23 सितंबर 2026 को "मुल्तानी समाज" राष्ट्रीय समाचार पत्रिका के ज़रिए एक ख़बर बिरादरी के सामने रखी गई थी। अब उसी सिलसिले में उस ख़बर से मुताल्लिक़ कुछ अहम और ख़ास पहलुओं को तफ़्सील से पेश किया जा रहा है, ताकि बिरादरी के अफ़राद इस पहल के मक़सद और इसके पीछे की सोच को बेहतर तौर पर समझ सकें।
मुल्तानी समाज चैरिटेबल ट्रस्ट की तरफ़ से कहा गया है कि आने वाले वक़्त में इस डिजिटल मिशन से जुड़ी और भी अहम मालूमात, नए प्रोग्राम, बिरादराना रिकॉर्ड, डिजिटल सहूलियतें और तरक़्क़ी के मंसूबे बिरादरी के सामने रखे जाएंगे।
यह सफ़र किसी एक शख़्स का सफ़र नहीं, बल्कि उन तमाम अफ़राद का साझा सफ़र है जो अपनी बिरादरी को इत्तेहाद, इल्म, हुनर, कारोबार और नई तकनीक के ज़रिए मज़बूत देखना चाहते हैं।
मुल्तानी समाज चैरिटेबल ट्रस्ट का पैग़ाम है कि बिरादरी को सिर्फ़ याद करने की नहीं, बल्कि उसे जोड़ने, समझने और आगे बढ़ाने की ज़रूरत है।
और शायद इसी सोच के साथ एक नया सवाल भी सामने आता है—
क्या वक़्त आ गया है कि मुल्क के हर शहर, हर क़स्बे और हर इलाक़े में रहने वाला मुल्तानी लोहार और बढ़ई अपने दूसरे बिरादर से डिजिटल तौर पर जुड़े और अपनी बिरादरी की एक नई, मुत्तहिद और मज़बूत पहचान का हिस्सा बने?
इस मुहिम का अगला सफ़र क्या होगा और आने वाले दिनों में "मुल्तानी समाज" बिरादरी के लिए कौन-कौन सी नई डिजिटल सहूलियतें लेकर सामने आएगा—इसकी तफ़्सीलात के लिए जुड़े रहिए।
सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार से पंजीकृत, मुल्क की राजधानी नई दिल्ली से शाया होने वाली पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी की क़ौमी समाचार पत्रिका, न्यूज़ पोर्टल और यूट्यूब चैनल "मुल्तानी समाज" के लिए उत्तर प्रदेश डेस्क से प्रधान संपादक ज़मीर आलम की ख़ास रिपोर्ट।
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