द्वारा शुरू किया गया “मुल्तानी घराना” प्रोजेक्ट आज मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी के लिए सिर्फ एक सॉफ्टवेयर नहीं, बल्कि हमारी पहचान, विरासत और अमानत बन चुका है। यह वह डिजिटल शिजरा है जो हमारी जड़ों को संभालते हुए आने वाली नस्लों के लिए राह रोशन कर रहा है।
🧭 ऐतिहासिक पृष्ठभूमि — “मुल्तानी” पहचान की जड़ें
“मुल्तानी” पहचान का संबंध ऐतिहासिक मुल्तान क्षेत्र से माना जाता है। लोहे और लकड़ी की कारीगरी—यानी लोहार और बढ़ई का हुनर—हमारी असल पहचान रही है। रोज़गार, व्यापार और सामाजिक परिस्थितियों के चलते अलग-अलग दौर में हिजरत हुई, और बिरादरी भारत के कई राज्यों में बसती चली गई।आज भी यह हुनर हमारी रगों में है—बस औज़ार बदले हैं, इरादे नहीं।
🗺️ भारत में राज्यवार फैलाव — मेहनत की मिसाल
🔹 उत्तर भारत (मुख्य केंद्र)
- उत्तर प्रदेश — पश्चिमी यूपी (शामली, मुज़फ्फरनगर, मेरठ, सहारनपुर), रोहिलखंड, अवध
- दिल्ली (NCT) — पुरानी दिल्ली, उत्तर-पूर्वी व बाहरी दिल्ली
- हरियाणा — यमुनानगर, करनाल, पानीपत
- पंजाब, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश (सीमावर्ती क्षेत्र)
🔹 पश्चिम व मध्य भारत
- राजस्थान — जयपुर, अजमेर, अलवर
- गुजरात — अहमदाबाद, सूरत
- महाराष्ट्र — मुंबई, पुणे
- मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़
🔹 पूर्व व अन्य क्षेत्र
- बिहार, झारखंड
- जम्मू क्षेत्र
यह फैलाव हमारी मेहनत, हुनर और हालात से तालमेल की गवाही देता है।
🧬 नस्लनामा — सिलसिला-ए-अव्वल से आज तक
शिजरा सिर्फ नामों की सूची नहीं, बल्कि रिश्तों की अमानत है।बुनियादी मूल:
मूल स्थान — मुल्तान
पहचान — मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई)
पारंपरिक पेशा — लोहे व लकड़ी की कारीगरी
सिलसिला-ए-अव्वल:
हाजी मुल्तानी साहब → शेख नूर मोहम्मद → हाजी करीमुद्दीन → हाजी सत्तार → मियां अब्दुल गफ्फार → मोहम्मद इस्माईल → हाजी रहमुद्दीन → हाजी सगीर अहमद → ज़मीर आलम → लारेब ज़मीर / रुशान ज़मीर
यह सिलसिला बताता है कि हम कहाँ से आए, कैसे फैले और किन-किन नामों ने इस पहचान को आगे बढ़ाया।
💻 “मुल्तानी घराना” — डिजिटल दौर की दीनी व सामाजिक ज़रूरत
ट्रस्ट ने वर्षों की मेहनत और संसाधनों से शिजरे को डिजिटल रूप दिया है, ताकि:
- देश-विदेश में फैली बिरादरी अपने कुनबे को जोड़ सके
- आने वाली नस्लों को सही जानकारी मिले
- खानदान की मैपिंग आसान हो
- विरासत हमेशा के लिए महफ़ूज़ रहे
दीनी ऐतबार से भी यह काम सवाब का ज़रिया है—
अपनी नस्ल, अपने बुजुर्गों और अपने सिलसिले को याद रखना और उसे सुरक्षित रखना एक अमानत की हिफ़ाज़त है। जब नई पीढ़ी अपने अस्ल से वाकिफ़ होगी, तो उसमें इत्तेहाद, जिम्मेदारी और खिदमत का जज़्बा और मजबूत होगा।
🤝 युवाओं के लिए सुनहरा मौका
इस प्रोजेक्ट पर काम करने के लिए ऐसे पढ़े-लिखे युवक-युवतियों की ज़रूरत है जो अपने-अपने शहर से ही सॉफ्टवेयर पर काम करना चाहें।
यह सिर्फ टेक्निकल काम नहीं—यह बिरादरी की खिदमत है।
📰 बिरादरी की आवाज़
सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा पंजीकृत और दिल्ली से प्रकाशित बिरादरी की पत्रिका “मुल्तानी समाज” भी इस मुहिम को मजबूती दे रही है—ताकि हर घर तक सही जानकारी पहुंचे।
🌿 “मुल्तानी घराना” — पहली से सातवीं पीढ़ी तक नस्लों को जोड़ने वाला डिजिटल शिजरा
की जानिब से तैयार किया गया “मुल्तानी घराना” सिर्फ एक सॉफ्टवेयर नहीं, बल्कि मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी की नस्लों को जोड़ने वाली अमानत है। यह वह डिजिटल शिजरा है जो हमारे बुजुर्गों की याद, हमारी पहचान और आने वाली पीढ़ियों की राह को एक साथ सुरक्षित करता है।
🧭 ऐतिहासिक पृष्ठभूमि — अस्ल से पहचान तक
“मुल्तानी” पहचान का रिश्ता ऐतिहासिक मुल्तान से माना जाता है। लोहे और लकड़ी की कारीगरी हमारी बुनियादी पहचान रही। वक्त के साथ रोज़गार और हालात के चलते बिरादरी भारत के अलग-अलग सूबों में फैलती चली गई—मगर अपनी तहज़ीब और दीनी जड़ों से जुड़ी रही।
🧬 पहली से सातवीं पीढ़ी तक पूरा सिलसिला
👴 पहली पीढ़ी (सिलसिला-ए-अव्वल)
हाजी मुल्तानी साहब
↳ “मुल्तानी” पहचान यहीं से मशहूर मानी जाती है।
👨🦳 दूसरी पीढ़ी
- हाजी करीमुद्दीन मुल्तानी
- शेख नूर मोहम्मद मुल्तानी
👨 तीसरी पीढ़ी (फैलाव की शुरुआत)
उत्तर भारत शाखा:
- हाजी सत्तार मुल्तानी
- मियां अब्दुल गफ्फार
पश्चिम भारत शाखा:
- हाजी यूसुफ़ मुल्तानी
- शेख अब्दुल वहीद
👨👦 चौथी पीढ़ी (राज्यवार पहचान)
- उत्तर प्रदेश — उस्ताद इलाही बख्श, मियां रशीद अहमद
- दिल्ली — हाजी कादिर बख्श, मियां हबीबुल्लाह
- हरियाणा — मियां गुलाम हुसैन, शेख रज़ा मोहम्मद
- पंजाब — हाजी फज़ल करीम, मियां खुदा बख्श
- राजस्थान — उस्ताद नूर अहमद, मियां सलीमुद्दीन
👨👦👦 पांचवीं पीढ़ी (विस्तार काल)
- मध्य प्रदेश — हाजी जमील अहमद, शेख बशीर अहमद
- गुजरात — हाजी इस्माइल मुल्तानी, मियां अज़ीज़ अहमद
- उत्तराखंड — हाजी रशीद अहमद, शेख नज़ीर अहमद
👨👧👦 छठी पीढ़ी (आधुनिक दौर)
- महाराष्ट्र — हाजी अब्दुल मजीद, शेख अनीस अहमद
- बिहार — हाजी लतीफ़ अहमद
- झारखंड — मियां हामिद अली
- छत्तीसगढ़ — हाजी वहीद अहमद
- हिमाचल प्रदेश — मियां नूर मोहम्मद
- जम्मू — हाजी अब्दुल रऊफ
🧑💼 सातवीं पीढ़ी (वर्तमान और भविष्य)
आज की पीढ़ी — जो शिक्षा, व्यापार, सरकारी-गैरसरकारी नौकरी, टेक्नोलॉजी और समाजसेवा में आगे बढ़ रही है — अपने-अपने शहरों में खानदान, कुनबा और घराना के नाम से पहचानी जाती है।
यही पीढ़ी “मुल्तानी घराना” डिजिटल शिजरे के जरिए अपनी जड़ों को आने वाली नस्लों तक पहुंचा रही है।
💻 “मुल्तानी घराना” — दीनी और सामाजिक फायदे
- नस्ल और सिलसिले की सही जानकारी महफ़ूज़ रहती है
- आने वाली पीढ़ियां अपने बुजुर्गों से जुड़ी रहती हैं
- बिरादरी में इत्तेहाद और पहचान मजबूत होती है
- गलतफहमियों और बिखराव से बचाव होता है
- दीनी एतबार से अपने अस्ल और बुजुर्गों को याद रखना सवाब का ज़रिया है
यह प्रोजेक्ट वर्षों की मेहनत, समय और संसाधनों से तैयार किया गया ताकि देश-विदेश में फैली बिरादरी एक डिजिटल प्लेटफॉर्म पर जुड़ सके।
🤝 युवाओं के लिए पैग़ाम
ट्रस्ट को ऐसे पढ़े-लिखे युवक-युवतियों की जरूरत है जो अपने शहर से ही इस सॉफ्टवेयर पर काम कर सकें। यह सिर्फ टेक्नोलॉजी नहीं, बल्कि अपनी कौम की खिदमत है।
✨ आख़िरी बात
“मुल्तानी घराना” सिर्फ नाम नहीं—
यह हमारी पहचान, हमारी तहज़ीब और हमारी नस्लों को जोड़ने वाली कड़ी है।
आइए, अपने शिजरे को अपडेट करें, अपनी जानकारी दर्ज कराएं और इस धरोहर को मजबूत बनाएं—ताकि आने वाली नस्लें फख्र से कह सकें कि हमने अपनी जड़ों को संभाल कर रखा।
✨ निष्कर्ष
“मुल्तानी घराना” सिर्फ एक डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म नहीं—यह हमारी पहचान, हमारी जड़ों और हमारी आने वाली नस्लों का पुल है।
आज वक्त है कि हम सब मिलकर इस धरोहर को मजबूत करें, अपने शिजरे को अपडेट करें और बिरादरी की इस टेक्नोलॉजी को हर घर तक पहुँचाएँ।
जब कौम अपने अस्ल को पहचान लेती है, तो तरक़्क़ी की राह खुद-ब-खुद आसान हो जाती है।
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