Monday, November 2, 2026

बिरादरी को चौधराहट नहीं, नौजवानों की ताक़त और सामूहिक इत्तेहाद की ज़रूरत है!

करोड़ों की आबादी, हज़ारों के दावे और चंद हज़ार सक्रिय लोग! आख़िर कब बदलेगी हमारी क़ौम की तस्वीर?

ज़रा सोचिए! जिस बिरादरी की आबादी करोड़ों में होने का अनुमान लगाया जाता है, उस बिरादरी की तालीम, तरक़्क़ी, कारोबार, रोज़गार और डिजिटल पहचान के लिए मैदान में कितने लोग वास्तव में अमली तौर पर काम कर रहे हैं?

आज पूरे हिंदुस्तान में मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी के नौजवानों, तालीमयाफ़्ता लोगों और कारोबार से जुड़े ज़िम्मेदार अफ़राद के दरमियान कई अहम सवालात पर गुफ़्तगू हो रही है। कहीं नए व्हाट्सऐप ग्रुप बनाए जा रहे हैं, कहीं नई तंजीम का ऐलान हो रहा है, कहीं नए ओहदेदार मुक़र्रर किए जा रहे हैं और कहीं नए सदर, चेयरमैन तथा सरपरस्त बनाए जा रहे हैं।

मगर अफ़सोस! इन तमाम सरगर्मियों के बीच एक बुनियादी सवाल पर बहुत कम लोग ग़ौर कर रहे हैं कि आख़िर हमारी बिरादरी की असल तरक़्क़ी के लिए अमली तौर पर किया क्या जा रहा है?

क्या सिर्फ़ नए ग्रुप बनाने, ओहदों के ऐलान करने और सोशल मीडिया पर तस्वीरें लगाने से हमारी आने वाली नस्लों का मुस्तक़बिल संवर जाएगा?

क्या बिरादरी की तरक़्क़ी का रास्ता सिर्फ़ सदर, चेयरमैन और राष्ट्रीय पदाधिकारी बनने से होकर गुज़रता है?

नहीं जनाब! अब वक़्त आ गया है कि हम इन सवालों का जवाब तलाशें।

मुझे बिरादरी का चौधरी नहीं बनना, मुझे बिरादरी को आगे बढ़ते देखना है!

मैं ज़मीर आलम, आज अपनी बिरादरी के तमाम नौजवानों, बुज़ुर्गों, कारोबारियों और सामाजिक ज़िम्मेदारों के सामने अपनी बात पूरी साफ़गोई के साथ रखना चाहता हूँ।

मुझे न बिरादरी का चौधरी बनना है, न किसी ओहदे की लालसा है और न ही किसी तंजीम के ओहदेदार से कोई मुक़ाबला करना है।

मेरा मक़सद सिर्फ़ इतना है कि हमारी बिरादरी को मुल्क की एक तालीमयाफ़्ता, बा-शऊर, तरक़्क़ीपसंद और डिजिटल तौर पर मज़बूत बिरादरी के रूप में पहचाना जाए।

अगर किसी तंजीम ने किसी शख़्स को चेयरमैन बनाया है तो यह उनका अपना फ़ैसला है। हम उनका एहतराम करते हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या सिर्फ़ चेयरमैन बना देने से बिरादरी की तक़दीर बदल जाएगी?

अगर किसी ओहदेदार के पास बिरादरी की तालीम, रोज़गार, कारोबार, नौजवानों की रहनुमाई और सामाजिक बेदारी के लिए कोई अमली मंसूबा नहीं है, तो फिर सिर्फ़ ओहदे की अहमियत क्या रह जाती है?

मेरा यक़ीन है कि बिरादरी की ख़िदमत ओहदों से नहीं, बल्कि ख़ुलूस, मेहनत, क़ुर्बानी और लगातार अमल से होती है।

करोड़ों की बिरादरी और चंद हज़ार ख़िदमतगार! यह हमारी सबसे बड़ी फ़िक्र होनी चाहिए

आज हमारे सामने मौजूद सामाजिक तंजीमों और उनसे जुड़े लोगों की तादाद पर ग़ौर करने की ज़रूरत है।

मेरे तजुर्बे, सामाजिक सरगर्मियों और बिरादरी के अलग-अलग हल्क़ों से मिलने वाली मालूमात के मुताबिक़, पूरे मुल्क में बिरादरी की ख़िदमत का दावा करने वाली कई तंजीमें मौजूद हैं। इनमें से कुछ बाक़ायदा रजिस्टर्ड हैं और कुछ सामाजिक सतह पर काम कर रही हैं।

अगर इन तमाम तंजीमों के साथ वास्तव में जुड़े हुए लोगों, पदाधिकारियों और अमली तौर पर काम करने वाले अफ़राद की तादाद का जायज़ा लिया जाए तो यह तादाद बिरादरी की कुल आबादी के मुक़ाबले बेहद कम नज़र आती है।

एक शुरुआती अंदाज़े के मुताबिक़, तमाम तंजीमों के सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ताओं और उनसे जुड़े लोगों की कुल तादाद कुछ हज़ार तक ही सीमित हो सकती है। यह कोई सरकारी या प्रमाणित सर्वे नहीं, बल्कि एक सामाजिक जायज़े की ज़रूरत की तरफ़ इशारा है।

अब ज़रा सोचिए!

जिस बिरादरी की आबादी करोड़ों में होने का अनुमान लगाया जाता है, उसके लिए अगर चंद हज़ार लोग ही सरगर्म हों तो क्या इतने कम लोग अकेले पूरी बिरादरी की तस्वीर बदल सकते हैं?

आख़िर बाक़ी लोग कहाँ हैं? क्या बिरादरी की तरक़्क़ी सिर्फ़ कुछ लोगों की ज़िम्मेदारी है?

सोशल मीडिया के हज़ारों फ़ॉलोअर्स को तंजीम का मेंबर समझने की भूल मत कीजिए!

आजकल एक और दिलचस्प सूरतेहाल देखने को मिल रही है।

कई तंजीमें अपने साथ 10 हज़ार, 20 हज़ार या उससे भी ज़्यादा लोगों के जुड़े होने का दावा करती हैं। हम भी इन दावों को सुनते हैं और ख़ुशी होती है कि हमारी बिरादरी के लोग बड़ी तादाद में एक प्लेटफ़ॉर्म पर जमा हो रहे हैं।

लेकिन असल तस्वीर जानने के लिए कुछ बुनियादी सवाल पूछना ज़रूरी है।

  • तंजीम के बाक़ायदा मेंबरशिप रजिस्टर में कितने लोगों के नाम दर्ज हैं?
  • कितने लोगों ने बाक़ायदा सदस्यता हासिल की है?
  • कितने लोग तंजीम के सामाजिक और तालीमी मिशन में हिस्सा लेते हैं?
  • कितने नौजवान रोज़ाना बिरादरी की बेदारी के लिए वक़्त निकालते हैं?
  • कितने लोग किसी ज़रूरतमंद की मदद के लिए आगे आते हैं?

सोशल मीडिया पर किसी फ़ेसबुक पेज को फ़ॉलो करने, इंस्टाग्राम अकाउंट से जुड़ने या व्हाट्सऐप ग्रुप में शामिल होने का मतलब यह नहीं कि वह शख़्स किसी तंजीम का बाक़ायदा मेंबर भी बन गया है।

हक़ीक़त यह है कि एक ही शख़्स बिरादरी की कई तंजीमों, दर्जनों सोशल मीडिया पेजों और सैकड़ों व्हाट्सऐप ग्रुपों से जुड़ा हुआ मिल सकता है।

इसलिए सोशल मीडिया पर दिखाई देने वाली तादाद और बाक़ायदा सदस्यता को एक जैसा समझना दुरुस्त नहीं।

हमें तादाद के दावों से ज़्यादा अमली कारगुज़ारी, पारदर्शिता और नतीजों पर तवज्जो देनी होगी।

100 से 150 व्हाट्सऐप ग्रुप, मगर कितने लोग हैं अमली तौर पर सरगर्म?

ज़रा किसी भी तंजीम के ज़िम्मेदार के मोबाइल पर मौजूद बिरादरी के व्हाट्सऐप ग्रुपों का जायज़ा लीजिए।

कई लोगों के मोबाइल में 100 से 150 तक ग्रुप मौजूद मिल सकते हैं। लेकिन सवाल यह है कि इन ग्रुपों में कितने लोग वाक़ई सरगर्मी से हिस्सा लेते हैं?

कितने लोग तालीम की जानकारी शेयर करते हैं?

कितने लोग सरकारी स्कीमों, रोज़गार, कारोबार और क़ानूनी रहनुमाई की मालूमात दूसरों तक पहुँचाते हैं?

कितने लोग किसी ज़रूरतमंद की मदद के लिए आगे आते हैं?

अक्सर देखा जाता है कि ग्रुप में सैकड़ों लोग शामिल होते हैं, लेकिन पैग़ाम भेजने और सामाजिक कामों में हिस्सा लेने वाले चंद ही लोग होते हैं।

अब वक़्त है कि हम सिर्फ़ ग्रुप में शामिल होने वाले नहीं, बल्कि बिरादरी के लिए काम करने वाले बनें।

ऐ नौजवानों! आपकी जेब में मौजूद मोबाइल हमारी बिरादरी का मुस्तक़बिल बदल सकता है!

मेरे प्यारे नौजवान भाइयों!

आप रोज़ाना सोशल मीडिया पर कितना वक़्त गुज़ारते हैं? फ़ेसबुक, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और व्हाट्सऐप पर कितनी देर सरगर्म रहते हैं?

क्या उसी वक़्त में से सिर्फ़ 10 से 15 मिनट अपनी बिरादरी की तरक़्क़ी के लिए नहीं निकाल सकते?

यक़ीन मानिए, अगर हमारी बिरादरी का हर नौजवान रोज़ाना सिर्फ़ 10 से 15 मिनट भी किसी मुनज़्ज़म और मुस्तनद सामाजिक प्लेटफ़ॉर्म के ज़रिए ख़िदमत के लिए दे दे तो एक ऐसी तहरीक खड़ी हो सकती है जिसका असर पूरे हिंदुस्तान में दिखाई देगा।

आपको न अपना कारोबार छोड़ना है, न नौकरी से छुट्टी लेनी है और न ही घर से बाहर निकलने की ज़रूरत है।

आप घर बैठे अपने मोबाइल से यह काम कर सकते हैं।

मसलन:

  1. बिरादरी के बच्चों को तालीम हासिल करने के लिए प्रोत्साहित करना।
  2. सरकारी योजनाओं, स्कॉलरशिप और दाख़िलों की जानकारी शेयर करना।
  3. बेरोज़गार नौजवानों तक रोज़गार और नौकरी की जानकारी पहुँचाना।
  4. कारोबारियों के कारोबार को डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर पहचान दिलाना।
  5. बिरादरी के होनहार बच्चों और कामयाब अफ़राद की हौसलाअफ़ज़ाई करना।
  6. ज़रूरतमंद परिवारों और तालीमी मदद के मुस्तहिक़ लोगों की जानकारी सही प्लेटफ़ॉर्म तक पहुँचाना।
  7. बिरादरी के बुज़ुर्गों, तंजीमों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के अच्छे कामों को आम करना।
  8. बिरादरी में इत्तेहाद, भाईचारे और आपसी एहतराम को फ़रोग़ देना।
  9. ग़लत मालूमात और अफ़वाहों के बजाय सही और मुस्तनद जानकारी को बढ़ावा देना।
  10. मुल्क के हर शहर और क़स्बे में बिरादरी की डिजिटल पहचान को मज़बूत करना।

सोशल मीडिया की ताक़त को पहचानिए, दुनिया बदलने का ज़रिया बनाइए!

आज दुनिया में बड़े-बड़े सामाजिक और कारोबारी ब्रांड अपनी पहचान सोशल मीडिया के ज़रिए बना रहे हैं।

एक छोटी-सी टीम अगर मुनज़्ज़म तरीक़े से काम करे तो उसकी आवाज़ मुल्क के कोने-कोने तक पहुँच सकती है।

जब दूसरी क़ौमें अपने नौजवानों को डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म, तालीम, कारोबार और नए मौक़ों से जोड़ रही हैं, तो फिर हमारी बिरादरी पीछे क्यों रहे?

हमारे नौजवान किसी से कम नहीं हैं। हमारे बच्चों में सलाहियत है, कारोबारियों में तजुर्बा है, बुज़ुर्गों के पास इल्म और तजुर्बे का ख़ज़ाना है और हमारे पास एक बड़ी सामाजिक ताक़त मौजूद है।

ज़रूरत सिर्फ़ इस ताक़त को एक मुनज़्ज़म सिम्त देने की है।

हमें एक-दूसरे की टाँग खींचने के बजाय एक-दूसरे का हाथ थामना होगा।

मुल्तानी समाज चैरिटेबल ट्रस्ट की तरफ़ से बिरादरी के नौजवानों को पुरख़ुलूस दावत

आज इसी मक़सद के साथ मैं ज़मीर आलम, अपनी पूरी बिरादरी के नौजवानों, तालीमयाफ़्ता भाइयों, कारोबारियों और सामाजिक तौर पर सरगर्म अफ़राद को मुल्तानी समाज चैरिटेबल ट्रस्ट के साथ जुड़ने की पुरख़ुलूस दावत देता हूँ।

हमारा मक़सद किसी दूसरी तंजीम को कमतर दिखाना या किसी के काम में रुकावट पैदा करना हरगिज़ नहीं है।

हम तमाम तंजीमों, उनके ज़िम्मेदारों और बिरादरी के लिए ख़िदमत अंजाम देने वाले हर शख़्स का एहतराम करते हैं।

हमारी कोशिश यह है कि बिरादरी की तालीम, डिजिटल बेदारी, सामाजिक इत्तेहाद, कारोबार, रोज़गार और नई नस्लों के मुस्तक़बिल के लिए एक ऐसा मुनज़्ज़म प्लेटफ़ॉर्म तैयार किया जाए जिसमें हर शहर, हर क़स्बे और हर इलाक़े के नौजवान को अपनी सलाहियत के मुताबिक़ ख़िदमत का मौक़ा मिले।

हम आपको कोई बड़ा ओहदा देने का वादा नहीं कर रहे।

हम आपको एक बड़ा मक़सद दे रहे हैं।

हम आपको किसी चौधराहट की दावत नहीं दे रहे।

हम आपको अपनी बिरादरी की ख़िदमत की दावत दे रहे हैं।

सिर्फ़ 6 महीने दीजिए, एक नई सामाजिक तहरीक की बुनियाद रखिए!

मेरी अपने नौजवान साथियों से पुरख़ुलूस गुज़ारिश है कि आप सिर्फ़ 6 महीने तक रोज़ाना 10 से 15 मिनट बिरादरी की डिजिटल बेदारी और तरक़्क़ी के लिए देने का इरादा कीजिए।

हमारी कोशिश होगी कि इस दौरान एक मुनज़्ज़म डिजिटल नेटवर्क तैयार किया जाए, शहरों और ज़िलों के नौजवानों को जोड़ा जाए, तालीम और रोज़गार की मालूमात पहुँचाई जाए और बिरादरी के अच्छे कामों को क़ौमी सतह पर पहचान दिलाई जाए।

छह महीने में कितना बदलाव आएगा, यह हमारे सबके इत्तेहाद, मेहनत और अमल पर निर्भर करेगा। लेकिन अगर हम आज से शुरुआत करें तो आने वाले वक़्त में एक मज़बूत बुनियाद ज़रूर रख सकते हैं।

याद रखिए, तारीख़ें ओहदे हासिल करने वालों को नहीं, बल्कि अपनी क़ौम और समाज के लिए अमली ख़िदमत करने वालों को याद रखती है।

आज ही आगे आइए, अपनी बिरादरी की तरक़्क़ी में हिस्सा लीजिए!

अगर आप मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी से ताल्लुक़ रखते हैं और अपनी बिरादरी के लिए कुछ करने का जज़्बा रखते हैं तो आज ही नीचे दिए गए नंबरों पर कॉल या व्हाट्सऐप पैग़ाम भेजकर अपना नाम और अपने शहर का नाम लिखकर भेजें।

हमारी टीम आपसे राब्ता क़ायम करेगी और आपको तफ़सील से समझाएगी कि आप घर बैठे अपने मोबाइल के ज़रिए इस सामाजिक मुहिम का हिस्सा कैसे बन सकते हैं।

हमें ऐसे नौजवान चाहिए जो सिर्फ़ बातें न करें, बल्कि अमल करके दिखाएँ।

हमें ऐसे कारोबारी चाहिए जो अपनी कामयाबी के साथ बिरादरी के दूसरे नौजवानों के लिए भी रास्ते खोलें।

हमें ऐसे तालीमयाफ़्ता अफ़राद चाहिए जो अपने इल्म और सलाहियत से दूसरों की रहनुमाई करें।

और हमें ऐसे ज़िम्मेदार बुज़ुर्ग चाहिए जो अपनी दुआओं, मशवरों और तजुर्बे से इस मुहिम को मज़बूत बनाएँ।

आइए! मिलकर अपनी बिरादरी को तालीमयाफ़्ता, बा-शऊर, ख़ुशहाल और डिजिटल तौर पर मज़बूत बनाने का अहद करें।

क्योंकि बिरादरी की तरक़्क़ी किसी एक शख़्स की ज़िम्मेदारी नहीं, बल्कि हम सबकी मुश्तरका ज़िम्मेदारी है।


हमारी पहचान, हमारा मिशन और हमारा पैग़ाम

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार से पंजीकृत, मुल्क की राजधानी नई दिल्ली से प्रकाशित एवं प्रसारित, पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी की क़ौमी समाचार पत्रिका, न्यूज़ पोर्टल और यूट्यूब चैनल — "मुल्तानी समाज"।

उत्तर प्रदेश डेस्क से प्रधान संपादक ज़मीर आलम की ख़ास रिपोर्ट।

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"मुल्तानी समाज"

अपनी बिरादरी की आवाज़, अपनी पहचान।

आपका ज़मीर आलम
प्रधान - संपादक
मुल्तानी समाज
राष्ट्रीय समाचार पत्रिका

Sunday, November 1, 2026

हेलीकॉप्टर से बारात लेकर पहुंचे रिहान मुल्तानी, माहिन मुल्तानी के निकाह ने बागपत से दिल्ली तक बिखेरी शाही शान; मुस्लिम मुल्तानी लोहार, बढ़ई बिरादरी में यादगार बना यह निकाह

बागपत। खुशियों के नग़्मे, रिश्तों की मिठास, अपनों की मोहब्बत और एक यादगार निकाह की शानदार तस्वीरों ने 01 नवंबर 2026, दिन इतवार को बागपत की सरज़मीं पर ऐसा समां बांधा कि यह दिन मुस्लिम मुल्तानी लोहार, बढ़ई बिरादरी के लिए लंबे अरसे तक याद रखा जाएगा।

मोहम्मद अखलाक साहब वल्द जनाब मोहम्मद इस्माईल साहब, निवासी बाग्गू वाले, जिला बागपत, उत्तर प्रदेश की नेक और सालेहा दुख़्तर माहिन मुल्तानी के निकाह की खुशियां उस वक्त और भी यादगार बन गईं, जब सलीम मुल्तानी साहब वल्द मरहूम मोहम्मद लतीफ़ मुल्तानी, रेलवे ठेकेदार, गांव बाजिदपुर वाले तथा हाल निवासी स्वरूप नगर, दिल्ली, अपने फरज़ंद रिहान मुल्तानी की बारात लेकर हेलीकॉप्टर के ज़रिये बसंत गार्डन, गौरीपुर, बागपत पहुंचे।

दूल्हे मियां की हेलीकॉप्टर से आमद ने शादी के इस मुबारक मौके को एक अलग ही शान और रौनक अता कर दी। बारात की आमद की खबर सुनकर न केवल बागपत बल्कि आसपास के इलाकों से भी बड़ी तादाद में लोग अपने खानदान और परिवार के साथ इस यादगार लम्हे का गवाह बनने पहुंचे।

हेलीकॉप्टर की आमद बनी हर किसी की तवज्जो का मरकज़

इस शानदार शादी की सबसे दिलचस्प बात यह रही कि शादी में शरीक होने के लिए मर्दों के साथ-साथ महिलाओं और बच्चों में भी ग़ैरमामूली जोश और उत्सुकता देखने को मिली। खास तौर पर महिलाओं में हेलीकॉप्टर से आने वाली बारात को देखने और इस ऐतिहासिक लम्हे को अपने मोबाइल कैमरों में महफूज़ करने का खासा शौक दिखाई दिया।

कोई हेलीकॉप्टर की आमद का नज़ारा अपने कैमरे में कैद कर रहा था, तो कोई दूल्हा मियां के साथ तस्वीरें खिंचवाकर इस खुशी को यादगार बनाने में मशगूल था। बच्चे भी इस अनोखे नज़ारे को देखने के लिए खासे पुरजोश दिखाई दिए।

शादी के हर लम्हे में खुशियों की चमक, अपनों का प्यार और मेहमानों की रौनक साफ़ नज़र आ रही थी। यूं महसूस हो रहा था कि जैसे पूरा माहौल एक यादगार जश्न में तब्दील हो गया हो।

दुल्हन के चाचा और ताऊ की खुशियों का नहीं रहा ठिकाना

अपनी भतीजी माहिन मुल्तानी की इस शानदार शादी पर दुल्हन के ताऊ मोहम्मद इरफ़ान मुल्तानी साहब तथा चाचा रिजवान मुल्तानी और शाहनवाज मुल्तानी साहब की खुशियां देखते ही बन रही थीं। अपने परिवार की इस खुशी और शानदार आयोजन को देखकर तमाम अहले-खानदान के चेहरों पर मुस्कुराहट और दिलों में खुशी की लहर दिखाई दी।

बेशक, शादी-ब्याह तो हर खानदान में होते हैं, मगर कुछ आयोजन अपनी अनूठी खासियत, शानदार इंतज़ाम और यादगार लम्हों की वजह से लोगों के दिलों में हमेशा के लिए जगह बना लेते हैं। रिहान मुल्तानी और माहिन मुल्तानी का यह निकाह भी उन्हीं यादगार आयोजनों में शामिल हो गया।

बिरादरी के लिए यादगार बना 01 नवंबर 2026

पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार, बढ़ई बिरादरी के लिए 01 नवंबर 2026 का यह दिन एक यादगार तारीख़ बन गया। बागपत की सरज़मीं पर हेलीकॉप्टर से बारात की आमद ने इस निकाह को न केवल स्थानीय स्तर पर बल्कि बिरादरी के बीच भी चर्चा का मौज़ू बना दिया।

इस शादी की चर्चा हर तरफ सुनाई दी। लोगों ने अपने-अपने अंदाज़ में इस शानदार आयोजन की तारीफ़ की और इस खुशी के मौके को अपने लिए भी एक यादगार अनुभव बताया।

मगर इस पूरे आयोजन की असल खूबसूरती सिर्फ़ शानो-शौकत नहीं, बल्कि दो खानदानों का आपसी रिश्ता, मोहब्बत, अपनापन और एक नए सफ़र की शुरुआत है। आखिरकार निकाह इस्लाम में एक पाकीज़ा रिश्ता और दो परिवारों के बीच मोहब्बत व जिम्मेदारियों का खूबसूरत अहद है।

दूल्हा-दुल्हन के लिए बिरादरी की तरफ़ से ख़ास दुआएं

इस मुबारक मौके पर "मुल्तानी समाज" राष्ट्रीय समाचार पत्रिका, मुल्तानी समाज चैरिटेबल ट्रस्ट और पूरी मुस्लिम मुल्तानी लोहार, बढ़ई बिरादरी की जानिब से नवनिकाहिता जोड़ी रिहान मुल्तानी और माहिन मुल्तानी को दिली मुबारकबाद और ढेरों नेक ख्वाहिशात पेश की जाती हैं।

अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त से दुआ है कि इस नए जोड़े की जिंदगी को हमेशा खुशियों, मोहब्बत, सुकून, रहमत और बरकतों से भर दे। दोनों के दरमियान हमेशा इत्तेहाद, एक-दूसरे का एहतराम, वफ़ादारी और बेपनाह मोहब्बत कायम रहे।

अल्लाह तआला दोनों को एक-दूसरे के लिए आंखों की ठंडक बनाए, हर मुश्किल में एक-दूसरे का सहारा बनाए, हलाल रिज़्क़ में बरकत अता फरमाए और नेक व सालेह औलाद से नवाज़े।

اللَّهُمَّ بَارِكْ لَهُمَا وَبَارِكْ عَلَيْهِمَا وَاجْمَعْ بَيْنَهُمَا فِي خَيْرٍ

तर्जुमा: ऐ अल्लाह! इन दोनों के लिए बरकत अता फरमा, इन पर अपनी बरकतें नाज़िल फरमा और इन्हें भलाई के साथ हमेशा एक-दूसरे के साथ रख।

आमीन या रब्बुल आलमीन!

03 नवंबर को दिल्ली में होगा दावत-ए-वलीमा

रिहान मुल्तानी और माहिन मुल्तानी के निकाह के बाद अब इस खुशी के मौके पर दावत-ए-वलीमा का शानदार प्रोग्राम बाकी है, जो दिन मंगल, बा-तारीख़ 03 नवंबर 2026 को ब्रिस्टल फॉर्म, बकौली विलेज, बख्तावरपुर रोड, अलीपुर, दिल्ली में मुनअक़िद होगा।

उम्मीद है कि इस मुबारक तक़रीब में भी बिरादरी की जानी-मानी शख्सियात, सामाजिक और कारोबारी हस्तियां, वीआईपी एवं वीवीआईपी मेहमानों के साथ दोनों खानदानों के अज़ीज़ो-अक़ारिब बड़ी तादाद में शिरकत करेंगे और नवनिकाहिता जोड़ी को अपनी दुआओं से नवाज़ेंगे।

"मुल्तानी समाज" की ख़ास कोशिश — यादगार लम्हों को बिरादरी तक पहुंचाना

"मुल्तानी समाज" राष्ट्रीय समाचार पत्रिका की कोशिश रहेगी कि इस शानदार निकाह और दावत-ए-वलीमा में शरीक रहने वाली अहम शख्सियात, वीआईपी एवं वीवीआईपी मेहमानों, दूल्हा-दुल्हन के वालिदैन, ताऊ, चाचा, रिश्तेदारों, अज़ीज़ो-अक़ारिब और दोनों खानदानों से अपने पाठकों को रूबरू कराया जाए।

यदि मोहम्मद अखलाक साहब और सलीम मुल्तानी साहब की जानिब से "मुल्तानी समाज" राष्ट्रीय समाचार पत्रिका को इस यादगार शादी के बाकी लम्हों और वलीमे की कवरेज के लिए दावत दी जाती है, तो हमारी कोशिश होगी कि इस खुशी के मौके की खास तस्वीरें और अहम जानकारियां बिरादरी तक पहुंचाई जाएं, ताकि आने वाली नस्लें भी इस यादगार आयोजन के बारे में जान सकें।

आखिर में एक बार फिर रिहान मुल्तानी और माहिन मुल्तानी को दिली मुबारकबाद। अल्लाह पाक आपके नए सफ़र को खुशहाल बनाए और दोनों खानदानों के दरमियान मोहब्बत, इज़्ज़त और रिश्तों की मिठास हमेशा कायम रखे।


प्रसारित: उत्तर प्रदेश डेस्क

ज़मीर आलम प्रधान संपादक

"मुल्तानी समाज" राष्ट्रीय समाचार पत्रिका | न्यूज़ पोर्टल | यूट्यूब चैनल

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार से पंजीकृत। मुल्क की राजधानी नई दिल्ली से प्रसारित।

पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी की मुल्क की इकलौती क़ौमी समाचार पत्रिका।

अपनी बिरादरी की आवाज़ को क़ौमी पहचान दिलाएं

अगर आप भी अपनी ख़बर, मज़मून (आर्टिकल), पैग़ाम, मुबारकबाद, ताज़ियती इश्तिहार, दिलचस्प वाक़ियात, तहरीर, अफ़साना (कहानी) या अपने कारोबार का इश्तिहार (विज्ञापन) क़ौमी सतह पर शाया या प्रसारित करवाना चाहते हैं, तो बराए मेहरबानी नीचे दिए गए नंबरों पर राब्ता फ़रमाएं।

📞 9410652990 📞 8010884848

आपका एतमाद ही हमारी सबसे बड़ी ताक़त है।

"मुल्तानी समाज" — अपनी बिरादरी की आवाज़, अपनी पहचान।

आसमान की बुलंदियों से उतरा दूल्हा रिहान मुल्तानी का शाही अंदाज़! हेलीकॉप्टर से दुल्हन माहिन को लेने बागपत पहुंची बारात, आसमान से ज़मीन तक बना चर्चा का विषय

दिल्ली से उड़ान भरकर गौरीपुर पहुंचे रिहान मुल्तानी, हेलीकॉप्टर में अपनी शरीके हयात माहिन मुल्तानी को लेकर हुए विदा | स्कॉर्पियो और ऑडी कारों के काफ़िले के साथ पहुंची बारात, मुल्तानी बिरादरी में शादी की धूम

बागपत, उत्तर प्रदेश।

किसी ने सच ही कहा है कि जब ख़ुशियों के अरमान बुलंद हों तो आसमान भी रास्ता दे देता है। कहीं शहनाइयों की गूंज थी, कहीं फूलों की ख़ुशबू और कहीं अपनों की मोहब्बत से सजा ख़ुशनुमा माहौल। लेकिन इस बार शादी का अंदाज़ कुछ ऐसा निराला रहा कि आसमान से लेकर ज़मीन तक हर तरफ़ इसी बारात के चर्चे होने लगे।

जी हां! हम बात कर रहे हैं उत्तर प्रदेश के जनपद बागपत की, जहां दिन इतवार, बा-तारीख़ 01 नवंबर 2026 को रिहान मुल्तानी अपनी शरीके हयात माहिन मुल्तानी को लेने किसी आम बाराती की तरह नहीं, बल्कि दिल्ली से हेलीकॉप्टर से उड़ान भरकर पहुंचे। आसमान की ऊंचाइयों से अपने महबूब रिश्ते की नई मंज़िल की ओर बढ़ते दूल्हे का यह अंदाज़ शादी समारोह का सबसे दिलचस्प और यादगार लम्हा बन गया।

मिली जानकारी के मुताबिक, जनाब सलीम मुल्तानी वल्द जनाब मोहम्मद लतीफ़ मुल्तानी साहब (मरहूम), निवासी ग्राम वाजिदपुर, तहसील बड़ौत, जिला बागपत, उत्तर प्रदेश एवं हाल निवासी स्वरूप नगर, दिल्ली के फ़रज़ंद रिहान मुल्तानी की शादी माहिन मुल्तानी वल्द मोहम्मद अखलाक साहब निवासी बागुवाला जिला बागपत उत्तर प्रदेश के साथ तय हुई।

इस ख़ुशनुमा मौक़े पर दूल्हे रिहान मुल्तानी और उनकी फैमिली ने बारात के सफ़र को यादगार बनाने के लिए हेलीकॉप्टर का इंतज़ाम किया। दिन के तक़रीबन 12 बजे स्वरूप नगर, दिल्ली से हेलीकॉप्टर ने गौरीपुर, जनपद बागपत के लिए उड़ान भरी और महज़ आधे घंटे के सफ़र के बाद दोपहर 12:30 बजे गौरीपुर बैंक्वेट हॉल में शानदार अंदाज़ से आमद हुई।

उधर, बारातियों का क़ाफ़िला भी किसी शाही जुलूस से कम नहीं था। तक़रीबन 200 बाराती स्कॉर्पियो और ऑडी जैसी शानदार गाड़ियों के ज़रिए बारात लेकर बसंत गार्डन, गौरीपुर, बागपत पहुंचे। एक तरफ़ आसमान में हेलीकॉप्टर की आमद और दूसरी तरफ़ ज़मीन पर गाड़ियों का शानदार क़ाफ़िला, इस नज़ारे ने शादी की रौनक़ में चार चांद लगा दिए।

आसमान से आई बारात, हेलीकॉप्टर में हुई दुल्हन की विदाई!

इस पूरे आयोजन का सबसे ख़ास और दिल को छू लेने वाला लम्हा उस वक़्त आया, जब अपनी शरीके हयात माहिन मुल्तानी को साथ लेकर रिहान मुल्तानी ने हेलीकॉप्टर से विदाई की तैयारी की।

दोपहर ठीक 3 बजकर 20 मिनट पर हेलीकॉप्टर ने गौरीपुर से दिल्ली की वापसी की उड़ान भरी और 3 बजकर 50 मिनट पर रिहान मुल्तानी अपनी दुल्हन माहिन मुल्तानी के साथ अपने घर दिल्ली पहुंच गए।

यह सिर्फ़ एक हवाई सफ़र नहीं, बल्कि दो परिवारों की ख़ुशियों, मोहब्बत और नए रिश्ते की शुरुआत का एक ऐसा यादगार लम्हा था, जिसकी यादें लंबे अरसे तक दोनों परिवारों और इस शादी में शरीक होने वाले मेहमानों के दिलों में महफ़ूज़ रहेंगी।

अब 03 नवंबर को दिल्ली में सजेगी वलीमे की महफ़िल!

इस यादगार शादी के बाद अब अगला ख़ास मौक़ा वलीमे की दावत का है। दिन मंगल, बा-तारीख़ 03 नवंबर 2026 को ब्रिस्टल फार्म, बकौली गाँव, बख़्तावरपुर रोड, अलीपुर, दिल्ली-110036 पर वलीमे की शानदार दावत का एहतिमाम किया जाएगा।

आज किसी वजह से इस आलीशान शादी में शरीक न हो पाने वाले कई मेहमानों के बीच भी इस बारात की ख़ूब चर्चा हो रही है। शादी के इस दिलचस्प अंदाज़ के चर्चे सुनकर अब मेहमान वलीमे की दावत में शिरकत करने के लिए बेहद पुरजोश नज़र आ रहे हैं।

दूल्हा-दुल्हन के लिए ख़ास दुआएं

मुल्तानी समाज राष्ट्रीय समाचार पत्रिका की पूरी टीम की जानिब से दूल्हा रिहान मुल्तानी और दुल्हन माहिन मुल्तानी को शादी की दिली मुबारकबाद।

अल्लाह तआला इस नए रिश्ते को हमेशा सलामत रखे, दोनों के दरमियान मोहब्बत, उल्फ़त, इज़्ज़त और वफ़ा क़ायम रखे। ज़िंदगी का हर आने वाला दिन ख़ुशियों से रोशन हो, हर क़दम पर कामयाबी मिले और दोनों परिवारों में हमेशा रहमतों और बरकतों का नुज़ूल होता रहे।

माशाअल्लाह! अल्लाह इस ख़ूबसूरत जोड़ी को हर बुरी नज़र, हसद और बला से महफ़ूज़ रखे। किसी की नज़र न लगे। दोनों का साथ उम्रभर बना रहे और यह जोड़ी हमेशा आबाद रहे। आमीन या रब्बुल आलमीन!


सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार से पंजीकृत, मुल्क की राजधानी नई दिल्ली से प्रसारित, पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी की मुल्क की इकलौती क़ौमी समाचार पत्रिका, न्यूज़ पोर्टल एवं यूट्यूब चैनल 'मुल्तानी समाज' के लिए उत्तर प्रदेश डेस्क से प्रधान संपादक ज़मीर आलम की ख़ास रिपोर्ट।

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मुल्तानी बिरादरी के इतिहास में दर्ज हुआ एक यादगार लम्हा! पहली बार हेलीकॉप्टर से गौरीपुर पहुंची बारात, रिहान मुल्तानी की शादी ने बढ़ाया पूरी बिरादरी का फ़ख्र

आसमान की बुलंदियों को छूती ख़ुशियों ने ज़मीन पर रचा इतिहास... सलीम मुल्तानी के फ़रज़ंद रिहान मुल्तानी हेलीकॉप्टर से पहुंचे अपनी शरीके हयात माहिन मुल्तानी को लेने | मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी के लिए गौरव, ख़ुशी और यादगार लम्हों से भरा रहा यह ख़ास दिन।

गौरीपुर, बागपत (उत्तर प्रदेश)।

कुछ लम्हे महज़ किसी एक ख़ानदान की ख़ुशियों तक महदूद नहीं रहते, बल्कि अपनी ख़ास अहमियत और अनोखे अंदाज़ की वजह से पूरी बिरादरी के लिए यादगार बन जाते हैं। कुछ वाक़ियात ऐसे होते हैं, जिनका ज़िक्र आने वाली नस्लें भी बड़े फ़ख्र और ख़ुशी के साथ करती हैं। ऐसा ही एक ख़ुशनुमा और यादगार मौक़ा दिन इतवार, बा-तारीख़ 01 नवंबर 2026 को पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी के सामने आया, जब बिरादरी के एक ख़ानदान की शादी ने अपनी अनोखी आमद के ज़रिए एक नया इतिहास रच दिया।

मौक़ा था जनाब सलीम मुल्तानी साहब (रेलवे ठेकेदार), वल्द जनाब मोहम्मद लतीफ़ मुल्तानी साहब (मरहूम), निवासी ग्राम बाजिदपुर, जिला बागपत, उत्तर प्रदेश एवं हाल बाशिंदे स्वरूप नगर, दिल्ली के फ़रज़ंद रिहान मुल्तानी की शादी का। रिहान मुल्तानी का निकाह जनाब इख़लाक़ मुल्तानी वल्द हाजी इस्लाम मुल्तानी निवासी ग्राम बाघूवाला, जनपद बागपत, उत्तर प्रदेश की नेक दुख़्तर माहिन मुल्तानी के साथ तय हुआ।

इस ख़ुशनसीब रिश्ते की ख़ुशी को यादगार बनाने के लिए दूल्हे रिहान मुल्तानी की बारात ने ऐसा अनोखा अंदाज़ इख़्तियार किया, जिसने शादी की रौनक़ को एक नई पहचान दे दी। दिल्ली से बागपत तक का सफ़र सड़क के बजाय आसमान के रास्ते तय करते हुए दूल्हा रिहान मुल्तानी हेलीकॉप्टर से अपनी बारात लेकर गौरीपुर, जनपद बागपत पहुंचा।

आसमान से उतरी ख़ुशियों की बारात, बिरादरी ने देखा अनोखा नज़ारा!

हेलीकॉप्टर की आमद ने शादी समारोह को एक अलग ही रंग दे दिया। आसमान में उड़ते हेलीकॉप्टर की गूंज और उसके गौरीपुर पहुंचने का नज़ारा वहां मौजूद लोगों के लिए बेहद दिलचस्प और यादगार रहा।

जहां आम तौर पर बारातें घोड़ियों, सजी-धजी गाड़ियों और गाजे-बाजे के साथ पहुंचती हैं, वहीं इस बार रिहान मुल्तानी की बारात ने हवाई सफ़र के ज़रिए अपनी आमद दर्ज कराई।

यह नज़ारा सिर्फ़ एक शादी की रौनक़ नहीं था, बल्कि बिरादरी के लोगों के लिए भी ख़ुशी और फ़ख्र का सबब बना। लोगों ने इस अनोखे आयोजन को देखा, तस्वीरों और यादों में महफ़ूज़ किया और नए जोड़े के लिए अपनी मुबारकबाद और नेक ख़्वाहिशात पेश कीं।

एक ख़ानदान की ख़ुशी, पूरी बिरादरी का फ़ख्र!

पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी के लिए यह मौक़ा इसलिए भी ख़ास अहमियत रखता है कि बिरादरी के इतिहास में पहली बार हेलीकॉप्टर से बारात के गौरीपुर पहुंचने का यह यादगार वाक़िया सामने आया है।

बिरादरी की पहचान सिर्फ़ उसके शानदार अतीत, मेहनत, हुनर और पेशेवर महारत से ही नहीं, बल्कि उसके लोगों की कामयाबी, तरक़्क़ी, ख़ुशहाली और आपसी मोहब्बत से भी बनती है।

जब बिरादरी का कोई परिवार अपनी ज़िंदगी के किसी ख़ास मौक़े को इस तरह यादगार बनाता है, तो उसकी ख़ुशी में शामिल होना और नए जोड़े को दुआओं से नवाज़ना पूरे समाज की तहज़ीब और आपसी रिश्तों की ख़ूबसूरती को बयान करता है।

आज रिहान और माहिन की शादी का यह अनोखा अंदाज़ यक़ीनन बिरादरी के लोगों के लिए एक ऐसी याद बन गया है, जिसका ज़िक्र लंबे अरसे तक मोहब्बत और मुस्कुराहट के साथ किया जाएगा।

'मुल्तानी समाज' की जानिब से दूल्हा-दुल्हन को दिली मुबारकबाद और ख़ास दुआएं

इस पुरमसर्रत मौक़े पर 'मुल्तानी समाज' राष्ट्रीय समाचार पत्रिका, न्यूज़ पोर्टल एवं यूट्यूब चैनल की पूरी टीम की जानिब से दूल्हा रिहान मुल्तानी और दुल्हन माहिन मुल्तानी को शादी की दिली मुबारकबाद पेश की जाती है।

अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त से ख़ास दुआ है कि वह इस नए रिश्ते को हमेशा अपनी रहमतों के साये में रखे। दोनों के दरमियान मोहब्बत, वफ़ादारी, एहतराम और हमदर्दी को हमेशा क़ायम रखे। इनके घर को सुकून, ख़ुशियों, रिज़्क़ और बरकतों से आबाद फ़रमाए।

अल्लाह तआला दोनों को एक-दूसरे के लिए ज़िंदगी का बेहतरीन हमसफ़र बनाए। हर मुश्किल में एक-दूसरे का सहारा बनने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए और इनके वालिदैन व तमाम अहले ख़ानदान को इस रिश्ते की ख़ुशियां उम्रभर नसीब फ़रमाए।

माशाअल्लाह! न किसी की नज़र लगे, न किसी की हसद का असर हो। यह जोड़ी हमेशा सलामत रहे, इनके आंगन में ख़ुशियों के फूल खिलते रहें और इनके दरमियान मोहब्बत का रिश्ता उम्रभर मज़बूत बना रहे।

आमीन या रब्बुल आलमीन!


बिरादरी की आवाज़, बिरादरी की पहचान — मुल्तानी समाज

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार से पंजीकृत, मुल्क की राजधानी नई दिल्ली से प्रसारित, पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी की मुल्क की इकलौती क़ौमी समाचार पत्रिका, न्यूज़ पोर्टल एवं यूट्यूब चैनल 'मुल्तानी समाज' के लिए उत्तर प्रदेश डेस्क से प्रधान संपादक ज़मीर आलम की ख़ास रिपोर्ट।

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बिरादरी की ख़िदमत या शादियों की दावत? 25, 28 और 30 साल की समाजसेवा का अनोखा हिसाब-किताब! जनाज़े में ग़ायब, दावत में पूरी मंडली के साथ हाज़िर!

ख़ास रिपोर्ट | मुल्तानी समाज | उत्तर प्रदेश डेस्क

बिरादरी की ख़िदमत का दावा करना बहुत आसान है, लेकिन हक़ीक़त में बिरादरी के काम आना हर किसी के बस की बात नहीं। आजकल पश्चिमी उत्तर प्रदेश की एक तंजीम और उससे जुड़े कुछ लोगों की चर्चाएं बिरादरी के कस्बों, शहरों और गांवों में ख़ूब गर्म हैं। कहीं चाय की महफ़िल में इनका ज़िक्र है तो कहीं सोशल मीडिया के गलियारों में इनकी सरगर्मियों पर तब्सिरा हो रहा है।

बिरादरी के कुछ हज़रात तो अपनी ख़िदमत का ऐसा शानदार तआरुफ़ कराते फिरते हैं कि सुनने वाला भी सोच में पड़ जाए। कोई फ़रमाते हैं कि हमें बिरादरी की ख़िदमत करते हुए 25 साल हो गए, कोई 28 साल का तजुर्बा बताते हैं, तो कोई पूरे 30 साल की ख़िदमत का दावा पेश करते हैं। कुछ तो ऐसे भी हैं जिनकी ज़ुबानी दास्तान सुनें तो ऐसा महसूस होता है कि इनकी पैदाइश ही बिरादरी की ख़िदमत के लिए हुई थी!

मगर जनाब, सवाल यह है कि इतनी लंबी ख़िदमत का आख़िर हासिल क्या है? बिरादरी के लिए कौन से नुमायां काम किए गए, जिनका फ़ायदा आम लोगों तक पहुंचा? कितने ज़रूरतमंद परिवारों की मदद हुई? कितने ग़रीब बच्चों की तालीम का इंतज़ाम हुआ? कितने परेशानहाल घरों के दुख-दर्द में शरीक हुए? और कितने ऐसे काम हुए जिनसे बिरादरी की तालीम, तरक़्क़ी और इत्तेहाद को मज़बूती मिली?

आइए, आज इन दावों के साथ-साथ बिरादरी की ख़िदमत के एक ऐसे दिलचस्प और अनोखे तरीक़े पर भी गुफ़्तगू कर लेते हैं, जो इन दिनों ख़ास तौर पर चर्चा का मौज़ू बना हुआ है।

दावत में पूरी मंडली, मगर जनाज़े में ख़ामोशी!

बिरादरी में पिछले कुछ अरसे से एक ऐसा ख़ास गिरोह काफ़ी सरगर्म नज़र आ रहा है, जिसकी सरगर्मियों का अपना ही एक अलग अंदाज़ है। इस गिरोह का सबसे पसंदीदा मैदान किसी सामाजिक समस्या का हल निकालना, ग़रीब की मदद करना या बिरादरी के किसी ज़रूरतमंद परिवार के काम आना नहीं, बल्कि शादी-ब्याह, सगाई, रिंग सेरेमनी और दूसरी ख़ुशी की तक़रीबें बताई जाती हैं।

किसी रईसज़ादे के यहां शादी हो, किसी रसूख़दार के यहां सगाई हो या किसी बड़े कारोबारी के घर कोई ख़ुशी का मौक़ा हो, बस फिर क्या है! ख़बर मिलते ही पूरी मंडली की सरगर्मियां तेज़ हो जाती हैं। कोई गाड़ी का इंतज़ाम करता है, कोई साथियों को फ़ोन मिलाता है और देखते ही देखते पूरी टीम मैदान में उतरने के लिए तैयार हो जाती है।

दूरी चाहे 50 किलोमीटर हो या 200 किलोमीटर, दिन हो या रात, मौसम कैसा भी हो, इन ख़िदमतगारों के हौसले पस्त नहीं होते। आख़िर मामला बिरादरी की ख़िदमत का जो ठहरा!

लेकिन अफ़सोस का मुक़ाम यह है कि अगर बिरादरी के किसी आम या ग़रीब परिवार में किसी की वफ़ात हो जाए, किसी घर में मातम हो, किसी को तसल्ली और दिलासे की ज़रूरत हो, तो यही सरगर्म मंडली अक्सर नज़र नहीं आती।

पूछा जाए तो जवाब भी कम दिलचस्प नहीं मिलता— ''यार, उस दिन तो हमारी तबीयत बहुत ख़राब थी!''

अब सवाल यह है कि आख़िर इनकी तबीयत सिर्फ़ ग़म के मौक़े पर ही क्यों नासाज़ होती है? क्या ख़ुशी की दावतों में पहुंचते ही सेहत अपने आप दुरुस्त हो जाती है?

दावत में शिरकत का नाम रखा गया 'बिरादरी की मीटिंग'!

इस पूरी कहानी का सबसे दिलचस्प पहलू तो इनकी सोशल मीडिया की कारगुज़ारी है।

शादी-ब्याह की तक़रीब में पूरी मंडली एक जगह जमा होती है। कभी कुर्सियों पर इस अंदाज़ से क़ब्ज़ा जमाया जाता है जैसे किसी अहम सरकारी मीटिंग का आयोजन हो रहा हो, तो कभी सभी हज़रात एक साथ खड़े होकर ग्रुप फ़ोटो खिंचवाते नज़र आते हैं।

इसके बाद शुरू होता है असल खेल!

फ़ोटो व्हाट्सएप ग्रुपों में पहुंचती है, फेसबुक पर पोस्ट होती है और कैप्शन में बड़े एहतमाम के साथ लिखा जाता है—

''आज बिरादरी की अहम मीटिंग करते हुए!''

अब बेचारे आम बिरादरी वाले भी सोच में पड़ जाते हैं कि आख़िर यह कैसी मीटिंग थी, जिसमें न कोई एजेंडा दिखाई दिया, न कोई प्रस्ताव, न किसी सामाजिक मसले का हल निकला। बस सामने दस्तरख़्वान सजा था, कुर्सियां लगी थीं और कैमरे के सामने चेहरे मुस्कुरा रहे थे!

जनाब, अगर शादी की दावत में शिरकत करना ही बिरादरी की मीटिंग है तो फिर बिरादरी के हर शादीशुदा घर को एक तंजीम का दफ़्तर घोषित कर देना चाहिए!

फ़ोटोशूट का शौक़ है तो ख़िदमत का जज़्बा भी दिखाइए!

हमारा मक़सद किसी को शादी-ब्याह या ख़ुशी की तक़रीब में शामिल होने से रोकना नहीं है। बेशक जाइए, ख़ुशियों में शरीक होइए, तस्वीरें खिंचवाइए और उन लम्हों को यादगार बनाइए। मगर एक गुज़ारिश ज़रूर है कि फ़ोटोशूट के शौक़ में उस परिवार और दूसरे मेहमानों की सहूलियत को नज़रअंदाज़ मत कीजिए, जिनकी ख़ुशी में आप शरीक होने पहुंचे हैं।

किसी आयोजन में ग्रुप फ़ोटो खिंचवाना बुरी बात नहीं, लेकिन क्या कभी आपने सोचा कि आपके लंबे फ़ोटो सेशन और कुर्सियों पर लगातार बैठे रहने से शादी वाले घर के लोगों को कितनी परेशानी होती होगी? दूसरे मेहमान अपनी बारी का इंतज़ार कर रहे होते हैं, बुज़ुर्गों को बैठने के लिए जगह नहीं मिलती और घर के ज़िम्मेदार लोग मेहमानों की ख़िदमत में परेशान होते रहते हैं।

अगर आप वाक़ई बिरादरी के ख़िदमतगार हैं तो शादी-ब्याह में अपनी ख़िदमत का अमली नमूना भी पेश कीजिए।

  • मेहमानों को इज़्ज़त और मोहब्बत के साथ बैठाइए।
  • उन्हें खाना खिलाने में मदद कीजिए।
  • पानी और दूसरे व्यंजन मेहमानों तक पहुंचाइए।
  • जिन मेहमानों को खाने के स्टॉल तक पहुंचने में परेशानी हो, उनके पास खाना पहुंचाइए।
  • शादी के घर में मौजूद बड़े बुज़ुर्गों और माज़ूर (दिव्यांग) लोगों का ख़ास ख़्याल रखिए।
  • बुज़ुर्गों को आरामदायक कुर्सियों पर बैठाकर खाना खिलाइए।
  • किसी मेहमान को पानी या किसी दूसरी चीज़ की ज़रूरत हो तो ख़ुद आगे बढ़कर पूछिए।
  • मेज़बान परिवार पर काम का बोझ हो तो उनकी मदद कीजिए।

और हां, इन सब ख़िदमतों के दौरान अगर आपकी तस्वीरें भी खिंच जाएं तो क्या ही अच्छी बात है!

लेकिन सोशल मीडिया पर उन तस्वीरों का कैप्शन ''बिरादरी की मीटिंग'' लिखने के बजाय ''मेहमानों की ख़िदमत करते हुए'' या ''बुज़ुर्गों और ज़रूरतमंद मेहमानों की ख़िदमत का एक छोटा सा प्रयास'' लिखिए।

यक़ीन मानिए, आपकी ऐसी तस्वीरें नौजवानों को कहीं ज़्यादा बेहतर पैग़ाम देंगी। उन्हें मालूम होगा कि असल ख़िदमत किसे कहते हैं और बिरादरी की समाजसेवा का अमली तरीक़ा क्या होता है।

क्योंकि कुर्सियों पर बैठकर फ़ोटो खिंचवाने से ज़्यादा इज़्ज़त उस वक़्त मिलती है जब आप किसी बुज़ुर्ग को कुर्सी पर बैठाकर खाना खिलाते हैं!

रईसों के साथ तस्वीरें और आम लोगों पर रसूख़ का रोब!

इस मंडली की एक और दिलचस्प रवायत यह बताई जाती है कि किसी बड़े कारोबारी, दौलतमंद या रसूख़दार शख़्स के साथ तस्वीर खिंचवाना इनके लिए किसी बड़े एज़ाज़ से कम नहीं होता।

ऐसी तस्वीरों को इस अंदाज़ से पेश किया जाता है कि देखने वाला समझे कि बिरादरी के इन हज़रात के ताल्लुक़ात तो बड़े-बड़े लोगों से हैं। तस्वीरों के ज़रिए आम और सीधे-सादे लोगों को यह एहसास दिलाने की कोशिश की जाती है कि देखिए, हमारे उठने-बैठने का दायरा कितना बड़ा है और हमारा रसूख़ कितना बुलंद है!

मगर हुज़ूर, किसी अमीर के साथ तस्वीर खिंचवा लेने से कोई समाजसेवी नहीं बन जाता और न ही किसी बड़े आदमी के साथ एक दस्तरख़्वान पर बैठ जाने से बिरादरी की क़ियादत हासिल हो जाती है।

असली इज़्ज़त तो उस वक़्त मिलती है जब कोई ग़रीब, परेशानहाल और बेसहारा इंसान यह कहे कि मुश्किल वक़्त में फलां शख़्स मेरे काम आया था।

ख़िदमत के 30 साल, मगर हिसाब-किताब कहां है?

हम उन तमाम हज़रात की इज़्ज़त करते हैं जिन्होंने वाक़ई अपनी ज़िंदगी का क़ीमती हिस्सा बिरादरी की भलाई, इत्तेहाद और तरक़्क़ी के लिए वक़्फ़ किया है। ऐसे लोग हमारे लिए क़ाबिले-एहतराम हैं।

लेकिन जो लोग अपनी 25, 28 या 30 साल की ख़िदमत के क़िस्से सुनाकर अपनी अहमियत जताते हैं, उनसे अदब के साथ कुछ सवाल ज़रूर पूछे जाने चाहिए।

  1. इन वर्षों में बिरादरी के कितने ग़रीब और ज़रूरतमंद परिवारों की मदद की?
  2. कितने तलबा और तालेबात की तालीम में हिस्सा लिया?
  3. कितने नौजवानों को रोज़गार और कारोबार से जोड़ने की कोशिश की?
  4. बिरादरी में आपसी इख़्तिलाफ़ात ख़त्म कराने के लिए क्या अमली क़दम उठाए?
  5. कितने ताज़ियती मौक़ों पर आप ख़ुद जाकर ग़मज़दा परिवारों के साथ खड़े हुए?
  6. और सबसे अहम सवाल, आपकी ख़िदमत का ऐसा कौन सा काम है जिसे बिरादरी आज भी याद करती है?

क्योंकि ख़िदमत का असल पैमाना सालों की गिनती नहीं, बल्कि किए गए कामों का नतीजा होता है।

बिरादरी को फ़ोटोशूट नहीं, फ़िक्र और फ़िक्र को अमल चाहिए!

आज हमारी मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी को ऐसे लोगों की ज़रूरत है जो सिर्फ़ तक़रीबों में नज़र आने के बजाय बिरादरी के मसाइल को समझें। जो तालीम के मैदान में काम करें, ग़रीब बेटियों की शादी में मददगार बनें, ज़रूरतमंद परिवारों का सहारा बनें, नौजवानों की रहनुमाई करें और बिरादरी में इत्तेहाद, भाईचारे और मोहब्बत को फ़रोग़ दें।

बिरादरी की ख़िदमत का मतलब यह नहीं कि हर शादी में आपकी आमद दर्ज हो, हर दावत में आपकी कुर्सी मुक़र्रर हो और हर तस्वीर में आपका चेहरा दिखाई दे।

ख़िदमत का मतलब है कि किसी घर में परेशानी आए तो आप उसके दरवाज़े पर पहुंचें। किसी के घर मातम हो तो आप उसके ग़म में शरीक हों। किसी ग़रीब को मदद चाहिए तो आप उसकी हैसियत देखकर नहीं, उसकी ज़रूरत देखकर आगे बढ़ें।

याद रखिए, शादी की दावत में शामिल होने से पेट तो भर सकता है, मगर बिरादरी की तरक़्क़ी का ख़्वाब सिर्फ़ दस्तरख़्वान पर बैठकर पूरा नहीं होता।

आख़िरी बात... अगली बार फ़ोटो के कैप्शन में ज़रा एहतियात कीजिएगा!

शादियों का सीज़न शुरू हो चुका है। लिहाज़ा आने वाले दिनों में सोशल मीडिया पर एक साथ खड़े, बैठे, मुस्कुराते और दस्तरख़्वान के इर्द-गिर्द जमा कुछ जाने-पहचाने चेहरे नज़र आएं तो हैरान मत होइएगा।

हो सकता है किसी बड़े घराने में कोई शादी हो और हमारी ख़िदमतगार मंडली वहां बिरादरी की तरक़्क़ी के किसी बेहद अहम एजेंडे पर गुफ़्तगू कर रही हो!

बस गुज़ारिश इतनी है कि अगली बार ऐसी तस्वीर के नीचे ''बिरादरी की मीटिंग'' लिखने से पहले मीटिंग का एजेंडा भी बता दीजिएगा। मसलन, कितने लोगों की मदद का फ़ैसला हुआ, कौन सा सामाजिक मसला हल हुआ और बिरादरी को क्या फ़ायदा पहुंचा?

और अगर आप शादी में जाकर मेहमानों को खाना खिला रहे हैं, बुज़ुर्गों की ख़िदमत कर रहे हैं, माज़ूर लोगों की मदद कर रहे हैं और मेज़बान परिवार का हाथ बंटा रहे हैं, तो यक़ीनन वह तस्वीर बिरादरी के नौजवानों के लिए एक मिसाल बन सकती है।

आख़िर में बस इतना ही कि दावत में मेहमान बनकर जाना आसान है, मगर मेहमानों की ख़िदमतगार बनकर लौटना असल किरदार की पहचान है।

हमारी नज़र में सच्चा ख़िदमतगार वह नहीं जिसके पास 30 साल की ख़िदमत का दावा हो, बल्कि वह है जिसके किए हुए कामों की गवाही बिरादरी के आम लोग दें।

न ख़िदमत का शोर, न रसूख़ का दिखावा, न तस्वीरों की नुमाइश... बस अमल, अख़लाक़ और बिरादरी के लिए सच्चा जज़्बा ही असल समाजसेवा है।


सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार से पंजीकृत, मुल्क की राजधानी नई दिल्ली से प्रसारित, पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी की मुल्क की इकलौती क़ौमी समाचार पत्रिका, न्यूज़ पोर्टल और यूट्यूब चैनल 'मुल्तानी समाज' के लिए उत्तर प्रदेश डेस्क से प्रधान संपादक ज़मीर आलम की ख़ास रिपोर्ट।

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इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन! शामली के मोहल्ला नौ कुआँ में जनाब अय्यूब मिर्ज़ा साहब का इंतकाल, बिरादराना हलक़ों में ग़म की लहर

अल्लाह तआला मरहूम की मग़फिरत फरमाए, क़ब्र को नूर से मुनव्वर करे और जन्नतुल फिरदौस में आला मुक़ाम अता फरमाए। आमीन या रब्बुल आलमीन।

निहायत ही रंज-ओ-ग़म तथा दिली अफ़सोस के साथ तमाम मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादराना हज़रात को यह इत्तिला दी जाती है कि आज दिन इतवार, बा-तारीख़ 01 नवंबर 2026 को मोहल्ला नौ कुआँ, शामली (उत्तर प्रदेश) में जनाब अय्यूब मिर्ज़ा साहब (कोठड़ी वाले), वल्द जनाब ग़ुलाम हुसैन साहब, उम्र तक़रीबन 58 साल, का क़ज़ा-ए-इलाही से इंतकाल हो गया है।

मरहूम के इंतकाल की ख़बर से ख़ानदान, अज़ीज़-ओ-अक़ारिब, अहबाब और मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी में ग़म और अफ़सोस की लहर दौड़ गई है। यह दुनिया फ़ानी है और हर ज़ी-रूह को एक दिन अपने रब की बारगाह में लौटकर जाना है। अल्लाह तआला मरहूम की तमाम ख़ताओं और लग़ज़िशों को माफ़ फरमाकर उन्हें अपनी रहमत के साये में जगह अता फरमाए।

जनाज़े और तदफ़ीन की इत्तिला

मिली जानकारी के मुताबिक़ मरहूम की मय्यत को आज रात 10 बजे सपूर्दे ख़ाक किया जाएगा। तमाम बिरादराना हज़रात, अज़ीज़-ओ-अक़ारिब और अहबाब से गुज़ारिश है कि जनाज़े में शिरकत फरमाकर मरहूम के हक़ में दुआ-ए-मग़फिरत करें और सवाबे दारेन हासिल करें।

क़ब्र में उतारते वक़्त की दुआ

मय्यत को क़ब्र में उतारते वक़्त यह दुआ पढ़ी जाती है:

بِسْمِ اللّٰهِ وَعَلٰى مِلَّةِ رَسُوْلِ اللّٰهِ ﷺ

बिस्मिल्लाहि व अला मिल्लति रसूलिल्लाह ﷺ

अर्थ: अल्लाह के नाम के साथ और रसूलुल्लाह ﷺ के दीन व तरीक़े पर।

मिट्टी देते वक़्त की दुआ

क़ब्र पर मिट्टी डालते वक़्त क़ुरआन-ए-पाक की यह आयत पढ़ी जाती है:

مِنْهَا خَلَقْنَاكُمْ وَفِيهَا نُعِيدُكُمْ وَمِنْهَا نُخْرِجُكُمْ تَارَةً أُخْرَىٰ

मिन्हा ख़लक़नाकुम व फ़ीहा नुईदुकुम व मिन्हा नुख़रिजुकुम तारतन उख़रा।

अर्थ: इसी मिट्टी से हमने तुम्हें पैदा किया, इसी में तुम्हें वापस लौटाएँगे और इसी से दोबारा तुम्हें निकालेंगे।

दफ़न के बाद मग़फिरत और साबितक़दमी की दुआ

اللّٰهُمَّ اغْفِرْ لَهُ وَارْحَمْهُ وَثَبِّتْهُ عِنْدَ السُّؤَالِ

अल्लाहुम्मग़फ़िर लहू वरहम्हू व सब्बित्हू इंदस्सुआल।

अर्थ: ऐ अल्लाह! मरहूम की मग़फिरत फरमा, उन पर रहम फरमा और सवाल के वक़्त उन्हें साबितक़दम रखना।

तमाम अहबाब से ख़ुसूसी गुज़ारिश है कि दफ़न के बाद भी मरहूम के लिए दुआ-ए-मग़फिरत फरमाएँ। अल्लाह तआला उनके मदफ़न को जन्नत के बाग़ों में से एक बाग़ बनाए, क़ब्र की तन्हाई को अपनी रहमत से दूर फरमाए और क़ब्र को जन्नत की ख़ुशबू और नूर से भर दे।

नोट: मय्यत के सिलसिले में मज़ीद मालूमात के लिए एडवोकेट रिज़वान आलम साहब के मोबाइल नंबर 8864880718 पर राब्ता क़ायम फरमाएँ।


सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार से पंजीकृत, मुल्क की राजधानी नई दिल्ली से प्रसारित, पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी की मुल्क की इकलौती क़ौमी समाचार पत्रिका, न्यूज़ पोर्टल एवं यूट्यूब चैनल 'मुल्तानी समाज' के लिए उत्तर प्रदेश डेस्क से प्रधान संपादक ज़मीर आलम की ख़ास रिपोर्ट।

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"मुल्तानी समाज"

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दुआ है कि अल्लाह तआला मरहूम को जन्नतुल फिरदौस में आला से आला मुक़ाम अता फरमाए और तमाम पसमान्दगान को सब्र-ए-जमील अता फरमाए। आमीन सुम्मा आमीन।

Saturday, October 31, 2026

रशीदा बी के इंतिक़ाल से मुल्तानी बिरादरी में ग़म की लहर, आज बाद नमाज़े असर गौरीपुर के कब्रिस्तान में होंगी सुपुर्द-ए-ख़ाक

शरीफ़ अहमद नांगल वाले (मरहूम) की अहलिया रशीदा बी ने बीमारी के चलते दुनिया-ए-फ़ानी को कहा अलविदा, अल्लाह तआला मरहूमा की मग़फ़िरत फ़रमाए और तमाम घर वालों को सब्र-ए-जमील अता फ़रमाए। आमीन।

उत्तर प्रदेश। निहायत ही रंज-ओ-ग़म और अफ़सोस के साथ तमाम मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादराना हज़रात को यह इत्तिला दी जाती है कि आज दिन इतवार, बा-तारीख़ 01 नवंबर 2026 को जनाब शरीफ़ अहमद नांगल वाले (मरहूम), हाल मुक़ाम गौरीपुर, ज़िला बागपत, उत्तर प्रदेश की अहलिया मोहतरमा रशीदा बी का बीमारी के चलते क़ज़ा-ए-इलाही से इंतिक़ाल हो गया है।

इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन।

मरहूमा के इंतिक़ाल की ख़बर से उनके अहल-ए-ख़ाना, रिश्तेदारों, अज़ीज़ों और बिरादरी के लोगों में गहरा रंज-ओ-ग़म पाया जा रहा है। यह दुनिया फ़ानी है और हर जान को एक दिन अपने रब की बारगाह में लौटकर जाना है। बेशक अल्लाह की मर्ज़ी के आगे किसी का ज़ोर नहीं चलता।

आज बाद नमाज़े असर अदा होगी नमाज़-ए-जनाज़ा और सुपुर्द-ए-ख़ाक

मिली जानकारी के मुताबिक़ मरहूमा रशीदा बी की मय्यत को आज दिन इतवार, बाद नमाज़े असर, गांव गौरीपुर, ज़िला बागपत, उत्तर प्रदेश स्थित क़ब्रिस्तान में सुपुर्द-ए-ख़ाक किया जाएगा।

लिहाज़ा तमाम बिरादराना हज़रात, अज़ीज़-ओ-अक़ारिब और अहल-ए-ईमान से गुज़ारिश है कि जनाज़े में शिरकत फ़रमाकर मरहूमा के लिए दुआ-ए-मग़फ़िरत करें और ग़मज़दा अहल-ए-ख़ाना के साथ ताज़ियत और दिलजोई का इज़हार फ़रमाएं।

दफ़न के वक़्त पढ़ी जाने वाली दुआ

जब मरहूमा को क़ब्र में उतारा जाए तो यह दुआ पढ़ना मस्नून है:

بِسْمِ اللّٰهِ وَعَلٰى مِلَّةِ رَسُوْلِ اللّٰهِ

बिस्मिल्लाहि व अला मिल्लति रसूलिल्लाह।

तर्जुमा: अल्लाह के नाम के साथ और रसूलुल्लाह ﷺ के दीन व तरीक़े पर।

मिट्टी देते वक़्त की दुआ

क़ब्र पर मिट्टी डालते वक़्त यह क़ुरआनी आयत पढ़ी जाती है:

مِنْهَا خَلَقْنَاكُمْ وَفِيهَا نُعِيدُكُمْ وَمِنْهَا نُخْرِجُكُمْ تَارَةً أُخْرَىٰ

मिन्हा ख़लक़नाकुम व फ़ीहा नुईदुकुम व मिन्हा नुख़रिजुकुम तारतन उख़रा।

तर्जुमा: इसी मिट्टी से हमने तुम्हें पैदा किया, इसी में तुम्हें लौटाएंगे और इसी से तुम्हें दोबारा निकालेंगे।

मरहूमा की मग़फ़िरत के लिए ख़ास दुआ

اللّٰهُمَّ اغْفِرْ لَهَا وَارْحَمْهَا وَعَافِهَا وَاعْفُ عَنْهَا

अल्लाहुम्मग़फ़िर लहा वरहमहा व आफ़िहा व अफ़ु अन्हा।

ऐ अल्लाह! मरहूमा की मग़फ़िरत फ़रमा, उन पर रहम फ़रमा, उन्हें आफ़ियत अता फ़रमा और उनकी ख़ताओं से दरगुज़र फ़रमा।

मुल्तानी समाज की तरफ़ से पुरदर्द ताज़ियत

राष्ट्रीय समाचार पत्रिका 'मुल्तानी समाज' के प्रधान संपादक ज़मीर आलम एवं समस्त टीम की जानिब से मरहूमा रशीदा बी के इंतिक़ाल पर उनके तमाम अहल-ए-ख़ाना, अज़ीज़-ओ-अक़ारिब और मुतअल्लिक़ीन की ख़िदमत में दिली ताज़ियत पेश की जाती है।

हमारी बारगाह-ए-इलाही में दुआ है कि अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त मरहूमा रशीदा बी की मग़फ़िरत फ़रमाए, उनकी क़ब्र को नूर से मुनव्वर फ़रमाए, क़ब्र की तन्हाई को अपनी रहमत से दूर फ़रमाए, उनकी क़ब्र को जन्नत के बाग़ों में से एक बाग़ बनाए और उन्हें जन्नतुल फ़िरदौस में आला मुक़ाम अता फ़रमाए।

अल्लाह तआला मरहूमा की तमाम छोटी-बड़ी ख़ताओं को माफ़ फ़रमाए, उनकी नेकियों को क़ुबूल फ़रमाए और उन्हें अपने प्यारे महबूब हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा ﷺ की शफ़ाअत नसीब फ़रमाए।

अल्लाह उनके अहल-ए-ख़ाना को इस मुश्किल घड़ी में सब्र-ए-जमील अता फ़रमाए। तमाम घर वालों को हिम्मत और हौसला दे और इस सदमे को बर्दाश्त करने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए।

आमीन या रब्बुल आलमीन।

इंतिक़ाल और जनाज़े के सिलसिले में मालूमात

मरहूमा के इंतिक़ाल, जनाज़े और दफ़न के सिलसिले में मज़ीद जानकारी हासिल करने के लिए जनाब ख़ालिद साहब से नीचे दिए गए मोबाइल नंबर पर राब्ता क़ायम कर सकते हैं।

📞 9410682228

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विशेष रिपोर्ट: उत्तर प्रदेश डेस्क

ज़मीर आलम
प्रधान संपादक
'मुल्तानी समाज'

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