Monday, September 14, 2026

बिरादरी की हर तंजीम हमारी है—दायरा सिमटाए नहीं, बढ़ाएं

कमेटियों और बिरादराने हजरात से ख़ास अपील: किसी एक अंजुमन तक महदूद न रहें, पूरी बिरादरी की ख़िदमत को अपना मिशन बनाएं

नई दिल्ली।
पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार, बढ़ई बिरादराने हजरात से मैं इस ख़ास रिपोर्ट के ज़रिए एक अहम, संजीदा और बिरादराना गुज़ारिश करना चाहता हूं कि हमारी बिरादरी में काम करने वाली हर सामाजिक तंजीम, अंजुमन, कमेटी, संस्था, सोसायटी और ट्रस्ट हमारी अपनी बिरादरी का हिस्सा है। इनके मिशन और काम करने के तरीके अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन मंज़िल एक ही है—बिरादरी की तरक्की, इत्तेहाद, तालीम, समाजी बेदारी और आने वाली नस्लों का बेहतर मुस्तकबिल।

आज हमारी बिरादरी में मुख्तलिफ़ मक़ासिद को लेकर कई तंजीमें मैदान-ए-अमल में हैं। कोई तंजीम अपने शहर या कस्बे तक समाजी ख़िदमत का काम कर रही है, कोई कई शहरों में अपना नेटवर्क कायम कर चुकी है और कोई संस्था पूरे हिंदुस्तान में एक ही दिन बड़े पैमाने पर समाजी प्रोग्राम मुनअक़िद करने की सलाहियत रखती है।

यह मुख्तलिफ़ तंजीमें हमारी बिरादरी की कमजोरी नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक ताक़त बनने का ज़रिया हैं—बशर्ते हम इन्हें एक-दूसरे का मुकाबिल समझने के बजाय एक-दूसरे का मददगार समझें।

जितनी ज्यादा तंजीमें, उतना ज्यादा समाजी दायरा

हमारी बिरादरी लंबे अरसे तक गुरबत, कम तालीमी सहूलियतों और समाजी बेदारी की कमी का सामना करती रही है। यही वजह है कि बहुत से बिरादराने हजरात को अंजुमन, तंजीम, सोसायटी और समाजी संस्थाओं के असल मक़सद और उनके काम करने के तरीके की पूरी जानकारी नहीं मिल सकी।

एक सोच यह भी रही कि अगर आदमी समाजी कामों में लग गया तो फिर अपने घर का निज़ाम कौन संभालेगा?

यह सवाल अपनी जगह वाजिब है। हर इंसान की अपनी रोज़ी-रोटी, कारोबार और खानदान की जिम्मेदारियां हैं। मगर इसका मतलब यह कतई नहीं कि हम समाजी ख़िदमत से दूर हो जाएं।

समाजी ख़िदमत नौकरी नहीं, ज़िम्मेदारी और सदक़ा-ए-जारीया की एक शक्ल हो सकती है।

अगर कोई शख़्स अपनी रोज़मर्रा की जिम्मेदारियों को निभाते हुए बिरादरी की ख़िदमत के लिए वक्त निकाल सकता है, तो उसे अपनी इस खिदमत का दायरा बढ़ाना चाहिए।

एक तंजीम से जुड़े हैं तो दूसरी से जुड़ने में क्या हर्ज है?

यह बात खास तौर पर समझने की जरूरत है कि अगर कोई बिरादर किसी एक तंजीम का ओहदेदार या मेंबर है और उसकी अपनी बिरादरी की कोई दूसरी तंजीम भी उसे अपनी कमेटी में शामिल करना चाहती है, तो उसे महज़ इस वजह से पहली तंजीम छोड़ने की जरूरत नहीं कि अब वह दूसरी तंजीम से भी जुड़ रहा है।

आख़िर ये बिरादरी की सामाजिक तंजीमें हैं, कोई सियासी पार्टी नहीं।

अगर किसी रिश्तेदार या बिरादर की तरफ़ से यह पेशकश आती है कि “आप हमारी तंजीम से जुड़ जाइए, हम आपको फलां कस्बे या शहर की जिम्मेदारी दे देंगे”, तो इसका मतलब यह नहीं होना चाहिए कि पहले से जिस तंजीम में आप ख़िदमत कर रहे हैं, उसे छोड़ दें।

बल्कि जवाब होना चाहिए—

“अगर यह बिरादरी की ख़िदमत का मंच है तो मैं बिरादरी की दूसरी तंजीमों के साथ भी ख़िदमत करूंगा, मगर हर जगह पूरी ईमानदारी और वफ़ादारी के साथ अपनी जिम्मेदारी निभाऊंगा।”

यही सोच हमारे समाज को जोड़ सकती है।

बिरादरी की क्रीम किसी एक तंजीम की मिल्कियत नहीं

हमारी बिरादरी में ऐसे बहुत से काबिल, पढ़े-लिखे, समाजी तौर पर सक्रिय और अपने-अपने मैदान में कामयाब बिरादर मौजूद हैं, जिन्हें मुख्तलिफ़ तंजीमें अपनी कमेटियों में शामिल करना चाहती हैं।

ऐसे बिरादराने हजरात को हम बिरादरी का सरमाया और कोहिनूर हीरे कह सकते हैं।

अगर बिरादरी की एक तंजीम ने किसी काबिल शख़्स को तलाश करके अपनी कमेटी में शामिल किया है और दूसरी तंजीम भी उसी शख़्स को अपनी टीम का हिस्सा बनाना चाहती है, तो इसे किसी टकराव की वजह बनाने के बजाय बिरादरी के लिए एक अच्छी निशानी समझना चाहिए।

क्योंकि वह शख़्स किसी एक तंजीम की मिल्कियत नहीं है।

वह पूरी बिरादरी का बेटा है।

अगर उसकी सलाह, तजुर्बा, काबिलियत और वक्त दो तंजीमों के काम आ सकते हैं तो उसे दो तंजीमों से जुड़ने दीजिए। अगर वह अपनी जिम्मेदारी ईमानदारी से निभा सकता है तो उसे पांच तंजीमों से जुड़ने से भी क्यों रोका जाए?

अपना दायरा एक अंजुमन तक महदूद न करें

हमारी बिरादरी में अगर 15-20 तंजीमें मुख़्तलिफ़ मक़ासिद के साथ समाजी काम कर रही हैं तो बिरादराने हजरात को अपना दायरा किसी एक अंजुमन तक महदूद नहीं करना चाहिए।

बल्कि जहां-जहां उनकी काबिलियत की जरूरत हो, वहां-वहां अपनी सेवाएं पेश करनी चाहिए।

एक तंजीम में रहकर अपना दायरा छोटा करने के बजाय, हर मुनासिब तंजीम से जुड़कर अपनी ख़िदमत का दायरा बड़ा कीजिए।

आप किसी एक कमेटी की शान नहीं हैं।

आप पूरी बिरादरी की आन, बान और शान हैं।

इसलिए जिस भी तंजीम से जुड़ें, शुरुआत में ही साफ़ तौर पर कह दें कि—

“मैं बिरादरी की ख़िदमत के लिए आपके साथ हूं, लेकिन अगर मेरी बिरादरी की कोई दूसरी तंजीम भी मुझे अपनी कमेटी में शामिल करना चाहेगी तो मैं वहां भी अपनी हैसियत और वक्त के मुताबिक़ बिरादरी की ख़िदमत करूंगा।”

इस साफ़गोई से न गलतफ़हमी पैदा होगी और न बाद में किसी को शिकायत का मौका मिलेगा।

तंजीमें समाजी ख़िदमत का मरकज़ बनें, सियासी खींचतान का नहीं

तमाम अंजुमन, तंजीम, कमेटी और संस्था संचालकों से भी अदब के साथ गुज़ारिश है कि अपनी-अपनी संस्थाओं को बिरादरी की ख़िदमत का मरकज़ बनाए रखें।

हमने ये सामाजिक संस्थाएं बिरादरी को जोड़ने के लिए बनाई हैं, एक-दूसरे को बांटने के लिए नहीं।

किसी ओहदेदार या मेंबर का दूसरी बिरादराना तंजीम से जुड़ना बेवफ़ाई नहीं है। अगर वह दोनों जगह ईमानदारी से अपनी जिम्मेदारी निभा रहा है तो यह उसकी समाजी सरगर्मी का दायरा बढ़ना है।

हमें यह भी समझना होगा कि बिरादरी की तंजीमें सियासी पार्टियां नहीं हैं।

यहां मक़सद ओहदा हासिल करना नहीं, बल्कि उस ओहदे को बिरादरी की ख़िदमत का ज़रिया बनाना होना चाहिए।

अगर एक बिरादर दूसरी तंजीम में भी शामिल हो गया तो इसका मतलब यह नहीं कि वह पहली तंजीम का दुश्मन हो गया।

हमारी बिरादरी एक है, इसलिए उसके समाजी मंच भी एक-दूसरे के दुश्मन नहीं, एक-दूसरे के साथी होने चाहिए।

दिल साफ़ रखें, नीयत पाक रखें और हाथ मिलाकर आगे बढ़ें

आज जरूरत इस बात की है कि हम अपने दिलों से छोटी-छोटी गलतफ़हमियां निकालें।

किसी को किसी दूसरी तंजीम में जाते देखकर यह न सोचें कि वह हमारा आदमी नहीं रहा।

बल्कि यह सोचें कि—

“हमारी बिरादरी का एक और बेटा समाजी ख़िदमत के एक और मंच तक पहुंच गया है।”

यही सोच हमारी ताक़त बनेगी।

तमाम तंजीमों के जिम्मेदारान से भी मेरी खास गुज़ारिश है कि दूसरी तंजीमों से जुड़े काबिल और मेहनती बिरादराने हजरात को भी अपनी कमेटियों में शामिल करने में दिल बड़ा रखें।

ओहदा बांटने से तंजीम छोटी नहीं होती, दिल छोटा करने से बिरादरी जरूर छोटी हो जाती है।

आइए, आज से हम यह अहद करें कि बिरादरी की हर तंजीम को अपनी समझेंगे, हर नेक कोशिश की इज़्ज़त करेंगे, एक-दूसरे की कामयाबी पर खुश होंगे और जहां मुमकिन हो, वहां एक-दूसरे का हाथ थामेंगे।

हमारी मंज़िल किसी एक तंजीम को सबसे बड़ा बनाना नहीं, बल्कि पूरी मुल्तानी बिरादरी को मजबूत बनाना होनी चाहिए।

आइए, बिरादरी के लिए एक नई रवायत कायम करें

हम किसी एक अंजुमन के नहीं, पूरी बिरादरी के हैं।

हमारी तंजीमें अलग हो सकती हैं, हमारे काम करने के तरीके अलग हो सकते हैं, हमारे प्रोग्राम अलग हो सकते हैं, लेकिन हमारा समाज एक है, हमारी बिरादरी एक है और हमारी तरक्की का ख्वाब भी एक होना चाहिए।

इसलिए—

तंजीमों की तादाद से मत घबराइए, उनके बीच मोहब्बत और इत्तेहाद पैदा कीजिए।

ओहदों के लिए मुकाबला मत कीजिए, ख़िदमत के लिए आगे आइए।

दूसरी तंजीम से जुड़ने वाले को अपना मुख़ालिफ़ मत समझिए, उसे बिरादरी का ख़ादिम समझिए।

और सबसे बढ़कर—

बिरादरी की ख़िदमत को किसी एक कमेटी की सरहद में कैद मत कीजिए।

आइए, अपनी-अपनी जगह से एक कदम आगे बढ़ाएं, एक-दूसरे के हाथों में हाथ दें और अपनी मेहनत, अपनी काबिलियत और अपनी इत्तेहाद की ताक़त से मुस्लिम मुल्तानी लोहार, बढ़ई बिरादरी के नाम को मुल्क की बुलंदियों तक पहुंचाएं।

यही वक्त की आवाज़ है।
यही बिरादराना तकाज़ा है।
और यही हमारी आने वाली नस्लों के लिए सबसे बड़ा तोहफ़ा होगा।


सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार से पंजीकृत, मुल्क की राजधानी नई दिल्ली से प्रसारित, पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी की मुल्क की इकलौती क़ौमी समाचार पत्रिका, न्यूज़ पोर्टल और यूट्यूब चैनल “मुल्तानी समाज” के लिए उत्तर प्रदेश डेस्क से प्रधान संपादक ज़मीर आलम की ख़ास रिपोर्ट।

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मथेडी वाले जनाब मोहम्मद अली साहब का इंतकाल, इलाके में पसरा ग़म का माहौल, इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन

खतौली, मुजफ्फरनगर। निहायत ही रंज-ओ-ग़म और गहरे अफसोस के साथ यह इत्तिला दी जाती है कि जनाब मोहम्मद अली साहब (मथेडी वाले), हाल निवासी मोहल्ला काज़ियान, जीत नर्सिंग होम के सामने, क़स्बा खतौली, जिला मुजफ्फरनगर, उत्तर प्रदेश, आज दिन पीर, बा-तारीख़ 14 सितंबर 2026 को लंबी बीमारी के चलते इस दुनिया-ए-फ़ानी से कूच कर गए।

इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन।

मरहूम के इंतकाल की दर्दनाक खबर जैसे ही परिवार, रिश्तेदारों, दोस्तों और करीबियों तक पहुंची, हर तरफ ग़म और उदासी की लहर दौड़ गई। मरहूम के इंतकाल से उनके अहल-ए-खाना और उनसे जुड़े तमाम लोगों को गहरा सदमा पहुंचा है।

अल्लाह तआला ने इंसान को इस दुनिया में एक मुकर्रर मुद्दत के लिए भेजा है और हर ज़ी-रूह को एक दिन इस दुनिया-ए-फ़ानी से रुख़्सत होना है। आज जनाब मोहम्मद अली साहब भी अपने तमाम दुनियावी रिश्तों और जिम्मेदारियों को पीछे छोड़कर अपने रब के हुज़ूर हाज़िर हो गए।

नमाज़-ए-जनाज़ा और तदफ़ीन

मरहूम जनाब मोहम्मद अली साहब की नमाज़-ए-जनाज़ा बाद नमाज़-ए-ईशा अदा की जाएगी, इंशाअल्लाह

तमाम अहबाब, रिश्तेदारों और बिरादरान-ए-मिल्लत से गुज़ारिश है कि जनाज़े में शरीक होकर मरहूम के लिए दुआ-ए-मग़फिरत करें और अहल-ए-खाना के ग़म में शरीक हों।

अल्लाह तआला मरहूम की मग़फिरत फरमाए, उनकी तमाम ख़ताओं और कोताहियों को माफ़ फरमाए, उनकी कब्र को नूर से मुनव्वर फरमाए, कब्र के तमाम मराहिल आसान फरमाए और उन्हें जन्नतुल फ़िरदौस में आला से आला मुकाम अता फरमाए।

या अल्लाह! मरहूम पर अपनी खास रहमत नाज़िल फरमा, उनकी क़ब्र को जन्नत के बाग़ों में से एक बाग़ बना दे और उन्हें अपने नेक बंदों में शामिल फरमा।

अल्लाह रब्बुल आलमीन तमाम अहल-ए-खाना, रिश्तेदारों और शोकाकुल परिजनों को इस बड़े सदमे को बर्दाश्त करने की हिम्मत, सब्र और सब्र-ए-जमील अता फरमाए तथा उन्हें इस ग़म के बदले अपने ख़ज़ाना-ए-रहमत से बेहतर अज्र अता फरमाए।

आमीन या रब्बुल आलमीन।

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सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार से पंजीकृत, मुल्क की राजधानी नई दिल्ली से प्रसारित, पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी की मुल्क की इकलौती क़ौमी समाचार पत्रिका, न्यूज़ पोर्टल एवं यूट्यूब चैनल "मुल्तानी समाज" के लिए उत्तर प्रदेश डेस्क से प्रधान संपादक ज़मीर आलम की ख़ास रिपोर्ट।

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Sunday, September 13, 2026

‘मुल्तानी-डे’ पर बढ़ा विवाद: तारीख़, पहचान और विरासत को लेकर आमने-सामने बिरादरी के दो दावे

12 नवंबर को मनाए जाने वाले ‘मुल्तानी-डे’ को अक्टूबर में आयोजित करने पर उठे सवाल — ज़मीर आलम का सख़्त एतराज़, बोले: बिरादरी की पहचान और कार्यक्रमों की तारीख़ों को लेकर अब भ्रम बर्दाश्त नहीं

नई दिल्ली।
मुस्लिम मुल्तानी लोहार एवं बढ़ई बिरादरी में इन दिनों ‘मुल्तानी-डे’ की तारीख़ और उसके आयोजन को लेकर एक नया विवाद सामने आया है। एक तरफ़ ‘मुल्तानी समाज’ राष्ट्रीय समाचार पत्रिका के प्रधान संपादक ज़मीर आलम का दावा है कि पत्रिका के सालाना राष्ट्रीय अधिवेशन को वर्षों से 12 नवंबर को ‘मुल्तानी-डे’ के नाम से आयोजित किया जाता रहा है, वहीं दूसरी ओर उत्तर प्रदेश के मुज़फ्फरनगर जनपद से संचालित एक तंजीम द्वारा पिछले दो वर्षों से अक्टूबर में आयोजित कार्यक्रम को ‘मुल्तानी-डे’ के नाम से प्रचारित किए जाने पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं।

मामला महज़ एक कार्यक्रम की तारीख़ का नहीं, बल्कि बिरादरी की पहचान, किसी आयोजन के नाम की परंपरा और उसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि से जुड़ा हुआ बताया जा रहा है।

‘मुल्तानी-डे’ किसकी पहचान?

ज़मीर आलम के अनुसार, ‘मुल्तानी समाज चैरिटेबल ट्रस्ट (रजि.)’ द्वारा प्रकाशित ‘मुल्तानी समाज’ राष्ट्रीय समाचार पत्रिका के सालाना राष्ट्रीय अधिवेशन को 12 नवंबर के दिन ‘मुल्तानी-डे’ के रूप में मनाने की परंपरा वर्षों से चली आ रही है।

उनका कहना है कि इस आयोजन की तारीख़, कार्यक्रमों और इससे संबंधित सामग्री के दस्तावेज़ पत्रिका एवं संबंधित संस्था के पास मौजूद हैं। ऐसे में यदि कोई अन्य संगठन उसी नाम को किसी दूसरी तारीख़ या महीने में अपने कार्यक्रम के लिए इस्तेमाल करता है, तो स्वाभाविक रूप से बिरादरी के बीच यह सवाल उठता है कि एक ही नाम से अलग-अलग तारीख़ों पर आयोजन करने का औचित्य क्या है?

अब्दुल कलाम के नाम से कार्यक्रम से ‘मुल्तानी-डे’ तक — सवाल क्यों उठे?

विवाद का एक अहम पहलू यह भी बताया जा रहा है कि संबंधित तंजीम द्वारा पूर्व में महान वैज्ञानिक एवं भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम के नाम से कार्यक्रम आयोजित किए जाते रहे हैं। आरोप है कि पिछले दो वर्षों से 12 नवंबर से लगभग एक माह पहले अक्टूबर में उसी आयोजन को ‘मुल्तानी-डे’ के नाम से प्रस्तुत किया जाने लगा।

यही बदलाव अब बिरादरी के एक वर्ग के बीच चर्चा और नाराज़गी का विषय बना हुआ है।

ज़मीर आलम का सवाल है कि यदि 12 नवंबर को ‘मुल्तानी समाज’ के राष्ट्रीय अधिवेशन की एक स्थापित परंपरा के तौर पर ‘मुल्तानी-डे’ मनाया जाता रहा है, तो उससे ठीक पहले किसी दूसरी तारीख़ पर उसी नाम का आयोजन करने की आवश्यकता क्यों महसूस हुई?

बिरादरी को जोड़ना है या तारीख़ों के नाम पर बांटना?

ज़मीर आलम ने अपने बयान में कहा कि बिरादरी पहले ही अनेक सामाजिक, तंजीमी और वैचारिक मतभेदों से जूझ रही है। ऐसे समय में किसी कार्यक्रम के नाम और तारीख़ को लेकर ऐसा विवाद पैदा होना, जो समाज के लोगों को दो अलग-अलग खेमों में खड़ा कर दे, किसी भी सूरत में बिरादरी के मुफ़ाद में नहीं है।

उन्होंने कहा कि ‘मुल्तानी-डे’ किसी व्यक्ति की निजी मिल्कियत नहीं, बल्कि बिरादरी की सामूहिक पहचान से जुड़ा नाम है, इसलिए इसके इतिहास और शुरुआत के बारे में बिरादरी के सामने उपलब्ध दस्तावेज़ों और पुराने रिकॉर्ड के आधार पर बात होनी चाहिए।

तंजीम के कार्यक्षेत्र को लेकर भी उठाए गए सवाल

ज़मीर आलम ने संबंधित संगठन के दावों और उसके कार्यक्षेत्र को लेकर भी गंभीर सवाल उठाए हैं। उनका आरोप है कि उत्तर प्रदेश में पंजीकृत संगठन के कार्यक्षेत्र और उसकी वास्तविक गतिविधियों के संबंध में बिरादरी के सामने स्थिति पूरी तरह स्पष्ट नहीं की गई है।

उन्होंने यह भी दावा किया कि संगठन से जुड़े अनेक लोग उत्तर प्रदेश से बाहर के राज्यों से हैं और संगठन के राष्ट्रीय स्तर पर संचालन संबंधी दावों की वास्तविक स्थिति पर स्पष्टता आवश्यक है।

हालांकि इन दावों की कानूनी और प्रशासनिक स्थिति संबंधित पंजीकरण दस्तावेज़ों तथा सक्षम प्राधिकारियों के रिकॉर्ड से ही अंतिम रूप से निर्धारित हो सकती है। इसलिए बिरादरी के सामने भी दस्तावेज़ों के साथ तथ्य रखने की मांग उठ रही है।

दिल्ली में आयोजनों को लेकर भी मांगा गया जवाब

ज़मीर आलम ने संबंधित तंजीम द्वारा दिल्ली में आयोजित किए गए कुछ कार्यक्रमों की बुकिंग एवं आयोजन प्रक्रिया को लेकर भी सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि यदि किसी संस्था का पंजीकरण और घोषित कार्यक्षेत्र किसी विशेष राज्य तक सीमित है, तो दूसरे राज्य में कार्यक्रम आयोजित करने की उसकी कानूनी स्थिति स्पष्ट होनी चाहिए।

उन्होंने संबंधित पक्ष से आग्रह किया कि इन तमाम सवालों का जवाब भावनाओं या आरोप-प्रत्यारोप से नहीं, बल्कि पंजीकरण प्रमाणपत्र, संस्था के नियमावली दस्तावेज़, कार्यक्रमों के रिकॉर्ड और अन्य प्रमाणिक काग़ज़ात के साथ दिया जाए।

‘हमारे पास रिकॉर्ड हैं, जरूरत पड़ी तो सामने रखेंगे’

ज़मीर आलम का कहना है कि ‘मुल्तानी समाज’ के पास ‘मुल्तानी-डे’ के संबंध में पुराने कार्यक्रमों, अधिवेशनों और प्रकाशनों से संबंधित पर्याप्त सामग्री मौजूद है।

उन्होंने कहा कि यदि विवाद केवल गलतफहमी का है तो संबंधित पक्ष को बैठकर बातचीत के ज़रिए उसे दूर करना चाहिए। लेकिन यदि किसी स्थापित आयोजन के नाम और पहचान को जानबूझकर दूसरी तारीख़ पर इस्तेमाल करके बिरादरी में भ्रम पैदा किया जा रहा है, तो इसका विरोध करना उनका संपादकीय और सामाजिक दायित्व है।

सख़्त संदेश: ‘नकल की तारीख़ नहीं, अपनी पहचान बनाइए’

ज़मीर आलम ने अपने सख़्त बयान में कहा कि बिरादरी अब पहले की तरह हर बात आंख बंद करके स्वीकार करने वाली नहीं है। सोशल मीडिया, डिजिटल मीडिया और दस्तावेज़ी रिकॉर्ड के दौर में लोग यह देखने और समझने लगे हैं कि किस कार्यक्रम की शुरुआत कब हुई, उसका नाम किस संदर्भ में रखा गया और उसकी परंपरा कितने समय से चली आ रही है।

उन्होंने संबंधित तंजीम के जिम्मेदार लोगों से कहा कि यदि उनके पास अपने कार्यक्रम और ‘मुल्तानी-डे’ नाम के इस्तेमाल के समर्थन में कोई अलग ऐतिहासिक या दस्तावेज़ी आधार है, तो उसे भी बिरादरी के सामने रखा जाए।

उनका कहना है—

“दूसरों के कार्यक्रमों के नाम और तारीख़ों को अपनाने के बजाय अपनी मेहनत, अपनी सोच और अपनी पहचान से नए कार्यक्रम खड़े कीजिए। बिरादरी को जोड़ना है तो नई मिसाल कायम कीजिए, पहले से चली आ रही पहचान को लेकर टकराव पैदा मत कीजिए।”

कानूनी रास्ता भी खुला रखने की चेतावनी

ज़मीर आलम ने स्पष्ट किया कि यदि भविष्य में ‘मुल्तानी-डे’ के नाम, कार्यक्रम की पहचान अथवा पत्रिका और संस्था से संबंधित किसी स्थापित आयोजन को लेकर कथित रूप से भ्रम फैलाने या भ्रामक प्रचार की स्थिति बनी रहती है, तो उपलब्ध दस्तावेज़ों और लागू क़ानून के तहत उचित कानूनी सलाह लेकर कार्रवाई का विकल्प खुला रखा जाएगा।

उन्होंने कहा कि किसी भी पक्ष को समाज की भावनाओं से खिलवाड़ करने के बजाय संवाद, दस्तावेज़ और प्रमाण की बुनियाद पर अपना पक्ष रखना चाहिए।

अब फैसला नारों से नहीं, रिकॉर्ड से होगा

‘मुल्तानी-डे’ को लेकर पैदा हुआ यह विवाद अब केवल 12 नवंबर बनाम अक्टूबर का सवाल नहीं रह गया है। असल सवाल यह है कि किसी सामाजिक आयोजन की पहचान और उसकी परंपरा का निर्धारण किस आधार पर होगा—दस्तावेज़ों से, पुराने रिकॉर्ड से या केवल प्रचार से?

बिरादरी के जिम्मेदार लोगों के लिए बेहतर रास्ता यही है कि दोनों पक्ष अपने-अपने दावों के समर्थन में प्रमाणिक रिकॉर्ड सामने रखें और आपसी बातचीत से ऐसा समाधान तलाशें जिससे मुल्तानी बिरादरी में इत्तेहाद कायम रहे और किसी को अपनी पहचान के लिए दूसरे से लड़ने की नौबत न आए।

12 नवंबर को मनाए जाने वाले ‘मुल्तानी-डे’ की परंपरा के संबंध में ‘मुल्तानी समाज’ राष्ट्रीय समाचार पत्रिका अपने पुराने रिकॉर्ड और दस्तावेज़ों के आधार पर अपना पक्ष रखने की बात कह रही है। अब देखना यह है कि संबंधित तंजीम इन सवालों का क्या जवाब देती है।


संपादकीय संदेश

मुल्तानी समाज की पहचान किसी एक शख़्स, तंजीम या शहर की जागीर नहीं है। यह पूरी बिरादरी की विरासत है। इसलिए तारीख़ों, नामों और आयोजनों को लेकर पैदा होने वाले हर विवाद का फैसला भावनाओं से नहीं बल्कि सच्चाई, दस्तावेज़ और इतिहास के आईने में होना चाहिए।

ज़मीर आलम
प्रधान-संपादक
‘मुल्तानी समाज’ राष्ट्रीय समाचार पत्रिका

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार से पंजीकृत — नई दिल्ली से प्रसारित

उत्तर प्रदेश डेस्क से विशेष रिपोर्ट


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मुल्तानी-डे: 12 नवंबर या 15 अक्टूबर .? तारीख़ के नाम पर बिरादरी में फूट डालने की कोशिश पर ज़मीर आलम मुल्तानी का तीखा हमला

नई दिल्ली। मुस्लिम मुल्तानी लोहार-बढ़ई बिरादरी के बीच “मुल्तानी-डे” को लेकर विवाद अब खुलकर सामने आ गया है। मुल्तानी समाज चैरिटेबल ट्रस्ट (रजि.) ऑल इंडिया की ओर से दावा किया गया है कि बिरादरी के सामाजिक, पारिवारिक एवं प्रतिभाशाली लोगों को मंच देने के उद्देश्य से सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार के तहत वर्ष 2011 में “मुल्तानी समाज” नाम से पत्रिका का पंजीकरण कराया गया था और तभी से पत्रिका एवं तंजीम से जुड़े लोग हर वर्ष 12 नवंबर को अपना वार्षिक अधिवेशन “मुल्तानी-डे” के रूप में मनाते आ रहे हैं।

तंजीम का कहना है कि 12 नवंबर को मुल्तानी-डे के रूप में मनाने की वर्षों पुरानी परंपरा के प्रमाण पत्रिका, वेबसाइट, यूट्यूब चैनल एवं विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध हैं। इसके अलावा तंजीम द्वारा दिल्ली, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, मध्यप्रदेश एवं गुजरात सरकारों को भारतीय पंजीकृत डाक एवं ई-मेल के माध्यम से 12 नवंबर को “मुल्तानी-डे” के रूप में सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज किए जाने की मांग भी पूर्व में की जा चुकी है।

“अचानक नई तारीख़ क्यों?” — ज़मीर आलम मुल्तानी का सवाल

तंजीम के मुताबिक पिछले दो-तीन वर्षों से उत्तर प्रदेश की एक अन्य संस्था द्वारा 15 अक्टूबर को “मुल्तानी-डे” के नाम पर कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। इसे लेकर तंजीम के जिम्मेदार लोगों ने पिछले वर्ष अक्टूबर में ही संबंधित संस्था के एक पदाधिकारी को अपनी आपत्ति से अवगत कराया था।

इसके बावजूद इस वर्ष भी 15 अक्टूबर को मुल्तानी-डे मनाने की तैयारियां किए जाने का आरोप लगाया गया है। तंजीम का कहना है कि इससे बिरादरी के लोगों के बीच भ्रम की स्थिति पैदा हो रही है और समाज को अलग-अलग तारीखों के नाम पर बांटने की कोशिश की जा रही है।

मुल्तानी समाज चैरिटेबल ट्रस्ट (रजि.) ऑल इंडिया से जुड़े ज़मीर आलम मुल्तानी ने इस मामले पर कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि बिरादरी के नाम पर अलग-अलग तारीखें प्रचारित कर समाज को भ्रमित करने और दो हिस्सों में बांटने की कोशिश स्वीकार नहीं की जाएगी।

उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा—

“बिरादरी की पुरानी परंपरा, दस्तावेजी रिकॉर्ड और वर्षों से चले आ रहे कार्यक्रमों को नजरअंदाज कर अचानक नई तारीख को मुल्तानी-डे बताना किसी भी सूरत में उचित नहीं है। अगर किसी संस्था को अपना कार्यक्रम करना है तो वह अपने कार्यक्रम पर ध्यान दे, लेकिन बिरादरी के बीच भ्रम और फूट पैदा करने की कोशिश न करे।”

“बिरादरी झूठे और मनगढ़ंत बहकावे में नहीं आएगी”

ज़मीर आलम मुल्तानी ने कहा कि मुल्तानी समाज जागरूक है और सोशल मीडिया के दौर में किसी भी दावे की सच्चाई दस्तावेजों और पुराने रिकॉर्ड के आधार पर आसानी से सामने आ सकती है। उन्होंने संबंधित संस्था को अपनी “घटिया मानसिकता बदलने” और बिरादरी को बांटने के बजाय समाजहित में काम करने की सलाह दी।

उन्होंने कहा—

“मुल्तानी-डे किसी व्यक्ति या संस्था की निजी जागीर नहीं है, लेकिन इतिहास और परंपरा को बदलने का अधिकार भी किसी को नहीं दिया जा सकता। बिरादरी झूठे, मनगढ़ंत और बहकावे वाले प्रचार में आने वाली नहीं है।”

तंजीम ने स्पष्ट किया है कि 12 नवंबर को मुल्तानी-डे के रूप में मनाने से संबंधित उपलब्ध दस्तावेज, पत्राचार एवं पुराने कार्यक्रमों के प्रमाण आवश्यकता पड़ने पर बिरादरी के सामने सार्वजनिक किए जा सकते हैं।

अब सवाल यह है कि मुल्तानी-डे की तारीख़ को लेकर उठे इस विवाद का सच क्या है और 15 अक्टूबर तथा 12 नवंबर में से किस तारीख़ को बिरादरी की पुरानी परंपरा और उपलब्ध दस्तावेज समर्थन करते हैं? आने वाले दिनों में यह मुद्दा बिरादरी के बीच और अधिक चर्चा का विषय बन सकता है।


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Thursday, September 10, 2026

सरधना के शाहिद मिर्ज़ा का दर्दनाक इंतक़ाल

अलवर में लोहे का भारी पैनल गिरने से हादसा, 45 वर्षीय युवक की मौत से घर में मचा कोहराम; ग़मगीन माहौल में हुआ दफ़ीना

सरधना/अलवर, 10 सितंबर 2026।
क़स्बा सरधना, ज़िला मेरठ, उत्तर प्रदेश के मोहल्ला कमरा नवाबान निवासी मोहम्मद शाहिद मिर्ज़ा के इंतक़ाल की दर्दनाक ख़बर से पूरे ख़ानदान और अहले-मोहल्ला में ग़म की लहर दौड़ गई। 45 वर्षीय शाहिद मिर्ज़ा की राजस्थान के अलवर शहर में एक दर्दनाक हादसे के दौरान मौत हो गई।

मिली जानकारी के मुताबिक़ शाहिद मिर्ज़ा अलवर में मौजूद थे, जहां लोहे का एक भारी पैनल अचानक गिर गया। इस हादसे में वह गंभीर रूप से ज़ख़्मी हो गए और उनकी जान चली गई। हादसे की ख़बर जैसे ही उनके परिजनों और अज़ीज़-ओ-अक़ारिब को मिली, घर में कोहराम मच गया और हर आंख अश्कबार हो उठी।

शाहिद मिर्ज़ा का शव जब उनके आबाई क़स्बे सरधना पहुंचा तो मातम का माहौल पैदा हो गया। अपने अज़ीज़ को आख़िरी बार देखने के लिए रिश्तेदारों, दोस्तों और अहले-मोहल्ला की बड़ी तादाद जमा हो गई। हर शख़्स इस दर्दनाक हादसे पर अफ़सोस का इज़हार करता और मरहूम के लिए मग़फ़िरत की दुआ करता नज़र आया।

बाद में बेहद ग़मगीन माहौल में मोहम्मद शाहिद मिर्ज़ा को सुपुर्द-ए-ख़ाक कर दिया गया। नम आंखों के साथ लोगों ने उनके जनाज़े में शिरकत की और मरहूम के लिए रहमत व मग़फ़िरत की दुआएं कीं।

मग़फ़िरत की दुआ

अल्लाह तआला मरहूम मोहम्मद शाहिद मिर्ज़ा की मुकम्मल मग़फ़िरत फ़रमाए, उनकी तमाम ख़ताओं और कोताहियों को माफ़ फ़रमाए, उनकी क़ब्र को नूर से मुनव्वर फ़रमाए, उसे जन्नत के बाग़ों में से एक बाग़ बनाए और उन्हें जन्नतुल फ़िरदौस में आला मुक़ाम अता फ़रमाए।

अल्लाह रब्बुल आलमीन तमाम पसमांदगान, अहले-ख़ाना और अज़ीज़-ओ-अक़ारिब को यह सदमा बर्दाश्त करने का सब्र-ए-जमील अता फ़रमाए।
आमीन या रब्बुल आलमीन।

إِنَّا لِلَّهِ وَإِنَّا إِلَيْهِ رَاجِعُونَ


"मुल्तानी समाज" की ख़ास रिपोर्ट

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार से पंजीकृत, मुल्क की राजधानी नई दिल्ली से प्रसारित, पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी की मुल्क की इकलौती क़ौमी समाचार पत्रिका, न्यूज़ पोर्टल और यूट्यूब चैनल "मुल्तानी समाज" के लिए उत्तर प्रदेश डेस्क से प्रधान संपादक ज़मीर आलम की ख़ास रिपोर्ट।

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दो दर्दनाक इंतक़ाल से बिरादरी में पसरा रंज-ओ-ग़म

नई दिल्ली में 95 वर्षीय बुज़ुर्ग ख़ातून का इंतक़ाल, सरधना के शाहिद साहब भी दर्दनाक हादसे में क़ज़ा-ए-इलाही से हुए वफ़ात

नई दिल्ली/सरधना (मेरठ)। निहायत ही रंज-ओ-ग़म और अफ़सोस के साथ अहले बिरादरी को यह इत्तिला दी जाती है कि आज दिन जुमेरात, बा-तारीख़ 10 सितंबर 2026 को दो अलग-अलग दुखद वाक़ियात में बिरादरी ने अपने दो अज़ीज़ अफ़राद को खो दिया। दोनों इंतक़ाल की ख़बर से अहले ख़ानदान, रिश्तेदारों और बिरादराना हज़रात में गहरा सदमा और मातम की कैफ़ियत है।

पहली इंतक़ाल की इत्तिला — न्यू जाफ़राबाद, दिल्ली

जनाब मो. यामीन साहब, मकान नंबर B-55, न्यू जाफ़राबाद, दिल्ली-53 की वालिदा मोहतरमा का आज इंतक़ाल हो गया। मरहूमा की उम्र तकरीबन 95 साल बताई गई है।

मिली जानकारी के मुताबिक़ मरहूमा की नमाज़-ए-जनाज़ा बाद नमाज़-ए-ईशा अदा की जाएगी और इसके बाद वेलकम स्थित क़ब्रिस्तान में उन्हें सुपुर्द-ए-ख़ाक किया जाएगा।

मरहूमा, मास्टर जमशेद, भजनपुरा वालों की ददिया सास थीं।

तमाम अहले ईमान और बिरादराना हज़रात से गुज़ारिश है कि मरहूमा की नमाज़-ए-जनाज़ा में शिरकत फ़रमाकर उनके लिए दुआ-ए-मग़फ़िरत करें और अपने मरहूमीन के लिए भी ख़ुसूसी दुआ करें।

राब्ता:
📞 9213505099
📞 9810032314
📞 9910703901
📞 9871490790


दूसरी इंतक़ाल की इत्तिला — क़स्बा सरधना, ज़िला मेरठ

क़स्बा सरधना, ज़िला मेरठ, उत्तर प्रदेश से भी एक बेहद दर्दनाक इंतक़ाल की इत्तिला सामने आई है।

अहले मुस्लिम मुल्तानी लोहार-बढ़ई बिरादराना हज़रात को निहायत दुख और अफ़सोस के साथ इत्तिला दी जाती है कि आज दिन जुमेरात, बा-तारीख़ 10 सितंबर 2026 को गाँव कलखेड़ा वालों के डॉ. क़य्यूम साहब के फ़र्ज़ंद जनाब शाहिद साहब का राजस्थान के एक शहर में पेश आए एक दर्दनाक हादसे के बाद क़ज़ा-ए-इलाही से इंतक़ाल हो गया।

इस दर्दनाक हादसे की ख़बर से परिवार और बिरादरी में गहरे रंज-ओ-ग़म की लहर दौड़ गई है। मिली जानकारी के मुताबिक़ आज शाम तक मय्यत के क़स्बा सरधना पहुंचने की उम्मीद है।

मय्यत के घर पहुंचने के बाद ज़िम्मेदारान की तरफ़ से नमाज़-ए-जनाज़ा और तदफ़ीन का वक़्त मुक़र्रर किया जाएगा। जैसे ही दफ़्न का समय और स्थान मुकर्रर होने की इत्तिला हासिल होगी, ख़बर को अपडेट कर दिया जाएगा।

तमाम बिरादराना हज़रात से गुज़ारिश है कि मरहूम के जनाज़े में शरीक होकर सवाब-ए-दारेन हासिल करें और इस मुश्किल व ग़म के मौक़े पर अहले ख़ाना के साथ इज़हार-ए-हमदर्दी फ़रमाएं।

दुआ-ए-मग़फ़िरत

इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन।

अल्लाह तआला दोनों मरहूमीन की मग़फ़िरत-ओ-बख़्शिश फ़रमाए, उनकी तमाम ख़ताओं और कोताहियों को माफ़ फ़रमाए, उनकी क़ब्रों को नूर से मुनव्वर फ़रमाए, उन्हें जन्नतुल फ़िरदौस में आला मक़ाम अता फ़रमाए और उनके दर्जात बुलंद फ़रमाए।

परवरदिगार-ए-आलम तमाम अहले ख़ाना को सब्र-ए-जमील अता फ़रमाए और इस सदमे को बर्दाश्त करने की तौफ़ीक़ दे।

आमीन या रब्बुल आलमीन।


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Tuesday, September 8, 2026

निहायत ही रंज-ओ-ग़म के साथ इत्तिला-ए-इंतक़ाल

बाग्गू वालों के भतीजे एवं मिस्त्री अली हसन साहब के बड़े साहबज़ादे मोहम्मद अनीस का लम्बी बीमारी के बाद कजा- ए - ईलाही से हुआ इंतक़ाल

निहायत ही रंज-ओ-ग़म और अफ़सोस के साथ तमाम बिरादरान-ए-हज़रात को यह इत्तिला दी जाती है कि हारून बाग्गू वालों के भतीजे एवं मिस्त्री अली हसन साहब के बड़े साहबज़ादे जनाब मोहम्मद अनीस का लम्बी बीमारी के चलते आज दिन मंगल, बा - तारीख़ 08 सितम्बर 2026 को कजा - ए - ईलाही से इंतक़ाल हो गया है।

इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन।

मरहूम की नमाज़-ए-जनाज़ा, इंशाअल्लाह आज ईशा की नमाज़ के बाद अदा की जाएगी और उसके बाद तकिया वाले क़ब्रिस्तान, बागपत में सुपुर्द-ए-ख़ाक किया जाएगा।

तमाम अहल-ए-बिरादरी और अज़ीज़-ओ-अक़ारिब से पुरख़ुलूस गुज़ारिश है कि जनाज़े में शिरकत फ़रमाकर मरहूम के लिए दुआ-ए-मग़फ़िरत करें और सवाब-ए-दारेन हासिल करें।

दुआ-ए-मग़फ़िरत

अल्लाह तआला मरहूम मोहम्मद अनीस साहब की कामिल मग़फ़िरत फ़रमाए, उनकी तमाम ख़ताएँ माफ़ फ़रमाए, क़ब्र को नूर से मुनव्वर और कुशादा फ़रमाए, क़ब्र की तमाम मंज़िलें आसान फ़रमाए और उन्हें जन्नतुल फ़िरदौस में आला मक़ाम अता फ़रमाए।

अल्लाह पाक तमाम पिछली मंज़िलों को आसान फ़रमाते हुए मरहूम को अपनी रहमत के साए में जगह अता फ़रमाए और घरवालों, अहल-ए-ख़ाना एवं तमाम अज़ीज़ों को यह सदमा सहने का सब्र-ए-जमील अता फ़रमाए।

आमीन या रब्बुल आलमीन।

मैय्यत के सिलसिले में राब्ता

अधिक मालूमात के लिए:

जनाब इरफ़ान साहब (बाग्गू वाले)
📞 8218611245

हारून (बाग्गू)
📞 9634974132


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