नौजवानों की मोबाइल गतिविधियों पर नज़र रखें वालिदैन, बहन-बेटियों की काउंसलिंग करें और घरों को टूटने से बचाने में निभाएँ ज़िम्मेदारी
फर्ज़ी सोशल मीडिया आईडी, ब्लैकमेलिंग और अश्लील तस्वीरों की धमकी जैसे मामले पूरे समाज के लिए तश्वीशनाक — मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी के वालिदैन, बुज़ुर्गों और ज़िम्मेदारों के लिए ग़ौर-ओ-फ़िक्र का पैग़ाम
ख़ास रिपोर्ट | ज़मीर आलम, प्रधान संपादक | उत्तर प्रदेश डेस्क, मुल्तानी समाज
खतौली, मुज़फ्फरनगर (उत्तर प्रदेश)। आज के डिजिटल दौर में मोबाइल फोन, इंटरनेट और सोशल मीडिया हमारी ज़िंदगी का अहम हिस्सा बन चुके हैं। जहाँ इन सहूलतों ने इल्म, कारोबार, रोज़गार और एक-दूसरे से राब्ते के नए रास्ते खोले हैं, वहीं इनका ग़लत इस्तेमाल कई घरों की खुशियों, नौजवानों के मुस्तक़बिल और परिवारों की इज़्ज़त के लिए गंभीर चुनौती बनता जा रहा है। खास तौर पर फर्ज़ी सोशल मीडिया आईडी बनाकर किसी को परेशान करना, ब्लैकमेल करना, बदनामी की धमकी देना और निजी तस्वीरों का ग़लत इस्तेमाल करना बेहद अफ़सोसनाक और संजीदा मामले हैं।
उत्तर प्रदेश के मुज़फ्फरनगर ज़िले के खतौली से सामने आई एक घटना ने इसी मसले पर ग़ौर करने की ज़रूरत को फिर उजागर किया है। उपलब्ध समाचार विवरण के मुताबिक, खतौली के मोहल्ला बिद्दीवाड़ा में एक युवती के नाम से कथित तौर पर फर्ज़ी इंस्टाग्राम आईडी बनाकर उसे ब्लैकमेल करने और एआई (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) की मदद से आपत्तिजनक तस्वीरें तैयार करके अपलोड करने की धमकी देने का मामला सामने आया। आरोप है कि युवती से पैसों की मांग भी की गई।समाचार में आरोपी की पहचान अनस, उम्र लगभग 26 वर्ष, पुत्र रईस आज़म, निवासी मोहल्ला बिद्दीवाड़ा, खतौली के रूप में बताई गई है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, पीड़िता की शिकायत पर खतौली थाने में एफआईआर संख्या 340/2026 दर्ज की गई। रिपोर्ट में आईटी एक्ट की धाराओं 66D और 67 का उल्लेख है। इसके बाद पुलिस ने मिशन शक्ति और एंटी रोमियो टीम की कार्रवाई के दौरान आरोपी को गिरफ्तार किए जाने की जानकारी दी है।
यहाँ यह स्पष्ट करना ज़रूरी है कि मामले से जुड़े आरोपों, पुलिस कार्रवाई और अदालत में दोषसिद्धि के बीच फ़र्क़ होता है। अंतिम अपराध साबित होना न्यायिक प्रक्रिया पर निर्भर करता है। इसलिए किसी भी व्यक्ति के बारे में अंतिम फ़ैसला अदालत के निर्णय के आधार पर ही किया जाना चाहिए।लेकिन इस मामले का एक बड़ा सामाजिक पहलू भी है। सवाल सिर्फ़ एक घटना का नहीं, बल्कि उस सोच और लापरवाही का है जिसके चलते कुछ लोग सोशल मीडिया को किसी की इज़्ज़त से खेलने, उसे डराने या उससे नाजायज़ फ़ायदा उठाने का ज़रिया समझ बैठते हैं। ऐसी हरकतें किसी भी सूरत में क़ाबिले-क़ुबूल नहीं हो सकतीं।
बिरादरी के नाम पर तक़रीर करने से पहले अपने घर की ज़िम्मेदारी भी समझें
मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी के तमाम बुज़ुर्गों, वालिदैन, नौजवानों और समाजी तंजीमों से एक संजीदा अपील है कि बिरादरी की तरक़्क़ी, इत्तेहाद और इस्लाह की बातें ज़रूर करें, लेकिन इसके साथ अपने घरों की हालत, बच्चों की तरबियत और परिवारों के माहौल पर भी पूरी तवज्जोह दें।
आज कुछ लोग बिरादरी के व्हाट्सऐप ग्रुपों में घंटों एक-दूसरे की कमियां निकालने, कमेटियों पर तनक़ीद करने और मुख़्तलिफ़ तंजीमों के दरमियान तनाज़े को बढ़ाने में अपनी क़ीमती ऊर्जा खर्च करते हैं। इख़्तिलाफ़ होना कोई नई बात नहीं है। हर समाज में राय का फ़र्क़ हो सकता है और तंजीमों के कामकाज पर सवाल उठाना भी जायज़ है, बशर्ते बातचीत तहज़ीब, दलील और शालीनता के दायरे में हो।
मगर ग़ौर करने की बात यह है कि अगर हम रोज़ाना कई घंटे बिरादरी के ग्रुपों में दूसरों की ग़लतियाँ तलाशने में लगा रहे हैं, तो क्या हमारे पास अपने बच्चों के साथ बैठने, उनकी बातें सुनने, उनकी परेशानियाँ समझने और उनकी रहनुमाई करने का वक़्त भी है?बिरादरी की इस्लाह का आग़ाज़ अपने घर से होना चाहिए। अपने बच्चों को अच्छा इंसान बनाना, उन्हें सही और ग़लत की पहचान कराना, दूसरों की इज़्ज़त करना सिखाना और उन्हें डिजिटल दुनिया के ख़तरों से आगाह करना भी समाजी ख़िदमत का ही हिस्सा है।
याद रखिए, बिरादरी की मज़बूती सिर्फ़ बड़े-बड़े दावों और व्हाट्सऐप पर लिखे पैग़ामों से नहीं आती; इसकी बुनियाद अच्छे अख़लाक़, बेहतर तरबियत और ज़िम्मेदार परिवारों से बनती है।
वालिदैन से ख़ास गुज़ारिश: बच्चों को वक़्त दें, सिर्फ़ नसीहत नहीं
आज के दौर में बच्चों के हाथों में मोबाइल फोन बहुत कम उम्र में आ जाता है। ऑनलाइन गेमिंग, इंस्टाग्राम, फेसबुक, व्हाट्सऐप और दूसरे डिजिटल प्लेटफॉर्म उनके रोज़मर्रा के मामूल का हिस्सा बन चुके हैं। ऐसे में वालिदैन की ज़िम्मेदारी पहले से कहीं ज़्यादा बढ़ गई है।
माँ-बाप को चाहिए कि वे अपने बच्चों की ज़िंदगी से बेख़बर न रहें। उनके दोस्तों, ऑनलाइन गतिविधियों, पढ़ाई, रोज़गार और रोज़मर्रा की परेशानियों के बारे में जानकारी रखें। इसका मतलब यह नहीं कि हर बच्चे को शक की निगाह से देखा जाए या उसकी हर बात पर पाबंदी लगा दी जाए। बल्कि ऐसा माहौल बनाया जाए कि बच्चा किसी परेशानी, ग़लती, धमकी या ब्लैकमेलिंग का शिकार होने पर सबसे पहले अपने वालिदैन से बात करने में महफ़ूज़ महसूस करे।
बच्चों से मोहब्बत के साथ बातचीत करें। उन्हें समझाएँ कि इंटरनेट पर हर शख़्स भरोसे के क़ाबिल नहीं होता। फर्ज़ी नाम, नक़ली तस्वीरें और झूठी पहचान बनाकर लोग दूसरों को अपने जाल में फँसाने की कोशिश कर सकते हैं।
वालिदैन अपने बच्चों को यह भी समझाएँ कि किसी अनजान व्यक्ति के साथ निजी तस्वीरें, वीडियो, घर का पता, स्कूल-कॉलेज की जानकारी, ओटीपी या दूसरी संवेदनशील जानकारी साझा न करें। अगर कोई धमकी दे, पैसों की मांग करे या तस्वीरें वायरल करने की बात कहे, तो डरकर उसकी बात मानने के बजाय तुरंत किसी भरोसेमंद बड़े और ज़रूरत पड़ने पर पुलिस से मदद लें।
बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा के लिए घर में साफ़ और उम्र के मुताबिक़ नियम तय किए जा सकते हैं। स्क्रीन टाइम, रात के वक़्त मोबाइल के इस्तेमाल और अनजान लोगों से ऑनलाइन राब्ते के बारे में परिवार में खुलकर बात होनी चाहिए।
मोबाइल की सुरक्षा के नाम पर बच्चों को बेइज़्ज़त करना, मारपीट करना या उनकी निजता को बिला वजह कुचलना सही रास्ता नहीं है। बेहतर तरीका भरोसा, समझदारी, निगरानी और खुली बातचीत का है।
नौजवानों से अपील: मोबाइल आपकी सहूलत है, किसी की ज़िंदगी बर्बाद करने का हथियार नहीं
मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी के तमाम नौजवानों से भी गुज़ारिश है कि वे अपनी डिजिटल ज़िंदगी को संजीदगी से लें। सोशल मीडिया पर किसी के नाम से फर्ज़ी आईडी बनाना, किसी की तस्वीर के साथ छेड़छाड़ करना, एआई की मदद से नक़ली अश्लील तस्वीरें तैयार करना, किसी को बदनाम करने की धमकी देना या पैसे वसूलने की कोशिश करना महज़ मज़ाक नहीं, बल्कि गंभीर और संभावित रूप से दंडनीय हरकतें हैं।
किसी लड़की या महिला की इज़्ज़त से खेलना, उसे डराना या उसकी निजी जानकारी का ग़लत इस्तेमाल करना न इंसानियत के मुताबिक़ है और न ही इस्लामी अख़लाक़ के मुताबिक़।
कुरआन-ए-करीम में दूसरों की तौहीन, बदगुमानी और ग़ीबत से बचने की तालीम दी गई है। हदीस की तालीम भी मुसलमान को अपनी ज़बान और अमल से दूसरों को महफ़ूज़ रखने की तरफ़ रहनुमाई करती है। लिहाज़ा एक मुसलमान नौजवान को चाहिए कि वह अपने किरदार, अपनी ज़बान और अपने डिजिटल अमल से दूसरों के लिए अमन और इत्मीनान का सबब बने।
नौजवानों को यह भी समझना चाहिए कि ऑनलाइन की गई हरकत का असर सिर्फ़ स्क्रीन तक महदूद नहीं रहता। किसी की तस्वीर या वीडियो का ग़लत इस्तेमाल उसकी मानसिक हालत, पढ़ाई, नौकरी, रिश्तों और पूरे परिवार पर गहरा असर डाल सकता है।
अगर कोई शख़्स किसी दूसरे की तस्वीर या वीडियो से छेड़छाड़ करता है, तो यह सोच लेना कि तकनीक की मदद से पहचान छिप जाएगी, ख़तरनाक ग़लतफ़हमी है। डिजिटल गतिविधियों की जाँच की जा सकती है और शिकायत मिलने पर क़ानूनी कार्रवाई भी हो सकती है।
मोबाइल का पासवर्ड और डिजिटल सुरक्षा: भरोसा भी, ज़िम्मेदारी भी
अक्सर घरों में बच्चों के मोबाइल इस्तेमाल को लेकर मतभेद पैदा होते हैं। कुछ वालिदैन चाहते हैं कि बच्चों के फोन का पासवर्ड उन्हें मालूम हो, जबकि नौजवान अपनी निजता को अहमियत देते हैं।
इस मसले का बेहतर हल आपसी भरोसे और ज़िम्मेदारी में है। परिवारों में यह सहमति बनाई जा सकती है कि नाबालिग बच्चों के मोबाइल और ऑनलाइन खातों की सुरक्षा के लिए वालिदैन को मुनासिब जानकारी और निगरानी का अधिकार हो। नौजवान भी अपने घरवालों के साथ ऐसा भरोसेमंद रिश्ता बनाएँ कि किसी परेशानी की सूरत में मदद लेने से न हिचकिचाएँ।
हर परिवार अपनी परिस्थितियों के मुताबिक़ नियम बना सकता है। लेकिन यह याद रहे कि पासवर्ड जान लेना ही अच्छी तरबियत की गारंटी नहीं है। असल मक़सद बच्चों में ऐसी समझ पैदा करना है कि वे वालिदैन की मौजूदगी में भी और उनकी गैरमौजूदगी में भी सही रास्ता चुनें।
अपने मोबाइल पर मज़बूत पासवर्ड रखें, दो-स्तरीय सुरक्षा (टू-फैक्टर ऑथेंटिकेशन) चालू करें और अनजान लिंक पर क्लिक करने से बचें। सोशल मीडिया की प्राइवेसी सेटिंग्स दुरुस्त रखें तथा अपनी निजी तस्वीरों और जानकारी को महफ़ूज़ रखें।
याद रहे, एहतियात कमज़ोरी नहीं, बल्कि अक़्लमंदी की निशानी है।
बहन-बेटियों के रिश्ते और घर-परिवार: मशवरा दें, मगर दबाव नहीं
हमारे समाज में शादी-ब्याह और घर-गृहस्थी को बहुत अहमियत हासिल है। परिवारों के बीच रिश्ते जोड़ना, नए घर बसाना और आपसी मोहब्बत को बढ़ावा देना एक नेक समाजी काम है। मगर शादी के बाद किसी बेटी को पेश आने वाली परेशानी को नज़रअंदाज़ करना या हर हाल में उसे ससुराल भेजने पर ज़ोर देना भी सही नहीं।
अगर किसी बहन या बेटी के वैवाहिक जीवन में तनाव पैदा हो, तो वालिदैन और बुज़ुर्गों को चाहिए कि वे उसकी बात इत्मीनान से सुनें। दोनों पक्षों की बात समझें और ज़रूरत पड़ने पर किसी समझदार, निष्पक्ष काउंसलर या भरोसेमंद विशेषज्ञ से मशवरा लें।
बेटियों को सिर्फ़ यह कह देना कि हर हाल में घर बचाओ, पर्याप्त नहीं है। उन्हें अपने हक़ूक़, अपनी सुरक्षा, इज़्ज़त और ज़िम्मेदारियों के बारे में भी समझाया जाना चाहिए। इसी तरह बेटों को भी अपनी बीवी के हक़ूक़, सम्मान, भावनाओं और घरेलू ज़िम्मेदारियों की अहमियत समझनी चाहिए।
किसी रिश्ते को बचाने की कोशिश तभी बेहतर नतीजा दे सकती है जब दोनों पक्ष इज़्ज़त, अमन और सुधार की नीयत से आगे बढ़ें। अगर किसी घर में हिंसा, ज़बरदस्ती, गंभीर उत्पीड़न या सुरक्षा का ख़तरा हो, तो पीड़ित को महज़ समाज के डर से उसी माहौल में रहने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए। ऐसी सूरत में पहले सुरक्षा और ज़रूरी क़ानूनी मदद को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
बेटी को मायके में सहारा देना उसकी नाकामी नहीं, बल्कि वालिदैन की मोहब्बत और ज़िम्मेदारी है। उसी तरह रिश्तों में मामूली मतभेदों को समझदारी से हल करने की कोशिश करना भी अहम है। मक़सद किसी को दबाना नहीं, बल्कि घरों में इज़्ज़त, सुकून और इंसाफ़ क़ायम करना होना चाहिए।
एआई और फर्ज़ी तस्वीरों का ख़तरा: हर घर तक पहुँचाएँ जागरूकता
पहले किसी की तस्वीर का ग़लत इस्तेमाल करने के लिए अलग-अलग तस्वीरों को जोड़ना या उनमें बदलाव करना पड़ता था। अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मदद से ऐसी तस्वीरें और वीडियो तैयार किए जा सकते हैं जो देखने में असली लगें, जबकि उनका वास्तविकता से कोई ताल्लुक़ न हो।
इस तकनीक का इस्तेमाल इल्म, कारोबार, तालीम और रचनात्मक कामों में फ़ायदेमंद हो सकता है। लेकिन किसी की इजाज़त के बग़ैर उसकी तस्वीर से अश्लील सामग्री बनाना, उसे फैलाना या ऐसी सामग्री के ज़रिये ब्लैकमेल करना बेहद गंभीर मामला है।
समाज को यह बात समझनी होगी कि इंटरनेट पर दिखाई देने वाली हर तस्वीर सच नहीं होती। किसी व्यक्ति के बारे में कोई तस्वीर, वीडियो या स्क्रीनशॉट सामने आए तो उसकी तस्दीक़ किए बग़ैर उसे आगे भेजना या उसके आधार पर किसी की इज़्ज़त पर हमला करना ग़लत है।
अगर किसी के साथ ऐसी हरकत होती है, तो उसे शर्मिंदगी या बदनामी के डर से ख़ामोश रहने की ज़रूरत नहीं। धमकी देने वाले को पैसे देना समस्या का स्थायी हल नहीं है। उपलब्ध चैट, प्रोफ़ाइल लिंक, संदेश, तारीख़ और दूसरे सबूत सुरक्षित रखें। आपत्तिजनक सामग्री को आगे साझा न करें और संबंधित प्लेटफॉर्म तथा साइबर अपराध शिकायत व्यवस्था के ज़रिये मदद लें।
अगर कोई ब्लैकमेलिंग का शिकार हो जाए तो क्या करे?
ऐसी स्थिति में घबराहट और बदनामी का डर इंसान को ग़लत फ़ैसले लेने पर मजबूर कर सकता है। इसलिए परिवारों और नौजवानों को कुछ ज़रूरी बातें मालूम होनी चाहिए:
- ब्लैकमेलर की मांग पूरी न करें: पैसे देने या उसकी दूसरी शर्तें मानने से वह दोबारा मांग कर सकता है।
- सबूत सुरक्षित रखें: चैट, यूज़रनेम, प्रोफ़ाइल लिंक, धमकी भरे संदेश और भुगतान संबंधी जानकारी का रिकॉर्ड रखें।
- खाते की सुरक्षा बढ़ाएँ: पासवर्ड बदलें, दो-स्तरीय सुरक्षा चालू करें और संदिग्ध खातों की रिपोर्ट करें।
- भरोसेमंद व्यक्ति को बताएँ: पीड़ित को अकेला न छोड़ें और उसकी बात को संजीदगी से सुनें।
- पुलिस या साइबर अपराध व्यवस्था से संपर्क करें: भारत में साइबर अपराध की शिकायत के लिए आधिकारिक पोर्टल cybercrime.gov.in का इस्तेमाल किया जा सकता है। तत्काल पुलिस सहायता की ज़रूरत हो तो 112 पर संपर्क किया जा सकता है।
- पीड़ित की पहचान महफ़ूज़ रखें: उसकी तस्वीरें, निजी संदेश या पहचान उजागर करने वाली जानकारी को सोशल मीडिया पर वायरल न करें।
खास तौर पर लड़कियों और महिलाओं के मामलों में परिवार का रवैया बेहद अहम है। अगर पीड़िता को ही दोषी ठहराया जाएगा, तो वह आगे मदद लेने से डर सकती है। इसलिए परिवार को उसके साथ खड़ा होना चाहिए और दोषी की जवाबदेही तय कराने में उसका साथ देना चाहिए।
बिरादरी के बुज़ुर्गों और तंजीमों के ज़िम्मेदारों से भी अपील
मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी की समाजी तंजीमों, कमेटियों, पंचायतों और ज़िम्मेदार शख़्सियतों को चाहिए कि वे सिर्फ़ इजलास, जलसों और तंजीमी सरगर्मियों तक अपनी ज़िम्मेदारी महदूद न रखें।
अपने-अपने इलाक़ों में डिजिटल सुरक्षा, नौजवानों की तरबियत, घरेलू रिश्तों की बेहतरी और महिलाओं के हक़ूक़ पर जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जाएँ। वालिदैन और नौजवानों के लिए ऐसे प्रोग्राम हों जिनमें उन्हें बताया जाए कि सोशल मीडिया का सुरक्षित इस्तेमाल कैसे किया जाए और ब्लैकमेलिंग या ऑनलाइन उत्पीड़न की स्थिति में मदद कहाँ से मिलेगी।
बिरादरी के व्हाट्सऐप ग्रुपों को भी सकारात्मक कामों के लिए इस्तेमाल किया जाए। एक-दूसरे की तौहीन, बेबुनियाद इल्ज़ामात और तंजीमी खींचतान के बजाय तालीम, रोज़गार, कारोबार, स्वास्थ्य, क़ानूनी जागरूकता और बच्चों की तरबियत पर बातचीत हो।
अगर कोई कमेटी समाज के लिए काम कर रही है, तो उसके काम का जायज़ा दलील और शालीनता के साथ लिया जा सकता है। लेकिन तंजीमी इख़्तिलाफ़ को इस हद तक न बढ़ाया जाए कि अपने घर, अपने बच्चे और अपनी पारिवारिक ज़िम्मेदारियाँ पीछे छूट जाएँ।
बिरादरी के हर ज़िम्मेदार व्यक्ति को ख़ुद से सवाल करना चाहिए कि वह समाज में नफ़रत बढ़ा रहा है या सुधार का रास्ता खोल रहा है।
वालिदैन के नाम एक ख़ास पैग़ाम
ऐ तमाम माँ-बाप! आपकी औलाद अल्लाह की तरफ़ से एक अमानत है। उसे सिर्फ़ अच्छा पहनाना, अच्छा खिलाना, स्कूल-कॉलेज भेजना और कारोबार के क़ाबिल बनाना ही आपकी ज़िम्मेदारी नहीं। उसे अच्छा इंसान बनाना, दूसरों की इज़्ज़त करना सिखाना, सही और ग़लत की पहचान कराना और मुश्किल वक़्त में उसका सहारा बनना भी उतना ही ज़रूरी है।
अपने बेटों को सिखाएँ कि किसी की बेटी भी किसी की अमानत और इज़्ज़त है। किसी महिला को परेशान करना, उसका पीछा करना, उसकी तस्वीरों का ग़लत इस्तेमाल करना या उसे धमकी देना मर्दानगी नहीं, बल्कि अख़लाक़ी गिरावट है।
अपनी बेटियों को भी डिजिटल सुरक्षा, आत्मसम्मान, अपने हक़ूक़ और मुश्किल हालात में मदद माँगने के तरीक़ों से आगाह करें। उन्हें ऐसा भरोसा दें कि वे किसी परेशानी को छिपाने के बजाय आपके सामने खुलकर रख सकें।
बच्चों की दोस्ती, पढ़ाई, संगत और ऑनलाइन गतिविधियों में दिलचस्पी लें, मगर उनकी हर बात को शक की नज़र से देखने के बजाय उन्हें समझने की कोशिश करें। घर में ऐसा माहौल बनाइए जहाँ नसीहत के साथ मोहब्बत हो, अनुशासन के साथ इंसाफ़ हो और ग़लती पर सुधार का मौक़ा भी मिले।
अगर हम अपने घरों में बेहतर तरबियत, आपसी भरोसा और ज़िम्मेदारी का माहौल क़ायम कर लें, तो बहुत-सी परेशानियों से बचाव मुमकिन है।
आख़िरी गुज़ारिश: किसी एक घटना को पूरी बिरादरी की पहचान न बनने दें
खतौली की इस घटना को लेकर पूरे खतौली शहर या पूरी मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी को इल्ज़ाम देना दुरुस्त नहीं होगा। किसी एक व्यक्ति के कथित अमल को पूरी क़ौम की पहचान नहीं बनाया जाना चाहिए। मगर ऐसी घटना से सबक़ लेना और भविष्य में इस तरह के वाक़ियात की रोकथाम के लिए कोशिश करना हर घर और समाज की साझा ज़िम्मेदारी है।
हमें अपने बच्चों को सिर्फ़ कामयाब कारोबारी, इंजीनियर, डॉक्टर या पेशेवर नहीं बनाना, बल्कि उन्हें ईमानदार, बा-अख़लाक़, ज़िम्मेदार और दूसरों के हक़ूक़ का एहतराम करने वाला इंसान भी बनाना है।
बिरादरी की इज़्ज़त सिर्फ़ नाम और पहचान से नहीं, बल्कि उसके अफ़राद के किरदार, इल्म, अख़लाक़ और समाज के प्रति ज़िम्मेदारी से बनती है।
आइए, आज यह अहद करें कि हम दूसरों की कमियाँ गिनाने से पहले अपने घरों की ज़िम्मेदारियाँ पूरी करेंगे; बिरादरी के ग्रुपों में तनाज़े बढ़ाने के बजाय इस्लाह की बात करेंगे; अपने बच्चों को मोबाइल देंगे तो उसके सही इस्तेमाल की तालीम भी देंगे; और किसी बहन-बेटी या परिवार के साथ परेशानी पेश आने पर तौहीन करने के बजाय इंसाफ़ और मदद का रास्ता अपनाएँगे।
खतौली जैसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए सिर्फ़ अफ़सोस करना काफ़ी नहीं। हमें अपने घरों, अपनी तरबियत, अपने रवैये और अपनी समाजी ज़िम्मेदारियों में सकारात्मक बदलाव लाना होगा।
यही हमारे घरों की हिफ़ाज़त, हमारी बिरादरी की बेहतरी और आने वाली नस्लों के महफ़ूज़ मुस्तक़बिल की बुनियाद है।
प्रस्तुति: मुल्तानी समाज — राष्ट्रीय समाचार पत्रिका, न्यूज़ पोर्टल एवं यूट्यूब चैनल
सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार से पंजीकृत, मुल्क की राजधानी नई दिल्ली से प्रसारित, पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी की क़ौमी समाचार पत्रिका “मुल्तानी समाज” के लिए उत्तर प्रदेश डेस्क से प्रधान संपादक ज़मीर आलम की ख़ास रिपोर्ट।
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