Tuesday, September 22, 2026

बिरादरी की ख़िदमत का जज़्बा रखने वालों के लिए खुला रास्ता—मुल्तानी समाज चैरिटेबल ट्रस्ट से जुड़कर अपने शहर में समाजी मिशन को आगे बढ़ाएँ

पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार-बढ़ई बिरादरी के लोगों से अपील—भीड़ नहीं, ख़िदमत के जज़्बे से सरशार चुनिंदा और साफ़-सुथरी छवि वाले लोगों की ज़रूरत

नई दिल्ली। पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार-बढ़ई बिरादरी के सामाजिक, शैक्षिक और सामुदायिक विकास के लिए काम कर रहे मुल्तानी समाज चैरिटेबल ट्रस्ट (रजि.) ऑल इंडिया से जुड़ने के इच्छुक बिरादराना हज़रात लगातार जानकारी हासिल करने के लिए संपर्क कर रहे हैं। बहुत से लोगों का सवाल है कि वे अपने शहर और कस्बे में रहते हुए ट्रस्ट के मिशन का हिस्सा किस तरह बन सकते हैं।

इसी सिलसिले में ट्रस्ट के फाउंडर ज़मीर आलम मुल्तानी की ओर से बिरादरी के लोगों को एक अहम इत्तिला दी गई है कि जो हज़रात अपने शहर या कस्बे में ट्रस्ट के साथ मिलकर समाजी ख़िदमत करना चाहते हैं, वे अपने क्षेत्र के 7, 9 या 11 ज़िम्मेदार लोगों की एक कमेटी गठित कर सकते हैं।

कमेटी में कौन लोग शामिल हों?

ट्रस्ट की ओर से यह कोशिश रहेगी कि कमेटी में ऐसे लोग शामिल हों जो आपस में बेहतर तालमेल रखते हों, बिरादरी की भलाई के लिए एक जैसी सोच और सकारात्मक विचार रखते हों तथा समाजी ख़िदमत के लिए वक़्त देने का जज़्बा रखते हों।

कमेटी में ऐसे लोगों को प्राथमिकता दी जाए जो:

  • समाजी और बिरादराना कामों में दिलचस्पी रखते हों।
  • अपने क्षेत्र में अच्छी और सम्मानजनक पहचान रखते हों।
  • आपसी भाईचारे और इत्तेहाद को अहमियत देते हों।
  • जिम्मेदारी को ईमानदारी और ख़ुलूस के साथ निभाने का जज़्बा रखते हों।
  • बिरादरी के बच्चों की तालीम, रोज़गार, सामाजिक जागरूकता और दूसरे सकारात्मक कार्यों में सहयोग करने के इच्छुक हों।
  • ट्रस्ट के नियमों और नीतियों के मुताबिक काम करने के लिए तैयार हों।

कमेटी बनने के बाद क्या करना होगा?

अपने शहर या कस्बे में कमेटी गठित करने के बाद कमेटी में शामिल सभी सदस्यों की पासपोर्ट साइज़ तस्वीर, आधार कार्ड की दोनों तरफ़ की स्पष्ट तस्वीर और मोबाइल नंबर ट्रस्ट को निर्धारित माध्यम से भेजे जा सकते हैं।

दस्तावेज़ प्राप्त होने और आवश्यक प्रक्रिया पूरी होने के बाद ट्रस्ट के हेड ऑफिस की ओर से संबंधित सदस्यों के लिए आईडी कार्ड, मेंबरशिप सर्टिफिकेट और अथॉरिटी लेटर आदि की प्रक्रिया पूरी की जाएगी।

इसके पश्चात ट्रस्ट की टीम आपसी सहमति से तय किए गए दिन और तारीख़ पर संबंधित शहर या कस्बे में पहुँचकर कमेटी के सदस्यों से मुलाक़ात करेगी और उन्हें ट्रस्ट की नीतियों, उद्देश्यों तथा समाजी मिशन की विस्तृत जानकारी दी जाएगी।

इस मौक़े पर कमेटी के सदस्यों का पगड़ी/साफ़ा पहनाकर और फूल-मालाओं से इस्तक़बाल भी किया जाएगा तथा उन्हें बिरादरी की ख़िदमत और समाजी कार्यों को आगे बढ़ाने के लिए ज़िम्मेदारियाँ सौंपी जाएँगी।

भीड़ नहीं, ख़िदमत का जज़्बा रखने वाले लोग चाहिए

ट्रस्ट के फाउंडर ज़मीर आलम मुल्तानी ने कहा कि हमारा मक़सद किसी भी शहर में महज़ भीड़ इकट्ठा करना नहीं है। हमारी कोशिश यह है कि हर शहर और कस्बे से ऐसे चुनिंदा, ज़िम्मेदार और समाजी ख़िदमत का जज़्बा रखने वाले लोग सामने आएँ जो अपनी ज़िम्मेदारी को पूरी ईमानदारी, ख़ुलूस और लगन के साथ निभा सकें।

उन्होंने कहा कि बिरादरी की तरक़्क़ी केवल किसी एक व्यक्ति या संस्था की कोशिश से मुमकिन नहीं, बल्कि इसके लिए समाज के ज़िम्मेदार लोगों को आगे आकर अपना किरदार अदा करना होगा। अगर हर शहर से कुछ ख़ुलूस रखने वाले लोग समाजी कामों को अपना मिशन समझकर आगे बढ़ें, तो बिरादरी के लिए सकारात्मक और दूरगामी काम किए जा सकते हैं।

हर शहर से उठे ख़िदमत की एक नई आवाज़

मुल्तानी समाज चैरिटेबल ट्रस्ट की कोशिश है कि बिरादरी के अलग-अलग शहरों और कस्बों में ऐसे लोगों का नेटवर्क तैयार हो जो स्थानीय स्तर पर समाजी और बिरादराना गतिविधियों को आगे बढ़ाने में अपना योगदान दे सकें।

इस मुहिम का मक़सद आपसी भाईचारा, इत्तेहाद, तालीम, समाजी जागरूकता और बिरादरी के बेहतर मुस्तक़बिल के लिए सकारात्मक माहौल तैयार करना है।

बिरादरी के तमाम हज़रात से गुज़ारिश है कि अगर आपके अंदर समाजी ख़िदमत का जज़्बा है और आप अपने शहर में बिरादरी के लिए कुछ बेहतर करना चाहते हैं, तो अपने भरोसेमंद साथियों के साथ मशवरा करके एक छोटी और ज़िम्मेदार कमेटी तैयार करें तथा ट्रस्ट से संपर्क करें।

याद रखिए—बिरादरी की ख़िदमत किसी ओहदे की मोहताज नहीं, बल्कि नीयत, ख़ुलूस और अमल की मोहताज है।


ख़ास रिपोर्ट

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार से पंजीकृत, मुल्क की राजधानी नई दिल्ली से प्रसारित पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी की क़ौमी समाचार पत्रिका, न्यूज़ पोर्टल एवं यूट्यूब चैनल "मुल्तानी समाज" के उत्तर प्रदेश डेस्क से प्रधान संपादक ज़मीर आलम की ख़ास रिपोर्ट।

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"मुल्तानी समाज"

अपनी बिरादरी की आवाज़ — अपनी पहचान

Monday, September 21, 2026

जनाब ज़लील अहमद का इंतिक़ाल, बिरादरी में ग़म की लहर, इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन —

नगीना (बिजनौर)। निहायत ही रंज-ओ-ग़म और अफ़सोस के साथ तमाम बिरादराना हज़रात को यह इत्तिला दी जाती है कि मोहल्ला लुहारी सराय, क़स्बा नगीना, ज़िला बिजनौर, उत्तर प्रदेश निवासी जनाब ज़लील अहमद वल्द जनाब शब्बीर अहमद, उम्र तक़रीबन 50 साल, आज मंगलवार, 22 सितंबर 2022 को क़ज़ा-ए-इलाही से इंतिक़ाल फ़रमा गए।

इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन।

मरहूम के इंतिक़ाल की ख़बर से खानदान, रिश्तेदारों, अहबाब और बिरादरी के लोगों में गहरा रंज-ओ-ग़म पाया जा रहा है। इस मुश्किल घड़ी में हम तमाम अहले-खानदान के ग़म में बराबर के शरीक हैं और बारगाह-ए-रब्बुल-आलमीन में मरहूम के लिए ख़ास दुआ-ए-मग़फ़िरत करते हैं।

या अल्लाह! मरहूम जनाब ज़लील अहमद की मुकम्मल मग़फ़िरत फ़रमा, उनकी ख़ताओं और कोताहियों से दरगुज़र फ़रमा, उनकी क़ब्र को नूर से मुनव्वर फ़रमा, क़ब्र को कुशादा और आराम की जगह बना, उन्हें जन्नतुल-फ़िरदौस में आला मुक़ाम अता फ़रमा और उनके तमाम गुनाहों को अपने फ़ज़्ल-ओ-करम से माफ़ फ़रमा। आमीन या रब्बुल-आलमीन।

दफ़्न और नमाज़-ए-जनाज़ा की जानकारी बाद में

ख़बर लिखे जाने तक मरहूम की नमाज़-ए-जनाज़ा और दफ़्न का वक़्त व मुक़ाम ज़िम्मेदारान की जानिब से तय नहीं हो पाया था। जैसे ही नमाज़-ए-जनाज़ा और दफ़्न से मुताल्लिक़ कोई जानकारी हासिल होगी, उसे ख़बर में फ़ौरन अपडेट कर दिया जाएगा।

तमाम बिरादराना हज़रात से गुज़ारिश है कि जानकारी मिलने पर नमाज़-ए-जनाज़ा में शिरकत फ़रमाएँ, मरहूम के लिए दुआ-ए-मग़फ़िरत करें और दफ़्न के मौक़े पर शरीक होकर सवाब-ए-दारैन हासिल करें।

क़ब्र में उतारते और मिट्टी देते वक़्त दुआ

मरहूम को क़ब्र में उतारते वक़्त तमाम हाज़िरीन अल्लाह तआला को याद करते हुए उनके लिए दुआ-ए-मग़फ़िरत करें। मिट्टी देते वक़्त यह आयत पढ़ना मुनासिब है:

مِنْهَا خَلَقْنَاكُمْ وَفِيهَا نُعِيدُكُمْ وَمِنْهَا نُخْرِجُكُمْ تَارَةً أُخْرَىٰ

"इसी मिट्टी से हमने तुम्हें पैदा किया, और इसी में तुम्हें वापस लौटाएँगे, और इसी से दोबारा तुम्हें निकालेंगे।"

या अल्लाह! इस क़ब्र को मरहूम के लिए जन्नत के बाग़ों में से एक बाग़ बना दे, इसे जहन्नम के गड्ढों में से कोई गड्ढा न बना। मरहूम को क़ब्र के सवालात में आसानी अता फ़रमा और उन्हें अपने रहमत व मग़फ़िरत के साये में जगह अता फ़रमा।

आमीन या रब्बुल-आलमीन।

अल्लाह तआला तमाम अहले-ख़ानदान को यह सदमा बर्दाश्त करने का हौसला, सब्र-ए-जमील और अज़्रे-अज़ीम अता फ़रमाए तथा मरहूम के लिए सदक़ा-ए-जारीया और नेक औलाद के ज़रिये उनके दरजात बुलंद फ़रमाए।

आमीन सुम्मा आमीन।


ख़ास रिपोर्ट

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार से पंजीकृत, मुल्क की राजधानी नई दिल्ली से प्रसारित, पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी की क़ौमी समाचार पत्रिका, न्यूज़ पोर्टल और यूट्यूब चैनल "मुल्तानी समाज" के लिए उत्तर प्रदेश डेस्क से प्रधान संपादक ज़मीर आलम की ख़ास रिपोर्ट।

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"मुल्तानी समाज"

अपनी बिरादरी की आवाज़ — अपनी पहचान

निहायत ही रंज-ओ-ग़म के साथ रिहाना बी के इंतक़ाल की इत्तिला

ग़ाज़ियाबाद/सरधना। निहायत ही रंज-ओ-ग़म और अफ़सोस के साथ तमाम मुस्लिम मुल्तानी लोहार, बढ़ई बिरादराना हज़रात को यह इत्तिला दी जाती है कि जनाब शमीम अहमद साहब, वल्द जनाब शब्बीर अहमद साहब, निवासी डबल चक्के, सरधना, ज़िला मेरठ, उत्तर प्रदेश, हाल मुक़ाम पसौंडा, गरिमा गार्डन, ज़िला ग़ाज़ियाबाद, उत्तर प्रदेश, निकट गोल चक्कर, दिल्ली, की अहलिया रिहाना बी का आज मंगलवार, 22 सितंबर 2026 को दिल्ली के सफ़दरजंग अस्पताल में इलाज के दौरान सुबह लगभग 9:00 बजे क़ज़ा-ए-इलाही से इंतक़ाल हो गया।

इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन।

मरहूमा के इंतक़ाल की ख़बर से खानदान, रिश्तेदारों, अज़ीज़-ओ-अक़ारिब और बिरादरी में गहरे रंज-ओ-ग़म की लहर दौड़ गई। इस मुश्किल और सदमे की घड़ी में तमाम बिरादराना हज़रात से गुज़ारिश है कि मरहूमा के लिए ख़ुसूसी तौर पर दुआ-ए-मग़फ़िरत फ़रमाएँ और अल्लाह तआला उनके तमाम सगीरा-ओ-कबीरा गुनाहों को माफ़ फ़रमाकर अपनी रहमत-ए-कामिला में जगह अता फ़रमाए।

नमाज़-ए-जनाज़ा और सुपुर्द-ए-ख़ाक

मिली हुई इत्तिला के मुताबिक़ मरहूमा रिहाना बी की नमाज़-ए-जनाज़ा नमाज़-ए-असर के बाद पसौंडा, गरिमा गार्डन, ज़िला ग़ाज़ियाबाद में अदा की जाएगी और इसके बाद मरहूमा को सुपुर्द-ए-ख़ाक किया जाएगा।

तमाम बिरादराना हज़रात से गुज़ारिश है कि अपनी मसरूफ़ियत में से वक़्त निकालकर जनाज़े में शिरकत फ़रमाएँ, मरहूमा के लिए दुआ-ए-मग़फ़िरत करें और ग़मज़दा खानदान के साथ शरीक-ए-ग़म हों।

जनाज़े में शिरकत के दौरान

जनाज़े में शामिल होने वाले हज़रात से गुज़ारिश है कि मरहूमा के लिए दिल से दुआ करें और अपनी ज़बान को ज़िक्र-ओ-दुआ से तर रखें।

नमाज़-ए-जनाज़ा के बाद दुआ:

اللّٰهُمَّ اغْفِرْ لَهَا وَارْحَمْهَا وَعَافِهَا وَاعْفُ عَنْهَا، وَأَكْرِمْ نُزُلَهَا وَوَسِّعْ مُدْخَلَهَا، وَاغْسِلْهَا بِالْمَاءِ وَالثَّلْجِ وَالْبَرَدِ۔

तर्जुमा:
ऐ अल्लाह! इसकी मग़फ़िरत फ़रमा, इस पर रहमत फ़रमा, इसे आफ़ियत अता फ़रमा और इससे दरगुज़र फ़रमा। इसके लिए अपनी मेहमाननवाज़ी को इज़्ज़त वाली बना और इसकी क़ब्र को कुशादा फ़रमा। इसे पानी, बर्फ़ और ओलों से धोकर पाक फ़रमा।

कब्र में उतारते वक़्त

जब मरहूमा को कब्र में उतारा जाए तो यह पढ़ना मस्नून है:

بِسْمِ اللّٰهِ وَعَلَىٰ مِلَّةِ رَسُولِ اللّٰهِ ﷺ

तर्जुमा:
अल्लाह के नाम के साथ और अल्लाह के रसूल ﷺ के दीन और तरीक़े पर।

कब्र में मरहूमा को रखने के बाद तमाम हाज़रीन उनके लिए दुआ-ए-मग़फ़िरत करें और अल्लाह तआला से सवाल करें कि वह कब्र के सफ़र को आसान फ़रमाए, कब्र को नूर से भर दे और उसे जन्नत के बाग़ों में से एक बाग़ बना दे।

मिट्टी देते वक़्त

सुपुर्द-ए-ख़ाक के मौक़े पर मिट्टी डालते हुए यह आयत पढ़ना मुनासिब है:

مِنْهَا خَلَقْنَاكُمْ وَفِيهَا نُعِيدُكُمْ وَمِنْهَا نُخْرِجُكُمْ تَارَةً أُخْرَىٰ

तर्जुमा:
हमने तुम्हें इसी मिट्टी से पैदा किया, इसी में तुम्हें वापस लौटाएँगे और इसी से दोबारा तुम्हें निकालेंगे।

इसके बाद मरहूमा के लिए दुआ की जाए:

ऐ अल्लाह! मरहूमा रिहाना बी की मग़फ़िरत फ़रमा, उनकी क़ब्र को नूर से मुनव्वर फ़रमा, उसे कुशादा और रौशन फ़रमा, उनकी तन्हाई को अपनी रहमत से दूर फ़रमा, कब्र के सवालात में आसानी अता फ़रमा, उनकी तमाम ख़ताओं से दरगुज़र फ़रमा और उन्हें जन्नतुल फ़िरदौस में आला मुक़ाम अता फ़रमा।

ऐ अल्लाह! जनाब शमीम अहमद साहब और तमाम पसमान्दगान को सब्र-ए-जमील अता फ़रमा। इस सदमे को बर्दाश्त करने की ताक़त अता फ़रमा और मरहूमा के लिए किया गया हर दुआ, सदक़ा और नेक अमल अपनी बारगाह में क़ुबूल फ़रमा।

आमीन या रब्बुल आलमीन।

तमाम मुस्लिम मुल्तानी लोहार, बढ़ई बिरादराना हज़रात से ख़ुसूसी गुज़ारिश है कि मरहूमा के लिए सूरह-ए-फ़ातिहा, सूरह-ए-इख़लास और दुआ-ए-मग़फ़िरत का एहतिमाम फ़रमाएँ और ग़मज़दा खानदान के साथ हमदर्दी का इज़हार करें।


ख़ास रिपोर्ट

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार से पंजीकृत, मुल्क की राजधानी नई दिल्ली से प्रसारित, पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी की मुल्क की इकलौती क़ौमी समाचार पत्रिका, न्यूज़ पोर्टल और यूट्यूब चैनल — “मुल्तानी समाज”

उत्तर प्रदेश डेस्क से
प्रधान संपादक — ज़मीर आलम की ख़ास रिपोर्ट


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“मुल्तानी समाज”

अपनी बिरादरी की आवाज़ — अपनी पहचान।

मुल्तानी-डे की तारीख़ पर बढ़ता इख़्तिलाफ़, 12 नवंबर की रवायत या अक्टूबर में अलग-अलग कार्यक्रम ?—मुल्तानी बिरादरी में उठ रहे सवालों पर गौर करने की ज़रूरत

नई दिल्ली/उत्तर प्रदेश डेस्क।

पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी में इन दिनों एक सामाजिक और तंजीमी मसले को लेकर चर्चा तेज़ होती जा रही है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश समेत मुल्क के मुख़्तलिफ़ शहरों में काम कर रही कई सामाजिक तंजीमों की ओर से अक्टूबर माह में “मुल्तानी-डे” के नाम से कार्यक्रम आयोजित किए जाने की घोषणाओं के बाद बिरादरी के एक तबके में यह सवाल उठ रहा है कि आखिर “मुल्तानी-डे” की तारीख़ क्या है और इसकी असल रवायत किस तारीख़ से जुड़ी हुई है?

कुछ तंजीमों की ओर से 15 अक्टूबर, 19 अक्टूबर और अक्टूबर माह की अन्य तारीख़ों में कार्यक्रम आयोजित करने की घोषणाएं सामने आने के बाद यह बहस और भी ज़ोर पकड़ रही है। दूसरी तरफ़ “मुल्तानी समाज” राष्ट्रीय समाचार पत्रिका से जुड़े आयोजकों का कहना है कि उनके द्वारा 12 नवंबर को “जश्ने मुल्तानी-डे” मनाने की रवायत लंबे अरसे से चली आ रही है।

12 नवंबर की रवायत का क्या है दावा?

“मुल्तानी समाज” की ओर से उपलब्ध कराई गई जानकारी के मुताबिक, मुल्तानी समाज चैरिटेबल ट्रस्ट (रजि.), जो नई दिल्ली से संचालित समाजसेवी संगठन है, ने वर्ष 2011 में अपनी बिरादरी के नाम पर “मुल्तानी समाज” नामक पत्रिका के पंजीकरण की प्रक्रिया पूरी की थी।

उस दौर में सोशल मीडिया आज की तरह आम नहीं था। बिरादरी के लोगों के बीच सामाजिक गतिविधियों, शादी-ब्याह, ताज़ियत, ख़ुशी और दूसरे सामाजिक मामलों की जानकारी पहुंचाने में पत्रिकाओं और समाचार-पत्रों का अहम किरदार हुआ करता था।

इसी सिलसिले में “मुल्तानी समाज” राष्ट्रीय समाचार पत्रिका से जुड़े पदाधिकारियों के मुताबिक, पत्रिका के राष्ट्रीय अधिवेशन और बिरादरी की एकजुटता के प्रतीक के तौर पर हर वर्ष 12 नवंबर को “जश्ने मुल्तानी-डे” मनाने की रवायत शुरू की गई।

इस जश्न की ख़ास बात क्या रही?

“मुल्तानी-डे” के इस जश्न की एक ख़ास बात यह बताई जाती है कि इसके लिए किसी एक शहर, मैदान या हॉल को स्थायी आयोजन स्थल नहीं बनाया गया।

बल्कि बिरादरी के लोगों को यह पैग़ाम दिया गया कि मुल्क के किसी भी हिस्से में रहने वाला मुल्तानी भाई—चाहे वह गांव में हो, कस्बे में हो, शहर में हो या विदेश में—अपने घर और अपने इलाके में अपनी सहूलियत के मुताबिक इस दिन को मनाए।

कहीं क़ुरआन-ए-पाक की तिलावत के साथ दुआ की जाती है, कहीं सामाजिक बैठक होती है, कहीं मिठाई तक़सीम की जाती है और कुछ नौजवान इस दिन को अपने अंदाज़ में केक काटकर भी मनाते हैं।

यानी इस जश्न को किसी एक मंच या किसी एक शहर तक महदूद रखने के बजाय इसे पूरी बिरादरी से जोड़ने की कोशिश किए जाने का दावा किया जाता है।

फिर अक्टूबर की तारीख़ों पर क्यों उठ रहे हैं सवाल?

बिरादरी में मौजूदा बहस का असल केंद्र यही सवाल है।

“मुल्तानी समाज” से जुड़े लोगों का कहना है कि जब 12 नवंबर को “मुल्तानी-डे” के नाम से एक रवायत पहले से चली आ रही है और बिरादरी के लोगों को इसकी जानकारी भी है, तो अक्टूबर में इसी नाम से अलग-अलग कार्यक्रम आयोजित करने की ज़रूरत और वजह क्या है?

वहीं दूसरी ओर, अक्टूबर में कार्यक्रम आयोजित करने वाली तंजीमों के अपने सामाजिक और तंजीमी कारण हो सकते हैं। इसलिए इस मामले में किसी भी पक्ष की मंशा पर अंतिम राय कायम करने के बजाय तारीख़, इतिहास और कार्यक्रम की रवायत को सामने रखकर बिरादरी के बुज़ुर्गों और जिम्मेदार लोगों के बीच बातचीत होना ज़रूरी दिखाई देता है।

बुज़ुर्गों के किरदार पर भी उठ रहे सवाल

मुल्तानी बिरादरी में जब भी किसी मामले को लेकर इख़्तिलाफ़ पैदा होता रहा है, बुज़ुर्गों, उलेमा, सामाजिक कार्यकर्ताओं और जिम्मेदार लोगों से यह उम्मीद की जाती रही है कि वे दोनों पक्षों को बैठाकर बातचीत के ज़रिए कोई रास्ता निकालें।

लेकिन मौजूदा विवाद को लेकर कुछ लोगों का कहना है कि जिन बुज़ुर्गों और सामाजिक हस्तियों से बीच-बचाव की उम्मीद की जा रही थी, उनकी तरफ़ से अभी तक कोई ऐसा साझा प्रयास सामने नहीं आया जिससे इस मसले को आपसी बातचीत से हल किया जा सके।

ऐसे में सवाल यह भी है कि अगर एक ही बिरादरी के लोग एक ही नाम से अलग-अलग तारीख़ों पर कार्यक्रम करेंगे, तो इससे इत्तेहाद बढ़ेगा या इख़्तिलाफ़?

मसला तारीख़ से ज़्यादा बिरादरी के इत्तेहाद का है

दरअसल, “मुल्तानी-डे” की बहस को केवल तारीख़ का विवाद समझना शायद इस पूरे मामले को छोटा कर देना होगा।

मुल्तानी बिरादरी देश के अलग-अलग हिस्सों में आबाद है और बड़ी संख्या में लोग रोज़गार, कारोबार और दूसरी वजहों से मुल्क के मुख़्तलिफ़ शहरों के अलावा विदेशों में भी रहते हैं।

ऐसे में किसी भी सामाजिक जश्न की असल खूबसूरती उसी वक्त कायम रह सकती है जब वह इत्तेहाद, भाईचारे, मोहब्बत और आपसी एहतराम का ज़रिया बने।

अगर एक ही बिरादरी के अलग-अलग संगठन एक ही नाम को अलग-अलग तारीख़ों और अलग-अलग बैनरों के साथ मनाएंगे, तो स्वाभाविक रूप से बिरादरी के आम लोगों के बीच यह सवाल पैदा होगा कि आखिर असल रवायत क्या है?

क्या दोनों पक्ष एक साथ बैठ सकते हैं?

मौजूदा हालात में सबसे अहम सवाल यही है कि क्या मुल्तानी बिरादरी की तमाम तंजीमें इस मसले को अनाना और तंजीमी मतभेद बनाने के बजाय आपसी मशवरे से हल कर सकती हैं?

अगर अक्टूबर में कार्यक्रम आयोजित करने वाली तंजीमें और 12 नवंबर की रवायत का दावा करने वाले आयोजक एक मेज़ पर बैठकर इतिहास, दस्तावेज़, पुरानी रवायत और कार्यक्रम की शुरुआत से संबंधित रिकॉर्ड सामने रखें, तो शायद इस बहस का कोई सम्मानजनक रास्ता निकाला जा सकता है।

आख़िरकार जश्न किसी एक शख़्स, संस्था या शहर की मिल्कियत नहीं होता; बिरादरी की तारीख़ और रवायत पूरी बिरादरी की अमानत होती है।

बिरादरी से एक सीधा सवाल

आज मुल्तानी बिरादरी के सामने सवाल यह नहीं होना चाहिए कि कौन किसके साथ है?

सवाल यह होना चाहिए कि—

“मुल्तानी-डे” की बुनियादी रवायत कब शुरू हुई?
उसकी तारीख़ का दस्तावेज़ी आधार क्या है?
और अगर 12 नवंबर से यह जश्न मनाया जाता रहा है तो अक्टूबर में उसी नाम से नए कार्यक्रम शुरू करने की ज़रूरत क्यों महसूस हुई?

इन सवालों का जवाब बहस, तकरार या इल्ज़ाम से नहीं, बल्कि दस्तावेज़, तारीख़ और आपसी मशविरे से मिलना चाहिए।

हमारा मक़सद टकराव नहीं, तजवीज़ और इत्तेहाद है

“मुल्तानी समाज” की ओर से कहा गया है कि इस रिपोर्ट का मक़सद किसी तंजीम, शख़्स या बिरादरी के किसी फर्द की तौहीन करना नहीं, बल्कि एक ऐसे सामाजिक मसले को सामने लाना है जिस पर बिरादरी के लोग चर्चा कर रहे हैं।

अगर किसी दूसरी तंजीम के पास “मुल्तानी-डे” की तारीख़, उसके आरंभ या उसके कार्यक्रम की कोई अलग दस्तावेज़ी रवायत मौजूद है, तो उसे भी बिरादरी के सामने लाया जाना चाहिए।

क्योंकि सच अगर दस्तावेज़ में मौजूद है तो उसे सामने आने से किसी को डर नहीं होना चाहिए।

बिरादरी का इत्तेहाद तारीख़ की बहस से बड़ा है और आपसी भाईचारा हर तंजीमी इख़्तिलाफ़ से ऊपर है।

अब फैसला मुल्तानी बिरादरी के संजीदा, समझदार और जागरूक अफ़राद को करना है कि “मुल्तानी-डे” की इस रवायत को एक तारीख़ और एक साझा मंच के तहत आगे बढ़ाया जाए या अक्टूबर और नवंबर में अलग-अलग कार्यक्रमों के रूप में मनाया जाए।

आपकी राय क्या है? अपनी बेबाक लेकिन तहज़ीब के दायरे में राय कमेंट में ज़रूर दें।


विशेष रिपोर्ट
उत्तर प्रदेश डेस्क
ज़मीर आलम, प्रधान संपादक

“मुल्तानी समाज”
सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार से पंजीकृत, मुल्क की राजधानी नई दिल्ली से प्रसारित, पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी की क़ौमी समाचार पत्रिका, न्यूज़ पोर्टल एवं यूट्यूब चैनल।

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“मुल्तानी समाज”

अपनी बिरादरी की आवाज़ — अपनी पहचान

मुल्तानी समाज चैरिटेबल ट्रस्ट में नई क़ौमी क़ियादत की तैयारी

1 अक्टूबर 2026 तक नए राष्ट्रीय सदर और राष्ट्रीय कार्यकारिणी के गठन का लक्ष्य — पूरे हिंदुस्तान से नाम और मशवरों की दरकार

नई दिल्ली। पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार, बढ़ई बिरादरी की क़ौमी सतह पर सामाजिक ख़िदमात के लिए सरगर्म “मुल्तानी समाज चैरिटेबल ट्रस्ट” (रजि.) ऑल इंडिया ने तंजीम को नए सिरे से मज़बूत और मुनज़्ज़म करने की दिशा में अहम पेशक़दमी शुरू कर दी है। ट्रस्ट की ओर से कुछ समय पूर्व अपनी राष्ट्रीय, प्रदेशीय, ज़िला, तहसील और नगर स्तर की तमाम इकाइयों को भंग कर दिया गया था। अब नई क़ौमी क़ियादत और नई तंजीमी इकाइयों के गठन की प्रक्रिया शुरू की जा रही है।

ट्रस्ट के फाउंडर ज़मीर आलम के मुताबिक़, तंजीम में हर तीन वर्ष बाद नया राष्ट्रीय सदर और नई राष्ट्रीय कार्यकारिणी गठित करने की व्यवस्था को आगे बढ़ाया जा रहा है। इस पहल का मक़सद यह है कि बिरादरी के हर तबक़े को तंजीम में अपनी ख़िदमात पेश करने का मौक़ा मिले और बिरादरी के ग़रीब से ग़रीब फ़र्द को भी उसकी सलाहियत, ख़िदमत और क़ाबिलियत की बुनियाद पर बड़ी से बड़ी तंजीमी ज़िम्मेदारी निभाने का अवसर हासिल हो।

पूरे हिंदुस्तान से नए राष्ट्रीय सदर के लिए नाम और मशवरे आमंत्रित

“मुल्तानी समाज चैरिटेबल ट्रस्ट” की ओर से दिल्ली, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, मध्य प्रदेश, गुजरात समेत पूरे हिंदुस्तान में रहने वाले मुस्लिम मुल्तानी लोहार, बढ़ई बिरादरी के अफ़राद से नए राष्ट्रीय सदर और राष्ट्रीय कार्यकारिणी के लिए नाम और मशवरे आमंत्रित किए गए हैं।

ट्रस्ट की अपील है कि बिरादरी के जो अफ़राद समाजी और तंजीमी ख़िदमात का तजुर्बा रखते हैं, लोगों को साथ लेकर चलने की सलाहियत रखते हैं और बिरादरी की बेहतरी के लिए अपना वक़्त और तजुर्बा पेश करना चाहते हैं, उनके नाम राष्ट्रीय सदर तथा राष्ट्रीय कार्यकारिणी के लिए सामने लाए जाएं।

बिरादरी के लोग अपने नाम, मशवरे और तंजीमी सुझाव हेल्पलाइन नंबर 8010884848 पर कॉल या व्हाट्सऐप के ज़रिए भेज सकते हैं।

1 अक्टूबर 2026 तक नई क़ौमी क़ियादत मुकम्मल करने का इरादा

फाउंडर ज़मीर आलम के मुताबिक़, ट्रस्ट का लक्ष्य है कि 1 अक्टूबर 2026 तक नए राष्ट्रीय सदर और राष्ट्रीय कार्यकारिणी का गठन मुकम्मल कर लिया जाए। इसके बाद मुल्क के मुख़्तलिफ़ हिस्सों में प्रदेश, ज़िला, तहसील और नगर स्तर की नई तंजीमी इकाइयों के गठन का सिलसिला शुरू किया जाएगा।

नई व्यवस्था के तहत राष्ट्रीय सदर को प्रदेशों, ज़िलों और नगरों तक तंजीमी ढांचे को तैयार करने में अहम ज़िम्मेदारी निभानी होगी। राष्ट्रीय कार्यकारिणी और प्रदेश स्तर के ज़िम्मेदार अफ़राद नए राष्ट्रीय सदर के साथ मिलकर इस तंजीमी सफ़र को आगे बढ़ाएंगे।

मिर्ज़ा से लेकर मुल्तानी, पुंवार और भट्टी तक—हर नाम, हर ख़ानदान का इस्तक़बाल

ट्रस्ट की ओर से साफ़ तौर पर कहा गया है कि पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार, बढ़ई बिरादरी से ताल्लुक़ रखने वाला कोई भी फ़र्द अपने नाम या ख़ानदानी पहचान की वजह से इस मंच से दूर न समझे।

मिर्ज़ा, मुल्तानी, पुंवार, भट्टी, लाजवान, मोटियार, खैरादी, नाकेदार, नालबंद, मुगल, बेग, आलम, हसन, अहमद, अली, खान या कोई भी दूसरा नाम अथवा ख़ानदानी पहचान इस्तेमाल करने वाले तमाम मुस्लिम मुल्तानी अफ़राद के लिए यह मंच खुला है।

ट्रस्ट की तरफ़ से बिरादरी के तमाम अफ़राद को खुला निमंत्रण है कि वे अपनी तंजीम, अपनी बिरादरी और अपनी आने वाली नस्लों के बेहतर मुस्तक़बिल के लिए इस सामाजिक सफ़र में शामिल हों।

नाम अलग हो सकते हैं, लेकिन बिरादरी का रिश्ता और सामाजिक मक़सद हमें एक साथ जोड़ता है।

18 वर्ष की उम्र पूरी करने वाला हर बिरादरी फ़र्द बन सकता है सदस्य

फाउंडर ज़मीर आलम के मुताबिक़, हिंदुस्तान में रहने वाला मुस्लिम मुल्तानी लोहार, बढ़ई बिरादरी का 18 वर्ष या उससे अधिक उम्र का हर फ़र्द ट्रस्ट की सदस्यता हासिल कर सकता है।

ट्रस्ट का मक़सद बिरादरी के लोगों को एक मज़बूत सामाजिक मंच पर जोड़ना, समाजी ख़िदमात को बढ़ावा देना, ज़रूरतमंद अफ़राद की मदद करना और नई नस्ल को तंजीमी व सामाजिक ज़िम्मेदारियों से जोड़ना है।

ट्रस्ट की ओर से बिरादरी के तमाम बुज़ुर्गों, नौजवानों, तालीमयाफ़्ता अफ़राद, कारोबारियों, समाजी ख़िदमतगारों और मुख़्तलिफ़ पेशों से जुड़े लोगों से अपील की गई है कि वे अपनी राय और मशवरे सामने लाएं और ऐसे अफ़राद के नाम भी भेजें जो बिरादरी की ख़िदमत के लिए क़ाबिल और तैयार हों।

राष्ट्रीय सदर और राष्ट्रीय कार्यकारिणी के लिए नाम/मशवरा भेजने हेतु

📞 8010884848
कॉल / व्हाट्सऐप


“मुल्तानी समाज” की ख़ास रिपोर्ट

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार से पंजीकृत, मुल्क की राजधानी नई दिल्ली से प्रसारित पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी की क़ौमी समाचार पत्रिका, न्यूज़ पोर्टल और यूट्यूब चैनल “मुल्तानी समाज” के लिए उत्तर प्रदेश डेस्क से प्रधान संपादक ज़मीर आलम की ख़ास रिपोर्ट।

अगर आप भी अपनी ख़बर, मज़मून (आर्टिकल), पैग़ाम, मुबारकबाद, ताज़ियती इश्तिहार, दिलचस्प वाक़ियात, तहरीर, अफ़साना (कहानी) या अपने कारोबार का इश्तिहार (विज्ञापन) क़ौमी सतह पर शाया या प्रसारित करवाना चाहते हैं तो राब्ता फ़रमाएँ।

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“आपका एतमाद ही हमारी सबसे बड़ी ताक़त है।”

“मुल्तानी समाज” — अपनी बिरादरी की आवाज़, अपनी पहचान।

नगीना में मुल्तानी बिरादरी के चुनावी नतीजे घोषित, जिसे अल्लाह तआला ने कामयाबी अता फ़रमाई, अब उसके कंधों पर बिरादरी की खिदमत की बड़ी ज़िम्मेदारी

नगीना, बिजनौर।
मुल्क की पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी के बीच नगीना में हुए चुनाव के नतीजे सामने आने के बाद बिरादरी के लोगों में खुशी और उत्साह का माहौल है। सामने आई चुनावी सूची में मुख़्तलिफ़ उम्मीदवारों को हासिल हुए वोटों के मुताबिक नतीजे दर्ज किए गए हैं।

बिरादरी के लोगों का कहना है कि चुनाव लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है और इसमें हर उम्मीदवार ने अपनी काबिलियत, मेहनत और लोगों के भरोसे के साथ हिस्सा लिया। आखिरकार जिसे जितने लोगों की हिमायत और एतमाद हासिल हुआ, उसे उसी के मुताबिक कामयाबी मिली।

मुस्लिम समाज में आम तौर पर यह यक़ीन रखा जाता है कि इज़्ज़त, कामयाबी और काम करने के मौक़े अल्लाह तआला की तरफ़ से होते हैं। इसी जज़्बे के साथ बिरादरी के लोगों का कहना है कि “अल्लाह तआला ने जिसे कामयाबी अता फ़रमाई है, अब उसे इस कामयाबी को बिरादरी की खिदमत का ज़रिया बनाना चाहिए।”

उम्मीदवारों को हासिल हुए वोट

उपलब्ध कराई गई चुनावी सूची के मुताबिक उम्मीदवारों को निम्नलिखित वोट हासिल हुए—

  1. खलीक अहमद — 837 वोट
  2. नासिर खान — 781 वोट
  3. नासिर अहमद पुत्र मरग़ूब — 766 वोट
  4. अज़ीम — 687 वोट
  5. मोहम्मद सिद्दीक़ — 686 वोट
  6. मतीन अहमद — 567 वोट
  7. मोहम्मद आसिम — 544 वोट
  8. इकरार अहमद — 513 वोट
  9. हैदर सलीम — 494 वोट
  10. आतिफ़ अमीर — 473 वोट
  11. मोहम्मद साजिद — 470 वोट
  12. आबिद अरशी — 467 वोट
  13. मोहम्मद जावेद — 467 वोट

कामयाबी के साथ बढ़ जाती है खिदमत की ज़िम्मेदारी

चुनाव का नतीजा सामने आने के बाद अब असल इम्तिहान खिदमत का है। बिरादरी के लोगों की उम्मीद है कि कामयाब होने वाले तमाम अफ़राद अपनी नई ज़िम्मेदारियों को सिर्फ़ एक ओहदे के तौर पर नहीं, बल्कि बिरादरी की खिदमत, समाज की बेहतरी और आने वाली नस्लों के बेहतर मुस्तक़बिल की अमानत समझकर निभाएंगे।

बिरादरी की तरक़्क़ी के लिए तालीम को फ़रोग़ देना, नौजवानों को सही दिशा और रोज़गार के मौक़े उपलब्ध कराने की कोशिश करना, ज़रूरतमंद परिवारों की मदद करना, आपसी इत्तेहाद को मज़बूत करना तथा सामाजिक और फ़लाही कामों को बढ़ावा देना ऐसे अहम मैदान हैं, जिन पर नई क़यादत से बिरादरी को उम्मीदें रहती हैं।

इत्तेहाद और भाईचारा ही बिरादरी की असल ताक़त

चुनावी मुकाबला अपनी जगह, लेकिन नतीजे आने के बाद तमाम उम्मीदवार और बिरादरी के लोग एक-दूसरे के साथ मिलकर आगे बढ़ें—यही किसी भी सामाजिक चुनाव की खूबसूरती होती है।

बिरादरी के बुज़ुर्गों और समझदार अफ़राद की भी यह ज़िम्मेदारी है कि वे नौजवानों और नई क़यादत की रहनुमाई करें, जबकि नई क़यादत को चाहिए कि वह हर तबक़े की राय का एहतराम करते हुए सबको साथ लेकर चले।

जीत किसी एक शख़्स की हो सकती है, लेकिन बिरादरी की तरक़्क़ी तभी मुमकिन है जब कामयाबी का फ़ायदा पूरी बिरादरी तक पहुँचे।

“मुल्तानी समाज” की जानिब से मुबारकबाद और नेक दुआ

क़ौमी समाचार पत्रिका “मुल्तानी समाज” की जानिब से नगीना मुल्तानी बिरादरी के तमाम कामयाब उम्मीदवारों को दिली मुबारकबाद पेश की जाती है।

दुआ है कि अल्लाह तआला तमाम कामयाब अफ़राद को अपनी ज़िम्मेदारियां ईमानदारी, इंसाफ़, ख़ुलूस और समझदारी के साथ निभाने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए, उन्हें बिरादरी की खिदमत का जज़्बा दे और नगीना की मुल्तानी बिरादरी में इत्तेहाद, भाईचारा, तालीम, तरक़्क़ी और ख़ुशहाली को फ़रोग़ अता फ़रमाए। आमीन या रब्बुल आलमीन।

ज़रूरी वज़ाहत

यह ख़बर उपलब्ध कराई गई चुनाव परिणाम सूची/चित्र में दर्ज आंकड़ों के आधार पर तैयार की गई है। आधिकारिक चुनाव प्राधिकरण की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध न होने की वजह से इन आंकड़ों को स्वतंत्र रूप से प्रमाणित आधिकारिक चुनाव परिणाम के तौर पर पेश नहीं किया जा रहा है।


सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार से पंजीकृत, मुल्क की राजधानी नई दिल्ली से प्रसारित, पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी की क़ौमी समाचार पत्रिका, न्यूज़ पोर्टल और यूट्यूब चैनल “मुल्तानी समाज” के लिए उत्तर प्रदेश डेस्क से प्रधान संपादक ज़मीर आलम की ख़ास रिपोर्ट।

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Sunday, September 20, 2026

नगीना के इलेक्शन में खतौली की तंजीम की सरगर्म मौजूदगी ने उठाया बड़ा सवाल

दूसरों की कमेटियों के चुनाव में इतनी दिलचस्पी तो अपनी कमेटी के इलेक्शन का इंतज़ार कब तक?

खतौली/नगीना/बिजनौर, उत्तर प्रदेश।

मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी में तंजीमी निज़ाम, जम्हूरी उसूल और कमेटियों के बाकायदा चुनाव को लेकर हमेशा से यह उम्मीद की जाती रही है कि बिरादरी की तमाम तंजीमें अपने-अपने दस्तूरी और जम्हूरी उसूलों के मुताबिक काम करें और वक्त-वक्त पर अपनी कमेटियों में चुनाव के ज़रिए नई क़यादत और नए लोगों को आगे आने का मौक़ा दें।

हाल ही में नगीना, जनपद बिजनौर में बिरादरी की एक कमेटी के ओहदेदारों के चुनाव का कार्यक्रम आयोजित किया गया। इस चुनाव में जनपद मुज़फ्फरनगर के क़स्बा खतौली से संचालित हमारी ही बिरादरी की एक सोसायटी के सदर और उनकी कमेटी के ज़िम्मेदारों की मौजूदगी और सरगर्म हिस्सेदारी सोशल मीडिया पर सामने आई तस्वीरों और वीडियो में दिखाई दी।

सोशल मीडिया पर उस तंजीम के ज़िम्मेदारों द्वारा साझा की गई तस्वीरों और वीडियो से यह ज़ाहिर होता है कि खतौली की उक्त सोसायटी के सदर अपनी कमेटी के कई ज़िम्मेदारों के साथ नगीना पहुंचे और वहां बिरादरी की कमेटी के चुनावी अमल में सक्रिय रूप से शामिल रहे।

बिरादरी की नज़र से देखा जाए तो यह पहल अपने आप में खुशी की बात है। आखिर हमारी बिरादरी की किसी भी कमेटी में अगर चुनाव का अमल होता है और बिरादरी के लोग जम्हूरी तरीके से अपने ओहदेदारों का इंतिखाब करते हैं, तो यह तंजीमी बेदारी की अलामत है।

लेकिन इसी तस्वीर का दूसरा पहलू भी है, और यही वह सवाल है जो बिरादरी के कई लोगों के ज़ेहन में लंबे समय से मौजूद है।

जब दूसरों की कमेटियों के चुनाव इतने अहम हैं, तो अपनी कमेटी का चुनाव कब?

बिरादरी में यह सवाल बार-बार उठता रहा है कि खतौली से संचालित यह तंजीम खुद अपनी कमेटी के बाकायदा चुनाव कब कराएगी?

जो तंजीम दूसरी जगहों पर बिरादरी की कमेटियों के चुनाव को इतनी दिलचस्पी और संजीदगी के साथ मुकम्मल कराने में अपना किरदार अदा कर रही है, उससे बिरादरी की स्वाभाविक उम्मीद है कि वह अपने यहां भी उसी जम्हूरी रिवायत को कायम करेगी।

नगीना में हुए चुनाव के दौरान खतौली की तंजीम के ज़िम्मेदारों की सरगर्म मौजूदगी देखकर बिरादरी के बीच एक दिलचस्प सवाल ने फिर सिर उठाया है—

क्या नगीना के चुनाव से खतौली की तंजीम के ज़िम्मेदार अपने लिए भी कोई जम्हूरी सबक लेकर लौटे हैं?

अगर जवाब हाँ है, तो यक़ीनन बिरादरी को इससे खुशी होगी।

नगीना से मिले जम्हूरी सबक को खतौली में कब लागू किया जाएगा?

नगीना में चुनावी अमल को करीब से देखने के बाद अगर खतौली की यह तंजीम भी अपनी कमेटी के चुनाव कराने की तैयारी करती है, तो इसे बिरादरी में एक सकारात्मक और काबिल-ए-तारीफ पहल के तौर पर देखा जाएगा।

क्योंकि किसी भी तंजीम की ताक़त सिर्फ उसके ओहदेदारों में नहीं होती, बल्कि उसकी असल ताक़त बिरादरी के भरोसे, जम्हूरी निज़ाम, जवाबदेही और नई क़यादत को मौक़ा देने में होती है।

वक्त के साथ कमेटियों में नए लोगों को आगे आने का मौक़ा देना, पुराने ज़िम्मेदारों के तजुर्बे से फायदा उठाना और बाकायदा चुनाव के ज़रिए जिम्मेदारियां तय करना किसी भी बिरादरी की तंजीमी तरक़्क़ी के लिए अहम है।

बिरादरी अब खतौली की तरफ देख रही है

नगीना में चुनाव का अमल मुकम्मल हो चुका है। वहां बिरादरी ने अपने ओहदेदारों का इंतिखाब कर लिया।

अब निगाहें खतौली की तरफ हैं।

बिरादरी यह देखना चाहती है कि नगीना के चुनाव में इतनी दिलचस्पी और सरगर्मी के साथ शामिल होने वाली खतौली की यह सोसायटी अपनी कमेटी के चुनाव का ऐलान कब करती है?

क्या वहां भी बिरादरी के तमाम अफ़राद को जम्हूरी तरीके से अपनी पसंद की क़यादत चुनने का मौक़ा मिलेगा?

क्या पुरानी कमेटी में नए लोगों को शामिल करने और जिम्मेदारियों में तब्दीली का अमल शुरू होगा?

और सबसे अहम सवाल—

क्या नगीना का चुनाव खतौली की तंजीम के लिए भी एक नई जम्हूरी शुरुआत का पैग़ाम लेकर आया है?

इन सवालों का जवाब आने वाला वक्त देगा।

“मुल्तानी समाज” की अपील

हमारा मक़सद किसी शख्स, कमेटी या तंजीम की तौहीन करना नहीं, बल्कि बिरादरी में जम्हूरी सोच, तंजीमी पारदर्शिता और जवाबदेही के हवाले से एक अहम सवाल बिरादरी के सामने रखना है।

अगर खतौली की सोसायटी के दस्तूर में कमेटी के चुनाव का कोई तय तरीका या मुद्दत मौजूद है, तो बिरादरी को उसी दस्तूर के मुताबिक चुनाव की तारीख और तरीका बताकर तस्वीर साफ़ करनी चाहिए।

और अगर नगीना के चुनाव से कोई अच्छा तंजीमी सबक मिला है, तो उससे बेहतर बात क्या होगी कि वही सबक अब अपनी तंजीम में भी अमल के साथ नज़र आए।

दूसरों की कमेटियों में जम्हूरियत को मजबूत करना यक़ीनन अच्छी बात है—और अपनी कमेटी में भी उसी जम्हूरियत को कायम करना उससे भी ज्यादा खूबसूरत मिसाल होगी।

अब बिरादरी इंतज़ार में है कि खतौली की यह सोसायटी अपनी कमेटी के चुनाव का ऐलान कब करती है।


मुल्तानी समाज — ख़ास रिपोर्ट

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार से पंजीकृत, मुल्क की राजधानी नई दिल्ली से प्रसारित, पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी की मुल्क की इकलौती क़ौमी समाचार पत्रिका, न्यूज़ पोर्टल और यूट्यूब चैनल “मुल्तानी समाज” के लिए उत्तर प्रदेश डेस्क से प्रधान संपादक ज़मीर आलम की ख़ास रिपोर्ट।

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“मुल्तानी समाज”

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