दौलत से सुविधाएँ खरीदी जा सकती हैं, मगर अदब, तहज़ीब, ईमानदारी, सुकून और इंसानियत नहीं—इन नेमतों की बुनियाद तालीम है
हमारा मुआशरा उस वक़्त खूबसूरत बनता है, जब उसमें अदब-ओ-तहज़ीब, बेफ़िक्री, सुकून, ईमानदारी, इल्म, शऊर और इंसानियत का बोलबाला हो। जब लोग एक-दूसरे का एहतराम करें, बातचीत में मिठास हो, घरों में सुकून हो, गलियों और मोहल्लों में पाकीज़ा माहौल हो और हर शख़्स दूसरे के दुख-दर्द को अपना समझकर उसके काम आए—तो ऐसा मुआशरा किसी जन्नत से कम नहीं होता।
लेकिन सवाल यह है कि क्या ये तमाम नेमतें सिर्फ़ दौलत और माल-ओ-दौलत से हासिल की जा सकती हैं?
यक़ीन जानिए—हरगिज़ नहीं।
दौलत इंसान को सहूलियतें दे सकती है, मगर अदब नहीं खरीद सकती।
दौलत घर बड़ा कर सकती है, मगर दिल बड़ा नहीं कर सकती।
दौलत सामान मुहैया करा सकती है, मगर इल्म, शऊर, तहज़ीब और सच्ची इंसानियत पैदा नहीं कर सकती।
इन तमाम खूबियों की बुनियाद तालीम है।
तालीम सिर्फ़ डिग्री का नाम नहीं
हमें तालीम का मतलब महज़ स्कूल, कॉलेज या डिग्री हासिल करना नहीं समझना चाहिए। असल तालीम वह है जो इंसान को अच्छा इंसान बनाना सिखाए, बड़ों का एहतराम, छोटों से मोहब्बत, पड़ोसी के हक़ की अदायगी, सच बोलने की आदत, मेहनत की क़द्र और समाज के लिए कुछ करने का जज़्बा पैदा करे।
तालीम इंसान के अंदर यह शऊर पैदा करती है कि वह अपने साथ-साथ अपने खानदान, बिरादरी, मुआशरे और मुल्क की तरक़्क़ी के बारे में भी सोचे।
बदलाव अपने घर से शुरू करना होगा
अगर हम सचमुच अपने मुआशरे में कोई बड़ा बदलाव देखना चाहते हैं तो शुरुआत किसी दूसरे से नहीं, अपने आप से करनी होगी।
हमें खुद से सवाल करना होगा—
मैंने तालीम के लिए अब तक क्या किया?
जो करना चाहिए था, वह क्यों नहीं किया?
आज और अभी से मैं क्या कर सकता हूँ?
और इसके बाद सिर्फ़ खुद तक सीमित न रहकर दूसरों को भी तालीम की तरफ़ लाने की कोशिश करनी होगी।
अपने आसपास नज़र डालिए।
हमारे पड़ोस में कितने बच्चे हैं?
हमारे रिश्तेदारों में कितने बच्चे पढ़ रहे हैं?
किस बच्चे की पढ़ाई आर्थिक परेशानी की वजह से रुक रही है?
किसे किताबों की ज़रूरत है?
किसे स्कूल की फीस की मदद चाहिए?
किसे सही मशवरे और रहनुमाई की ज़रूरत है?
अगर हम सिर्फ़ एक बच्चे की पढ़ाई की ज़िम्मेदारी उठाने का फैसला कर लें, तो यह भी एक बड़ी शुरुआत हो सकती है।
जिसके पास हैसियत है, वह किसी और का सहारा बने
हर शख़्स अपनी हैसियत के मुताबिक़ किसी बच्चे की मदद कर सकता है।
कोई फीस में मदद कर सकता है, कोई किताबें दिला सकता है, कोई यूनिफॉर्म और स्टेशनरी का इंतज़ाम कर सकता है, कोई स्कूल में दाख़िला दिलाने में मदद कर सकता है और कोई सिर्फ़ बच्चे की हौसला-अफ़ज़ाई करके उसे पढ़ाई जारी रखने के लिए प्रेरित कर सकता है।
और अगर किसी एक शख़्स के लिए यह सब करना मुश्किल हो, तो वह अपने दोस्तों, रिश्तेदारों और साहिबे-हैसियत लोगों से मिलकर एक बच्चे की मदद का इंतज़ाम कर सकता है।
फिर एक शख़्स दूसरे को तैयार करे, दूसरा तीसरे को और तीसरा चौथे को।
यही छोटी-छोटी कोशिशें आगे चलकर एक बड़ी तहरीक बन सकती हैं।
तालीम आम होगी तो हर शोबे में हमारी मौजूदगी होगी
जब हमारी नई नस्ल तालीम हासिल करेगी तो आने वाले वक़्त में मुख़्तलिफ़ शोबों में डॉक्टर, इंजीनियर, वकील, शिक्षक, प्रोफ़ेसर, अफ़सर, कारोबारी, वैज्ञानिक और दूसरे ज़िम्मेदार ओहदों पर काबिज़ लोग सामने आएँगे।
और यहीं से मुआशरे में वास्तविक बदलाव की शुरुआत होगी।
बड़े बदलाव हमेशा सिर्फ़ दौलत से नहीं आते। कई बार बदलाव के लिए इल्म, शऊर, क़ाबिलियत और ज़िम्मेदार ओहदों पर मौजूदगी ज़्यादा अहम होती है।
इसलिए हमारी कोशिश यह होनी चाहिए कि कोई बच्चा सिर्फ़ आर्थिक परेशानियों की वजह से तालीम से महरूम न रहे।
आइए, आज ही एक बच्चे की ज़िम्मेदारी लेते हैं
तालीम को आम करने के लिए किसी बड़े ऐलान का इंतज़ार मत कीजिए।
अपने घर से शुरुआत कीजिए।
अपने पड़ोस से शुरुआत कीजिए।
अपने रिश्तेदारों से शुरुआत कीजिए।
एक बच्चे से शुरुआत कीजिए।
अगर हर साहिबे-हैसियत शख़्स सिर्फ़ एक ज़रूरतमंद बच्चे की तालीम में मदद करने का अहद कर ले, तो देखते ही देखते यह कोशिश एक ऐसी ज़ंजीर बन सकती है जिसकी हर कड़ी किसी न किसी बच्चे के बेहतर मुस्तक़बिल से जुड़ी होगी।
अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त हमारे दिलों में इल्म और तालीम की मोहब्बत पैदा फरमाए, हमारी औलाद को नेक, क़ाबिल और बा-अख़लाक़ बनाए और हमें अपनी बिरादरी तथा पूरे मुआशरे की बेहतरी के लिए काम करने की तौफ़ीक़ अता फरमाए।
आमीन या रब्बुल आलमीन।
शुक्रिया।
आपका — गुलज़ार अहमद ‘गुलज़ार’
मुल्तानी समाज — विशेष प्रस्तुति
सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार से पंजीकृत, मुल्क की राजधानी नई दिल्ली से प्रसारित, पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी की क़ौमी समाचार पत्रिका, न्यूज़ पोर्टल और YouTube चैनल “मुल्तानी समाज” के लिए उत्तर प्रदेश डेस्क से प्रधान संपादक ज़मीर आलम की ख़ास रिपोर्ट।
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