ज़मीर आलम मुल्तानी की पुरअसर अपील—तमाम तंजीमें अपनी पहचान, अपने प्रोजेक्ट और अपने नाम से काम करें; बिरादरी को गुमराह करने के बजाय इत्तेहाद और भाईचारे को फ़रोग़ दें
“किसी तंजीम की मुख़ालफ़त हमारा मक़सद नहीं, लेकिन किसी दूसरी तंजीम की मेहनत, पहचान और परंपरागत कार्यक्रमों को अपना बताकर बिरादरी के सामने पेश करना किसी भी सूरत में मुनासिब नहीं।”
शामली, उत्तर प्रदेश। पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी की सामाजिक, तंजीमी और फ़लाही सरगर्मियों के बीच मुल्तानी समाज चैरिटेबल ट्रस्ट के फाउंडर एवं सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार से पंजीकृत राष्ट्रीय समाचार पत्रिका “मुल्तानी समाज” के प्रधान संपादक ज़मीर आलम मुल्तानी ने मुल्क भर की बिरादरी की तमाम तंजीमों, सोसाइटियों, अंजुमनों और उनके ज़िम्मेदार ओहदेदारों के नाम एक ख़ास और अहम अपील जारी की है।
उन्होंने कहा कि मुल्तानी समाज चैरिटेबल ट्रस्ट को मुल्क के किसी भी सूबे, ज़िले, शहर या क़स्बे से संचालित होने वाली किसी भी तंजीम, सोसाइटी या कमेटी से कोई व्यक्तिगत गिला-शिकवा नहीं है। बिरादरी की ख़िदमत करने वाली हर तंजीम का अपना मुक़ाम, अपनी पहचान और अपनी अहमियत है। हमारी दिली ख़्वाहिश है कि बिरादरी की तमाम तंजीमें तरक़्क़ी करें, समाज के बच्चों की तालीम, नौजवानों की रहनुमाई, ज़रूरतमंदों की मदद, आपसी इत्तेहाद और सामाजिक बेहतरी के लिए बढ़-चढ़कर काम करें।
लेकिन अफ़सोस उस रवैये पर है, जिसमें कुछ ज़िम्मेदार अफ़राद अपनी ज़ाती ज़िद, ग़लतफ़हमी या तंजीमी बरतरी के तसव्वुर में दूसरी तंजीमों की मेहनत और उनकी पुरानी पहचान को नज़रअंदाज़ करते हुए उनके परंपरागत कार्यक्रमों, ख़ास नामों और प्रोजेक्ट्स से मिलते-जुलते नाम अपनाकर उन्हें अपनी नई पहल के तौर पर पेश करने की कोशिश करते हैं। ऐसे रवैये से बिरादरी में ग़लतफ़हमियां पैदा होती हैं, आपसी एतमाद को ठेस पहुंचती है और इत्तेहाद के बजाय इख़्तिलाफ़ात को बढ़ावा मिलता है।
तंजीमों के ज़िम्मेदार याद रखें—बिरादरी का एतमाद एक बड़ी अमानत है
ज़मीर आलम मुल्तानी ने ख़ास तौर पर पश्चिमी उत्तर प्रदेश समेत मुल्क के मुख़्तलिफ़ इलाक़ों में काम करने वाली तंजीमों के ज़िम्मेदारों से मुख़ातिब होते हुए कहा कि आप चाहे अपने संगठन को तंजीम कहें, सोसाइटी कहें या अंजुमन, आपके साथ जुड़ा हुआ हर फ़र्द आपकी बातों और आपके दावों पर एतमाद करता है। वह आपको बिरादरी का ख़ैरख़्वाह समझकर आपकी आवाज़ पर साथ खड़ा होता है। लिहाज़ा यह एतमाद आपके लिए सिर्फ़ ताक़त नहीं, बल्कि एक बड़ी अमानत और जवाबदेही भी है।
बिरादरी के कुछ सौ अफ़राद का किसी सदर या कमेटी के साथ खड़ा हो जाना इस बात की दलील नहीं कि अब हर फ़ैसला सही है या किसी दूसरी तंजीम के काम को नज़रअंदाज़ किया जा सकता है। असल क़ाबिलियत यह नहीं कि कितने लोग आपकी आवाज़ पर जमा हो जाते हैं, बल्कि यह है कि आप कितने लोगों के हक़, इज़्ज़त और जज़्बात का एहतराम करते हैं।
बिरादरी की रहनुमाई का हक़ उसी को ज़ेब देता है जो अपने किरदार, अमल, सच्चाई और इंसाफ़ से लोगों का एतमाद क़ायम रखे।
दूसरी तंजीम के प्रोजेक्ट की नकल से अपनी पहचान क़ायम नहीं की जा सकती
प्रधान संपादक ज़मीर आलम मुल्तानी ने कहा कि हर तंजीम को अपनी सोच के मुताबिक़ नए प्रोजेक्ट शुरू करने, अपने सामाजिक और फ़लाही कार्यक्रम आयोजित करने तथा बिरादरी की बेहतरी के लिए काम करने का पूरा हक़ है। हम किसी भी तंजीम की जायज़ सरगर्मियों के ख़िलाफ़ नहीं हैं और न ही किसी को बिरादरी की ख़िदमत करने से रोकना चाहते हैं।
लेकिन अगर कोई तंजीम किसी दूसरी तंजीम के पहले से जारी प्रोजेक्ट, उसकी पहचान से जुड़े नाम या उसके परंपरागत कार्यक्रम की नक़ल करके उसे अपनी नई पहल के तौर पर पेश करती है, तो इस पर सवाल उठना लाज़िमी है। किसी दूसरे के काम से मुतास्सिर होकर बेहतर काम करना और बात है, लेकिन किसी की मेहनत, पहचान या परंपरा को इस तरह अपनाना कि लोगों के सामने असल और नक़ल का फ़र्क़ ही मिट जाए, बिल्कुल दूसरी बात है।
किसी भी प्रोजेक्ट की असलियत और उसके इस्तेमाल के बारे में बात करते समय तारीख़, दस्तावेज़, पुराने रिकॉर्ड, प्रकाशित ख़बरों, तस्वीरों, वीडियो और दूसरे भरोसेमंद सबूतों को अहमियत दी जानी चाहिए। महज़ बड़े दावों, भीड़ या बार-बार किसी बात को दोहराने से कोई दावा हक़ीक़त नहीं बन जाता।
ज़मीर आलम मुल्तानी ने कहा कि बिरादरी के लोग आज शायद किसी के दावे पर भरोसा करके उसके साथ खड़े हों, लेकिन जब कभी उनके सामने तमाम हक़ाइक़ और दस्तावेज़ात आएंगे, तो वह ख़ुद फ़ैसला करने की सलाहियत रखते हैं। इसलिए किसी को भी यह ग़लतफ़हमी नहीं पालनी चाहिए कि चंद दिनों, महीनों या कुछ सालों तक लोगों को किसी बात पर यक़ीन दिलाकर हमेशा के लिए हक़ीक़त को छिपाया जा सकता है।
परंपरागत कार्यक्रमों की पहचान का एहतराम करें
उन्होंने कहा कि बिरादरी में हर तंजीम को अपने परंपरागत कार्यक्रम आयोजित करने, अपनी सालगिरह मनाने और अपनी सामाजिक पहचान को मज़बूत करने का हक़ हासिल है। लेकिन किसी दूसरी तंजीम के पहले से स्थापित कार्यक्रम या उससे जुड़े नाम को लेकर ऐसा अंदाज़ अपनाना, जिससे बिरादरी के लोगों में असल आयोजक, कार्यक्रम की परंपरा या उसकी पहचान को लेकर ग़लतफ़हमी पैदा हो, किसी भी ज़िम्मेदाराना रवैये के मुताबिक़ नहीं है।
ख़ास तौर पर जब किसी कार्यक्रम का नाम किसी तंजीम की कई सालों की मेहनत, लगातार सरगर्मियों और पुराने रिकॉर्ड से जुड़ा हो, तो उसका इस्तेमाल करने से पहले तमाम पहलुओं पर संजीदगी से ग़ौर करना चाहिए। किसी नाम या प्रोजेक्ट को लेकर तना-तनी पैदा करने के बजाय बातचीत, दस्तावेज़ी हक़ाइक़ और आपसी मशविरे के ज़रिए मसले का हल तलाश करना चाहिए।
हमारी अपील है कि बिरादरी की तमाम तंजीमें अपने-अपने प्रोजेक्ट शुरू करें, नए नाम रखें, नए सामाजिक कार्यक्रम आयोजित करें और ऐसे काम करें जिन पर पूरी बिरादरी फ़ख़्र कर सके। लेकिन किसी दूसरी तंजीम की मेहनत और पहचान को नज़रअंदाज़ करके अपनी कामयाबी का रास्ता तलाश करने से गुरेज़ करें।
झूठे दावों और ज़िद के बजाय सच्चाई और जवाबदेही को अपनाएं
ज़मीर आलम मुल्तानी ने कहा कि किसी भी तंजीम के सदर, सरपरस्त, ओहदेदार या कमेटी के सदस्य को अपनी ज़िम्मेदारी का एहसास होना चाहिए। ओहदा मिलने के बाद इंसान की जवाबदेही कम नहीं, बल्कि और बढ़ जाती है। बिरादरी के लोगों की रहनुमाई करने वालों को चाहिए कि वह अपनी ज़बान, अपने दावों और अपने अमल में एहतियात बरतें।
अगर किसी प्रोजेक्ट, कार्यक्रम या नाम को लेकर इख़्तिलाफ़ पैदा हो गया है, तो उसे ज़ाती अनबन, तंजीमी दुश्मनी या बिरादरी की तक़सीम का ज़रिया बनाने के बजाय बातचीत और वसातत से हल किया जाए। अगर किसी से ग़लती हुई है, तो उसे अपनी ग़लती तस्लीम करने और ज़रूरत पड़ने पर सार्वजनिक तौर पर माफ़ी मांगने में देर नहीं करनी चाहिए। अपनी इस्लाह करना कमज़ोरी नहीं, बल्कि अच्छे किरदार और बुलंद ज़र्फ़ की निशानी है।
याद रखिए, लोगों का एतमाद हासिल करने में बरसों लगते हैं, लेकिन उसे खोने के लिए कभी-कभी एक ग़लत फ़ैसला ही काफ़ी होता है।
जो लोग आज अपने साथ खड़े अफ़राद की तादाद देखकर ख़ुद को जवाबदेही से ऊपर समझने लगते हैं, उन्हें यह भी याद रखना चाहिए कि वक़्त हमेशा एक जैसा नहीं रहता। आज के हमनवा कल सवाल भी कर सकते हैं। इसलिए भीड़ की ताक़त पर नाज़ करने के बजाय अपने किरदार, सच्चाई और इंसाफ़ पर भरोसा करना चाहिए।
इस्लामी तालीमात हमें इत्तेहाद, अमानतदारी और हुस्ने-अख़लाक़ का सबक़ देती हैं
हमारा ताल्लुक़ एक ऐसी बिरादरी से है जिसकी सामाजिक पहचान, पारिवारिक रिश्ते और आपसी मेल-जोल हमारे लिए बहुत अहमियत रखते हैं। इस्लामी तालीमात भी सच बोलने, अमानत की हिफ़ाज़त करने, इंसाफ़ करने और दूसरों के हुक़ूक़ का एहतराम करने की तालीम देती हैं।
ऐसे में हमारी ज़िम्मेदारी और भी बढ़ जाती है कि हम अपने तंजीमी इख़्तिलाफ़ात को बिरादरी के आपसी रिश्तों पर हावी न होने दें। सदर, सरपरस्त, कमेटी के सदस्य और समाज के दूसरे ज़िम्मेदार अफ़राद अपने किरदार से मिसाल क़ायम करें। एक-दूसरे की मेहनत का एहतराम करें, किसी के बारे में बेबुनियाद बातें फैलाने से बचें और हर मसले को सच्चाई तथा इंसाफ़ की बुनियाद पर देखें।
बिरादरी की तरक़्क़ी किसी एक तंजीम की कामयाबी तक महदूद नहीं है। जब मुख़्तलिफ़ तंजीमें तालीम, रोज़गार, फ़लाह, नौजवानों की रहनुमाई और समाजी इस्लाह के लिए अपने-अपने दायरे में काम करेंगी, तभी हमारी बिरादरी मज़बूत होगी।
हमारी कोशिश किसी तंजीम को नीचा दिखाना नहीं, बल्कि ऐसे रवैयों की निशानदेही करना है जो बिरादरी के एतमाद और इत्तेहाद को नुक़सान पहुंचा सकते हैं।
तमाम तंजीमों के ज़िम्मेदारों से हमारी पुरख़ुलूस अपील
मुल्क भर की तमाम तंजीमों, सोसाइटियों, अंजुमनों, सदूर, सरपरस्तों और कमेटियों के ज़िम्मेदारों से गुज़ारिश है कि वह इन बातों पर संजीदगी से ग़ौर करें:
- अपनी तंजीम के नाम, पहचान और काम को अपनी मेहनत से आगे बढ़ाएं।
- दूसरी तंजीमों के परंपरागत कार्यक्रमों और प्रोजेक्ट्स से जुड़े नामों का इस्तेमाल करते वक़्त उनके पुराने रिकॉर्ड, पहचान और संभावित ग़लतफ़हमी को ध्यान में रखें।
- बिरादरी के लोगों को किसी प्रोजेक्ट या कार्यक्रम की तारीख़, शुरुआत, इतिहास और आयोजक के बारे में ग़लत जानकारी न दें।
- किसी भी इख़्तिलाफ़ को ज़ाती दुश्मनी या तंजीमी टकराव में तब्दील न होने दें।
- अगर किसी नाम या प्रोजेक्ट को लेकर एतराज़ सामने आए, तो उसे नज़रअंदाज़ करने के बजाय बातचीत और दस्तावेज़ी हक़ाइक़ के ज़रिए हल करें।
- अगर किसी की पहचान या मेहनत के बारे में ग़लत दावा हुआ हो, तो उसकी वज़ाहत करें और ज़रूरत पड़ने पर सार्वजनिक तौर पर माफ़ी मांगें।
- बिरादरी के नौजवानों को तंजीमी नफ़रत के बजाय इल्म, तालीम, रोज़गार, ख़िदमत और आपसी इत्तेहाद की राह दिखाएं।
हम तमाम तंजीमों को अपना समझते हैं और चाहते हैं कि हर तंजीम तरक़्क़ी करे। मगर तरक़्क़ी का रास्ता किसी दूसरे की पहचान को कमज़ोर करके नहीं, बल्कि अपने किरदार और काम को मज़बूत बनाकर तय किया जाना चाहिए।
आख़िरी गुज़ारिश—अल्लाह से डरें, हक़ का एहतराम करें और बिरादरी को जोड़ें
ज़मीर आलम मुल्तानी ने अपनी अपील के इख़्तिताम पर कहा कि बिरादरी की ख़िदमत का दावा करने वाले हर शख़्स को अपने दिल में यह सवाल ज़रूर करना चाहिए कि क्या उसके अमल से बिरादरी जुड़ रही है या बिखर रही है? क्या उसकी कोशिशों से लोगों का एतमाद बढ़ रहा है या कम हो रहा है? और क्या वह दूसरों की मेहनत का एहतराम कर रहा है या अपनी पहचान बनाने के लिए उनके काम को नज़रअंदाज़ कर रहा है?
हम किसी भी तंजीम के ख़िलाफ़ नहीं हैं। हमारा मक़सद सिर्फ़ यह है कि बिरादरी के तमाम इदारों के दरमियान एहतराम, इंसाफ़, एतमाद और भाईचारा क़ायम रहे। जो भी तंजीम अच्छे काम कर रही है, उसे आगे बढ़ना चाहिए। जो नए प्रोजेक्ट शुरू करना चाहती है, उसे शुरू करने चाहिए। लेकिन हर किसी को अपनी पहचान और अपनी मेहनत के साथ आगे बढ़ना चाहिए।
अल्लाह तआला हम सबको सच बोलने, अमानतदारी के साथ काम करने, दूसरों के हुक़ूक़ का एहतराम करने और बिरादरी की बेहतरी के लिए मिल-जुलकर कोशिश करने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए। आमीन।
आख़िर में बस इतना ही कहना है कि समझदारों के लिए इशारा काफ़ी है। वक़्त रहते अपनी इस्लाह कर लेना ही बेहतर है। बिरादरी किसी एक शख़्स, सदर या कमेटी की जागीर नहीं, बल्कि हम सबकी साझा अमानत है। इसकी इज़्ज़त, एकता और आने वाली नस्लों के मुस्तक़बिल की हिफ़ाज़त करना हम सबकी सामूहिक ज़िम्मेदारी है।
जारीकर्ता:
ज़मीर आलम मुल्तानी
फाउंडर, मुल्तानी समाज चैरिटेबल ट्रस्ट
प्रधान संपादक, “मुल्तानी समाज” राष्ट्रीय समाचार पत्रिका
विशेष रिपोर्ट — उत्तर प्रदेश डेस्क
सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार से पंजीकृत तथा नई दिल्ली से प्रसारित “मुल्तानी समाज” राष्ट्रीय समाचार पत्रिका, न्यूज़ पोर्टल एवं यूट्यूब चैनल।
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