Saturday, September 26, 2026

गुज़ारिश: तालीम को आम कीजिए, क्योंकि असली बदलाव इल्म से आता है

दौलत से सुविधाएँ खरीदी जा सकती हैं, मगर अदब, तहज़ीब, ईमानदारी, सुकून और इंसानियत नहीं—इन नेमतों की बुनियाद तालीम है

हमारा मुआशरा उस वक़्त खूबसूरत बनता है, जब उसमें अदब-ओ-तहज़ीब, बेफ़िक्री, सुकून, ईमानदारी, इल्म, शऊर और इंसानियत का बोलबाला हो। जब लोग एक-दूसरे का एहतराम करें, बातचीत में मिठास हो, घरों में सुकून हो, गलियों और मोहल्लों में पाकीज़ा माहौल हो और हर शख़्स दूसरे के दुख-दर्द को अपना समझकर उसके काम आए—तो ऐसा मुआशरा किसी जन्नत से कम नहीं होता।

लेकिन सवाल यह है कि क्या ये तमाम नेमतें सिर्फ़ दौलत और माल-ओ-दौलत से हासिल की जा सकती हैं?

यक़ीन जानिए—हरगिज़ नहीं।

दौलत इंसान को सहूलियतें दे सकती है, मगर अदब नहीं खरीद सकती।
दौलत घर बड़ा कर सकती है, मगर दिल बड़ा नहीं कर सकती।
दौलत सामान मुहैया करा सकती है, मगर इल्म, शऊर, तहज़ीब और सच्ची इंसानियत पैदा नहीं कर सकती।

इन तमाम खूबियों की बुनियाद तालीम है।

तालीम सिर्फ़ डिग्री का नाम नहीं

हमें तालीम का मतलब महज़ स्कूल, कॉलेज या डिग्री हासिल करना नहीं समझना चाहिए। असल तालीम वह है जो इंसान को अच्छा इंसान बनाना सिखाए, बड़ों का एहतराम, छोटों से मोहब्बत, पड़ोसी के हक़ की अदायगी, सच बोलने की आदत, मेहनत की क़द्र और समाज के लिए कुछ करने का जज़्बा पैदा करे।

तालीम इंसान के अंदर यह शऊर पैदा करती है कि वह अपने साथ-साथ अपने खानदान, बिरादरी, मुआशरे और मुल्क की तरक़्क़ी के बारे में भी सोचे।

बदलाव अपने घर से शुरू करना होगा

अगर हम सचमुच अपने मुआशरे में कोई बड़ा बदलाव देखना चाहते हैं तो शुरुआत किसी दूसरे से नहीं, अपने आप से करनी होगी।

हमें खुद से सवाल करना होगा—

मैंने तालीम के लिए अब तक क्या किया?
जो करना चाहिए था, वह क्यों नहीं किया?
आज और अभी से मैं क्या कर सकता हूँ?

और इसके बाद सिर्फ़ खुद तक सीमित न रहकर दूसरों को भी तालीम की तरफ़ लाने की कोशिश करनी होगी।

अपने आसपास नज़र डालिए।
हमारे पड़ोस में कितने बच्चे हैं?
हमारे रिश्तेदारों में कितने बच्चे पढ़ रहे हैं?
किस बच्चे की पढ़ाई आर्थिक परेशानी की वजह से रुक रही है?
किसे किताबों की ज़रूरत है?
किसे स्कूल की फीस की मदद चाहिए?
किसे सही मशवरे और रहनुमाई की ज़रूरत है?

अगर हम सिर्फ़ एक बच्चे की पढ़ाई की ज़िम्मेदारी उठाने का फैसला कर लें, तो यह भी एक बड़ी शुरुआत हो सकती है।

जिसके पास हैसियत है, वह किसी और का सहारा बने

हर शख़्स अपनी हैसियत के मुताबिक़ किसी बच्चे की मदद कर सकता है।

कोई फीस में मदद कर सकता है, कोई किताबें दिला सकता है, कोई यूनिफॉर्म और स्टेशनरी का इंतज़ाम कर सकता है, कोई स्कूल में दाख़िला दिलाने में मदद कर सकता है और कोई सिर्फ़ बच्चे की हौसला-अफ़ज़ाई करके उसे पढ़ाई जारी रखने के लिए प्रेरित कर सकता है।

और अगर किसी एक शख़्स के लिए यह सब करना मुश्किल हो, तो वह अपने दोस्तों, रिश्तेदारों और साहिबे-हैसियत लोगों से मिलकर एक बच्चे की मदद का इंतज़ाम कर सकता है।

फिर एक शख़्स दूसरे को तैयार करे, दूसरा तीसरे को और तीसरा चौथे को।

यही छोटी-छोटी कोशिशें आगे चलकर एक बड़ी तहरीक बन सकती हैं।

तालीम आम होगी तो हर शोबे में हमारी मौजूदगी होगी

जब हमारी नई नस्ल तालीम हासिल करेगी तो आने वाले वक़्त में मुख़्तलिफ़ शोबों में डॉक्टर, इंजीनियर, वकील, शिक्षक, प्रोफ़ेसर, अफ़सर, कारोबारी, वैज्ञानिक और दूसरे ज़िम्मेदार ओहदों पर काबिज़ लोग सामने आएँगे।

और यहीं से मुआशरे में वास्तविक बदलाव की शुरुआत होगी।

बड़े बदलाव हमेशा सिर्फ़ दौलत से नहीं आते। कई बार बदलाव के लिए इल्म, शऊर, क़ाबिलियत और ज़िम्मेदार ओहदों पर मौजूदगी ज़्यादा अहम होती है।

इसलिए हमारी कोशिश यह होनी चाहिए कि कोई बच्चा सिर्फ़ आर्थिक परेशानियों की वजह से तालीम से महरूम न रहे।

आइए, आज ही एक बच्चे की ज़िम्मेदारी लेते हैं

तालीम को आम करने के लिए किसी बड़े ऐलान का इंतज़ार मत कीजिए।

अपने घर से शुरुआत कीजिए।
अपने पड़ोस से शुरुआत कीजिए।
अपने रिश्तेदारों से शुरुआत कीजिए।
एक बच्चे से शुरुआत कीजिए।

अगर हर साहिबे-हैसियत शख़्स सिर्फ़ एक ज़रूरतमंद बच्चे की तालीम में मदद करने का अहद कर ले, तो देखते ही देखते यह कोशिश एक ऐसी ज़ंजीर बन सकती है जिसकी हर कड़ी किसी न किसी बच्चे के बेहतर मुस्तक़बिल से जुड़ी होगी।

अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त हमारे दिलों में इल्म और तालीम की मोहब्बत पैदा फरमाए, हमारी औलाद को नेक, क़ाबिल और बा-अख़लाक़ बनाए और हमें अपनी बिरादरी तथा पूरे मुआशरे की बेहतरी के लिए काम करने की तौफ़ीक़ अता फरमाए।

आमीन या रब्बुल आलमीन।

शुक्रिया।

आपका — गुलज़ार अहमद ‘गुलज़ार’


मुल्तानी समाज — विशेष प्रस्तुति

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार से पंजीकृत, मुल्क की राजधानी नई दिल्ली से प्रसारित, पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी की क़ौमी समाचार पत्रिका, न्यूज़ पोर्टल और YouTube चैनल “मुल्तानी समाज” के लिए उत्तर प्रदेश डेस्क से प्रधान संपादक ज़मीर आलम की ख़ास रिपोर्ट।

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अगर आप भी अपनी ख़बर, मज़मून (आर्टिकल), पैग़ाम, मुबारकबाद, ताज़ियती इश्तिहार, दिलचस्प वाक़ियात, तहरीर, अफ़साना (कहानी) या अपने कारोबार का इश्तिहार (विज्ञापन) क़ौमी सतह पर शाया (प्रकाशित) अथवा प्रसारित करवाना चाहते हैं, तो बराए मेहरबानी नीचे दिए गए नंबरों पर राब्ता फ़रमाएँ।

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इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊनमहज़ 15 बरस की उम्र में दुनिया-ए-फ़ानी से रुख़्सत हुई मासूम — बज्जन खानदान में पसरा ग़म, हर आँख हुई अश्कबार

बड़ौत, जनपद बागपत।
निहायत ही रंज-ओ-ग़म और दिल को सदमा पहुँचा देने वाली इत्तिला है कि आज शनिवार, 26 सितंबर 2026 को जनाब मौलाना अब्दुल जब्बार साहब के बड़े भाई मरहूम अब्दुल गफूर साहब (बज्जन खानदान) की पोती तथा मोहम्मद शुऐब साहब, पूर्व नायब सचिव, अंजुमन मुल्तानी बड़ौत, की 15 वर्षीय बेटी का अचानक तबीयत बिगड़ने और बीपी डाउन हो जाने के बाद क़ज़ा-ए-इलाही से इंतिक़ाल हो गया।

इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन।

मासूम उम्र में इस तरह अचानक दुनिया से रुख़्सत हो जाने की ख़बर ने खानदान, रिश्तेदारों, अहबाब और मुस्लिम मुल्तानी लोहार, बढ़ई बिरादरी में गहरे रंज-ओ-ग़म की लहर दौड़ा दी है। इस सदमे के मौक़े पर हर शख़्स की ज़बान पर मरहूमा के लिए मग़फिरत की दुआ और उनके अहले-ख़ाना के लिए सब्र की दुआ है।

आज रात 11 बजे होगी तदफ़ीन

मिली इत्तिला के मुताबिक़ मरहूमा को आज रात 11 बजे सुपुर्द-ए-ख़ाक किया जाएगा। तमाम बिरादराना हज़रात से गुज़ारिश है कि जनाज़े में शरीक होकर मरहूमा के लिए दुआ-ए-मग़फिरत करें और ग़मज़दा खानदान के साथ शरीक-ए-ग़म हों।

जनाज़ा व तदफ़ीन का मक़ाम:
कब्रिस्तान ग़ौरे ग़रीबा, हीरोज़ कॉलेज के पास, बड़का रोड, बड़ौत, जनपद बागपत।

मग़फिरत और तदफ़ीन के मौक़े की दुआ

अल्लाह तआला इस मासूम मरहूमा की मुकम्मल मग़फिरत फरमाए, उनके तमाम सग़ीरा-कबीरा गुनाहों को माफ़ फरमाए, उन्हें अपनी रहमत के साए में जगह अता फरमाए और जन्नतुल फ़िरदौस में आला मुक़ाम नसीब फरमाए।

या अल्लाह! जब इस मासूम को कब्र में उतारा जाए तो उसकी कब्र को नूर से भर दे। कब्र को उसके लिए जन्नत के बाग़ों में से एक बाग़ बना दे, उसे तन्हाई और वहशत से महफ़ूज़ फरमा और सवालात-ए-कब्र में आसानी अता फरमा।

या रब्बुल आलमीन! जब मिट्टी दी जाए तो हर मुट्ठी मिट्टी को उसके लिए रहमत और सुकून का ज़रिया बना दे। उसकी कब्र को कुशादा फरमा, उसमें अपनी रहमत और नूर नाज़िल फरमा और उसे रोज़-ए-महशर अपने नेक बंदों के साथ उठाना।

अल्लाह तआला वालिदैन, दादा-दादी, तमाम अहले-ख़ाना और रिश्तेदारों को इस अज़ीम सदमे पर सब्र-ए-जमील अता फरमाए और इस सदमे को उनके लिए अज्र-ए-अज़ीम का ज़रिया बनाए।

ऐ अल्लाह! मरहूमा को अपनी रहमत में जगह दे, उनके दर्जात बुलंद फरमा और अहले-ख़ाना को सब्र व इस्तिक़ामत अता फरमा।

आमीन या रब्बुल आलमीन। 🤲

राब्ता

मैय्यत के सिलसिले में मज़ीद मालूमात के लिए मौलाना अब्दुल जब्बार साहब से मोबाइल नंबर 9310186111 पर राब्ता क़ायम किया जा सकता है।


सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार से पंजीकृत, मुल्क की राजधानी नई दिल्ली से प्रसारित, पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी की मुल्क की इकलौती क़ौमी समाचार पत्रिका, न्यूज़ पोर्टल और यूट्यूब चैनल “मुल्तानी समाज” के लिए उत्तर प्रदेश डेस्क से प्रधान संपादक ज़मीर आलम की ख़ास रिपोर्ट।

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“मुल्तानी समाज” — अपनी बिरादरी की आवाज़, अपनी पहचान।

इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन — जवान बेटे मोहम्मद फ़रीद के इंतक़ाल से परिवार पर टूटा ग़म का पहाड़, पिछले साल छोटे बेटे को खो चुके थे शमीम अहमद

35 वर्षीय मोहम्मद फ़रीद ने मेरठ के निजी अस्पताल में इलाज के दौरान ली आख़िरी साँस; एक साल के भीतर शमीम अहमद ने खो दिए अपने दो बेटे, बिरादरी में पसरा मातम

शामली, उत्तर प्रदेश।
निहायत ही रंज-ओ-ग़म और दिल को झकझोर देने वाली ख़बर के साथ तमाम मुस्लिम मुल्तानी लोहार-बढ़ई बिरादरी के बिरादराना हज़रात को इत्तिला दी जाती है कि मोहल्ला सरवरपीर, शामली, उत्तर प्रदेश निवासी मोहम्मद फ़रीद वल्द जनाब शमीम अहमद, उम्र लगभग 35 वर्ष, का आज शनिचर, 26 सितंबर 2026 को मेरठ के एक निजी अस्पताल में इलाज के दौरान शाम लगभग साढ़े 5 बजे क़ज़ा-ए-इलाही से इंतक़ाल हो गया।

मरहूम मोहम्मद फ़रीद की अचानक मौत की ख़बर से अहले-ख़ानदान, रिश्तेदारों, अज़ीज़ों, दोस्तों और पूरी मुल्तानी बिरादरी में गहरे रंज-ओ-मलाल की लहर दौड़ गई है। एक जवान बेटे की मौत का सदमा वैसे ही किसी भी वालिदैन और परिवार के लिए बेहद क़ल्ब-फ़िगार होता है, लेकिन जनाब शमीम अहमद के लिए यह सदमा और भी भारी है।

एक साल में शमीम अहमद ने खो दिए दो बेटे

बताया गया है कि जनाब शमीम अहमद के तीन बेटे थे, जिनमें से सबसे छोटे बेटे का पिछले वर्ष ही क़ज़ा-ए-इलाही से इंतक़ाल हो गया था। अभी उस सदमे से परिवार पूरी तरह उबर भी नहीं पाया था कि आज उनके बड़े बेटे मोहम्मद फ़रीद के इंतक़ाल ने परिवार को एक बार फिर गहरे सदमे और ग़म में डाल दिया।

एक ही परिवार में महज़ एक साल के दौरान दो जवान बेटों का दुनिया से चले जाना यक़ीनन बेहद दर्दनाक और आज़माइश की घड़ी है। इस मुश्किल वक़्त में अहले-ख़ानदान के साथ पूरी बिरादरी की हमदर्दी और दुआएँ हैं।

अभी मैय्यत घर लाई जा रही है, तदफ़ीन का वक़्त मुक़र्रर नहीं

ख़बर लिखे जाने तक मैय्यत मेरठ के अस्पताल से शामली स्थित घर लाई जा रही है। ज़िम्मेदारान की ओर से अभी नमाज़-ए-जनाज़ा और तदफ़ीन का वक़्त मुक़र्रर नहीं किया गया है।

जैसे ही नमाज़-ए-जनाज़ा और तदफ़ीन (सुपुर्द-ए-ख़ाक) का वक़्त मुक़र्रर होगा, उसकी इत्तिला ख़बर में अपडेट के ज़रिए दी जाएगी।

तमाम अहले-बिरादरी, अज़ीज़-ओ-अक़ारिब और दोस्तों से गुज़ारिश है कि तदफ़ीन के वक़्त की इत्तिला मिलते ही जनाज़े में शिरकत फ़रमाएँ और मरहूम के लिए ख़ुसूसी दुआ-ए-मग़फ़िरत करें।

मैय्यत को कब्र में उतारते वक़्त की दुआ

मैय्यत को कब्र में रखते वक़्त यह दुआ पढ़ी जाती है:

بِسْمِ اللّٰهِ وَعَلَىٰ مِلَّةِ رَسُولِ اللّٰهِ

“अल्लाह के नाम से और रसूलुल्लाह ﷺ के दीन व तरीक़े पर।”

मिट्टी देते वक़्त अल्लाह तआला की तरफ़ से इंसान की पैदाइश और वापसी को याद करते हुए यह आयत पढ़ी जा सकती है:

مِنْهَا خَلَقْنَاكُمْ وَفِيهَا نُعِيدُكُمْ وَمِنْهَا نُخْرِجُكُمْ تَارَةً أُخْرَىٰ

“हमने तुम्हें इसी मिट्टी से पैदा किया, इसी में तुम्हें वापस लौटाएँगे और इसी से दोबारा निकालेंगे।”
(सूरह ताहा, आयत 55)

दफ़्न के बाद मरहूम के लिए दुआ

मैय्यत को दफ़्न करने के बाद उसके लिए मग़फ़िरत और साबित-क़दमी की दुआ करनी चाहिए:

اللّٰهُمَّ اغْفِرْ لَهُ وَارْحَمْهُ وَثَبِّتْهُ عِنْدَ السُّؤَالِ

“ऐ अल्लाह! इसकी मग़फ़िरत फ़रमा, इस पर रहमत फ़रमा और सवाल के वक़्त इसे साबित-क़दम रख।”

अल्लाह तआला मोहम्मद फ़रीद मरहूम की मग़फ़िरत फ़रमाए, उनकी तमाम ख़ताओं से दरगुज़र फ़रमाए, उनकी कब्र को नूर से मुनव्वर फ़रमाए, उसे जन्नत के बाग़ों में से एक बाग़ बना दे, तमाम मराहिल आसान फ़रमाए, सवाल-ए-क़ब्र में कामयाबी अता फ़रमाए और जन्नतुल फ़िरदौस में आला मुक़ाम अता फ़रमाए।

अल्लाह रब्बुल-आलमीन उनके वालिद जनाब शमीम अहमद, तमाम अहले-ख़ानदान और पसमानदगान को सब्र-ए-जमील अता फ़रमाए। जिस परिवार ने एक साल के भीतर अपने दो बेटों को खोने का सदमा झेला है, अल्लाह तआला उनके दिलों को सब्र, सुकून और अपनी ख़ास रहमत से भर दे।

आमीन या रब्बुल आलमीन।

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हाजी याक़ूब ख़ान मुल्तानी का इंतक़ाल, बिरादरी में पसरा ग़म, इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन —

पानीपत, हरियाणा। निहायत ही रंज-ओ-ग़म के साथ तमाम अहले-मुस्लिम मुल्तानी लोहार-बढ़ई बिरादरी को यह इत्तिला दी जाती है कि आज दिन शनिचर, 26 सितंबर 2026 को हाजी याक़ूब ख़ान, मुल्तानी लोहार बिरादरी, मूल निवासी गाँव सुताना एवं हाल बाशिंदे गोहाना रोड, पानीपत, हरियाणा, का क़ज़ा-ए-इलाही से इंतक़ाल हो गया।

मरहूम के इंतक़ाल की ख़बर से अहले-ख़ानदान, रिश्तेदारों, दोस्तों, अज़ीज़ों और पूरी बिरादरी में गहरा रंज-ओ-मलाल और शदीद ग़म की लहर दौड़ गई। इस दुख की घड़ी में हर आँख अश्कबार और हर दिल मरहूम की मग़फ़िरत के लिए दुआगो है।

आज बाद नमाज़-ए-ईशा होगा जनाज़ा और सुपुर्द-ए-ख़ाक

मिली जानकारी के मुताबिक़ मरहूम हाजी याक़ूब ख़ान की नमाज़-ए-जनाज़ा आज बाद नमाज़-ए-ईशा, तक़रीबन रात 8 बजे, मेहराना, पानीपत स्थित कब्रिस्तान में अदा की जाएगी। नमाज़-ए-जनाज़ा के बाद मरहूम को उसी कब्रिस्तान में सुपुर्द-ए-ख़ाक किया जाएगा।

तमाम अहले-बिरादरी, अज़ीज़-ओ-अक़ारिब, दोस्त-अहबाब और जानने वालों से गुज़ारिश है कि जनाज़े में शिरकत फ़रमाएँ और मरहूम के लिए मग़फ़िरत एवं बुलंदी-ए-दरजात की दुआ करें।

कब्र में उतारते और मिट्टी देते वक़्त दुआ

जब मरहूम को कब्र में उतारा जाए तो अहले-ख़ैर उनकी मग़फ़िरत की दुआ करें और मिट्टी देते हुए दिल से दुआ करें:

“ऐ अल्लाह! हमारे इस मरहूम बंदे की मग़फ़िरत फ़रमा, उसकी ख़ता-बख़्शी फ़रमा, उसकी कब्र को नूर से भर दे, उसे कुशादा और आराम की जगह बना दे। उसकी तन्हाई को अपनी रहमत से दूर फ़रमा। उसके दर्जात बुलंद फ़रमा और उसे जन्नतुल फ़िरदौस में आला मक़ाम अता फ़रमा।”

मिट्टी देते वक़्त यह आयत पढ़ना भी मंसून है:

مِنْهَا خَلَقْنَاكُمْ وَفِيهَا نُعِيدُكُمْ وَمِنْهَا نُخْرِجُكُمْ تَارَةً أُخْرَىٰ

“इसी मिट्टी से हमने तुम्हें पैदा किया, इसी में तुम्हें लौटाएँगे और इसी से तुम्हें दोबारा निकालेंगे।”
(सूरह ताहा: 55)

नमाज़-ए-जनाज़ा के बाद मरहूम के लिए दुआ

तमाम मुसलमानों से गुज़ारिश है कि मरहूम के लिए ख़ुसूसन यह दुआ फ़रमाएँ:

اللّٰهُمَّ اغْفِرْ لَهُ وَارْحَمْهُ وَعَافِهِ وَاعْفُ عَنْهُ

“ऐ अल्लाह! इसकी मग़फ़िरत फ़रमा, इस पर रहमत फ़रमा, इसे आफ़ियत अता फ़रमा और इससे दरगुज़र फ़रमा।”

अल्लाह तआला मरहूम हाजी याक़ूब ख़ान की मुकम्मल मग़फ़िरत फ़रमाए, उनकी क़ब्र को नूर से मुनव्वर फ़रमाए, क़ब्र के तमाम मराहिल आसान फ़रमाए, उन्हें सवालात-ए-क़ब्र में कामयाबी अता फ़रमाए और जन्नतुल फ़िरदौस में आला से आला मुक़ाम अता फ़रमाए।

अल्लाह तआला तमाम पसमानदगान को सब्र-ए-जमील अता फ़रमाए और इस सदमे को बर्दाश्त करने की तौफ़ीक़ दे। आमीन या रब्बुल आलमीन।

इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन।

संपर्क: 9671955918


सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार से पंजीकृत, मुल्क की राजधानी नई दिल्ली से प्रसारित, पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी की क़ौमी समाचार पत्रिका, न्यूज़ पोर्टल एवं यूट्यूब चैनल “मुल्तानी समाज” के लिए उत्तर प्रदेश डेस्क से प्रधान संपादक ज़मीर आलम की ख़ास रिपोर्ट।

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Friday, September 25, 2026

अब्दुल वहाब साहब का इंतक़ाल, बिरादरी में पसरा ग़म, इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन —

जयपुर, राजस्थान। निहायत ही रंज-ओ-ग़म के साथ तमाम बिरादराना हज़रात को यह इत्तिला दी जाती है कि आज दिन शनिवार, 26 सितंबर 2026 को जयपुर, राजस्थान में मरहूम लाल मोहम्मद साहब, चांदपोल वालों के फ़रज़ंद जनाब अब्दुल वहाब साहब का क़ज़ा-ए-इलाही से इंतक़ाल हो गया।

इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन।

अब्दुल वहाब साहब के इंतक़ाल की ख़बर से अहले-ख़ानदान, रिश्तेदारों, अज़ीज़ों और बिरादराना हज़रात में गहरे रंज और सदमे की फ़िज़ा है। इस मुश्किल और ग़मगीन घड़ी में तमाम अहले-ख़ानदान के साथ दिली हमदर्दी और ताज़ियत का इज़हार किया जाता है।

जनाज़े और तदफ़ीन का ऐलान

मिली इत्तिला के मुताबिक मरहूम जनाब अब्दुल वहाब साहब का जनाज़ा चांदपोल से नारी का नाका कब्रिस्तान, जयपुर ले जाया जाएगा।

मैय्यत की तदफ़ीन का वक़्त सुबह 10:00 बजे मुक़र्रर किया गया है।

तमाम अहले-ख़ैर और बिरादराना हज़रात से गुज़ारिश है कि अपनी मसरूफ़ियात में से वक़्त निकालकर जनाज़े में शरीक हों और मरहूम के लिए दुआ-ए-मग़फ़िरत फ़रमाएँ।

कब्र में उतारते और मिट्टी देते वक़्त दुआ

अल्लाह तआला मरहूम अब्दुल वहाब साहब की मग़फ़िरत फ़रमाए, उनकी तमाम ख़ताओं और कोताहियों से दरगुज़र फ़रमाए, उनकी क़ब्र को नूर से मुनव्वर फ़रमाए और उसे जन्नत के बाग़ों में से एक बाग़ बना दे।

कब्र में उतारते वक़्त पढ़ा जाता है:

«بِسْمِ اللّٰهِ وَعَلَىٰ مِلَّةِ رَسُولِ اللّٰهِ ﷺ»

तर्जुमा: अल्लाह के नाम से और अल्लाह के रसूल ﷺ के दीन व तरीक़े पर।

मिट्टी देते वक़्त यह दुआ की जाए:

«مِنْهَا خَلَقْنَاكُمْ وَفِيهَا نُعِيدُكُمْ وَمِنْهَا نُخْرِجُكُمْ تَارَةً أُخْرَىٰ»

तर्जुमा: हमने तुम्हें इसी मिट्टी से पैदा किया, इसी में तुम्हें वापस लौटाएँगे और इसी से दोबारा तुम्हें निकालेंगे।

इसके बाद तमाम हाज़रीन मरहूम के लिए दिल से दुआ-ए-मग़फ़िरत करें:

ऐ अल्लाह! मरहूम अब्दुल वहाब साहब की मग़फ़िरत फ़रमा, उनकी क़ब्र को कुशादा और रोशन फ़रमा, उन्हें सवाल-ए-क़ब्र में कामयाबी अता फ़रमा, उनके दर्जात बुलंद फ़रमा, उनकी नेकियों को क़ुबूल फ़रमा और उन्हें जन्नतुल फ़िरदौस में आला मक़ाम अता फ़रमा।

या अल्लाह! उनके तमाम गुनाहों को माफ़ फ़रमा, रहमत की चादर में ढांप ले और उनके घरवालों को सब्र-ए-जमील अता फ़रमा। आमीन या रब्बुल आलमीन।

रसूल-ए-अकरम ﷺ ने मुसलमान भाई की ताज़ियत और उसके लिए दुआ करने की बड़ी फ़ज़ीलत बयान फ़रमाई है। इसलिए इस मौक़े पर तमाम बिरादराना हज़रात से ख़ास तौर पर गुज़ारिश है कि मरहूम को अपनी दुआओं में याद रखें और उनके लिए ईसाल-ए-सवाब करें।

अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त मरहूम की मग़फ़िरत फ़रमाए और तमाम अहले-ख़ानदान को सब्र-ए-जमील अता फ़रमाए। आमीन।

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उत्तर प्रदेश डेस्क से प्रधान संपादक ज़मीर आलम की ख़ास रिपोर्ट

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मास्टर जमील मरहूम की विरासत को आगे बढ़ाने निकले फैसल मिर्ज़ा, वार्ड-12 से निर्विरोध निर्वाचन की बनी राह

नगर पंचायत बेहट के वार्ड नंबर-12 से सिर्फ़ फैसल मिर्ज़ा ने दाखिल किया नामांकन • नामांकन प्रक्रिया पूरी होने के बाद निर्विरोध निर्वाचन की स्थिति • वालिद मरहूम मास्टर जमील साहब की सादगी और नेकदिली को किया गया याद

बेहट/सहारनपुर।
नगर पंचायत बेहट के वार्ड नंबर-12, मोहल्ला लोहारान में उस वक़्त एक ख़ास सियासी और सामाजिक तस्वीर सामने आई, जब मरहूम सभासद मास्टर जमील साहब के इंतक़ाल के बाद रिक्त हुई सभासद की सीट के लिए उनके साहेबज़ादे फैसल मिर्ज़ा ने नामांकन की आख़िरी तारीख़ को तहसील बेहट पहुंचकर अपना नामांकन पत्र दाखिल किया।

मास्टर जमील साहब वार्ड नंबर-12 के सभासद रहे थे। उनके इंतक़ाल के बाद यह सीट रिक्त हो गई थी, जिसके लिए राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा उपचुनाव का कार्यक्रम जारी किया गया। उपलब्ध चुनाव कार्यक्रम के मुताबिक यह सीट अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षित है और 13 अक्टूबर को मतदान तथा 15 अक्टूबर को मतगणना प्रस्तावित की गई थी।

फैसल मिर्ज़ा के अलावा किसी और ने नहीं भरा पर्चा

नामांकन की निर्धारित आख़िरी तारीख़ तक फैसल मिर्ज़ा के अलावा किसी अन्य प्रत्याशी द्वारा नामांकन दाखिल नहीं किए जाने से वार्ड नंबर-12 में चुनावी तस्वीर लगभग साफ़ हो गई है।

हालांकि नामांकन पत्रों की जांच, नाम वापसी तथा निर्वाचन संबंधी अन्य औपचारिक प्रक्रियाएं अभी पूरी होनी बाकी हैं। इसलिए आधिकारिक रूप से निर्विरोध निर्वाचित होने की घोषणा संबंधित निर्वाचन प्रक्रिया पूर्ण होने के बाद ही मानी जाएगी।

यदि कोई अन्य वैध प्रत्याशी मैदान में नहीं आता और निर्वाचन प्रक्रिया इसी प्रकार आगे बढ़ती है, तो वार्ड नंबर-12 में मतदान की आवश्यकता नहीं रह जाएगी।

वालिद की विरासत को आगे बढ़ाने का मौक़ा

फैसल मिर्ज़ा के नामांकन के साथ ही वार्ड में उनके वालिद-ए-मोहतरम मास्टर जमील साहब मरहूम की यादें भी ताज़ा हो गईं।

इलाक़ाई लोगों के बीच मास्टर जमील साहब की सादगी, मिलनसारी, नेकदिली, खुश-अख़लाक़ी और लोगों से मोहब्बत का ज़िक्र आज भी सम्मान के साथ किया जाता है। ऐसे में उनके साहेबज़ादे का उसी वार्ड से सभासद पद के लिए आगे आना उनके परिवार के लिए महज़ एक चुनावी प्रक्रिया नहीं, बल्कि अपने मरहूम वालिद की सामाजिक विरासत और लोगों से जुड़े रिश्तों को आगे बढ़ाने के एक मौक़े के तौर पर भी देखा जा रहा है।

नामांकन के दौरान मौजूद रहे सम्मानित लोग

फैसल मिर्ज़ा के नामांकन के दौरान नगर पंचायत अध्यक्ष अब्दुल रहमान उर्फ़ शालू भैया, सभासद प्रतिनिधि मिर्ज़ा अब्दुल मलिक, समाजसेवी अतीक मिर्ज़ा तथा अबरार मिर्ज़ा (सदर) समेत अनेक सम्मानित साथी एवं समर्थक मौजूद रहे।

नामांकन के दौरान समर्थकों में उत्साह दिखाई दिया और सभी ने फैसल मिर्ज़ा के लिए नेक ख़्वाहिशात का इज़हार किया।

मरहूम मास्टर जमील साहब की नेकनामी का असर

इलाक़े में यह चर्चा भी है कि फैसल मिर्ज़ा को मिल रही यह मोहब्बत और समर्थन उनके वालिद मरहूम मास्टर जमील साहब द्वारा लोगों के साथ बनाए गए अच्छे रिश्तों का भी नतीजा है।

किसी इंसान के जाने के बाद भी अगर उसकी सादगी, किरदार, नेकदिली और अच्छे अख़लाक़ लोगों के दिलों में ज़िंदा रहें, तो इससे बड़ी सामाजिक पूंजी और क्या हो सकती है। मास्टर जमील साहब ने अपने व्यवहार और सामाजिक संबंधों से जो जगह बनाई, आज उनके साहेबज़ादे फैसल मिर्ज़ा के लिए वही मोहब्बत और दुआएं दिखाई दे रही हैं।

‘मुल्तानी समाज’ की तरफ़ से दिली मुबारकबाद

मुल्तानी समाज की तरफ़ से फैसल मिर्ज़ा को नामांकन दाखिल करने पर दिली मुबारकबाद पेश की जाती है और उनके लिए कामयाबी, नेकनामी तथा अवाम की ख़िदमत की दुआ की जाती है।

साथ ही मरहूम मास्टर जमील साहब के लिए अल्लाह तआला से मग़फ़िरत और बुलंद दरजात की दुआ की जाती है।

दुआ है कि फैसल मिर्ज़ा अपने वालिद-ए-मोहतरम की अच्छी रवायत, सादगी, ख़ुलूस और ख़िदमत के जज़्बे को आगे बढ़ाते हुए वार्ड की अवाम की बेहतरी और ख़िदमत में अपना किरदार अदा करें।


उत्तर प्रदेश डेस्क की ख़ास रिपोर्ट

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार से पंजीकृत, मुल्क की राजधानी नई दिल्ली से प्रसारित, पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी की क़ौमी समाचार पत्रिका, न्यूज़ पोर्टल और यूट्यूब चैनल — “मुल्तानी समाज”

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Wednesday, September 23, 2026

बिना चंदा-ए-आम व ख़ास लिए, महज़ ₹250 की मेंबरशिप फ़ीस से बिरादरी को डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर मुत्तहिद करने की अनोखी पहल

मुल्क भर में मुस्लिम मुल्तानी लोहार और बढ़ई बिरादरी के अफ़राद को तलाश कर एक डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर जोड़ने का काम — मुल्तानी समाज चैरिटेबल ट्रस्ट के फ़ाउंडर ज़मीर आलम की क़यादत में एक नई मिसाल

नई दिल्ली/उत्तर प्रदेश डेस्क।
मुस्लिम मुल्तानी लोहार और बढ़ई बिरादरी की फ़लाह, तरक़्क़ी, इत्तेहाद और पहचान के लिए मुख़्तलिफ़ तंजीमें अपने-अपने अंदाज़ में काम करती रही हैं। मगर बिरादरी को किसी बड़े चंदा-ए-आम या चंदा-ए-ख़ास के सहारे के बग़ैर, महज़ मामूली मेंबरशिप फ़ीस के ज़रिए एक मुकम्मल डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर मुल्क के मुख़्तलिफ़ हिस्सों से तलाश कर जोड़ने की कोशिश अपने आप में एक नई और ग़ौरतलब पहल है।

"मुल्तानी समाज चैरिटेबल ट्रस्ट" के फ़ाउंडर ज़मीर आलम की क़यादत में शुरू की गई इस पहल का मक़सद सिर्फ़ एक तंजीम की तामीर करना नहीं, बल्कि मुल्क के मुख़्तलिफ़ शहरों, क़स्बों और इलाक़ों में रहने वाले मुस्लिम मुल्तानी लोहार और बढ़ई बिरादरी के अफ़राद को एक ऐसे डिजिटल निज़ाम से जोड़ना है, जहाँ उनकी पहचान, हुनर, कारोबार, सामाजिक सरोकार और बिरादराना ताल्लुक़ात को एक नई पहचान मिल सके।

इस पहल की सबसे अहम बात यह है कि इसमें चंदा-ए-आम या चंदा-ए-ख़ास को बुनियादी सहारा बनाने के बजाय महज़ ₹250 की मेंबरशिप फ़ीस को आधार बनाया गया है। यानी बिरादरी के अफ़राद अपनी हैसियत के मुताबिक़ मामूली मेंबरशिप फ़ीस अदा करके इस डिजिटल मिशन का हिस्सा बन सकते हैं।

पहली मर्तबा लोहार और बढ़ई बिरादरी को एक साथ लेकर चलने की कोशिश

मुल्तानी समाज चैरिटेबल ट्रस्ट की ओर से दिए गए हालिया पैग़ाम में एक और अहम पहलू की तरफ़ तवज्जो दिलाई गई है।

मुल्क में अब तक बनी मुख़्तलिफ़ बिरादराना तंजीमों का तआरुफ़ और उनकी सरगर्मियों का अपना-अपना दायरा रहा है। लेकिन मुल्तानी लोहार और मुल्तानी बढ़ई बिरादरी को एक साथ लेकर चलने और दोनों की सामाजिक व मआशी तरक़्क़ी को एक ही बिरादराना प्लेटफ़ॉर्म पर अहमियत देने की कोशिश को मुल्तानी समाज चैरिटेबल ट्रस्ट अपनी अहम ख़िदमत के तौर पर पेश कर रहा है।

यहाँ यह वाज़ेह करना भी ज़रूरी है कि मुल्तानी लोहार और मुल्तानी बढ़ई एक ही बिरादराना विरासत से जुड़े हुए हैं, मगर दोनों के पेशे, हुनर, कारोबार और रोज़गार के अंदाज़ में फ़र्क़ मौजूद है। लिहाज़ा दोनों बिरादरियों के मआशी और कारोबारी मसाइल, उनके हुनर और उनकी ज़रूरतों को अलग-अलग समझना भी उतना ही ज़रूरी है।

मुल्तानी समाज चैरिटेबल ट्रस्ट का कहना है कि अगर बिरादरी की तरक़्क़ी को मुकम्मल और जामे अंदाज़ में आगे बढ़ाना है तो लोहार के साथ बढ़ई और बढ़ई के साथ लोहार—दोनों को बराबर की अहमियत और नुमाइंदगी देना ज़रूरी है।

"हमने बढ़ई बिरादरी को कभी नज़रअंदाज़ नहीं किया"

ट्रस्ट की तरफ़ से यह भी कहा गया है कि इस मौज़ू पर आने वाले दिनों में मुख़्तलिफ़ तंजीमों और अफ़राद की तरफ़ से बहस हो सकती है। कोई इस पहल की मुख़ालिफ़त करे या अपने-अपने अंदाज़ में इसकी तफ़्सीर करे, मगर एक सवाल अपनी जगह रहेगा कि क्या मुल्तानी बढ़ई बिरादरी की तरक़्क़ी, पहचान और मआशी मज़बूती को उतनी ही अहमियत दी गई, जितनी दी जानी चाहिए थी?

मुल्तानी समाज चैरिटेबल ट्रस्ट का मौक़िफ़ है कि उसने इस सवाल को पहली बार खुलकर बिरादरी के सामने रखने की कोशिश की है और बढ़ई बिरादरी को बिरादराना निज़ाम का बराबर का हिस्सा मानते हुए उसे दरकिनार करने के बजाय साथ लेकर चलने की राह इख़्तियार की है।

ट्रस्ट का कहना है कि इसका मक़सद किसी तंजीम या शख़्स की तन्क़ीद करना नहीं, बल्कि बिरादरी के उन तमाम अफ़राद को एक साथ लाना है जो इल्म, हुनर, कारोबार, रोज़गार और समाजी तरक़्क़ी में अपना किरदार अदा कर रहे हैं।

"पैदायशी इंजीनियर" — बिरादरी के हुनर को नई पहचान देने की कोशिश

मुल्तानी समाज चैरिटेबल ट्रस्ट की तरफ़ से बिरादरी के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले एक ख़ास अल्क़ाब में "पैदायशी इंजीनियर" भी शामिल है।

ट्रस्ट का नज़रिया है कि सदियों से लोहे, लकड़ी, औज़ार, मशीनरी, दस्तकारी और तकनीकी हुनर से जुड़े रहने वाली इस बिरादरी के पारंपरिक फ़न और कारीगरी को सिर्फ़ एक पेशा समझने के बजाय उसके अंदर मौजूद तकनीकी सलाहियत और हुनर को भी पहचान मिलनी चाहिए।

इसी सोच के तहत बिरादरी के लिए "पैदायशी इंजीनियर" का अल्क़ाब इस्तेमाल किया गया, ताकि नई नस्ल को अपने बुज़ुर्गों के हुनर, मेहनत और दस्तकारी की विरासत पर फ़ख़्र महसूस हो और वह आधुनिक तालीम व तकनीक के साथ इस विरासत को आगे बढ़ा सके।

₹250 की मेंबरशिप — डिजिटल इत्तेहाद की तरफ़ एक क़दम

मुल्तानी समाज चैरिटेबल ट्रस्ट की यह डिजिटल पहल सिर्फ़ मेंबरशिप जमा करने तक महदूद नहीं बताई जा रही, बल्कि इसके ज़रिए बिरादरी के अफ़राद को एक-दूसरे से जोड़ने, उनकी पहचान को डिजिटल तौर पर दर्ज करने और मुल्क के मुख़्तलिफ़ हिस्सों में मौजूद बिरादराना नेटवर्क को मज़बूत करने की कोशिश की जा रही है।

एक तरफ़ जहाँ बड़ी-बड़ी तंजीमों के लिए चंदा जमा करना और बड़े इज्लास करना आम बात है, वहीं इस पहल में छोटी मेंबरशिप फ़ीस के ज़रिए ज़्यादा से ज़्यादा अफ़राद को सीधे डिजिटल नेटवर्क का हिस्सा बनाने का तसव्वुर सामने रखा गया है।

यही वजह है कि यह पहल बिरादरी के अंदर एक नई बहस और नई उम्मीद दोनों पैदा कर रही है।

"बिरादरी की ताक़त उसके अफ़राद हैं"

मुल्तानी समाज चैरिटेबल ट्रस्ट का पैग़ाम साफ़ है कि किसी भी बिरादरी की असल ताक़त सिर्फ़ उसकी तादाद में नहीं बल्कि उसके मुत्तहिद, बा-इल्म, हुनरमंद और एक-दूसरे से जुड़े हुए अफ़राद में होती है।

अगर मुल्क के मुख़्तलिफ़ राज्यों और शहरों में रहने वाला एक-एक मुल्तानी अपने दूसरे मुल्तानी से डिजिटल तौर पर जुड़ जाए, एक-दूसरे के कारोबार को जाने, एक-दूसरे के हुनर से वाक़िफ़ हो, नौजवानों को रोज़गार के मौक़े मिलें और बिरादरी के मसाइल को एक साझा प्लेटफ़ॉर्म पर उठाया जा सके, तो यह सिर्फ़ एक डिजिटल डायरेक्टरी नहीं बल्कि बिरादराना इत्तेहाद का एक नया निज़ाम साबित हो सकता है।

23 सितंबर 2026 की ख़बर के बाद सामने आईं कुछ अहम बातें

गुज़िश्ता रोज़ 23 सितंबर 2026 को "मुल्तानी समाज" राष्ट्रीय समाचार पत्रिका के ज़रिए एक ख़बर बिरादरी के सामने रखी गई थी। अब उसी सिलसिले में उस ख़बर से मुताल्लिक़ कुछ अहम और ख़ास पहलुओं को तफ़्सील से पेश किया जा रहा है, ताकि बिरादरी के अफ़राद इस पहल के मक़सद और इसके पीछे की सोच को बेहतर तौर पर समझ सकें।

मुल्तानी समाज चैरिटेबल ट्रस्ट की तरफ़ से कहा गया है कि आने वाले वक़्त में इस डिजिटल मिशन से जुड़ी और भी अहम मालूमात, नए प्रोग्राम, बिरादराना रिकॉर्ड, डिजिटल सहूलियतें और तरक़्क़ी के मंसूबे बिरादरी के सामने रखे जाएंगे।

यह सफ़र किसी एक शख़्स का सफ़र नहीं, बल्कि उन तमाम अफ़राद का साझा सफ़र है जो अपनी बिरादरी को इत्तेहाद, इल्म, हुनर, कारोबार और नई तकनीक के ज़रिए मज़बूत देखना चाहते हैं।

मुल्तानी समाज चैरिटेबल ट्रस्ट का पैग़ाम है कि बिरादरी को सिर्फ़ याद करने की नहीं, बल्कि उसे जोड़ने, समझने और आगे बढ़ाने की ज़रूरत है।

और शायद इसी सोच के साथ एक नया सवाल भी सामने आता है—

क्या वक़्त आ गया है कि मुल्क के हर शहर, हर क़स्बे और हर इलाक़े में रहने वाला मुल्तानी लोहार और बढ़ई अपने दूसरे बिरादर से डिजिटल तौर पर जुड़े और अपनी बिरादरी की एक नई, मुत्तहिद और मज़बूत पहचान का हिस्सा बने?

इस मुहिम का अगला सफ़र क्या होगा और आने वाले दिनों में "मुल्तानी समाज" बिरादरी के लिए कौन-कौन सी नई डिजिटल सहूलियतें लेकर सामने आएगा—इसकी तफ़्सीलात के लिए जुड़े रहिए।


सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार से पंजीकृत, मुल्क की राजधानी नई दिल्ली से शाया होने वाली पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी की क़ौमी समाचार पत्रिका, न्यूज़ पोर्टल और यूट्यूब चैनल "मुल्तानी समाज" के लिए उत्तर प्रदेश डेस्क से प्रधान संपादक ज़मीर आलम की ख़ास रिपोर्ट।

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