शुक्रवार, 6 नवंबर 2026

रुड़की में 14 नवंबर को सजेगी अदब और शायरी की महफ़िल, मरहूम अब्दुल हकीम मिर्ज़ा की याद में होगा ऑल इंडिया मुशायरा

देशभर के नामचीन शायर करेंगे अपने कलाम से महफ़िल को रौशन, अंजुमन इरतिका-ए-अदब रुड़की के ज़ेरे-ए-एहतिमाम होगा शानदार अदबी आयोजन

रुड़की, उत्तराखंड।

उर्दू अदब, शायरी और तहज़ीब की ख़ूबसूरत रवायत को बरक़रार रखने तथा मरहूम जनाब अब्दुल हकीम मिर्ज़ा साहब की यादों को ताज़ा करने के मक़सद से उत्तराखंड के रुड़की शहर में एक शानदार ऑल इंडिया मुशायरे का आयोजन किया जा रहा है।

अंजुमन इरतिका-ए-अदब रुड़की के बैनर तले आगामी 14 नवंबर 2026, शनिवार को रात 8 बजे नगर निगम प्रांगण, सिविल लाइंस, रुड़की (उत्तराखंड) में याद-ए-अब्दुल हकीम मिर्ज़ा के नाम से इस अदबी महफ़िल का आयोजन होगा।

इस मुशायरे में देश के मुख़्तलिफ़ शहरों से तशरीफ़ लाने वाले नामचीन शायर और शायरा अपने ख़ूबसूरत कलाम, ग़ज़लों और अशआर के ज़रिये महफ़िल को रौनक़ बख़्शेंगे।

अंजुमन के ज़िम्मेदारान और पदाधिकारी

आमंत्रण पत्र के मुताबिक़ इस अदबी अंजुमन की सरपरस्ती की ज़िम्मेदारी डॉ. चौधरी बाबा अब्दुल रज़्ज़ाक साहब संभाल रहे हैं। अंजुमन के सदर जनाब सैयद सना-उल-हक़ साहब हैं, जबकि जनरल सेक्रेटरी की ज़िम्मेदारी जनाब सिकंदर हयात ग़दबड़ साहब के पास है।

अंजुमन के तमाम ज़िम्मेदारान और मेंबरान इस अदबी आयोजन को कामयाब बनाने की तैयारियों में जुटे हुए हैं।

देशभर के मशहूर शायर और शायरात होंगे शामिल

आमंत्रण पत्र में जिन नामचीन शायरों और शायरात के नाम प्रकाशित किए गए हैं, उनमें प्रमुख रूप से:

  • इक़बाल अशहर
  • रियाज़ सागर
  • अज़्म शाकिरी
  • अल्ताफ़ ज़िया
  • खुर्शीद हैदर
  • सिकंदर एच. ग़दबड़
  • मोहन मुन्तज़िर
  • राधिका मित्तल
  • इस्माइल नज़र
  • वसीम राजापुरी
  • इमरान फ़ैज़
  • मोनिका मंतशा
  • महमूद असर
  • मनोज शाश्वत
  • साहिल माधोपुरी

आदि शायर और शायरात के नाम शामिल हैं।

इन तमाम अहल-ए-अदब की मौजूदगी से मुशायरे में उर्दू शायरी के रंग, ज़बान की मिठास और अदबी तहज़ीब की ख़ास झलक देखने को मिलेगी।

वरिष्ठ समाजसेवी अब्दुल खालिक से की मुलाक़ात, पेश किया दावत-नामा

मुशायरे के सिलसिले में जनाब अब्दुल अज़ीज़ मिर्ज़ा साहब ने सहारनपुर पहुंचकर वरिष्ठ समाजसेवी जनाब अब्दुल खालिक साहब के आवास पर उनसे मुलाक़ात की। इस मौक़े पर उन्होंने मुशायरे का आमंत्रण पत्र पेश किया और कार्यक्रम के संबंध में विस्तार से जानकारी साझा की।

इस मुलाक़ात के दौरान बिरादरी के लोगों, अहल-ए-अदब और शायरी के शौक़ीनों से इस मुशायरे में बढ़-चढ़कर शिरकत करने की पुरख़ुलूस गुज़ारिश की गई।

जनाब अब्दुल खालिक साहब ने इस अदबी पहल का इस्तक़बाल करते हुए आयोजन की कामयाबी के लिए अपनी नेक ख़्वाहिशात पेश कीं।

मरहूम अब्दुल हकीम मिर्ज़ा साहब का पारिवारिक परिचय

मरहूम जनाब अब्दुल हकीम मिर्ज़ा साहब का पारिवारिक रिश्ता उत्तर प्रदेश के कई अहम इलाक़ों से जुड़ा हुआ है। प्राप्त जानकारी के मुताबिक़, उनके परिवार में दो बेटे और दो बेटियां हैं।

उनकी शादी जिला शामली के लिलौन गांव में हुई थी। उनकी दोनों बेटियों की शादी सहारनपुर में हुई है। वहीं, उनके बड़े बेटे की शादी थानाभवन और छोटे बेटे की शादी जिला मुज़फ़्फ़रनगर के खतौली में हुई है।

मरहूम अब्दुल हकीम मिर्ज़ा साहब की याद में आयोजित यह मुशायरा उनके प्रति मोहब्बत, एहतराम और ख़िराज-ए-अक़ीदत पेश करने का एक अदबी ज़रिया है।

आमंत्रण पत्र और प्रवेश संबंधी ख़ास हिदायतें

आयोजक अंजुमन की ओर से आमंत्रण पत्र में कुछ ज़रूरी हिदायतें भी जारी की गई हैं।

  1. परिवारों के लिए बैठने की ख़ास व्यवस्था की गई है।
  2. कार्यक्रम रात 8 बजे बिल्कुल समय पर शुरू होगा।
  3. आमंत्रण पत्र को ही प्रवेश पास माना जाएगा। इसलिए आने वाले अहबाब अपने साथ आमंत्रण पत्र ज़रूर लेकर आएं।

तमाम बिरादरान और अहल-ए-अदब से पुरख़ुलूस अपील

मुशायरा हमारी अदबी और सांस्कृतिक विरासत का अहम हिस्सा है। यह वह मंच है जहां अल्फ़ाज़ के ज़रिये दिलों को जोड़ा जाता है, मोहब्बत का पैग़ाम दिया जाता है और हमारी उर्दू ज़बान की ख़ूबसूरती को नई नस्ल तक पहुंचाया जाता है।

इसी जज़्बे के साथ तमाम बिरादरान-ए-मिल्लत, अहल-ए-अदब, शायरी के शौक़ीनों, समाजसेवियों और रुड़की सहित आसपास के तमाम शहरों के अहबाब से पुरख़ुलूस गुज़ारिश है कि इस अदबी महफ़िल में अपनी मौजूदगी दर्ज कराकर आयोजन की रौनक़ बढ़ाएं।

कार्यक्रम का पूरा विवरण:

  • कार्यक्रम: याद-ए-अब्दुल हकीम मिर्ज़ा ऑल इंडिया मुशायरा
  • आयोजक: अंजुमन इरतिका-ए-अदब रुड़की
  • सरपरस्त: डॉ. चौधरी बाबा अब्दुल रज़्ज़ाक
  • सदर: सैयद सना-उल-हक़
  • जनरल सेक्रेटरी: सिकंदर हयात ग़दबड़
  • दिनांक: 14 नवंबर 2026, शनिवार
  • समय: रात 8 बजे (कार्यक्रम समय पर शुरू होगा)
  • स्थान: नगर निगम प्रांगण, सिविल लाइंस, रुड़की, उत्तराखंड

आइए, अदब की इस ख़ूबसूरत महफ़िल का हिस्सा बनें और मरहूम अब्दुल हकीम मिर्ज़ा साहब की यादों को ख़िराज-ए-अक़ीदत पेश करें।


सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार से पंजीकृत, देश की राजधानी नई दिल्ली से प्रसारित, पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी की राष्ट्रीय समाचार पत्रिका, न्यूज़ पोर्टल एवं यूट्यूब चैनल 'मुल्तानी समाज' के लिए उत्तर प्रदेश डेस्क से जनाब अब्दुल खालिक साहब की प्राप्त जानकारी के आधार पर प्रधान संपादक ज़मीर आलम की ख़ास रिपोर्ट।

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इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन इंतिक़ाल की बेहद अफ़सोसनाक ख़बर — खुर्शीदा बी के इंतिक़ाल से बिरादरी में ग़म की लहर

अल्लाह तआला मरहूमा की मग़फ़िरत फ़रमाए, क़ब्र को नूर से मुनव्वर करे और तमाम अहले ख़ाना को सब्र-ए-जमील अता फ़रमाए। आमीन या रब्बुल आलमीन।

निहायत ही रंजो-ग़म और अफ़सोस के साथ तमाम बिरादराना हज़रात को यह इत्तिला दी जाती है कि आज दिन जुमा, बा-तारीख़ 06 नवंबर 2026 को नियर मदीना प्रेस मोहल्ला मिर्दग्रान बिजनौर, उत्तर प्रदेश में (खेड़ा वाले, मुजफ्फरनगर वाले) जनाब मुश्ताक़ साहब (मूनसन) वाले की अहलिया मोहतरमा खुर्शीदा बी (उम्र तक़रीबन 70 वर्ष) का क़ज़ा-ए-इलाही से इंतिक़ाल हो गया है।

मालूमात के मुताबिक़ मरहूमा पिछले तक़रीबन 15 दिनों से मेरठ, उत्तर प्रदेश के एक प्राइवेट हॉस्पिटल में ज़ेरे इलाज थीं। घरवालों और अज़ीज़ो-अक़ारिब को उनके सेहतयाब होने की उम्मीद थी, मगर मशीयत-ए-इलाही के आगे किसी का ज़ोर नहीं चलता। आख़िरकार आज उन्होंने इस दार-ए-फ़ानी से रुख़्सत होकर अपने मालिक-ए-हक़ीक़ी से जा मिलने का सफ़र इख़्तियार कर लिया।

मरहूमा के इंतिक़ाल की ख़बर से उनके ख़ानदान, अज़ीज़ो-अक़ारिब, रिश्तेदारों और बिरादरी के लोगों में गहरे रंजो-ग़म की लहर दौड़ गई है। इस दुख की घड़ी में तमाम बिरादराना हज़रात की हमदर्दियां और दुआएं मरहूमा के अहले ख़ाना के साथ हैं।

दफ़ीने और नमाज़-ए-जनाज़ा की इत्तिला

मय्यत को कल दिन शनिचर बा - तारीख़ 07 नवंबर 2026 को सुबह 10 बजे किया जाएगा सपूर्दे - ख़ाक, लिहाज़ा आप हज़रात भी जनाज़े में शरीक होकर सवाबे दारेन हासिल करें 

तमाम बिरादराना हज़रात से गुज़ारिश है कि मरहूमा के लिए दुआ-ए-मग़फ़िरत फ़रमाएं और उनके अहले ख़ाना को इस मुश्किल वक़्त में सब्र व हौसला अता होने की दुआ करें।

मरहूमा के लिए दुआ-ए-मग़फ़िरत

या अल्लाह! मरहूमा खुर्शीदा बी की मुकम्मल मग़फ़िरत फ़रमा। उनकी तमाम ख़ताओं, लग़ज़िशों और कोताहियों को अपने फ़ज़्लो-करम से माफ़ फ़रमा। उनकी नेकियों को क़ुबूल फ़रमा और उनके दरजात बुलंद अता फ़रमा।

या रब्बुल आलमीन! उनकी क़ब्र को जन्नत के बाग़ों में से एक बाग़ बना दे। क़ब्र की तंगी और तारीकी को दूर फ़रमा। क़ब्र में नूर ही नूर अता फ़रमा। सवालात-ए-क़ब्र के वक़्त आसानी अता फ़रमा और अपनी रहमत के साये में उन्हें जगह नसीब फ़रमा।

दफ़न के वक़्त की दुआ:

या अल्लाह! जब मरहूमा को क़ब्र में उतारा जाए तो उनके लिए इस आख़िरी मंज़िल को आसान फ़रमा। क़ब्र को उनके लिए वुसअत वाली, रोशन और सुकून की जगह बना दे। मिट्टी की हर परत को उनके लिए रहमत और नूर का ज़रिया बना दे। उन्हें अज़ाब-ए-क़ब्र से महफ़ूज़ फ़रमा और जन्नतुल फ़िरदौस में आला मक़ाम अता फ़रमा।

मिट्टी देते वक़्त तमाम हाज़िरीन के लिए दुआ:

या अल्लाह! हम सबको मौत की हक़ीक़त समझने, नेक आमाल करने और ईमान पर ख़ातिमा नसीब फ़रमा। मरहूमा को अपनी बेपनाह रहमत में जगह अता फ़रमा और उनके तमाम घरवालों को सब्र-ए-जमील अता फ़रमा।

आमीन सुम्मा आमीन या रब्बुल आलमीन।

इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन।


ख़बरनवीस एवं इदारा

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उत्तर प्रदेश डेस्क से प्रधान संपादक ज़मीर आलम की ख़ास रिपोर्ट।

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22 सदस्यीय कार्यकारिणी में फेरबदल पर उठे सवाल! 600 रुपये की सदस्यता रसीद और 2,100 रुपये के चंदे का हिसाब कौन देगा? चुनावी अधिकारों को लेकर बिरादरी में चर्चा तेज

ख़तौली में हुई बैठक के बाद कार्यकारिणी की सूची में नामों के बदलाव पर सदस्यों ने उठाए सवाल, आपत्ति दर्ज कराने वाले सदस्यों के नाम हटने और चुनाव में मतदान के अधिकार को लेकर मांगा गया जवाब

बड़ौत, जिला बागपत (उत्तर प्रदेश)।

मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी के संगठनात्मक मामलों में 22 सदस्यीय कार्यकारिणी, सदस्यता की शर्तों, चुनावी प्रक्रिया और संगठन के नाम पर जमा की गई धनराशि को लेकर कुछ सदस्यों की ओर से महत्वपूर्ण सवाल उठाए जा रहे हैं। इन सवालों ने संगठन के भीतर पारदर्शिता, आपसी मशवरे और लोकतांत्रिक व्यवस्था को लेकर एक नई बहस को जन्म दिया है।

मामला उस समय चर्चा में आया जब संगठन की 22 सदस्यीय कार्यकारिणी के सदस्यों की सूची सामने आई। इस सूची के संबंध में एक सदस्य की ओर से यह सवाल उठाया गया कि कार्यकारिणी में शामिल सदस्य समय-समय पर बदलते रहते हैं। इसके लिए पूर्व में आयोजित एक बैठक का हवाला भी दिया गया, जो खतौली में अशरफ एडवोकेट के बुढ़ाना रोड स्थित आवास पर आयोजित हुई थी।

बताया गया कि उक्त बैठक में अब्दुल सत्तार देवबंद और मोहम्मद इमरान थानाभवन सहित कुछ अन्य साथी भी मौजूद थे। संदेश भेजने वाले सदस्य के अनुसार, बैठक के दौरान इन दोनों सदस्यों ने कुछ विषयों पर अपनी आपत्ति दर्ज कराई थी, लेकिन बाद में जारी की गई कार्यकारिणी की सूची में उनके नाम शामिल नहीं दिखाई दिए।

इस घटनाक्रम के बाद सवाल उठाया जा रहा है कि क्या कार्यकारिणी की सदस्यता में बदलाव किसी निर्धारित प्रक्रिया के तहत किया गया है? यदि किसी सदस्य को हटाया गया है अथवा उसकी जगह किसी अन्य व्यक्ति को शामिल किया गया है, तो क्या इसका कोई लिखित प्रस्ताव, बैठक का कार्यवृत्त अथवा अधिकृत निर्णय मौजूद है?

यह सवाल इसलिए भी अहम है क्योंकि किसी भी पंजीकृत संगठन में पदाधिकारियों और कार्यकारिणी सदस्यों की नियुक्ति, बदलाव तथा उनके अधिकार संगठन के पंजीकृत संविधान और उपविधियों के अनुरूप होने चाहिए।

2,100 रुपये जमा कराने का मामला भी चर्चा में

सदस्य की ओर से भेजे गए संदेश में एक अन्य महत्वपूर्ण विषय का उल्लेख किया गया है। उनके अनुसार, खतौली में आयोजित उसी बैठक के दौरान कुछ सदस्यों ने संगठन के पंजीकरण के उद्देश्य से 2,100 रुपये नकद जमा कराए थे।

अब सवाल यह उठता है कि पंजीकरण के लिए जमा की गई इस धनराशि का विधिवत हिसाब-किताब कहां उपलब्ध है? कितने लोगों ने रकम जमा कराई? कुल कितनी धनराशि एकत्र हुई? क्या रकम प्राप्त करने वालों की ओर से रसीद जारी की गई? और क्या इस धनराशि को संगठन के खाते अथवा किसी अधिकृत वित्तीय अभिलेख में दर्ज किया गया?

संगठनात्मक पारदर्शिता का तकाज़ा है कि बिरादरी के जिन लोगों ने किसी सामाजिक या संगठनात्मक उद्देश्य से आर्थिक सहयोग किया है, उन्हें उस धनराशि के इस्तेमाल की जानकारी उपलब्ध कराई जाए।

यहां यह स्पष्ट करना भी आवश्यक है कि नकद धनराशि जमा होना अपने आप में किसी अनियमितता का प्रमाण नहीं है। वास्तविक स्थिति जानने के लिए रसीदों, भुगतान के रिकॉर्ड, बैठक के प्रस्ताव और पंजीकरण संबंधी दस्तावेजों का अवलोकन आवश्यक है।

600 रुपये की रसीद पर सदस्य बने लोगों के मतदान का अधिकार कहां गया?

इस पूरे प्रकरण का सबसे महत्वपूर्ण और संवेदनशील पहलू 600 रुपये की सदस्यता रसीद से जुड़ा हुआ है।

संदेश भेजने वाले सदस्य का कहना है कि बिरादरी के जिन लोगों की 600 रुपये की रसीद काटी गई थी, उन्हें सक्रिय सदस्य बताया गया था। उस समय यह शर्त भी सामने रखी गई थी कि यही सक्रिय सदस्य संगठन के चुनाव में अपने मताधिकार का इस्तेमाल करेंगे।

ऐसे में अब सवाल उठाया जा रहा है कि यदि सदस्यता शुल्क जमा कराने वाले और सक्रिय सदस्य बनाए गए लोगों को चुनाव में मतदान का अधिकार नहीं दिया जाता, तो इसके पीछे क्या नियम और आधार है?

क्या सदस्यता लेने के समय बताई गई शर्तें आज भी प्रभावी हैं? क्या सभी सदस्यों को समान रूप से मतदान का अधिकार प्राप्त है? क्या किसी सदस्य की सदस्यता समाप्त की गई है? यदि हां, तो क्या उसे इसकी लिखित सूचना दी गई और क्या उसे अपना पक्ष रखने का अवसर मिला?

संदेश में यह भी मांग की गई है कि यदि 600 रुपये की रसीद के आधार पर बनाए गए सदस्यों को संगठन के चुनाव में भाग लेने का अधिकार नहीं दिया जा सकता, तो उनकी जमा की गई सदस्यता राशि वापस करने पर भी विचार किया जाना चाहिए।

सदस्यों की यह मांग संगठन के सामने एक गंभीर सवाल रखती है कि सदस्यता के समय किए गए वादों, निर्धारित नियमों और वास्तविक व्यवहार में एकरूपता क्यों न हो?

चुनाव किसी व्यक्ति की मर्जी से नहीं, संविधान और नियमों से होने चाहिए

किसी भी सामाजिक संगठन की मजबूती उसके पदाधिकारियों की संख्या से नहीं, बल्कि उसकी आंतरिक लोकतांत्रिक व्यवस्था, पारदर्शिता और सदस्यों के विश्वास से तय होती है।

संगठन का सदर, कार्यकारिणी और अन्य पदाधिकारी किस प्रक्रिया से चुने जाएंगे, इसका स्पष्ट उल्लेख पंजीकृत संविधान एवं उपविधियों में होना चाहिए।

यदि संगठन में चुनाव की व्यवस्था निर्धारित है, तो सभी पात्र सदस्यों को नियमों के मुताबिक चुनाव में भाग लेने और मतदान करने का समान अवसर मिलना चाहिए। न किसी व्यक्ति को मनमाने ढंग से अधिकारों से वंचित किया जाना चाहिए और न ही किसी पदाधिकारी को नियमों से ऊपर समझा जाना चाहिए।

इसी संदर्भ में सदस्यों की ओर से यह सवाल भी सामने आया है कि यदि चुनाव में सदस्यता शुल्क जमा करने वाले लोगों की भागीदारी स्वीकार नहीं की जाती, तो फिर संगठन के पदाधिकारियों का चयन किस आधार पर किया जाएगा?

बिरादरी के लोगों की अपेक्षा है कि संगठन में होने वाले प्रत्येक महत्वपूर्ण निर्णय को लिखित रूप में दर्ज किया जाए और सदस्यों के सामने रखा जाए, ताकि किसी प्रकार की गलतफहमी अथवा विवाद की गुंजाइश न रहे।

कानूनी पहलू : पंजीकृत संविधान और सदस्यता रजिस्टर ही होंगे अहम

कानूनी दृष्टि से इस पूरे मामले में कुछ दस्तावेज अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।

यदि संबंधित संगठन सोसाइटीज रजिस्ट्रेशन एक्ट, 1860 के अंतर्गत पंजीकृत है, तो उसके पंजीकरण प्रमाणपत्र, पंजीकृत नियमावली, उपविधियों और लागू राज्यीय संशोधनों के आधार पर उसकी आंतरिक व्यवस्था का परीक्षण किया जाना चाहिए।

विशेष रूप से निम्नलिखित अभिलेखों का अवलोकन आवश्यक है :

  1. संगठन का पंजीकरण प्रमाणपत्र एवं पंजीकरण संख्या।
  2. पंजीकृत संविधान और उपविधियों की प्रमाणित प्रति।
  3. संगठन के मूल एवं वर्तमान सदस्यों का रजिस्टर।
  4. 600 रुपये की सदस्यता रसीदों और जमा धनराशि का विवरण।
  5. 2,100 रुपये जमा कराने वाले सदस्यों की सूची तथा उपलब्ध रसीदें।
  6. खतौली में आयोजित बैठक का कार्यवृत्त और प्रस्ताव।
  7. कार्यकारिणी के गठन, बदलाव अथवा सदस्यों को हटाने संबंधी लिखित निर्णय।
  8. चुनाव की अधिसूचना, मतदाता सूची और मतदान के लिए निर्धारित पात्रता संबंधी नियम।
  9. संगठन के आय-व्यय का लेखा-जोखा तथा संबंधित वित्तीय अभिलेख।

इन दस्तावेजों के आधार पर ही यह निर्धारित किया जा सकता है कि सदस्यता में बदलाव, कार्यकारिणी का गठन और चुनावी प्रक्रिया पंजीकृत नियमों के अनुरूप हुई है अथवा नहीं।

यह भी ध्यान देने योग्य है कि प्रत्येक रसीदधारी व्यक्ति को स्वतः मतदान का अधिकार प्राप्त हो, यह जरूरी नहीं है। उसका अधिकार संगठन की पंजीकृत उपविधियों, सदस्यता की श्रेणी, पात्रता और लागू कानून पर निर्भर करेगा। लेकिन यदि सदस्यता लेते समय मतदान का अधिकार स्पष्ट रूप से बताया गया था, तो उस शर्त और उससे संबंधित दस्तावेजों की जांच आवश्यक है।

इसी प्रकार किसी सदस्य का नाम सूची में न होना अपने आप में अवैध निष्कासन का प्रमाण नहीं है। इसके लिए संगठन के नियम, बैठक के निर्णय और संबंधित सदस्य को दी गई सूचना देखना जरूरी होगा।

बिरादरी के नाम पर संगठन है तो जवाबदेही भी बिरादरी के प्रति होनी चाहिए

मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी का सामाजिक इतिहास आपसी भाईचारे, मशवरे, एकता और सामूहिक सहयोग की परंपरा से जुड़ा रहा है। ऐसे में बिरादरी के नाम पर स्थापित किसी भी संगठन से यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि उसके सभी कार्य निष्पक्षता, अमानतदारी और पारदर्शिता के साथ संपन्न हों।

संगठन में मतभेद होना कोई असामान्य बात नहीं है। अलग-अलग राय रखना और किसी निर्णय पर आपत्ति दर्ज कराना भी लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा है। लेकिन किसी भी सदस्य की असहमति को व्यक्तिगत विवाद का रूप देने के बजाय उसका समाधान संगठन के संविधान और आपसी मशवरे के जरिए होना चाहिए।

बिरादरी के जिम्मेदार लोगों को चाहिए कि वे सामने आए सवालों का तथ्यात्मक जवाब दें, सदस्यता और कार्यकारिणी की स्थिति स्पष्ट करें तथा आर्थिक लेन-देन का विवरण सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराएं।

इससे न केवल सदस्यों का विश्वास मजबूत होगा, बल्कि संगठन की साख और भविष्य भी सुरक्षित रहेगा।

अब संगठन के जिम्मेदारों से अपेक्षित हैं इन सवालों के जवाब

  • 22 सदस्यीय कार्यकारिणी की अंतिम सूची किस बैठक में और किस प्रस्ताव के आधार पर स्वीकृत हुई?
  • अब्दुल सत्तार देवबंद और मोहम्मद इमरान थानाभवन के नाम सूची में क्यों शामिल नहीं हैं? क्या उन्होंने स्वयं पद छोड़ने की सूचना दी थी अथवा कोई अधिकृत निर्णय हुआ?
  • 600 रुपये की रसीद के आधार पर बनाए गए सदस्यों की वर्तमान स्थिति क्या है?
  • क्या इन सदस्यों को आगामी चुनाव में मतदान का अधिकार मिलेगा?
  • खतौली की बैठक में जमा कराई गई 2,100 रुपये की धनराशि का कुल हिसाब और उपयोग क्या है?
  • चुनाव में मतदान करने वाले पात्र सदस्यों की अंतिम सूची कब और किस प्रक्रिया से जारी की जाएगी?
  • क्या सभी सदस्यों को संगठन के संविधान एवं उपविधियों की प्रति उपलब्ध कराई जाएगी?

इन सवालों का जवाब देना किसी व्यक्ति विशेष पर आरोप लगाना नहीं, बल्कि संगठनात्मक पारदर्शिता की मांग है।

मुल्तानी समाज राष्ट्रीय समाचार पत्रिका का पक्ष है कि किसी भी सामाजिक संगठन में पद से अधिक महत्व अमानत, व्यक्ति से अधिक महत्व उसूल और निजी पसंद से अधिक महत्व सामूहिक सहमति को दिया जाना चाहिए।

फिलहाल सामने आए संदेश और उपलब्ध जानकारी के आधार पर ये सवाल उठाए गए हैं। संगठन के जिम्मेदार पदाधिकारियों, अध्यक्ष, कार्यकारिणी तथा संबंधित सदस्यों का पक्ष प्राप्त होने पर उसे भी निष्पक्षता के साथ प्रकाशित किया जाएगा।

संपादकीय टिप्पणी: बिरादरी की एकता सर्वोपरि है। हमारा उद्देश्य किसी की प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचाना या किसी व्यक्ति विशेष के विरुद्ध माहौल बनाना नहीं, बल्कि संगठनात्मक व्यवस्था में पारदर्शिता, जवाबदेही और संवैधानिक प्रक्रिया को मजबूत करना है। किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले सभी संबंधित पक्षों का पक्ष और दस्तावेज देखना आवश्यक है।


प्रस्तुति : अली हसन मुल्तानी
पत्रकार, बड़ौत – जिला बागपत, उत्तर प्रदेश डेस्क

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बिरादरी के नाम पर आख़िर कब तक चलेगा धोखे और झूठ का खेल? बड़ौत से खतौली तक उठे सवाल, मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी के नाम पर चल रही संस्थाओं की जवाबदेही पर घिरी बहस!

कहीं रजिस्टर्ड संस्था के कामकाज पर सवाल, तो कहीं मिर्ज़ा मुल्तानी वेलफेयर सोसाइटी में तानाशाही के आरोप; 3,100 रुपये की रसीद, वोट का अधिकार, कथित आर्थिक अनियमितताओं और राष्ट्रीय नेतृत्व को लेकर सोशल मीडिया पर छिड़ी बहस

उत्तर प्रदेश डेस्क | ख़ास रिपोर्ट

मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी का इतिहास, सामाजिक पहचान, मेहनत, कारोबार और तालीमी विरासत किसी परिचय की मोहताज नहीं है। इस बिरादरी में तालीमयाफ़्ता अफ़राद, वकील, कारोबारी, समाजसेवी, बुद्धिजीवी और समझदार लोगों की कोई कमी नहीं है। इसके बावजूद समय-समय पर बिरादरी के नाम पर गठित सामाजिक संस्थाओं और उनके ज़िम्मेदारों के कामकाज को लेकर ऐसे सवाल सामने आते रहे हैं, जो न केवल आम लोगों के एतमाद को प्रभावित करते हैं, बल्कि आने वाली नस्लों के मुस्तक़बिल के लिए भी फ़िक्र का सबब बनते हैं।

आख़िर सवाल यह है कि बिरादरी के नाम पर तंजीमें बनाने वाले कुछ लोग अपनी ज़िम्मेदारियों को किस तरह निभा रहे हैं? क्या सामाजिक संस्थाएं बिरादरी की एकता, तरक़्क़ी और नुमाइंदगी के लिए बनाई जाती हैं या फिर कुछ अफ़राद के निजी प्रभाव और पद की चाहत तक सिमटकर रह जाती हैं?

इन दिनों सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे मुख़्तलिफ़ पैग़ामात, कथित ऑडियो और वीडियो ने इस बहस को और तेज़ कर दिया है। विशेष रूप से उत्तर प्रदेश के बड़ौत और मुज़फ्फरनगर के खतौली से संबंधित दो संस्थाओं का ज़िक्र करते हुए बिरादरी के लोग कई गंभीर सवाल उठा रहे हैं।

बड़ौत की संस्था से खतौली की सोसाइटी तक, आखिर सवाल क्यों उठ रहे हैं?

सोशल मीडिया पर वायरल एक संदेश में मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी के एक शख़्स ने तल्ख़ अंदाज़ में सवाल उठाया है कि बिरादरी के नाम पर आख़िर कब तक झूठे वादों और ग़लत बयानी का सिलसिला चलता रहेगा?

संदेश में बड़ौत की रजिस्टर्ड संस्था अंजुमन मुल्तानी मुग़ल आह्नग्रान, बड़का मार्ग, बड़ौत के कामकाज को लेकर उठाए जा रहे सवालों का हवाला दिया गया है। वहीं मुज़फ्फरनगर के कस्बा खतौली की मिर्ज़ा मुल्तानी वेलफेयर सोसाइटी को लेकर सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे संदेशों, कथित दस्तावेज़ों और आर्थिक लेन-देन से जुड़े सवालों का भी ज़िक्र किया गया है।

वायरल संदेश लिखने वाले का कहना है कि एक संस्था के कामकाज को लेकर उठे सवालों का सिलसिला अभी थमा भी नहीं था कि दूसरी संस्था को लेकर भी नए विवाद और चर्चाएं सामने आने लगी हैं।

उन्होंने अफ़सोस जताते हुए सवाल किया है कि जब बिरादरी में पढ़े-लिखे, तालीमयाफ़्ता, कारोबारी और समझदार लोग मौजूद हैं तो फिर मुट्ठी भर लोग किस तरह पूरे समाज को अपने दावों और वादों के ज़रिए प्रभावित कर लेते हैं?

संदेश के अंत में लिखा गया एक सवाल विशेष रूप से ध्यान खींचता है—

'ज़रा सोचिए!'

यह सवाल केवल किसी एक संस्था या व्यक्ति से नहीं, बल्कि उन तमाम लोगों से है जो बिरादरी के नाम पर सामाजिक नेतृत्व का दावा करते हैं।

हालांकि, दोनों संस्थाओं के संबंध में लगाए गए आरोपों और अनियमितताओं की स्वतंत्र पुष्टि होना अभी बाक़ी है। संबंधित संस्थाओं का पक्ष भी सामने आना ज़रूरी है।

खतौली की मिर्ज़ा मुल्तानी वेलफेयर सोसाइटी में अंदरूनी मतभेद हुए सार्वजनिक

खतौली की मिर्ज़ा मुल्तानी वेलफेयर सोसाइटी (MMWS) को लेकर सोशल मीडिया पर इन दिनों कई संदेश वायरल हो रहे हैं। इन संदेशों में संगठन के पुराने साथियों की नाराज़गी, मौजूदा नेतृत्व पर तानाशाही के आरोप और राष्ट्रीय स्तर पर चुनावी व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल उठाए गए हैं।

एक वायरल संदेश में मोहतरम जनाब साबिर साहब को संबोधित करते हुए लिखा गया है कि MMWS की बुनियाद में कुछ लोगों का खून, पसीना और पैसा लगा हुआ है। संदेश में हाजी सगीर हसन साहब के योगदान का विशेष रूप से ज़िक्र किया गया है।

वायरल पैग़ाम के अनुसार, संस्था के रजिस्ट्रेशन में हाजी सगीर हसन साहब ने अपनी जेब से रकम खर्च की थी। वर्ष 2018 में दिल्ली में आयोजित सेमिनार और वर्ष 2023 में मिर्ज़ा ग़ालिब ऑडिटोरियम में आयोजित बड़े कार्यक्रम को भी बिरादरी की सामाजिक यात्रा का अहम हिस्सा बताया गया है।

संदेश में दावा किया गया है कि वर्ष 2023 के कार्यक्रम पर लगभग 6 लाख 80 हज़ार रुपये खर्च किए गए, जिनका इंतज़ाम हाजी सगीर हसन साहब, अब्दुल हमीद साहब और दिल्ली के कुछ साथियों के सहयोग से हुआ था।

वहीं, संदेश लिखने वाले ने आरोप लगाया है कि बाद के दौर में कई पुराने और क़ाबिल साथियों को संगठन से अलग कर दिया गया।

पुराने साथियों को हटाने और तानाशाही के आरोप

वायरल संदेशों में इमरान साहब, कामिल साहब, देवबंद के वसीम साहब, सलीम साहब, इनाम साहब और आलम साहब सहित कई लोगों का नाम लिया गया है।

संदेश लिखने वाले का दावा है कि इन लोगों सहित कई साथियों को संगठन से अलग किया गया और सामूहिक मशवरे की व्यवस्था प्रभावित हुई।

उन्होंने मौजूदा नेतृत्व पर तानाशाही का आरोप लगाते हुए संगठन के अंदर कुछ लोगों के प्रभाव को लेकर भी सवाल उठाए हैं।

यहां सवाल उठता है कि जिस संगठन की बुनियाद सामूहिक मेहनत, सहयोग और बिरादरी की ख़िदमत के लिए रखी गई हो, वहां पुराने सहयोगियों और सदस्यों की राय को कितनी अहमियत दी जा रही है?

क्या किसी सामाजिक संस्था का निज़ाम कुछ चुनिंदा लोगों की मर्ज़ी से चलना चाहिए या फिर उसके सभी वैध सदस्यों को निर्णय प्रक्रिया में बराबर का मौक़ा मिलना चाहिए?

सैफ़ी बिरादरी की मिसाल देकर किया जा रहा है आगाह

एक अन्य वायरल संदेश में सैफ़ी बिरादरी के संगठनात्मक मतभेदों की मिसाल देकर मुल्तानी बिरादरी को आगाह किया गया है।

संदेश में दावा किया गया है कि सैफ़ी नाम से संस्था बनने के बाद नेतृत्व को लेकर विवाद पैदा हुए और अलग-अलग लोगों की ओर से राष्ट्रीय सदर होने के दावे किए जाने लगे।

संदेश लिखने वाले ने सवाल उठाया है कि क्या मुल्तानी बिरादरी भी इसी तरह के संगठनात्मक बिखराव की तरफ़ बढ़ रही है?

उन्होंने कहा है कि किसी व्यक्ति की ज़िद या नेतृत्व संबंधी मतभेदों की वजह से पूरी बिरादरी का सामाजिक भविष्य प्रभावित नहीं होना चाहिए।

3,100 रुपये की रसीद और वोट के अधिकार पर जवाब मांगा

इस पूरे घटनाक्रम का सबसे अहम और आम सदस्यों से सीधे जुड़ा पहलू 3,100 रुपये की रसीद और मतदान के अधिकार को लेकर सामने आया है।

सोशल मीडिया पर वायरल एक संदेश में सवाल किया गया है कि क्या कार्यवाहक सदर बनने के लिए भी पर्चा भरना पड़ता है? क्या कार्यवाहक सदर बनने के लिए 3,100 रुपये की रसीद बनवाना ज़रूरी है?

कुछ लोगों का दावा है कि उनसे यह कहकर पैसे जमा कराए गए थे कि उनकी सदस्यता बनेगी और वे बिरादरी का राष्ट्रीय सदर चुनने के लिए वोट डाल सकेंगे।

अब यही लोग सवाल उठा रहे हैं कि उन्हें केवल रसीद नहीं, बल्कि अपने लोकतांत्रिक अधिकार की स्पष्ट जानकारी चाहिए।

उनका कहना है कि यदि उनसे सदस्यता के नाम पर रकम ली गई है तो उन्हें यह बताया जाए कि उनकी सदस्यता की स्थिति क्या है, मतदाता सूची में उनका नाम शामिल है या नहीं और राष्ट्रीय सदर का चुनाव कब कराया जाएगा?

इस मामले में सोसाइटी के ज़िम्मेदारों को सदस्यता की शर्तें, रसीदों का उद्देश्य, मतदान के पात्र सदस्यों की स्थिति और चुनाव की प्रक्रिया सार्वजनिक करनी चाहिए।

जायज़ सवालों को सियासत बताकर टालने का आरोप

एक वायरल संदेश में अली अंसार साहब को संबोधित करते हुए कहा गया है कि बिरादरी के ग्रुपों में सवाल पूछना कोई बुरी बात नहीं है, बल्कि सवालों का जवाब न देना चिंता का विषय है।

एक दूसरे संदेश में अब्दुल बारी साहब को संबोधित करते हुए सवाल उठाया गया है कि जायज़ सवाल पूछने वालों को समझाने और चुप कराने की कोशिश क्यों की जाती है?

संदेश लिखने वाले का आरोप है कि सवालों को सियासत का नाम देकर टाल दिया जाता है।

उनका कहना है कि अगर कोई व्यक्ति संस्था की सदस्यता, राष्ट्रीय सदर के चयन और आर्थिक पारदर्शिता के बारे में जानकारी मांग रहा है तो उसे बिरादरी विरोधी या सियासत करने वाला क्यों समझा जाए?

बेशक, सवाल करने का हक़ हर सदस्य को है, लेकिन सवालों के जवाब भी तहज़ीब और दलील के साथ दिए जाने चाहिए। यही किसी भी मज़बूत सामाजिक संगठन की पहचान होती है।

राजनीति में भागीदारी का एजेंडा या पद हासिल करने की कोशिश?

दिल्ली से वायरल एक अन्य संदेश में कहा गया है कि राजनीति में भागीदारी सोसाइटी के एजेंडे का हिस्सा है और नेतृत्व की सलाहियत पैदा करने के लिए एक मंच की आवश्यकता होती है।

इसमें कॉलेजों के छात्र संघ चुनाव की मिसाल देते हुए कहा गया है कि जिस तरह छात्र राजनीति से भविष्य के नेता तैयार होते हैं, उसी तरह बिरादरी के लोग भी संगठनात्मक मंच से राजनीतिक समझ विकसित कर सकते हैं।

इसके जवाब में सवाल उठाया गया है कि सामाजिक संस्था का अमीर या सदर तो सभी के मशवरे से चुना जाना चाहिए।

यह बहस अपने आप में अहम है कि बिरादरी को राजनीतिक भागीदारी का मंच देने का मक़सद क्या है और उस मंच का नेतृत्व किस तरह चुना जाएगा?

जातीय पहचान और आने वाली नस्लों के मुस्तक़बिल पर भी सवाल

एक वायरल संदेश में प्रस्तावित जातीय जनगणना का हवाला देते हुए बिरादरी की पहचान को लेकर भी चिंता जताई गई है।

संदेश में पूछा गया है कि मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी के लोग अपनी सामाजिक और जातीय पहचान किस नाम से दर्ज कराएं? क्या बिरादरी के ज़िम्मेदारों ने इस संबंध में कोई जागरूकता अभियान चलाया है?

यह सवाल केवल एक जनगणना तक सीमित नहीं है। यह बिरादरी की पहचान, सामाजिक अधिकारों, सरकारी योजनाओं और आने वाली नस्लों के भविष्य से जुड़ा विषय है।

हालांकि, जनगणना की तारीख़ों और जातीय वर्गीकरण को लेकर किसी भी नतीजे पर पहुंचने से पहले सरकारी अधिसूचना और संबंधित प्रशासनिक दिशा-निर्देशों की पुष्टि ज़रूरी है।

अब बिरादरी के सामने कुछ सीधे सवाल

बड़ौत और खतौली से संबंधित वायरल संदेशों तथा मौजूदा चर्चाओं के बाद बिरादरी के सामने कई सवाल हैं:

  1. क्या बिरादरी के नाम पर संचालित संस्थाओं की वार्षिक रिपोर्ट और ऑडिट सार्वजनिक किए जाते हैं?
  2. क्या संस्थाओं के पंजीकृत नियमों के मुताबिक चुनाव कराए जाते हैं?
  3. सदस्यता के नाम पर ली जाने वाली रकम का पूरा हिसाब सदस्यों को दिया जाता है?
  4. क्या 3,100 रुपये की रसीद लेने वाले लोगों को मतदान का अधिकार दिया जाएगा?
  5. पुराने पदाधिकारियों और संस्थापक साथियों को हटाने के क्या लिखित कारण हैं?
  6. क्या राष्ट्रीय स्तर पर नेतृत्व के चयन के लिए निष्पक्ष और पारदर्शी चुनावी व्यवस्था है?
  7. बिरादरी की तालीम, रोज़गार, सामाजिक पहचान और राजनीतिक भागीदारी के लिए संस्थाओं की वास्तविक कार्ययोजना क्या है?
  8. क्या आम बिरादरी को संस्थाओं के अहम फैसलों और आर्थिक गतिविधियों की जानकारी मिलती है?

बिरादरी के समझदार और तालीमयाफ़्ता लोग कब आगे आएंगे?

सबसे अफ़सोसनाक पहलू यह है कि मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी में पढ़े-लिखे, कारोबारी, वकील, तालीमयाफ़्ता और समझदार लोगों की अच्छी तादाद मौजूद है। इसके बावजूद सामाजिक नेतृत्व और संगठनात्मक जवाबदेही के मामलों में आम लोगों की सामूहिक आवाज़ उतनी प्रभावशाली दिखाई नहीं देती, जितनी होनी चाहिए।

आख़िर ऐसा क्यों?

क्या बिरादरी के बुद्धिजीवी और शिक्षित लोग इन मामलों से दूरी बनाए रखेंगे? क्या सामाजिक संस्थाओं के कामकाज को केवल कुछ पदाधिकारियों के भरोसे छोड़ दिया जाएगा? क्या आम सदस्य केवल रसीद कटवाने और कार्यक्रमों में शामिल होने तक सीमित रहेंगे?

समाज को ऐसे नेतृत्व की ज़रूरत है जो सवालों से न घबराए, दस्तावेज़ दिखाने में संकोच न करे, आर्थिक हिसाब देने से पीछे न हटे और किसी भी पद को अपनी निजी जागीर न समझे।

आख़िरी सवाल: बिरादरी की ख़िदमत या कुर्सी की सियासत?

बिरादरी के नाम पर कोई भी संस्था बने, उसका मक़सद लोगों को जोड़ना, तालीम को बढ़ावा देना, कारोबार और रोज़गार के अवसर पैदा करना, सामाजिक अधिकारों के लिए आवाज़ उठाना और आने वाली नस्लों के लिए बेहतर रास्ता तैयार करना होना चाहिए।

यदि किसी संस्था के भीतर मतभेद हैं तो उन्हें बातचीत और मशवरे से हल किया जाना चाहिए। यदि आर्थिक लेन-देन पर सवाल हैं तो हिसाब पेश किया जाना चाहिए। यदि चुनाव पर विवाद है तो पंजीकृत नियमावली के मुताबिक निष्पक्ष प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए।

बिरादरी किसी एक शख़्स, परिवार, गुट या सोसाइटी की जागीर नहीं है। यह हम सबकी साझा पहचान और हमारी आने वाली नस्लों की अमानत है।

आख़िर कब तक बिरादरी के नाम पर बड़े-बड़े दावे होते रहेंगे और आम लोग अपने ही अधिकारों के लिए सवाल पूछते रहेंगे?

अब वक़्त आ गया है कि बिरादरी के नाम पर नेतृत्व का दावा करने वाले हर शख़्स से उसके काम, किरदार, पारदर्शिता और जवाबदेही का हिसाब मांगा जाए।


संपादकीय स्पष्टीकरण: इस रिपोर्ट में बड़ौत की अंजुमन मुल्तानी मुग़ल आह्नग्रान तथा खतौली की मिर्ज़ा मुल्तानी वेलफेयर सोसाइटी के संबंध में सोशल मीडिया पर वायरल संदेशों और उनमें लगाए गए आरोपों को जनचर्चा के रूप में शामिल किया गया है। किसी भी संस्था या व्यक्ति के विरुद्ध धोखाधड़ी अथवा अन्य अनियमितता को न्यायिक या आधिकारिक पुष्टि के बिना सिद्ध तथ्य नहीं माना जाना चाहिए। संबंधित संस्थाओं और पदाधिकारियों का पक्ष प्राप्त होने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।

प्रस्तुति:

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मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी की क़ौमी समाचार पत्रिका, न्यूज़ पोर्टल एवं यूट्यूब चैनल

उत्तर प्रदेश डेस्क से पत्रकार: अली हसन मुल्तानी

स्थान: बड़ौत, जिला बागपत, उत्तर प्रदेश

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गुरुवार, 5 नवंबर 2026

बिरादरी के नाम पर राष्ट्रीय तंजीम का दावा या हक़ीक़त कुछ और?

खतौली की पंजीकृत सोसाइटी के कार्यक्षेत्र, राष्ट्रीय ओहदों की तक़सीम और चुनावी रकम पर उठे संगीन सवाल! आखिर कब मिलेगा बिरादरी को अपने सवालों का जवाब?

ख़ास तहक़ीक़ाती रिपोर्ट | उत्तर प्रदेश डेस्क | अज़हर ख़ान

मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी की एक तंजीम, जिसका रजिस्टर्ड दफ़्तर उत्तर प्रदेश के ज़िला मुज़फ्फरनगर के क़स्बा खतौली में बताया जाता है और जिसका पंजीकरण सहारनपुर मंडल से हुआ है, आजकल अपनी संगठनात्मक हैसियत, राष्ट्रीय दायरे, ओहदों की तक़सीम और चुनावी अमल को लेकर बिरादरी के दरमियान कई सवालों के घेरे में है।

यह वही बिरादरी है जिसके बुजुर्गों ने अपनी मेहनत, हुनर, ईमानदारी और खुद्दारी से मुल्क के मुख्तलिफ सूबों में अपनी पहचान बनाई। दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, उत्तराखंड और दीगर रियासतों में रहने वाले हमारे बिरादरी भाई हमेशा से अपने हक़, अपनी इज़्ज़त और अपने सामाजिक वक़ार को लेकर संजीदा रहे हैं।

मगर अफसोस! आज इसी बिरादरी के कुछ लोग एक ऐसी संगठनात्मक सूरतेहाल को लेकर परेशान और हैरान नज़र आ रहे हैं, जिसके बारे में उनका कहना है कि उन्हें तंजीम की असल कानूनी हैसियत और उसके पंजीकृत दायरे की मुकम्मल जानकारी पहले नहीं दी गई।

आखिर ऐसा क्या हुआ कि जिन लोगों ने एक राष्ट्रीय तंजीम समझकर अपना वक़्त, पैसा और एतमाद लगाया, आज वही लोग अपने फैसले पर दोबारा गौर करने को मजबूर हैं?

इंजीनियर साहब का रौब या दस्तावेज़ों की असल हैसियत?

बिरादरी में अपने नाम के आगे 'इंजीनियर' लिखकर अपना तआरुफ कराने वाले तंजीम के सदर साहब की शख्सियत से शायद ही कोई अनजान हो। बिरादरी के कुछ तालीमयाफ्ता और सरकारी मुलाज़िमों का उनके साथ खड़ा होना भी किसी सामाजिक संगठन के लिए हौसला-अफ़ज़ाई की बात हो सकती है।

लेकिन यहां एक बुनियादी सवाल पैदा होता है।

क्या किसी शख्स की तालीमी पहचान, उसका ओहदा, उसका असर-ओ-रसूख या कुछ सरकारी मुलाज़िमों की हिमायत किसी तंजीम के पंजीकृत दस्तावेज़ों से बढ़कर हो सकती है?

बिरादरी के कुछ लोगों का कहना है कि सदर साहब को कुछ असरदार और तालीमयाफ्ता लोगों की हिमायत हासिल रही, जिसके चलते संगठन के कामकाज पर उठने वाले सवालों को उतनी अहमियत नहीं मिल सकी, जितनी मिलनी चाहिए थी।

हमारा मानना है कि किसी भी तंजीम में शख्सियत से ज्यादा अहमियत उसके दस्तूर, क़वायद और कानूनी हैसियत की होती है। ओहदा चाहे कितना ही बड़ा क्यों न हो, जवाबदेही से कोई भी ऊपर नहीं हो सकता।

उत्तर प्रदेश की सोसाइटी और मुल्कभर में राष्ट्रीय ओहदे! यह कैसा निज़ाम?

इस पूरे मामले की सबसे अहम कड़ी सोसाइटी के पंजीकृत कार्यक्षेत्र से जुड़ी है।

बिरादरी में उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, संबंधित सोसाइटी का पंजीकृत कार्यक्षेत्र उत्तर प्रदेश तक महदूद बताया जा रहा है। यदि पंजीकृत उपविधियों में वास्तव में यही सीमा निर्धारित है, तो फिर यह सवाल अपनी जगह बेहद अहम है कि दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, उत्तराखंड और मुल्क की दूसरी रियासतों में रहने वाले बिरादरी भाइयों को राष्ट्रीय अध्यक्ष, प्रदेश अध्यक्ष, ज़िला अध्यक्ष और दीगर राष्ट्रीय ओहदों पर किस कानूनी बुनियाद पर नियुक्त किया गया?

क्या सोसाइटी के दस्तूर में राष्ट्रीय स्तर पर काम करने की गुंजाइश मौजूद थी?

क्या इसके लिए रजिस्ट्रार के यहां कोई संशोधन दर्ज कराया गया?

क्या सोसाइटी की जनरल बॉडी ने इस सिलसिले में कोई बाकायदा प्रस्ताव पास किया?

अगर तमाम कानूनी और दस्तावेज़ी कार्रवाई मुकम्मल है तो उसे बिरादरी के सामने लाने में क्या परेशानी है?

और अगर ऐसा कोई दस्तावेज़ मौजूद नहीं है, तो फिर इतने बड़े पैमाने पर राष्ट्रीय ओहदों की तक़सीम का आधार क्या था?

यह सवाल किसी की तौहीन के लिए नहीं, बल्कि बिरादरी के उन लोगों के हक़ के लिए हैं जिन्होंने राष्ट्रीय संगठन के नाम पर अपनी वाबस्तगी कायम की।

बिरादरी के अधिवक्ताओं को भी ओहदे दिए गए, मगर असल हक़ीक़त कब सामने आई?

इस मामले में एक और पहलू बेहद गौरतलब है।

बिरादरी के कई अधिवक्ता भी इस तंजीम से जुड़े और उन्हें मुख्तलिफ ओहदों से नवाज़े जाने की जानकारी सामने आई है।

किसी भी बिरादरी के लिए यह फख्र की बात है कि उसके नौजवान कानून की तालीम हासिल करके वकालत जैसे जिम्मेदार पेशे से जुड़े हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या उन्हें तंजीम की मुकम्मल कानूनी हैसियत और पंजीकृत कार्यक्षेत्र से आगाह कराया गया था?

कुछ लोगों का दावा है कि उन्हें बाद में मालूम हुआ कि संबंधित सोसाइटी का पंजीकृत दायरा उत्तर प्रदेश तक सीमित है।

अगर यह जानकारी सही है तो फिर सवाल उठता है कि राष्ट्रीय ओहदे स्वीकार करने से पहले संबंधित दस्तावेज़ क्यों सामने नहीं रखे गए?

क्या किसी भी तंजीम में ओहदा हासिल करने वाले शख्स को उसके संगठन की असल कानूनी हैसियत जानने का हक़ नहीं?

बिरादरी के वकीलों और दीगर तालीमयाफ्ता लोगों से भी गुज़ारिश है कि वे इस मामले को किसी शख्स की हिमायत या मुखालफत के बजाय दस्तावेज़ों और कानून की रोशनी में देखें।

'मुल्तानी समाज' की खबरें विरोध या बिरादरी को आगाह करने की कोशिश?

राष्ट्रीय समाचार पत्रिका 'मुल्तानी समाज' ने इस मसले को लेकर पहले भी कई बार बिरादरी के सामने सवाल रखे हैं।

पत्रिका का कहना है कि जब भी इस सिलसिले में खबरें प्रकाशित की गईं, तो कुछ लोगों द्वारा उन्हें विरोधियों की कार्रवाई बताकर सदस्यों से यह कहा गया कि ऐसे लोग हमेशा हमारे खिलाफ लिखते हैं, आप तंजीम के लिए अपना काम जारी रखिए।

हम पूछना चाहते हैं कि अगर खबरों में उठाए गए सवाल बेबुनियाद थे तो दस्तावेज़ों के साथ उनका जवाब क्यों नहीं दिया गया?

अगर सोसाइटी का राष्ट्रीय स्तर पर काम करना कानूनी तौर पर मुमकिन था, तो उसकी प्रमाणित उपविधियां और संबंधित संशोधन बिरादरी के सामने क्यों नहीं रखे गए?

किसी अखबार या समाचार पत्रिका से इख्तिलाफ रखना हर किसी का हक़ है, लेकिन सवाल का जवाब देने के बजाय सवाल उठाने वाले को विरोधी करार देना क्या किसी जिम्मेदार तंजीम की पहचान हो सकती है?

'मुल्तानी समाज' का मकसद किसी की शख्सियत को निशाना बनाना नहीं, बल्कि बिरादरी के सामने उन सवालों को रखना है जिनका ताल्लुक हर उस शख्स से है जिसने इस तंजीम पर एतमाद किया।

600 से 3100 रुपये तक की वसूली? वोट के नाम पर जमा रकम का हिसाब कौन देगा?

अब आते हैं इस पूरे मामले के सबसे अहम और नाज़ुक पहलू पर।

बिरादरी के कुछ सदस्यों की शिकायतों के मुताबिक, सोसाइटी के चुनाव और वोट बनाने के नाम पर उनसे 600 रुपये से लेकर 3100 रुपये तक की रकम जमा कराई गई।

शिकायत यह भी है कि रकम सोसाइटी के आधिकारिक बैंक खाते के बजाय एक निजी बैंक खाते में जमा कराई गई।

अगर यह शिकायतें सही हैं तो सदस्यों के कई सवाल अपनी जगह बिल्कुल जायज़ हैं।

  • वोट बनवाने के नाम पर कितनी रकम जमा की गई?
  • कुल कितने लोगों ने अपनी रकम जमा कराई?
  • रकम जमा करने वालों को रसीद दी गई या नहीं?
  • निजी बैंक खाते में रकम जमा कराने की वजह क्या थी?
  • जमा की गई रकम का कितना हिस्सा वोटर लिस्ट तैयार करने पर खर्च हुआ?
  • जिन लोगों ने रकम जमा की, उनके वोट वास्तव में बनाए गए या नहीं?
  • रकम का पूरा हिसाब सदस्यों को कब दिया जाएगा?

यहां एक बात बिल्कुल साफ होनी चाहिए कि बिरादरी के किसी भी शख्स की जेब से निकला हुआ पैसा उसकी मेहनत की कमाई है।

सामाजिक खिदमत के नाम पर जमा की गई रकम किसी की निजी मिल्कियत नहीं, बल्कि एक अमानत होती है। अमानत का तकाज़ा है कि उसका हिसाब भी साफ और शफ़्फ़ाफ़ होना चाहिए।

राष्ट्रीय चुनाव का इंतजार या अभी एक साल और सब्र?

बिरादरी के कुछ लोगों के पास तंजीम के सदर साहब की एक कथित ऑडियो रिकॉर्डिंग पहुंचने की बात कही जा रही है।

बताया जा रहा है कि इस ऑडियो में सदर साहब अपने सदस्यों को अपने-अपने शहरों में चुनाव कराकर स्थानीय कमेटियां गठित करने की बात समझाते सुनाई देते हैं। साथ ही राष्ट्रीय कार्यकारिणी के चुनाव के लिए अभी लगभग एक साल का इंतजार करने की बात भी सामने आने का दावा किया जा रहा है।

अगर यह ऑडियो असली है और इसमें कही गई बातें सही हैं तो फिर सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिन बिरादरी भाइयों ने राष्ट्रीय चुनाव की उम्मीद में रकम जमा कराई, उन्हें चुनाव की इस समय-सीमा से पहले ही पूरी तरह आगाह क्यों नहीं किया गया?

क्या उन्हें बताया गया था कि पहले शहरों की कमेटियां बनेंगी, फिर आगे चलकर राष्ट्रीय कार्यकारिणी का चुनाव होगा?

क्या यह चुनावी कार्यक्रम सोसाइटी के पंजीकृत दस्तूर और बाकायदा प्रस्ताव पर आधारित है?

सवाल यह भी है कि अगर राष्ट्रीय चुनाव में अभी एक साल बाकी है, तो वोट बनाने के नाम पर जमा की गई रकम और अब तक की गई कार्रवाई का पूरा ब्यौरा सदस्यों को क्यों न दिया जाए?

सदर साहब को समझना चाहिए कि बिरादरी के लोग सिर्फ ऑडियो सुनकर और मौखिक तसल्ली से अपने सवाल खत्म नहीं करेंगे। उन्हें अपने हक़ का हिसाब चाहिए।

ट्रस्ट और ISO प्रमाणपत्र का जिक्र, आखिर क्या है आगे का मंसूबा?

इसी कथित ऑडियो को लेकर यह भी चर्चा है कि सदर साहब ने अपने पास एक अलग ट्रस्ट के पंजीकरण और ISO प्रमाणपत्र होने का जिक्र किया है।

ट्रस्ट का पंजीकरण कराना या ISO प्रमाणपत्र हासिल करना अपने आप में कोई गलत काम नहीं है। हर शख्स को कानून के दायरे में रहकर संस्था कायम करने और सामाजिक काम करने का अधिकार है।

लेकिन बिरादरी के सामने सवाल यह है कि जब मौजूदा सोसाइटी की कार्यप्रणाली और चुनावी प्रक्रिया को लेकर सवाल उठ रहे हैं, तब अलग ट्रस्ट और ISO प्रमाणपत्र का जिक्र किस सिलसिले में किया गया?

क्या दोनों संस्थाओं का कामकाज अलग-अलग है?

क्या उनके बैंक खाते, सदस्यता, पदाधिकारी और आर्थिक गतिविधियां अलग हैं?

क्या सदस्यों को दोनों संस्थाओं की वास्तविक स्थिति और उनके आपसी संबंधों की जानकारी दी गई है?

बिरादरी को यह जानने का पूरा हक़ है कि जिस नाम पर उससे वाबस्तगी और आर्थिक सहयोग मांगा जा रहा है, उस संस्था की असल हैसियत क्या है।

सदर साहब से बिरादरी के सीधे सवाल!

हम संबंधित सदर साहब और तमाम जिम्मेदार पदाधिकारियों से अदब के साथ, मगर पूरी संजीदगी से पूछना चाहते हैं:

  1. सोसाइटी का असल पंजीकृत कार्यक्षेत्र क्या है?
  2. क्या उत्तर प्रदेश से बाहर राष्ट्रीय और प्रदेश स्तर की कमेटियां बनाने की वैधानिक अनुमति हासिल की गई?
  3. क्या संबंधित उपविधियों में कोई संशोधन कराया गया?
  4. राष्ट्रीय पदाधिकारियों की नियुक्ति किस प्रस्ताव और किस अधिकार से हुई?
  5. वोट बनाने के नाम पर जमा की गई कुल रकम कितनी है?
  6. रकम निजी बैंक खाते में जमा कराने का क्या कारण था?
  7. जिन सदस्यों ने रकम दी, उनके वोट कब बनाए जाएंगे?
  8. जमा रकम का पूरा हिसाब कब सार्वजनिक होगा?
  9. राष्ट्रीय कार्यकारिणी के चुनाव की सही तारीख और लिखित कार्यक्रम क्या है?
  10. यदि किसी सदस्य की रकम लेने के बाद संबंधित प्रक्रिया पूरी नहीं हुई है तो उसे नियमानुसार रकम वापस करने की व्यवस्था क्या है?

इन सवालों के जवाब देना किसी पर एहसान नहीं, बल्कि संगठन के सदस्यों के प्रति उसकी जिम्मेदारी है।

बिरादरी को अब किसी के रौब की नहीं, हक़ीक़त की जरूरत है!

हमारे बुजुर्गों ने हमेशा हमें इत्तेहाद, भाईचारे, ईमानदारी और अमानतदारी का सबक दिया है। हमारी बिरादरी में मेहनतकश लोग भी हैं, कारोबारी भी, तालीमयाफ्ता नौजवान भी और कानून व सरकारी सेवाओं से जुड़े जिम्मेदार लोग भी।

ऐसी बिरादरी को किसी एक शख्स की शख्सियत या ओहदे के इर्द-गिर्द नहीं घूमना चाहिए।

किसी भी सदर को यह समझना होगा कि सदर का ओहदा बिरादरी की खिदमत के लिए होता है, बिरादरी पर हुकूमत करने के लिए नहीं।

किसी भी राष्ट्रीय पदाधिकारी को यह याद रखना चाहिए कि ओहदा मिलने से जवाबदेही खत्म नहीं होती, बल्कि और बढ़ जाती है।

और जो लोग अपनी मेहनत की कमाई से संगठन को मजबूत बनाने के लिए रकम देते हैं, उन्हें यह पूछने का पूरा हक़ है कि उनका पैसा कहां खर्च हुआ।

हम किसी के खिलाफ नहीं, बल्कि बिरादरी के हक़ में सवाल उठा रहे हैं।

आखिरी बात: एतमाद टूटने से पहले जवाब दे दीजिए!

सदर साहब! बिरादरी के लोग आपसे कोई गैरमुनासिब मांग नहीं कर रहे। वे सिर्फ अपनी सोसाइटी की कानूनी हैसियत जानना चाहते हैं। अपने वोट का हक़ चाहते हैं। अपनी जमा रकम का हिसाब चाहते हैं और उस राष्ट्रीय संगठन की वास्तविक स्थिति जानना चाहते हैं, जिसके नाम पर उन्होंने आपसे उम्मीदें बांधी थीं।

अगर सब कुछ दस्तूर और कानून के मुताबिक हुआ है तो दस्तावेज़ सामने रखिए।

अगर रकम सही मद में खर्च हुई है तो हिसाब दीजिए।

अगर राष्ट्रीय कमेटियां कानूनी तौर पर गठित हुई हैं तो उनका आधार बताइए।

और अगर कहीं कोई कमी रह गई है तो उसे दुरुस्त करने के लिए आगे आइए।

याद रखिए, बिरादरी के लोग किसी के दुश्मन नहीं हैं। लेकिन अपनी मेहनत की कमाई, अपनी इज़्ज़त और अपने हक़ के मामले में किसी को भी सवाल करने से रोका नहीं जा सकता।

कुर्सियां आती-जाती रहती हैं, ओहदे बदलते रहते हैं, मगर बिरादरी का एतमाद एक बार टूट जाए तो उसे दोबारा हासिल करना आसान नहीं होता।

कौम की खिदमत का दावा करने वालों को पहले कौम के सामने जवाबदेह होना सीखना चाहिए।


पत्रिका का पक्ष एवं कानूनी स्पष्टीकरण

यह रिपोर्ट बिरादरी के सदस्यों से प्राप्त शिकायतों, उपलब्ध कराई गई जानकारियों और संगठनात्मक पारदर्शिता से जुड़े सवालों के आधार पर तैयार की गई है। इसमें व्यक्त आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि और संबंधित दस्तावेज़ों की जांच आवश्यक है। किसी भी व्यक्ति या संस्था को दोषी घोषित करना इस रिपोर्ट का उद्देश्य नहीं है।

संबंधित सोसाइटी के सदर साहब, पदाधिकारियों और अन्य जिम्मेदार लोगों को अपना पक्ष रखने का पूरा अवसर दिया जाएगा। उनका जवाब और उपलब्ध कराए गए दस्तावेज़ प्राप्त होने पर उन्हें भी उचित स्थान दिया जाएगा।

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उत्तर प्रदेश डेस्क | ख़ास रिपोर्ट: अज़हर ख़ान


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बुधवार, 4 नवंबर 2026

🌹 दो ख़ुशियों भरे निकाह की तारीख़ों का ऐलान

नीमच के भट्टी (जाट वाले) ख़ानदान में बजेगी शहनाई, अशफ़ाक़ हुसैन और सानिया नूर के निकाह की तैयारियाँ मुकम्मल

बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम

اَلنِّكَاحُ مِنْ سُنَّتِي

निकाह मेरी सुन्नत है।

अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त के फ़ज़्लो करम, रहमतों और बरकतों से मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी के भट्टी (जाट वाले) ख़ानदान में दोहरी ख़ुशियों का मुबारक मौक़ा आने वाला है। इसी सिलसिले में नीमच (मध्य प्रदेश) निवासी मुहम्मद उस्मान साहब भट्टी (जाट वाले) के यहाँ दो निकाहों की तारीख़ों का बाक़ायदा ऐलान किया गया है।

इस ख़ुशनुमा मौक़े पर परिवार के बुज़ुर्गों, अज़ीज़ो-अक़ारिब, रिश्तेदारों और बिरादराना हज़रात में ख़ुशी और मसर्रत का माहौल है। दोनों निकाह हुज़ूर-ए-अकरम, रहमतुल्लिल आलमीन, हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की सुन्नत की पैरवी में अंजाम पाएँगे।

🌹 पहला निकाह — अशफ़ाक़ हुसैन और अलफ़िया नूर

भट्टी (जाट वाले) ख़ानदान के मुहम्मद उस्मान साहब के नेक फ़रज़ंद अशफ़ाक़ हुसैन साहब (नीमच) का निकाह शाहिद हुसैन साहब (जावद वाले), उज्जैन की नेक दुख़्तर अलफ़िया नूर के साथ तय पाया है।

निकाह की तारीख़ और वक़्त:

  • तारीख़: 01 अप्रैल 2027, बरोज़ जुमेरात
  • इस्लामी तारीख़: 24 शव्वाल 1448 हिजरी
  • वक़्त: बाद नमाज़-ए-मग़रिब
  • मक़ाम: उज्जैन (मध्य प्रदेश)

इंशाअल्लाह, इस मुबारक तक़रीब में दोनों ख़ानदानों के अज़ीज़ो-अक़ारिब और बिरादराना हज़रात की मौजूदगी में निकाह की सुन्नत अदा की जाएगी।

🌹 दूसरा निकाह — सानिया नूर और मुहम्मद ज़ुबैर

इसी ख़ुशी के सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए मुहम्मद उस्मान साहब भट्टी (जाट वाले), नीमच की नेक दुख़्तर सानिया नूर का निकाह अब्दुल वहाब साहब खरादी, इंदौर के नेक फ़रज़ंद मुहम्मद ज़ुबैर के साथ तय पाया है।

निकाह की तारीख़ और वक़्त:

  • तारीख़: 03 अप्रैल 2027, बरोज़ शनिचर
  • इस्लामी तारीख़: 26 शव्वाल 1448 हिजरी
  • वक़्त: बाद नमाज़-ए-मग़रिब
  • मक़ाम: नीमच (मध्य प्रदेश)

इंशाअल्लाह, इस मौक़े पर भी दोनों ख़ानदानों के दरमियान मोहब्बत, ख़ुलूस और ख़ुशियों के साथ निकाह की मुबारक रस्म अदा की जाएगी।

🌺 भट्टी (जाट वाले) ख़ानदान में ख़ुशियों का माहौल

इन दोनों निकाहों के मुबारक मौक़ों पर ख़ानदान के बुज़ुर्गों और अज़ीज़ो-अक़ारिब की तरफ़ से तमाम बिरादराना हज़रात को पुरख़ुलूस दावते शिरकत दी गई है। ख़ानदान की जानिब से गुज़ारिश की गई है कि तमाम हज़रात अपनी मसरूफ़ियात में से वक़्त निकालकर इन तक़ारीब में शिरकत फ़रमाएँ, अपनी मौजूदगी से महफ़िल की रौनक़ बढ़ाएँ और दोनों जोड़ों को अपनी ख़ास दुआओं से नवाज़ें।

🌹 दुआ है कि अल्लाह दोनों जोड़ों को ख़ुशियों भरी ज़िंदगी अता फ़रमाए

इस मुबारक मौक़े पर मुल्तानी समाज राष्ट्रीय समाचार पत्रिका की जानिब से दोनों होने वाले जोड़ों को दिली मुबारकबाद और नेक ख़्वाहिशात पेश की जाती हैं।

बारगाह-ए-इलाही में ख़ास दुआ है कि अल्लाह तआला अशफ़ाक़ हुसैन और अलफ़िया नूर तथा सानिया नूर और मुहम्मद ज़ुबैर के निकाह को अपने ख़ास फ़ज़्लो करम से कामयाब, ख़ुशहाल और बाबरकत बनाए।

अल्लाह पाक दोनों दुल्हनों को अपने-अपने नए घरों में इज़्ज़त, मोहब्बत, सुकून और ख़ुशियों से नवाज़े। दोनों दूल्हों को नेक सीरत, अच्छी अख़लाक़ और अपनी ज़िम्मेदारियों को ख़ुश-अस्लूबी से निभाने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए।

दोनों जोड़ों के दरमियान हमेशा बाहमी मोहब्बत, एतमाद, वफ़ादारी, सब्र और एक-दूसरे का एहतराम क़ायम रखे। उनके घरों को रहमतों और बरकतों का गहवारा बनाए, नेक और सालेह औलाद अता फ़रमाए तथा दोनों ख़ानदानों के दरमियान मोहब्बत और रिश्तेदारी को हमेशा मज़बूत रखे।

आमीन या रब्बुल आलमीन!

🌷 दावत देने वाले बुज़ुर्गान-ए-ख़ानदान

हाजी मुहम्मद उमर साहब, मुहम्मद याक़ूब साहब, हाजी मुहम्मद यूसुफ़ साहब, मुहम्मद सलीम साहब, अब्दुल समद साहब, अब्दुल रहमान साहब, हाजी मुबारिक हुसैन साहब, हाजी ज़ाकिर हुसैन साहब, नासिर हुसैन साहब एवं अहले भट्टी जाट वाला ख़ानदान।

मीन जानिब: मुहम्मद उस्मान साहब भट्टी (जाट वाले) एवं शाहिद हुसैन साहब भट्टी (जाट वाले)।

चश्मे बराह: मुहम्मद अफ़ज़ल, मुहम्मद आरिफ़, मुहम्मद हारून, मुहम्मद इरफ़ान, मुहम्मद अली, मुहम्मद यूनुस, हैदर अली, मुहम्मद शहज़ाद, मुहम्मद शोएब, मुहम्मद शाकिर, मुहम्मद वसीम, मुहम्मद शादाब, नूर हसन, फ़ैज़ान नूर, हसनैन रज़ा, साजिद हुसैन, हाजी मुहम्मद फ़ैज़, मुहम्मद नातिक़ एवं मुस्तफ़ा रज़ा।

नन्ही इल्तिज़ा: मुहम्मद अजलान, अबान नूर, रिदा फ़ातिमा, मुहम्मद अफ़्फ़ान, मुहम्मद रज़ा, मुहम्मद अमान, अब्दुल क़ादिर, आयरा नूर एवं मुस्तफ़ा रज़ा।

फ़र्म: मुल्तानी फैब्रिकेशन, नीमच।

राब्ता व पता: मुहम्मद उस्मान साहब जाट वाले, मूलचंद मार्ग, नीमच – 458441।

मोबाइल: 7828107160

शाहिद हुसैन साहब जाट वाले मोबाइल: 8770223015


📰 मुल्तानी समाज — अपनी बिरादरी की आवाज़, अपनी पहचान

विशेष रिपोर्ट | राजस्थान डेस्क

ज़मीर आलम
प्रधान-संपादक
मुल्तानी समाज — राष्ट्रीय समाचार पत्रिका

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार से पंजीकृत तथा देश की राजधानी नई दिल्ली से प्रसारित, पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी की क़ौमी समाचार पत्रिका, न्यूज़ पोर्टल एवं यूट्यूब चैनल।

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मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी का इतिहास और पहचान | मुल्तानी समाज

एक ऐसी मुहिम, जो सिर्फ़ तस्वीरें प्रकाशित करने की नहीं, बल्कि अपनी नस्लों को अपनी पहचान, अपने बुज़ुर्गों की कुर्बानियों और अपने असल इतिहास से रूबरू कराने की है।

नई दिल्ली/उत्तर प्रदेश।

किसी भी क़ौम और बिरादरी की असल दौलत उसके महल, ज़मीन-जायदाद या कारोबार नहीं होते, बल्कि उसकी असल दौलत वे लोग होते हैं जिन्होंने अपनी मेहनत, क़ाबिलियत, इल्म, हुनर, ईमानदारी और समाज के प्रति अपनी बेपनाह मुहब्बत से उस बिरादरी को एक नई पहचान दिलाई हो। अफ़सोस की बात है कि हमारी बिरादरी में ऐसी अनगिनत शख़्सियतें गुज़री हैं और आज भी मौजूद हैं, जिन्होंने अपनी ज़िंदगी के बेहतरीन साल बिरादरी की तरक़्क़ी, ख़िदमत और भलाई के लिए वक़्फ़ कर दिए, मगर उनमें से बहुत-से नाम आज भी गुमनामी के अंधेरों में खोए हुए हैं।

किसी ने तालीम के मैदान में अपनी मेहनत से कामयाबी की नई मिसाल क़ायम की, किसी ने तकनीकी हुनर से अपनी पहचान बनाई, किसी ने सरकारी मुलाज़मत में अपनी क़ाबिलियत का लोहा मनवाया, तो किसी ने पब्लिक सेक्टर, तिजारत, कारोबार, ठेकेदारी, समाजी ख़िदमत और दीगर शोबों में कामयाबी हासिल करके मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी का नाम रोशन किया। लेकिन सवाल यह है कि क्या उनकी ये कामयाबियाँ सिर्फ़ उनके अपने परिवार तक महदूद रह जाएँगी? क्या आने वाली नस्लें कभी जान पाएँगी कि हमारे दरमियान कितने क़ाबिल, मेहनती, बा-हुनर और ख़िदमतगार लोग मौजूद रहे हैं?

इन्हीं अहम सवालों को मद्देनज़र रखते हुए मुल्तानी समाज चैरिटेबल ट्रस्ट (रजिस्टर्ड ऑल इंडिया) ने बिरादरी की तारीख़ को महफ़ूज़ करने और अपनी क़ाबिल शख़्सियतों को मंज़रे-आम पर लाने के लिए एक अहम और तारीख़ी मुहिम शुरू करने का ऐलान किया है।

ट्रस्ट के राष्ट्रीय चेयरमैन मोहम्मद आलम साहब ने पूरे मुल्क में आबाद पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी के तमाम हज़रात से पुरज़ोर अपील की है कि वे अपने आसपास, अपने ख़ानदान, कुनबे, रिश्तेदारी और शहरों में मौजूद ऐसी तमाम शख़्सियतों की तलाश करें जिन्होंने किसी भी शोबे में अपनी मेहनत और क़ाबिलियत से बिरादरी का नाम रोशन किया हो।

### अब बिरादरी के हर क़ाबिल और हुनरमंद शख़्स की तस्वीर होगी वेबसाइट पर!

मोहम्मद आलम साहब ने कहा कि हमारी कोशिश है कि मुल्क के किसी भी कोने में रहने वाला ऐसा कोई भी शख़्स गुमनामी का शिकार न रहे, जिसने अपनी मेहनत, इल्म, हुनर और ख़िदमत से बिरादरी की इज़्ज़त और वक़ार में इज़ाफ़ा किया हो।

चाहे वह कोई तालीमयाफ़्ता बच्चा हो, आला तालीम हासिल करने वाला नौजवान हो, इंजीनियर, डॉक्टर, वकील, टीचर, प्रोफ़ेसर, सरकारी अफ़सर, मुलाज़िम, कारोबारी, ताजिर, ठेकेदार, तकनीकी माहिर, समाजी ख़िदमतगार या कोई ऐसा बुज़ुर्ग हो जिसने अपनी पूरी ज़िंदगी बिरादरी की भलाई और तरक़्क़ी के लिए गुज़ार दी हो।

ऐसी हर शख़्सियत हमारी बिरादरी का सरमाया है और उसका तआरुफ़ हमारी आने वाली नस्लों तक पहुँचना चाहिए।

अब ऐसी तमाम शख़्सियतों की तस्वीरें, उनके नाम और उनकी कामयाबियों का तफ़सीली तआरुफ़ बिरादरी की वेबसाइट www.multanisamaj.com पर प्रकाशित किया जाएगा।

### सिर्फ़ ज़िंदा शख़्सियतें ही नहीं, मरहूम बुज़ुर्गों की ख़िदमात भी होंगी महफ़ूज़

इस मुहिम का सबसे अहम और दिल को छू लेने वाला पहलू यह है कि इसमें उन मरहूम बुज़ुर्गों और समाजी ख़िदमतगारों को भी शामिल किया जाएगा, जिन्होंने अपनी ज़िंदगी बिरादरी की ख़िदमत में गुज़ार दी और आज इस दुनिया से रुख़्सत हो चुके हैं।

हमारे दरमियान ऐसे कितने ही बुज़ुर्ग मौजूद रहे होंगे जिन्होंने अपनी जेब से पैसा ख़र्च करके, लोगों की मदद करके, बच्चों की तालीम का बंदोबस्त करके, ग़रीब और ज़रूरतमंद परिवारों का सहारा बनकर, बिरादरी के इत्तिहाद के लिए कोशिशें करके और समाजी बेहतरी के लिए अपनी ज़िंदगी वक़्फ़ करके ऐसी मिसालें क़ायम कीं जिन्हें कभी भुलाया नहीं जाना चाहिए।

मगर अफ़सोस! उनकी तस्वीरें, उनकी ज़िंदगी के वाक़ियात, उनकी मेहनत और उनकी क़ुर्बानियों का कोई मुकम्मल रिकॉर्ड हमारे पास मौजूद नहीं है।

आज ज़रूरत है कि उनके बेटे, पोते, रिश्तेदार, अहबाब और उन्हें जानने वाले लोग आगे आएँ और उनकी तस्वीरों के साथ उनकी ज़िंदगी की तफ़सीलात हमें भेजें, ताकि उनकी ख़िदमात को भी बिरादरी की वेबसाइट पर हमेशा के लिए महफ़ूज़ किया जा सके।

क्योंकि जो बुज़ुर्ग अपनी पूरी ज़िंदगी बिरादरी के लिए लगा गए, क्या उनका नाम आने वाली नस्लों तक पहुँचाना हमारी ज़िम्मेदारी नहीं है?

### अपनी बिरादरी का इतिहास दूसरों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता!

हक़ीक़त यह है कि हमारे बुज़ुर्गों के दौर में तालीम और मआशी वसाइल की कमी थी। न आज जैसी टेक्नोलॉजी थी, न सोशल मीडिया था और न ही अपनी बात को पूरी दुनिया तक पहुँचाने के इतने आसान ज़रिये मौजूद थे। इसी वजह से हमारे बुज़ुर्ग अपनी क़ौमी और समाजी तारीख़ को उस अंदाज़ में महफ़ूज़ नहीं कर सके, जिसकी आज ज़रूरत महसूस की जा रही है।

लेकिन आज हमारे पास मोबाइल है, इंटरनेट है, वेबसाइट है, सोशल मीडिया है और अपनी बात दुनिया तक पहुँचाने के तमाम ज़रिये मौजूद हैं।

इसके बावजूद अगर हम अपनी बिरादरी के क़ाबिल लोगों की पहचान, उनके कारनामों और अपने बुज़ुर्गों की क़ुर्बानियों को महफ़ूज़ नहीं कर सके, तो आने वाली नस्लों के सामने हम क्या जवाब देंगे?

ज़रा सोचिए! आज से 50 या 100 साल बाद हमारी औलादें जब अपनी बिरादरी का इतिहास तलाशेंगी, तो उन्हें क्या मिलेगा? क्या उन्हें अपने बुज़ुर्गों के नाम, उनकी तस्वीरें, उनके कारनामे और उनकी समाजी ख़िदमात मिलेंगी या फिर सिर्फ़ अधूरी बातें और भूली-बिसरी यादें?

हमारी आज की छोटी-सी कोशिश आने वाली नस्लों के लिए एक बहुत बड़ा ख़ज़ाना साबित हो सकती है।

### घमंड, अकड़ और आपसी मतभेद छोड़कर बिरादरी के लिए आगे आइए!

इस मुहिम को कामयाब बनाने के लिए हर शख़्स को अपना किरदार अदा करना होगा। यह किसी एक परिवार, किसी एक ख़ानदान, किसी एक शहर या किसी एक संगठन की मुहिम नहीं है, बल्कि पूरी मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी की साझा ज़िम्मेदारी है।

हमें अपने आपसी मतभेद, छोटी-छोटी नाराज़गियाँ, घमंड और अकड़ को किनारे रखकर उन लोगों की तलाश करनी होगी जिन्होंने बिरादरी के लिए कुछ अच्छा किया है।

यह नहीं देखना चाहिए कि वह शख़्स किस परिवार से ताल्लुक़ रखता है, किस शहर में रहता है, किस संगठन से जुड़ा है या हमारी उससे कितनी जान-पहचान है। देखना सिर्फ़ यह चाहिए कि उसने बिरादरी और इंसानियत के लिए क्या अच्छा काम किया है।

याद रखिए, किसी की क़ाबिलियत को तस्लीम करने से हमारा क़द छोटा नहीं होता, बल्कि हमारी बिरादरी का वक़ार बुलंद होता है।

हमारा मक़सद किसी की तारीफ़ में क़सीदे पढ़ना नहीं, बल्कि अपनी बिरादरी की उन हक़ीक़ी कामयाबियों और ख़िदमात को तारीख़ का हिस्सा बनाना है, जिन्हें वक़्त के साथ भुला दिया जाता है।

### आप भी इस मुहिम का हिस्सा बनें, इन आसान तरीक़ों से भेजें जानकारी

अगर आप किसी ऐसे शख़्स को जानते हैं जिसने किसी भी शोबे में बिरादरी का नाम रोशन किया है या जिसने समाज की ख़िदमत में अपनी ज़िंदगी गुज़ार दी है, तो उसकी जानकारी हमें व्हाट्सऐप के ज़रिये भेज सकते हैं।

जानकारी भेजते वक़्त इन बातों का ख़ास ख़याल रखें:

* संबंधित शख़्स का पूरा नाम और वालिद का नाम।

* उनका शहर, ज़िला और मौजूदा पता।

* उन्होंने किस शोबे में कामयाबी हासिल की या बिरादरी की क्या ख़िदमत की?

* उनकी ज़िंदगी की अहम कामयाबियों और ख़िदमात की तफ़सील।

* उनकी साफ़ और अच्छी क्वालिटी की तस्वीर।

* अगर वह मरहूम हैं तो उनकी तस्वीर के साथ उनके जीवन और समाजी ख़िदमात की जानकारी।

अपनी तरफ़ से भेजी गई जानकारी की सही होने की तस्दीक़ भी ज़रूर कर लें, ताकि वेबसाइट पर प्रकाशित होने वाला हर तआरुफ़ सही, भरोसेमंद और आने वाली नस्लों के लिए फ़ायदेमंद साबित हो।

प्राप्त जानकारी और तस्वीरों को मुनासिब तर्तीब देकर संबंधित शख़्सियत के तआरुफ़ के साथ बिरादरी की वेबसाइट पर प्रकाशित किया जाएगा।

### आज शुरुआत नहीं की तो कल बहुत देर हो जाएगी!

यह सिर्फ़ एक वेबसाइट पर तस्वीर लगाने की मुहिम नहीं है। यह अपनी पहचान बचाने, अपने बुज़ुर्गों को याद रखने, अपने हुनरमंद नौजवानों की हौसला-अफ़ज़ाई करने और अपनी आने वाली नस्लों को एक मज़बूत तारीख़ सौंपने की कोशिश है।

हमें यह बात अच्छी तरह समझनी होगी कि कोई भी बिरादरी उस वक़्त तक मज़बूत नहीं बन सकती, जब तक वह अपने माज़ी को नहीं पहचानती, अपने हाल को नहीं सँवारती और अपने मुस्तक़बिल की फ़िक्र नहीं करती।

हमारे बुज़ुर्गों ने मुफ़लिसी, जहालत और सहूलतों की कमी के बावजूद अपनी ज़िंदगी में जो कुछ हासिल किया, वह हमारी तारीख़ का हिस्सा है। अब हमारी ज़िम्मेदारी है कि हम उनकी मेहनत को गुमनामी में दफ़्न न होने दें।

अगर आज हमने अपनी औलादों को अपने बुज़ुर्गों की मेहनत और क़ुर्बानियों से रूबरू नहीं कराया, तो कल हमारी नस्लें अपनी ही पहचान तलाशती फिरेंगी।

याद रखिए, तारीख़ सिर्फ़ किताबों में नहीं बनती, तारीख़ उन लोगों के नाम और कारनामों से बनती है जिन्हें उनकी क़ौम और बिरादरी याद रखती है।

आइए! आज ही अपने घर, ख़ानदान, कुनबे और रिश्तेदारी में उन लोगों की तलाश शुरू कीजिए जिन्होंने बिरादरी के लिए कुछ अच्छा किया है। उनकी तस्वीरें और उनकी ज़िंदगी की दास्तानें जमा कीजिए और उन्हें मुल्तानी समाज तक पहुँचाइए।

क्योंकि आने वाली नस्लों को सिर्फ़ हमारी दौलत और जायदाद की विरासत नहीं चाहिए, उन्हें अपनी पहचान, अपने बुज़ुर्गों की तारीख़ और अपने लोगों के कारनामों की विरासत भी चाहिए।

अगर हम आज अपनी तारीख़ नहीं सँभालेंगे, तो कल हमारी आने वाली नस्लें हमें कभी माफ़ नहीं करेंगी!

### ख़बर, मज़मून और इश्तिहारात के लिए राब्ता करें

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार से पंजीकृत, मुल्क की राजधानी नई दिल्ली से प्रसारित, पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी की मुल्क की इकलौती क़ौमी समाचार पत्रिका, न्यूज़ पोर्टल और यूट्यूब चैनल "मुल्तानी समाज" के लिए उत्तर प्रदेश डेस्क से प्रधान संपादक ज़मीर आलम की ख़ास रिपोर्ट।

अगर आप भी अपनी ख़बर, मज़मून (आर्टिकल), पैग़ाम, मुबारकबाद, ताज़ियती इश्तिहार, दिलचस्प वाक़ियात, तहरीर, अफ़साना (कहानी) या अपने कारोबार का इश्तिहार (विज्ञापन) क़ौमी सतह पर शाया (प्रकाशित) या प्रसारित करवाना चाहते हैं, तो बराए मेहरबानी नीचे दिए गए नंबरों पर राब्ता फ़रमाएँ।

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"मुल्तानी समाज" — अपनी बिरादरी की आवाज़, अपनी पहचान।

### सोशल मीडिया के लिए असरदार नारा

"अपने बुज़ुर्गों को गुमनामी से निकालिए, अपनी नस्लों को अपनी तारीख़ से मिलवाइए। आज उनकी तस्वीर भेजिए, कल यही तस्वीरें हमारी बिरादरी की पहचान बनेंगी!"

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