“जिस क़ौम को अपनी तारीख़ याद नहीं रहती, उसकी पहचान भी धीरे-धीरे धुंधली पड़ जाती है”
एक सोच… एक बिरादरी… एक तारीख़ — क्या हमारी अपनी कोई तारीख़ नहीं होनी चाहिए?
आज यह सवाल सिर्फ़ एक शख़्स का नहीं, बल्कि पूरी क़ौम और बिरादरी के सामने खड़ा है।
बड़े अफ़सोस और गहरे ग़म के साथ यह कहना पड़ता है कि आज हमारी क़ौम के बीच दीनी, सामाजिक और तारीखी मालूमात का वह सिलसिला कमज़ोर होता जा रहा है, जो कभी हमारी पहचान और हमारी नस्लों के लिए रहनुमाई का ज़रिया हुआ करता था।
हमारी नई नस्ल को अपने बुज़ुर्गों के कारनामों का पूरा इल्म नहीं, अपनी बिरादरी के दस्तकारों और फ़नकारों की तारीख़ का पूरा पता नहीं और कई बार तो हमें अपने ही अतीत के उन रोशन बाबों का इल्म नहीं होता, जिन पर हमें फ़ख़्र करना चाहिए।
दूसरी तरफ़ हम देखते हैं कि मुख़्तलिफ़ क़ौमें और बिरादरियाँ अपनी तारीखी, मज़हबी और सांस्कृतिक तारीख़ों को याद रखती हैं, उन्हें अपनी नई नस्ल तक पहुँचाती हैं और बड़े एहतराम के साथ अपनी रवायतों को ज़िंदा रखती हैं।
तो फिर सवाल पैदा होता है—
क्या हम अपनी तारीख़ भूलते जा रहे हैं?
क्या हमारी आने वाली नस्लें यह जान पाएँगी कि मुस्लिम मुल्तानी लौहार-बढ़ई बिरादरी कौन है?
हमारे बुज़ुर्ग कौन थे?
हमारे दस्तकार कौन थे?
उन्होंने मुल्क और समाज की तरक़्क़ी में क्या किरदार अदा किया?
उनके हुनर ने गाँवों, किसानों, खेतों, कारख़ानों और आम ज़िंदगी को किस तरह आसान बनाया?
अगर हम आज इन सवालों के जवाब दर्ज नहीं करेंगे तो कल हमारी नस्लें जवाब कहाँ से तलाश करेंगी?
तारीख़ सिर्फ़ तारीख़ नहीं होती, यह किसी क़ौम का बायोडाटा होती है
हर क़ौम और बिरादरी के पास अपनी एक तारीख़ होती है। तारीख़ सिर्फ़ साल, महीना और दिन लिख देने का नाम नहीं, बल्कि यह उन लोगों की मेहनत, क़ुर्बानी, हुनर, फ़न, ख़िदमत और जद्दोजहद का आईना होती है जिन्होंने उस क़ौम को पहचान दी।
इसीलिए अपनी तारीख़ को महफ़ूज़ करना कोई फ़ख़्र-ए-फ़िज़ूल नहीं, बल्कि आने वाली नस्लों के प्रति हमारी ज़िम्मेदारी है।
हमें अपने बच्चों को यह बताना होगा कि उनके बुज़ुर्ग सिर्फ़ रोज़गार करने वाले लोग नहीं थे, बल्कि अपने फ़न और दस्तकारी के ज़रिए मुल्क की तरक़्क़ी में हिस्सा लेने वाले मेहनतकश, हुनरमंद और वतनपरस्त लोग थे।
मुस्लिम मुल्तानी लौहार-बढ़ई बिरादरी किसी नाम की मोहताज नहीं
हमें डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम साहब की शख़्सियत पर फ़ख़्र है। वह मुल्क के महान वैज्ञानिक, क़ाबिल इंसान और नौजवानों के लिए प्रेरणा का स्रोत रहे।
लेकिन अपनी बिरादरी की पहचान बनाने के लिए हमें किसी बाहरी शख़्सियत के नाम का सहारा लेने की ज़रूरत नहीं।
हमारी अपनी तारीख़ है।
हमारे अपने बुज़ुर्ग हैं।
हमारे अपने दस्तकार हैं।
हमारे अपने फ़नकार हैं।
हमारी अपनी मेहनत और हमारी अपनी पहचान है।
अगर डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम साहब ने मुल्क की हिफ़ाज़त और तरक़्क़ी के लिए मिसाइलों के निर्माण में अहम किरदार अदा किया, तो हमारी मुस्लिम मुल्तानी लौहार-बढ़ई बिरादरी के मेहनतकश दस्तकारों ने भी सदियों से मुल्क के किसानों और आम आदमी के लिए कृषि यंत्र, औज़ार, मशीनों के पुर्ज़े और ज़रूरत की अनेक चीज़ें तैयार की हैं।
हुनर हमारी पहचान है, दस्तकारी हमारी विरासत है और मेहनत हमारी तारीख़ है।
इस तारीख़ को लिखना, सँवारना और आने वाली नस्लों तक पहुँचाना हमारा फ़र्ज़ है।
एक सोच… एक बिरादरी… एक तारीख़
हमारा मानना है कि मुस्लिम मुल्तानी लौहार-बढ़ई बिरादरी की एक ऐसी तारीखी पहचान ज़रूर होनी चाहिए, जिससे देश-दुनिया में हमारी बिरादरी का बच्चा-बच्चा अपने अतीत से वाक़िफ़ हो सके।
हमारी बिरादरी को किसी दूसरे नाम की बैसाखी की ज़रूरत नहीं।
हमें अपनी पहचान ख़ुद बनानी है।
अपनी तारीख़ ख़ुद लिखनी है।
अपने बुज़ुर्गों के कारनामे ख़ुद दर्ज करने हैं।
और अपनी आने वाली नस्ल को यह बताना है कि—
हम कौन थे, हम कौन हैं और हम आने वाले कल में क्या बनना चाहते हैं।
मुल्तानी डे — तारीख़ को ज़िंदा रखने की एक कोशिश
इसी सिलसिले में 12 नवंबर को “मुल्तानी डे” मनाने की कोशिश को देखा जाना चाहिए।
अगर पिछले लगभग 15 वर्षों से ज़मीर आलम साहब (गढ़ी पुख्ता) शामली, उत्तर प्रदेश वाले बिरादरी के बीच 12 नवंबर को “मुल्तानी डे” के रूप में एक तारीखी पहचान को आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं, तो इस कोशिश को किसी शख़्स की निजी कामयाबी या नाकामी के बजाय बिरादरी की तारीखी पहचान के एक प्रयास के तौर पर देखना चाहिए।
बिरादरी के अंदर राय का इख़्तिलाफ़ हो सकता है।
तरीक़े अलग हो सकते हैं।
सोच अलग हो सकती है।
मगर मक़सद अगर अपनी बिरादरी की तारीख़ और पहचान को ज़िंदा रखना है, तो ऐसे प्रयासों पर बातचीत होनी चाहिए, बहस होनी चाहिए और बेहतर रास्ता तलाश किया जाना चाहिए।
कंपीटिशन हो, मगर बिरादरी की तरक़्क़ी के लिए
कंपीटिशन अपनी जगह बुरा नहीं।
बल्कि स्वस्थ और सकारात्मक कंपीटिशन बिरादरी के लिए फ़ायदेमंद हो सकता है।
अगर 12 नवंबर को एक बिरादरी अपने-अपने शहरों, कस्बों और गाँवों में “मुल्तानी डे” मनाती है और 13 नवंबर को अपने-अपने कार्यक्रमों की ख़बरें प्रकाशित करती है, तो इससे पूरी दुनिया को यह संदेश जाएगा कि—
मुस्लिम मुल्तानी लौहार-बढ़ई बिरादरी की भी अपनी एक तारीख़ है, अपनी एक पहचान है और अपनी एक तारीखी विरासत है।
जिसने जहाँ तक काम किया है, उसे सामने आना चाहिए।
जिसने जितनी मेहनत की है, उसकी क़द्र होनी चाहिए।
जिसने अपनी बिरादरी के लिए कोई ख़िदमत की है, उसका नाम तारीख़ में दर्ज होना चाहिए।
क्योंकि तारीख़ किसी एक शख़्स की जागीर नहीं होती।
तारीख़ पूरी क़ौम की अमानत होती है।
हमारी गुज़ारिश सिर्फ़ इतनी है…
हम तमाम मुस्लिम मुल्तानी लौहार-बढ़ई बिरादराने वतन से गुज़ारिश करते हैं कि अपनी हैसियत, अपने इलाक़े और अपने हालात के मुताबिक़ 12 नवंबर को “मुल्तानी डे” मनाने की कोशिश करें।
अपने बुज़ुर्गों को याद करें।
अपने बच्चों को अपनी बिरादरी की तारीख़ बताएं।
अपने हुनरमंदों और दस्तकारों को सम्मान दें।
अपनी पुरानी तस्वीरें, दस्तावेज़, किताबें, अख़बारों की ख़बरें और बुज़ुर्गों की यादों को महफ़ूज़ करें।
क्योंकि हो सकता है कि आज हमारे पास मौजूद एक पुरानी तस्वीर या एक छोटा-सा काग़ज़ आने वाली नस्लों के लिए पूरी तारीख़ का सबसे बड़ा सबूत बन जाए।
हमारी मेहनत ज़ाया नहीं होनी चाहिए।
हमारे बुज़ुर्गों के नाम गुम नहीं होने चाहिए।
हमारी बिरादरी का बायोडाटा मिटना नहीं चाहिए।
और हमारी आने वाली नस्लें अपनी पहचान के लिए दूसरों की तरफ़ देखने पर मजबूर न हों।
अपनी पहचान ख़ुद लिखिए।
अपनी तारीख़ ख़ुद बचाइए।
अपनी नस्ल को अपना बायोडाटा ख़ुद दीजिए।
यही वक़्त की आवाज़ है।
यही हमारी ज़िम्मेदारी है।
और शायद यही आने वाली नस्लों के लिए हमारी सबसे बड़ी विरासत भी होगी।
एक सोच…
एक बिरादरी…
एक तारीख़…
और अपनी एक मुकम्मल पहचान।
इंशाअल्लाह।
लेखक परिचय
सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार से पंजीकृत, मुल्क की राजधानी नई दिल्ली से प्रकाशित/प्रसारित मुस्लिम मुल्तानी लौहार (बढ़ई) बिरादरी की क़ौमी समाचार पत्रिका, न्यूज़ पोर्टल और यूट्यूब चैनल “मुल्तानी समाज” के लिए कस्बा बड़ौत, ज़िला बागपत, उत्तर प्रदेश डेस्क से अली हसन मुल्तानी का विशेष लेख।
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