Wednesday, October 14, 2026

बागपत कमेटी के शानदार इंतज़ाम को दिल से सलाम — बुज़ुर्गों की इज़्ज़त, बेटियों की ख़ुशियाँ और बिरादरी के इत्तिहाद का ख़ूबसूरत पैग़ाम बना मुल्तानी वेलफेयर सोसायटी का बैनर

बागपत की सरज़मीन पर 15 अक्टूबर को सजेगी ख़ुशियों, ख़िदमत, इल्म और बिरादराना इत्तिहाद की महफ़िल; बुज़ुर्गों की एकजुट तस्वीर ने जीता सबका दिल

बागपत, उत्तर प्रदेश। माशाअल्लाह, मुल्तानी वेलफेयर सोसायटी, जनपद बागपत की जानिब से तैयार किया गया ख़ूबसूरत बैनर देखकर दिल को बेहद ख़ुशी और इत्मीनान हासिल हुआ। बैनर में जिस सलीक़े, ख़ूबसूरती और एहतराम के साथ तमाम बुज़ुर्गों, सरपरस्तों और बिरादरी के ज़िम्मेदारों को एक साथ जगह दी गई है, वह क़ाबिल-ए-तारीफ़ है। पहले जिन अल्फ़ाज़ और जानकारियों की कमी महसूस हो रही थी, अब वह भी मुकम्मल और साफ़ नज़र आ रही हैं।

यह महज़ एक बैनर नहीं, बल्कि बिरादरी के आपसी ताल्लुक़ात, बुज़ुर्गों के एहतराम, बेटियों की ख़ुशियों और आने वाली नस्लों के बेहतर मुस्तक़बिल का एक ख़ूबसूरत पैग़ाम है।

🌙 एक ही फ़्रेम में बुज़ुर्गों का एहतराम, इत्तिहाद की मिसाल

इस बैनर की सबसे ख़ास और दिल को छू लेने वाली बात यह है कि ऊपर से नीचे तक हमारी बिरादरी के बुज़ुर्गों और ज़िम्मेदारों को एक साथ पेश किया गया है। किसी भी क़ौम की असल दौलत उसके बुज़ुर्गों का तजुर्बा, उनकी दुआएँ, उनकी रहनुमाई और नई नस्लों के लिए उनकी फ़िक्र होती है।

जब बुज़ुर्ग एक साथ नज़र आते हैं, तो नौजवानों को हौसला मिलता है, बच्चों को अपनी पहचान पर फ़ख़्र महसूस होता है और बिरादरी में आपसी मोहब्बत व इत्तिहाद का जज़्बा मज़बूत होता है।

हमारी यही एकजुटता हमारी असल ताक़त है। अल्लाह तआला हमारी बिरादरी के तमाम बुज़ुर्गों को सेहत, आफ़ियत, इज़्ज़त और दराज़ी-ए-उम्र अता फ़रमाए तथा उनकी रहनुमाई को हमारी आने वाली नस्लों के लिए ज़रिया-ए-रौशनी बनाए। आमीन!

✨ एक कार्यक्रम, कई नेक मक़ासिद

बैनर पर दर्ज जानकारी के मुताबिक़, पूर्व राष्ट्रपति-ए-जम्हूरिया-ए-हिंद डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम साहब के यौमे पैदाइश के मौक़े पर तीन अहम मक़ासिद को सामने रखते हुए इस प्रोग्राम का आयोजन किया जा रहा है—

  • बेटियों का निकाह: बेटियों की ख़ुशियों, उनके बेहतर मुस्तक़बिल और समाज में ख़ुशियों के पैग़ाम को आम करने की एक अहम कोशिश।
  • छात्र-छात्रा प्रतिभा सम्मान समारोह: तालीम के मैदान में मेहनत करने वाले बच्चों की हौसलाअफ़ज़ाई और उनकी कामयाबियों का एतराफ़।
  • मुल्तानी बिरादरी सम्मेलन: बिरादरी के लोगों को एक मंच पर लाकर आपसी राब्ते, मशवरे, मोहब्बत और इत्तिहाद को फ़रोग़ देने की कोशिश।

ये तीनों पहलू अपने अंदर एक अहम सामाजिक पैग़ाम समेटे हुए हैं। बेटियों की ख़ुशियाँ, बच्चों की तालीमी तरक़्क़ी और बिरादरी की एकजुटता—ये ऐसे मक़ासिद हैं जिनके लिए मिल-जुलकर कोशिश करना वक़्त की अहम ज़रूरत है।

📍 कार्यक्रम की मुकम्मल तफ़सील

आयोजक: मुल्तानी वेलफेयर सोसायटी, जनपद बागपत

दिन: जुमेरात, 15 अक्टूबर 2026

वक़्त: सुबह 10:00 बजे

मक़ाम: आशीर्वाद गार्डन, दिल्ली रोड, बागपत

प्रोग्राम: बेटियों का निकाह, छात्र-छात्रा प्रतिभा सम्मान समारोह एवं मुल्तानी बिरादरी सम्मेलन।

🌹 बागपत की टीम की मेहनत को दिल से सलाम

बागपत कमेटी ने जिस मोहब्बत, लगन और तवज्जोह के साथ इस कार्यक्रम की तैयारी को बैनर पर पेश किया है, वह हौसला बढ़ाने वाली बात है। किसी भी सामाजिक काम की ख़ूबसूरती सिर्फ़ उसके बड़े इंतज़ामात में नहीं, बल्कि उसकी नेक नीयती, आपसी तालमेल और लोगों को साथ लेकर चलने के जज़्बे में होती है।

अल्लाह तआला बागपत कमेटी के तमाम ज़िम्मेदारों की मेहनत को क़ुबूल फ़रमाए, उनके दरमियान इत्तिहाद और मोहब्बत क़ायम रखे और इस प्रोग्राम को ख़ैर-ओ-बरकत, कामयाबी और ख़ुशियों का ज़रिया बनाए। आमीन या रब्बुल आलमीन!

🖋️ इत्तिहाद के नाम एक ख़ूबसूरत पैग़ाम

चिराग़ जलते हैं तो अँधेरा ख़ुद ही मिट जाता है,
क़ौम में इत्तिहाद हो तो मुक़द्दर भी सँवर जाता है।

बुज़ुर्गों की दुआओं से महकती हैं नस्लें,
मोहब्बत से जुड़ें दिल तो बदल जाती हैं शक्लें।

यक़ीनन, जब किसी बिरादरी के बुज़ुर्ग, नौजवान और ज़िम्मेदार लोग एक-दूसरे के एहतराम के साथ आगे बढ़ते हैं, तो समाज में बेहतरी की नई राहें खुलती हैं। हमारी कोशिश होनी चाहिए कि ऐसे कार्यक्रम सिर्फ़ एक दिन की यादगार बनकर न रह जाएँ, बल्कि इनके ज़रिये तालीम, समाजी इस्लाह, बेटियों की बेहतरी और आपसी भाईचारे के लिए लगातार काम करने का जज़्बा पैदा हो।

बागपत कमेटी की इस ख़ूबसूरत सोच और मेहनत को दिल से सलाम!

अल्लाह करे कि यह इत्तिहाद हमेशा क़ायम रहे, बिरादरी में मोहब्बत बढ़े और हमारी आने वाली नस्लें इल्म, अख़लाक़, अमल और ख़िदमत के मैदान में नई मिसालें क़ायम करें। आमीन!


📰 मुल्तानी समाज — अपनी बिरादरी की आवाज़, अपनी पहचान

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार से पंजीकृत होने तथा मुल्क की राजधानी नई दिल्ली से प्रसारित होने का परिचय देने वाली, पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी की क़ौमी समाचार पत्रिका ‘मुल्तानी समाज’ की उत्तर प्रदेश डेस्क से प्रधान संपादक ज़मीर आलम की ख़ास रिपोर्ट।

हमारा मक़सद बिरादरी की ख़बरों, समाजी सरगर्मियों, तालीमी कामयाबियों, ख़ुशियों, ग़म के मौक़ों और ख़िदमत-ए-ख़ल्क़ से जुड़े नेक कामों को क़ौमी सतह पर आवाज़ देना है।

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अगर आप भी अपनी ख़बर, मज़मून (आर्टिकल), पैग़ाम, मुबारकबाद, ताज़ियती इश्तिहार, दिलचस्प वाक़ियात, तहरीर, अफ़साना (कहानी) या अपने कारोबार का इश्तिहार क़ौमी सतह पर शाया व प्रसारित करवाना चाहते हैं, तो नीचे दिए गए नंबरों पर राब्ता फ़रमाएँ।

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🌹 ‘मुल्तानी समाज’ — अपनी बिरादरी की आवाज़, अपनी पहचान।

🥀 इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन 🥀नागौर की जरीना बानो (रानी) का इंतकाल, मुल्तानी बिरादरी में ग़म की लहर; अल्लाह तआला मरहूमा की मग़फ़िरत फ़रमाए और जन्नतुल फ़िरदौस में आला मक़ाम अता फ़रमाए — आमीन या रब्बुल आलमीन

नागौर, राजस्थान।

निहायत ही रंज-ओ-ग़म और दिली अफ़सोस के साथ तमाम मुस्लिम मुल्तानी लोहार, बढ़ई बिरादराना हज़रात को यह इत्तिला दी जाती है कि आज दिन बुध, बा-तारीख़ 14 अक्टूबर 2026 को नक़्शबंद मस्जिद के पास, लोहार पूरा, नागौर, राजस्थान निवासी जनाब शौकत अली साहब (रांझे वाले) की ज़ौजा-ए-मोहतरमा जरीना बानो (रानी) साहिबा का क़ज़ा-ए-इलाही से इंतक़ाल हो गया है।

इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन।

बेशक हम सब अल्लाह ही के हैं और उसी की तरफ़ लौटकर जाने वाले हैं।

मरहूमा के इंतक़ाल की ख़बर से अहल-ए-ख़ाना, अज़ीज़-ओ-अक़ारिब और मुस्लिम मुल्तानी लोहार, बढ़ई बिरादरी के लोगों में ग़म और अफ़सोस की कैफ़ियत है। यह दुनिया फ़ानी है और हर जान को एक दिन अपने परवरदिगार की तरफ़ लौटना है। मौत एक ऐसी हक़ीक़त है जिससे किसी को मफ़र नहीं, मगर किसी अपने के दुनिया से रुख़्सत हो जाने का सदमा दिल को ग़मगीन कर देता है।

इस पुरदर्द मौक़े पर हम अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त की बारगाह में दस्त-ब-दुआ हैं कि वह मरहूमा पर अपनी ख़ास रहमत नाज़िल फ़रमाए, उनकी मग़फ़िरत फ़रमाए, उनकी ख़ताओं और लग़ज़िशों से दरगुज़र फ़रमाए और उन्हें जन्नतुल फ़िरदौस में आला से आला मक़ाम अता फ़रमाए। आमीन।

🤲 मरहूमा की मग़फ़िरत के लिए ख़ास दुआ

اَللّٰهُمَّ اغْفِرْ لَهَا وَارْحَمْهَا وَعَافِهَا وَاعْفُ عَنْهَا

तर्जुमा: ऐ अल्लाह! मरहूमा की मग़फ़िरत फ़रमा, उन पर रहम फ़रमा, उन्हें आफ़ियत अता फ़रमा और उनसे दरगुज़र फ़रमा।

ऐ अल्लाह! मरहूमा की क़ब्र को नूर से मुनव्वर फ़रमा। उनकी क़ब्र को जन्नत के बाग़ों में से एक बाग़ बना दे। क़ब्र की तन्हाई को अपनी रहमत से दूर फ़रमा, उनकी मंज़िलें आसान फ़रमा और उन्हें सवालात-ए-क़ब्र के वक़्त साबित-क़दम रख।

ऐ हमारे परवरदिगार! अगर मरहूमा से ज़िंदगी में कोई ख़ता, ग़लती या कोताही हुई हो तो अपने फ़ज़्ल-ओ-करम से माफ़ फ़रमा। उनकी नेकियों को क़ुबूल फ़रमा, उनके दरजात बुलंद फ़रमा और उन्हें अपने महबूब बंदों के साथ जन्नतुल फ़िरदौस में जगह अता फ़रमा।

आमीन या रब्बुल आलमीन।

🕊️ दफ़्न और मिट्टी देने के मौक़े पर पढ़ी जाने वाली दुआएँ

इस पुरदर्द वक़्त में तमाम अहल-ए-ईमान से गुज़ारिश है कि मरहूमा के लिए दुआ-ए-मग़फ़िरत फ़रमाएँ और उनके घर वालों को सब्र-ओ-हौसला अता होने की दुआ करें।

1. क़ब्रिस्तान में दाख़िल होते वक़्त की दुआ

اَلسَّلَامُ عَلَيْكُمْ أَهْلَ الدِّيَارِ مِنَ الْمُؤْمِنِينَ وَالْمُسْلِمِينَ، وَإِنَّا إِنْ شَاءَ اللّٰهُ بِكُمْ لَاحِقُونَ، نَسْأَلُ اللّٰهَ لَنَا وَلَكُمُ الْعَافِيَةَ

तर्जुमा: ऐ मोमिनों और मुसलमानों के घर वालो! तुम पर सलाम हो। इंशाअल्लाह, हम भी तुमसे आ मिलने वाले हैं। हम अल्लाह से अपने और तुम्हारे लिए आफ़ियत माँगते हैं।

2. मैय्यत को क़ब्र में उतारते वक़्त की दुआ

بِسْمِ اللّٰهِ وَعَلَى مِلَّةِ رَسُولِ اللّٰهِ

तर्जुमा: अल्लाह के नाम के साथ और अल्लाह के रसूल ﷺ के दीन पर।

यह दुआ मैय्यत को क़ब्र में रखते वक़्त पढ़ी जाती है।

3. मिट्टी देते वक़्त की याददिहानी

मिट्टी देते वक़्त इंसान को अपनी पैदाइश, दुनिया में आमद और आख़िरत की वापसी याद रखनी चाहिए। क़ुरआन-ए-करीम में इरशाद है:

مِنْهَا خَلَقْنَاكُمْ وَفِيهَا نُعِيدُكُمْ وَمِنْهَا نُخْرِجُكُمْ تَارَةً أُخْرَىٰ

तर्जुमा: इसी ज़मीन से हमने तुम्हें पैदा किया, इसी में तुम्हें लौटाएँगे और इसी से तुम्हें दोबारा निकालेंगे।

(सूरह ताहा, आयत 55)

4. दफ़्न के बाद मरहूमा के लिए दुआ

अल्लाह तआला से दुआ है कि वह मरहूमा को मग़फ़िरत, रहमत और सुकून अता फ़रमाए। क़ब्र में उन्हें साबित-क़दम रखे और उनकी आख़िरत को बेहतर फ़रमाए।

इस्लामी तालीमात के मुताबिक़ दफ़्न के बाद मैय्यत के लिए मग़फ़िरत और साबित-क़दमी की दुआ करना मुस्तहब है। तमाम हाज़िरीन से गुज़ारिश है कि मरहूमा के हक़ में दिल से दुआ करें।

🤲 अहल-ए-ख़ाना के लिए दुआ-ए-सब्र

ऐ अल्लाह! जनाब शौकत अली साहब (रांझे वाले), मरहूमा के तमाम घर वालों, अज़ीज़-ओ-अक़ारिब और अहबाब को इस सदमे को बर्दाश्त करने की ताक़त अता फ़रमा। उनके दिलों को सब्र-ओ-क़रार अता फ़रमा और उन्हें इस मुश्किल वक़्त में अपने ज़िक्र और रहमत से सुकून नसीब फ़रमा।

ऐ अल्लाह! मरहूमा के घर वालों के लिए इस इम्तिहान को आसान फ़रमा। उन्हें सब्र-ए-जमील अता फ़रमा और मरहूमा की याद को उनके लिए नेकियों और दुआओं का ज़रिया बना दे।

आमीन सुम्मा आमीन।

🥀 मुल्तानी समाज की जानिब से पुरसा-ए-ताज़ियत

राष्ट्रीय समाचार पत्रिका “मुल्तानी समाज” की पूरी टीम, उत्तर प्रदेश डेस्क और प्रधान संपादक की जानिब से मरहूमा जरीना बानो (रानी) साहिबा के इंतक़ाल पर जनाब शौकत अली साहब और तमाम पसमान्दगान-ए-मरहूमा की ख़िदमत में दिली ताज़ियत और पुरसा पेश किया जाता है।

हम इस ग़म की घड़ी में अहल-ए-ख़ाना के साथ अपनी हमदर्दी का इज़हार करते हैं और दुआगो हैं कि अल्लाह तआला मरहूमा की मग़फ़िरत फ़रमाए, उन्हें जन्नतुल फ़िरदौस में आला मक़ाम अता फ़रमाए और तमाम घर वालों को सब्र-ए-जमील नसीब फ़रमाए।

अल्लाहुम्मग़फ़िर लहा वरहमहा, वजअल मक़ामहा फ़िल जन्नत।

ऐ अल्लाह! उनकी मग़फ़िरत फ़रमा, उन पर रहम फ़रमा और जन्नत में उनका मक़ाम अता फ़रमा।

आमीन या रब्बुल आलमीन।


📰 मुल्तानी समाज — अपनी बिरादरी की आवाज़, अपनी पहचान

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार से पंजीकृत, मुल्क की राजधानी नई दिल्ली से प्रसारित, पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी की क़ौमी समाचार पत्रिका, न्यूज़ पोर्टल और यूट्यूब चैनल “मुल्तानी समाज” के लिए उत्तर प्रदेश डेस्क से प्रधान संपादक ज़मीर आलम की ख़ास रिपोर्ट।

अगर आप भी अपनी ख़बर, मज़मून (आर्टिकल), पैग़ाम, मुबारकबाद, ताज़ियती इश्तिहार, दिलचस्प वाक़ियात, तहरीर, अफ़साना (कहानी) या अपने कारोबार का इश्तिहार क़ौमी सतह पर शाया या प्रसारित करवाना चाहते हैं, तो बराए मेहरबानी नीचे दिए गए नंबरों पर राब्ता फ़रमाएँ।

📞 9410652990

📞 8010884848

आपका एतमाद ही हमारी सबसे बड़ी ताक़त है।

“मुल्तानी समाज” — अपनी बिरादरी की आवाज़, अपनी पहचान।

🥀 इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन 🥀निहायत ही रंज-ओ-ग़म के साथ ताज़ियती ख़बर

ख़ातून-ए-इस्लाम शफ़ीक़न बी का इंतिक़ाल, ख़तौली में पसरा मातम; नमाज़-ए-जनाज़ा बाद नमाज़-ए-असर, ग़ौरे-ग़रीबा क़ब्रिस्तान में होगी तदफ़ीन

ख़तौली, मुज़फ़्फ़रनगर, उत्तर प्रदेश।

निहायत ही रंज-ओ-ग़म और दिली अफ़सोस के साथ तमाम मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादराना हज़रात को इत्तिला दी जाती है कि मोहल्ला इस्लाम नगर, क़स्बा ख़तौली, ज़िला मुज़फ़्फ़रनगर, उत्तर प्रदेश की साकिन शफ़ीक़न बी साहिबा, अहलिया-ए-जनाब रहीमुद्दीन साहब मरहूम, उम्र तक़रीबन 80 साल, आज बुध, बा-तारीख़ 14 अक्टूबर 2026 को सुबह तक़रीबन 7 बजे क़ज़ा-ए-इलाही से इस दार-ए-फ़ानी से कूच फ़रमा गईं।

इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन।

बेशक हम सब अल्लाह ही के हैं और उसी की तरफ़ हमें लौटकर जाना है।

मरहूमा के इंतिक़ाल की ख़बर से अहल-ए-ख़ाना, ख़ानदान, अज़ीज़-ओ-अक़ारिब और तमाम जानने वालों में ग़म की लहर दौड़ गई है। मरहूमा अपने पीछे अपने बेटे-बेटियों, पोते-पोतियों, नाते-नातिनों समेत भरा-पूरा कुनबा, ख़ानदान और मुतअद्दिद अज़ीज़-ओ-अक़ारिब को सोगवार छोड़कर हमेशा के लिए इस दुनिया से रुख़्सत हो गईं।

एक बुज़ुर्ग ख़ातून का दुनिया से चले जाना घर-परिवार के लिए ऐसा सदमा है जिसकी कमी को आसानी से पूरा नहीं किया जा सकता। उम्र के इस पड़ाव पर अपनों से जुदाई का यह लम्हा अहल-ए-ख़ाना के लिए बेहद तकलीफ़देह है। अल्लाह तआला तमाम पसमांदगान को सब्र-ए-जमील अता फ़रमाए और इस सदमे को बर्दाश्त करने की तौफ़ीक़ बख़्शे। आमीन।

मरहूमा का मायका मंगलौर में था

मिली हुई मालूमात के मुताबिक़, मरहूमा शफ़ीक़न बी साहिबा का मायका क़स्बा मंगलौर, ज़िला हरिद्वार, उत्तराखंड में था। बताया जाता है कि अब उनके मायके वाले मुज़फ़्फ़रनगर शहर में आबाद हो गए हैं।

नमाज़-ए-जनाज़ा और तदफ़ीन की मालूमात

तमाम बिरादराना हज़रात को इत्तिला दी जाती है कि मरहूमा की नमाज़-ए-जनाज़ा आज बाद नमाज़-ए-असर अदा की जाएगी। इसके बाद उन्हें रोडवेज़ बस स्टैंड के सामने वाक़े ग़ौरे-ग़रीबा क़ब्रिस्तान, ख़तौली में सुपुर्द-ए-ख़ाक किया जाएगा।

तमाम अहबाब, अज़ीज़-ओ-अक़ारिब और बिरादराना हज़रात से गुज़ारिश है कि जनाज़े में शिरकत फ़रमाकर मरहूमा के लिए दुआ-ए-मग़फ़िरत करें और इस कार-ए-ख़ैर में हिस्सा लेकर सवाब-ए-दारैन हासिल करें।

🤲 मरहूमा की मग़फ़िरत के लिए दुआ

अल्लाहुम्मग़फ़िर लहा वरहमहा व आफ़िहा वअफ़ु अन्हा।

ऐ अल्लाह! मरहूमा की मग़फ़िरत फ़रमा, उन पर अपनी ख़ास रहमत नाज़िल फ़रमा, उन्हें आफ़ियत अता फ़रमा और उनकी ख़ताओं से दरगुज़र फ़रमा।

या अल्लाह! मरहूमा की तमाम छोटी-बड़ी ख़ताओं को माफ़ फ़रमा। उनकी नेकियों को क़ुबूल फ़रमा, उनकी क़ब्र को नूर से मुनव्वर फ़रमा और उसे जन्नत के बाग़ों में से एक बाग़ बना दे। उनकी क़ब्र की तंगी और वहशत को दूर फ़रमा, उन्हें सवालात-ए-क़ब्र में साबित-क़दम रख और अपनी रहमत के साये में जगह अता फ़रमा।

ऐ रब्बुल आलमीन! मरहूमा को जन्नतुल फ़िरदौस में आला मक़ाम अता फ़रमा, उन्हें हुज़ूर नबी-ए-करीम ﷺ की शफ़ाअत नसीब फ़रमा और उनके दरजात बुलंद से बुलंदतर फ़रमा।

🤲 मैय्यत को क़ब्र में उतारते वक़्त की दुआ

मैय्यत को क़ब्र में उतारते वक़्त यह दुआ पढ़ना मसनून है:

بِسْمِ اللَّهِ وَعَلَى مِلَّةِ رَسُولِ اللَّهِ ﷺ

तर्जुमा: अल्लाह के नाम के साथ और रसूलुल्लाह ﷺ के दीन व तरीक़े पर।

या अल्लाह! इस अमानत को तेरी बारगाह में पेश करते हैं। मरहूमा पर अपनी रहमत फ़रमा, उन्हें क़ब्र में सुकून अता फ़रमा और अपनी रज़ा व मग़फ़िरत से नवाज़ दे। आमीन।

🤲 मिट्टी देते वक़्त की दुआ और आख़िरत की याद

मिट्टी देते वक़्त कुरआन-ए-करीम की यह आयत पढ़ना मुनासिब है:

مِنْهَا خَلَقْنَاكُمْ وَفِيهَا نُعِيدُكُمْ وَمِنْهَا نُخْرِجُكُمْ تَارَةً أُخْرَىٰ

तर्जुमा: हमने तुम्हें इसी ज़मीन से पैदा किया, इसी में तुम्हें वापस लौटाएँगे और इसी से तुम्हें दोबारा निकालेंगे।

(सूरह ताहा, आयत 55)

मिट्टी देने के मौक़े पर तमाम हाज़िरीन को चाहिए कि आख़िरत को याद करें, मरहूमा के लिए मग़फ़िरत की दुआ करें और अहल-ए-ख़ाना को सब्र की तलक़ीन करें।

🤲 दफ़्न के बाद की दुआ

जनाज़े की तदफ़ीन के बाद मरहूमा के लिए मग़फ़िरत और साबित-क़दमी की दुआ करना चाहिए।

اللَّهُمَّ اغْفِرْ لَهَا وَثَبِّتْهَا عِنْدَ السُّؤَالِ

तर्जुमा: ऐ अल्लाह! इनकी मग़फ़िरत फ़रमा और सवाल के वक़्त इन्हें साबित-क़दम रख।

या अल्लाह! मरहूमा को अपनी रहमत में जगह अता फ़रमा। उनकी क़ब्र को आरामगाह बना, उन्हें अज़ाब-ए-क़ब्र से महफ़ूज़ रख और रोज़-ए-महशर उन्हें अपने नेक बंदों के साथ उठाना। उनके तमाम गुनाहों को माफ़ फ़रमा और उन्हें जन्नतुल फ़िरदौस में आला दर्जा अता फ़रमा।

या अल्लाह! उनके तमाम बच्चों, पोते-पोतियों, नाते-नातिनों, रिश्तेदारों और तमाम पसमांदगान को सब्र-ए-जमील अता फ़रमा। उनके दिलों को सुकून दे, इस सदमे को बर्दाश्त करने की हिम्मत अता फ़रमा और तमाम ख़ानदान को अपनी हिफ़ाज़त में रख।

आमीन या रब्बल आलमीन।

तफ़सीली मालूमात के लिए राब्ता करें

मैय्यत और नमाज़-ए-जनाज़ा के सिलसिले में मज़ीद मालूमात हासिल करने के लिए जनाब अब्दुल क़य्यूम साहब से नीचे दिए गए मोबाइल नंबर पर राब्ता फ़रमा सकते हैं।

📞 मोबाइल नंबर: 9358509980


📰 मुल्तानी समाज — क़ौमी समाचार पत्रिका की ख़ास रिपोर्ट

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार से पंजीकृत, मुल्क की राजधानी नई दिल्ली से प्रकाशित व प्रसारित, पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी की क़ौमी समाचार पत्रिका, न्यूज़ पोर्टल और यूट्यूब चैनल “मुल्तानी समाज” के लिए उत्तर प्रदेश डेस्क से प्रधान संपादक ज़मीर आलम की ख़ास रिपोर्ट।

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Tuesday, October 13, 2026

🥀 इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन 🥀कम उम्र में समद मिर्ज़ा का दर्दनाक इंतिक़ाल, मिर्ज़ा ख़ानदान और बिरादरी में ग़म की लहर

हादसे में गंभीर रूप से ज़ख़्मी होने के बाद सुभारती हॉस्पिटल मेरठ में ली आख़िरी साँस, नम आँखों से दी जा रही हैं ख़िराज-ए-अक़ीदत और मग़फ़िरत की दुआएँ

मुज़फ़्फ़रनगर/मेरठ, उत्तर प्रदेश।

इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन।

बेहद रंज-ओ-ग़म, दिली अफ़सोस और बोझिल दिल के साथ तमाम बिरादराना हज़रात को यह इत्तिला दी जाती है कि वार्ड नंबर 4, अलावलपुर रोड, मुज़फ़्फ़रनगर, उत्तर प्रदेश के साजिद मिर्ज़ा (मथाने वाले) के फ़रज़ंद और छुटमलपुर, ज़िला सहारनपुर की नगर पंचायत चेयरपर्सन के भतीजे समद मिर्ज़ा का मंगलवार, 13 अक्टूबर 2026 को इलाज के दौरान इंतिक़ाल हो गया।

मिली हुई इत्तिला के मुताबिक़, समद मिर्ज़ा एक हादसे में गंभीर रूप से ज़ख़्मी हो गए थे। उन्हें बेहतर इलाज के लिए मेरठ के सुभारती हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया, जहाँ ज़िंदगी और मौत के दरमियान जारी जद्दोजहद के बाद आख़िरकार उन्होंने दम तोड़ दिया। उनकी कम उम्र में इस दुनिया-ए-फ़ानी से रुख़्सती की ख़बर ने अहल-ए-ख़ाना, रिश्तेदारों, अज़ीज़ों, दोस्तों और बिरादरी के लोगों को गहरे सदमे और रंज में मुब्तिला कर दिया है।

समद मिर्ज़ा की जुदाई का यह सदमा उनके घरवालों के लिए ऐसा दुख है, जिसकी भरपाई करना आसान नहीं। जिस उम्र में इंसान की ज़िंदगी उम्मीदों, ख़्वाबों और नए अरमानों से सजी होती है, उसी उम्र में उनका दुनिया से चले जाना हर सुनने वाले के दिल को ग़मगीन कर रहा है। इस दर्दनाक ख़बर से मिर्ज़ा ख़ानदान और उनसे मुहब्बत रखने वाले तमाम लोगों में शोक की लहर दौड़ गई है।

अल्लाह तआला मरहूम के तमाम घरवालों, वालिदैन, अहल-ए-ख़ाना और अज़ीज़-ओ-अक़ारिब को इस मुश्किल वक़्त में सब्र-ओ-हौसला अता फ़रमाए। आमीन।

🕊️ मरहूम की मग़फ़िरत के लिए दिली दुआ

इस मौक़े पर तमाम बिरादराना हज़रात से गुज़ारिश है कि मरहूम समद मिर्ज़ा की मग़फ़िरत, रहमत और बुलंदी-ए-दरजात के लिए ख़ुसूसी दुआ फ़रमाएँ।

ऐ अल्लाह! समद मिर्ज़ा की मग़फ़िरत फ़रमा, उनकी ख़ताओं और लग़ज़िशों से दरगुज़र फ़रमा, उनकी नेकियों को क़ुबूल फ़रमा और अपनी बेपनाह रहमत के साये में जगह अता फ़रमा।

या रब्बुल आलमीन! मरहूम पर अपना ख़ास करम फ़रमा, उनकी क़ब्र को नूर से मुनव्वर फ़रमा, उसे जन्नत के बाग़ों में से एक बाग़ बना दे। क़ब्र की तंगी, वहशत और हर तकलीफ़ से महफ़ूज़ फ़रमा। हिसाब-ओ-किताब में आसानी फ़रमा और रोज़-ए-क़ियामत उन्हें अपने महबूब बंदों के साथ उठाना।

ऐ अल्लाह! मरहूम को जन्नतुल फ़िरदौस में आला मुक़ाम अता फ़रमा, उन्हें अपने नबी हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा ﷺ की शफ़ाअत नसीब फ़रमा और उनके वालिदैन व अहल-ए-ख़ाना को सब्र-ए-जमील अता फ़रमा।

ऐ अल्लाह! इस सदमे से टूटे हुए दिलों को सुकून अता फ़रमा, घरवालों की आँखों के आँसू पोंछ दे और उन्हें इस इम्तिहान को बर्दाश्त करने की ताक़त अता फ़रमा। आमीन या रब्बुल आलमीन।

🤲 नमाज़-ए-जनाज़ा, तदफ़ीन और मिट्टी देने के वक़्त की दुआएँ

नमाज़-ए-जनाज़ा, तदफ़ीन और सुपुर्द-ए-ख़ाक किए जाने के वक़्त तमाम हाज़िरीन से गुज़ारिश है कि मरहूम के लिए ख़ुलूस-ए-दिल से मग़फ़िरत की दुआ करें। नमाज़-ए-जनाज़ा और तदफ़ीन का सही वक़्त, तारीख़ तथा मुक़ाम की तस्दीक़ अहल-ए-ख़ाना से की जाए।

1. मैय्यत को क़ब्र में उतारते वक़्त की मस्नून दुआ

अरबी: بِسْمِ اللَّهِ وَعَلَى مِلَّةِ رَسُولِ اللَّهِ

हिंदी उच्चारण: बिस्मिल्लाहि व अला मिल्लति रसूलिल्लाह।

मफ़हूम: अल्लाह के नाम के साथ और अल्लाह के रसूल ﷺ के दीन व तरीक़े पर।

2. मैय्यत को मिट्टी देते वक़्त की याद-दिहानी

अल्लाह तआला ने इंसान की पैदाइश मिट्टी से फ़रमाई और उसी की तरफ़ उसकी वापसी है। क़ब्र पर मिट्टी डालते वक़्त क़ुरआन मजीद की यह आयत पढ़ना मुस्तहब है:

अरबी: مِنْهَا خَلَقْنَاكُمْ وَفِيهَا نُعِيدُكُمْ وَمِنْهَا نُخْرِجُكُمْ تَارَةً أُخْرَىٰ

हिंदी उच्चारण: मिन्हा ख़लक़नाकुम व फ़ीहा नुईदुकुम व मिन्हा नुख़रिजुकुम तारतन उख़रा।

मफ़हूम: इसी मिट्टी से हमने तुम्हें पैदा किया, इसी में तुम्हें वापस लौटाएँगे और इसी से तुम्हें दोबारा निकालेंगे।

(सूरह ताहा, आयत 55)

3. दफ़न के बाद मरहूम के लिए दुआ

दफ़न के बाद मरहूम के लिए मग़फ़िरत और साबित-क़दमी की दुआ करना चाहिए। रसूलुल्लाह ﷺ से दफ़न के बाद मैय्यत के लिए मग़फ़िरत और साबित-क़दमी की दुआ करने की तालीम साबित है।

अरबी: اللَّهُمَّ اغْفِرْ لَهُ وَثَبِّتْهُ

हिंदी उच्चारण: अल्लाहुम्मग़फ़िर लहू व सब्बित्हू।

मफ़हूम: ऐ अल्लाह! उनकी मग़फ़िरत फ़रमा और उन्हें साबित-क़दम रख।

ऐ अल्लाह! समद मिर्ज़ा को क़ब्र के सवालों में साबित-क़दम रख, उनकी मग़फ़िरत फ़रमा और उन्हें अपनी रहमत में जगह अता फ़रमा। आमीन।

नोट: मरहूम मर्द हैं, इसलिए उनके लिए दुआ में “लहू” का इस्तेमाल किया गया है। नमाज़-ए-जनाज़ा और तदफ़ीन के सिलसिले में स्थानीय इमाम या आलिम-ए-दीन की रहनुमाई के मुताबिक़ अमल किया जाए।

🖤 तमाम बिरादराना हज़रात से ख़ुसूसी गुज़ारिश

तमाम मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी, मिर्ज़ा ख़ानदान से ताल्लुक़ रखने वाले अज़ीज़ों, दोस्तों और तमाम अहबाब से गुज़ारिश है कि इस दुख की घड़ी में मरहूम के घरवालों के साथ हमदर्दी और दिलजोई का इज़हार करें। अपनी दुआओं में मरहूम को याद रखें और अल्लाह तआला से उनके लिए रहमत, मग़फ़िरत और जन्नतुल फ़िरदौस की दुआ करें।

किसी अज़ीज़ का दुनिया से चले जाना इंसानी ज़िंदगी की सबसे कठिन आज़माइशों में से एक है। ऐसे वक़्त में सब्र, दुआ, हमदर्दी और एक-दूसरे का सहारा बनना ही इंसानियत और भाईचारे की असल पहचान है।

अल्लाह तआला मरहूम समद मिर्ज़ा की मग़फ़िरत फ़रमाए, उनकी क़ब्र को नूर से भर दे, उनके दर्जात बुलंद फ़रमाए और उन्हें जन्नतुल फ़िरदौस में आला मुक़ाम अता फ़रमाए। उनके तमाम घरवालों को सब्र-ए-जमील और अज्र-ए-अज़ीम अता फ़रमाए।

आमीन सुम्मा आमीन, या रब्बुल आलमीन।


📰 मुल्तानी समाज — अपनी बिरादरी की आवाज़, अपनी पहचान

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार से पंजीकृत, मुल्क की राजधानी नई दिल्ली से प्रसारित, पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी की क़ौमी समाचार पत्रिका, न्यूज़ पोर्टल और यूट्यूब चैनल “मुल्तानी समाज” के लिए उत्तर प्रदेश डेस्क से प्रधान संपादक ज़मीर आलम की ख़ास रिपोर्ट।

अगर आप भी अपनी ख़बर, मज़मून (आर्टिकल), पैग़ाम, मुबारकबाद, ताज़ियती इश्तिहार, दिलचस्प वाक़ियात, तहरीर, अफ़साना (कहानी) या अपने कारोबार का इश्तिहार क़ौमी सतह पर शाया और प्रसारित करवाना चाहते हैं, तो बराए मेहरबानी नीचे दिए गए नंबरों पर राब्ता फ़रमाएँ।

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“मुल्तानी समाज” — अपनी बिरादरी की आवाज़, अपनी पहचान।

Sunday, October 11, 2026

💔 इंतिक़ाल की दर्दनाक ख़बर: पारोली, भीलवाड़ा में जनाब अब्दुल जब्बार पंवार साहब की ज़ौजा मोहतरमा फरीदा बानू का इंतिक़ाल, बिरादरी में ग़म की लहर

इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन।

निहायत ही रंज-ओ-ग़म, दिली अफ़सोस और बोझिल दिल के साथ तमाम बिरादराना हज़रात को इत्तिला दी जाती है कि आज, दिन पीर, बा-तारीख़ 12 अक्टूबर 2026 को पारोली, ज़िला भीलवाड़ा, राजस्थान में जनाब अब्दुल जब्बार पंवार साहब की ज़ौजा-ए-मोहतरमा फरीदा बानू साहिबा का क़ज़ा-ए-इलाही से इंतिक़ाल हो गया है।

इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन।

मरहूमा के इंतिक़ाल की ख़बर से अहल-ए-ख़ाना, अज़ीज़ो-अक़ारिब और बिरादरी के लोगों में गहरे रंज-ओ-ग़म की कैफ़ियत है। इस दुनिया-ए-फ़ानी में हर जानदार को एक दिन अपने रब की बारगाह में लौटकर जाना है। मौत एक अटल हक़ीक़त है, मगर किसी अपने की जुदाई का ग़म दिल पर गहरा असर छोड़ जाता है। अल्लाह तआला मरहूमा के तमाम गुनाहों को माफ़ फ़रमाए, उनकी मग़फ़िरत फ़रमाए और उन्हें अपनी रहमत के साये में जगह अता फ़रमाए।

इस पुरदर्द मौक़े पर हम जनाब अब्दुल जब्बार पंवार साहब और तमाम सोगवार अहल-ए-ख़ाना के ग़म में बराबर के शरीक हैं। अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त तमाम घरवालों को इस सदमे को बर्दाश्त करने की ताक़त, सब्र-ए-जमील और हौसला अता फ़रमाए।

🤲 मरहूमा की मग़फ़िरत के लिए दुआ

ऐ अल्लाह! मरहूमा फरीदा बानू साहिबा की मुकम्मल मग़फ़िरत फ़रमा। उनकी ख़ताओं और गुनाहों से दरगुज़र फ़रमा, उनकी नेकियों को क़ुबूल फ़रमा और उनकी क़ब्र को नूर से मुनव्वर फ़रमा।

ऐ परवरदिगार! उनकी क़ब्र को जन्नत के बाग़ों में से एक बाग़ बना दे। क़ब्र की तंगी और वहशत को दूर फ़रमा, उन्हें क़ब्र के अज़ाब से महफ़ूज़ फ़रमा और सवालात-ए-क़ब्र के वक़्त अपनी रहमत से आसानी अता फ़रमा।

या अल्लाह! मरहूमा को जन्नतुल फ़िरदौस में आला मक़ाम अता फ़रमा। उन्हें हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा ﷺ की शफ़ाअत नसीब फ़रमा और अपने नेक बंदों के ज़ुमरे में शामिल फ़रमा।

🤲 दफ़्न और क़ब्र में उतारने के वक़्त की दुआ

ऐ अल्लाह! जब मरहूमा को क़ब्र में उतारा जाए, तो अपनी ख़ास रहमत और करम से उन्हें सुकून अता फ़रमा। उनकी आख़िरी मंज़िल को आसान फ़रमा, उनकी क़ब्र को वुसअत अता फ़रमा और उसे नूर, रहमत और सुकून से भर दे।

या रब्बुल आलमीन! जो हाथ मरहूमा को क़ब्र में उतारें, उन सबको आख़िरत की याद और नेक अमल की तौफ़ीक़ अता फ़रमा। जो लोग उनकी मिट्टी देने में शरीक हों, उन सबकी हाज़िरी और दुआओं को अपनी बारगाह में क़ुबूल फ़रमा। मरहूमा के लिए क़ब्र को आरामगाह बना और उन्हें रोज़-ए-महशर अपनी रहमत के साये में जगह अता फ़रमा।

🤲 मिट्टी देने के मौक़े पर दुआ

ऐ अल्लाह! हम सब तेरे ही हैं और हमें तेरी ही तरफ़ लौटकर जाना है। मरहूमा फरीदा बानू साहिबा पर अपनी रहमत नाज़िल फ़रमा। उनकी क़ब्र पर अपनी रहमत की बारिश फ़रमा, उन्हें तन्हाई में अपना सहारा अता फ़रमा और उनकी आख़िरत को बेहतर से बेहतर फ़रमा।

ऐ अल्लाह! मरहूमा के तमाम अहल-ए-ख़ाना, ख़ास तौर पर जनाब अब्दुल जब्बार पंवार साहब और उनके तमाम अज़ीज़ो-अक़ारिब को सब्र-ए-जमील अता फ़रमा। उनके दिलों को सुकून दे, इस ग़म को बर्दाश्त करने की हिम्मत अता फ़रमा और उन्हें दुआ, सदक़ा और नेक अमल के ज़रिये मरहूमा के लिए ख़ैर भेजने की तौफ़ीक़ अता फ़रमा।

आमीन या रब्बुल आलमीन।

तमाम बिरादराना हज़रात से गुज़ारिश है कि मरहूमा की मग़फ़िरत, बुलंदी-ए-दरजात और जन्नतुल फ़िरदौस में आला मक़ाम के लिए ख़ुसूसी दुआ फ़रमाएँ। अल्लाह तआला इस पुरदर्द वक़्त में सोगवार ख़ानदान को सब्र और हौसला अता फ़रमाए।

अल्लाह मरहूमा की मग़फ़िरत फ़रमाए, उनकी क़ब्र को नूर से भर दे और उन्हें जन्नतुल फ़िरदौस में आला मक़ाम अता फ़रमाए। आमीन सुम्मा आमीन।


ख़बर एवं इशाअत:
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उत्तर प्रदेश डेस्क से प्रधान संपादक ज़मीर आलम की ख़ास रिपोर्ट।

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“मुल्तानी समाज” — अपनी बिरादरी की आवाज़, अपनी पहचान।

Thursday, October 8, 2026

बिरादरी की ख़िदमत के नाम पर किसी दूसरी तंजीम के प्रोजेक्ट और परंपरागत कार्यक्रमों की नकल आख़िर कब तक?

ज़मीर आलम मुल्तानी की पुरअसर अपील—तमाम तंजीमें अपनी पहचान, अपने प्रोजेक्ट और अपने नाम से काम करें; बिरादरी को गुमराह करने के बजाय इत्तेहाद और भाईचारे को फ़रोग़ दें

“किसी तंजीम की मुख़ालफ़त हमारा मक़सद नहीं, लेकिन किसी दूसरी तंजीम की मेहनत, पहचान और परंपरागत कार्यक्रमों को अपना बताकर बिरादरी के सामने पेश करना किसी भी सूरत में मुनासिब नहीं।”

शामली, उत्तर प्रदेश। पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी की सामाजिक, तंजीमी और फ़लाही सरगर्मियों के बीच मुल्तानी समाज चैरिटेबल ट्रस्ट के फाउंडर एवं सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार से पंजीकृत राष्ट्रीय समाचार पत्रिका “मुल्तानी समाज” के प्रधान संपादक ज़मीर आलम मुल्तानी ने मुल्क भर की बिरादरी की तमाम तंजीमों, सोसाइटियों, अंजुमनों और उनके ज़िम्मेदार ओहदेदारों के नाम एक ख़ास और अहम अपील जारी की है।

उन्होंने कहा कि मुल्तानी समाज चैरिटेबल ट्रस्ट को मुल्क के किसी भी सूबे, ज़िले, शहर या क़स्बे से संचालित होने वाली किसी भी तंजीम, सोसाइटी या कमेटी से कोई व्यक्तिगत गिला-शिकवा नहीं है। बिरादरी की ख़िदमत करने वाली हर तंजीम का अपना मुक़ाम, अपनी पहचान और अपनी अहमियत है। हमारी दिली ख़्वाहिश है कि बिरादरी की तमाम तंजीमें तरक़्क़ी करें, समाज के बच्चों की तालीम, नौजवानों की रहनुमाई, ज़रूरतमंदों की मदद, आपसी इत्तेहाद और सामाजिक बेहतरी के लिए बढ़-चढ़कर काम करें।

लेकिन अफ़सोस उस रवैये पर है, जिसमें कुछ ज़िम्मेदार अफ़राद अपनी ज़ाती ज़िद, ग़लतफ़हमी या तंजीमी बरतरी के तसव्वुर में दूसरी तंजीमों की मेहनत और उनकी पुरानी पहचान को नज़रअंदाज़ करते हुए उनके परंपरागत कार्यक्रमों, ख़ास नामों और प्रोजेक्ट्स से मिलते-जुलते नाम अपनाकर उन्हें अपनी नई पहल के तौर पर पेश करने की कोशिश करते हैं। ऐसे रवैये से बिरादरी में ग़लतफ़हमियां पैदा होती हैं, आपसी एतमाद को ठेस पहुंचती है और इत्तेहाद के बजाय इख़्तिलाफ़ात को बढ़ावा मिलता है।

तंजीमों के ज़िम्मेदार याद रखें—बिरादरी का एतमाद एक बड़ी अमानत है

ज़मीर आलम मुल्तानी ने ख़ास तौर पर पश्चिमी उत्तर प्रदेश समेत मुल्क के मुख़्तलिफ़ इलाक़ों में काम करने वाली तंजीमों के ज़िम्मेदारों से मुख़ातिब होते हुए कहा कि आप चाहे अपने संगठन को तंजीम कहें, सोसाइटी कहें या अंजुमन, आपके साथ जुड़ा हुआ हर फ़र्द आपकी बातों और आपके दावों पर एतमाद करता है। वह आपको बिरादरी का ख़ैरख़्वाह समझकर आपकी आवाज़ पर साथ खड़ा होता है। लिहाज़ा यह एतमाद आपके लिए सिर्फ़ ताक़त नहीं, बल्कि एक बड़ी अमानत और जवाबदेही भी है।

बिरादरी के कुछ सौ अफ़राद का किसी सदर या कमेटी के साथ खड़ा हो जाना इस बात की दलील नहीं कि अब हर फ़ैसला सही है या किसी दूसरी तंजीम के काम को नज़रअंदाज़ किया जा सकता है। असल क़ाबिलियत यह नहीं कि कितने लोग आपकी आवाज़ पर जमा हो जाते हैं, बल्कि यह है कि आप कितने लोगों के हक़, इज़्ज़त और जज़्बात का एहतराम करते हैं।

बिरादरी की रहनुमाई का हक़ उसी को ज़ेब देता है जो अपने किरदार, अमल, सच्चाई और इंसाफ़ से लोगों का एतमाद क़ायम रखे।

दूसरी तंजीम के प्रोजेक्ट की नकल से अपनी पहचान क़ायम नहीं की जा सकती

प्रधान संपादक ज़मीर आलम मुल्तानी ने कहा कि हर तंजीम को अपनी सोच के मुताबिक़ नए प्रोजेक्ट शुरू करने, अपने सामाजिक और फ़लाही कार्यक्रम आयोजित करने तथा बिरादरी की बेहतरी के लिए काम करने का पूरा हक़ है। हम किसी भी तंजीम की जायज़ सरगर्मियों के ख़िलाफ़ नहीं हैं और न ही किसी को बिरादरी की ख़िदमत करने से रोकना चाहते हैं।

लेकिन अगर कोई तंजीम किसी दूसरी तंजीम के पहले से जारी प्रोजेक्ट, उसकी पहचान से जुड़े नाम या उसके परंपरागत कार्यक्रम की नक़ल करके उसे अपनी नई पहल के तौर पर पेश करती है, तो इस पर सवाल उठना लाज़िमी है। किसी दूसरे के काम से मुतास्सिर होकर बेहतर काम करना और बात है, लेकिन किसी की मेहनत, पहचान या परंपरा को इस तरह अपनाना कि लोगों के सामने असल और नक़ल का फ़र्क़ ही मिट जाए, बिल्कुल दूसरी बात है।

किसी भी प्रोजेक्ट की असलियत और उसके इस्तेमाल के बारे में बात करते समय तारीख़, दस्तावेज़, पुराने रिकॉर्ड, प्रकाशित ख़बरों, तस्वीरों, वीडियो और दूसरे भरोसेमंद सबूतों को अहमियत दी जानी चाहिए। महज़ बड़े दावों, भीड़ या बार-बार किसी बात को दोहराने से कोई दावा हक़ीक़त नहीं बन जाता।

ज़मीर आलम मुल्तानी ने कहा कि बिरादरी के लोग आज शायद किसी के दावे पर भरोसा करके उसके साथ खड़े हों, लेकिन जब कभी उनके सामने तमाम हक़ाइक़ और दस्तावेज़ात आएंगे, तो वह ख़ुद फ़ैसला करने की सलाहियत रखते हैं। इसलिए किसी को भी यह ग़लतफ़हमी नहीं पालनी चाहिए कि चंद दिनों, महीनों या कुछ सालों तक लोगों को किसी बात पर यक़ीन दिलाकर हमेशा के लिए हक़ीक़त को छिपाया जा सकता है।

परंपरागत कार्यक्रमों की पहचान का एहतराम करें

उन्होंने कहा कि बिरादरी में हर तंजीम को अपने परंपरागत कार्यक्रम आयोजित करने, अपनी सालगिरह मनाने और अपनी सामाजिक पहचान को मज़बूत करने का हक़ हासिल है। लेकिन किसी दूसरी तंजीम के पहले से स्थापित कार्यक्रम या उससे जुड़े नाम को लेकर ऐसा अंदाज़ अपनाना, जिससे बिरादरी के लोगों में असल आयोजक, कार्यक्रम की परंपरा या उसकी पहचान को लेकर ग़लतफ़हमी पैदा हो, किसी भी ज़िम्मेदाराना रवैये के मुताबिक़ नहीं है।

ख़ास तौर पर जब किसी कार्यक्रम का नाम किसी तंजीम की कई सालों की मेहनत, लगातार सरगर्मियों और पुराने रिकॉर्ड से जुड़ा हो, तो उसका इस्तेमाल करने से पहले तमाम पहलुओं पर संजीदगी से ग़ौर करना चाहिए। किसी नाम या प्रोजेक्ट को लेकर तना-तनी पैदा करने के बजाय बातचीत, दस्तावेज़ी हक़ाइक़ और आपसी मशविरे के ज़रिए मसले का हल तलाश करना चाहिए।

हमारी अपील है कि बिरादरी की तमाम तंजीमें अपने-अपने प्रोजेक्ट शुरू करें, नए नाम रखें, नए सामाजिक कार्यक्रम आयोजित करें और ऐसे काम करें जिन पर पूरी बिरादरी फ़ख़्र कर सके। लेकिन किसी दूसरी तंजीम की मेहनत और पहचान को नज़रअंदाज़ करके अपनी कामयाबी का रास्ता तलाश करने से गुरेज़ करें।

झूठे दावों और ज़िद के बजाय सच्चाई और जवाबदेही को अपनाएं

ज़मीर आलम मुल्तानी ने कहा कि किसी भी तंजीम के सदर, सरपरस्त, ओहदेदार या कमेटी के सदस्य को अपनी ज़िम्मेदारी का एहसास होना चाहिए। ओहदा मिलने के बाद इंसान की जवाबदेही कम नहीं, बल्कि और बढ़ जाती है। बिरादरी के लोगों की रहनुमाई करने वालों को चाहिए कि वह अपनी ज़बान, अपने दावों और अपने अमल में एहतियात बरतें।

अगर किसी प्रोजेक्ट, कार्यक्रम या नाम को लेकर इख़्तिलाफ़ पैदा हो गया है, तो उसे ज़ाती अनबन, तंजीमी दुश्मनी या बिरादरी की तक़सीम का ज़रिया बनाने के बजाय बातचीत और वसातत से हल किया जाए। अगर किसी से ग़लती हुई है, तो उसे अपनी ग़लती तस्लीम करने और ज़रूरत पड़ने पर सार्वजनिक तौर पर माफ़ी मांगने में देर नहीं करनी चाहिए। अपनी इस्लाह करना कमज़ोरी नहीं, बल्कि अच्छे किरदार और बुलंद ज़र्फ़ की निशानी है।

याद रखिए, लोगों का एतमाद हासिल करने में बरसों लगते हैं, लेकिन उसे खोने के लिए कभी-कभी एक ग़लत फ़ैसला ही काफ़ी होता है।

जो लोग आज अपने साथ खड़े अफ़राद की तादाद देखकर ख़ुद को जवाबदेही से ऊपर समझने लगते हैं, उन्हें यह भी याद रखना चाहिए कि वक़्त हमेशा एक जैसा नहीं रहता। आज के हमनवा कल सवाल भी कर सकते हैं। इसलिए भीड़ की ताक़त पर नाज़ करने के बजाय अपने किरदार, सच्चाई और इंसाफ़ पर भरोसा करना चाहिए।

इस्लामी तालीमात हमें इत्तेहाद, अमानतदारी और हुस्ने-अख़लाक़ का सबक़ देती हैं

हमारा ताल्लुक़ एक ऐसी बिरादरी से है जिसकी सामाजिक पहचान, पारिवारिक रिश्ते और आपसी मेल-जोल हमारे लिए बहुत अहमियत रखते हैं। इस्लामी तालीमात भी सच बोलने, अमानत की हिफ़ाज़त करने, इंसाफ़ करने और दूसरों के हुक़ूक़ का एहतराम करने की तालीम देती हैं।

ऐसे में हमारी ज़िम्मेदारी और भी बढ़ जाती है कि हम अपने तंजीमी इख़्तिलाफ़ात को बिरादरी के आपसी रिश्तों पर हावी न होने दें। सदर, सरपरस्त, कमेटी के सदस्य और समाज के दूसरे ज़िम्मेदार अफ़राद अपने किरदार से मिसाल क़ायम करें। एक-दूसरे की मेहनत का एहतराम करें, किसी के बारे में बेबुनियाद बातें फैलाने से बचें और हर मसले को सच्चाई तथा इंसाफ़ की बुनियाद पर देखें।

बिरादरी की तरक़्क़ी किसी एक तंजीम की कामयाबी तक महदूद नहीं है। जब मुख़्तलिफ़ तंजीमें तालीम, रोज़गार, फ़लाह, नौजवानों की रहनुमाई और समाजी इस्लाह के लिए अपने-अपने दायरे में काम करेंगी, तभी हमारी बिरादरी मज़बूत होगी।

हमारी कोशिश किसी तंजीम को नीचा दिखाना नहीं, बल्कि ऐसे रवैयों की निशानदेही करना है जो बिरादरी के एतमाद और इत्तेहाद को नुक़सान पहुंचा सकते हैं।

तमाम तंजीमों के ज़िम्मेदारों से हमारी पुरख़ुलूस अपील

मुल्क भर की तमाम तंजीमों, सोसाइटियों, अंजुमनों, सदूर, सरपरस्तों और कमेटियों के ज़िम्मेदारों से गुज़ारिश है कि वह इन बातों पर संजीदगी से ग़ौर करें:

  1. अपनी तंजीम के नाम, पहचान और काम को अपनी मेहनत से आगे बढ़ाएं।
  2. दूसरी तंजीमों के परंपरागत कार्यक्रमों और प्रोजेक्ट्स से जुड़े नामों का इस्तेमाल करते वक़्त उनके पुराने रिकॉर्ड, पहचान और संभावित ग़लतफ़हमी को ध्यान में रखें।
  3. बिरादरी के लोगों को किसी प्रोजेक्ट या कार्यक्रम की तारीख़, शुरुआत, इतिहास और आयोजक के बारे में ग़लत जानकारी न दें।
  4. किसी भी इख़्तिलाफ़ को ज़ाती दुश्मनी या तंजीमी टकराव में तब्दील न होने दें।
  5. अगर किसी नाम या प्रोजेक्ट को लेकर एतराज़ सामने आए, तो उसे नज़रअंदाज़ करने के बजाय बातचीत और दस्तावेज़ी हक़ाइक़ के ज़रिए हल करें।
  6. अगर किसी की पहचान या मेहनत के बारे में ग़लत दावा हुआ हो, तो उसकी वज़ाहत करें और ज़रूरत पड़ने पर सार्वजनिक तौर पर माफ़ी मांगें।
  7. बिरादरी के नौजवानों को तंजीमी नफ़रत के बजाय इल्म, तालीम, रोज़गार, ख़िदमत और आपसी इत्तेहाद की राह दिखाएं।

हम तमाम तंजीमों को अपना समझते हैं और चाहते हैं कि हर तंजीम तरक़्क़ी करे। मगर तरक़्क़ी का रास्ता किसी दूसरे की पहचान को कमज़ोर करके नहीं, बल्कि अपने किरदार और काम को मज़बूत बनाकर तय किया जाना चाहिए।

आख़िरी गुज़ारिश—अल्लाह से डरें, हक़ का एहतराम करें और बिरादरी को जोड़ें

ज़मीर आलम मुल्तानी ने अपनी अपील के इख़्तिताम पर कहा कि बिरादरी की ख़िदमत का दावा करने वाले हर शख़्स को अपने दिल में यह सवाल ज़रूर करना चाहिए कि क्या उसके अमल से बिरादरी जुड़ रही है या बिखर रही है? क्या उसकी कोशिशों से लोगों का एतमाद बढ़ रहा है या कम हो रहा है? और क्या वह दूसरों की मेहनत का एहतराम कर रहा है या अपनी पहचान बनाने के लिए उनके काम को नज़रअंदाज़ कर रहा है?

हम किसी भी तंजीम के ख़िलाफ़ नहीं हैं। हमारा मक़सद सिर्फ़ यह है कि बिरादरी के तमाम इदारों के दरमियान एहतराम, इंसाफ़, एतमाद और भाईचारा क़ायम रहे। जो भी तंजीम अच्छे काम कर रही है, उसे आगे बढ़ना चाहिए। जो नए प्रोजेक्ट शुरू करना चाहती है, उसे शुरू करने चाहिए। लेकिन हर किसी को अपनी पहचान और अपनी मेहनत के साथ आगे बढ़ना चाहिए।

अल्लाह तआला हम सबको सच बोलने, अमानतदारी के साथ काम करने, दूसरों के हुक़ूक़ का एहतराम करने और बिरादरी की बेहतरी के लिए मिल-जुलकर कोशिश करने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए। आमीन।

आख़िर में बस इतना ही कहना है कि समझदारों के लिए इशारा काफ़ी है। वक़्त रहते अपनी इस्लाह कर लेना ही बेहतर है। बिरादरी किसी एक शख़्स, सदर या कमेटी की जागीर नहीं, बल्कि हम सबकी साझा अमानत है। इसकी इज़्ज़त, एकता और आने वाली नस्लों के मुस्तक़बिल की हिफ़ाज़त करना हम सबकी सामूहिक ज़िम्मेदारी है।

जारीकर्ता:
ज़मीर आलम मुल्तानी
फाउंडर, मुल्तानी समाज चैरिटेबल ट्रस्ट
प्रधान संपादक, “मुल्तानी समाज” राष्ट्रीय समाचार पत्रिका

विशेष रिपोर्ट — उत्तर प्रदेश डेस्क

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार से पंजीकृत तथा नई दिल्ली से प्रसारित “मुल्तानी समाज” राष्ट्रीय समाचार पत्रिका, न्यूज़ पोर्टल एवं यूट्यूब चैनल।


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Tuesday, October 6, 2026

अपनी तारीख़ से दूर होती क़ौम और मिटती हुई पहचान

“जिस क़ौम को अपनी तारीख़ याद नहीं रहती, उसकी पहचान भी धीरे-धीरे धुंधली पड़ जाती है”

एक सोच… एक बिरादरी… एक तारीख़ — क्या हमारी अपनी कोई तारीख़ नहीं होनी चाहिए?

आज यह सवाल सिर्फ़ एक शख़्स का नहीं, बल्कि पूरी क़ौम और बिरादरी के सामने खड़ा है।

बड़े अफ़सोस और गहरे ग़म के साथ यह कहना पड़ता है कि आज हमारी क़ौम के बीच दीनी, सामाजिक और तारीखी मालूमात का वह सिलसिला कमज़ोर होता जा रहा है, जो कभी हमारी पहचान और हमारी नस्लों के लिए रहनुमाई का ज़रिया हुआ करता था।

हमारी नई नस्ल को अपने बुज़ुर्गों के कारनामों का पूरा इल्म नहीं, अपनी बिरादरी के दस्तकारों और फ़नकारों की तारीख़ का पूरा पता नहीं और कई बार तो हमें अपने ही अतीत के उन रोशन बाबों का इल्म नहीं होता, जिन पर हमें फ़ख़्र करना चाहिए।

दूसरी तरफ़ हम देखते हैं कि मुख़्तलिफ़ क़ौमें और बिरादरियाँ अपनी तारीखी, मज़हबी और सांस्कृतिक तारीख़ों को याद रखती हैं, उन्हें अपनी नई नस्ल तक पहुँचाती हैं और बड़े एहतराम के साथ अपनी रवायतों को ज़िंदा रखती हैं।

तो फिर सवाल पैदा होता है—

क्या हम अपनी तारीख़ भूलते जा रहे हैं?

क्या हमारी आने वाली नस्लें यह जान पाएँगी कि मुस्लिम मुल्तानी लौहार-बढ़ई बिरादरी कौन है?

हमारे बुज़ुर्ग कौन थे?

हमारे दस्तकार कौन थे?

उन्होंने मुल्क और समाज की तरक़्क़ी में क्या किरदार अदा किया?

उनके हुनर ने गाँवों, किसानों, खेतों, कारख़ानों और आम ज़िंदगी को किस तरह आसान बनाया?

अगर हम आज इन सवालों के जवाब दर्ज नहीं करेंगे तो कल हमारी नस्लें जवाब कहाँ से तलाश करेंगी?

तारीख़ सिर्फ़ तारीख़ नहीं होती, यह किसी क़ौम का बायोडाटा होती है

हर क़ौम और बिरादरी के पास अपनी एक तारीख़ होती है। तारीख़ सिर्फ़ साल, महीना और दिन लिख देने का नाम नहीं, बल्कि यह उन लोगों की मेहनत, क़ुर्बानी, हुनर, फ़न, ख़िदमत और जद्दोजहद का आईना होती है जिन्होंने उस क़ौम को पहचान दी।

इसीलिए अपनी तारीख़ को महफ़ूज़ करना कोई फ़ख़्र-ए-फ़िज़ूल नहीं, बल्कि आने वाली नस्लों के प्रति हमारी ज़िम्मेदारी है।

हमें अपने बच्चों को यह बताना होगा कि उनके बुज़ुर्ग सिर्फ़ रोज़गार करने वाले लोग नहीं थे, बल्कि अपने फ़न और दस्तकारी के ज़रिए मुल्क की तरक़्क़ी में हिस्सा लेने वाले मेहनतकश, हुनरमंद और वतनपरस्त लोग थे।

मुस्लिम मुल्तानी लौहार-बढ़ई बिरादरी किसी नाम की मोहताज नहीं

हमें डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम साहब की शख़्सियत पर फ़ख़्र है। वह मुल्क के महान वैज्ञानिक, क़ाबिल इंसान और नौजवानों के लिए प्रेरणा का स्रोत रहे।

लेकिन अपनी बिरादरी की पहचान बनाने के लिए हमें किसी बाहरी शख़्सियत के नाम का सहारा लेने की ज़रूरत नहीं।

हमारी अपनी तारीख़ है।

हमारे अपने बुज़ुर्ग हैं।

हमारे अपने दस्तकार हैं।

हमारे अपने फ़नकार हैं।

हमारी अपनी मेहनत और हमारी अपनी पहचान है।

अगर डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम साहब ने मुल्क की हिफ़ाज़त और तरक़्क़ी के लिए मिसाइलों के निर्माण में अहम किरदार अदा किया, तो हमारी मुस्लिम मुल्तानी लौहार-बढ़ई बिरादरी के मेहनतकश दस्तकारों ने भी सदियों से मुल्क के किसानों और आम आदमी के लिए कृषि यंत्र, औज़ार, मशीनों के पुर्ज़े और ज़रूरत की अनेक चीज़ें तैयार की हैं।

हुनर हमारी पहचान है, दस्तकारी हमारी विरासत है और मेहनत हमारी तारीख़ है।

इस तारीख़ को लिखना, सँवारना और आने वाली नस्लों तक पहुँचाना हमारा फ़र्ज़ है।

एक सोच… एक बिरादरी… एक तारीख़

हमारा मानना है कि मुस्लिम मुल्तानी लौहार-बढ़ई बिरादरी की एक ऐसी तारीखी पहचान ज़रूर होनी चाहिए, जिससे देश-दुनिया में हमारी बिरादरी का बच्चा-बच्चा अपने अतीत से वाक़िफ़ हो सके।

हमारी बिरादरी को किसी दूसरे नाम की बैसाखी की ज़रूरत नहीं।

हमें अपनी पहचान ख़ुद बनानी है।

अपनी तारीख़ ख़ुद लिखनी है।

अपने बुज़ुर्गों के कारनामे ख़ुद दर्ज करने हैं।

और अपनी आने वाली नस्ल को यह बताना है कि—

हम कौन थे, हम कौन हैं और हम आने वाले कल में क्या बनना चाहते हैं।

मुल्तानी डे — तारीख़ को ज़िंदा रखने की एक कोशिश

इसी सिलसिले में 12 नवंबर को “मुल्तानी डे” मनाने की कोशिश को देखा जाना चाहिए।

अगर पिछले लगभग 15 वर्षों से ज़मीर आलम साहब (गढ़ी पुख्ता) शामली, उत्तर प्रदेश वाले बिरादरी के बीच 12 नवंबर को “मुल्तानी डे” के रूप में एक तारीखी पहचान को आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं, तो इस कोशिश को किसी शख़्स की निजी कामयाबी या नाकामी के बजाय बिरादरी की तारीखी पहचान के एक प्रयास के तौर पर देखना चाहिए।

बिरादरी के अंदर राय का इख़्तिलाफ़ हो सकता है।

तरीक़े अलग हो सकते हैं।

सोच अलग हो सकती है।

मगर मक़सद अगर अपनी बिरादरी की तारीख़ और पहचान को ज़िंदा रखना है, तो ऐसे प्रयासों पर बातचीत होनी चाहिए, बहस होनी चाहिए और बेहतर रास्ता तलाश किया जाना चाहिए।

कंपीटिशन हो, मगर बिरादरी की तरक़्क़ी के लिए

कंपीटिशन अपनी जगह बुरा नहीं।

बल्कि स्वस्थ और सकारात्मक कंपीटिशन बिरादरी के लिए फ़ायदेमंद हो सकता है।

अगर 12 नवंबर को एक बिरादरी अपने-अपने शहरों, कस्बों और गाँवों में “मुल्तानी डे” मनाती है और 13 नवंबर को अपने-अपने कार्यक्रमों की ख़बरें प्रकाशित करती है, तो इससे पूरी दुनिया को यह संदेश जाएगा कि—

मुस्लिम मुल्तानी लौहार-बढ़ई बिरादरी की भी अपनी एक तारीख़ है, अपनी एक पहचान है और अपनी एक तारीखी विरासत है।

जिसने जहाँ तक काम किया है, उसे सामने आना चाहिए।

जिसने जितनी मेहनत की है, उसकी क़द्र होनी चाहिए।

जिसने अपनी बिरादरी के लिए कोई ख़िदमत की है, उसका नाम तारीख़ में दर्ज होना चाहिए।

क्योंकि तारीख़ किसी एक शख़्स की जागीर नहीं होती।

तारीख़ पूरी क़ौम की अमानत होती है।

हमारी गुज़ारिश सिर्फ़ इतनी है…

हम तमाम मुस्लिम मुल्तानी लौहार-बढ़ई बिरादराने वतन से गुज़ारिश करते हैं कि अपनी हैसियत, अपने इलाक़े और अपने हालात के मुताबिक़ 12 नवंबर को “मुल्तानी डे” मनाने की कोशिश करें।

अपने बुज़ुर्गों को याद करें।

अपने बच्चों को अपनी बिरादरी की तारीख़ बताएं।

अपने हुनरमंदों और दस्तकारों को सम्मान दें।

अपनी पुरानी तस्वीरें, दस्तावेज़, किताबें, अख़बारों की ख़बरें और बुज़ुर्गों की यादों को महफ़ूज़ करें।

क्योंकि हो सकता है कि आज हमारे पास मौजूद एक पुरानी तस्वीर या एक छोटा-सा काग़ज़ आने वाली नस्लों के लिए पूरी तारीख़ का सबसे बड़ा सबूत बन जाए।

हमारी मेहनत ज़ाया नहीं होनी चाहिए।

हमारे बुज़ुर्गों के नाम गुम नहीं होने चाहिए।

हमारी बिरादरी का बायोडाटा मिटना नहीं चाहिए।

और हमारी आने वाली नस्लें अपनी पहचान के लिए दूसरों की तरफ़ देखने पर मजबूर न हों।

अपनी पहचान ख़ुद लिखिए।
अपनी तारीख़ ख़ुद बचाइए।
अपनी नस्ल को अपना बायोडाटा ख़ुद दीजिए।

यही वक़्त की आवाज़ है।

यही हमारी ज़िम्मेदारी है।

और शायद यही आने वाली नस्लों के लिए हमारी सबसे बड़ी विरासत भी होगी।

एक सोच…
एक बिरादरी…
एक तारीख़…
और अपनी एक मुकम्मल पहचान।

इंशाअल्लाह।


लेखक परिचय

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार से पंजीकृत, मुल्क की राजधानी नई दिल्ली से प्रकाशित/प्रसारित मुस्लिम मुल्तानी लौहार (बढ़ई) बिरादरी की क़ौमी समाचार पत्रिका, न्यूज़ पोर्टल और यूट्यूब चैनल “मुल्तानी समाज” के लिए कस्बा बड़ौत, ज़िला बागपत, उत्तर प्रदेश डेस्क से अली हसन मुल्तानी का विशेष लेख।

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