Thursday, October 8, 2026

बिरादरी की ख़िदमत के नाम पर किसी दूसरी तंजीम के प्रोजेक्ट और परंपरागत कार्यक्रमों की नकल आख़िर कब तक?

ज़मीर आलम मुल्तानी की पुरअसर अपील—तमाम तंजीमें अपनी पहचान, अपने प्रोजेक्ट और अपने नाम से काम करें; बिरादरी को गुमराह करने के बजाय इत्तेहाद और भाईचारे को फ़रोग़ दें

“किसी तंजीम की मुख़ालफ़त हमारा मक़सद नहीं, लेकिन किसी दूसरी तंजीम की मेहनत, पहचान और परंपरागत कार्यक्रमों को अपना बताकर बिरादरी के सामने पेश करना किसी भी सूरत में मुनासिब नहीं।”

शामली, उत्तर प्रदेश। पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी की सामाजिक, तंजीमी और फ़लाही सरगर्मियों के बीच मुल्तानी समाज चैरिटेबल ट्रस्ट के फाउंडर एवं सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार से पंजीकृत राष्ट्रीय समाचार पत्रिका “मुल्तानी समाज” के प्रधान संपादक ज़मीर आलम मुल्तानी ने मुल्क भर की बिरादरी की तमाम तंजीमों, सोसाइटियों, अंजुमनों और उनके ज़िम्मेदार ओहदेदारों के नाम एक ख़ास और अहम अपील जारी की है।

उन्होंने कहा कि मुल्तानी समाज चैरिटेबल ट्रस्ट को मुल्क के किसी भी सूबे, ज़िले, शहर या क़स्बे से संचालित होने वाली किसी भी तंजीम, सोसाइटी या कमेटी से कोई व्यक्तिगत गिला-शिकवा नहीं है। बिरादरी की ख़िदमत करने वाली हर तंजीम का अपना मुक़ाम, अपनी पहचान और अपनी अहमियत है। हमारी दिली ख़्वाहिश है कि बिरादरी की तमाम तंजीमें तरक़्क़ी करें, समाज के बच्चों की तालीम, नौजवानों की रहनुमाई, ज़रूरतमंदों की मदद, आपसी इत्तेहाद और सामाजिक बेहतरी के लिए बढ़-चढ़कर काम करें।

लेकिन अफ़सोस उस रवैये पर है, जिसमें कुछ ज़िम्मेदार अफ़राद अपनी ज़ाती ज़िद, ग़लतफ़हमी या तंजीमी बरतरी के तसव्वुर में दूसरी तंजीमों की मेहनत और उनकी पुरानी पहचान को नज़रअंदाज़ करते हुए उनके परंपरागत कार्यक्रमों, ख़ास नामों और प्रोजेक्ट्स से मिलते-जुलते नाम अपनाकर उन्हें अपनी नई पहल के तौर पर पेश करने की कोशिश करते हैं। ऐसे रवैये से बिरादरी में ग़लतफ़हमियां पैदा होती हैं, आपसी एतमाद को ठेस पहुंचती है और इत्तेहाद के बजाय इख़्तिलाफ़ात को बढ़ावा मिलता है।

तंजीमों के ज़िम्मेदार याद रखें—बिरादरी का एतमाद एक बड़ी अमानत है

ज़मीर आलम मुल्तानी ने ख़ास तौर पर पश्चिमी उत्तर प्रदेश समेत मुल्क के मुख़्तलिफ़ इलाक़ों में काम करने वाली तंजीमों के ज़िम्मेदारों से मुख़ातिब होते हुए कहा कि आप चाहे अपने संगठन को तंजीम कहें, सोसाइटी कहें या अंजुमन, आपके साथ जुड़ा हुआ हर फ़र्द आपकी बातों और आपके दावों पर एतमाद करता है। वह आपको बिरादरी का ख़ैरख़्वाह समझकर आपकी आवाज़ पर साथ खड़ा होता है। लिहाज़ा यह एतमाद आपके लिए सिर्फ़ ताक़त नहीं, बल्कि एक बड़ी अमानत और जवाबदेही भी है।

बिरादरी के कुछ सौ अफ़राद का किसी सदर या कमेटी के साथ खड़ा हो जाना इस बात की दलील नहीं कि अब हर फ़ैसला सही है या किसी दूसरी तंजीम के काम को नज़रअंदाज़ किया जा सकता है। असल क़ाबिलियत यह नहीं कि कितने लोग आपकी आवाज़ पर जमा हो जाते हैं, बल्कि यह है कि आप कितने लोगों के हक़, इज़्ज़त और जज़्बात का एहतराम करते हैं।

बिरादरी की रहनुमाई का हक़ उसी को ज़ेब देता है जो अपने किरदार, अमल, सच्चाई और इंसाफ़ से लोगों का एतमाद क़ायम रखे।

दूसरी तंजीम के प्रोजेक्ट की नकल से अपनी पहचान क़ायम नहीं की जा सकती

प्रधान संपादक ज़मीर आलम मुल्तानी ने कहा कि हर तंजीम को अपनी सोच के मुताबिक़ नए प्रोजेक्ट शुरू करने, अपने सामाजिक और फ़लाही कार्यक्रम आयोजित करने तथा बिरादरी की बेहतरी के लिए काम करने का पूरा हक़ है। हम किसी भी तंजीम की जायज़ सरगर्मियों के ख़िलाफ़ नहीं हैं और न ही किसी को बिरादरी की ख़िदमत करने से रोकना चाहते हैं।

लेकिन अगर कोई तंजीम किसी दूसरी तंजीम के पहले से जारी प्रोजेक्ट, उसकी पहचान से जुड़े नाम या उसके परंपरागत कार्यक्रम की नक़ल करके उसे अपनी नई पहल के तौर पर पेश करती है, तो इस पर सवाल उठना लाज़िमी है। किसी दूसरे के काम से मुतास्सिर होकर बेहतर काम करना और बात है, लेकिन किसी की मेहनत, पहचान या परंपरा को इस तरह अपनाना कि लोगों के सामने असल और नक़ल का फ़र्क़ ही मिट जाए, बिल्कुल दूसरी बात है।

किसी भी प्रोजेक्ट की असलियत और उसके इस्तेमाल के बारे में बात करते समय तारीख़, दस्तावेज़, पुराने रिकॉर्ड, प्रकाशित ख़बरों, तस्वीरों, वीडियो और दूसरे भरोसेमंद सबूतों को अहमियत दी जानी चाहिए। महज़ बड़े दावों, भीड़ या बार-बार किसी बात को दोहराने से कोई दावा हक़ीक़त नहीं बन जाता।

ज़मीर आलम मुल्तानी ने कहा कि बिरादरी के लोग आज शायद किसी के दावे पर भरोसा करके उसके साथ खड़े हों, लेकिन जब कभी उनके सामने तमाम हक़ाइक़ और दस्तावेज़ात आएंगे, तो वह ख़ुद फ़ैसला करने की सलाहियत रखते हैं। इसलिए किसी को भी यह ग़लतफ़हमी नहीं पालनी चाहिए कि चंद दिनों, महीनों या कुछ सालों तक लोगों को किसी बात पर यक़ीन दिलाकर हमेशा के लिए हक़ीक़त को छिपाया जा सकता है।

परंपरागत कार्यक्रमों की पहचान का एहतराम करें

उन्होंने कहा कि बिरादरी में हर तंजीम को अपने परंपरागत कार्यक्रम आयोजित करने, अपनी सालगिरह मनाने और अपनी सामाजिक पहचान को मज़बूत करने का हक़ हासिल है। लेकिन किसी दूसरी तंजीम के पहले से स्थापित कार्यक्रम या उससे जुड़े नाम को लेकर ऐसा अंदाज़ अपनाना, जिससे बिरादरी के लोगों में असल आयोजक, कार्यक्रम की परंपरा या उसकी पहचान को लेकर ग़लतफ़हमी पैदा हो, किसी भी ज़िम्मेदाराना रवैये के मुताबिक़ नहीं है।

ख़ास तौर पर जब किसी कार्यक्रम का नाम किसी तंजीम की कई सालों की मेहनत, लगातार सरगर्मियों और पुराने रिकॉर्ड से जुड़ा हो, तो उसका इस्तेमाल करने से पहले तमाम पहलुओं पर संजीदगी से ग़ौर करना चाहिए। किसी नाम या प्रोजेक्ट को लेकर तना-तनी पैदा करने के बजाय बातचीत, दस्तावेज़ी हक़ाइक़ और आपसी मशविरे के ज़रिए मसले का हल तलाश करना चाहिए।

हमारी अपील है कि बिरादरी की तमाम तंजीमें अपने-अपने प्रोजेक्ट शुरू करें, नए नाम रखें, नए सामाजिक कार्यक्रम आयोजित करें और ऐसे काम करें जिन पर पूरी बिरादरी फ़ख़्र कर सके। लेकिन किसी दूसरी तंजीम की मेहनत और पहचान को नज़रअंदाज़ करके अपनी कामयाबी का रास्ता तलाश करने से गुरेज़ करें।

झूठे दावों और ज़िद के बजाय सच्चाई और जवाबदेही को अपनाएं

ज़मीर आलम मुल्तानी ने कहा कि किसी भी तंजीम के सदर, सरपरस्त, ओहदेदार या कमेटी के सदस्य को अपनी ज़िम्मेदारी का एहसास होना चाहिए। ओहदा मिलने के बाद इंसान की जवाबदेही कम नहीं, बल्कि और बढ़ जाती है। बिरादरी के लोगों की रहनुमाई करने वालों को चाहिए कि वह अपनी ज़बान, अपने दावों और अपने अमल में एहतियात बरतें।

अगर किसी प्रोजेक्ट, कार्यक्रम या नाम को लेकर इख़्तिलाफ़ पैदा हो गया है, तो उसे ज़ाती अनबन, तंजीमी दुश्मनी या बिरादरी की तक़सीम का ज़रिया बनाने के बजाय बातचीत और वसातत से हल किया जाए। अगर किसी से ग़लती हुई है, तो उसे अपनी ग़लती तस्लीम करने और ज़रूरत पड़ने पर सार्वजनिक तौर पर माफ़ी मांगने में देर नहीं करनी चाहिए। अपनी इस्लाह करना कमज़ोरी नहीं, बल्कि अच्छे किरदार और बुलंद ज़र्फ़ की निशानी है।

याद रखिए, लोगों का एतमाद हासिल करने में बरसों लगते हैं, लेकिन उसे खोने के लिए कभी-कभी एक ग़लत फ़ैसला ही काफ़ी होता है।

जो लोग आज अपने साथ खड़े अफ़राद की तादाद देखकर ख़ुद को जवाबदेही से ऊपर समझने लगते हैं, उन्हें यह भी याद रखना चाहिए कि वक़्त हमेशा एक जैसा नहीं रहता। आज के हमनवा कल सवाल भी कर सकते हैं। इसलिए भीड़ की ताक़त पर नाज़ करने के बजाय अपने किरदार, सच्चाई और इंसाफ़ पर भरोसा करना चाहिए।

इस्लामी तालीमात हमें इत्तेहाद, अमानतदारी और हुस्ने-अख़लाक़ का सबक़ देती हैं

हमारा ताल्लुक़ एक ऐसी बिरादरी से है जिसकी सामाजिक पहचान, पारिवारिक रिश्ते और आपसी मेल-जोल हमारे लिए बहुत अहमियत रखते हैं। इस्लामी तालीमात भी सच बोलने, अमानत की हिफ़ाज़त करने, इंसाफ़ करने और दूसरों के हुक़ूक़ का एहतराम करने की तालीम देती हैं।

ऐसे में हमारी ज़िम्मेदारी और भी बढ़ जाती है कि हम अपने तंजीमी इख़्तिलाफ़ात को बिरादरी के आपसी रिश्तों पर हावी न होने दें। सदर, सरपरस्त, कमेटी के सदस्य और समाज के दूसरे ज़िम्मेदार अफ़राद अपने किरदार से मिसाल क़ायम करें। एक-दूसरे की मेहनत का एहतराम करें, किसी के बारे में बेबुनियाद बातें फैलाने से बचें और हर मसले को सच्चाई तथा इंसाफ़ की बुनियाद पर देखें।

बिरादरी की तरक़्क़ी किसी एक तंजीम की कामयाबी तक महदूद नहीं है। जब मुख़्तलिफ़ तंजीमें तालीम, रोज़गार, फ़लाह, नौजवानों की रहनुमाई और समाजी इस्लाह के लिए अपने-अपने दायरे में काम करेंगी, तभी हमारी बिरादरी मज़बूत होगी।

हमारी कोशिश किसी तंजीम को नीचा दिखाना नहीं, बल्कि ऐसे रवैयों की निशानदेही करना है जो बिरादरी के एतमाद और इत्तेहाद को नुक़सान पहुंचा सकते हैं।

तमाम तंजीमों के ज़िम्मेदारों से हमारी पुरख़ुलूस अपील

मुल्क भर की तमाम तंजीमों, सोसाइटियों, अंजुमनों, सदूर, सरपरस्तों और कमेटियों के ज़िम्मेदारों से गुज़ारिश है कि वह इन बातों पर संजीदगी से ग़ौर करें:

  1. अपनी तंजीम के नाम, पहचान और काम को अपनी मेहनत से आगे बढ़ाएं।
  2. दूसरी तंजीमों के परंपरागत कार्यक्रमों और प्रोजेक्ट्स से जुड़े नामों का इस्तेमाल करते वक़्त उनके पुराने रिकॉर्ड, पहचान और संभावित ग़लतफ़हमी को ध्यान में रखें।
  3. बिरादरी के लोगों को किसी प्रोजेक्ट या कार्यक्रम की तारीख़, शुरुआत, इतिहास और आयोजक के बारे में ग़लत जानकारी न दें।
  4. किसी भी इख़्तिलाफ़ को ज़ाती दुश्मनी या तंजीमी टकराव में तब्दील न होने दें।
  5. अगर किसी नाम या प्रोजेक्ट को लेकर एतराज़ सामने आए, तो उसे नज़रअंदाज़ करने के बजाय बातचीत और दस्तावेज़ी हक़ाइक़ के ज़रिए हल करें।
  6. अगर किसी की पहचान या मेहनत के बारे में ग़लत दावा हुआ हो, तो उसकी वज़ाहत करें और ज़रूरत पड़ने पर सार्वजनिक तौर पर माफ़ी मांगें।
  7. बिरादरी के नौजवानों को तंजीमी नफ़रत के बजाय इल्म, तालीम, रोज़गार, ख़िदमत और आपसी इत्तेहाद की राह दिखाएं।

हम तमाम तंजीमों को अपना समझते हैं और चाहते हैं कि हर तंजीम तरक़्क़ी करे। मगर तरक़्क़ी का रास्ता किसी दूसरे की पहचान को कमज़ोर करके नहीं, बल्कि अपने किरदार और काम को मज़बूत बनाकर तय किया जाना चाहिए।

आख़िरी गुज़ारिश—अल्लाह से डरें, हक़ का एहतराम करें और बिरादरी को जोड़ें

ज़मीर आलम मुल्तानी ने अपनी अपील के इख़्तिताम पर कहा कि बिरादरी की ख़िदमत का दावा करने वाले हर शख़्स को अपने दिल में यह सवाल ज़रूर करना चाहिए कि क्या उसके अमल से बिरादरी जुड़ रही है या बिखर रही है? क्या उसकी कोशिशों से लोगों का एतमाद बढ़ रहा है या कम हो रहा है? और क्या वह दूसरों की मेहनत का एहतराम कर रहा है या अपनी पहचान बनाने के लिए उनके काम को नज़रअंदाज़ कर रहा है?

हम किसी भी तंजीम के ख़िलाफ़ नहीं हैं। हमारा मक़सद सिर्फ़ यह है कि बिरादरी के तमाम इदारों के दरमियान एहतराम, इंसाफ़, एतमाद और भाईचारा क़ायम रहे। जो भी तंजीम अच्छे काम कर रही है, उसे आगे बढ़ना चाहिए। जो नए प्रोजेक्ट शुरू करना चाहती है, उसे शुरू करने चाहिए। लेकिन हर किसी को अपनी पहचान और अपनी मेहनत के साथ आगे बढ़ना चाहिए।

अल्लाह तआला हम सबको सच बोलने, अमानतदारी के साथ काम करने, दूसरों के हुक़ूक़ का एहतराम करने और बिरादरी की बेहतरी के लिए मिल-जुलकर कोशिश करने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए। आमीन।

आख़िर में बस इतना ही कहना है कि समझदारों के लिए इशारा काफ़ी है। वक़्त रहते अपनी इस्लाह कर लेना ही बेहतर है। बिरादरी किसी एक शख़्स, सदर या कमेटी की जागीर नहीं, बल्कि हम सबकी साझा अमानत है। इसकी इज़्ज़त, एकता और आने वाली नस्लों के मुस्तक़बिल की हिफ़ाज़त करना हम सबकी सामूहिक ज़िम्मेदारी है।

जारीकर्ता:
ज़मीर आलम मुल्तानी
फाउंडर, मुल्तानी समाज चैरिटेबल ट्रस्ट
प्रधान संपादक, “मुल्तानी समाज” राष्ट्रीय समाचार पत्रिका

विशेष रिपोर्ट — उत्तर प्रदेश डेस्क

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार से पंजीकृत तथा नई दिल्ली से प्रसारित “मुल्तानी समाज” राष्ट्रीय समाचार पत्रिका, न्यूज़ पोर्टल एवं यूट्यूब चैनल।


अपनी ख़बर, तहरीर और पैग़ाम क़ौमी सतह पर प्रकाशित कराएं

अगर आप भी अपनी ख़बर, मज़मून (आर्टिकल), पैग़ाम, मुबारकबाद, ताज़ियती इश्तिहार, दिलचस्प वाक़ियात, तहरीर, अफ़साना (कहानी) या अपने कारोबार का विज्ञापन क़ौमी सतह पर शाया या प्रसारित करवाना चाहते हैं, तो नीचे दिए गए नंबरों पर राब्ता फ़रमाएं।

📞 9410652990
📞 8010884848

आपका एतमाद ही हमारी सबसे बड़ी ताक़त है।

“मुल्तानी समाज” — अपनी बिरादरी की आवाज़, अपनी पहचान।

Tuesday, October 6, 2026

अपनी तारीख़ से दूर होती क़ौम और मिटती हुई पहचान

“जिस क़ौम को अपनी तारीख़ याद नहीं रहती, उसकी पहचान भी धीरे-धीरे धुंधली पड़ जाती है”

एक सोच… एक बिरादरी… एक तारीख़ — क्या हमारी अपनी कोई तारीख़ नहीं होनी चाहिए?

आज यह सवाल सिर्फ़ एक शख़्स का नहीं, बल्कि पूरी क़ौम और बिरादरी के सामने खड़ा है।

बड़े अफ़सोस और गहरे ग़म के साथ यह कहना पड़ता है कि आज हमारी क़ौम के बीच दीनी, सामाजिक और तारीखी मालूमात का वह सिलसिला कमज़ोर होता जा रहा है, जो कभी हमारी पहचान और हमारी नस्लों के लिए रहनुमाई का ज़रिया हुआ करता था।

हमारी नई नस्ल को अपने बुज़ुर्गों के कारनामों का पूरा इल्म नहीं, अपनी बिरादरी के दस्तकारों और फ़नकारों की तारीख़ का पूरा पता नहीं और कई बार तो हमें अपने ही अतीत के उन रोशन बाबों का इल्म नहीं होता, जिन पर हमें फ़ख़्र करना चाहिए।

दूसरी तरफ़ हम देखते हैं कि मुख़्तलिफ़ क़ौमें और बिरादरियाँ अपनी तारीखी, मज़हबी और सांस्कृतिक तारीख़ों को याद रखती हैं, उन्हें अपनी नई नस्ल तक पहुँचाती हैं और बड़े एहतराम के साथ अपनी रवायतों को ज़िंदा रखती हैं।

तो फिर सवाल पैदा होता है—

क्या हम अपनी तारीख़ भूलते जा रहे हैं?

क्या हमारी आने वाली नस्लें यह जान पाएँगी कि मुस्लिम मुल्तानी लौहार-बढ़ई बिरादरी कौन है?

हमारे बुज़ुर्ग कौन थे?

हमारे दस्तकार कौन थे?

उन्होंने मुल्क और समाज की तरक़्क़ी में क्या किरदार अदा किया?

उनके हुनर ने गाँवों, किसानों, खेतों, कारख़ानों और आम ज़िंदगी को किस तरह आसान बनाया?

अगर हम आज इन सवालों के जवाब दर्ज नहीं करेंगे तो कल हमारी नस्लें जवाब कहाँ से तलाश करेंगी?

तारीख़ सिर्फ़ तारीख़ नहीं होती, यह किसी क़ौम का बायोडाटा होती है

हर क़ौम और बिरादरी के पास अपनी एक तारीख़ होती है। तारीख़ सिर्फ़ साल, महीना और दिन लिख देने का नाम नहीं, बल्कि यह उन लोगों की मेहनत, क़ुर्बानी, हुनर, फ़न, ख़िदमत और जद्दोजहद का आईना होती है जिन्होंने उस क़ौम को पहचान दी।

इसीलिए अपनी तारीख़ को महफ़ूज़ करना कोई फ़ख़्र-ए-फ़िज़ूल नहीं, बल्कि आने वाली नस्लों के प्रति हमारी ज़िम्मेदारी है।

हमें अपने बच्चों को यह बताना होगा कि उनके बुज़ुर्ग सिर्फ़ रोज़गार करने वाले लोग नहीं थे, बल्कि अपने फ़न और दस्तकारी के ज़रिए मुल्क की तरक़्क़ी में हिस्सा लेने वाले मेहनतकश, हुनरमंद और वतनपरस्त लोग थे।

मुस्लिम मुल्तानी लौहार-बढ़ई बिरादरी किसी नाम की मोहताज नहीं

हमें डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम साहब की शख़्सियत पर फ़ख़्र है। वह मुल्क के महान वैज्ञानिक, क़ाबिल इंसान और नौजवानों के लिए प्रेरणा का स्रोत रहे।

लेकिन अपनी बिरादरी की पहचान बनाने के लिए हमें किसी बाहरी शख़्सियत के नाम का सहारा लेने की ज़रूरत नहीं।

हमारी अपनी तारीख़ है।

हमारे अपने बुज़ुर्ग हैं।

हमारे अपने दस्तकार हैं।

हमारे अपने फ़नकार हैं।

हमारी अपनी मेहनत और हमारी अपनी पहचान है।

अगर डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम साहब ने मुल्क की हिफ़ाज़त और तरक़्क़ी के लिए मिसाइलों के निर्माण में अहम किरदार अदा किया, तो हमारी मुस्लिम मुल्तानी लौहार-बढ़ई बिरादरी के मेहनतकश दस्तकारों ने भी सदियों से मुल्क के किसानों और आम आदमी के लिए कृषि यंत्र, औज़ार, मशीनों के पुर्ज़े और ज़रूरत की अनेक चीज़ें तैयार की हैं।

हुनर हमारी पहचान है, दस्तकारी हमारी विरासत है और मेहनत हमारी तारीख़ है।

इस तारीख़ को लिखना, सँवारना और आने वाली नस्लों तक पहुँचाना हमारा फ़र्ज़ है।

एक सोच… एक बिरादरी… एक तारीख़

हमारा मानना है कि मुस्लिम मुल्तानी लौहार-बढ़ई बिरादरी की एक ऐसी तारीखी पहचान ज़रूर होनी चाहिए, जिससे देश-दुनिया में हमारी बिरादरी का बच्चा-बच्चा अपने अतीत से वाक़िफ़ हो सके।

हमारी बिरादरी को किसी दूसरे नाम की बैसाखी की ज़रूरत नहीं।

हमें अपनी पहचान ख़ुद बनानी है।

अपनी तारीख़ ख़ुद लिखनी है।

अपने बुज़ुर्गों के कारनामे ख़ुद दर्ज करने हैं।

और अपनी आने वाली नस्ल को यह बताना है कि—

हम कौन थे, हम कौन हैं और हम आने वाले कल में क्या बनना चाहते हैं।

मुल्तानी डे — तारीख़ को ज़िंदा रखने की एक कोशिश

इसी सिलसिले में 12 नवंबर को “मुल्तानी डे” मनाने की कोशिश को देखा जाना चाहिए।

अगर पिछले लगभग 15 वर्षों से ज़मीर आलम साहब (गढ़ी पुख्ता) शामली, उत्तर प्रदेश वाले बिरादरी के बीच 12 नवंबर को “मुल्तानी डे” के रूप में एक तारीखी पहचान को आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं, तो इस कोशिश को किसी शख़्स की निजी कामयाबी या नाकामी के बजाय बिरादरी की तारीखी पहचान के एक प्रयास के तौर पर देखना चाहिए।

बिरादरी के अंदर राय का इख़्तिलाफ़ हो सकता है।

तरीक़े अलग हो सकते हैं।

सोच अलग हो सकती है।

मगर मक़सद अगर अपनी बिरादरी की तारीख़ और पहचान को ज़िंदा रखना है, तो ऐसे प्रयासों पर बातचीत होनी चाहिए, बहस होनी चाहिए और बेहतर रास्ता तलाश किया जाना चाहिए।

कंपीटिशन हो, मगर बिरादरी की तरक़्क़ी के लिए

कंपीटिशन अपनी जगह बुरा नहीं।

बल्कि स्वस्थ और सकारात्मक कंपीटिशन बिरादरी के लिए फ़ायदेमंद हो सकता है।

अगर 12 नवंबर को एक बिरादरी अपने-अपने शहरों, कस्बों और गाँवों में “मुल्तानी डे” मनाती है और 13 नवंबर को अपने-अपने कार्यक्रमों की ख़बरें प्रकाशित करती है, तो इससे पूरी दुनिया को यह संदेश जाएगा कि—

मुस्लिम मुल्तानी लौहार-बढ़ई बिरादरी की भी अपनी एक तारीख़ है, अपनी एक पहचान है और अपनी एक तारीखी विरासत है।

जिसने जहाँ तक काम किया है, उसे सामने आना चाहिए।

जिसने जितनी मेहनत की है, उसकी क़द्र होनी चाहिए।

जिसने अपनी बिरादरी के लिए कोई ख़िदमत की है, उसका नाम तारीख़ में दर्ज होना चाहिए।

क्योंकि तारीख़ किसी एक शख़्स की जागीर नहीं होती।

तारीख़ पूरी क़ौम की अमानत होती है।

हमारी गुज़ारिश सिर्फ़ इतनी है…

हम तमाम मुस्लिम मुल्तानी लौहार-बढ़ई बिरादराने वतन से गुज़ारिश करते हैं कि अपनी हैसियत, अपने इलाक़े और अपने हालात के मुताबिक़ 12 नवंबर को “मुल्तानी डे” मनाने की कोशिश करें।

अपने बुज़ुर्गों को याद करें।

अपने बच्चों को अपनी बिरादरी की तारीख़ बताएं।

अपने हुनरमंदों और दस्तकारों को सम्मान दें।

अपनी पुरानी तस्वीरें, दस्तावेज़, किताबें, अख़बारों की ख़बरें और बुज़ुर्गों की यादों को महफ़ूज़ करें।

क्योंकि हो सकता है कि आज हमारे पास मौजूद एक पुरानी तस्वीर या एक छोटा-सा काग़ज़ आने वाली नस्लों के लिए पूरी तारीख़ का सबसे बड़ा सबूत बन जाए।

हमारी मेहनत ज़ाया नहीं होनी चाहिए।

हमारे बुज़ुर्गों के नाम गुम नहीं होने चाहिए।

हमारी बिरादरी का बायोडाटा मिटना नहीं चाहिए।

और हमारी आने वाली नस्लें अपनी पहचान के लिए दूसरों की तरफ़ देखने पर मजबूर न हों।

अपनी पहचान ख़ुद लिखिए।
अपनी तारीख़ ख़ुद बचाइए।
अपनी नस्ल को अपना बायोडाटा ख़ुद दीजिए।

यही वक़्त की आवाज़ है।

यही हमारी ज़िम्मेदारी है।

और शायद यही आने वाली नस्लों के लिए हमारी सबसे बड़ी विरासत भी होगी।

एक सोच…
एक बिरादरी…
एक तारीख़…
और अपनी एक मुकम्मल पहचान।

इंशाअल्लाह।


लेखक परिचय

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार से पंजीकृत, मुल्क की राजधानी नई दिल्ली से प्रकाशित/प्रसारित मुस्लिम मुल्तानी लौहार (बढ़ई) बिरादरी की क़ौमी समाचार पत्रिका, न्यूज़ पोर्टल और यूट्यूब चैनल “मुल्तानी समाज” के लिए कस्बा बड़ौत, ज़िला बागपत, उत्तर प्रदेश डेस्क से अली हसन मुल्तानी का विशेष लेख।

अपनी ख़बर, मज़मून और पैग़ाम हमें भेजें

अगर आप भी अपनी ख़बर, मज़मून (आर्टिकल), पैग़ाम, मुबारकबाद, ताज़ियती इश्तिहार, दिलचस्प वाक़ियात, तहरीर, अफ़साना (कहानी) या अपने कारोबार का इश्तिहार (विज्ञापन) क़ौमी सतह पर शाया या प्रसारित करवाना चाहते हैं, तो बराए मेहरबानी राब्ता फ़रमाएँ।

📞 9410652990
📞 8010884848

आपका एतमाद ही हमारी सबसे बड़ी ताक़त है।

“मुल्तानी समाज”

अपनी बिरादरी की आवाज़ — अपनी तारीख़, अपनी पहचान।

🌹 अक़्द-ए-मसनून की पुरनूर महफ़िल 🌹

अब्दुल गफ्फार पँवार की साहबज़ादी नूर चश्मी आलेमा नूर का निकाह 6 नवंबर को अजमेर शरीफ़ में

बज़्म-ए-निशात में सजेगी खुशियों की महफ़िल, मुल्तानी लोहार बिरादरी के अज़ीज़ो-अक़ारिब को शिरकत की दावत

अजमेर शरीफ़।
मुन्तज़िरे-चश्म भी, क़ल्ब भी, जान भी है,
आपके आने की हसरत भी है, अरमान भी है।

अल्हम्दुलिल्लाह! बफ़ज़्ले रब्बे-करीम और रहमतुल्लिल-आलमीन हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा ﷺ के सदक़े से खुशियों का एक पुरनूर मौक़ा दस्तक दे रहा है। हमारे हरदिल-अज़ीज़ भाई जनाब अब्दुल गफ्फार पँवार, अजमेर शरीफ़ की साहबज़ादी नूर चश्मी आलेमा नूर सलमहल्लाह का अक़्द-ए-मसनून, इंशाअल्लाह, बड़ी खुशी और दुआओं के माहौल में होने जा रहा है।

इस मुबारक मौक़े पर नूर चश्म मुहम्मद उमैर सलमहू, साहिबज़ादा हाजी सरफराज हुसैन साहब, होटल वाले, इंदौर के साथ निकाह की यह पुरमसर्रत तक़रीब आयोजित की जा रही है।

इस खुशी के मौक़े पर तमाम अज़ीज़ो-अक़ारिब, दोस्तों, अहबाब और मुस्लिम मुल्तानी लोहार बिरादरी के हज़रात की शिरकत मेज़बान ख़ानदान के लिए न सिर्फ़ बाइसे-फ़ख़्र बल्कि बाइसे-मसर्रत भी होगी।

🌹 रसम-ए-हल्दी

31 अक्टूबर 2026, बरोज़ शनिवार
बाद नमाज़-ए-असर

💐 हार-फूल व तआम

4 नवंबर 2026, बरोज़ बुधवार
बाद नमाज़-ए-असर

बमुक़ाम: सकीना पैलेस, अंदरकोट, अजमेर शरीफ़

🌹 तक़रीब-ए-निकाह — 6 नवंबर 2026

बरोज़ जुमा, मुताबिक़ 25 जमादी-उल-अव्वल 1448 हिजरी

💐 इस्तक़बाल-ए-बारात: बाद नमाज़-ए-असर
💐 अक़्द-ए-मसनून: बाद नमाज़-ए-मग़रिब
🌹 दावत-ए-तआम: बाद-अज़-निकाह

बमुक़ाम: अजमेर बाग, फाई सागर रोड, अजमेर शरीफ़

इस पुरमसर्रत मौक़े पर तमाम हज़रात से गुज़ारिश है कि अपनी मसरूफ़ियात में से वक़्त निकालकर इस मुबारक तक़रीब में शिरकत फ़रमाएँ और नवविवाहित जोड़े को अपनी ख़ुलूस भरी दुआओं से नवाज़ें। आपकी आमद हमारे लिए इज़्ज़त, आपकी दुआ हमारे लिए सबसे क़ीमती तोहफ़ा और आपकी ख़िदमत का मौक़ा हमारे लिए बाइसे-सआदत होगा।

🌹 अद्दाईयान

नूर मोहम्मद, शकील अहमद, अहमद नूर, अब्दुल जब्बार, अब्दुल खालिक, मुहम्मद रफ़ीक
पँवार अजमेर वाले

🌹 अल-मुकल्लफ़ीन

फ़ज़लुर्रहमान, निज़ामुद्दीन, फ़ख़रुद्दीन, अब्दुल समद, अब्दुल बारी, अल्ताफ़ हुसैन, अब्दुल अज़ीज़, अब्दुल गफ्फार
व जुमला अज़ीज़ो-अक़ारिब, मुल्तानी लोहार

🌹 मुंतज़िरीन-ए-आमद

मोहम्मद अली, शब्बीर अहमद, मोहम्मद हुसैन, नबी अहमद, ज़ाकिर हुसैन, शाकिर हुसैन, मोहम्मद इम्तियाज़, मोहम्मद मुज़म्मिल, मोहम्मद मुदस्सिर, मोहम्मद उवेस, मोहम्मद दानिश, मोहम्मद अयान, मोहम्मद उबैद, अबूबकर एवं अली हमज़ा।

अब्दुल गफ्फार मुल्तानी लोहार
वल्द मरहूम हाजी अब्दुल करीम साहब

पता: सकीना पैलेस, नई सड़क, अंदरकोट, अजमेर शरीफ़

राब्ता: 9828684855, 9414017861, 9928574786, 9783928345


🌹 दूल्हा-दुल्हन के लिए दुआ

अल्लाह तआला इस पाकीज़ा रिश्ते को अपनी रहमतों और बरकतों से मालामाल फ़रमाए, दोनों को एक-दूसरे के लिए सुकून, मोहब्बत और वफ़ा का ज़रिया बनाए तथा इनके घर को ख़ुशियों, बरकतों और नेमतों से आबाद फ़रमाए।

बारकल्लाहु लकुमा व बारका अलैकुमा व जमअा बैनकुमा फी ख़ैर।

अल्लाह रब्बुल-इज़्ज़त इस नए सफ़र को ख़ैर, आफ़ियत और कामयाबी से हमकिनार फ़रमाए। आमीन या रब्बल-आलमीन। 🤲


📰 मुल्तानी समाज — अपनी बिरादरी की आवाज़, अपनी पहचान

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार से पंजीकृत तथा देश की राजधानी नई दिल्ली से प्रसारित मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी की क़ौमी समाचार पत्रिका, न्यूज़ पोर्टल और यूट्यूब चैनल "मुल्तानी समाज" के लिए राजस्थान डेस्क से प्रधान संपादक ज़मीर आलम की ख़ास रिपोर्ट।

अगर आप भी अपनी ख़बर, मज़मून (आर्टिकल), पैग़ाम, मुबारकबाद, ताज़ियती इश्तिहार, दिलचस्प वाक़ियात, तहरीर, अफ़साना या कारोबार का इश्तिहार क़ौमी सतह पर शाया या प्रसारित करवाना चाहते हैं, तो राब्ता फ़रमाएँ।

📞 9410652990
📞 8010884848

आपका एतमाद ही हमारी सबसे बड़ी ताक़त है।

🌹 "मुल्तानी समाज" — अपनी बिरादरी की आवाज़, अपनी पहचान। 🌹

दीन अपनी जगह मुकम्मल, दुनियावी मामलात अपनी जगह

‘मुल्तानी-डे’ को लेकर जारी बहस पर ज़मीर आलम की दो टूक—हर दुनियावी मामले को मज़हब से जोड़कर देखना मुनासिब नहीं

नई - दिल्ली 
दीन-ए-इस्लाम, शरीयत और मज़हबी उसूल अपनी जगह मुकम्मल और मोअज़्ज़म हैं। उनमें किसी भी तरह की तब्दीली, तहरीफ़ या मनमानी की न तो गुंजाइश है और न ही ऐसा किया जाना चाहिए। वहीं दुनियावी ज़िंदगी के मामलात, सामाजिक रिश्ते, बिरादरी की गतिविधियां, तालीमी व इज्तिमाई प्रोग्राम और खुशी के मौके मनाने के तौर-तरीके अलग-अलग हो सकते हैं। इसलिए हर दुनियावी मामले को सीधे दीन और मज़हब से जोड़कर देखना भी मुनासिब नहीं।

इन दिनों मुस्लिम मुल्तानी लोहार-बढ़ई बिरादरी में जश्न-ए “मुल्तानी-डे” को लेकर बहस छिड़ी हुई है। इसी सिलसिले में बिरादरी के एक फर्द की करीब नौ मिनट की ऑडियो सामने आई, जिसमें उन्होंने ‘मुल्तानी-डे’ के आयोजन को मज़हब और दीन से जोड़ते हुए आयोजकों के इस्लाम के साथ छेड़छाड़ करने तक की बात कही और दारुल उलूम का हवाला भी दिया।

इस संबंध में ज़मीर आलम ने कहा कि दीन और दुनियावी मामलात के बीच फर्क को समझना बेहद ज़रूरी है। उन्होंने कहा कि हर मसले को दीन के आईने से देखना और हर सामाजिक गतिविधि को मज़हबी मामला बना देना सही रवैया नहीं है। अगर किसी कार्यक्रम में कोई ऐसा अमल हो जो शरीयत के खिलाफ हो, तो उस पर एहतिसाब और इस्लाही बातचीत जरूर होनी चाहिए, लेकिन उससे पहले यह मालूम करना भी जरूरी है कि असल कार्यक्रम की हक़ीक़त और मकसद क्या है।

हमारे बुज़ुर्गों ने जो नहीं किया, क्या हम वह सब छोड़ दें?

अक्सर यह दलील दी जाती है कि हमारे बुज़ुर्गों ने ऐसा नहीं किया, इसलिए हमें भी नहीं करना चाहिए। इस पर गौर करने की जरूरत है कि हमारे बुज़ुर्गों के दौर और आज के दौर में जमीन-आसमान का फर्क है।

हमारे बुज़ुर्गों ने डिजिटल दुनिया नहीं देखी थी। उनके दौर में मोबाइल फोन, इंटरनेट, लैपटॉप और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसी तकनीकें मौजूद नहीं थीं। हवाई जहाज का सफर भी आम ज़िंदगी का हिस्सा नहीं था। तो क्या आज हम इन तमाम दुनियावी सहूलियतों से सिर्फ इसलिए किनारा कर लें कि हमारे बुज़ुर्गों ने इनका इस्तेमाल नहीं किया?

बेशक, दीन के उसूल अपनी जगह अटल हैं, लेकिन दुनियावी ज़िंदगी लगातार बदलती रहती है। इसलिए दीन और दुनिया के दायरे को समझना और दोनों को एक-दूसरे के साथ गड्डमड्ड न करना जरूरी है।

बिरादरी, खानदान और रिश्तेदारी भी दुनियावी मामलात हैं

इंसान की ज़िंदगी सिर्फ व्यक्तिगत इबादत तक महदूद नहीं है। कुनबा, खानदान, रिश्तेदार, पड़ोसी, बिरादरी, कारोबार, तालीम, सामाजिक रिश्ते और इज्तिमाई तरक्की—ये सब दुनियावी ज़िंदगी के अहम पहलू हैं।

हर शख्स चाहता है कि उसकी बिरादरी तरक्की करे, उसके नौजवान आगे बढ़ें, उसकी नई नस्ल तालीम हासिल करे और उसकी बिरादरी की पहचान मुल्क और दुनिया में बेहतर तरीके से सामने आए।

इसी मकसद से अगर कोई जायज़ सामाजिक और बिरादराना कार्यक्रम आयोजित किया जाता है तो उस पर अपनी राय रखना और किसी जायज़ पहलू पर एहतिराज़ जताना अपनी जगह ठीक है, लेकिन हर बात को सीधे इस्लाम और शरीयत के साथ जोड़ देना मामले को जरूरत से ज्यादा पेचीदा बना सकता है।

‘मुल्तानी-डे’ का मकसद क्या है?

जहां तक ‘मुल्तानी-डे’ का सवाल है, आयोजकों की ओर से स्पष्ट किया गया है कि यह किसी जीवित या मरहूम शख्स की याद में मनाया जाने वाला दिन नहीं है।

बताया गया है कि 15 अक्टूबर ‘World Students’ Day’ के अवसर और 12 नवंबर को ‘मुल्तानी समाज’ राष्ट्रीय समाचार पत्रिका के रजिस्ट्रेशन की खुशी में जश्न-ए ‘मुल्तानी-डे’ मनाया जाता है। इसे किसी व्यक्ति की पैदाइश, वफात या शख्सियत से जोड़ना इसका मकसद नहीं है, बल्कि इसे पत्रिका के सालाना जश्न और बिरादरी की सामाजिक पहचान से जोड़कर देखा जाता है।

इसी तरह खुशी के मौके पर जायज़ खाने-पीने की चीज़ें—मसलन मिठाई, शीर, फिरनी, केक, पेस्ट्री या दूसरी हलाल व जायज़ चीज़ें—खाने-खिलाने को भी अपने आप में मज़हबी रस्म करार देना सही नहीं होगा। किसी भी अमल का हुक्म उसके मकसद, तरीके और वास्तविक स्वरूप को देखकर ही तय किया जाना चाहिए।

‘मुल्तानी-डे’ का डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम से कोई संबंध नहीं

यह बात भी साफ कर देना जरूरी है कि ‘मुल्तानी-डे’ का पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम साहब की शख्सियत, उनकी पैदाइश या वफात से कोई ताल्लुक नहीं है। इसे किसी जीवित या मरहूम शख्स की याद के तौर पर पेश करना भी सही जानकारी नहीं होगी।

इसी तरह ‘मुल्तानी-डे’ को किसी मज़हबी त्योहार के तौर पर पेश करना भी आयोजकों के घोषित उद्देश्य के मुताबिक नहीं है। यह ‘मुल्तानी समाज’ राष्ट्रीय समाचार पत्रिका के सालाना सफर और उसकी सामाजिक-पत्रकारीय गतिविधियों से जुड़ा हुआ कार्यक्रम है।

तारीख तय करने की बात पर भी स्थिति साफ हो

ऑडियो में ‘मुल्तानी-डे’ की तारीख तय न किए जाने की बात कही गई है। इस पर भी स्थिति स्पष्ट है कि अगर यह किसी मज़हबी त्योहार का नाम नहीं बल्कि किसी समाचार पत्रिका का सालाना कार्यक्रम है, तो इसकी तारीख आयोजक संस्था अपनी सुविधानुसार पहले से तय कर सकती है।

मज़हबी त्योहारों की तारीख और दुनियावी सामाजिक कार्यक्रम की तारीख—दोनों को एक ही पैमाने से देखना मुनासिब नहीं होगा।

राय देने से पहले मुकम्मल जानकारी जरूरी

बिरादरी में किसी भी मसले पर राय रखना हर शख्स का हक है। लेकिन किसी भी मामले को दीन, शरीयत या इस्लाम से जोड़कर कोई गंभीर बात कहने से पहले उसके तमाम पहलुओं की तहकीक, सही जानकारी और वास्तविक मकसद को समझना भी उतना ही जरूरी है।

दीन की हिफाज़त अपनी जगह हमारी जिम्मेदारी है और बिरादरी की इज्तिमाई तरक्की भी हमारी जिम्मेदारी है। दोनों को आमने-सामने खड़ा करने के बजाय उनके-अपने दायरे को समझना ही बेहतर रास्ता है।

इसलिए ‘मुल्तानी-डे’ को लेकर अगर किसी भाई को कोई शरीयत संबंधी एतराज़ है तो वह इल्मी, तहज़ीबी और दलीली अंदाज़ में अपनी बात रख सकता है। मगर किसी सामाजिक कार्यक्रम को बिना उसकी पूरी हक़ीक़त जाने सीधे इस्लाम के साथ छेड़छाड़ करार देना न तो बिरादराना एकता के लिए मुफीद है और न ही किसी मसले का मुनासिब हल।

इख़्तिलाफ़ हो सकता है, मगर अदब के साथ। राय अलग हो सकती है, मगर तहक़ीक़ और हक़ीक़त के साथ। और सबसे बढ़कर—दीन का अदब भी कायम रहे और बिरादरी की इत्तेहाद व इज्तिमाई तरक्की भी।


📍 विशेष रिपोर्ट

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार से पंजीकृत, मुल्क की राजधानी नई दिल्ली से प्रसारित, पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी की मुल्क की इकलौती क़ौमी समाचार पत्रिका, न्यूज़ पोर्टल और यूट्यूब चैनल ‘मुल्तानी समाज’ के लिए उत्तर प्रदेश डेस्क से प्रधान संपादक ज़मीर आलम की ख़ास रिपोर्ट।

📢 अपनी खबर हमें भेजें

अगर आप भी अपनी ख़बर, मज़मून (आर्टिकल), पैग़ाम, मुबारकबाद, ताज़ियती इश्तिहार, दिलचस्प वाक़ियात, तहरीर, अफ़साना (कहानी) या अपने कारोबार का इश्तिहार (विज्ञापन) क़ौमी सतह पर शाया या प्रसारित करवाना चाहते हैं, तो बराए मेहरबानी नीचे दिए गए नंबरों पर राब्ता फ़रमाएँ।

📞 9410652990
📞 8010884848

आपका एतमाद ही हमारी सबसे बड़ी ताक़त है।

“मुल्तानी समाज”

अपनी बिरादरी की आवाज़, अपनी पहचान।

Monday, October 5, 2026

🕊️ इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊननिहायत ही रंज-ओ-ग़म के साथ मुस्लिम मुल्तानी बिरादरी के लिए दुःखद ख़बर

टिकरोल/नानौता। निहायत ही रंज-ओ-ग़म और अफ़सोस के साथ तमाम मुस्लिम मुल्तानी, लोहार, बढ़ई बिरादराना हज़रात को यह इत्तिला दी जाती है कि गाँव टिकरोल, तहसील नानौता, ज़िला सहारनपुर, उत्तर प्रदेश निवासी जनाब मोहम्मद यामीन वल्द नामालूम का बीती रात लगभग 2 बजे क़ज़ा-ए-इलाही से इंतिक़ाल हो गया।

इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन।

मरहूम के इंतिक़ाल की ख़बर सुनकर खानदान, रिश्तेदारों, अज़ीज़-ओ-अक़ारिब और बिरादरी में गहरे रंज-ओ-ग़म की लहर दौड़ गई। मरहूम अपने पीछे अपनी अहलिया, दो साहबज़ादे और पाँच साहबज़ादियों समेत पूरा कुनबा, खानदान, रिश्तेदार और तमाम अज़ीज़-ओ-अक़ारिब को ग़मज़दा छोड़कर इस फ़ानी दुनिया से हमेशा-हमेशा के लिए रुख़्सत हो गए।

🕌 नमाज़-ए-जनाज़ा और तदफ़ीन

मिली जानकारी के मुताबिक मरहूम की नमाज़-ए-जनाज़ा आज बाद नमाज़-ए-ज़ोहर अदा की जाएगी, जिसके बाद उन्हें उनके आबाई क़ब्रिस्तान में सुपुर्द-ए-ख़ाक किया जाएगा।

तमाम बिरादराना हज़रात से गुज़ारिश है कि मरहूम के नमाज़-ए-जनाज़ा में शरीक होकर उनके लिए दुआ-ए-मग़फ़िरत करें और सवाब-ए-दारेन हासिल करें।

🤲 मरहूम के लिए दुआ-ए-मग़फ़िरत

ऐ अल्लाह! मरहूम मोहम्मद यामीन साहब की मुकम्मल मग़फ़िरत फ़रमा। उनकी तमाम ख़ताओं और गुनाहों को माफ़ फ़रमा। उनकी क़ब्र को नूर से मुनव्वर फ़रमा, उसे कुशादा और रोशन फ़रमा। उन्हें क़ब्र के अज़ाब से महफ़ूज़ फ़रमा और जन्नतुल फ़िरदौस में आला मुक़ाम अता फ़रमा।

ऐ परवरदिगार! मरहूम की नेकियों को क़ुबूल फ़रमा, उनकी लग़ज़िशों से दरगुज़र फ़रमा और उन्हें अपने ख़ास रहमत व करम के साये में जगह अता फ़रमा।

🤲 क़ब्र में उतारते वक़्त दुआ

जब मरहूम को क़ब्र में उतारा जाए तो अल्लाह तआला उनके लिए क़ब्र के सफ़र को आसान फ़रमाए और उन्हें अपनी रहमत से नवाज़े।

ऐ अल्लाह! इस बंदे को अपनी रहमत के हवाले फ़रमा। उसकी क़ब्र को जन्नत के बाग़ों में से एक बाग़ बना दे। उसे तन्हाई में अपनी रहमत, नूर और इत्मीनान अता फ़रमा और सवालात-ए-क़ब्र के वक़्त उसके लिए आसानी फ़रमा।

🤲 मिट्टी देते वक़्त दुआ

मिट्टी देते हुए तमाम हाज़िरीन मरहूम के लिए मग़फ़िरत की दुआ करें:

ऐ अल्लाह! जिस मिट्टी में आज हमारे भाई को सुपुर्द किया जा रहा है, उसे उनके लिए सुकून और रहमत का ज़रिया बना दे। उनकी क़ब्र को नूर से भर दे, क़यामत के दिन उनकी मग़फ़िरत फ़रमा और उन्हें अपने महबूब बंदों में शामिल फ़रमा।

ऐ अल्लाह! मरहूम के तमाम अहल-ए-ख़ाना को, उनकी अहलिया, दोनों बेटों, पाँच बेटियों और तमाम खानदान व रिश्तेदारों को सब्र-ए-जमील अता फ़रमा। उन्हें इस सदमे को बर्दाश्त करने का हौसला दे और मरहूम के लिए सदक़ा-ए-जारीया बनने वाले नेक अमल की तौफ़ीक़ अता फ़रमा।

आमीन या रब्बुल आलमीन।

📿 बिरादराना हज़रात से ख़ास गुज़ारिश

तमाम मुस्लिम मुल्तानी, लोहार, बढ़ई बिरादरी के हज़रात से ख़ास गुज़ारिश है कि मरहूम के लिए सूरह-ए-फ़ातिहा, सूरह-ए-इख़लास और दुआ-ए-मग़फ़िरत फ़रमाएँ तथा उनकी तदफ़ीन में शरीक होकर ग़मज़दा खानदान की दिलजोई करें।

अल्लाह तआला मरहूम की मग़फ़िरत फ़रमाए, उनकी क़ब्र को नूर से भर दे और तमाम पसमान्दगान को सब्र-ए-जमील अता फ़रमाए।

आमीन सुम्मा आमीन।

📞 मय्यत के सिलसिले में राब्ता

मय्यत, नमाज़-ए-जनाज़ा और तदफ़ीन के सिलसिले में मज़ीद मालूमात के लिए मोहम्मद इमरान साहब से इस नंबर पर राब्ता क़ायम किया जा सकता है:

📞 8219318604


सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार से पंजीकृत, मुल्क की राजधानी नई दिल्ली से प्रसारित, पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी की मुल्क की इकलौती क़ौमी समाचार पत्रिका, न्यूज़ पोर्टल और यूट्यूब चैनल "मुल्तानी समाज" के लिए उत्तर प्रदेश डेस्क से प्रधान संपादक ज़मीर आलम की ख़ास रिपोर्ट।

अगर आप भी अपनी ख़बर, मज़मून (आर्टिकल), पैग़ाम, मुबारकबाद, ताज़ियती इश्तिहार, दिलचस्प वाक़ियात, तहरीर, अफ़साना (कहानी) या अपने कारोबार का इश्तिहार (विज्ञापन) क़ौमी सतह पर शाया या प्रसारित करवाना चाहते हैं, तो बराए मेहरबानी नीचे दिए गए नंबरों पर राब्ता फ़रमाएँ:

📞 9410652990
📞 8010884848

आपका एतमाद ही हमारी सबसे बड़ी ताक़त है।

"मुल्तानी समाज"

अपनी बिरादरी की आवाज़, अपनी पहचान।

मुल्तानी-डे की हक़ीक़त क्या है? तारीख़ बदलने से इतिहास नहीं बदलता

गलत तारीख़ और ग़लत मालूमात से बिरादरी की तारीख़ नहीं बदली जा सकती—ख़ामोशी भी कभी-कभी ग़लतफ़हमी को मज़बूत कर देती है

मुस्लिम मुल्तानी लोहार, बढ़ई बिरादरी के नौजवानों में कई दिनों से "मुल्तानी-डे" को लेकर सोशल मीडिया पर बहस जारी—कोई इसे डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम की पैदाइश से जोड़ रहा है तो कोई उनके विसाल से; आख़िर 12 नवंबर को "मुल्तानी-डे" क्यों मनाया जाता है? पेश है पूरी हक़ीक़त।

नई दिल्ली/उत्तर प्रदेश डेस्क।
बिरादरी की तारीख़ और पहचान कोई ऐसी चीज़ नहीं जिसे अपनी मर्ज़ी के मुताबिक़ बदला या नई तारीख़ के साथ पेश किया जा सके। अगर किसी तारीख़ के पीछे कोई हक़ीक़त, दस्तावेज़ और पुरानी रिवायत मौजूद हो तो उसे छिपाने या उसके बारे में ग़लतफ़हमी पैदा करने से इतिहास नहीं बदल जाता।

आज सोशल मीडिया के ज़रिए "मुल्तानी-डे" को लेकर मुस्लिम मुल्तानी लोहार, बढ़ई बिरादरी के नौजवानों के बीच बहस चल रही है। कोई इसे पूर्व राष्ट्रपति और महान वैज्ञानिक डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम की जयंती से जोड़कर देख रहा है, कोई उनकी पैदाइश का हवाला दे रहा है और कोई उनके विसाल से इसका ताल्लुक़ जोड़कर मुख़ालफ़त कर रहा है।

दिलचस्प बात यह है कि बिरादरी का एक तबक़ा आज इस सवाल का जवाब तलाश रहा है कि आख़िर "मुल्तानी-डे" क्यों मनाया जाता है और इसकी तारीख़ 12 नवंबर ही क्यों है?

ऐसे में ज़रूरी हो जाता है कि अफ़वाह, ग़लतफ़हमी और सोशल मीडिया की बहस से अलग हटकर असल हक़ीक़त बिरादरी के सामने रखी जाए।

जानी-मानी हस्तियां ख़ामोश क्यों?

बिरादरी की रहनुमाई करने वाली तंजीमों, बुज़ुर्गों और जानी-पहचानी शख़्सियात से उम्मीद की जाती है कि जब नई नस्ल किसी सवाल का जवाब तलाश कर रही हो तो वे आगे बढ़कर सही मालूमात फराहम करें।

अगर बिरादरी के नौजवानों को सही तारीख़ और सही वजह नहीं बताई जाएगी तो वे हक़ीक़त तक कैसे पहुंचेंगे?

झूठ या ग़लत मालूमात का पर्दाफ़ाश करना किसी की दुश्मनी नहीं, बल्कि हक़ीक़त को सामने लाने की ज़िम्मेदारी है। सामने वाला चाहे कितना ही क़रीबी क्यों न हो, बिरादरी के इतिहास और पहचान के मामले में सही बात कहना ज़रूरी है।

आख़िर 12 नवंबर को ही "मुल्तानी-डे" क्यों?

इस सवाल का जवाब बेहद सादा और साफ़ है।

12 नवंबर किसी इंसान का जन्मदिन या मरण-दिवस नहीं है।

12 नवंबर का "मुल्तानी-डे" किसी सियासी शख़्सियत, वैज्ञानिक, राष्ट्रपति या किसी फ़र्द-ए-वाहित से जुड़ा हुआ दिवस नहीं है।

बल्कि उपलब्ध जानकारी के मुताबिक़ यह दिन मुस्लिम मुल्तानी लोहार, बढ़ई बिरादरी की राष्ट्रीय समाचार पत्रिका "मुल्तानी समाज" के सालाना उत्सव के तौर पर मनाया जाता है।

बिरादरी की राष्ट्रीय पत्रिका "मुल्तानी समाज" का रजिस्ट्रेशन 12 नवंबर 2013 को हुआ था। इसी तारीख़ की सालाना खुशी को "मुल्तानी समाज चैरिटेबल ट्रस्ट" की तरफ़ से "मुल्तानी-डे" के तौर पर मनाने की रिवायत क़ायम हुई।

यानी—

12 नवंबर = "मुल्तानी समाज" की सालाना खुशी

और

"मुल्तानी-डे" = किसी शख़्स की पैदाइश या विसाल का दिन नहीं।

नौजवानों के लिए यह बात समझना बेहद ज़रूरी है

आज सोशल मीडिया का दौर है। कोई भी शख़्स कोई भी तारीख़ और कोई भी कहानी लिखकर सैकड़ों लोगों तक पहुंचा सकता है। लेकिन सोशल मीडिया पर बार-बार कही गई बात अपने आप इतिहास नहीं बन जाती।

हमारी नई नस्ल का हक़ है कि उसे अपनी बिरादरी की तारीख़ और रिवायत के बारे में सही और मुसद्दक़ मालूमात मिलें।

इसलिए अगर कोई पूछे—

"मुल्तानी-डे कब मनाया जाता है?"

तो जवाब है—

हर साल 12 नवंबर को।

और अगर कोई पूछे—

"क्यों मनाया जाता है?"

तो जवाब है—

मुस्लिम मुल्तानी लोहार, बढ़ई बिरादरी की राष्ट्रीय समाचार पत्रिका "मुल्तानी समाज" के सालाना उत्सव की खुशी के तौर पर।

यह किसी एक शहर या राज्य का कार्यक्रम नहीं

"मुल्तानी-डे" की एक और ख़ास बात यह है कि इसे किसी एक गांव, कस्बे, शहर या राज्य तक महदूद रखने के बजाय बिरादरी के लोग अपने-अपने घरों में अपनी खुशी के मुताबिक़ मनाते हैं।

इसके लिए किसी ख़ास हॉल, मैरिज होम, होटल, रेस्टोरेंट या क्लब में जमा होना लाज़िमी नहीं है।

यह किसी एक शख़्स की मिल्कियत या किसी एक शहर का प्रोग्राम नहीं, बल्कि बिरादरी की राष्ट्रीय पत्रिका की सालाना खुशी से जुड़ी एक रिवायत के तौर पर पेश किया जाता है।

12 नवंबर की खुशी को ख़िदमत से जोड़ने का इरादा

"मुल्तानी समाज" राष्ट्रीय समाचार पत्रिका के प्रधान-संपादक ज़मीर आलम ने बताया कि "मुल्तानी-डे" की खुशी को सिर्फ़ जश्न तक महदूद रखने के बजाय उसे ख़िदमत-ए-ख़ल्क़ से जोड़ने का इरादा है।

इसी सिलसिले में हर साल 12 नवंबर की खुशी के मौक़े पर 12 ज़रूरतमंद बेटियों की इज्तिमाई शादी कराने की योजना है, जिसे बिरादरी के सहयोग से जल्द शुरू करने का इरादा है।

क्यों न हमारी खुशियां किसी ज़रूरतमंद के घर की ख़ुशी बनें?

क्यों न हमारी बिरादरी की सालाना खुशी किसी बेटी के निकाह और उसके नए घर की शुरुआत का सबब बने?

यही जज़्बा "मुल्तानी-डे" की खुशी को एक बेहतर और ख़िदमतगार मक़सद दे सकता है।

आइए, बहस नहीं—हक़ीक़त को आम करें

हमारी गुज़ारिश है कि इस ख़बर को ज़्यादा से ज़्यादा बिरादरान-ए-वतन तक पहुंचाया जाए, ताकि अगर कोई आपसे पूछे—

"मुल्तानी-डे कब और क्यों मनाया जाता है?"

तो आप अंदाज़े या सुनी-सुनाई बात के बजाय सही जानकारी के साथ जवाब दे सकें।

तारीख़ बदल देने से इतिहास नहीं बदलता।
ख़ामोशी से हक़ीक़त मिटती नहीं।
और सोशल मीडिया की बहस से दस्तावेज़ी हक़ीक़त बदलती नहीं।

हमारी ज़िम्मेदारी है कि अपनी बिरादरी की तारीख़, पहचान और रिवायत को आने वाली नस्ल तक सही मालूमात के साथ पहुंचाएं।


"मुल्तानी समाज" — अपनी बिरादरी की आवाज़, अपनी पहचान

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार से पंजीकृत, नई दिल्ली से प्रकाशित/प्रसारित मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी की क़ौमी समाचार पत्रिका, न्यूज़ पोर्टल और YouTube चैनल "मुल्तानी समाज" के लिए उत्तर प्रदेश डेस्क से प्रधान-संपादक ज़मीर आलम की ख़ास रिपोर्ट।

अपनी ख़बर हम तक पहुंचाएं

अगर आप भी अपनी ख़बर, मज़मून, पैग़ाम, मुबारकबाद, ताज़ियती इश्तिहार, दिलचस्प वाक़ियात, तहरीर, अफ़साना या अपने कारोबार का इश्तिहार क़ौमी सतह पर शाया या प्रसारित करवाना चाहते हैं, तो बराए मेहरबानी राब्ता फ़रमाएं।

📞 9410652990
📞 8010884848

आपका एतमाद ही हमारी सबसे बड़ी ताक़त है।

"मुल्तानी समाज"
अपनी बिरादरी की आवाज़, अपनी पहचान।

Sunday, October 4, 2026

World Students Day या “Multani Day”? डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम की यौमे पैदाइश को बिरादरी के नाम से जोड़कर पेश किए जाने पर उठे गंभीर सवाल

मुज़फ्फरनगर/शामली, उत्तर प्रदेश।

मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी के तमाम बिरादरान-ए-वतन की ख़िदमत में यह सवाल पेश करना ज़रूरी हो गया है कि क्या किसी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचाने जाने वाले दिवस को किसी बिरादरी विशेष के नाम से पेश किया जाना मुनासिब है?

मामला 15 अक्टूबर का है—वह तारीख़ जो महान वैज्ञानिक, मिसाइल मैन और भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम की यौमे पैदाइश है और जिसे भारत सहित विभिन्न स्थानों पर World Students Day के रूप में याद किया जाता है।

बताया जा रहा है कि क़स्बा खतौली, ज़िला मुज़फ्फरनगर से संचालित बिरादरी की एक प्रदेश स्तरीय सोसाइटी द्वारा पिछले कुछ वर्षों से डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम की यौमे पैदाइश के अवसर पर कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। मुज़फ्फरनगर शहर और फिर खतौली में कार्यक्रमों के बाद अब सोशल मीडिया के ज़रिए 15 अक्टूबर को “Multani Day” के नाम से प्रचारित किए जाने पर बिरादरी के भीतर कई सवाल उठ रहे हैं।

सवाल यह नहीं कि डॉ. कलाम को याद क्यों किया जा रहा है—सवाल यह है कि नाम क्या दिया जा रहा है?

डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम किसी एक बिरादरी, मज़हब या क्षेत्र की शख्सियत नहीं थे। वह पूरे हिंदुस्तान के गौरव, नौजवानों के प्रेरणास्रोत और शिक्षा व विज्ञान के पैरोकार थे।

अगर कोई संस्था उनकी यौमे पैदाइश पर कार्यक्रम आयोजित करना चाहती है तो इसका स्वागत होना चाहिए। लेकिन सवाल यह है कि एक ऐसे दिवस को, जो विद्यार्थियों और युवाओं की प्रेरणा से जुड़ा हुआ है, क्या किसी एक बिरादरी की विशेष पहचान के साथ प्रचारित करना उचित है?

बिरादरी के लोगों के सामने यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि “Multani Day” नाम का अपना एक अलग सामाजिक और ऐतिहासिक संदर्भ बताया जाता रहा है। ऐसे में किसी दूसरी तारीख़ को उसी नाम से प्रचारित किए जाने पर स्वाभाविक रूप से यह भ्रम पैदा होता है कि आखिर बिरादरी के बीच “Multani Day” की पहचान क्या है और इसकी तारीख़ क्या मानी जाए?

इंजीनियर साहब से बिरादरी का सीधा सवाल

जिस सोसाइटी के सदर साहब अपने नाम के साथ “इंजीनियर” का लक़ब इस्तेमाल करते हैं, उनसे बिरादरी के पढ़े-लिखे नौजवानों और बुज़ुर्गों का अदब के साथ सवाल है—

अगर 15 अक्टूबर को डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम की यौमे पैदाइश के तौर पर कार्यक्रम आयोजित किया जा रहा है तो उसे “World Students Day” अथवा डॉ. कलाम की यौमे पैदाइश के नाम से ही क्यों न आयोजित किया जाए?

अगर मक़सद बिरादरी के नौजवानों में शिक्षा, विज्ञान, तरक़्क़ी और देशप्रेम का जज़्बा पैदा करना है तो कार्यक्रम को पूरे समाज के लिए खुला रखा जाए और डॉ. कलाम के विचारों तथा उनकी ज़िंदगी से नई नस्ल को रोशनी हासिल करने का मौक़ा दिया जाए।

किसी महान राष्ट्रीय शख्सियत को किसी एक बिरादरी तक सीमित करना उनकी विरासत को छोटा करना होगा।

बिरादरी को भ्रम में रखने के बजाय साफ़-साफ़ तारीख़ और इतिहास बताया जाए

मुल्तानी बिरादरी के लोग सीधे-सादे, मोहब्बत करने वाले और अपनी बिरादरी की पहचान से बेपनाह मोहब्बत रखने वाले हैं। यही वजह है कि बिरादरी से जुड़े किसी भी आयोजन को लोग भरोसे के साथ स्वीकार कर लेते हैं।

लेकिन यही भरोसा हमारी सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी भी है।

बिरादरी के ज़िम्मेदार लोगों से गुज़ारिश है कि तारीख़, नाम और इतिहास को लेकर कोई ऐसा प्रचार न किया जाए जिससे आने वाली नस्लें भ्रमित हों।

अगर “Multani Day” के लिए कोई पुरानी परंपरा, तारीख़ या दस्तावेज़ मौजूद है तो उसे बिरादरी के सामने सार्वजनिक किया जाए। अगर 15 अक्टूबर को डॉ. कलाम की यौमे पैदाइश पर कार्यक्रम है तो उसे उसी हवाले से आयोजित किया जाए।

दोनों को मिलाकर पेश करने से आख़िर हासिल क्या होगा?

बिरादरी के बुद्धिजीवी आगे आएँ

आज ज़रूरत इस बात की है कि बिरादरी के पढ़े-लिखे नौजवान, सामाजिक कार्यकर्ता, बुज़ुर्ग और बुद्धिजीवी इस मसले पर ख़ामोशी इख़्तियार करने के बजाय तथ्यों के साथ अपनी राय सामने रखें।

हम किसी शख्सियत या संस्था की मुख़ालफ़त नहीं कर रहे, बल्कि नाम, तारीख़, इतिहास और बिरादरी की पहचान को लेकर साफ़गोई की बात कर रहे हैं।

डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम का सम्मान कीजिए, उनकी तालीमी और वैज्ञानिक सोच को नई नस्ल तक पहुँचाइए, उनके सपनों का हिंदुस्तान बनाने की बात कीजिए—मगर किसी राष्ट्रीय शख्सियत की यौमे पैदाइश को बिरादरी की पहचान के साथ इस तरह न जोड़ा जाए कि आम लोगों के बीच असल तथ्य ही धुंधले पड़ जाएँ।

बिरादरी का सवाल सीधा है—
15 अक्टूबर को डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम की यौमे पैदाइश मनानी है, World Students Day मनाना है या “Multani Day” के नाम से एक अलग पहचान कायम करनी है?

अगर मक़सद नेक है तो नाम और तारीख़ को लेकर इतनी साफ़गोई भी ज़रूरी है।

इसी का नाम बिरादरी की अमानत, इतिहास की हिफ़ाज़त और आने वाली नस्लों के प्रति हमारी ज़िम्मेदारी है।

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार से पंजीकृत, मुल्क की राजधानी नई दिल्ली से प्रसारित, मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी की क़ौमी समाचार पत्रिका, न्यूज़ पोर्टल एवं YouTube चैनल “मुल्तानी समाज” के लिए उत्तर प्रदेश डेस्क से प्रधान संपादक ज़मीर आलम की ख़ास रिपोर्ट।

अपनी ख़बर हम तक पहुँचाइए

अगर आप भी अपनी ख़बर, मज़मून (आर्टिकल), पैग़ाम, मुबारकबाद, ताज़ियती इश्तिहार, दिलचस्प वाक़ियात, तहरीर, अफ़साना या अपने कारोबार का इश्तिहार (विज्ञापन) क़ौमी सतह पर शाया या प्रसारित करवाना चाहते हैं, तो बराए मेहरबानी नीचे दिए गए नंबरों पर राब्ता फ़रमाएँ।

📞 9410652990
📞 8010884848

आपका एतमाद ही हमारी सबसे बड़ी ताक़त है।

“मुल्तानी समाज”

अपनी बिरादरी की आवाज़ — अपनी पहचान

मुल्तानी बिरादरी की डिजिटल जनगणना के लिए बड़ा डिजिटल प्लेटफॉर्म तैयार

“मुल्तानी घराना” के ज़रिए हर घर, हर कुनबे और हर खानदान को डिजिटल शिजरे में जोड़ने की पहल — अपने घराने की एंट्री खुद करें या अपने कस्बे-शहर में जनगणना अधिकारी बनने के लिए अपनी जानकारी भेजें

नई दिल्ली/उत्तर प्रदेश डेस्क।
मुस्लिम मुल्तानी लोहार एवं बढ़ई बिरादरी की सामाजिक एकजुटता, डिजिटल पहचान और आने वाली नस्लों के लिए बिरादरी का मुकम्मल रिकॉर्ड महफूज़ करने की दिशा में एक अहम और दूरअंदेशाना पहल सामने आई है। बिरादरी की राष्ट्रीय संस्था “मुल्तानी समाज चैरिटेबल ट्रस्ट” ने डिजिटल दौर की जरूरतों को समझते हुए बिरादरी की डिजिटल जनगणना के लिए एक बड़े सॉफ्टवेयर प्लेटफॉर्म “मुल्तानी घराना” को बिरादरी के सामने पेश किया है।

इस डिजिटल प्लेटफॉर्म का मकसद सिर्फ नाम और मोबाइल नंबर इकट्ठा करना नहीं, बल्कि हर परिवार, कुनबे, खानदान और रिश्तेदारी के सिलसिले को एक मुकम्मल डिजिटल शिजरे की शक्ल में सुरक्षित करना है, ताकि आज का तैयार किया गया रिकॉर्ड आने वाली नस्लों के लिए भी एक अहम सामाजिक दस्तावेज़ साबित हो सके।

सोशल मीडिया के शुरुआती दौर से डिजिटल सफर की कहानी

आज जब सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुके हैं, उस दौर को भी याद करना जरूरी है जब इन तकनीकों का इस्तेमाल भारत में अभी शुरुआती मरहले में था।

मुल्तानी समाज चैरिटेबल ट्रस्ट ने बिरादरी को डिजिटल प्लेटफॉर्म पर एकजुट करने की कोशिश उस समय शुरू की, जब व्हाट्सऐप का इस्तेमाल भारत में तेजी से शुरू ही हुआ था। वर्ष 2011 के आसपास बिरादरी के लोगों को व्हाट्सऐप ग्रुपों के माध्यम से जिला और राज्यवार जोड़ने की कोशिश की गई। उस दौर में एक व्हाट्सऐप ग्रुप में सदस्यों की संख्या बेहद सीमित हुआ करती थी, जिसकी वजह से बड़ी तादाद में बिरादरी के अफराद को एक ही प्लेटफॉर्म पर जोड़ना अपने आप में एक चुनौती था।

इसके बाद टेलीग्राम के सामने आने पर बिरादरी के लिए टेलीग्राम ग्रुप और चैनल तैयार किए गए, ताकि ज्यादा से ज्यादा लोगों को एक साथ जोड़ा जा सके। इसके साथ-साथ फेसबुक पर बिरादरी के लोगों को तलाश कर विभिन्न ग्रुपों और पेजों से जोड़ा गया तथा दूसरे डिजिटल प्लेटफॉर्मों पर भी बिरादरी की मौजूदगी दर्ज कराने की कोशिश की गई।

बिरादरी के लोगों को एक-दूसरे के करीब लाने और सामाजिक संपर्क को मजबूत करने के लिए ऑनलाइन डायरेक्टरी प्लेटफॉर्म पर भी संस्था की मौजूदगी दर्ज कराई गई।

खबरों से लेकर रिश्तों तक — डिजिटल पहचान बनाने की कोशिश

इसी डिजिटल सफर को आगे बढ़ाते हुए बिरादरी की राष्ट्रीय समाचार पत्रिका “मुल्तानी समाज” का न्यूज़ पोर्टल, डिजिटल प्लेटफॉर्म और यूट्यूब चैनल तैयार किया गया, ताकि बिरादरी के लोगों की खुशियों, ग़मों, सामाजिक गतिविधियों, कामयाबियों और अहम खबरों को मुल्क के कोने-कोने तक पहुंचाया जा सके।

बिरादरी की डिजिटल पहचान को और मजबूत करने के लिए “मुल्तानी समाज” नाम से वेबसाइट तैयार की गई। वहीं बिरादरी में निकाह के लिए मुनासिब रिश्तों की तलाश को आसान बनाने के उद्देश्य से “रिश्तों की दुनिया” जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म की शुरुआत की गई।

इन तमाम कोशिशों के पीछे बुनियादी सोच यही रही कि बिरादरी का कोई भी अफ़राद एक-दूसरे से बेखबर न रहे और दूर-दराज़ इलाकों में रहने वाले मुल्तानी परिवार भी आपसी राब्ते और इत्तेहाद के एक मजबूत सिलसिले से जुड़े रहें।

अब जनगणना की तरफ बड़ा कदम — “मुल्तानी घराना”

इसी लंबे डिजिटल सफर का अगला और अहम मरहला अब बिरादरी की डिजिटल जनगणना है।

मुल्तानी समाज चैरिटेबल ट्रस्ट द्वारा तैयार किया गया “मुल्तानी घराना” सॉफ्टवेयर बिरादरी के हर परिवार को अपनी जानकारी खुद दर्ज करने का मौका देता है। इसके माध्यम से कोई भी परिवार अपने घर के अफराद के साथ-साथ अपने कुनबे, खानदान और रिश्तेदारों की जानकारी दर्ज कर अपने परिवार का डिजिटल शिजरा तैयार कर सकता है।

यानी एक परिवार से शुरू होकर जानकारी आगे बढ़ते हुए पूरे कुनबे और खानदान को एक डिजिटल सामाजिक नक्शे में जोड़ा जा सकता है।

यह पहल आने वाले समय में बिरादरी की सामाजिक ताकत, परिवारों की संख्या, अलग-अलग शहरों और कस्बों में आबादी की मौजूदगी तथा आपसी रिश्तेदारी के सिलसिले को समझने में बेहद उपयोगी साबित हो सकती है।

हर घर बने डिजिटल जनगणना का हिस्सा

ट्रस्ट की अपील है कि बिरादरी का हर परिवार इस मुहिम को सिर्फ एक संस्था की मुहिम समझकर न देखे, बल्कि इसे अपनी बिरादरी और अपनी आने वाली नस्लों के लिए एक सामाजिक जिम्मेदारी समझे।

हर परिवार अपने घराने की जानकारी दर्ज करे, अपने माता-पिता, भाई-बहन, औलाद, खानदान और रिश्तेदारों को इस डिजिटल शिजरे से जोड़े और कोशिश करे कि उसका पूरा कुनबा इस जनगणना का हिस्सा बने।

“मुल्तानी घराना” को देखने और अपनी डिजिटल एंट्री की प्रक्रिया शुरू करने के लिए आज ही वेबसाइट पर जाएँ:

मुल्तानी घराना डॉट कॉम

सॉफ्टवेयर को इस्तेमाल करने के दौरान किसी तरह की परेशानी या रहनुमाई की जरूरत हो तो हेल्पलाइन नंबर की जानकारी भी प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध कराई गई है।

क्या आप अपने शहर या कस्बे के “जनगणना अधिकारी” बनना चाहते हैं?

बिरादरी की डिजिटल जनगणना को ज्यादा व्यापक बनाने के लिए ऐसे जिम्मेदार, सक्रिय और समाजी खिदमत का जज़्बा रखने वाले अफराद की भी जरूरत है, जो अपने कस्बे, शहर, ब्लॉक, तहसील या इलाके में बिरादरी के परिवारों को इस डिजिटल जनगणना से जोड़ने में अपना किरदार अदा कर सकें।

अगर आप अपने इलाके में “मुल्तानी बिरादरी डिजिटल जनगणना अधिकारी” के तौर पर काम करने के इच्छुक हैं तो अपनी पूरी जानकारी ट्रस्ट/सम्बंधित टीम तक भेज सकते हैं।

आपका नाम, शहर/कस्बा, जिला, मोबाइल नंबर और बिरादरी के लिए किए जाने वाले काम का संक्षिप्त विवरण भेजकर इस मुहिम से जुड़ा जा सकता है।

एक-एक घर जुड़ेगा, तभी पूरी बिरादरी का मुकम्मल डिजिटल रिकॉर्ड तैयार होगा।

आने वाले दौर में रिश्तों के लिए भी नया डिजिटल प्लेटफॉर्म

मुल्तानी समाज चैरिटेबल ट्रस्ट की ओर से यह भी संकेत दिया गया है कि बिरादरी के बीच रिश्ते-नाते आसान बनाने के लिए एक और डिजिटल सॉफ्टवेयर जल्द पेश किया जाएगा।

इसका मकसद बिरादरी के परिवारों को मुनासिब रिश्तों की तलाश में आधुनिक तकनीक का फायदा पहुंचाना और खास तौर पर हमारी बहन-बेटियों और नौजवानों के लिए रिश्तों की तलाश के सिलसिले को ज्यादा व्यवस्थित और आसान बनाना होगा।

“बड़े अल्फाज़” नहीं, काम का इतिहास देखिए

बिरादरी के कुछ अफराद कभी-कभी संस्था के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले अल्फाज़ जैसे “पैदायशी इंजीनियर”, “क्रांतिकारी तंजीम”, “राष्ट्रीय स्तर की संस्था” आदि पर सवाल या नापसंदगी का इज़हार करते हैं।

लेकिन किसी भी संस्था की पहचान सिर्फ उसके अल्फाज़ से नहीं, बल्कि उसके काम, उसके सफर और उसकी लगातार मेहनत से होती है।

अगर किसी तंजीम ने उस दौर में बिरादरी को डिजिटल प्लेटफॉर्म पर जोड़ने की कोशिश की, जब सोशल मीडिया भारत में अपनी शुरुआती मंजिलें तय कर रहा था; अगर उसने बिरादरी की खबरों को डिजिटल माध्यम से घर-घर पहुंचाने की कोशिश की; अगर उसने वेबसाइट, न्यूज़ पोर्टल, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और रिश्तों के डिजिटल प्लेटफॉर्म तैयार किए; और आज बिरादरी की डिजिटल जनगणना तथा डिजिटल शिजरे की तरफ कदम बढ़ाया है, तो इन तमाम कामों का जायज़ा लेकर ही उसके सफर की अहमियत को समझा जाना चाहिए।

अल्फाज़ पर बहस अपनी जगह, मगर काम का हिसाब भी अपनी जगह।

मुल्तानी समाज चैरिटेबल ट्रस्ट का कहना है कि यह सफर अभी खत्म नहीं हुआ, बल्कि असल में एक नए डिजिटल दौर की शुरुआत है।

बिरादरी की जनगणना, डिजिटल शिजरा, रिश्तों का डिजिटल प्लेटफॉर्म, बिरादरी की खबरों का राष्ट्रीय नेटवर्क और आने वाली नस्लों के लिए सामाजिक रिकॉर्ड — यह सब मिलकर मुल्तानी बिरादरी को एक मजबूत डिजिटल सामाजिक नेटवर्क की शक्ल दे सकता है।

आज जो जानकारी हम महफूज़ करेंगे, वही कल हमारी आने वाली नस्लों के लिए हमारी पहचान और हमारे खानदानों की कहानी बनेगी।

इसलिए तमाम अहले बिरादरी से गुज़ारिश है कि इस मुहिम में बढ़-चढ़कर हिस्सा लें और अपने घराने को “मुल्तानी घराना” से जरूर जोड़ें।

अपने घराने की एंट्री खुद करें — या अपने इलाके में डिजिटल जनगणना अधिकारी बनकर बिरादरी की खिदमत का हिस्सा बनें।

इंशाअल्लाह, अगली कड़ी में मुल्तानी समाज चैरिटेबल ट्रस्ट की ओर से बिरादरी के लिए किए गए दूसरे अहम कामों और आने वाले डिजिटल प्रोजेक्ट्स की तफसील भी बिरादरी के सामने रखी जाएगी।


सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार से पंजीकृत, मुल्क की राजधानी नई दिल्ली से प्रसारित, मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी की क़ौमी समाचार पत्रिका, न्यूज़ पोर्टल और यूट्यूब चैनल “मुल्तानी समाज” के लिए उत्तर प्रदेश डेस्क से प्रधान संपादक ज़मीर आलम की ख़ास रिपोर्ट।

अपनी खबर, मज़मून और इश्तिहार हमें भेजें

अगर आप भी अपनी ख़बर, मज़मून (आर्टिकल), पैग़ाम, मुबारकबाद, ताज़ियती इश्तिहार, दिलचस्प वाक़ियात, तहरीर, अफ़साना (कहानी) या अपने कारोबार का इश्तिहार (विज्ञापन) क़ौमी सतह पर प्रकाशित या प्रसारित करवाना चाहते हैं, तो नीचे दिए गए नंबरों पर राब्ता फरमाएँ।

📞 9410652990
📞 8010884848

आपका एतमाद ही हमारी सबसे बड़ी ताक़त है।

“मुल्तानी समाज”

अपनी बिरादरी की आवाज़ — अपनी पहचान।

Saturday, October 3, 2026

इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन सलीमन बी का इंतिक़ाल, मुल्तानी बिरादरी में पसरा ग़म — आज ईशा की नमाज़ के बाद होगी तदफ़ीन

अल्लाह तआला मरहूमा की मग़फिरत फ़रमाए और उन्हें जन्नतुल फ़िरदौस में आला मुक़ाम अता फ़रमाए। आमीन।

निहायत ही रंज-ओ-ग़म और अफ़सोस के साथ तमाम मुस्लिम, मुल्तानी लोहार एवं बढ़ई बिरादराना हज़रात को यह इत्तिला दी जाती है कि आज दिन इतवार, बा-तारीख़ 04 अक्टूबर 2026 को क़स्बा अंबेहटा पीर, ज़िला सहारनपुर, उत्तर प्रदेश में जनाब रिजवान साहब वल्द जनाब सुल्तान साहब की अहलिया सलीमन बी, जिनका मायका गाँव पुरमाफ़ी, ज़िला शामली, उत्तर प्रदेश में है, आज सुबह तक़रीबन 09 बजे क़ज़ा-ए-इलाही से वफ़ात पा गईं।

इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन।

मरहूमा के इंतिक़ाल की ख़बर से अहल-ए-ख़ाना, अज़ीज़-ओ-अक़ारिब और बिरादराने-मिल्लत में गहरा रंज और सदमा है। यह दुनिया फ़ानी है और हर ज़ी-रूह को एक दिन अपने रब की तरफ़ लौटकर जाना है। अल्लाह तआला मरहूमा की तमाम ख़ताओं और कोताहियों से दरगुज़र फ़रमाते हुए उनकी मग़फिरत फ़रमाए, क़ब्र को नूर से मुनव्वर करे और उन्हें अपनी रहमत के साए में जगह अता फ़रमाए।

नमाज़-ए-जनाज़ा और तदफ़ीन

मिली हुई जानकारी के मुताबिक़ मरहूमा की नमाज़-ए-जनाज़ा आज बाद नमाज़-ए-ईशा अदा की जाएगी, जिसके बाद उन्हें सुपुर्द-ए-ख़ाक किया जाएगा।

तमाम बिरादराना हज़रात से गुज़ारिश है कि अगर मुमकिन हो तो नमाज़-ए-जनाज़ा में शिरकत फ़रमाएँ, मरहूमा के लिए मग़फिरत की दुआ करें और अहल-ए-ख़ाना के ग़म में शरीक होकर उन्हें तसल्ली दें।

मय्यत को क़ब्र में उतारते वक़्त

जब मय्यत को क़ब्र में उतारा जाए तो दुआ की जाए:

اللّٰهُمَّ اغْفِرْ لَهَا وَارْحَمْهَا، وَعَافِهَا وَاعْفُ عَنْهَا۔

तर्जुमा:
ऐ अल्लाह! इसकी मग़फिरत फ़रमा, इस पर रहम फ़रमा, इसे आफ़ियत अता फ़रमा और इससे दरगुज़र फ़रमा।

क़ब्र में मय्यत को रखते वक़्त यह पढ़ना भी मसनून है:

بِسْمِ اللّٰهِ وَعَلَىٰ مِلَّةِ رَسُولِ اللّٰهِ ﷺ

तर्जुमा:
अल्लाह के नाम के साथ और अल्लाह के रसूल ﷺ के दीन व तरीक़े पर।

मिट्टी देते वक़्त

मय्यत पर मिट्टी डालते वक़्त यह आयत पढ़ी जा सकती है:

مِنْهَا خَلَقْنَاكُمْ وَفِيهَا نُعِيدُكُمْ وَمِنْهَا نُخْرِجُكُمْ تَارَةً أُخْرَىٰ

तर्जुमा:
हमने तुम्हें इसी मिट्टी से पैदा किया, इसी में तुम्हें वापस लौटाएँगे और इसी से दोबारा तुम्हें निकालेंगे।

क़ब्र पर मिट्टी देने के बाद मरहूमा के लिए दिल से दुआ-ए-मग़फिरत की जाए:

ऐ अल्लाह! मरहूमा सलीमन बी की मग़फिरत फ़रमा। उनकी तमाम ख़ताओं और गुनाहों को माफ़ फ़रमा। उनकी क़ब्र को कुशादा और नूरानी फ़रमा। क़ब्र की तंगी और अज़ाब से महफ़ूज़ फ़रमा। उन्हें सवालात-ए-क़ब्र में कामयाबी अता फ़रमा। उनकी क़ब्र को जन्नत के बाग़ों में से एक बाग़ बना दे। उन्हें जन्नतुल फ़िरदौस में आला मुक़ाम अता फ़रमा और अपने प्यारे हबीब हज़रत मुहम्मद ﷺ की शफ़ाअत नसीब फ़रमा।

या अल्लाह! अहल-ए-ख़ाना को सब्र-ए-जमील अता फ़रमा, इस सदमे को बर्दाश्त करने की ताक़त दे और मरहूमा के लिए किए गए तमाम नेक अमल और दुआओं को उनके हक़ में क़बूल फ़रमा। आमीन या रब्बुल आलमीन।

राब्ता

मय्यत के सिलसिले में मज़ीद मालूमात के लिए मरहूमा के फ़रज़ंद जनाब परवेज़ साहब से इस मोबाइल नंबर पर राब्ता क़ायम किया जा सकता है:

📞 9719929191

तमाम हज़रात से ख़ुसूसन गुज़ारिश है कि मरहूमा के लिए फ़ातिहा-ख़्वानी और दुआ-ए-मग़फिरत फ़रमाएँ।

अल्लाह तआला मरहूमा को जन्नतुल फ़िरदौस में आला मुक़ाम अता फ़रमाए और तमाम पसमान्दगान को सब्र-ए-जमील अता फ़रमाए।
आमीन सुम्मा आमीन।


सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार से पंजीकृत, मुल्क की राजधानी नई दिल्ली से प्रसारित, पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी की मुल्क की इकलौती क़ौमी समाचार पत्रिका, न्यूज़ पोर्टल एवं यूट्यूब चैनल “मुल्तानी समाज” के लिए उत्तर प्रदेश डेस्क से प्रधान संपादक ज़मीर आलम की ख़ास रिपोर्ट।

अपनी ख़बर हमें भेजें

अगर आप भी अपनी ख़बर, मज़मून (आर्टिकल), पैग़ाम, मुबारकबाद, ताज़ियती इश्तिहार, दिलचस्प वाक़ियात, तहरीर, अफ़साना (कहानी) या अपने कारोबार का इश्तिहार (विज्ञापन) क़ौमी सतह पर शाया या प्रसारित करवाना चाहते हैं तो बराए मेहरबानी नीचे दिए गए नंबरों पर राब्ता फ़रमाएँ।

📞 9410652990
📞 8010884848

आपका एतमाद ही हमारी सबसे बड़ी ताक़त है।

“मुल्तानी समाज”

अपनी बिरादरी की आवाज़ — अपनी पहचान

मुल्तानी-डे पर बिरादरी के चौधरियों की खामोशी क्यों?

जब बिरादरी का एक अहम मसला सामने हो तो 30-40 साल की ख़िदमत का दावा करने वाले जिम्मेदार हज़रात बोलने से क्यों गुरेज़ कर रहे हैं?

ख़ास रिपोर्ट | उत्तर प्रदेश डेस्क

बिरादरी की ख़िदमत, बिरादरी की एकता और बिरादरी के वक़ार की बातें करना आसान है, लेकिन जब बिरादरी के सामने कोई अहम और संवेदनशील मसला खड़ा हो जाए, तब उस मसले पर सही वक़्त में आवाज़ उठाना ही असल ख़िदमत और जिम्मेदारी की पहचान होती है।

आज मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी के सामने "मुल्तानी-डे" से जुड़ा एक ऐसा ही अहम सवाल खड़ा है, जिस पर बिरादरी के बुज़ुर्गों, चौधरियों, ओहदेदारों और प्रभावशाली सामाजिक जिम्मेदारों की खामोशी लगातार सवाल पैदा कर रही है।

बिरादरी में कई ऐसे हज़रात हैं जो अक्सर यह कहते सुनाई देते हैं कि उन्होंने तीन दशक, चार दशक या उससे भी अधिक समय से बिरादरी की ख़िदमत की है। यक़ीनन बिरादरी की ख़िदमत एक क़ाबिले-ए-एहतराम अमल है और जो लोग लंबे अरसे से समाज के लिए काम करते आए हैं, उनका एहतराम किया जाना चाहिए।

लेकिन सवाल यह है कि जब बिरादरी का कोई अहम मामला सामने आए, जब किसी मसले से बिरादरी की एकता, पहचान और आपसी इत्तेहाद प्रभावित होने का अंदेशा पैदा हो, तब वही जिम्मेदार आवाज़ बुलंद करने से क्यों पीछे हट जाते हैं?

क्या ऐसी सूरत में खामोशी ही सबसे बेहतर रास्ता है?

"मुल्तानी-डे" की परम्परा को लेकर उठे सवाल

पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी की राष्ट्रीय समाचार पत्रिका "मुल्तानी समाज" से जुड़े मुल्तानी समाज चैरिटेबल ट्रस्ट द्वारा कई वर्ष पूर्व राष्ट्रीय अधिवेशन के सिलसिले में 12 नवंबर को "मुल्तानी-डे" के नाम से कार्यक्रम आयोजित करने और इसे बिरादरी के बीच पहचान दिलाने की शुरुआत की गई।

समय के साथ यह तारीख और यह नाम बिरादरी के सामाजिक कार्यक्रमों और पहचान के संदर्भ में चर्चा का हिस्सा बनते चले गए।

लेकिन अब कस्बा खतौली, जनपद मुजफ्फरनगर, उत्तर प्रदेश की एक तंजीम द्वारा 15 अक्टूबर को पूर्व राष्ट्रपति एवं महान वैज्ञानिक डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम साहब की यौमे-पैदाइश के मौके पर इसी नाम "मुल्तानी-डे" से कार्यक्रम आयोजित किए जाने की कोशिश की जा रही है।

यहीं से एक अहम सामाजिक सवाल पैदा होता है—

अगर कोई कार्यक्रम एक निर्धारित तारीख और नाम के साथ वर्षों से बिरादरी के एक मंच द्वारा आयोजित होता रहा है, तो उसी नाम को उसकी तय तारीख से ठीक एक माह पहले किसी दूसरे कार्यक्रम के लिए इस्तेमाल किए जाने पर बिरादरी के जिम्मेदार लोगों को कम-से-कम अपनी राय जाहिर नहीं करनी चाहिए?

यह सवाल किसी व्यक्ति या तंजीम की मुखालफत के लिए नहीं, बल्कि बिरादरी की साझा पहचान, सामाजिक परम्परा और भविष्य में पैदा होने वाली गलतफहमियों को रोकने के लिए उठाया जा रहा है।

चौधरियों से सिर्फ इतनी सी गुज़ारिश—बोलिए तो सही!

हम यह नहीं कहते कि कोई किसी से लड़ाई करे।

हम यह भी नहीं कहते कि किसी कार्यक्रम को रोकने के लिए सामाजिक टकराव पैदा किया जाए।

लेकिन इतना तो कहा ही जा सकता है कि—

"भाई, अगर 'मुल्तानी-डे' नाम से कोई कार्यक्रम पहले से एक तारीख के साथ बिरादरी में स्थापित है, तो उसी नाम से ठीक एक माह पहले कार्यक्रम आयोजित करने से भविष्य में भ्रम और मतभेद पैदा हो सकते हैं। लिहाज़ा इस पर आपस में बैठकर बात कर ली जाए।"

क्या इतनी बात कहने के लिए भी किसी चौधरी, बुज़ुर्ग या ओहदेदार को किसी से इजाज़त की जरूरत है?

अगर बिरादरी के बड़े-बड़े जिम्मेदार लोग किसी मसले पर अपनी राय ही जाहिर नहीं करेंगे, तो फिर उनकी चौधराहट, ओहदेदारी और सामाजिक जिम्मेदारी का असल मतलब क्या रह जाता है?

दिल्ली-NCR के जिम्मेदार हज़रात भी खामोश क्यों?

मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी के दिल्ली-NCR समेत विभिन्न इलाकों में ऐसे अनेक सामाजिक रूप से प्रभावशाली और रसूखदार हज़रात मौजूद हैं, जिनका ताल्लुक बड़ौत, खतौली और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के इलाकों से रहा है।

इन बुज़ुर्गों और जिम्मेदार हज़रात से बिरादरी को हमेशा उम्मीद रही है कि जब भी कोई सामाजिक मसला सामने आएगा, वे हिकमत, समझदारी और भाईचारे के साथ अपना किरदार अदा करेंगे।

लेकिन "मुल्तानी-डे" को लेकर सामने आए इस पूरे प्रकरण में जिस तरह की खामोशी दिखाई दे रही है, उसने बिरादरी के आम लोगों को सोचने पर मजबूर कर दिया है।

आख़िर ये खामोशी किस इंतज़ार में है?

क्या किसी बड़े टकराव का इंतज़ार किया जा रहा है?

या फिर यह उम्मीद की जा रही है कि मामला खुद-ब-खुद खत्म हो जाएगा?

अगर ऐसा है तो यह सोच शायद सही नहीं है।

क्योंकि सामाजिक मसले खामोशी से खत्म नहीं होते, बल्कि कई बार खामोशी ही उन्हें आने वाले दिनों में बड़ा विवाद बना देती है।

बिरादरी को जोड़ना है, तो पहले संवाद शुरू कीजिए

आज जरूरत किसी को छोटा या बड़ा साबित करने की नहीं है।

जरूरत है कि बिरादरी के बुज़ुर्ग, चौधरी, ओहदेदार और सामाजिक तंजीमें एक जगह बैठें, एक-दूसरे की बात सुनें और ऐसा रास्ता निकालें जिससे बिरादरी का इत्तेहाद भी कायम रहे और किसी की सामाजिक इज़्ज़त भी प्रभावित न हो।

अगर किसी कार्यक्रम के नाम और तारीख को लेकर गलतफहमी पैदा हो रही है तो उसे बातचीत के जरिए दूर किया जा सकता है।

अगर दो तंजीमें एक ही नाम को लेकर कार्यक्रम करना चाहती हैं तो उनके बीच आपसी मशविरा हो सकता है।

अगर किसी एक नाम की वर्षों पुरानी सामाजिक पहचान है तो उसका भी एहतराम किया जा सकता है।

यही तो बिरादरी के बुज़ुर्गों और चौधरियों का असल किरदार होना चाहिए।

क्या बिरादरी के फैसलों पर भी सवाल उठने चाहिए?

आज आम बिरादरी के बीच एक और सवाल चर्चा का विषय बन रहा है।

जब सामाजिक कार्यक्रमों के नाम और तारीख जैसे अपेक्षाकृत सामान्य मसले पर भी बिरादरी के जिम्मेदार हज़रात अपनी राय सामने रखने से गुरेज़ करें, तो आम लोग यह सवाल करने पर मजबूर होंगे कि—

अगर कल बिरादरी के किसी बड़े और गंभीर मसले पर फैसला लेना पड़ा, तो फैसला किस आधार पर होगा और उसकी जवाबदेही किसकी होगी?

चौधराहट केवल किसी पद, नाम या पहचान का नाम नहीं।

चौधराहट का मतलब है—मुश्किल वक्त में बिरादरी के साथ खड़ा होना, सही बात को सही तरीके से कहना और दो पक्षों के बीच इत्तेहाद कायम कराने की कोशिश करना।

"मुल्तानी समाज" ने अपनी जिम्मेदारी निभाई

इस पूरे मामले को "मुल्तानी समाज" राष्ट्रीय समाचार पत्रिका अपने न्यूज़ पोर्टल और मीडिया प्लेटफॉर्म के माध्यम से पहले भी बिरादरी के सामने रख चुकी है।

हमारा मकसद किसी तंजीम, शख्स या कार्यक्रम की तौहीन करना नहीं है।

हमारा मकसद सिर्फ इतना है कि बिरादरी के सामने पैदा हो रही संभावित गलतफहमी को समय रहते बातचीत और सामाजिक मशविरे के जरिए दूर किया जाए।

लेकिन अगर बिरादरी के बुज़ुर्ग, चौधरी और ओहदेदार अब भी इस मसले पर कोई संज्ञान नहीं लेते, तो आम बिरादरी के बीच यह सवाल उठना लाज़िमी है कि आखिर बिरादरी की आवाज़ कौन बनेगा?

क्या हर मसले पर आम लोगों को ही अपनी आवाज़ उठानी पड़ेगी?

या फिर बिरादरी के जिम्मेदार हज़रात भी अपनी जिम्मेदारी निभाएंगे?

एक सप्ताह—बिरादरी के जिम्मेदारों के नाम

"मुल्तानी समाज" बिरादरी के तमाम बुज़ुर्गों, चौधरियों, ओहदेदारों और सामाजिक जिम्मेदारों से अदब के साथ अपील करता है कि इस मामले पर एक सप्ताह के भीतर अपनी राय और जिम्मेदारी का इज़हार करें।

किसी के खिलाफ नहीं—

बिरादरी के हक़ में।

किसी से लड़ने के लिए नहीं—

बिरादरी को जोड़ने के लिए।

किसी की तौहीन के लिए नहीं—

बिरादरी की पहचान और वक़ार की हिफाज़त के लिए।

अगर इस मुद्दे पर बिरादरी के जिम्मेदार हज़रात कोई पहल करते हैं तो "मुल्तानी समाज" उसका खैरमकदम करेगा और बिरादरी के इत्तेहाद की हर सकारात्मक कोशिश को पूरी इज़्ज़त के साथ जगह देगा।

लेकिन अगर लगातार खामोशी बरकरार रही और कोई जिम्मेदार पहल सामने नहीं आई, तो "मुल्तानी समाज" राष्ट्रीय समाचार पत्रिका अपने स्तर पर उपलब्ध दस्तावेज़ों, पूर्व प्रकाशित सामग्री, तारीखों और संबंधित तथ्यों का जायज़ा लेते हुए इस मामले को सामाजिक एवं आवश्यकतानुसार कानूनी पहलुओं की रोशनी में आगे देखेगी।

क्योंकि किसी भी बिरादरी की ताक़त उसके लोगों की तादाद में नहीं, बल्कि उसके इत्तेहाद, उसूल, आपसी एहतराम और सही वक़्त पर सही बात कहने की हिम्मत में होती है।

आख़िर में चौधरियों से एक सवाल…

अगर आप 30-40 साल से बिरादरी की ख़िदमत कर रहे हैं, तो आज बिरादरी के इस मसले पर आपकी आवाज़ कहाँ है?

अगर आप लड़ नहीं सकते तो कोई बात नहीं—लेकिन क्या आप अपनी बिरादरी के लिए सिर्फ इतना भी नहीं कह सकते कि जो कार्यक्रम वर्षों से एक खास नाम और तारीख के साथ मनाया जाता रहा है, उसी नाम से ठीक एक माह पहले कार्यक्रम आयोजित करने से पैदा होने वाली गलतफहमी पर बातचीत होनी चाहिए?

बिरादरी आपकी तरफ देख रही है…
अब खामोशी नहीं, हिकमत और जिम्मेदारी से बात करने का वक्त है।


सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार से पंजीकृत, मुल्क की राजधानी नई दिल्ली से प्रसारित, पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी की क़ौमी समाचार पत्रिका, न्यूज़ पोर्टल और यूट्यूब चैनल "मुल्तानी समाज" के लिए उत्तर प्रदेश डेस्क से प्रधान संपादक ज़मीर आलम की ख़ास रिपोर्ट।

अपनी ख़बर हम तक पहुँचाएँ

अगर आप भी अपनी ख़बर, मज़मून (आर्टिकल), पैग़ाम, मुबारकबाद, ताज़ियती इश्तिहार, दिलचस्प वाक़ियात, तहरीर, अफ़साना (कहानी) या अपने कारोबार का इश्तिहार (विज्ञापन) क़ौमी सतह पर शाया या प्रसारित करवाना चाहते हैं, तो बराए मेहरबानी नीचे दिए गए नंबरों पर राब्ता फ़रमाएँ।

📞 9410652990
📞 8010884848

आपका एतमाद ही हमारी सबसे बड़ी ताक़त है।

"मुल्तानी समाज"

अपनी बिरादरी की आवाज़ — अपनी पहचान

इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन निहायत ही रंज-ओ-ग़म के साथ इत्तिला — सुलेमान भुट्टो साहब की अहलिया सुगरा बानो का इंतिक़ाल

भीलवाड़ा (राजस्थान), 04 अक्टूबर 2026।
निहायत ही रंज-ओ-ग़म और दिली सदमे के साथ तमाम बिरादराना हज़रात को यह इत्तिला दी जाती है कि जनाब सुलेमान भुट्टो साहब की अहलिया मोहतरमा सुगरा बानो का आज दिन इतवार, बा-तारीख़ 04 अक्टूबर 2026 को बिगोद, ज़िला भीलवाड़ा, राजस्थान में क़ज़ा-ए-इलाही से इंतिक़ाल हो गया।

इन्ना लिल्लाहि वा इन्ना इलैहि राजिऊन।

मरहूमा के इंतिक़ाल की ख़बर से खानदान, अज़ीज़-ओ-अक़ारिब और बिरादरान-ए-मुल्तानी में गहरे रंज और सदमे की लहर दौड़ गई है। हर आँख अश्कबार और हर दिल ग़मगीन है। इस मुश्किल और ग़म के मौक़े पर हम तमाम अहल-ए-ख़ानदान के साथ दिली हमदर्दी और ताज़ियत का इज़हार करते हैं।

मरहूमा के लिए दुआ-ए-मग़फ़िरत

बारगाह-ए-इलाही में दस्त-ब-दुआ हैं कि अल्लाह तआला मरहूमा सुगरा बानो की मुकम्मल मग़फ़िरत फ़रमाए, उनकी तमाम ख़ताओं और कोताहियों को माफ़ फ़रमाए, उनके दर्जात बुलंद फ़रमाए और उन्हें जन्नतुल फ़िरदौस में आला मुक़ाम अता फ़रमाए।

ऐ अल्लाह! मरहूमा की क़ब्र को नूर से मुनव्वर फ़रमा, उसे कुशादा फ़रमा, उसे जन्नत के बाग़ों में से एक बाग़ बना दे और उन्हें अपनी रहमत के साये में जगह अता फ़रमा।

ऐ परवरदिगार! मरहूमा से क़ब्र के सवालात आसान फ़रमा, उनकी क़ब्र को अमन और सुकून की जगह बना और क़यामत के दिन उन्हें अपनी ख़ास रहमत और मग़फ़िरत नसीब फ़रमा। आमीन या रब्बुल आलमीन।

तदफ़ीन की इत्तिला का इंतज़ार

ख़बर लिखे जाने तक मरहूमा की नमाज़-ए-जनाज़ा और तदफ़ीन का वक़्त तय होने की इत्तिला हासिल नहीं हो सकी थी। जैसे ही खानदान की तरफ़ से नमाज़-ए-जनाज़ा और तदफ़ीन के सिलसिले में मुकम्मल जानकारी हासिल होगी, उसे ख़बर में अपडेट कर दिया जाएगा।

जब मरहूमा को क़ब्र में उतारा जाए और मिट्टी दी जाए, तो तमाम अहल-ए-बिरादरी से गुज़ारिश है कि इस मौक़े पर दिल से उनके लिए दुआ-ए-मग़फ़िरत करें।

ऐ अल्लाह! जिस वक़्त मरहूमा को क़ब्र में उतारा जाए, उस वक़्त अपनी रहमत उनके शामिल-ए-हाल फ़रमा। क़ब्र को उनके लिए तन्हाई और तारीकी की जगह न बना, बल्कि नूर, सुकून और रहमत से भर दे।

ऐ अल्लाह! मिट्टी की हर परत को उनके लिए राहत और रहमत का ज़रिया बना। उनकी क़ब्र पर अपनी रहमतों की बारिश फ़रमा और उन्हें जन्नत की ख़ुशबू और ठंडक नसीब फ़रमा। आमीन।

मिट्टी देने की दुआ

मिट्टी देते वक़्त दिल में यह दुआ की जाए:

“ऐ अल्लाह! हम इस अमानत को तेरे सुपुर्द करते हैं। तू ही इस अमानत का मालिक है। मरहूमा की मग़फ़िरत फ़रमा, उनकी क़ब्र को नूर से भर दे, उनकी मंज़िल आसान फ़रमा और उन्हें जन्नतुल फ़िरदौस में जगह अता फ़रमा।”

इसके बाद तमाम हाज़िरीन से मरहूमा के लिए सूरह-ए-फ़ातिहा, सूरह-ए-इख़लास और दुआ-ए-मग़फ़िरत करने की गुज़ारिश है।

सब्र-ए-जमील की दुआ

अल्लाह तआला मरहूमा के तमाम अहल-ए-ख़ानदान, अज़ीज़-ओ-अक़ारिब और दोस्तों को इस सदमे को बर्दाश्त करने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए और सभी को सब्र-ए-जमील नसीब फ़रमाए।

ऐ अल्लाह! ग़मज़दा खानदान के दिलों को सुकून अता फ़रमा, उनके आँसुओं को अपनी रहमत का ज़रिया बना और उन्हें इस सदमे पर सब्र करने का अज्र-ए-अज़ीम अता फ़रमा।

आमीन या रब्बुल आलमीन।

मय्यत के सिलसिले में राब्ता

मय्यत की नमाज़-ए-जनाज़ा, तदफ़ीन और दूसरे मामलों के बारे में ज़्यादा मालूमात के लिए:

जनाब मोइनुद्दीन मुल्तानी
📞 9529395915

से राब्ता करके मुकम्मल जानकारी हासिल की जा सकती है।


सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार से पंजीकृत, मुल्क की राजधानी नई दिल्ली से प्रसारित, पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी की मुल्क की इकलौती क़ौमी समाचार पत्रिका, न्यूज़ पोर्टल और यूट्यूब चैनल “मुल्तानी समाज” के लिए उत्तर प्रदेश डेस्क से प्रधान संपादक ज़मीर आलम की ख़ास रिपोर्ट।

अपनी ख़बर हम तक पहुँचाएँ

अगर आप भी अपनी ख़बर, मज़मून (आर्टिकल), पैग़ाम, मुबारकबाद, ताज़ियती इश्तिहार, दिलचस्प वाक़ियात, तहरीर, अफ़साना (कहानी) या अपने कारोबार का इश्तिहार (विज्ञापन) क़ौमी सतह पर शाया या प्रसारित करवाना चाहते हैं, तो बराए मेहरबानी नीचे दिए गए नंबरों पर राब्ता फ़रमाएँ:

📞 9410652990
📞 8010884848

आपका एतमाद ही हमारी सबसे बड़ी ताक़त है।

“मुल्तानी समाज”

अपनी बिरादरी की आवाज़ — अपनी पहचान

🖤 इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन 🖤 निहायत ही रंज-ओ-ग़म के साथ हाजी इलियास साहब के इंतिक़ाल की ख़बर, मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी में पसरा मातम

देहरादून/अंबेहटा। निहायत ही रंज-ओ-ग़म और अफ़सोस के साथ तमाम मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरान-ए-वतन को इत्तिला दी जाती है कि जनाब हाजी इलियास साहब वल्द जनाब हाजी मुनीर साहब मरहूम, उम्र तकरीबन 67 वर्ष, निवासी हाइडिल वाले, क़स्बा अंबेहटा, ज़िला सहारनपुर, उत्तर प्रदेश तथा हाल बाशिंदा क़स्बा ढालीपुर/हरबर्टपुर, तहसील विकासनगर, ज़िला देहरादून, उत्तराखंड का आज शनिचर, 03 अक्टूबर 2026 को रात तकरीबन 10 बजे देहरादून के एक अस्पताल में इलाज के दौरान क़ज़ा-ए-इलाही से इंतिक़ाल हो गया।

इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन।

मरहूम अपने पीछे अपनी अहलिया, भाई-बहन, औलाद, पौते-पोतियां, नाते-नातिन, तमाम खानदान, रिश्तेदारों और अज़ीज़-ओ-अक़ारिब को ग़मज़दा और अश्कबार छोड़कर इस फ़ानी दुनिया से हमेशा के लिए रुख़्सत हो गए।

मरहूम के इंतिक़ाल की ख़बर से उनके खानदान, अज़ीज़-ओ-अक़ारिब और जानने वालों में गहरा सदमा और ग़म की लहर दौड़ गई है। इस मुश्किल घड़ी में तमाम अहल-ए-खानदान के साथ हम भी बराबर के शरीक-ए-ग़म हैं।

🤲 मरहूम के लिए दुआ-ए-मग़फ़िरत

ऐ अल्लाह! जनाब हाजी इलियास साहब की मग़फ़िरत-ओ-बख़्शिश फ़रमा।
उनकी तमाम ख़ताओं और गुनाहों को माफ़ फ़रमा।
उनकी क़ब्र को नूर से मुनव्वर फ़रमा और उसे जन्नत के बाग़ों में से एक बाग़ बना दे।
उनकी क़ब्र को कुशादा फ़रमा, उसमें सुकून और राहत अता फ़रमा।
उनसे दरगुज़र फ़रमा और अपनी रहमत-ए-कामिला के साये में जगह अता फ़रमा।
उन्हें जन्नतुल फ़िरदौस में आला मुक़ाम अता फ़रमा और अपने महबूब बंदों की रिफ़ाक़त नसीब फ़रमा।

या अल्लाह! मरहूम को ईमान और कलिमा-ए-तौहीद के साथ दुनिया से रुख़्सत होने का अज्र अता फ़रमा और उनकी आख़िरत आसान फ़रमा। आमीन या रब्बुल आलमीन।

🤲 दफ़्न और मिट्टी देने के मौक़े पर दुआ

मिली जानकारी के मुताबिक़ मय्यत को बाद नमाज़-ए-जौहर ठीक 2 बजे गांव ढकरानी स्थित कब्रिस्तान में किया जायेगा सपुर्दे - ख़ाक, लिहाज़ा आप हज़रात भी जनाज़े में शरीक होकर सवाबे दारेन हासिल करें।

जब मरहूम को क़ब्र में उतारा जाए तो तमाम अहबाब और बिरादरान उनके लिए दुआ-ए-मग़फ़िरत करें और अल्लाह तआला से उनकी आख़िरत की आसानी की दुआ मांगें।

ऐ अल्लाह! जब हमारे इस भाई को क़ब्र में उतारा जाए तो अपनी रहमत से उनकी क़ब्र को सुकून का घर बना देना। मिट्टी की पहली मंज़िल को उनके लिए आसान फ़रमा, सवाल-ए-क़ब्र में साबित-क़दम रखना और हर तरह की तंगी व अज़ाब से महफ़ूज़ फ़रमाना।

ऐ अल्लाह! जो लोग उनकी मय्यत में शरीक हों, उनके क़दमों को अज्र अता फ़रमा और जो उनके लिए दुआ करें उनकी दुआ क़ुबूल फ़रमा। आमीन।

मय्यत को मिट्टी देने के बाद भी मरहूम के लिए दुआ-ए-मग़फ़िरत, सदक़ा-ए-जारीया और नेक आमाल का सवाब पहुंचाने की दुआ की जाए।

🤲 अहल-ए-खानदान के लिए सब्र की दुआ

ऐ परवरदिगार! मरहूम के तमाम अहल-ए-खानदान, अहलिया, औलाद, भाई-बहन, पौते-पोतियों, नाते-नातिन और तमाम अज़ीज़-ओ-अक़ारिब को इस सदमे को बर्दाश्त करने की तौफ़ीक़ अता फ़रमा।

उनके दिलों को सब्र-ए-जमील अता फ़रमा, उनकी आंखों के आंसुओं को अपनी रहमत का ज़रिया बना और उन्हें इस सदमे के बदले अपने ख़ज़ाना-ए-रहमत से बेहतर अज्र अता फ़रमा।

अल्लाह तआला मरहूम की मग़फ़िरत फ़रमाए, दर्जात बुलंद फ़रमाए, जन्नतुल फ़िरदौस में आला मुक़ाम अता फ़रमाए और तमाम पसमान्दगान को सब्र-ए-जमील अता फ़रमाए।

आमीन या रब्बुल आलमीन।

📞 मय्यत के बारे में जानकारी

मय्यत के बारे में मज़ीद मालूमात तथा नमाज़-ए-जनाज़ा और दफ़्न के वक़्त व मक़ाम की जानकारी के लिए जनाब मोहम्मद हाशिम, झिंझाना वाले और मरहूम के फरजंद जनाब अकरम साहब के मोबाईल नंबर -8077513452 से मोबाइल नंबर 7906309363 पर राब्ता क़ायम किया जा सकता है।

तमाम बिरादरान से गुज़ारिश है कि जैसे ही नमाज़-ए-जनाज़ा और तदफ़ीन का वक़्त व मक़ाम मालूम हो, एक-दूसरे तक इत्तिला पहुंचाएं और मौक़ा मिलने पर जनाज़े में शरीक होकर मरहूम के लिए दुआ-ए-मग़फ़िरत करें।

अल्लाह तआला मरहूम की मग़फ़िरत फरमाए। आमीन।


सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार से पंजीकृत, मुल्क की राजधानी नई दिल्ली से प्रसारित, पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी की क़ौमी समाचार पत्रिका, न्यूज़ पोर्टल और यूट्यूब चैनल "मुल्तानी समाज" के लिए उत्तर प्रदेश डेस्क से प्रधान संपादक ज़मीर आलम की ख़ास रिपोर्ट।

📢 अपनी ख़बर हम तक पहुंचाएं

अगर आप भी अपनी ख़बर, मज़मून (आर्टिकल), पैग़ाम, मुबारकबाद, ताज़ियती इश्तिहार, दिलचस्प वाक़ियात, तहरीर, अफ़साना (कहानी) या अपने कारोबार का इश्तिहार (विज्ञापन) क़ौमी सतह पर शाया या प्रसारित करवाना चाहते हैं तो बराए मेहरबानी नीचे दिए गए नंबरों पर राब्ता फ़रमाएं।

📞 9410652990
📞 8010884848

आपका एतमाद ही हमारी सबसे बड़ी ताक़त है।

"मुल्तानी समाज" — अपनी बिरादरी की आवाज़, अपनी पहचान।

डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम की यौमे-पैदाइश पर एक बिरादरी तक महदूद आयोजन पर उठे सवाल, “मुल्तानी-डे” की तारीख को लेकर भी सामने आया मतभेद

“मिसाइल मैन” जैसे राष्ट्रीय नायक की विरासत को किसी एक बिरादरी तक सीमित न किया जाए—मुल्तानी समाज की ओर से आयोजन के स्वरूप और उद्देश्य पर सवाल

मुज़फ्फरनगर/खतौली।
भारत के पूर्व राष्ट्रपति, महान वैज्ञानिक और देश के युवाओं के प्रेरणास्रोत डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम की यौमे-पैदाइश के सिलसिले में आयोजित किए जाने वाले एक कार्यक्रम को लेकर मुस्लिम मुल्तानी लोहार, बढ़ई बिरादरी के बीच बहस और सवाल सामने आने लगे हैं। मुल्तानी समाज की ओर से जारी प्रतिक्रिया में कहा गया है कि डॉ. कलाम जैसी अज़ीम और राष्ट्रीय स्तर की शख्सियत को किसी एक बिरादरी तक महदूद करके कार्यक्रम आयोजित करना उनके राष्ट्रीय कद और विरासत की व्यापकता के अनुरूप नहीं है।

मुल्तानी समाज के मुताबिक, डॉ. कलाम केवल किसी एक बिरादरी, मज़हब या समुदाय की शख्सियत नहीं थे, बल्कि पूरे हिन्दुस्तान के लिए एक नायाब हीरे की हैसियत रखते थे। उन्होंने विज्ञान, शिक्षा और राष्ट्र निर्माण के क्षेत्र में अपनी सेवाओं से देश और दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाई। ऐसे में उनकी यौमे-पैदाइश के मौके पर होने वाले किसी भी कार्यक्रम में समाज के हर तबके की शिरकत होनी चाहिए और हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई समेत सभी समुदायों को दावत दी जानी चाहिए।

“डॉ. कलाम के नाम पर कार्यक्रम हो तो दायरा भी राष्ट्रीय होना चाहिए”

मुल्तानी समाज की ओर से कहा गया है कि अगर किसी तंजीम की तरफ से डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम के नाम पर कार्यक्रम आयोजित किया जाता है तो उसका विरोध नहीं है। बल्कि ऐसी कोशिश का स्वागत होना चाहिए, बशर्ते कार्यक्रम का मकसद उनकी वैज्ञानिक सोच, तालीम, इंसानियत और राष्ट्र निर्माण के पैगाम को आम करना हो।

हालांकि, संगठन की ओर से यह सवाल उठाया गया है कि क्या इतनी अज़ीम राष्ट्रीय शख्सियत की यौमे-पैदाइश को केवल एक बिरादरी की महफ़िल तक सीमित रखना मुनासिब है? इस सवाल पर बिरादरी और समाज के लोगों से गंभीरता से गौर करने की अपील की गई है।

“मुल्तानी-डे” की तारीख को लेकर भी उठी आवाज़

इस पूरे मामले में एक दूसरा अहम पहलू “मुल्तानी-डे” की तारीख को लेकर सामने आया है। मुल्तानी समाज चैरिटेबल ट्रस्ट की ओर से कहा गया है कि उसकी ओर से राष्ट्रीय अधिवेशन को हर वर्ष 12 नवंबर को “मुल्तानी-डे” के नाम से मनाए जाने की परंपरा वर्षों से चली आ रही है।

संगठन का कहना है कि ऐसे में अक्टूबर महीने में, यानी परंपरागत तारीख से लगभग एक माह पहले, डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम के नाम को जोड़कर “मुल्तानी-डे” के आयोजन की घोषणा किए जाने से बिरादरी में भ्रम, मतभेद और टकराव की स्थिति पैदा हो सकती है।

मुल्तानी समाज का कहना है कि एक ही बिरादरी के भीतर अलग-अलग तारीखों और अलग-अलग मंचों के माध्यम से समान नाम को लेकर कार्यक्रम किए जाने के बजाय आपसी मशवरे और भाईचारे का रास्ता अपनाया जाना चाहिए।

“टकराव नहीं, इत्तेहाद और मशवरा ज़रूरी”

मुल्तानी समाज की ओर से यह भी कहा गया कि बिरादरी की किसी भी तंजीम या संस्था को सामाजिक और शैक्षिक कार्यक्रम आयोजित करने का अधिकार है, लेकिन किसी भी राष्ट्रीय शख्सियत के नाम का इस्तेमाल करते समय उसके मकसद और स्वरूप को साफ रखना भी ज़रूरी है।

संगठन के मुताबिक, मुल्तानी बिरादरी के नाम पर होने वाले कार्यक्रम बिरादरी को जोड़ने वाले होने चाहिए, बांटने वाले नहीं। अगर किसी आयोजन से दो धड़ों के बीच गलतफ़हमियां पैदा हों तो बेहतर होगा कि संबंधित जिम्मेदार लोग बैठकर बातचीत करें और ऐसा रास्ता निकालें जिससे बिरादरी की एकता और इज़्ज़त बरकरार रहे।

बिरादरी के सामने सवाल

इस पूरे विवाद के बीच अब मूल सवाल यही है कि डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम की यौमे-पैदाइश का आयोजन किस दायरे और किस मकसद से किया जाए तथा “मुल्तानी-डे” की परंपरागत तारीख को लेकर बिरादरी में क्या रुख अपनाया जाए।

मुल्तानी समाज की ओर से कहा गया है कि अंतिम फैसला किसी एक व्यक्ति या संस्था के बजाय बिरादरी के लोगों के आपसी मशवरे, ऐतिहासिक परंपरा और व्यापक सामाजिक हित को ध्यान में रखकर होना चाहिए।

डॉ. कलाम ने अपनी ज़िंदगी में तालीम, मेहनत, विज्ञान, नौजवानों और मुल्क की तरक्की को अहमियत दी। इसलिए उनके नाम पर होने वाला कार्यक्रम भी ऐसा हो जो इल्म, इत्तेहाद, भाईचारे और राष्ट्र निर्माण का पैगाम समाज तक पहुंचाए।

यह भी ज़रूरी है कि डॉ. कलाम जैसी अज़ीम राष्ट्रीय शख्सियत की याद को किसी बिरादरी के आपसी मतभेद का हिस्सा बनाने के बजाय उनके बताए हुए इल्मी और इंसानी रास्ते को आगे बढ़ाने का जरिया बनाया जाए।


उत्तर प्रदेश डेस्क से विशेष रिपोर्ट

प्रधान संपादक — ज़मीर आलम
सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार से पंजीकृत, नई दिल्ली से प्रसारित राष्ट्रीय समाचार पत्रिका, न्यूज़ पोर्टल एवं YouTube चैनल “मुल्तानी समाज”

नोट: इस रिपोर्ट में व्यक्त आपत्तियां और आरोप संबंधित पक्ष की ओर से व्यक्त किए गए विचार हैं। आयोजन से जुड़े दूसरे पक्ष का आधिकारिक पक्ष उपलब्ध होने पर उसे भी निष्पक्षता के साथ प्रकाशित किया जा सकता है।

अपनी खबर हम तक पहुंचाएं

अगर आप भी अपनी ख़बर, मज़मून (आर्टिकल), पैग़ाम, मुबारकबाद, ताज़ियती इश्तिहार, दिलचस्प वाक़ियात, तहरीर, अफ़साना (कहानी) या कारोबार का इश्तिहार क़ौमी सतह पर शाया या प्रसारित करवाना चाहते हैं, तो राब्ता फ़रमाएँ।

📞 9410652990
📞 8010884848

आपका एतमाद ही हमारी सबसे बड़ी ताक़त है।

“मुल्तानी समाज” — अपनी बिरादरी की आवाज़, अपनी पहचान।

🌹 सादिका नूर व आयशा बानो का निकाह मोहम्मद रिजवान व मोहम्मद तोहीद से होगा

11 अक्टूबर को भीलवाड़ा में सजेगी महफ़िल-ए-निकाह, अहले मक्कड़ खानदान ने बिरादराने अहले मुलतानी को दी दावते आम

भीलवाड़ा (राजस्थान)।
बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम। अल्लाह तआला के फ़ज़्लो करम और हुज़ूर-ए-अकरम हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा ﷺ के सदक़े-तुफ़ैल से अहले मक्कड़ खानदान, दान्थल व पारोली वालों के यहां दो ख़ुशियों के मौक़े एक साथ दस्तक देने जा रहे हैं। खानदान में होने वाली दो निकाह की तक़रीबों को लेकर घर-परिवार और बिरादरी में ख़ुशी का माहौल है।

मरहूम हाजी मोहम्मद कासम साहब मक्कड़, दान्थल वाले की परपोतियों तथा मरहूम हाजी कमालुद्दीन साहब मक्कड़, दान्थल वाले की पोतियों के निकाह की ख़ुशी में अहले मक्कड़ खानदान की जानिब से बिरादराने अहले मुलतानी को ख़ास दावते आम दी गई है।

प्राप्त इत्तिला के मुताबिक़ जनाब मोहम्मद सलीम साहब मक्कड़, दान्थल वाले, भीलवाड़ा की साहबज़ादियों के निकाह की तक़रीब इंशाअल्लाह 11 अक्टूबर 2026, बरोज़ इतवार को अंजाम पाएगी।

🌹 पहला निकाह — सादिका नूर व मोहम्मद रिजवान

पहली नेक दुख्तर सादिका नूर, बिन्ते जनाब मोहम्मद सलीम साहब मक्कड़, दान्थल वाले, भीलवाड़ा, का निकाह मोहम्मद रिजवान, इब्ने अब्दुल मजीद साहब उस्ता (बाबू भाई), भीलवाड़ा के साथ होगा।

🌹 दूसरा निकाह — आयशा बानो व मोहम्मद तोहीद

इसी ख़ुशी के मौक़े पर दूसरी नेक दुख्तर आयशा बानो, बिन्ते जनाब मोहम्मद सलीम साहब मक्कड़, दान्थल वाले, भीलवाड़ा, का निकाह मोहम्मद तोहीद, इब्ने मरहूम अब्दुल रहमान साहब लजवान, काछौला के साथ तय पाया है।

🕌 महफ़िल-ए-निकाह का मुक़र्रर वक़्त

इत्तिला के मुताबिक़ दोनों निकाह 29 रबीउल आखिर 1448 हिजरी, मुताबिक़ 11 अक्टूबर 2026, बरोज़ इतवार, बाद नमाज़-ए-ज़ोहर अदा किए जाएंगे।

मुक़ाम:
मस्जिद-ए-नीलगरान, बाहला

इसके बाद बाद नमाज़-ए-असर दावते आम का एहतिमाम किया गया है।

मुक़ाम:
तिलक नगर कम्यूनिटी हॉल, पॉलीटेक्निक कॉलेज के सामने, भीलवाड़ा।

खानदान की जानिब से तमाम बिरादराने अहले मुलतानी से पुरख़ुलूस गुज़ारिश की गई है कि इस मुबारक तक़रीब में शिरकत फ़रमाकर जश्न-ए-शादी की रौनक़ बढ़ाएं और दोनों नवविवाहित जोड़ों को अपनी ख़ुलूस भरी दुआओं से नवाज़ें।

🌹 खानदान के बुज़ुर्गों की सरपरस्ती

इस ख़ुशी के मौक़े पर हाजी मोहम्मद इब्राहिम साहब मक्कड़, दान्थल वाले सरपरस्त हैं। वहीं अहले मक्कड़ खानदान, दान्थल और पारोली वालों की जानिब से रिश्तेदारों, दोस्तों और बिरादरी के लोगों को इस मुबारक तक़रीब में शामिल होने की दावते आम दी गई है।

खानदान की जानिब से हाजी अब्दुल रज्जाक, हाजी अब्दुल अजीज, हाजी उस्मान गनी, हाजी उस्मान गनी उर्फ़ बाबू, हाजी अब्दुल रहमान, हाजी अब्दुल हमीद, अब्दुल ग़फ़ूर, हाजी मोहम्मद इब्राहिम, हाफ़िज़ मोहम्मद सिद्दीक़, अब्दुल क़य्यूम, मोहम्मद यूनुस, हाजी जमालुद्दीन, हाजी कमालुद्दीन, अब्दुल हकीम, हाजी अलारख़ हुसैन, मोहम्मद उमर, हाजी मोहम्मद सिद्दीक़, मोहम्मद हनीफ़, हाजी मुबारक हुसैन, मोहम्मद शरीफ़, हाजी मोहम्मद हनीफ़, मोहम्मद शफ़ीक़, हाजी मोहम्मद आरिफ़, हाजी मोहम्मद इरफ़ान और मोहम्मद आसिफ़ सहित अहले मक्कड़ खानदान मौजूद रहेगा।

🌺 बिरादरी को पुरख़ुलूस दावत

इस मुबारक मौक़े पर हाजी मोहम्मद हनीफ़, हाजी मोहम्मद शरीफ़, मोहम्मद उमर, मोहम्मद सलीम, मोहम्मद इस्माइल, अब्दुल सत्तार, मोहम्मद इदरीस, अब्दुल सलाम, हाजी फ़ज़लुर्रहमान, हबीबुर्रहमान, शफ़ीक़ुर्रहमान, मोहम्मद अय्यूब, मोहम्मद याक़ूब, मोहम्मद एहसान, मोहम्मद इमरान, मोहम्मद इरफ़ान, मोहम्मद कलीम, अब्दुल क़ादर, अब्दुल शकूर, ज़हूर हसन, अब्दुल करीम, वाहिद हुसैन, मोइनुद्दीन, अमीनुद्दीन, साजिद हुसैन और माजिद हुसैन सहित अहले मक्कड़ खानदान की जानिब से बिरादराने अहले मुलतानी को दावते आम दी गई है।

वहीं मोहम्मद रफ़ीक़, मोहम्मद शफ़ीक़, मोहम्मद अनीस, मोहम्मद याक़ूब, हाजी मोहम्मद आसिफ़, मोहम्मद इरफ़ान, मोहम्मद यूनुस, मोहम्मद इमरान, मोहम्मद असलम, नूर हसन, मोहम्मद फ़ारूक़, मोहम्मद तौसीफ़, अल्ताफ़ हुसैन, मोहम्मद शोएब, मोहम्मद आरिफ़, मोहम्मद शाहरुख़, मोहम्मद सोहेल, मोहसिन हुसैन, तौफ़ीक़ नूर, मोहम्मद शाहिद, मोहम्मद फ़ैज़ान, वसीम हुसैन, मोहम्मद आक़िब उर्फ़ शेर अली, मोहम्मद फरहान, मुज़फ़्फ़र रहमान, मोहम्मद अमान, अब्दुल वहाब, मोहम्मद अरशद, अली हसन, अब्दुल हक़, ताहा नूर, मोहम्मद मुज़फ़्फ़र, मोहम्मद रज़ा, अब्दुल मुत्तलिफ़, ताहिर हुसैन, मोहम्मद अली, मोहम्मद कैफ़, मोहम्मद मूसा, मोहम्मद शारिम, मोहम्मद हमज़ा, मोहम्मद ज़की, मोहम्मद नूमान, मोहम्मद मुज़म्मिल और मोहम्मद मुदस्सिर समेत खानदान के अफ़राद अपनी मौजूदगी से इस ख़ुशी को यादगार बनाएंगे।

🌹 लख़्त-ए-जिगर और नन्ही इल्तेजा

खानदान के लख़्त-ए-जिगर अली हसन, सैफ़ुल्लाह, मक़सूद हसन, मोहम्मद हसन, मोहम्मद हुसैन, मोहम्मद रज़ा, मोहम्मद ज़ैद, मोहम्मद अली रज़ा और मोहम्मद रूहान भी इस मुबारक मौक़े पर अपनी ख़ुशियों में शामिल होंगे।

वहीं नन्ही फ़ातिमा बतूल उर्फ़ जुनैरा की जानिब से भी तमाम मेहमानों और बिरादरी के लोगों से इस ख़ुशी में शिरकत की इल्तेजा की गई है।

🤲 दुआ है कि यह रिश्ता उम्रभर की ख़ुशियों का सबब बने

अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त से दुआ है कि दोनों जोड़ों के निकाह को अपने हुक्म और अपनी रहमत के साए में क़ुबूल फ़रमाए। दोनों की ज़िंदगी में मोहब्बत, उन्स, बरकत, सुकून और ख़ुशहाली अता फ़रमाए तथा दोनों खानदानों के बीच प्यार और भाईचारे को और मज़बूत फ़रमाए।

बारकल्लाहु लका व बारका अलैकुमा व जमा बैनकुमा फी ख़ैर।

अल्लाह तआला दोनों नवविवाहित जोड़ों को नेक, ख़ुशहाल और मुबारक ज़िंदगी अता फ़रमाए और इस निकाह की ख़ुशी को दोनों खानदानों के लिए दुनिया व आख़िरत की भलाई का ज़रिया बनाए। आमीन या रब्बुल आलमीन। 🤲

📍 संपर्क

हाजी मोहम्मद इब्राहिम: 9799575224
हाजी अब्दुल रहमान: 9602093498
मोहम्मद इस्माइल: 9928731522
हाजी फ़ज़लुर्रहमान: 9829023059
मोहम्मद उमर: 9414617702
मोहम्मद सलीम: 9461079579 / 8078627997

पता: ग़रीब नवाज़ कॉलोनी, भवानी नगर, भीलवाड़ा, राजस्थान।

K.K. Engineering, ट्रांसपोर्ट नगर, भीलवाड़ा।
H.D. Engineering, रेलवे फाटक, साबुन मार्ग, भीलवाड़ा।


📰 मुल्तानी समाज — राजस्थान डेस्क

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार से पंजीकृत, मुल्क की राजधानी नई दिल्ली से प्रकाशित पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी की क़ौमी समाचार पत्रिका, न्यूज़ पोर्टल और यूट्यूब चैनल “मुल्तानी समाज” के लिए राजस्थान डेस्क से प्रधान संपादक ज़मीर आलम की ख़ास रिपोर्ट।

अपनी बिरादरी की ख़बर, मज़मून, पैग़ाम, मुबारकबाद, ताज़ियती इश्तिहार, दिलचस्प वाक़ियात, तहरीर, अफ़साना या कारोबार का इश्तिहार क़ौमी सतह पर प्रकाशित अथवा प्रसारित करवाने के लिए राब्ता फ़रमाएँ:

📞 9410652990
📞 8010884848

“मुल्तानी समाज” — अपनी बिरादरी की आवाज़, अपनी पहचान।

Friday, October 2, 2026

🌹 मोहम्मद नदीम और नाजमीन बानू के निकाह की तारीख़ तय

हाजी अब्दुल रज्जाक पुंवार के पोते के निकाह की खुशियों से गुलज़ार होगा पुंवार खानदान

भीलवाड़ा/बीकानेर।
अल्लाह रब्बुल आलमीन के फ़ज़्लो करम और हुज़ूर-ए-अकरम हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा ﷺ के सदक़े-तुफ़ैल से अहले पुंवार खानदान में शादी की खुशियों का मुबारक मौक़ा आया है। हाजी अब्दुल रज्जाक साहब पुंवार के पोते और मरहूम अब्दुल जब्बार साहब पुंवार, पारोली वाले (भीलवाड़ा) के नेक फ़रज़ंद मोहम्मद नदीम का निकाह मोहम्मद आरिफ साहब उस्ता, बीकानेर की नेक-दुख़्तर नाजमीन बानू के साथ तय हुआ है।

दोनों खानदानों की आपसी रज़ामंदी से तय हुए इस मुबारक रिश्ते के सिलसिले में निकाह और बारात का बाक़ायदा प्रोग्राम जारी किया गया है। इस ख़ुशी के मौक़े पर अहले पुंवार खानदान की ओर से तमाम बिरादराने अहले मुल्तानी, रिश्तेदारों, दोस्तों और अज़ीज़ों से शिरकत की पुरख़ुलूस दरख़्वास्त की गई है।

🌹 बारात की रवानगी

जारी की गई इत्तिला के मुताबिक़ 31 अक्टूबर 2026, बरोज़ शनिवार को शाम 8 बजे, मुताबिक़ 19 जमादिल अव्वल 1448 हिजरी, बारात बीकानेर के लिए रवाना होगी।

🌹 निकाह की मुबारक तारीख़

1 नवंबर 2026, बरोज़ रविवार, मुताबिक़ 20 जमादिल अव्वल 1448 हिजरी, बाद नमाज़ असर व मगरिब निकाह की तक़रीब-ए-मुबारक अदा की जाएगी।

इस मुबारक मौक़े पर खानदान की ओर से बिरादराने मुल्तानी से गुज़ारिश की गई है कि वह अपनी शिरकत से इस ख़ुशी को और बढ़ाएँ तथा दूल्हा-दुल्हन के लिए ख़ुशहाल मुस्तक़बिल, आपसी मोहब्बत और बरकत की दुआ फ़रमाएँ।

🌷 अद्दाईयान

हाजी अब्दुल रज़्ज़ाक, मोहम्मद हुसैन, मोहम्मद इब्राहिम, उस्मान गनी, अब्दुल गफ़्फ़ार एवं अहले पुंवार खानदान।

🌹 आपकी आमद के मुंतज़िर

मोहम्मद लुकमान, मोहम्मद उमर, अब्दुल अज़ीज़, अब्दुल रहीम, मोहम्मद फ़ारूक़, अब्दुल क़य्यूम, अब्दुल हकीम, मोहम्मद रशीद, अब्दुल क़य्यूम, मोहम्मद इरफ़ान, मोहम्मद इक़बाल, मोहम्मद याक़ूब, अब्दुल रशीद, मोहम्मद रफ़ीक़, मोहम्मद नीसार, मोहम्मद इमरान, ज़ाहिद हुसैन, सद्दाम हुसैन, साबिर हुसैन, मोहम्मद अतीक़ (वल्द मरहूम अब्दुल जब्बार) सहित अहले पुंवार खानदान।

🌹 चश्म बराह

अब्दुल लतीफ़, अल्ताफ़ हुसैन, सोयब नूर, आरिफ़ हुसैन, नासिर हुसैन, शाहिद नूर, वाहिद नूर, मोहम्मद फ़ैज़ान, मोहम्मद रियान, कोहिनूर, तौफ़ीक़ नूर, साहिल नूर, मोहम्मद आयन (सिकंदर), मोहम्मद अमीन, मोहम्मद अरशद, मोहम्मद सूफ़ियान, मोहम्मद आदिल, मोहम्मद साहिल, अनस रज़ा, मोहम्मद यूसुफ़, अहमद रज़ा, मुहम्मद रज़ा, मोहम्मद हसन, मुहम्मद रज़ा एवं अहले पुंवार खानदान।

🌸 नन्ही इल्तिज़ा

जहीर अहमद, अबु बकर, अल्तमस नूर, ईल्मा नूर, कनीज़ फ़ातिमा और नूर फ़ातमा की मासूमाना इल्तिज़ा है:

“मेरे चाचू जान की शादी में ज़रूर-ज़रूर तशरीफ़ लाना और अपनी दुआओं से इस ख़ुशी को मुकम्मल करना।”

🏭 कारोबार की जानकारी

इस खानदान से जुड़े कारोबार में नूर इंजीनियरिंग ट्रांसपोर्ट भीलवाड़ा, 313 नूर इंजीनियरिंग जिंदल, नूर आयरन SS स्टील फैब्रिकेशन भीलवाड़ा तथा पुंवार आयरन पारोली शामिल हैं।

रابطे के लिए:
मोहम्मद उमर — 9983005249
अब्दुल हकीम — 9509944756
मोहम्मद अतीक़ — 9256711728
अब्दुल लतीफ़ — 7073656556
नासिर हुसैन — 9829251716

पता: मदीना कॉलोनी, भवानी नगर, भीलवाड़ा (राजस्थान)

🌹 दुआ है कि यह रिश्ता हमेशा ख़ुशियों से आबाद रहे

अल्लाह तआला इस मुबारक निकाह को दोनों खानदानों के लिए ख़ैर, बरकत और ख़ुशियों का ज़रिया बनाए। दूल्हा मोहम्मद नदीम और दुल्हन नाजमीन बानू की ज़िंदगी में मोहब्बत, सुकून, रहमत और बरकत अता फ़रमाए तथा दोनों को एक-दूसरे के लिए बेहतर शरीक-ए-हयात बनाए। आमीन या रब्बुल आलमीन।


📰 मुल्तानी समाज — अपनी बिरादरी की आवाज़, अपनी पहचान

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार से पंजीकृत, नई दिल्ली से प्रसारित पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी की क़ौमी समाचार पत्रिका, न्यूज़ पोर्टल एवं यूट्यूब चैनल “मुल्तानी समाज” के लिए उत्तर प्रदेश डेस्क से प्रधान संपादक ज़मीर आलम की ख़ास रिपोर्ट।

अगर आप भी अपनी ख़बर, मज़मून, पैग़ाम, मुबारकबाद, ताज़ियती इश्तिहार, दिलचस्प वाक़ियात, तहरीर, अफ़साना या अपने कारोबार का इश्तिहार क़ौमी सतह पर शाया या प्रसारित करवाना चाहते हैं तो राब्ता फ़रमाएँ।

📞 9410652990
📞 8010884848

आपका एतमाद ही हमारी सबसे बड़ी ताक़त है।
🌹 “मुल्तानी समाज” — अपनी बिरादरी की आवाज़, अपनी पहचान।