Monday, October 5, 2026

मुल्तानी-डे की हक़ीक़त क्या है? तारीख़ बदलने से इतिहास नहीं बदलता

गलत तारीख़ और ग़लत मालूमात से बिरादरी की तारीख़ नहीं बदली जा सकती—ख़ामोशी भी कभी-कभी ग़लतफ़हमी को मज़बूत कर देती है

मुस्लिम मुल्तानी लोहार, बढ़ई बिरादरी के नौजवानों में कई दिनों से "मुल्तानी-डे" को लेकर सोशल मीडिया पर बहस जारी—कोई इसे डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम की पैदाइश से जोड़ रहा है तो कोई उनके विसाल से; आख़िर 12 नवंबर को "मुल्तानी-डे" क्यों मनाया जाता है? पेश है पूरी हक़ीक़त।

नई दिल्ली/उत्तर प्रदेश डेस्क।
बिरादरी की तारीख़ और पहचान कोई ऐसी चीज़ नहीं जिसे अपनी मर्ज़ी के मुताबिक़ बदला या नई तारीख़ के साथ पेश किया जा सके। अगर किसी तारीख़ के पीछे कोई हक़ीक़त, दस्तावेज़ और पुरानी रिवायत मौजूद हो तो उसे छिपाने या उसके बारे में ग़लतफ़हमी पैदा करने से इतिहास नहीं बदल जाता।

आज सोशल मीडिया के ज़रिए "मुल्तानी-डे" को लेकर मुस्लिम मुल्तानी लोहार, बढ़ई बिरादरी के नौजवानों के बीच बहस चल रही है। कोई इसे पूर्व राष्ट्रपति और महान वैज्ञानिक डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम की जयंती से जोड़कर देख रहा है, कोई उनकी पैदाइश का हवाला दे रहा है और कोई उनके विसाल से इसका ताल्लुक़ जोड़कर मुख़ालफ़त कर रहा है।

दिलचस्प बात यह है कि बिरादरी का एक तबक़ा आज इस सवाल का जवाब तलाश रहा है कि आख़िर "मुल्तानी-डे" क्यों मनाया जाता है और इसकी तारीख़ 12 नवंबर ही क्यों है?

ऐसे में ज़रूरी हो जाता है कि अफ़वाह, ग़लतफ़हमी और सोशल मीडिया की बहस से अलग हटकर असल हक़ीक़त बिरादरी के सामने रखी जाए।

जानी-मानी हस्तियां ख़ामोश क्यों?

बिरादरी की रहनुमाई करने वाली तंजीमों, बुज़ुर्गों और जानी-पहचानी शख़्सियात से उम्मीद की जाती है कि जब नई नस्ल किसी सवाल का जवाब तलाश कर रही हो तो वे आगे बढ़कर सही मालूमात फराहम करें।

अगर बिरादरी के नौजवानों को सही तारीख़ और सही वजह नहीं बताई जाएगी तो वे हक़ीक़त तक कैसे पहुंचेंगे?

झूठ या ग़लत मालूमात का पर्दाफ़ाश करना किसी की दुश्मनी नहीं, बल्कि हक़ीक़त को सामने लाने की ज़िम्मेदारी है। सामने वाला चाहे कितना ही क़रीबी क्यों न हो, बिरादरी के इतिहास और पहचान के मामले में सही बात कहना ज़रूरी है।

आख़िर 12 नवंबर को ही "मुल्तानी-डे" क्यों?

इस सवाल का जवाब बेहद सादा और साफ़ है।

12 नवंबर किसी इंसान का जन्मदिन या मरण-दिवस नहीं है।

12 नवंबर का "मुल्तानी-डे" किसी सियासी शख़्सियत, वैज्ञानिक, राष्ट्रपति या किसी फ़र्द-ए-वाहित से जुड़ा हुआ दिवस नहीं है।

बल्कि उपलब्ध जानकारी के मुताबिक़ यह दिन मुस्लिम मुल्तानी लोहार, बढ़ई बिरादरी की राष्ट्रीय समाचार पत्रिका "मुल्तानी समाज" के सालाना उत्सव के तौर पर मनाया जाता है।

बिरादरी की राष्ट्रीय पत्रिका "मुल्तानी समाज" का रजिस्ट्रेशन 12 नवंबर 2013 को हुआ था। इसी तारीख़ की सालाना खुशी को "मुल्तानी समाज चैरिटेबल ट्रस्ट" की तरफ़ से "मुल्तानी-डे" के तौर पर मनाने की रिवायत क़ायम हुई।

यानी—

12 नवंबर = "मुल्तानी समाज" की सालाना खुशी

और

"मुल्तानी-डे" = किसी शख़्स की पैदाइश या विसाल का दिन नहीं।

नौजवानों के लिए यह बात समझना बेहद ज़रूरी है

आज सोशल मीडिया का दौर है। कोई भी शख़्स कोई भी तारीख़ और कोई भी कहानी लिखकर सैकड़ों लोगों तक पहुंचा सकता है। लेकिन सोशल मीडिया पर बार-बार कही गई बात अपने आप इतिहास नहीं बन जाती।

हमारी नई नस्ल का हक़ है कि उसे अपनी बिरादरी की तारीख़ और रिवायत के बारे में सही और मुसद्दक़ मालूमात मिलें।

इसलिए अगर कोई पूछे—

"मुल्तानी-डे कब मनाया जाता है?"

तो जवाब है—

हर साल 12 नवंबर को।

और अगर कोई पूछे—

"क्यों मनाया जाता है?"

तो जवाब है—

मुस्लिम मुल्तानी लोहार, बढ़ई बिरादरी की राष्ट्रीय समाचार पत्रिका "मुल्तानी समाज" के सालाना उत्सव की खुशी के तौर पर।

यह किसी एक शहर या राज्य का कार्यक्रम नहीं

"मुल्तानी-डे" की एक और ख़ास बात यह है कि इसे किसी एक गांव, कस्बे, शहर या राज्य तक महदूद रखने के बजाय बिरादरी के लोग अपने-अपने घरों में अपनी खुशी के मुताबिक़ मनाते हैं।

इसके लिए किसी ख़ास हॉल, मैरिज होम, होटल, रेस्टोरेंट या क्लब में जमा होना लाज़िमी नहीं है।

यह किसी एक शख़्स की मिल्कियत या किसी एक शहर का प्रोग्राम नहीं, बल्कि बिरादरी की राष्ट्रीय पत्रिका की सालाना खुशी से जुड़ी एक रिवायत के तौर पर पेश किया जाता है।

12 नवंबर की खुशी को ख़िदमत से जोड़ने का इरादा

"मुल्तानी समाज" राष्ट्रीय समाचार पत्रिका के प्रधान-संपादक ज़मीर आलम ने बताया कि "मुल्तानी-डे" की खुशी को सिर्फ़ जश्न तक महदूद रखने के बजाय उसे ख़िदमत-ए-ख़ल्क़ से जोड़ने का इरादा है।

इसी सिलसिले में हर साल 12 नवंबर की खुशी के मौक़े पर 12 ज़रूरतमंद बेटियों की इज्तिमाई शादी कराने की योजना है, जिसे बिरादरी के सहयोग से जल्द शुरू करने का इरादा है।

क्यों न हमारी खुशियां किसी ज़रूरतमंद के घर की ख़ुशी बनें?

क्यों न हमारी बिरादरी की सालाना खुशी किसी बेटी के निकाह और उसके नए घर की शुरुआत का सबब बने?

यही जज़्बा "मुल्तानी-डे" की खुशी को एक बेहतर और ख़िदमतगार मक़सद दे सकता है।

आइए, बहस नहीं—हक़ीक़त को आम करें

हमारी गुज़ारिश है कि इस ख़बर को ज़्यादा से ज़्यादा बिरादरान-ए-वतन तक पहुंचाया जाए, ताकि अगर कोई आपसे पूछे—

"मुल्तानी-डे कब और क्यों मनाया जाता है?"

तो आप अंदाज़े या सुनी-सुनाई बात के बजाय सही जानकारी के साथ जवाब दे सकें।

तारीख़ बदल देने से इतिहास नहीं बदलता।
ख़ामोशी से हक़ीक़त मिटती नहीं।
और सोशल मीडिया की बहस से दस्तावेज़ी हक़ीक़त बदलती नहीं।

हमारी ज़िम्मेदारी है कि अपनी बिरादरी की तारीख़, पहचान और रिवायत को आने वाली नस्ल तक सही मालूमात के साथ पहुंचाएं।


"मुल्तानी समाज" — अपनी बिरादरी की आवाज़, अपनी पहचान

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार से पंजीकृत, नई दिल्ली से प्रकाशित/प्रसारित मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी की क़ौमी समाचार पत्रिका, न्यूज़ पोर्टल और YouTube चैनल "मुल्तानी समाज" के लिए उत्तर प्रदेश डेस्क से प्रधान-संपादक ज़मीर आलम की ख़ास रिपोर्ट।

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Sunday, October 4, 2026

World Students Day या “Multani Day”? डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम की यौमे पैदाइश को बिरादरी के नाम से जोड़कर पेश किए जाने पर उठे गंभीर सवाल

मुज़फ्फरनगर/शामली, उत्तर प्रदेश।

मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी के तमाम बिरादरान-ए-वतन की ख़िदमत में यह सवाल पेश करना ज़रूरी हो गया है कि क्या किसी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचाने जाने वाले दिवस को किसी बिरादरी विशेष के नाम से पेश किया जाना मुनासिब है?

मामला 15 अक्टूबर का है—वह तारीख़ जो महान वैज्ञानिक, मिसाइल मैन और भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम की यौमे पैदाइश है और जिसे भारत सहित विभिन्न स्थानों पर World Students Day के रूप में याद किया जाता है।

बताया जा रहा है कि क़स्बा खतौली, ज़िला मुज़फ्फरनगर से संचालित बिरादरी की एक प्रदेश स्तरीय सोसाइटी द्वारा पिछले कुछ वर्षों से डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम की यौमे पैदाइश के अवसर पर कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। मुज़फ्फरनगर शहर और फिर खतौली में कार्यक्रमों के बाद अब सोशल मीडिया के ज़रिए 15 अक्टूबर को “Multani Day” के नाम से प्रचारित किए जाने पर बिरादरी के भीतर कई सवाल उठ रहे हैं।

सवाल यह नहीं कि डॉ. कलाम को याद क्यों किया जा रहा है—सवाल यह है कि नाम क्या दिया जा रहा है?

डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम किसी एक बिरादरी, मज़हब या क्षेत्र की शख्सियत नहीं थे। वह पूरे हिंदुस्तान के गौरव, नौजवानों के प्रेरणास्रोत और शिक्षा व विज्ञान के पैरोकार थे।

अगर कोई संस्था उनकी यौमे पैदाइश पर कार्यक्रम आयोजित करना चाहती है तो इसका स्वागत होना चाहिए। लेकिन सवाल यह है कि एक ऐसे दिवस को, जो विद्यार्थियों और युवाओं की प्रेरणा से जुड़ा हुआ है, क्या किसी एक बिरादरी की विशेष पहचान के साथ प्रचारित करना उचित है?

बिरादरी के लोगों के सामने यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि “Multani Day” नाम का अपना एक अलग सामाजिक और ऐतिहासिक संदर्भ बताया जाता रहा है। ऐसे में किसी दूसरी तारीख़ को उसी नाम से प्रचारित किए जाने पर स्वाभाविक रूप से यह भ्रम पैदा होता है कि आखिर बिरादरी के बीच “Multani Day” की पहचान क्या है और इसकी तारीख़ क्या मानी जाए?

इंजीनियर साहब से बिरादरी का सीधा सवाल

जिस सोसाइटी के सदर साहब अपने नाम के साथ “इंजीनियर” का लक़ब इस्तेमाल करते हैं, उनसे बिरादरी के पढ़े-लिखे नौजवानों और बुज़ुर्गों का अदब के साथ सवाल है—

अगर 15 अक्टूबर को डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम की यौमे पैदाइश के तौर पर कार्यक्रम आयोजित किया जा रहा है तो उसे “World Students Day” अथवा डॉ. कलाम की यौमे पैदाइश के नाम से ही क्यों न आयोजित किया जाए?

अगर मक़सद बिरादरी के नौजवानों में शिक्षा, विज्ञान, तरक़्क़ी और देशप्रेम का जज़्बा पैदा करना है तो कार्यक्रम को पूरे समाज के लिए खुला रखा जाए और डॉ. कलाम के विचारों तथा उनकी ज़िंदगी से नई नस्ल को रोशनी हासिल करने का मौक़ा दिया जाए।

किसी महान राष्ट्रीय शख्सियत को किसी एक बिरादरी तक सीमित करना उनकी विरासत को छोटा करना होगा।

बिरादरी को भ्रम में रखने के बजाय साफ़-साफ़ तारीख़ और इतिहास बताया जाए

मुल्तानी बिरादरी के लोग सीधे-सादे, मोहब्बत करने वाले और अपनी बिरादरी की पहचान से बेपनाह मोहब्बत रखने वाले हैं। यही वजह है कि बिरादरी से जुड़े किसी भी आयोजन को लोग भरोसे के साथ स्वीकार कर लेते हैं।

लेकिन यही भरोसा हमारी सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी भी है।

बिरादरी के ज़िम्मेदार लोगों से गुज़ारिश है कि तारीख़, नाम और इतिहास को लेकर कोई ऐसा प्रचार न किया जाए जिससे आने वाली नस्लें भ्रमित हों।

अगर “Multani Day” के लिए कोई पुरानी परंपरा, तारीख़ या दस्तावेज़ मौजूद है तो उसे बिरादरी के सामने सार्वजनिक किया जाए। अगर 15 अक्टूबर को डॉ. कलाम की यौमे पैदाइश पर कार्यक्रम है तो उसे उसी हवाले से आयोजित किया जाए।

दोनों को मिलाकर पेश करने से आख़िर हासिल क्या होगा?

बिरादरी के बुद्धिजीवी आगे आएँ

आज ज़रूरत इस बात की है कि बिरादरी के पढ़े-लिखे नौजवान, सामाजिक कार्यकर्ता, बुज़ुर्ग और बुद्धिजीवी इस मसले पर ख़ामोशी इख़्तियार करने के बजाय तथ्यों के साथ अपनी राय सामने रखें।

हम किसी शख्सियत या संस्था की मुख़ालफ़त नहीं कर रहे, बल्कि नाम, तारीख़, इतिहास और बिरादरी की पहचान को लेकर साफ़गोई की बात कर रहे हैं।

डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम का सम्मान कीजिए, उनकी तालीमी और वैज्ञानिक सोच को नई नस्ल तक पहुँचाइए, उनके सपनों का हिंदुस्तान बनाने की बात कीजिए—मगर किसी राष्ट्रीय शख्सियत की यौमे पैदाइश को बिरादरी की पहचान के साथ इस तरह न जोड़ा जाए कि आम लोगों के बीच असल तथ्य ही धुंधले पड़ जाएँ।

बिरादरी का सवाल सीधा है—
15 अक्टूबर को डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम की यौमे पैदाइश मनानी है, World Students Day मनाना है या “Multani Day” के नाम से एक अलग पहचान कायम करनी है?

अगर मक़सद नेक है तो नाम और तारीख़ को लेकर इतनी साफ़गोई भी ज़रूरी है।

इसी का नाम बिरादरी की अमानत, इतिहास की हिफ़ाज़त और आने वाली नस्लों के प्रति हमारी ज़िम्मेदारी है।

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार से पंजीकृत, मुल्क की राजधानी नई दिल्ली से प्रसारित, मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी की क़ौमी समाचार पत्रिका, न्यूज़ पोर्टल एवं YouTube चैनल “मुल्तानी समाज” के लिए उत्तर प्रदेश डेस्क से प्रधान संपादक ज़मीर आलम की ख़ास रिपोर्ट।

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“मुल्तानी समाज”

अपनी बिरादरी की आवाज़ — अपनी पहचान

मुल्तानी बिरादरी की डिजिटल जनगणना के लिए बड़ा डिजिटल प्लेटफॉर्म तैयार

“मुल्तानी घराना” के ज़रिए हर घर, हर कुनबे और हर खानदान को डिजिटल शिजरे में जोड़ने की पहल — अपने घराने की एंट्री खुद करें या अपने कस्बे-शहर में जनगणना अधिकारी बनने के लिए अपनी जानकारी भेजें

नई दिल्ली/उत्तर प्रदेश डेस्क।
मुस्लिम मुल्तानी लोहार एवं बढ़ई बिरादरी की सामाजिक एकजुटता, डिजिटल पहचान और आने वाली नस्लों के लिए बिरादरी का मुकम्मल रिकॉर्ड महफूज़ करने की दिशा में एक अहम और दूरअंदेशाना पहल सामने आई है। बिरादरी की राष्ट्रीय संस्था “मुल्तानी समाज चैरिटेबल ट्रस्ट” ने डिजिटल दौर की जरूरतों को समझते हुए बिरादरी की डिजिटल जनगणना के लिए एक बड़े सॉफ्टवेयर प्लेटफॉर्म “मुल्तानी घराना” को बिरादरी के सामने पेश किया है।

इस डिजिटल प्लेटफॉर्म का मकसद सिर्फ नाम और मोबाइल नंबर इकट्ठा करना नहीं, बल्कि हर परिवार, कुनबे, खानदान और रिश्तेदारी के सिलसिले को एक मुकम्मल डिजिटल शिजरे की शक्ल में सुरक्षित करना है, ताकि आज का तैयार किया गया रिकॉर्ड आने वाली नस्लों के लिए भी एक अहम सामाजिक दस्तावेज़ साबित हो सके।

सोशल मीडिया के शुरुआती दौर से डिजिटल सफर की कहानी

आज जब सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुके हैं, उस दौर को भी याद करना जरूरी है जब इन तकनीकों का इस्तेमाल भारत में अभी शुरुआती मरहले में था।

मुल्तानी समाज चैरिटेबल ट्रस्ट ने बिरादरी को डिजिटल प्लेटफॉर्म पर एकजुट करने की कोशिश उस समय शुरू की, जब व्हाट्सऐप का इस्तेमाल भारत में तेजी से शुरू ही हुआ था। वर्ष 2011 के आसपास बिरादरी के लोगों को व्हाट्सऐप ग्रुपों के माध्यम से जिला और राज्यवार जोड़ने की कोशिश की गई। उस दौर में एक व्हाट्सऐप ग्रुप में सदस्यों की संख्या बेहद सीमित हुआ करती थी, जिसकी वजह से बड़ी तादाद में बिरादरी के अफराद को एक ही प्लेटफॉर्म पर जोड़ना अपने आप में एक चुनौती था।

इसके बाद टेलीग्राम के सामने आने पर बिरादरी के लिए टेलीग्राम ग्रुप और चैनल तैयार किए गए, ताकि ज्यादा से ज्यादा लोगों को एक साथ जोड़ा जा सके। इसके साथ-साथ फेसबुक पर बिरादरी के लोगों को तलाश कर विभिन्न ग्रुपों और पेजों से जोड़ा गया तथा दूसरे डिजिटल प्लेटफॉर्मों पर भी बिरादरी की मौजूदगी दर्ज कराने की कोशिश की गई।

बिरादरी के लोगों को एक-दूसरे के करीब लाने और सामाजिक संपर्क को मजबूत करने के लिए ऑनलाइन डायरेक्टरी प्लेटफॉर्म पर भी संस्था की मौजूदगी दर्ज कराई गई।

खबरों से लेकर रिश्तों तक — डिजिटल पहचान बनाने की कोशिश

इसी डिजिटल सफर को आगे बढ़ाते हुए बिरादरी की राष्ट्रीय समाचार पत्रिका “मुल्तानी समाज” का न्यूज़ पोर्टल, डिजिटल प्लेटफॉर्म और यूट्यूब चैनल तैयार किया गया, ताकि बिरादरी के लोगों की खुशियों, ग़मों, सामाजिक गतिविधियों, कामयाबियों और अहम खबरों को मुल्क के कोने-कोने तक पहुंचाया जा सके।

बिरादरी की डिजिटल पहचान को और मजबूत करने के लिए “मुल्तानी समाज” नाम से वेबसाइट तैयार की गई। वहीं बिरादरी में निकाह के लिए मुनासिब रिश्तों की तलाश को आसान बनाने के उद्देश्य से “रिश्तों की दुनिया” जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म की शुरुआत की गई।

इन तमाम कोशिशों के पीछे बुनियादी सोच यही रही कि बिरादरी का कोई भी अफ़राद एक-दूसरे से बेखबर न रहे और दूर-दराज़ इलाकों में रहने वाले मुल्तानी परिवार भी आपसी राब्ते और इत्तेहाद के एक मजबूत सिलसिले से जुड़े रहें।

अब जनगणना की तरफ बड़ा कदम — “मुल्तानी घराना”

इसी लंबे डिजिटल सफर का अगला और अहम मरहला अब बिरादरी की डिजिटल जनगणना है।

मुल्तानी समाज चैरिटेबल ट्रस्ट द्वारा तैयार किया गया “मुल्तानी घराना” सॉफ्टवेयर बिरादरी के हर परिवार को अपनी जानकारी खुद दर्ज करने का मौका देता है। इसके माध्यम से कोई भी परिवार अपने घर के अफराद के साथ-साथ अपने कुनबे, खानदान और रिश्तेदारों की जानकारी दर्ज कर अपने परिवार का डिजिटल शिजरा तैयार कर सकता है।

यानी एक परिवार से शुरू होकर जानकारी आगे बढ़ते हुए पूरे कुनबे और खानदान को एक डिजिटल सामाजिक नक्शे में जोड़ा जा सकता है।

यह पहल आने वाले समय में बिरादरी की सामाजिक ताकत, परिवारों की संख्या, अलग-अलग शहरों और कस्बों में आबादी की मौजूदगी तथा आपसी रिश्तेदारी के सिलसिले को समझने में बेहद उपयोगी साबित हो सकती है।

हर घर बने डिजिटल जनगणना का हिस्सा

ट्रस्ट की अपील है कि बिरादरी का हर परिवार इस मुहिम को सिर्फ एक संस्था की मुहिम समझकर न देखे, बल्कि इसे अपनी बिरादरी और अपनी आने वाली नस्लों के लिए एक सामाजिक जिम्मेदारी समझे।

हर परिवार अपने घराने की जानकारी दर्ज करे, अपने माता-पिता, भाई-बहन, औलाद, खानदान और रिश्तेदारों को इस डिजिटल शिजरे से जोड़े और कोशिश करे कि उसका पूरा कुनबा इस जनगणना का हिस्सा बने।

“मुल्तानी घराना” को देखने और अपनी डिजिटल एंट्री की प्रक्रिया शुरू करने के लिए आज ही वेबसाइट पर जाएँ:

मुल्तानी घराना डॉट कॉम

सॉफ्टवेयर को इस्तेमाल करने के दौरान किसी तरह की परेशानी या रहनुमाई की जरूरत हो तो हेल्पलाइन नंबर की जानकारी भी प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध कराई गई है।

क्या आप अपने शहर या कस्बे के “जनगणना अधिकारी” बनना चाहते हैं?

बिरादरी की डिजिटल जनगणना को ज्यादा व्यापक बनाने के लिए ऐसे जिम्मेदार, सक्रिय और समाजी खिदमत का जज़्बा रखने वाले अफराद की भी जरूरत है, जो अपने कस्बे, शहर, ब्लॉक, तहसील या इलाके में बिरादरी के परिवारों को इस डिजिटल जनगणना से जोड़ने में अपना किरदार अदा कर सकें।

अगर आप अपने इलाके में “मुल्तानी बिरादरी डिजिटल जनगणना अधिकारी” के तौर पर काम करने के इच्छुक हैं तो अपनी पूरी जानकारी ट्रस्ट/सम्बंधित टीम तक भेज सकते हैं।

आपका नाम, शहर/कस्बा, जिला, मोबाइल नंबर और बिरादरी के लिए किए जाने वाले काम का संक्षिप्त विवरण भेजकर इस मुहिम से जुड़ा जा सकता है।

एक-एक घर जुड़ेगा, तभी पूरी बिरादरी का मुकम्मल डिजिटल रिकॉर्ड तैयार होगा।

आने वाले दौर में रिश्तों के लिए भी नया डिजिटल प्लेटफॉर्म

मुल्तानी समाज चैरिटेबल ट्रस्ट की ओर से यह भी संकेत दिया गया है कि बिरादरी के बीच रिश्ते-नाते आसान बनाने के लिए एक और डिजिटल सॉफ्टवेयर जल्द पेश किया जाएगा।

इसका मकसद बिरादरी के परिवारों को मुनासिब रिश्तों की तलाश में आधुनिक तकनीक का फायदा पहुंचाना और खास तौर पर हमारी बहन-बेटियों और नौजवानों के लिए रिश्तों की तलाश के सिलसिले को ज्यादा व्यवस्थित और आसान बनाना होगा।

“बड़े अल्फाज़” नहीं, काम का इतिहास देखिए

बिरादरी के कुछ अफराद कभी-कभी संस्था के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले अल्फाज़ जैसे “पैदायशी इंजीनियर”, “क्रांतिकारी तंजीम”, “राष्ट्रीय स्तर की संस्था” आदि पर सवाल या नापसंदगी का इज़हार करते हैं।

लेकिन किसी भी संस्था की पहचान सिर्फ उसके अल्फाज़ से नहीं, बल्कि उसके काम, उसके सफर और उसकी लगातार मेहनत से होती है।

अगर किसी तंजीम ने उस दौर में बिरादरी को डिजिटल प्लेटफॉर्म पर जोड़ने की कोशिश की, जब सोशल मीडिया भारत में अपनी शुरुआती मंजिलें तय कर रहा था; अगर उसने बिरादरी की खबरों को डिजिटल माध्यम से घर-घर पहुंचाने की कोशिश की; अगर उसने वेबसाइट, न्यूज़ पोर्टल, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और रिश्तों के डिजिटल प्लेटफॉर्म तैयार किए; और आज बिरादरी की डिजिटल जनगणना तथा डिजिटल शिजरे की तरफ कदम बढ़ाया है, तो इन तमाम कामों का जायज़ा लेकर ही उसके सफर की अहमियत को समझा जाना चाहिए।

अल्फाज़ पर बहस अपनी जगह, मगर काम का हिसाब भी अपनी जगह।

मुल्तानी समाज चैरिटेबल ट्रस्ट का कहना है कि यह सफर अभी खत्म नहीं हुआ, बल्कि असल में एक नए डिजिटल दौर की शुरुआत है।

बिरादरी की जनगणना, डिजिटल शिजरा, रिश्तों का डिजिटल प्लेटफॉर्म, बिरादरी की खबरों का राष्ट्रीय नेटवर्क और आने वाली नस्लों के लिए सामाजिक रिकॉर्ड — यह सब मिलकर मुल्तानी बिरादरी को एक मजबूत डिजिटल सामाजिक नेटवर्क की शक्ल दे सकता है।

आज जो जानकारी हम महफूज़ करेंगे, वही कल हमारी आने वाली नस्लों के लिए हमारी पहचान और हमारे खानदानों की कहानी बनेगी।

इसलिए तमाम अहले बिरादरी से गुज़ारिश है कि इस मुहिम में बढ़-चढ़कर हिस्सा लें और अपने घराने को “मुल्तानी घराना” से जरूर जोड़ें।

अपने घराने की एंट्री खुद करें — या अपने इलाके में डिजिटल जनगणना अधिकारी बनकर बिरादरी की खिदमत का हिस्सा बनें।

इंशाअल्लाह, अगली कड़ी में मुल्तानी समाज चैरिटेबल ट्रस्ट की ओर से बिरादरी के लिए किए गए दूसरे अहम कामों और आने वाले डिजिटल प्रोजेक्ट्स की तफसील भी बिरादरी के सामने रखी जाएगी।


सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार से पंजीकृत, मुल्क की राजधानी नई दिल्ली से प्रसारित, मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी की क़ौमी समाचार पत्रिका, न्यूज़ पोर्टल और यूट्यूब चैनल “मुल्तानी समाज” के लिए उत्तर प्रदेश डेस्क से प्रधान संपादक ज़मीर आलम की ख़ास रिपोर्ट।

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Saturday, October 3, 2026

इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन सलीमन बी का इंतिक़ाल, मुल्तानी बिरादरी में पसरा ग़म — आज ईशा की नमाज़ के बाद होगी तदफ़ीन

अल्लाह तआला मरहूमा की मग़फिरत फ़रमाए और उन्हें जन्नतुल फ़िरदौस में आला मुक़ाम अता फ़रमाए। आमीन।

निहायत ही रंज-ओ-ग़म और अफ़सोस के साथ तमाम मुस्लिम, मुल्तानी लोहार एवं बढ़ई बिरादराना हज़रात को यह इत्तिला दी जाती है कि आज दिन इतवार, बा-तारीख़ 04 अक्टूबर 2026 को क़स्बा अंबेहटा पीर, ज़िला सहारनपुर, उत्तर प्रदेश में जनाब रिजवान साहब वल्द जनाब सुल्तान साहब की अहलिया सलीमन बी, जिनका मायका गाँव पुरमाफ़ी, ज़िला शामली, उत्तर प्रदेश में है, आज सुबह तक़रीबन 09 बजे क़ज़ा-ए-इलाही से वफ़ात पा गईं।

इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन।

मरहूमा के इंतिक़ाल की ख़बर से अहल-ए-ख़ाना, अज़ीज़-ओ-अक़ारिब और बिरादराने-मिल्लत में गहरा रंज और सदमा है। यह दुनिया फ़ानी है और हर ज़ी-रूह को एक दिन अपने रब की तरफ़ लौटकर जाना है। अल्लाह तआला मरहूमा की तमाम ख़ताओं और कोताहियों से दरगुज़र फ़रमाते हुए उनकी मग़फिरत फ़रमाए, क़ब्र को नूर से मुनव्वर करे और उन्हें अपनी रहमत के साए में जगह अता फ़रमाए।

नमाज़-ए-जनाज़ा और तदफ़ीन

मिली हुई जानकारी के मुताबिक़ मरहूमा की नमाज़-ए-जनाज़ा आज बाद नमाज़-ए-ईशा अदा की जाएगी, जिसके बाद उन्हें सुपुर्द-ए-ख़ाक किया जाएगा।

तमाम बिरादराना हज़रात से गुज़ारिश है कि अगर मुमकिन हो तो नमाज़-ए-जनाज़ा में शिरकत फ़रमाएँ, मरहूमा के लिए मग़फिरत की दुआ करें और अहल-ए-ख़ाना के ग़म में शरीक होकर उन्हें तसल्ली दें।

मय्यत को क़ब्र में उतारते वक़्त

जब मय्यत को क़ब्र में उतारा जाए तो दुआ की जाए:

اللّٰهُمَّ اغْفِرْ لَهَا وَارْحَمْهَا، وَعَافِهَا وَاعْفُ عَنْهَا۔

तर्जुमा:
ऐ अल्लाह! इसकी मग़फिरत फ़रमा, इस पर रहम फ़रमा, इसे आफ़ियत अता फ़रमा और इससे दरगुज़र फ़रमा।

क़ब्र में मय्यत को रखते वक़्त यह पढ़ना भी मसनून है:

بِسْمِ اللّٰهِ وَعَلَىٰ مِلَّةِ رَسُولِ اللّٰهِ ﷺ

तर्जुमा:
अल्लाह के नाम के साथ और अल्लाह के रसूल ﷺ के दीन व तरीक़े पर।

मिट्टी देते वक़्त

मय्यत पर मिट्टी डालते वक़्त यह आयत पढ़ी जा सकती है:

مِنْهَا خَلَقْنَاكُمْ وَفِيهَا نُعِيدُكُمْ وَمِنْهَا نُخْرِجُكُمْ تَارَةً أُخْرَىٰ

तर्जुमा:
हमने तुम्हें इसी मिट्टी से पैदा किया, इसी में तुम्हें वापस लौटाएँगे और इसी से दोबारा तुम्हें निकालेंगे।

क़ब्र पर मिट्टी देने के बाद मरहूमा के लिए दिल से दुआ-ए-मग़फिरत की जाए:

ऐ अल्लाह! मरहूमा सलीमन बी की मग़फिरत फ़रमा। उनकी तमाम ख़ताओं और गुनाहों को माफ़ फ़रमा। उनकी क़ब्र को कुशादा और नूरानी फ़रमा। क़ब्र की तंगी और अज़ाब से महफ़ूज़ फ़रमा। उन्हें सवालात-ए-क़ब्र में कामयाबी अता फ़रमा। उनकी क़ब्र को जन्नत के बाग़ों में से एक बाग़ बना दे। उन्हें जन्नतुल फ़िरदौस में आला मुक़ाम अता फ़रमा और अपने प्यारे हबीब हज़रत मुहम्मद ﷺ की शफ़ाअत नसीब फ़रमा।

या अल्लाह! अहल-ए-ख़ाना को सब्र-ए-जमील अता फ़रमा, इस सदमे को बर्दाश्त करने की ताक़त दे और मरहूमा के लिए किए गए तमाम नेक अमल और दुआओं को उनके हक़ में क़बूल फ़रमा। आमीन या रब्बुल आलमीन।

राब्ता

मय्यत के सिलसिले में मज़ीद मालूमात के लिए मरहूमा के फ़रज़ंद जनाब परवेज़ साहब से इस मोबाइल नंबर पर राब्ता क़ायम किया जा सकता है:

📞 9719929191

तमाम हज़रात से ख़ुसूसन गुज़ारिश है कि मरहूमा के लिए फ़ातिहा-ख़्वानी और दुआ-ए-मग़फिरत फ़रमाएँ।

अल्लाह तआला मरहूमा को जन्नतुल फ़िरदौस में आला मुक़ाम अता फ़रमाए और तमाम पसमान्दगान को सब्र-ए-जमील अता फ़रमाए।
आमीन सुम्मा आमीन।


सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार से पंजीकृत, मुल्क की राजधानी नई दिल्ली से प्रसारित, पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी की मुल्क की इकलौती क़ौमी समाचार पत्रिका, न्यूज़ पोर्टल एवं यूट्यूब चैनल “मुल्तानी समाज” के लिए उत्तर प्रदेश डेस्क से प्रधान संपादक ज़मीर आलम की ख़ास रिपोर्ट।

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“मुल्तानी समाज”

अपनी बिरादरी की आवाज़ — अपनी पहचान

मुल्तानी-डे पर बिरादरी के चौधरियों की खामोशी क्यों?

जब बिरादरी का एक अहम मसला सामने हो तो 30-40 साल की ख़िदमत का दावा करने वाले जिम्मेदार हज़रात बोलने से क्यों गुरेज़ कर रहे हैं?

ख़ास रिपोर्ट | उत्तर प्रदेश डेस्क

बिरादरी की ख़िदमत, बिरादरी की एकता और बिरादरी के वक़ार की बातें करना आसान है, लेकिन जब बिरादरी के सामने कोई अहम और संवेदनशील मसला खड़ा हो जाए, तब उस मसले पर सही वक़्त में आवाज़ उठाना ही असल ख़िदमत और जिम्मेदारी की पहचान होती है।

आज मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी के सामने "मुल्तानी-डे" से जुड़ा एक ऐसा ही अहम सवाल खड़ा है, जिस पर बिरादरी के बुज़ुर्गों, चौधरियों, ओहदेदारों और प्रभावशाली सामाजिक जिम्मेदारों की खामोशी लगातार सवाल पैदा कर रही है।

बिरादरी में कई ऐसे हज़रात हैं जो अक्सर यह कहते सुनाई देते हैं कि उन्होंने तीन दशक, चार दशक या उससे भी अधिक समय से बिरादरी की ख़िदमत की है। यक़ीनन बिरादरी की ख़िदमत एक क़ाबिले-ए-एहतराम अमल है और जो लोग लंबे अरसे से समाज के लिए काम करते आए हैं, उनका एहतराम किया जाना चाहिए।

लेकिन सवाल यह है कि जब बिरादरी का कोई अहम मामला सामने आए, जब किसी मसले से बिरादरी की एकता, पहचान और आपसी इत्तेहाद प्रभावित होने का अंदेशा पैदा हो, तब वही जिम्मेदार आवाज़ बुलंद करने से क्यों पीछे हट जाते हैं?

क्या ऐसी सूरत में खामोशी ही सबसे बेहतर रास्ता है?

"मुल्तानी-डे" की परम्परा को लेकर उठे सवाल

पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी की राष्ट्रीय समाचार पत्रिका "मुल्तानी समाज" से जुड़े मुल्तानी समाज चैरिटेबल ट्रस्ट द्वारा कई वर्ष पूर्व राष्ट्रीय अधिवेशन के सिलसिले में 12 नवंबर को "मुल्तानी-डे" के नाम से कार्यक्रम आयोजित करने और इसे बिरादरी के बीच पहचान दिलाने की शुरुआत की गई।

समय के साथ यह तारीख और यह नाम बिरादरी के सामाजिक कार्यक्रमों और पहचान के संदर्भ में चर्चा का हिस्सा बनते चले गए।

लेकिन अब कस्बा खतौली, जनपद मुजफ्फरनगर, उत्तर प्रदेश की एक तंजीम द्वारा 15 अक्टूबर को पूर्व राष्ट्रपति एवं महान वैज्ञानिक डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम साहब की यौमे-पैदाइश के मौके पर इसी नाम "मुल्तानी-डे" से कार्यक्रम आयोजित किए जाने की कोशिश की जा रही है।

यहीं से एक अहम सामाजिक सवाल पैदा होता है—

अगर कोई कार्यक्रम एक निर्धारित तारीख और नाम के साथ वर्षों से बिरादरी के एक मंच द्वारा आयोजित होता रहा है, तो उसी नाम को उसकी तय तारीख से ठीक एक माह पहले किसी दूसरे कार्यक्रम के लिए इस्तेमाल किए जाने पर बिरादरी के जिम्मेदार लोगों को कम-से-कम अपनी राय जाहिर नहीं करनी चाहिए?

यह सवाल किसी व्यक्ति या तंजीम की मुखालफत के लिए नहीं, बल्कि बिरादरी की साझा पहचान, सामाजिक परम्परा और भविष्य में पैदा होने वाली गलतफहमियों को रोकने के लिए उठाया जा रहा है।

चौधरियों से सिर्फ इतनी सी गुज़ारिश—बोलिए तो सही!

हम यह नहीं कहते कि कोई किसी से लड़ाई करे।

हम यह भी नहीं कहते कि किसी कार्यक्रम को रोकने के लिए सामाजिक टकराव पैदा किया जाए।

लेकिन इतना तो कहा ही जा सकता है कि—

"भाई, अगर 'मुल्तानी-डे' नाम से कोई कार्यक्रम पहले से एक तारीख के साथ बिरादरी में स्थापित है, तो उसी नाम से ठीक एक माह पहले कार्यक्रम आयोजित करने से भविष्य में भ्रम और मतभेद पैदा हो सकते हैं। लिहाज़ा इस पर आपस में बैठकर बात कर ली जाए।"

क्या इतनी बात कहने के लिए भी किसी चौधरी, बुज़ुर्ग या ओहदेदार को किसी से इजाज़त की जरूरत है?

अगर बिरादरी के बड़े-बड़े जिम्मेदार लोग किसी मसले पर अपनी राय ही जाहिर नहीं करेंगे, तो फिर उनकी चौधराहट, ओहदेदारी और सामाजिक जिम्मेदारी का असल मतलब क्या रह जाता है?

दिल्ली-NCR के जिम्मेदार हज़रात भी खामोश क्यों?

मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी के दिल्ली-NCR समेत विभिन्न इलाकों में ऐसे अनेक सामाजिक रूप से प्रभावशाली और रसूखदार हज़रात मौजूद हैं, जिनका ताल्लुक बड़ौत, खतौली और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के इलाकों से रहा है।

इन बुज़ुर्गों और जिम्मेदार हज़रात से बिरादरी को हमेशा उम्मीद रही है कि जब भी कोई सामाजिक मसला सामने आएगा, वे हिकमत, समझदारी और भाईचारे के साथ अपना किरदार अदा करेंगे।

लेकिन "मुल्तानी-डे" को लेकर सामने आए इस पूरे प्रकरण में जिस तरह की खामोशी दिखाई दे रही है, उसने बिरादरी के आम लोगों को सोचने पर मजबूर कर दिया है।

आख़िर ये खामोशी किस इंतज़ार में है?

क्या किसी बड़े टकराव का इंतज़ार किया जा रहा है?

या फिर यह उम्मीद की जा रही है कि मामला खुद-ब-खुद खत्म हो जाएगा?

अगर ऐसा है तो यह सोच शायद सही नहीं है।

क्योंकि सामाजिक मसले खामोशी से खत्म नहीं होते, बल्कि कई बार खामोशी ही उन्हें आने वाले दिनों में बड़ा विवाद बना देती है।

बिरादरी को जोड़ना है, तो पहले संवाद शुरू कीजिए

आज जरूरत किसी को छोटा या बड़ा साबित करने की नहीं है।

जरूरत है कि बिरादरी के बुज़ुर्ग, चौधरी, ओहदेदार और सामाजिक तंजीमें एक जगह बैठें, एक-दूसरे की बात सुनें और ऐसा रास्ता निकालें जिससे बिरादरी का इत्तेहाद भी कायम रहे और किसी की सामाजिक इज़्ज़त भी प्रभावित न हो।

अगर किसी कार्यक्रम के नाम और तारीख को लेकर गलतफहमी पैदा हो रही है तो उसे बातचीत के जरिए दूर किया जा सकता है।

अगर दो तंजीमें एक ही नाम को लेकर कार्यक्रम करना चाहती हैं तो उनके बीच आपसी मशविरा हो सकता है।

अगर किसी एक नाम की वर्षों पुरानी सामाजिक पहचान है तो उसका भी एहतराम किया जा सकता है।

यही तो बिरादरी के बुज़ुर्गों और चौधरियों का असल किरदार होना चाहिए।

क्या बिरादरी के फैसलों पर भी सवाल उठने चाहिए?

आज आम बिरादरी के बीच एक और सवाल चर्चा का विषय बन रहा है।

जब सामाजिक कार्यक्रमों के नाम और तारीख जैसे अपेक्षाकृत सामान्य मसले पर भी बिरादरी के जिम्मेदार हज़रात अपनी राय सामने रखने से गुरेज़ करें, तो आम लोग यह सवाल करने पर मजबूर होंगे कि—

अगर कल बिरादरी के किसी बड़े और गंभीर मसले पर फैसला लेना पड़ा, तो फैसला किस आधार पर होगा और उसकी जवाबदेही किसकी होगी?

चौधराहट केवल किसी पद, नाम या पहचान का नाम नहीं।

चौधराहट का मतलब है—मुश्किल वक्त में बिरादरी के साथ खड़ा होना, सही बात को सही तरीके से कहना और दो पक्षों के बीच इत्तेहाद कायम कराने की कोशिश करना।

"मुल्तानी समाज" ने अपनी जिम्मेदारी निभाई

इस पूरे मामले को "मुल्तानी समाज" राष्ट्रीय समाचार पत्रिका अपने न्यूज़ पोर्टल और मीडिया प्लेटफॉर्म के माध्यम से पहले भी बिरादरी के सामने रख चुकी है।

हमारा मकसद किसी तंजीम, शख्स या कार्यक्रम की तौहीन करना नहीं है।

हमारा मकसद सिर्फ इतना है कि बिरादरी के सामने पैदा हो रही संभावित गलतफहमी को समय रहते बातचीत और सामाजिक मशविरे के जरिए दूर किया जाए।

लेकिन अगर बिरादरी के बुज़ुर्ग, चौधरी और ओहदेदार अब भी इस मसले पर कोई संज्ञान नहीं लेते, तो आम बिरादरी के बीच यह सवाल उठना लाज़िमी है कि आखिर बिरादरी की आवाज़ कौन बनेगा?

क्या हर मसले पर आम लोगों को ही अपनी आवाज़ उठानी पड़ेगी?

या फिर बिरादरी के जिम्मेदार हज़रात भी अपनी जिम्मेदारी निभाएंगे?

एक सप्ताह—बिरादरी के जिम्मेदारों के नाम

"मुल्तानी समाज" बिरादरी के तमाम बुज़ुर्गों, चौधरियों, ओहदेदारों और सामाजिक जिम्मेदारों से अदब के साथ अपील करता है कि इस मामले पर एक सप्ताह के भीतर अपनी राय और जिम्मेदारी का इज़हार करें।

किसी के खिलाफ नहीं—

बिरादरी के हक़ में।

किसी से लड़ने के लिए नहीं—

बिरादरी को जोड़ने के लिए।

किसी की तौहीन के लिए नहीं—

बिरादरी की पहचान और वक़ार की हिफाज़त के लिए।

अगर इस मुद्दे पर बिरादरी के जिम्मेदार हज़रात कोई पहल करते हैं तो "मुल्तानी समाज" उसका खैरमकदम करेगा और बिरादरी के इत्तेहाद की हर सकारात्मक कोशिश को पूरी इज़्ज़त के साथ जगह देगा।

लेकिन अगर लगातार खामोशी बरकरार रही और कोई जिम्मेदार पहल सामने नहीं आई, तो "मुल्तानी समाज" राष्ट्रीय समाचार पत्रिका अपने स्तर पर उपलब्ध दस्तावेज़ों, पूर्व प्रकाशित सामग्री, तारीखों और संबंधित तथ्यों का जायज़ा लेते हुए इस मामले को सामाजिक एवं आवश्यकतानुसार कानूनी पहलुओं की रोशनी में आगे देखेगी।

क्योंकि किसी भी बिरादरी की ताक़त उसके लोगों की तादाद में नहीं, बल्कि उसके इत्तेहाद, उसूल, आपसी एहतराम और सही वक़्त पर सही बात कहने की हिम्मत में होती है।

आख़िर में चौधरियों से एक सवाल…

अगर आप 30-40 साल से बिरादरी की ख़िदमत कर रहे हैं, तो आज बिरादरी के इस मसले पर आपकी आवाज़ कहाँ है?

अगर आप लड़ नहीं सकते तो कोई बात नहीं—लेकिन क्या आप अपनी बिरादरी के लिए सिर्फ इतना भी नहीं कह सकते कि जो कार्यक्रम वर्षों से एक खास नाम और तारीख के साथ मनाया जाता रहा है, उसी नाम से ठीक एक माह पहले कार्यक्रम आयोजित करने से पैदा होने वाली गलतफहमी पर बातचीत होनी चाहिए?

बिरादरी आपकी तरफ देख रही है…
अब खामोशी नहीं, हिकमत और जिम्मेदारी से बात करने का वक्त है।


सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार से पंजीकृत, मुल्क की राजधानी नई दिल्ली से प्रसारित, पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी की क़ौमी समाचार पत्रिका, न्यूज़ पोर्टल और यूट्यूब चैनल "मुल्तानी समाज" के लिए उत्तर प्रदेश डेस्क से प्रधान संपादक ज़मीर आलम की ख़ास रिपोर्ट।

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"मुल्तानी समाज"

अपनी बिरादरी की आवाज़ — अपनी पहचान

इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन निहायत ही रंज-ओ-ग़म के साथ इत्तिला — सुलेमान भुट्टो साहब की अहलिया सुगरा बानो का इंतिक़ाल

भीलवाड़ा (राजस्थान), 04 अक्टूबर 2026।
निहायत ही रंज-ओ-ग़म और दिली सदमे के साथ तमाम बिरादराना हज़रात को यह इत्तिला दी जाती है कि जनाब सुलेमान भुट्टो साहब की अहलिया मोहतरमा सुगरा बानो का आज दिन इतवार, बा-तारीख़ 04 अक्टूबर 2026 को बिगोद, ज़िला भीलवाड़ा, राजस्थान में क़ज़ा-ए-इलाही से इंतिक़ाल हो गया।

इन्ना लिल्लाहि वा इन्ना इलैहि राजिऊन।

मरहूमा के इंतिक़ाल की ख़बर से खानदान, अज़ीज़-ओ-अक़ारिब और बिरादरान-ए-मुल्तानी में गहरे रंज और सदमे की लहर दौड़ गई है। हर आँख अश्कबार और हर दिल ग़मगीन है। इस मुश्किल और ग़म के मौक़े पर हम तमाम अहल-ए-ख़ानदान के साथ दिली हमदर्दी और ताज़ियत का इज़हार करते हैं।

मरहूमा के लिए दुआ-ए-मग़फ़िरत

बारगाह-ए-इलाही में दस्त-ब-दुआ हैं कि अल्लाह तआला मरहूमा सुगरा बानो की मुकम्मल मग़फ़िरत फ़रमाए, उनकी तमाम ख़ताओं और कोताहियों को माफ़ फ़रमाए, उनके दर्जात बुलंद फ़रमाए और उन्हें जन्नतुल फ़िरदौस में आला मुक़ाम अता फ़रमाए।

ऐ अल्लाह! मरहूमा की क़ब्र को नूर से मुनव्वर फ़रमा, उसे कुशादा फ़रमा, उसे जन्नत के बाग़ों में से एक बाग़ बना दे और उन्हें अपनी रहमत के साये में जगह अता फ़रमा।

ऐ परवरदिगार! मरहूमा से क़ब्र के सवालात आसान फ़रमा, उनकी क़ब्र को अमन और सुकून की जगह बना और क़यामत के दिन उन्हें अपनी ख़ास रहमत और मग़फ़िरत नसीब फ़रमा। आमीन या रब्बुल आलमीन।

तदफ़ीन की इत्तिला का इंतज़ार

ख़बर लिखे जाने तक मरहूमा की नमाज़-ए-जनाज़ा और तदफ़ीन का वक़्त तय होने की इत्तिला हासिल नहीं हो सकी थी। जैसे ही खानदान की तरफ़ से नमाज़-ए-जनाज़ा और तदफ़ीन के सिलसिले में मुकम्मल जानकारी हासिल होगी, उसे ख़बर में अपडेट कर दिया जाएगा।

जब मरहूमा को क़ब्र में उतारा जाए और मिट्टी दी जाए, तो तमाम अहल-ए-बिरादरी से गुज़ारिश है कि इस मौक़े पर दिल से उनके लिए दुआ-ए-मग़फ़िरत करें।

ऐ अल्लाह! जिस वक़्त मरहूमा को क़ब्र में उतारा जाए, उस वक़्त अपनी रहमत उनके शामिल-ए-हाल फ़रमा। क़ब्र को उनके लिए तन्हाई और तारीकी की जगह न बना, बल्कि नूर, सुकून और रहमत से भर दे।

ऐ अल्लाह! मिट्टी की हर परत को उनके लिए राहत और रहमत का ज़रिया बना। उनकी क़ब्र पर अपनी रहमतों की बारिश फ़रमा और उन्हें जन्नत की ख़ुशबू और ठंडक नसीब फ़रमा। आमीन।

मिट्टी देने की दुआ

मिट्टी देते वक़्त दिल में यह दुआ की जाए:

“ऐ अल्लाह! हम इस अमानत को तेरे सुपुर्द करते हैं। तू ही इस अमानत का मालिक है। मरहूमा की मग़फ़िरत फ़रमा, उनकी क़ब्र को नूर से भर दे, उनकी मंज़िल आसान फ़रमा और उन्हें जन्नतुल फ़िरदौस में जगह अता फ़रमा।”

इसके बाद तमाम हाज़िरीन से मरहूमा के लिए सूरह-ए-फ़ातिहा, सूरह-ए-इख़लास और दुआ-ए-मग़फ़िरत करने की गुज़ारिश है।

सब्र-ए-जमील की दुआ

अल्लाह तआला मरहूमा के तमाम अहल-ए-ख़ानदान, अज़ीज़-ओ-अक़ारिब और दोस्तों को इस सदमे को बर्दाश्त करने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए और सभी को सब्र-ए-जमील नसीब फ़रमाए।

ऐ अल्लाह! ग़मज़दा खानदान के दिलों को सुकून अता फ़रमा, उनके आँसुओं को अपनी रहमत का ज़रिया बना और उन्हें इस सदमे पर सब्र करने का अज्र-ए-अज़ीम अता फ़रमा।

आमीन या रब्बुल आलमीन।

मय्यत के सिलसिले में राब्ता

मय्यत की नमाज़-ए-जनाज़ा, तदफ़ीन और दूसरे मामलों के बारे में ज़्यादा मालूमात के लिए:

जनाब मोइनुद्दीन मुल्तानी
📞 9529395915

से राब्ता करके मुकम्मल जानकारी हासिल की जा सकती है।


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“मुल्तानी समाज”

अपनी बिरादरी की आवाज़ — अपनी पहचान

🖤 इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन 🖤 निहायत ही रंज-ओ-ग़म के साथ हाजी इलियास साहब के इंतिक़ाल की ख़बर, मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी में पसरा मातम

देहरादून/अंबेहटा। निहायत ही रंज-ओ-ग़म और अफ़सोस के साथ तमाम मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरान-ए-वतन को इत्तिला दी जाती है कि जनाब हाजी इलियास साहब वल्द जनाब हाजी मुनीर साहब मरहूम, उम्र तकरीबन 67 वर्ष, निवासी हाइडिल वाले, क़स्बा अंबेहटा, ज़िला सहारनपुर, उत्तर प्रदेश तथा हाल बाशिंदा क़स्बा ढालीपुर/हरबर्टपुर, तहसील विकासनगर, ज़िला देहरादून, उत्तराखंड का आज शनिचर, 03 अक्टूबर 2026 को रात तकरीबन 10 बजे देहरादून के एक अस्पताल में इलाज के दौरान क़ज़ा-ए-इलाही से इंतिक़ाल हो गया।

इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन।

मरहूम अपने पीछे अपनी अहलिया, भाई-बहन, औलाद, पौते-पोतियां, नाते-नातिन, तमाम खानदान, रिश्तेदारों और अज़ीज़-ओ-अक़ारिब को ग़मज़दा और अश्कबार छोड़कर इस फ़ानी दुनिया से हमेशा के लिए रुख़्सत हो गए।

मरहूम के इंतिक़ाल की ख़बर से उनके खानदान, अज़ीज़-ओ-अक़ारिब और जानने वालों में गहरा सदमा और ग़म की लहर दौड़ गई है। इस मुश्किल घड़ी में तमाम अहल-ए-खानदान के साथ हम भी बराबर के शरीक-ए-ग़म हैं।

🤲 मरहूम के लिए दुआ-ए-मग़फ़िरत

ऐ अल्लाह! जनाब हाजी इलियास साहब की मग़फ़िरत-ओ-बख़्शिश फ़रमा।
उनकी तमाम ख़ताओं और गुनाहों को माफ़ फ़रमा।
उनकी क़ब्र को नूर से मुनव्वर फ़रमा और उसे जन्नत के बाग़ों में से एक बाग़ बना दे।
उनकी क़ब्र को कुशादा फ़रमा, उसमें सुकून और राहत अता फ़रमा।
उनसे दरगुज़र फ़रमा और अपनी रहमत-ए-कामिला के साये में जगह अता फ़रमा।
उन्हें जन्नतुल फ़िरदौस में आला मुक़ाम अता फ़रमा और अपने महबूब बंदों की रिफ़ाक़त नसीब फ़रमा।

या अल्लाह! मरहूम को ईमान और कलिमा-ए-तौहीद के साथ दुनिया से रुख़्सत होने का अज्र अता फ़रमा और उनकी आख़िरत आसान फ़रमा। आमीन या रब्बुल आलमीन।

🤲 दफ़्न और मिट्टी देने के मौक़े पर दुआ

मिली जानकारी के मुताबिक़ मय्यत को बाद नमाज़-ए-जौहर ठीक 2 बजे गांव ढकरानी स्थित कब्रिस्तान में किया जायेगा सपुर्दे - ख़ाक, लिहाज़ा आप हज़रात भी जनाज़े में शरीक होकर सवाबे दारेन हासिल करें।

जब मरहूम को क़ब्र में उतारा जाए तो तमाम अहबाब और बिरादरान उनके लिए दुआ-ए-मग़फ़िरत करें और अल्लाह तआला से उनकी आख़िरत की आसानी की दुआ मांगें।

ऐ अल्लाह! जब हमारे इस भाई को क़ब्र में उतारा जाए तो अपनी रहमत से उनकी क़ब्र को सुकून का घर बना देना। मिट्टी की पहली मंज़िल को उनके लिए आसान फ़रमा, सवाल-ए-क़ब्र में साबित-क़दम रखना और हर तरह की तंगी व अज़ाब से महफ़ूज़ फ़रमाना।

ऐ अल्लाह! जो लोग उनकी मय्यत में शरीक हों, उनके क़दमों को अज्र अता फ़रमा और जो उनके लिए दुआ करें उनकी दुआ क़ुबूल फ़रमा। आमीन।

मय्यत को मिट्टी देने के बाद भी मरहूम के लिए दुआ-ए-मग़फ़िरत, सदक़ा-ए-जारीया और नेक आमाल का सवाब पहुंचाने की दुआ की जाए।

🤲 अहल-ए-खानदान के लिए सब्र की दुआ

ऐ परवरदिगार! मरहूम के तमाम अहल-ए-खानदान, अहलिया, औलाद, भाई-बहन, पौते-पोतियों, नाते-नातिन और तमाम अज़ीज़-ओ-अक़ारिब को इस सदमे को बर्दाश्त करने की तौफ़ीक़ अता फ़रमा।

उनके दिलों को सब्र-ए-जमील अता फ़रमा, उनकी आंखों के आंसुओं को अपनी रहमत का ज़रिया बना और उन्हें इस सदमे के बदले अपने ख़ज़ाना-ए-रहमत से बेहतर अज्र अता फ़रमा।

अल्लाह तआला मरहूम की मग़फ़िरत फ़रमाए, दर्जात बुलंद फ़रमाए, जन्नतुल फ़िरदौस में आला मुक़ाम अता फ़रमाए और तमाम पसमान्दगान को सब्र-ए-जमील अता फ़रमाए।

आमीन या रब्बुल आलमीन।

📞 मय्यत के बारे में जानकारी

मय्यत के बारे में मज़ीद मालूमात तथा नमाज़-ए-जनाज़ा और दफ़्न के वक़्त व मक़ाम की जानकारी के लिए जनाब मोहम्मद हाशिम, झिंझाना वाले और मरहूम के फरजंद जनाब अकरम साहब के मोबाईल नंबर -8077513452 से मोबाइल नंबर 7906309363 पर राब्ता क़ायम किया जा सकता है।

तमाम बिरादरान से गुज़ारिश है कि जैसे ही नमाज़-ए-जनाज़ा और तदफ़ीन का वक़्त व मक़ाम मालूम हो, एक-दूसरे तक इत्तिला पहुंचाएं और मौक़ा मिलने पर जनाज़े में शरीक होकर मरहूम के लिए दुआ-ए-मग़फ़िरत करें।

अल्लाह तआला मरहूम की मग़फ़िरत फरमाए। आमीन।


सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार से पंजीकृत, मुल्क की राजधानी नई दिल्ली से प्रसारित, पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी की क़ौमी समाचार पत्रिका, न्यूज़ पोर्टल और यूट्यूब चैनल "मुल्तानी समाज" के लिए उत्तर प्रदेश डेस्क से प्रधान संपादक ज़मीर आलम की ख़ास रिपोर्ट।

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