गलत तारीख़ और ग़लत मालूमात से बिरादरी की तारीख़ नहीं बदली जा सकती—ख़ामोशी भी कभी-कभी ग़लतफ़हमी को मज़बूत कर देती है
मुस्लिम मुल्तानी लोहार, बढ़ई बिरादरी के नौजवानों में कई दिनों से "मुल्तानी-डे" को लेकर सोशल मीडिया पर बहस जारी—कोई इसे डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम की पैदाइश से जोड़ रहा है तो कोई उनके विसाल से; आख़िर 12 नवंबर को "मुल्तानी-डे" क्यों मनाया जाता है? पेश है पूरी हक़ीक़त।
नई दिल्ली/उत्तर प्रदेश डेस्क।
बिरादरी की तारीख़ और पहचान कोई ऐसी चीज़ नहीं जिसे अपनी मर्ज़ी के मुताबिक़ बदला या नई तारीख़ के साथ पेश किया जा सके। अगर किसी तारीख़ के पीछे कोई हक़ीक़त, दस्तावेज़ और पुरानी रिवायत मौजूद हो तो उसे छिपाने या उसके बारे में ग़लतफ़हमी पैदा करने से इतिहास नहीं बदल जाता।
आज सोशल मीडिया के ज़रिए "मुल्तानी-डे" को लेकर मुस्लिम मुल्तानी लोहार, बढ़ई बिरादरी के नौजवानों के बीच बहस चल रही है। कोई इसे पूर्व राष्ट्रपति और महान वैज्ञानिक डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम की जयंती से जोड़कर देख रहा है, कोई उनकी पैदाइश का हवाला दे रहा है और कोई उनके विसाल से इसका ताल्लुक़ जोड़कर मुख़ालफ़त कर रहा है।
दिलचस्प बात यह है कि बिरादरी का एक तबक़ा आज इस सवाल का जवाब तलाश रहा है कि आख़िर "मुल्तानी-डे" क्यों मनाया जाता है और इसकी तारीख़ 12 नवंबर ही क्यों है?
ऐसे में ज़रूरी हो जाता है कि अफ़वाह, ग़लतफ़हमी और सोशल मीडिया की बहस से अलग हटकर असल हक़ीक़त बिरादरी के सामने रखी जाए।
जानी-मानी हस्तियां ख़ामोश क्यों?
बिरादरी की रहनुमाई करने वाली तंजीमों, बुज़ुर्गों और जानी-पहचानी शख़्सियात से उम्मीद की जाती है कि जब नई नस्ल किसी सवाल का जवाब तलाश कर रही हो तो वे आगे बढ़कर सही मालूमात फराहम करें।
अगर बिरादरी के नौजवानों को सही तारीख़ और सही वजह नहीं बताई जाएगी तो वे हक़ीक़त तक कैसे पहुंचेंगे?
झूठ या ग़लत मालूमात का पर्दाफ़ाश करना किसी की दुश्मनी नहीं, बल्कि हक़ीक़त को सामने लाने की ज़िम्मेदारी है। सामने वाला चाहे कितना ही क़रीबी क्यों न हो, बिरादरी के इतिहास और पहचान के मामले में सही बात कहना ज़रूरी है।
आख़िर 12 नवंबर को ही "मुल्तानी-डे" क्यों?
इस सवाल का जवाब बेहद सादा और साफ़ है।
12 नवंबर किसी इंसान का जन्मदिन या मरण-दिवस नहीं है।
12 नवंबर का "मुल्तानी-डे" किसी सियासी शख़्सियत, वैज्ञानिक, राष्ट्रपति या किसी फ़र्द-ए-वाहित से जुड़ा हुआ दिवस नहीं है।
बल्कि उपलब्ध जानकारी के मुताबिक़ यह दिन मुस्लिम मुल्तानी लोहार, बढ़ई बिरादरी की राष्ट्रीय समाचार पत्रिका "मुल्तानी समाज" के सालाना उत्सव के तौर पर मनाया जाता है।
बिरादरी की राष्ट्रीय पत्रिका "मुल्तानी समाज" का रजिस्ट्रेशन 12 नवंबर 2013 को हुआ था। इसी तारीख़ की सालाना खुशी को "मुल्तानी समाज चैरिटेबल ट्रस्ट" की तरफ़ से "मुल्तानी-डे" के तौर पर मनाने की रिवायत क़ायम हुई।
यानी—
12 नवंबर = "मुल्तानी समाज" की सालाना खुशी
और
"मुल्तानी-डे" = किसी शख़्स की पैदाइश या विसाल का दिन नहीं।
नौजवानों के लिए यह बात समझना बेहद ज़रूरी है
आज सोशल मीडिया का दौर है। कोई भी शख़्स कोई भी तारीख़ और कोई भी कहानी लिखकर सैकड़ों लोगों तक पहुंचा सकता है। लेकिन सोशल मीडिया पर बार-बार कही गई बात अपने आप इतिहास नहीं बन जाती।
हमारी नई नस्ल का हक़ है कि उसे अपनी बिरादरी की तारीख़ और रिवायत के बारे में सही और मुसद्दक़ मालूमात मिलें।
इसलिए अगर कोई पूछे—
"मुल्तानी-डे कब मनाया जाता है?"
तो जवाब है—
हर साल 12 नवंबर को।
और अगर कोई पूछे—
"क्यों मनाया जाता है?"
तो जवाब है—
मुस्लिम मुल्तानी लोहार, बढ़ई बिरादरी की राष्ट्रीय समाचार पत्रिका "मुल्तानी समाज" के सालाना उत्सव की खुशी के तौर पर।
यह किसी एक शहर या राज्य का कार्यक्रम नहीं
"मुल्तानी-डे" की एक और ख़ास बात यह है कि इसे किसी एक गांव, कस्बे, शहर या राज्य तक महदूद रखने के बजाय बिरादरी के लोग अपने-अपने घरों में अपनी खुशी के मुताबिक़ मनाते हैं।
इसके लिए किसी ख़ास हॉल, मैरिज होम, होटल, रेस्टोरेंट या क्लब में जमा होना लाज़िमी नहीं है।
यह किसी एक शख़्स की मिल्कियत या किसी एक शहर का प्रोग्राम नहीं, बल्कि बिरादरी की राष्ट्रीय पत्रिका की सालाना खुशी से जुड़ी एक रिवायत के तौर पर पेश किया जाता है।
12 नवंबर की खुशी को ख़िदमत से जोड़ने का इरादा
"मुल्तानी समाज" राष्ट्रीय समाचार पत्रिका के प्रधान-संपादक ज़मीर आलम ने बताया कि "मुल्तानी-डे" की खुशी को सिर्फ़ जश्न तक महदूद रखने के बजाय उसे ख़िदमत-ए-ख़ल्क़ से जोड़ने का इरादा है।
इसी सिलसिले में हर साल 12 नवंबर की खुशी के मौक़े पर 12 ज़रूरतमंद बेटियों की इज्तिमाई शादी कराने की योजना है, जिसे बिरादरी के सहयोग से जल्द शुरू करने का इरादा है।
क्यों न हमारी खुशियां किसी ज़रूरतमंद के घर की ख़ुशी बनें?
क्यों न हमारी बिरादरी की सालाना खुशी किसी बेटी के निकाह और उसके नए घर की शुरुआत का सबब बने?
यही जज़्बा "मुल्तानी-डे" की खुशी को एक बेहतर और ख़िदमतगार मक़सद दे सकता है।
आइए, बहस नहीं—हक़ीक़त को आम करें
हमारी गुज़ारिश है कि इस ख़बर को ज़्यादा से ज़्यादा बिरादरान-ए-वतन तक पहुंचाया जाए, ताकि अगर कोई आपसे पूछे—
"मुल्तानी-डे कब और क्यों मनाया जाता है?"
तो आप अंदाज़े या सुनी-सुनाई बात के बजाय सही जानकारी के साथ जवाब दे सकें।
तारीख़ बदल देने से इतिहास नहीं बदलता।
ख़ामोशी से हक़ीक़त मिटती नहीं।
और सोशल मीडिया की बहस से दस्तावेज़ी हक़ीक़त बदलती नहीं।
हमारी ज़िम्मेदारी है कि अपनी बिरादरी की तारीख़, पहचान और रिवायत को आने वाली नस्ल तक सही मालूमात के साथ पहुंचाएं।
"मुल्तानी समाज" — अपनी बिरादरी की आवाज़, अपनी पहचान
सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार से पंजीकृत, नई दिल्ली से प्रकाशित/प्रसारित मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी की क़ौमी समाचार पत्रिका, न्यूज़ पोर्टल और YouTube चैनल "मुल्तानी समाज" के लिए उत्तर प्रदेश डेस्क से प्रधान-संपादक ज़मीर आलम की ख़ास रिपोर्ट।
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