“मिसाइल मैन” जैसे राष्ट्रीय नायक की विरासत को किसी एक बिरादरी तक सीमित न किया जाए—मुल्तानी समाज की ओर से आयोजन के स्वरूप और उद्देश्य पर सवाल
मुज़फ्फरनगर/खतौली।
भारत के पूर्व राष्ट्रपति, महान वैज्ञानिक और देश के युवाओं के प्रेरणास्रोत डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम की यौमे-पैदाइश के सिलसिले में आयोजित किए जाने वाले एक कार्यक्रम को लेकर मुस्लिम मुल्तानी लोहार, बढ़ई बिरादरी के बीच बहस और सवाल सामने आने लगे हैं। मुल्तानी समाज की ओर से जारी प्रतिक्रिया में कहा गया है कि डॉ. कलाम जैसी अज़ीम और राष्ट्रीय स्तर की शख्सियत को किसी एक बिरादरी तक महदूद करके कार्यक्रम आयोजित करना उनके राष्ट्रीय कद और विरासत की व्यापकता के अनुरूप नहीं है।
मुल्तानी समाज के मुताबिक, डॉ. कलाम केवल किसी एक बिरादरी, मज़हब या समुदाय की शख्सियत नहीं थे, बल्कि पूरे हिन्दुस्तान के लिए एक नायाब हीरे की हैसियत रखते थे। उन्होंने विज्ञान, शिक्षा और राष्ट्र निर्माण के क्षेत्र में अपनी सेवाओं से देश और दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाई। ऐसे में उनकी यौमे-पैदाइश के मौके पर होने वाले किसी भी कार्यक्रम में समाज के हर तबके की शिरकत होनी चाहिए और हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई समेत सभी समुदायों को दावत दी जानी चाहिए।
“डॉ. कलाम के नाम पर कार्यक्रम हो तो दायरा भी राष्ट्रीय होना चाहिए”
मुल्तानी समाज की ओर से कहा गया है कि अगर किसी तंजीम की तरफ से डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम के नाम पर कार्यक्रम आयोजित किया जाता है तो उसका विरोध नहीं है। बल्कि ऐसी कोशिश का स्वागत होना चाहिए, बशर्ते कार्यक्रम का मकसद उनकी वैज्ञानिक सोच, तालीम, इंसानियत और राष्ट्र निर्माण के पैगाम को आम करना हो।
हालांकि, संगठन की ओर से यह सवाल उठाया गया है कि क्या इतनी अज़ीम राष्ट्रीय शख्सियत की यौमे-पैदाइश को केवल एक बिरादरी की महफ़िल तक सीमित रखना मुनासिब है? इस सवाल पर बिरादरी और समाज के लोगों से गंभीरता से गौर करने की अपील की गई है।
“मुल्तानी-डे” की तारीख को लेकर भी उठी आवाज़
इस पूरे मामले में एक दूसरा अहम पहलू “मुल्तानी-डे” की तारीख को लेकर सामने आया है। मुल्तानी समाज चैरिटेबल ट्रस्ट की ओर से कहा गया है कि उसकी ओर से राष्ट्रीय अधिवेशन को हर वर्ष 12 नवंबर को “मुल्तानी-डे” के नाम से मनाए जाने की परंपरा वर्षों से चली आ रही है।
संगठन का कहना है कि ऐसे में अक्टूबर महीने में, यानी परंपरागत तारीख से लगभग एक माह पहले, डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम के नाम को जोड़कर “मुल्तानी-डे” के आयोजन की घोषणा किए जाने से बिरादरी में भ्रम, मतभेद और टकराव की स्थिति पैदा हो सकती है।
मुल्तानी समाज का कहना है कि एक ही बिरादरी के भीतर अलग-अलग तारीखों और अलग-अलग मंचों के माध्यम से समान नाम को लेकर कार्यक्रम किए जाने के बजाय आपसी मशवरे और भाईचारे का रास्ता अपनाया जाना चाहिए।
“टकराव नहीं, इत्तेहाद और मशवरा ज़रूरी”
मुल्तानी समाज की ओर से यह भी कहा गया कि बिरादरी की किसी भी तंजीम या संस्था को सामाजिक और शैक्षिक कार्यक्रम आयोजित करने का अधिकार है, लेकिन किसी भी राष्ट्रीय शख्सियत के नाम का इस्तेमाल करते समय उसके मकसद और स्वरूप को साफ रखना भी ज़रूरी है।
संगठन के मुताबिक, मुल्तानी बिरादरी के नाम पर होने वाले कार्यक्रम बिरादरी को जोड़ने वाले होने चाहिए, बांटने वाले नहीं। अगर किसी आयोजन से दो धड़ों के बीच गलतफ़हमियां पैदा हों तो बेहतर होगा कि संबंधित जिम्मेदार लोग बैठकर बातचीत करें और ऐसा रास्ता निकालें जिससे बिरादरी की एकता और इज़्ज़त बरकरार रहे।
बिरादरी के सामने सवाल
इस पूरे विवाद के बीच अब मूल सवाल यही है कि डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम की यौमे-पैदाइश का आयोजन किस दायरे और किस मकसद से किया जाए तथा “मुल्तानी-डे” की परंपरागत तारीख को लेकर बिरादरी में क्या रुख अपनाया जाए।
मुल्तानी समाज की ओर से कहा गया है कि अंतिम फैसला किसी एक व्यक्ति या संस्था के बजाय बिरादरी के लोगों के आपसी मशवरे, ऐतिहासिक परंपरा और व्यापक सामाजिक हित को ध्यान में रखकर होना चाहिए।
डॉ. कलाम ने अपनी ज़िंदगी में तालीम, मेहनत, विज्ञान, नौजवानों और मुल्क की तरक्की को अहमियत दी। इसलिए उनके नाम पर होने वाला कार्यक्रम भी ऐसा हो जो इल्म, इत्तेहाद, भाईचारे और राष्ट्र निर्माण का पैगाम समाज तक पहुंचाए।
यह भी ज़रूरी है कि डॉ. कलाम जैसी अज़ीम राष्ट्रीय शख्सियत की याद को किसी बिरादरी के आपसी मतभेद का हिस्सा बनाने के बजाय उनके बताए हुए इल्मी और इंसानी रास्ते को आगे बढ़ाने का जरिया बनाया जाए।
उत्तर प्रदेश डेस्क से विशेष रिपोर्ट
प्रधान संपादक — ज़मीर आलम
सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार से पंजीकृत, नई दिल्ली से प्रसारित राष्ट्रीय समाचार पत्रिका, न्यूज़ पोर्टल एवं YouTube चैनल “मुल्तानी समाज”
नोट: इस रिपोर्ट में व्यक्त आपत्तियां और आरोप संबंधित पक्ष की ओर से व्यक्त किए गए विचार हैं। आयोजन से जुड़े दूसरे पक्ष का आधिकारिक पक्ष उपलब्ध होने पर उसे भी निष्पक्षता के साथ प्रकाशित किया जा सकता है।
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