Wednesday, September 30, 2026

हर खुशी का दिन बना ‘मुल्तानी-डे’: 12 नवंबर को सगाई, निकाह और अकीकाह की खुशियाँ मनाने का बढ़ता रुझान

मुल्तानी समाज में नई रिवायत ने पकड़ी रफ़्तार, बिरादरी के घरों में 12 नवंबर को जश्न की तैयारियाँ

नई दिल्ली/उत्तर प्रदेश।
पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार, बढ़ई बिरादरी में अपनी सामूहिक पहचान, भाईचारे और खुशियों को एक-दूसरे से जोड़ने की एक खूबसूरत रिवायत लगातार मज़बूत होती जा रही है। बिरादरी के अनेक परिवार अब अपने घरों में होने वाली खुशियों—सगाई, निकाह, अकीकाह और दीगर खुशी के मौकों—को 12 नवंबर यानी “मुल्तानी-डे” के मुबारक दिन के साथ जोड़ने लगे हैं।

बिरादरी के लिए यह दिन महज़ एक तारीख़ नहीं, बल्कि अपनी कौमी पहचान, इत्तेहाद, भाईचारे और आपसी मोहब्बत के इज़हार का एक खास मौक़ा बनता जा रहा है।

12 नवंबर से जुड़ी है ‘मुल्तानी-डे’ की खास पहचान

पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार, बढ़ई बिरादरी की देश की राजधानी नई दिल्ली से संचालित “मुल्तानी समाज चैरिटेबल ट्रस्ट” के मुताबिक, राष्ट्रीय स्तर पर बिरादरी की आवाज़ को एक मंच देने के उद्देश्य से राष्ट्रीय समाचार पत्रिका “मुल्तानी समाज” का पंजीकरण 12 नवंबर को हुआ था।

इसी सिलसिले में ट्रस्ट की ओर से यह ऐलान किया गया कि हर वर्ष पत्रिका के राष्ट्रीय अधिवेशन को “मुल्तानी-डे” के नाम से मनाया जाएगा। इसके बाद से बिरादरी के लोग अपने-अपने गाँव, कस्बों और शहरों में अपने घरों तथा सामाजिक स्तर पर इस दिन को खुशी और मिलन के अवसर के रूप में मनाते आ रहे हैं।

समय के साथ यह दिन बिरादरी के बीच एक सामूहिक पहचान और खुशी के प्रतीक के तौर पर अपनी जगह बनाता गया।

अब निकाह से लेकर अकीकाह तक, खुशियों को ‘मुल्तानी-डे’ से जोड़ने की पहल

इस रिवायत को अब एक नई दिशा मिलती दिखाई दे रही है। बिरादरी के कई परिवार अपने घर में आने वाली खुशियों को 12 नवंबर के मुबारक मौके से जोड़ने लगे हैं।

कहीं सगाई की तारीख़ 12 नवंबर रखी जा रही है तो कहीं निकाह और अकीकाह जैसे मुबारक मौकों को इसी दिन मनाने की तैयारियाँ की जा रही हैं। इस तरह व्यक्तिगत खुशी धीरे-धीरे सामूहिक खुशी में बदलती दिखाई दे रही है।

इस पहल की खूबसूरती यह है कि एक परिवार की खुशी को बिरादरी के दूसरे परिवार भी अपनी खुशी समझकर उसमें शरीक हो सकते हैं। यही जज़्बा किसी भी बिरादरी के सामाजिक रिश्तों को मज़बूत करने में अहम किरदार अदा करता है।

एक तारीख़, एक पहचान और हजारों खुशियाँ

12 नवंबर को लेकर बिरादरी में बढ़ता यह रुझान आने वाले समय में एक ऐसी सामाजिक रिवायत की शक्ल ले सकता है, जिसमें मुल्तानी परिवार अपने घर की खुशियों को एक साझा दिन के साथ जोड़कर पूरी बिरादरी को उस खुशी का हिस्सा बनाएं।

सगाई हो, निकाह हो, अकीकाह हो या किसी और खुशी का मौका—अगर इन खुशियों के साथ “मुल्तानी-डे” का नाम जुड़ता है तो यह दिन परिवार की खुशी के साथ-साथ बिरादरी की एकजुटता और आपसी मोहब्बत का भी प्रतीक बन सकता है।

बिरादरी की नई नस्ल के लिए भी बन सकता है पहचान का माध्यम

आज के दौर में जब नई पीढ़ी अपनी पारिवारिक और बिरादराना रवायतों से जुड़ने के लिए नए माध्यम तलाश रही है, ऐसे सामूहिक आयोजन उन्हें अपनी जड़ों, अपनी तारीख़ और अपनी सामाजिक पहचान से जोड़ने में अहम भूमिका निभा सकते हैं।

“मुल्तानी-डे” को खुशियों से जोड़ने की यह पहल अगर मोहब्बत, भाईचारे और आपसी इत्तेहाद के साथ आगे बढ़ती है, तो यह आने वाली नस्लों के लिए भी एक यादगार सामाजिक रिवायत बन सकती है।

बिरादरी के लोगों का कहना है कि खुशी चाहे छोटी हो या बड़ी, अगर उसमें अपने लोगों की शिरकत और दुआएँ शामिल हो जाएँ तो उसकी खुशी कई गुना बढ़ जाती है। शायद यही वजह है कि अब कई परिवार अपनी खुशियों के लिए 12 नवंबर को एक खास दिन के तौर पर देखने लगे हैं।


‘मुल्तानी समाज’ की ख़ास रिपोर्ट

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार से पंजीकृत, देश की राजधानी नई दिल्ली से प्रसारित पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी की राष्ट्रीय समाचार पत्रिका, न्यूज़ पोर्टल एवं यूट्यूब चैनल “मुल्तानी समाज” के लिए उत्तर प्रदेश डेस्क से प्रधान संपादक ज़मीर आलम की ख़ास रिपोर्ट।

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एक ही रात मुस्लिम मुल्तानी लोहार-बढ़ई बिरादरी के दो घरों में पसरा मातम

नजीबाबाद और बागपत से दो अफ़राद के इंतक़ाल की दर्दनाक इत्तिला, बिरादराना हज़रात से जनाज़े में शिरकत और मरहूमीन के लिए दुआ-ए-मग़फ़िरत की अपील

निहायत ही रंज-ओ-ग़म और दिली अफ़सोस के साथ मुल्क भर में रहने वाले तमाम मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादराना हज़रात को यह दर्दनाक इत्तिला दी जाती है कि बीती रात बुध बा-तारीख़ 30 सितंबर 2026 को बिरादरी के दो अलग-अलग जिलों से दो अफ़राद के क़ज़ा-ए-इलाही से इंतक़ाल की ख़बर सामने आई है। दोनों सदमों ने बिरादरी के लोगों को गहरे रंज-ओ-ग़म में मुब्तिला कर दिया है।

नजीबाबाद, जिला बिजनौर से पहली इंतक़ाल की इत्तिला

मोहल्ला मुग़लुशा, क़स्बा नजीबाबाद, जिला बिजनौर, उत्तर प्रदेश के रहने वाले जनाब फ़ख़रे आलम साहब वल्द मरहूम जनाब अख़्तर मुल्तानी साहब का बीती रात क़ज़ा-ए-इलाही से इंतक़ाल हो गया।

मरहूम के इंतक़ाल की ख़बर से खानदान, रिश्तेदारों, अहबाब और बिरादरी में गहरे सदमे और ग़म की लहर दौड़ गई। हर तरफ़ से मरहूम के लिए दुआ-ए-मग़फ़िरत और अहले-ख़ाना के लिए सब्र-ए-जमील की दुआएँ की जा रही हैं।

मैय्यत को बाद नमाज़ जौहर तदफिन होगा।


1.30 बजे जनाज़ा उनकी रिहाइशगाह मोहल्ला मुग़लशा इस्लामी फंड के सामने से होज़ वाले कब्रिस्तान ले जाया जाएगा। बाद नमाज़-ए-ज़ुहर सुपुर्द-ए-ख़ाक किया जाएगा। बिरादराना हज़रात से गुज़ारिश है कि जनाज़े में शरीक होकर मरहूम के लिए दुआ-ए-मग़फ़िरत करें और सवाब-ए-दारेन हासिल करें।

मैय्यत के सिलसिले में मज़ीद मालूमात के लिए जनाब शेकुलरहमान साहब — 9719174812 पर राब्ता क़ायम किया जा सकता है।

बागपत से दूसरी दर्दनाक इत्तिला

इसी के साथ गाँव बावली, तहसील बड़ौत, जिला बागपत, उत्तर प्रदेश से भी इंतक़ाल की दूसरी बेहद अफ़सोसनाक इत्तिला मिली है।

गाँव बावली के जनाब अलीहसन साहब वल्द जनाब हाजी मुंसी जी के बड़े फ़रज़ंद का भी बीती रात बुध बा-तारीख़ 30 सितंबर 2026 को क़ज़ा-ए-इलाही से इंतक़ाल हो गया।

इस दर्दनाक ख़बर से अहले-ख़ाना, रिश्तेदारों, दोस्तों और बिरादरी के लोगों में ग़म की लहर दौड़ गई। मरहूम की नमाज़-ए-जनाज़ा आज जुमेरात बा-तारीख़ 01 अक्टूबर 2026 को नमाज़-ए-ज़ुहर के बाद गाँव बावली में अदा की जाएगी, जिसके बाद मरहूम को सुपुर्द-ए-ख़ाक किया जाएगा।

तमाम बिरादराना हज़रात से पुरख़ुलूस गुज़ारिश है कि जनाज़े में शरीक होकर मरहूम के लिए दुआ-ए-मग़फ़िरत करें और अहले-ख़ाना के ग़म में शरीक हों।

मैय्यत के सिलसिले में मज़ीद मालूमात के लिए जनाब ख़ालिद साहब — 7984844198 पर राब्ता क़ायम किया जा सकता है।

दुआ-ए-मग़फ़िरत

ऐ अल्लाह! दोनों मरहूमीन की मुकम्मल मग़फ़िरत फ़रमा, उनकी तमाम ख़ताओं और कोताहियों को माफ़ फ़रमा, उनकी क़ब्रों को नूर से मुनव्वर फ़रमा, क़ब्र को उनके लिए जन्नत के बाग़ों में से एक बाग़ बना दे और उसमें कुशादगी अता फ़रमा।

या अल्लाह! जब उन्हें क़ब्र में उतारा जाए और मिट्टी दी जाए तो अपनी रहमत के साये में उन्हें जगह अता फ़रमा। उनकी क़ब्र की तन्हाई को अपनी रहमत से दूर फ़रमा, सवालात-ए-क़ब्र में आसानी फ़रमा और उन्हें जन्नतुल फ़िरदौस में आला मक़ाम अता फ़रमा।

या रब्बुल आलमीन! मरहूमीन की मग़फ़िरत फ़रमा, उनकी नेकियों को क़ुबूल फ़रमा, उनकी लग़ज़िशों से दरगुज़र फ़रमा और उन्हें अपने प्यारे हबीब हज़रत मुहम्मद ﷺ की शफ़ाअत नसीब फ़रमा।

अल्लाह तआला दोनों मरहूमीन को जन्नतुल फ़िरदौस में आला मक़ाम अता फ़रमाए और तमाम अहले-ख़ाना को इस सदमे को बर्दाश्त करने के लिए सब्र-ए-जमील अता फ़रमाए।

आमीन या रब्बुल आलमीन।

तमाम बिरादराना हज़रात से गुज़ारिश है कि इन दोनों ग़मज़दा ख़ानदानों के लिए ख़ुसूसी दुआ करें और जहाँ मुमकिन हो, जनाज़े में शरीक होकर बिरादराना हमदर्दी का इज़हार करें।


सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार से पंजीकृत, मुल्क की राजधानी नई दिल्ली से प्रसारित, पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी की मुल्क की इकलौती क़ौमी समाचार पत्रिका, न्यूज़ पोर्टल और यूट्यूब चैनल “मुल्तानी समाज” के लिए उत्तर प्रदेश डेस्क से प्रधान संपादक ज़मीर आलम की ख़ास रिपोर्ट।

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Tuesday, September 29, 2026

🌹 दो घरानों में बजेगी निकाह की शहनाई, सजेंगे खुशियों के रंग

मोहम्मद जावेद व सानिया नूर तथा जियाउर्रहमान व अमरीन बानो के निकाह की तैयारियाँ मुकम्मल

बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम

अस्सलातु वस्सलामु अलैका या रसूलल्लाह ﷺ

🌹 “अन-निकाहु मिन सुन्नती” 🌹

उदयपुर। अल्लाह तआला के फ़ज़्लो-करम और सरवरे कायनात, रहमतुल्लिल-आलमीन हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा ﷺ के सदक़े व तुफ़ैल दो खानदानों में निकाह की मुबारक खुशियाँ दस्तक देने जा रही हैं। इस मुबारक मौक़े पर अहले मुल्तानी बिरादरी के दो नौजवानों के निकाह की खुशखबरी ने रिश्तेदारों और अज़ीज़ो-अक़ारिब में ख़ुशी की लहर पैदा कर दी है।

मरहूम रहीम बख्श साहब के परपोते तथा मरहूम हाजी अब्दुल क़ादिर पटेल साहब के पोते जनाब मोहम्मद जावेद, इब्ने अब्दुल वहीद पटेल (पुंवार), आयड़, उदयपुर, का निकाह सानिया नूर, बिन्ते मोहम्मद शरीफ़ साहब, पुंवार (उदयपुर) के साथ दोनों खानदानों की बाहमी रज़ामंदी से तय पाया है।

💐 पहला निकाह — मोहम्मद जावेद एवं सानिया नूर

इस मुबारक निकाह की तक़रीब 6 जमादिउल अव्वल 1448 हिजरी, मुताबिक़ 17 अक्टूबर 2026, बरोज़ शनिवार, बाद नमाज़-ए-मग़रिब लोहार कॉलोनी, उदयपुर में आयोजित होगी।

अल्लाह तआला इस पाक रिश्ते को मोहब्बत, बरकत, सुकून और ख़ुशहाली से मालामाल फ़रमाए और दोनों को उम्र भर एक-दूसरे का ख़ैरख़्वाह और हमसफ़र बनाए। आमीन।


🌹 दूसरा निकाह — जियाउर्रहमान एवं अमरीन बानो

इसी ख़ुशनुमा सिलसिले में जनाब जियाउर्रहमान, इब्ने अब्दुल हमीद पटेल (पुंवार), आयड़, उदयपुर, का निकाह अमरीन बानो, बिन्ते अब्दुल अज़ीज़ साहब, मोटीयार (इंदौर) के साथ तय पाया है।

यह मुबारक निकाह 8 जमादिउल अव्वल 1448 हिजरी, मुताबिक़ 19 अक्टूबर 2026, बरोज़ सोमवार, बाद नमाज़-ए-मग़रिब इंदौर में, इंशाअल्लाह, अदा होगा।

दोनों परिवारों में निकाह की तैयारियाँ अपने पूरे जोश व ख़ुशी के साथ जारी हैं और रिश्तेदारों, दोस्तों तथा बिरादराने अहले मुल्तानी की आमद से इन मुबारक तक़रीबात की रौनक़ में और इज़ाफ़ा होगा।

🌺 दावते वलीमा

निकाह की इन मुबारक तक़रीबात के बाद 21 अक्टूबर 2026, बरोज़ बुधवार को तुलसी वाटिका, यूनिवर्सिटी रोड, उदयपुर में दावते वलीमा का एहतिमाम किया गया है।

इस मौक़े पर खानदान के अज़ीज़ो-अक़ारिब, दोस्तों और बिरादरी के लोगों से शिरकत फ़रमाकर नवविवाहित जोड़ों को अपनी दुआओं से नवाज़ने की दरख़्वास्त की गई है।

🌹 दुआ है...

अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त दोनों नवविवाहित जोड़ों के निकाह को अपनी बारगाह में क़ुबूल फ़रमाए। उनके आने वाले सफ़र को ईमान, मोहब्बत, रहमत, बरकत और सुकून से भर दे। दोनों परिवारों के बीच मोहब्बत और भाईचारा हमेशा क़ायम रखे तथा घरों को ख़ुशियों, नेक औलाद और अपनी रहमतों से आबाद फ़रमाए।

आमीन या रब्बुल आलमीन। 🤲🌹

🌺 अदईय्यान

अब्दुल जलील पटेल साहब, अब्दुल अज़ीज़ पटेल, अब्दुल गफ़्फ़ार पटेल, मोहम्मद इब्राहीम पटेल, अब्दुल हमीद पटेल एवं अब्दुल वहीद पटेल।

🌺 अल-मुक़ल्लिफ़ीन

अब्दुल रशीद, अब्दुल मजीद, मोहम्मद सलीम, अब्दुल सलाम, मोहम्मद फ़ारूक़, मोहम्मद इरफ़ान, मोहम्मद शरीफ़, मोहम्मद हनीफ़, अब्दुल वहीद, मोहम्मद इमरान, अताउर्रहमान, मोहम्मद इदरीस, मोहम्मद आसिफ़, हबीबुर्रहमान, मोहम्मद इलियास, मोहम्मद फ़ैज़ल, मोहम्मद तौसीफ़, अब्दुल कलाम, मोहम्मद मुजाहिद, मोहम्मद शाहिद एवं मोहम्मद अल्तमश।

🌷 नन्ही इल्तिजा

मोहम्मद ताबिश एवं अक़लीमा फ़ातिमा

🌹 ननिहाल की तरफ़ से

मामा जी: हाजी मक़बूल अहमद साहब, मौलाना मोहम्मद अय्यूब, मोहम्मद शरीफ़, अहमद हुसैन, मोहम्मद सलीम, मोहम्मद सईद, मोहम्मद आरिफ़ एवं अब्दुल रशीद।

बहनोई: हाजी मोहम्मद फ़ारूक़ डड्डियाल।

भांजे: मोहम्मद तारिक़, मोहम्मद साजिद, मोहम्मद नूर, मोहम्मद सलीम, मोहम्मद फ़ुरक़ान एवं मोहम्मद फ़ैज़ान।

🌹 नियाज़मंद

अब्दुल गफ़्फ़ार पटेल — 7727019647
अब्दुल हमीद पटेल — 7737719595
अब्दुल वहीद पटेल — 9414474105

पता: 84, गली नंबर 3, लोहार कॉलोनी, उदयपुर (राजस्थान)


📰 मुल्तानी समाज — आपकी बिरादरी की अपनी आवाज़

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार से पंजीकृत, मुल्क की राजधानी नई दिल्ली से प्रसारित, पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी की क़ौमी समाचार पत्रिका, न्यूज़ पोर्टल और यूट्यूब चैनल “मुल्तानी समाज” के लिए उत्तर प्रदेश डेस्क से प्रधान संपादक ज़मीर आलम की ख़ास रिपोर्ट।

अगर आप भी अपनी ख़बर, मज़मून, पैग़ाम-ए-मुबारकबाद, ताज़ियती इश्तिहार, दिलचस्प वाक़ियात, तहरीर, अफ़साना या अपने कारोबार का इश्तिहार क़ौमी सतह पर शाया व प्रसारित करवाना चाहते हैं, तो राब्ता फ़रमाएँ।

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Monday, September 28, 2026

सिर्फ़ एक मौत नहीं, हमारे लिए एक बड़ा सवाल है — 38 साल की उम्र में मोहम्मद शहज़ाद का अचानक इंतक़ाल

रात 11 बजे तक दोस्तों के साथ हंसी-ख़ुशी मुलाक़ातें… और महज़ पौने दो घंटे बाद मौत की ख़बर — एक ख़ुशमिज़ाज नौजवान का यूँ अचानक चले जाना हर दिल को झकझोर गया

शामली।
कभी-कभी ज़िंदगी हमें ऐसे सदमे से रूबरू करा देती है, जिसके बाद इंसान देर तक यही सोचता रह जाता है कि आखिर कुछ ही लम्हों में सब कुछ कैसे बदल गया।

मोहम्मद शहज़ाद का अचानक इंतक़ाल भी ऐसा ही एक दिल दहला देने वाला वाक़िया है। महज़ 38 साल की उम्र में उनका अचानक हार्ट फेल होने से इंतक़ाल हो जाना न सिर्फ़ उनके खानदान, रिश्तेदारों और दोस्तों के लिए बल्कि पूरी मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी के लिए गहरे रंज और सदमे का सबब है।

बताया जाता है कि 28 सितंबर 2026 की रात करीब 11 बजे तक मोहम्मद शहज़ाद अपने यार-दोस्तों के साथ हंसी-ख़ुशी घूमते, मिलते-जुलते और बातचीत करते रहे। उस वक़्त न किसी को किसी अनहोनी का अंदेशा था और न ही किसी ने यह सोचा होगा कि कुछ ही देर बाद हालात इतने बदल जाएंगे।

लेकिन रात आगे बढ़ी और करीब 12 बजकर 45 मिनट पर अचानक उनके इंतक़ाल की ख़बर सामने आई।

महज़ करीब पौने दो घंटे का यह फ़ासला ज़िंदगी और मौत के बीच ऐसा फ़ासला बन गया, जिसने हर सुनने वाले को अंदर तक हिला दिया।


मौत ने न डॉक्टर तक पहुंचने की मोहलत दी, न इलाज का मौक़ा

मोहम्मद शहज़ाद का परिवार मेडिकल सेक्टर से जुड़ा हुआ बताया जाता है। उनका अपना होलसेल और रिटेल मेडिकल स्टोर था। शामली की पॉश कॉलोनी में उनका आलीशान अस्पताल भी बताया जाता है। शहर के छोटे-बड़े मेडिकल स्टोर संचालकों से लेकर बड़े से बड़े डॉक्टरों तक उनके अच्छे ताल्लुक़ात थे।

लेकिन इंसान के पास चाहे कितने ही साधन क्यों न हों, मौत का वक़्त जब मुक़र्रर होता है तो तमाम इंतज़ामात बेबस हो जाते हैं।

जिस शख़्स के आसपास हर वक़्त दवाइयां, डॉक्टर और इलाज की सुविधाएं मौजूद थीं, उसे डॉक्टर को बुलाने या अस्पताल तक पहुंचाने तक की मोहलत भी न मिल सकी।

यही बात इस हादसे को और भी ज़्यादा झकझोर देने वाला बना देती है।


क्या 38 साल की उम्र में अचानक दिल का जवाब दे देना महज़ एक इत्तेफ़ाक़ है?

मोहम्मद शहज़ाद के इंतक़ाल को किसी एक वजह से जोड़ देना सही नहीं होगा। अचानक होने वाली हृदय संबंधी घटनाओं के पीछे कई अलग-अलग चिकित्सकीय कारण हो सकते हैं और किसी व्यक्ति की मौत का वास्तविक कारण डॉक्टरों की जांच तथा मेडिकल रिकॉर्ड के बिना तय नहीं किया जा सकता।

लेकिन यह हादसा हमें अपने आप से कुछ सवाल करने का मौक़ा ज़रूर देता है।

आज हमारी ज़िंदगी में भागदौड़ बढ़ रही है। खान-पान का अंदाज़ बदल रहा है। बाज़ार में मिलने वाली चीज़ों की गुणवत्ता को लेकर सवाल उठते रहते हैं। नींद पूरी न होना, लगातार तनाव, शारीरिक गतिविधि की कमी, धूम्रपान या तंबाकू का इस्तेमाल और कई दूसरे जोखिम भी दिल की सेहत को प्रभावित कर सकते हैं।

इसीलिए मोहम्मद शहज़ाद का इंतक़ाल सिर्फ़ एक दर्दनाक ख़बर बनकर न रह जाए, बल्कि हमें अपनी ज़िंदगी और सेहत के बारे में सोचने पर भी मजबूर करे।


मिलावट और जहरीले माहौल का सवाल—लेकिन जवाब सबूत के साथ ही

आजकल अक्सर अचानक होने वाली मौतों के बाद लोग मिलावटी खाने, नकली खाद्य पदार्थों, प्रदूषण या जहरीले वातावरण को संभावित वजह मानने लगते हैं।

इन पहलुओं पर सवाल उठना अपनी जगह अहम है, लेकिन बिना चिकित्सकीय जांच और वैज्ञानिक प्रमाण के मोहम्मद शहज़ाद की मौत को इनमें से किसी एक वजह से जोड़ना उचित नहीं होगा।

हाँ, एक समाज के तौर पर हमें यह ज़रूर पूछना चाहिए कि—

हम जो खा रहे हैं, उसकी गुणवत्ता कैसी है?
हमारी रोज़मर्रा की जीवनशैली कितनी सेहतमंद है?
क्या हम नियमित स्वास्थ्य जांच को गंभीरता से लेते हैं?
क्या हम अपने दिल की सेहत, ब्लड प्रेशर, शुगर और कोलेस्ट्रॉल जैसी बुनियादी चीज़ों पर ध्यान देते हैं?
क्या हम अपनी नींद, खान-पान और रोज़ाना की शारीरिक गतिविधि को पर्याप्त महत्व देते हैं?

ये सवाल सिर्फ़ मोहम्मद शहज़ाद के परिवार के नहीं, बल्कि हम सबके हैं।


ज़िंदगी का भरोसा नहीं, मगर एहतियात हमारे हाथ में है

इस दुनिया की सबसे बड़ी हक़ीक़त यही है कि मौत का वक़्त किसी इंसान को मालूम नहीं।

क़ुरआन हमें मौत की हक़ीक़त की याद दिलाता है और इस्लामी तालीम इंसान को अपनी ज़िंदगी की हिफ़ाज़त और सेहत का भी ख़याल रखने की सीख देती है।

इसलिए मौत को याद करना हमें मायूस करने के लिए नहीं, बल्कि ज़िंदगी को बेहतर तरीके से जीने के लिए होना चाहिए।

मोहम्मद शहज़ाद की ज़िंदगी और उनका अचानक चला जाना हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि हम अपनी सेहत को कल पर न टालें।

बीमारी का इंतज़ार करने के बजाय एहतियात करें।
लक्षणों को नज़रअंदाज़ करने के बजाय डॉक्टर से मशवरा करें।
खान-पान में लापरवाही के बजाय संतुलन अपनाएं।
और अपनी तेज़ रफ़्तार ज़िंदगी में अपने शरीर और दिल के लिए भी थोड़ा वक़्त निकालें।


एक ख़ुशमिज़ाज नौजवान की याद और हमारे लिए सबक

मोहम्मद शहज़ाद की आख़िरी रात शायद उनके दोस्तों के लिए हमेशा यादगार रहेगी।

रात 11 बजे तक साथ बैठना, मिलना-जुलना, हंसी-मज़ाक और बातचीत… और फिर कुछ ही देर बाद यह ख़बर कि शहज़ाद अब इस दुनिया में नहीं रहे।

ऐसे वाक़ियात इंसान को अंदर तक हिला देते हैं।

आज हम उनके लिए मग़फ़िरत की दुआ करें, उनके खानदान के ग़म में शरीक हों और साथ ही उनकी मौत को सनसनी नहीं बल्कि एक सामाजिक और सेहत संबंधी सबक बनाने की कोशिश करें।

क्योंकि सवाल सिर्फ़ यह नहीं कि मोहम्मद शहज़ाद के साथ क्या हुआ?

एक बड़ा सवाल यह भी है—

क्या हम अपनी ज़िंदगी, खान-पान और सेहत के बारे में आज से कुछ बेहतर करने का फ़ैसला करेंगे?

या फिर हम भी इस भरोसे में जीते रहेंगे कि हमारे साथ ऐसा कभी नहीं होगा?

अल्लाह तआला मरहूम मोहम्मद शहज़ाद की मग़फ़िरत फ़रमाए, उनके दर्जात बुलंद फ़रमाए और तमाम अहले-ख़ाना को सब्र-ए-जमील अता फ़रमाए। आमीन।


"मुल्तानी समाज" की ख़ास रिपोर्ट

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार से पंजीकृत, मुल्क की राजधानी नई दिल्ली से प्रसारित, पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी की मुल्क की इकलौती क़ौमी समाचार पत्रिका, न्यूज़ पोर्टल और यूट्यूब चैनल "मुल्तानी समाज" के लिए उत्तर प्रदेश डेस्क से प्रधान संपादक ज़मीर आलम की ख़ास रिपोर्ट।

आप भी अपनी ख़बर, मज़मून (आर्टिकल), पैग़ाम, मुबारकबाद, ताज़ियती इश्तिहार, दिलचस्प वाक़ियात, तहरीर, अफ़साना (कहानी) या अपने कारोबार का इश्तिहार (विज्ञापन) क़ौमी सतह पर शाया (प्रकाशित) या प्रसारित करवाना चाहते हैं तो बराए मेहरबानी नीचे दिए गए नंबरों पर राब्ता फ़रमाएँ।

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"मुल्तानी समाज" — अपनी बिरादरी की आवाज़, अपनी पहचान।

इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन,निशा बानू के इंतकाल से बिरादरी में पसरा रंज-ओ-ग़म, नमाज़-ए-जनाज़ा के बाद सुपुर्द-ए-ख़ाक किया जाएगा

पारोली, जिला भीलवाड़ा (राजस्थान), 29 सितंबर 2026।

निहायत ही रंज-ओ-ग़म और अफ़सोस के साथ तमाम बिरादराना हज़रात को यह इत्तिला दी जाती है कि आज दिन मंगलवार, 29 सितंबर 2026 को पारोली, जिला भीलवाड़ा, राजस्थान में मोहम्मद इब्राहिम जी पुवार की बहू तथा अब्दुल हक़ पुवार की अहलिया, निशा बानू का क़ज़ा-ए-इलाही से इंतकाल हो गया।

इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन।

मरहूमा के इंतकाल की ख़बर सुनकर खानदान, रिश्तेदारों, अज़ीज़-ओ-अक़ारिब और बिरादराने मुल्तानी में गहरे रंज-ओ-ग़म की लहर दौड़ गई। इस दुख की घड़ी में हर शख़्स मरहूमा के लिए दुआ-ए-मग़फिरत और उनके अहले-ख़ाना के लिए सब्र-ए-जमील की दुआ कर रहा है।

मिली जानकारी के मुताबिक मरहूमा की नमाज़-ए-जनाज़ा नमाज़-ए-ज़ुहर के बाद अदा की जाएगी, जिसके पश्चात उन्हें उनके आबाई/मुक़ामी कब्रिस्तान में सुपुर्द-ए-ख़ाक किया जाएगा। तमाम बिरादराना हज़रात से गुज़ारिश है कि अपनी मसरूफ़ियत में से वक़्त निकालकर नमाज़-ए-जनाज़ा में शिरकत फ़रमाएँ और मरहूमा के लिए दुआ-ए-मग़फ़िरत करें।

मैय्यत को कब्र में उतारते वक़्त दुआ

जब मरहूमा को कब्र में उतारा जाए तो अल्लाह तआला उनके लिए कब्र के सफ़र को आसान फरमाए, कब्र को नूर से मुनव्वर फरमाए और उसे जन्नत के बाग़ों में से एक बाग़ बना दे।

اللّٰهُمَّ اغْفِرْ لَهَا وَارْحَمْهَا، وَعَافِهَا وَاعْفُ عَنْهَا۔

ऐ अल्लाह! मरहूमा की मग़फ़िरत फरमा, उन पर रहम फरमा, उन्हें आफ़ियत अता फरमा और उनसे दरगुज़र फरमा।

اللّٰهُمَّ نَوِّرْ قَبْرَهَا وَوَسِّعْ مُدْخَلَهَا۔

ऐ अल्लाह! उनकी कब्र को नूर से भर दे और उनकी कब्र को कुशादा फरमा।

कब्र पर मिट्टी डालते वक़्त

मैय्यत को मिट्टी देते हुए यह दुआ की जाए कि:

اللّٰهُمَّ ثَبِّتْهَا عِنْدَ السُّؤَالِ، وَاجْعَلْ قَبْرَهَا رَوْضَةً مِنْ رِيَاضِ الْجَنَّةِ।

ऐ अल्लाह! सवाल के वक़्त उन्हें साबित-क़दम रख और उनकी कब्र को जन्नत के बाग़ों में से एक बाग़ बना दे।

तमाम हज़रात से गुज़ारिश है कि मरहूमा के लिए सूरह-ए-फ़ातिहा, सूरह-ए-इख़लास और दुआ-ए-मग़फ़िरत फरमाएँ। अल्लाह रब्बुल आलमीन मरहूमा के तमाम सग़ीरा-कबीरा गुनाहों को माफ़ फरमाए, उनकी कब्र को रोशन और कुशादा फरमाए, सवाल-ए-कब्र को आसान फरमाए, उन्हें जन्नतुल फ़िरदौस में आला से आला मक़ाम अता फरमाए और अपने हबीब हज़रत मुहम्मद ﷺ की शफ़ाअत नसीब फरमाए।

अहले-ख़ाना के लिए दुआ

अल्लाह तआला मरहूमा के तमाम अहले-ख़ाना, रिश्तेदारों और अज़ीज़-ओ-अक़ारिब को इस सदमे को बर्दाश्त करने की ताक़त अता फरमाए, उन्हें सब्र-ए-जमील नसीब फरमाए और इस ग़म की घड़ी में अपना ख़ास करम फरमाए।

या अल्लाह! मरहूमा निशा बानू की मग़फ़िरत फरमा, उनकी कब्र को नूर से भर दे, उन्हें जन्नतुल फ़िरदौस में आला मक़ाम अता फरमा और उनके तमाम घरवालों को सब्र-ए-जमील अता फरमा।

आमीन या रब्बुल आलमीन।


सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार से पंजीकृत, मुल्क की राजधानी नई दिल्ली से प्रसारित, पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी की मुल्क की इकलौती क़ौमी समाचार पत्रिका, न्यूज़ पोर्टल और यूट्यूब चैनल "मुल्तानी समाज" के लिए उत्तर प्रदेश डेस्क से प्रधान संपादक ज़मीर आलम की ख़ास रिपोर्ट।

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"मुल्तानी समाज"

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इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन — मोहम्मद शहज़ाद के अचानक इंतिक़ाल से ग़म में डूबा शामली और गढ़ी पुख़्ता

महज़ 38 वर्ष की उम्र में दुनिया-ए-फ़ानी से रुख़्सत हुए शहज़ाद, अचानक मौत की ख़बर से बिरादरी में पसरा मातम

भूल सुधार एवं विस्तृत सूचना

निहायत ही रंज-ओ-ग़म और अफ़सोस के साथ तमाम बिरादराना हज़रात को यह इत्तिला दी जाती है कि मोहल्ला सलेक विहार, शामली, उत्तर प्रदेश निवासी मोहम्मद शहज़ाद वल्द जनाब हाजी इश्तियाक साहब, उम्र तक़रीबन 38 वर्ष, का बीती रात अचानक तबीयत ख़राब होने के बाद इंतिक़ाल हो गया।

मिली जानकारी के मुताबिक आज दिन मंगलवार, 29 सितंबर 2026 की बीती रात तक़रीबन पौने एक बजे अचानक उनकी तबीयत बिगड़ गई। परिजन उन्हें इलाज के लिए शामली के मशहूर डॉक्टर खुर्शीद अनवर के नर्सिंग होम पर लेकर पहुंचे, जहां इलाज के दौरान हार्ट फेल होने से कुछ ही मिनटों में क़ज़ा-ए-इलाही से उनका इंतिक़ाल हो गया।

इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन।

मोहम्मद शहज़ाद के अचानक इंतिक़ाल की दर्दनाक ख़बर धीरे-धीरे पूरे शहर में आग की तरह फैलती चली गई। जिस किसी को भी इस दुखद हादसे की इत्तिला मिली, वह ग़मज़दा परिवार से मिलने और ताज़ियत के लिए उनके घर की ओर दौड़ पड़ा। अचानक हुई इस मौत ने परिवार, रिश्तेदारों, दोस्तों और बिरादराना हज़रात को गहरे सदमे में डाल दिया।

बताया गया कि रात तक़रीबन 2 से 3 बजे के बीच मृतक शहज़ाद के परिजन भी शामली पहुंच गए। परिजनों की राय के मुताबिक मैय्यत को क़स्बा गढ़ी पुख़्ता ले जाकर दफ़न किया जाना था। इसके बाद मृतक के बड़े भाई डॉक्टर मुन्तियाज़ अली साहब के कहने पर मैय्यत को क़स्बा गढ़ी पुख़्ता में मिस्त्री सगीर के कारखाने के पीछे स्थित मृतक के छोटे भाई फुरकान के मकान पर ले जाया गया।

मिली जानकारी के मुताबिक आज बाद नमाज़-ए-ज़ुहर ठीक 2 बजे जनाज़े की नमाज़ अदा किए जाने के बाद मैय्यत को सुपुर्द-ए-ख़ाक किया जाएगा। तमाम बिरादराना हज़रात से गुज़ारिश है कि जनाज़े में शरीक होकर मरहूम के लिए मग़फ़िरत की दुआ करें और परिवार को इस मुश्किल घड़ी में सब्र-ओ-तसल्ली दें।

मैय्यत को सुपुर्द-ए-ख़ाक करते वक़्त दुआ

अल्लाह तआला मरहूम मोहम्मद शहज़ाद साहब की मुकम्मल मग़फ़िरत फरमाए, उनकी तमाम ख़ताओं और गुनाहों को माफ़ फरमाए, उनके दरजात को बुलंद फरमाए और उन्हें जन्नतुल फ़िरदौस में आला मक़ाम अता फरमाए।

या अल्लाह! मरहूम की क़ब्र को नूर से मुनव्वर फरमा, उसे उनके लिए जन्नत के बाग़ों में से एक बाग़ बना दे, क़ब्र की तंगी और अंधेरे से महफ़ूज़ फरमा, उन्हें सवालात-ए-क़ब्र में कामयाबी अता फरमा और अपनी रहमत के साये में जगह अता फरमा।

या अल्लाह! जब मरहूम को क़ब्र में उतारा जाए तो उनके लिए आसानी फरमा, उनके कदमों को साबित रख, उनकी तन्हाई को अपनी रहमत से दूर फरमा और उन्हें अपनी रज़ा और मग़फ़िरत नसीब फरमा।

ऐ अल्लाह! जो मिट्टी उनके जिस्म को ढांपे, उसी मिट्टी को उनके लिए सुकून, रहमत और नूर का ज़रिया बना दे।

परिवार के तमाम अफ़राद, रिश्तेदारों और अहले-बिरादरी को सब्र-ए-जमील अता फरमाए और इस सदमे को बर्दाश्त करने की ताक़त दे।

आमीन या रब्बुल आलमीन।

तमाम हज़रात मरहूम के लिए ज़्यादा से ज़्यादा दुआ-ए-मग़फ़िरत और ईसाल-ए-सवाब करें।


मालूमात के लिए राब्ता

मैय्यत के बारे में और ज़्यादा मालूमात के लिए उनके बड़े भाई डॉक्टर मुन्तियाज़ साहब से नीचे दिए गए मोबाइल नंबरों पर राब्ता किया जा सकता है:

📞 9368119416
📞 9719823744


"मुल्तानी समाज" की तरफ़ से ताज़ियत

मुल्तानी समाज राष्ट्रीय समाचार पत्रिका की पूरी टीम इस ग़म की घड़ी में मरहूम मोहम्मद शहज़ाद साहब के परिवार के साथ है।

हम दुआगो हैं कि रब्बे-करीम मरहूम की मग़फ़िरत फरमाए, उनकी क़ब्र को नूर से भर दे, उन्हें जन्नतुल फ़िरदौस में जगह अता फरमाए और तमाम अहले-ख़ाना को सब्र-ए-जमील अता फरमाए।

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इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन मोहम्मद शहज़ाद के अचानक इंतिक़ाल से बिरादरी में पसरा रंज-ओ-ग़म — गढ़ी पुख्ता में सुपुर्द-ए-ख़ाक किए जाने की तैयारियाँ

शामली/गंगोह, 29 सितंबर 2026।
निहायत ही रंज-ओ-ग़म और अफ़सोस के साथ तमाम मुस्लिम मुल्तानी लोहार, बढ़ई बिरादराना हज़रात को यह इत्तिला दी जाती है कि क़स्बा गंगोह, ज़िला सहारनपुर के रहने वाले और फ़िलहाल मोहल्ला सलेक विहार, शामली, उत्तर प्रदेश में क़याम-पज़ीर मोहम्मद शहज़ाद साहब, जिन्हें लोग “अली मेडिकल स्टोर” के नाम से भी जानते थे, का आज मंगलवार, 29 सितंबर 2026 को तक़रीबन 38 वर्ष की उम्र में अचानक इंतिक़ाल हो गया।

मिली जानकारी के मुताबिक़ आज लगभग 1 बजे अचानक तबीयत ख़राब होने पर उन्हें डॉक्टर खुर्शीद अनवर के हॉस्पिटल में इलाज के लिए ले जाया गया, जहां इलाज के दौरान उन्हें दिल का दौरा पड़ा और क़ज़ा-ए-इलाही से उनका इंतिक़ाल हो गया।

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मोहम्मद शहज़ाद के अचानक इंतिक़ाल की ख़बर से उनके अहल-ए-ख़ाना, अज़ीज़-ओ-अक़ारिब, दोस्त-अहबाब और बिरादरी के लोगों में गहरा रंज-ओ-ग़म है। ख़बर लिखे जाने तक उनके घर वाले शामली पहुंच चुके थे और घर में मातम का माहौल है।

मैय्यत को दफनाने के बारे में 

परिवार और अज़ीज़-ओ-अक़ारिब की ओर से मैय्यत को क़स्बा गढ़ी पुख़्ता जिला शामली ले जाकर वहीं सुपुर्द-ए-ख़ाक किए जाएंगे नमाज़-ए-जनाज़ा बाद नमाज़ जोहर अदा करके ठीक 2 बजे मैय्यत को किया जाएगा सपुर्द - ए - ख़ाक 

तमाम बिरादराना हज़रात से गुज़ारिश है कि मैय्यत के जनाज़े में शिरकत फ़रमाएं, नमाज़-ए-जनाज़ा अदा करें और मरहूम के हक़ में दुआ-ए-मग़फ़िरत फ़रमाएं।

मरहूम के लिए दुआ-ए-मग़फ़िरत

अल्लाह तआला मरहूम मोहम्मद शहज़ाद साहब की मग़फ़िरत फ़रमाए, उनकी तमाम ख़ताओं और ग़लतियों को माफ़ फ़रमाए, उनकी नेकियों को क़ुबूल फ़रमाए और उन्हें अपनी रहमत-ओ-मग़फ़िरत के साए में जगह अता फ़रमाए।

या अल्लाह! उनकी क़ब्र को नूर से मुनव्वर फ़रमा, उसे कुशादा फ़रमा और उन्हें रौज़ा-ए-जन्नत में से एक बाग़ बना दे। क़ब्र की तन्हाई में उनका हाफ़िज़-ओ-नासिर बन, उन्हें सवालात-ए-क़ब्र में कामयाबी अता फ़रमा और अपनी ख़ास रहमत से नवाज़।

दफ़्न के वक़्त की दुआ

जब मरहूम को क़ब्र में उतारा जाए तो या अल्लाह, उस आख़िरी मंज़िल को उनके लिए आसान फ़रमा। मिट्टी की इस आख़िरी आरामगाह को उनके लिए सुकून, रहमत और नूर का मक़ाम बना दे।

या अल्लाह! जो लोग अपने हाथों से मरहूम को क़ब्र में उतारें, उनके इस अमल को अपनी बारगाह में क़ुबूल फ़रमा और जो लोग मिट्टी दें, उनके हर मुट्ठी भर मिट्टी को मरहूम के लिए रहमत का सबब बना दे।

या रब्बुल आलमीन! मरहूम के तमाम अहल-ए-ख़ाना को सब्र-ए-जमील अता फ़रमा, उन्हें इस सदमे को बर्दाश्त करने की ताक़त दे और उनके दिलों को अपने ज़िक्र और अपनी रहमत से सुकून अता फ़रमा।

आमीन या रब्बुल आलमीन।

तमाम हज़रात से गुज़ारिश है कि मरहूम के लिए सूरह-ए-फ़ातिहा, सूरह-ए-इख़लास और दुआ-ए-मग़फ़िरत फ़रमाएं।

अल्लाह तआला मरहूम को जन्नतुल फ़िरदौस में आला मक़ाम अता फ़रमाए और तमाम पसमांदगान को सब्र-ए-जमील अता फ़रमाए।

आमीन सुम्मा आमीन।


मुल्तानी समाज की ख़ास रिपोर्ट

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार से पंजीकृत, मुल्क की राजधानी नई दिल्ली से प्रसारित, पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी की मुल्क की इकलौती क़ौमी समाचार पत्रिका, न्यूज़ पोर्टल और यूट्यूब चैनल “मुल्तानी समाज” के लिए उत्तर प्रदेश डेस्क से प्रधान संपादक ज़मीर आलम की ख़ास रिपोर्ट।

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Saturday, September 26, 2026

गुज़ारिश: तालीम को आम कीजिए, क्योंकि असली बदलाव इल्म से आता है

दौलत से सुविधाएँ खरीदी जा सकती हैं, मगर अदब, तहज़ीब, ईमानदारी, सुकून और इंसानियत नहीं—इन नेमतों की बुनियाद तालीम है

हमारा मुआशरा उस वक़्त खूबसूरत बनता है, जब उसमें अदब-ओ-तहज़ीब, बेफ़िक्री, सुकून, ईमानदारी, इल्म, शऊर और इंसानियत का बोलबाला हो। जब लोग एक-दूसरे का एहतराम करें, बातचीत में मिठास हो, घरों में सुकून हो, गलियों और मोहल्लों में पाकीज़ा माहौल हो और हर शख़्स दूसरे के दुख-दर्द को अपना समझकर उसके काम आए—तो ऐसा मुआशरा किसी जन्नत से कम नहीं होता।

लेकिन सवाल यह है कि क्या ये तमाम नेमतें सिर्फ़ दौलत और माल-ओ-दौलत से हासिल की जा सकती हैं?

यक़ीन जानिए—हरगिज़ नहीं।

दौलत इंसान को सहूलियतें दे सकती है, मगर अदब नहीं खरीद सकती।
दौलत घर बड़ा कर सकती है, मगर दिल बड़ा नहीं कर सकती।
दौलत सामान मुहैया करा सकती है, मगर इल्म, शऊर, तहज़ीब और सच्ची इंसानियत पैदा नहीं कर सकती।

इन तमाम खूबियों की बुनियाद तालीम है।

तालीम सिर्फ़ डिग्री का नाम नहीं

हमें तालीम का मतलब महज़ स्कूल, कॉलेज या डिग्री हासिल करना नहीं समझना चाहिए। असल तालीम वह है जो इंसान को अच्छा इंसान बनाना सिखाए, बड़ों का एहतराम, छोटों से मोहब्बत, पड़ोसी के हक़ की अदायगी, सच बोलने की आदत, मेहनत की क़द्र और समाज के लिए कुछ करने का जज़्बा पैदा करे।

तालीम इंसान के अंदर यह शऊर पैदा करती है कि वह अपने साथ-साथ अपने खानदान, बिरादरी, मुआशरे और मुल्क की तरक़्क़ी के बारे में भी सोचे।

बदलाव अपने घर से शुरू करना होगा

अगर हम सचमुच अपने मुआशरे में कोई बड़ा बदलाव देखना चाहते हैं तो शुरुआत किसी दूसरे से नहीं, अपने आप से करनी होगी।

हमें खुद से सवाल करना होगा—

मैंने तालीम के लिए अब तक क्या किया?
जो करना चाहिए था, वह क्यों नहीं किया?
आज और अभी से मैं क्या कर सकता हूँ?

और इसके बाद सिर्फ़ खुद तक सीमित न रहकर दूसरों को भी तालीम की तरफ़ लाने की कोशिश करनी होगी।

अपने आसपास नज़र डालिए।
हमारे पड़ोस में कितने बच्चे हैं?
हमारे रिश्तेदारों में कितने बच्चे पढ़ रहे हैं?
किस बच्चे की पढ़ाई आर्थिक परेशानी की वजह से रुक रही है?
किसे किताबों की ज़रूरत है?
किसे स्कूल की फीस की मदद चाहिए?
किसे सही मशवरे और रहनुमाई की ज़रूरत है?

अगर हम सिर्फ़ एक बच्चे की पढ़ाई की ज़िम्मेदारी उठाने का फैसला कर लें, तो यह भी एक बड़ी शुरुआत हो सकती है।

जिसके पास हैसियत है, वह किसी और का सहारा बने

हर शख़्स अपनी हैसियत के मुताबिक़ किसी बच्चे की मदद कर सकता है।

कोई फीस में मदद कर सकता है, कोई किताबें दिला सकता है, कोई यूनिफॉर्म और स्टेशनरी का इंतज़ाम कर सकता है, कोई स्कूल में दाख़िला दिलाने में मदद कर सकता है और कोई सिर्फ़ बच्चे की हौसला-अफ़ज़ाई करके उसे पढ़ाई जारी रखने के लिए प्रेरित कर सकता है।

और अगर किसी एक शख़्स के लिए यह सब करना मुश्किल हो, तो वह अपने दोस्तों, रिश्तेदारों और साहिबे-हैसियत लोगों से मिलकर एक बच्चे की मदद का इंतज़ाम कर सकता है।

फिर एक शख़्स दूसरे को तैयार करे, दूसरा तीसरे को और तीसरा चौथे को।

यही छोटी-छोटी कोशिशें आगे चलकर एक बड़ी तहरीक बन सकती हैं।

तालीम आम होगी तो हर शोबे में हमारी मौजूदगी होगी

जब हमारी नई नस्ल तालीम हासिल करेगी तो आने वाले वक़्त में मुख़्तलिफ़ शोबों में डॉक्टर, इंजीनियर, वकील, शिक्षक, प्रोफ़ेसर, अफ़सर, कारोबारी, वैज्ञानिक और दूसरे ज़िम्मेदार ओहदों पर काबिज़ लोग सामने आएँगे।

और यहीं से मुआशरे में वास्तविक बदलाव की शुरुआत होगी।

बड़े बदलाव हमेशा सिर्फ़ दौलत से नहीं आते। कई बार बदलाव के लिए इल्म, शऊर, क़ाबिलियत और ज़िम्मेदार ओहदों पर मौजूदगी ज़्यादा अहम होती है।

इसलिए हमारी कोशिश यह होनी चाहिए कि कोई बच्चा सिर्फ़ आर्थिक परेशानियों की वजह से तालीम से महरूम न रहे।

आइए, आज ही एक बच्चे की ज़िम्मेदारी लेते हैं

तालीम को आम करने के लिए किसी बड़े ऐलान का इंतज़ार मत कीजिए।

अपने घर से शुरुआत कीजिए।
अपने पड़ोस से शुरुआत कीजिए।
अपने रिश्तेदारों से शुरुआत कीजिए।
एक बच्चे से शुरुआत कीजिए।

अगर हर साहिबे-हैसियत शख़्स सिर्फ़ एक ज़रूरतमंद बच्चे की तालीम में मदद करने का अहद कर ले, तो देखते ही देखते यह कोशिश एक ऐसी ज़ंजीर बन सकती है जिसकी हर कड़ी किसी न किसी बच्चे के बेहतर मुस्तक़बिल से जुड़ी होगी।

अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त हमारे दिलों में इल्म और तालीम की मोहब्बत पैदा फरमाए, हमारी औलाद को नेक, क़ाबिल और बा-अख़लाक़ बनाए और हमें अपनी बिरादरी तथा पूरे मुआशरे की बेहतरी के लिए काम करने की तौफ़ीक़ अता फरमाए।

आमीन या रब्बुल आलमीन।

शुक्रिया।

आपका — गुलज़ार अहमद ‘गुलज़ार’


मुल्तानी समाज — विशेष प्रस्तुति

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार से पंजीकृत, मुल्क की राजधानी नई दिल्ली से प्रसारित, पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी की क़ौमी समाचार पत्रिका, न्यूज़ पोर्टल और YouTube चैनल “मुल्तानी समाज” के लिए उत्तर प्रदेश डेस्क से प्रधान संपादक ज़मीर आलम की ख़ास रिपोर्ट।

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इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊनमहज़ 15 बरस की उम्र में दुनिया-ए-फ़ानी से रुख़्सत हुई मासूम — बज्जन खानदान में पसरा ग़म, हर आँख हुई अश्कबार

बड़ौत, जनपद बागपत।
निहायत ही रंज-ओ-ग़म और दिल को सदमा पहुँचा देने वाली इत्तिला है कि आज शनिवार, 26 सितंबर 2026 को जनाब मौलाना अब्दुल जब्बार साहब के बड़े भाई मरहूम अब्दुल गफूर साहब (बज्जन खानदान) की पोती तथा मोहम्मद शुऐब साहब, पूर्व नायब सचिव, अंजुमन मुल्तानी बड़ौत, की 15 वर्षीय बेटी का अचानक तबीयत बिगड़ने और बीपी डाउन हो जाने के बाद क़ज़ा-ए-इलाही से इंतिक़ाल हो गया।

इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन।

मासूम उम्र में इस तरह अचानक दुनिया से रुख़्सत हो जाने की ख़बर ने खानदान, रिश्तेदारों, अहबाब और मुस्लिम मुल्तानी लोहार, बढ़ई बिरादरी में गहरे रंज-ओ-ग़म की लहर दौड़ा दी है। इस सदमे के मौक़े पर हर शख़्स की ज़बान पर मरहूमा के लिए मग़फिरत की दुआ और उनके अहले-ख़ाना के लिए सब्र की दुआ है।

आज रात 11 बजे होगी तदफ़ीन

मिली इत्तिला के मुताबिक़ मरहूमा को आज रात 11 बजे सुपुर्द-ए-ख़ाक किया जाएगा। तमाम बिरादराना हज़रात से गुज़ारिश है कि जनाज़े में शरीक होकर मरहूमा के लिए दुआ-ए-मग़फिरत करें और ग़मज़दा खानदान के साथ शरीक-ए-ग़म हों।

जनाज़ा व तदफ़ीन का मक़ाम:
कब्रिस्तान ग़ौरे ग़रीबा, हीरोज़ कॉलेज के पास, बड़का रोड, बड़ौत, जनपद बागपत।

मग़फिरत और तदफ़ीन के मौक़े की दुआ

अल्लाह तआला इस मासूम मरहूमा की मुकम्मल मग़फिरत फरमाए, उनके तमाम सग़ीरा-कबीरा गुनाहों को माफ़ फरमाए, उन्हें अपनी रहमत के साए में जगह अता फरमाए और जन्नतुल फ़िरदौस में आला मुक़ाम नसीब फरमाए।

या अल्लाह! जब इस मासूम को कब्र में उतारा जाए तो उसकी कब्र को नूर से भर दे। कब्र को उसके लिए जन्नत के बाग़ों में से एक बाग़ बना दे, उसे तन्हाई और वहशत से महफ़ूज़ फरमा और सवालात-ए-कब्र में आसानी अता फरमा।

या रब्बुल आलमीन! जब मिट्टी दी जाए तो हर मुट्ठी मिट्टी को उसके लिए रहमत और सुकून का ज़रिया बना दे। उसकी कब्र को कुशादा फरमा, उसमें अपनी रहमत और नूर नाज़िल फरमा और उसे रोज़-ए-महशर अपने नेक बंदों के साथ उठाना।

अल्लाह तआला वालिदैन, दादा-दादी, तमाम अहले-ख़ाना और रिश्तेदारों को इस अज़ीम सदमे पर सब्र-ए-जमील अता फरमाए और इस सदमे को उनके लिए अज्र-ए-अज़ीम का ज़रिया बनाए।

ऐ अल्लाह! मरहूमा को अपनी रहमत में जगह दे, उनके दर्जात बुलंद फरमा और अहले-ख़ाना को सब्र व इस्तिक़ामत अता फरमा।

आमीन या रब्बुल आलमीन। 🤲

राब्ता

मैय्यत के सिलसिले में मज़ीद मालूमात के लिए मौलाना अब्दुल जब्बार साहब से मोबाइल नंबर 9310186111 पर राब्ता क़ायम किया जा सकता है।


सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार से पंजीकृत, मुल्क की राजधानी नई दिल्ली से प्रसारित, पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी की मुल्क की इकलौती क़ौमी समाचार पत्रिका, न्यूज़ पोर्टल और यूट्यूब चैनल “मुल्तानी समाज” के लिए उत्तर प्रदेश डेस्क से प्रधान संपादक ज़मीर आलम की ख़ास रिपोर्ट।

अगर आप भी अपनी ख़बर, मज़मून (आर्टिकल), पैग़ाम, मुबारकबाद, ताज़ियती इश्तिहार, दिलचस्प वाक़ियात, तहरीर, अफ़साना (कहानी) या अपने कारोबार का इश्तिहार (विज्ञापन) क़ौमी सतह पर शाया (प्रकाशित) या प्रसारित करवाना चाहते हैं, तो बराए मेहरबानी नीचे दिए गए नंबरों पर राब्ता फ़रमाएँ।

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आपका एतमाद ही हमारी सबसे बड़ी ताक़त है।

“मुल्तानी समाज” — अपनी बिरादरी की आवाज़, अपनी पहचान।

इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन — जवान बेटे मोहम्मद फ़रीद के इंतक़ाल से परिवार पर टूटा ग़म का पहाड़, पिछले साल छोटे बेटे को खो चुके थे शमीम अहमद

35 वर्षीय मोहम्मद फ़रीद ने मेरठ के निजी अस्पताल में इलाज के दौरान ली आख़िरी साँस; एक साल के भीतर शमीम अहमद ने खो दिए अपने दो बेटे, बिरादरी में पसरा मातम

शामली, उत्तर प्रदेश।
निहायत ही रंज-ओ-ग़म और दिल को झकझोर देने वाली ख़बर के साथ तमाम मुस्लिम मुल्तानी लोहार-बढ़ई बिरादरी के बिरादराना हज़रात को इत्तिला दी जाती है कि मोहल्ला सरवरपीर, शामली, उत्तर प्रदेश निवासी मोहम्मद फ़रीद वल्द जनाब शमीम अहमद, उम्र लगभग 35 वर्ष, का आज शनिचर, 26 सितंबर 2026 को मेरठ के एक निजी अस्पताल में इलाज के दौरान शाम लगभग साढ़े 5 बजे क़ज़ा-ए-इलाही से इंतक़ाल हो गया।

मरहूम मोहम्मद फ़रीद की अचानक मौत की ख़बर से अहले-ख़ानदान, रिश्तेदारों, अज़ीज़ों, दोस्तों और पूरी मुल्तानी बिरादरी में गहरे रंज-ओ-मलाल की लहर दौड़ गई है। एक जवान बेटे की मौत का सदमा वैसे ही किसी भी वालिदैन और परिवार के लिए बेहद क़ल्ब-फ़िगार होता है, लेकिन जनाब शमीम अहमद के लिए यह सदमा और भी भारी है।

एक साल में शमीम अहमद ने खो दिए दो बेटे

बताया गया है कि जनाब शमीम अहमद के तीन बेटे थे, जिनमें से सबसे छोटे बेटे का पिछले वर्ष ही क़ज़ा-ए-इलाही से इंतक़ाल हो गया था। अभी उस सदमे से परिवार पूरी तरह उबर भी नहीं पाया था कि आज उनके बड़े बेटे मोहम्मद फ़रीद के इंतक़ाल ने परिवार को एक बार फिर गहरे सदमे और ग़म में डाल दिया।

एक ही परिवार में महज़ एक साल के दौरान दो जवान बेटों का दुनिया से चले जाना यक़ीनन बेहद दर्दनाक और आज़माइश की घड़ी है। इस मुश्किल वक़्त में अहले-ख़ानदान के साथ पूरी बिरादरी की हमदर्दी और दुआएँ हैं।

अभी मैय्यत घर लाई जा रही है, तदफ़ीन का वक़्त मुक़र्रर नहीं

ख़बर लिखे जाने तक मैय्यत मेरठ के अस्पताल से शामली स्थित घर लाई जा रही है। ज़िम्मेदारान की ओर से अभी नमाज़-ए-जनाज़ा और तदफ़ीन का वक़्त मुक़र्रर नहीं किया गया है।

जैसे ही नमाज़-ए-जनाज़ा और तदफ़ीन (सुपुर्द-ए-ख़ाक) का वक़्त मुक़र्रर होगा, उसकी इत्तिला ख़बर में अपडेट के ज़रिए दी जाएगी।

तमाम अहले-बिरादरी, अज़ीज़-ओ-अक़ारिब और दोस्तों से गुज़ारिश है कि तदफ़ीन के वक़्त की इत्तिला मिलते ही जनाज़े में शिरकत फ़रमाएँ और मरहूम के लिए ख़ुसूसी दुआ-ए-मग़फ़िरत करें।

मैय्यत को कब्र में उतारते वक़्त की दुआ

मैय्यत को कब्र में रखते वक़्त यह दुआ पढ़ी जाती है:

بِسْمِ اللّٰهِ وَعَلَىٰ مِلَّةِ رَسُولِ اللّٰهِ

“अल्लाह के नाम से और रसूलुल्लाह ﷺ के दीन व तरीक़े पर।”

मिट्टी देते वक़्त अल्लाह तआला की तरफ़ से इंसान की पैदाइश और वापसी को याद करते हुए यह आयत पढ़ी जा सकती है:

مِنْهَا خَلَقْنَاكُمْ وَفِيهَا نُعِيدُكُمْ وَمِنْهَا نُخْرِجُكُمْ تَارَةً أُخْرَىٰ

“हमने तुम्हें इसी मिट्टी से पैदा किया, इसी में तुम्हें वापस लौटाएँगे और इसी से दोबारा निकालेंगे।”
(सूरह ताहा, आयत 55)

दफ़्न के बाद मरहूम के लिए दुआ

मैय्यत को दफ़्न करने के बाद उसके लिए मग़फ़िरत और साबित-क़दमी की दुआ करनी चाहिए:

اللّٰهُمَّ اغْفِرْ لَهُ وَارْحَمْهُ وَثَبِّتْهُ عِنْدَ السُّؤَالِ

“ऐ अल्लाह! इसकी मग़फ़िरत फ़रमा, इस पर रहमत फ़रमा और सवाल के वक़्त इसे साबित-क़दम रख।”

अल्लाह तआला मोहम्मद फ़रीद मरहूम की मग़फ़िरत फ़रमाए, उनकी तमाम ख़ताओं से दरगुज़र फ़रमाए, उनकी कब्र को नूर से मुनव्वर फ़रमाए, उसे जन्नत के बाग़ों में से एक बाग़ बना दे, तमाम मराहिल आसान फ़रमाए, सवाल-ए-क़ब्र में कामयाबी अता फ़रमाए और जन्नतुल फ़िरदौस में आला मुक़ाम अता फ़रमाए।

अल्लाह रब्बुल-आलमीन उनके वालिद जनाब शमीम अहमद, तमाम अहले-ख़ानदान और पसमानदगान को सब्र-ए-जमील अता फ़रमाए। जिस परिवार ने एक साल के भीतर अपने दो बेटों को खोने का सदमा झेला है, अल्लाह तआला उनके दिलों को सब्र, सुकून और अपनी ख़ास रहमत से भर दे।

आमीन या रब्बुल आलमीन।

इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन।


सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार से पंजीकृत, मुल्क की राजधानी नई दिल्ली से प्रसारित, पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी की क़ौमी समाचार पत्रिका, न्यूज़ पोर्टल एवं यूट्यूब चैनल “मुल्तानी समाज” के लिए उत्तर प्रदेश डेस्क से प्रधान संपादक ज़मीर आलम की ख़ास रिपोर्ट।

अगर आप भी अपनी ख़बर, मज़मून (आर्टिकल), पैग़ाम, मुबारकबाद, ताज़ियती इश्तिहार, दिलचस्प वाक़ियात, तहरीर, अफ़साना (कहानी) या अपने कारोबार का इश्तिहार (विज्ञापन) क़ौमी सतह पर शाया या प्रसारित करवाना चाहते हैं, तो बराए मेहरबानी नीचे दिए गए नंबरों पर राब्ता फ़रमाएँ।

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“मुल्तानी समाज” — अपनी बिरादरी की आवाज़, अपनी पहचान।

हाजी याक़ूब ख़ान मुल्तानी का इंतक़ाल, बिरादरी में पसरा ग़म, इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन —

पानीपत, हरियाणा। निहायत ही रंज-ओ-ग़म के साथ तमाम अहले-मुस्लिम मुल्तानी लोहार-बढ़ई बिरादरी को यह इत्तिला दी जाती है कि आज दिन शनिचर, 26 सितंबर 2026 को हाजी याक़ूब ख़ान, मुल्तानी लोहार बिरादरी, मूल निवासी गाँव सुताना एवं हाल बाशिंदे गोहाना रोड, पानीपत, हरियाणा, का क़ज़ा-ए-इलाही से इंतक़ाल हो गया।

मरहूम के इंतक़ाल की ख़बर से अहले-ख़ानदान, रिश्तेदारों, दोस्तों, अज़ीज़ों और पूरी बिरादरी में गहरा रंज-ओ-मलाल और शदीद ग़म की लहर दौड़ गई। इस दुख की घड़ी में हर आँख अश्कबार और हर दिल मरहूम की मग़फ़िरत के लिए दुआगो है।

आज बाद नमाज़-ए-ईशा होगा जनाज़ा और सुपुर्द-ए-ख़ाक

मिली जानकारी के मुताबिक़ मरहूम हाजी याक़ूब ख़ान की नमाज़-ए-जनाज़ा आज बाद नमाज़-ए-ईशा, तक़रीबन रात 8 बजे, मेहराना, पानीपत स्थित कब्रिस्तान में अदा की जाएगी। नमाज़-ए-जनाज़ा के बाद मरहूम को उसी कब्रिस्तान में सुपुर्द-ए-ख़ाक किया जाएगा।

तमाम अहले-बिरादरी, अज़ीज़-ओ-अक़ारिब, दोस्त-अहबाब और जानने वालों से गुज़ारिश है कि जनाज़े में शिरकत फ़रमाएँ और मरहूम के लिए मग़फ़िरत एवं बुलंदी-ए-दरजात की दुआ करें।

कब्र में उतारते और मिट्टी देते वक़्त दुआ

जब मरहूम को कब्र में उतारा जाए तो अहले-ख़ैर उनकी मग़फ़िरत की दुआ करें और मिट्टी देते हुए दिल से दुआ करें:

“ऐ अल्लाह! हमारे इस मरहूम बंदे की मग़फ़िरत फ़रमा, उसकी ख़ता-बख़्शी फ़रमा, उसकी कब्र को नूर से भर दे, उसे कुशादा और आराम की जगह बना दे। उसकी तन्हाई को अपनी रहमत से दूर फ़रमा। उसके दर्जात बुलंद फ़रमा और उसे जन्नतुल फ़िरदौस में आला मक़ाम अता फ़रमा।”

मिट्टी देते वक़्त यह आयत पढ़ना भी मंसून है:

مِنْهَا خَلَقْنَاكُمْ وَفِيهَا نُعِيدُكُمْ وَمِنْهَا نُخْرِجُكُمْ تَارَةً أُخْرَىٰ

“इसी मिट्टी से हमने तुम्हें पैदा किया, इसी में तुम्हें लौटाएँगे और इसी से तुम्हें दोबारा निकालेंगे।”
(सूरह ताहा: 55)

नमाज़-ए-जनाज़ा के बाद मरहूम के लिए दुआ

तमाम मुसलमानों से गुज़ारिश है कि मरहूम के लिए ख़ुसूसन यह दुआ फ़रमाएँ:

اللّٰهُمَّ اغْفِرْ لَهُ وَارْحَمْهُ وَعَافِهِ وَاعْفُ عَنْهُ

“ऐ अल्लाह! इसकी मग़फ़िरत फ़रमा, इस पर रहमत फ़रमा, इसे आफ़ियत अता फ़रमा और इससे दरगुज़र फ़रमा।”

अल्लाह तआला मरहूम हाजी याक़ूब ख़ान की मुकम्मल मग़फ़िरत फ़रमाए, उनकी क़ब्र को नूर से मुनव्वर फ़रमाए, क़ब्र के तमाम मराहिल आसान फ़रमाए, उन्हें सवालात-ए-क़ब्र में कामयाबी अता फ़रमाए और जन्नतुल फ़िरदौस में आला से आला मुक़ाम अता फ़रमाए।

अल्लाह तआला तमाम पसमानदगान को सब्र-ए-जमील अता फ़रमाए और इस सदमे को बर्दाश्त करने की तौफ़ीक़ दे। आमीन या रब्बुल आलमीन।

इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन।

संपर्क: 9671955918


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Friday, September 25, 2026

अब्दुल वहाब साहब का इंतक़ाल, बिरादरी में पसरा ग़म, इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन —

जयपुर, राजस्थान। निहायत ही रंज-ओ-ग़म के साथ तमाम बिरादराना हज़रात को यह इत्तिला दी जाती है कि आज दिन शनिवार, 26 सितंबर 2026 को जयपुर, राजस्थान में मरहूम लाल मोहम्मद साहब, चांदपोल वालों के फ़रज़ंद जनाब अब्दुल वहाब साहब का क़ज़ा-ए-इलाही से इंतक़ाल हो गया।

इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन।

अब्दुल वहाब साहब के इंतक़ाल की ख़बर से अहले-ख़ानदान, रिश्तेदारों, अज़ीज़ों और बिरादराना हज़रात में गहरे रंज और सदमे की फ़िज़ा है। इस मुश्किल और ग़मगीन घड़ी में तमाम अहले-ख़ानदान के साथ दिली हमदर्दी और ताज़ियत का इज़हार किया जाता है।

जनाज़े और तदफ़ीन का ऐलान

मिली इत्तिला के मुताबिक मरहूम जनाब अब्दुल वहाब साहब का जनाज़ा चांदपोल से नारी का नाका कब्रिस्तान, जयपुर ले जाया जाएगा।

मैय्यत की तदफ़ीन का वक़्त सुबह 10:00 बजे मुक़र्रर किया गया है।

तमाम अहले-ख़ैर और बिरादराना हज़रात से गुज़ारिश है कि अपनी मसरूफ़ियात में से वक़्त निकालकर जनाज़े में शरीक हों और मरहूम के लिए दुआ-ए-मग़फ़िरत फ़रमाएँ।

कब्र में उतारते और मिट्टी देते वक़्त दुआ

अल्लाह तआला मरहूम अब्दुल वहाब साहब की मग़फ़िरत फ़रमाए, उनकी तमाम ख़ताओं और कोताहियों से दरगुज़र फ़रमाए, उनकी क़ब्र को नूर से मुनव्वर फ़रमाए और उसे जन्नत के बाग़ों में से एक बाग़ बना दे।

कब्र में उतारते वक़्त पढ़ा जाता है:

«بِسْمِ اللّٰهِ وَعَلَىٰ مِلَّةِ رَسُولِ اللّٰهِ ﷺ»

तर्जुमा: अल्लाह के नाम से और अल्लाह के रसूल ﷺ के दीन व तरीक़े पर।

मिट्टी देते वक़्त यह दुआ की जाए:

«مِنْهَا خَلَقْنَاكُمْ وَفِيهَا نُعِيدُكُمْ وَمِنْهَا نُخْرِجُكُمْ تَارَةً أُخْرَىٰ»

तर्जुमा: हमने तुम्हें इसी मिट्टी से पैदा किया, इसी में तुम्हें वापस लौटाएँगे और इसी से दोबारा तुम्हें निकालेंगे।

इसके बाद तमाम हाज़रीन मरहूम के लिए दिल से दुआ-ए-मग़फ़िरत करें:

ऐ अल्लाह! मरहूम अब्दुल वहाब साहब की मग़फ़िरत फ़रमा, उनकी क़ब्र को कुशादा और रोशन फ़रमा, उन्हें सवाल-ए-क़ब्र में कामयाबी अता फ़रमा, उनके दर्जात बुलंद फ़रमा, उनकी नेकियों को क़ुबूल फ़रमा और उन्हें जन्नतुल फ़िरदौस में आला मक़ाम अता फ़रमा।

या अल्लाह! उनके तमाम गुनाहों को माफ़ फ़रमा, रहमत की चादर में ढांप ले और उनके घरवालों को सब्र-ए-जमील अता फ़रमा। आमीन या रब्बुल आलमीन।

रसूल-ए-अकरम ﷺ ने मुसलमान भाई की ताज़ियत और उसके लिए दुआ करने की बड़ी फ़ज़ीलत बयान फ़रमाई है। इसलिए इस मौक़े पर तमाम बिरादराना हज़रात से ख़ास तौर पर गुज़ारिश है कि मरहूम को अपनी दुआओं में याद रखें और उनके लिए ईसाल-ए-सवाब करें।

अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त मरहूम की मग़फ़िरत फ़रमाए और तमाम अहले-ख़ानदान को सब्र-ए-जमील अता फ़रमाए। आमीन।

राब्ता: 9460000786


ख़ास रिपोर्ट

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उत्तर प्रदेश डेस्क से प्रधान संपादक ज़मीर आलम की ख़ास रिपोर्ट

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"मुल्तानी समाज"

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मास्टर जमील मरहूम की विरासत को आगे बढ़ाने निकले फैसल मिर्ज़ा, वार्ड-12 से निर्विरोध निर्वाचन की बनी राह

नगर पंचायत बेहट के वार्ड नंबर-12 से सिर्फ़ फैसल मिर्ज़ा ने दाखिल किया नामांकन • नामांकन प्रक्रिया पूरी होने के बाद निर्विरोध निर्वाचन की स्थिति • वालिद मरहूम मास्टर जमील साहब की सादगी और नेकदिली को किया गया याद

बेहट/सहारनपुर।
नगर पंचायत बेहट के वार्ड नंबर-12, मोहल्ला लोहारान में उस वक़्त एक ख़ास सियासी और सामाजिक तस्वीर सामने आई, जब मरहूम सभासद मास्टर जमील साहब के इंतक़ाल के बाद रिक्त हुई सभासद की सीट के लिए उनके साहेबज़ादे फैसल मिर्ज़ा ने नामांकन की आख़िरी तारीख़ को तहसील बेहट पहुंचकर अपना नामांकन पत्र दाखिल किया।

मास्टर जमील साहब वार्ड नंबर-12 के सभासद रहे थे। उनके इंतक़ाल के बाद यह सीट रिक्त हो गई थी, जिसके लिए राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा उपचुनाव का कार्यक्रम जारी किया गया। उपलब्ध चुनाव कार्यक्रम के मुताबिक यह सीट अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षित है और 13 अक्टूबर को मतदान तथा 15 अक्टूबर को मतगणना प्रस्तावित की गई थी।

फैसल मिर्ज़ा के अलावा किसी और ने नहीं भरा पर्चा

नामांकन की निर्धारित आख़िरी तारीख़ तक फैसल मिर्ज़ा के अलावा किसी अन्य प्रत्याशी द्वारा नामांकन दाखिल नहीं किए जाने से वार्ड नंबर-12 में चुनावी तस्वीर लगभग साफ़ हो गई है।

हालांकि नामांकन पत्रों की जांच, नाम वापसी तथा निर्वाचन संबंधी अन्य औपचारिक प्रक्रियाएं अभी पूरी होनी बाकी हैं। इसलिए आधिकारिक रूप से निर्विरोध निर्वाचित होने की घोषणा संबंधित निर्वाचन प्रक्रिया पूर्ण होने के बाद ही मानी जाएगी।

यदि कोई अन्य वैध प्रत्याशी मैदान में नहीं आता और निर्वाचन प्रक्रिया इसी प्रकार आगे बढ़ती है, तो वार्ड नंबर-12 में मतदान की आवश्यकता नहीं रह जाएगी।

वालिद की विरासत को आगे बढ़ाने का मौक़ा

फैसल मिर्ज़ा के नामांकन के साथ ही वार्ड में उनके वालिद-ए-मोहतरम मास्टर जमील साहब मरहूम की यादें भी ताज़ा हो गईं।

इलाक़ाई लोगों के बीच मास्टर जमील साहब की सादगी, मिलनसारी, नेकदिली, खुश-अख़लाक़ी और लोगों से मोहब्बत का ज़िक्र आज भी सम्मान के साथ किया जाता है। ऐसे में उनके साहेबज़ादे का उसी वार्ड से सभासद पद के लिए आगे आना उनके परिवार के लिए महज़ एक चुनावी प्रक्रिया नहीं, बल्कि अपने मरहूम वालिद की सामाजिक विरासत और लोगों से जुड़े रिश्तों को आगे बढ़ाने के एक मौक़े के तौर पर भी देखा जा रहा है।

नामांकन के दौरान मौजूद रहे सम्मानित लोग

फैसल मिर्ज़ा के नामांकन के दौरान नगर पंचायत अध्यक्ष अब्दुल रहमान उर्फ़ शालू भैया, सभासद प्रतिनिधि मिर्ज़ा अब्दुल मलिक, समाजसेवी अतीक मिर्ज़ा तथा अबरार मिर्ज़ा (सदर) समेत अनेक सम्मानित साथी एवं समर्थक मौजूद रहे।

नामांकन के दौरान समर्थकों में उत्साह दिखाई दिया और सभी ने फैसल मिर्ज़ा के लिए नेक ख़्वाहिशात का इज़हार किया।

मरहूम मास्टर जमील साहब की नेकनामी का असर

इलाक़े में यह चर्चा भी है कि फैसल मिर्ज़ा को मिल रही यह मोहब्बत और समर्थन उनके वालिद मरहूम मास्टर जमील साहब द्वारा लोगों के साथ बनाए गए अच्छे रिश्तों का भी नतीजा है।

किसी इंसान के जाने के बाद भी अगर उसकी सादगी, किरदार, नेकदिली और अच्छे अख़लाक़ लोगों के दिलों में ज़िंदा रहें, तो इससे बड़ी सामाजिक पूंजी और क्या हो सकती है। मास्टर जमील साहब ने अपने व्यवहार और सामाजिक संबंधों से जो जगह बनाई, आज उनके साहेबज़ादे फैसल मिर्ज़ा के लिए वही मोहब्बत और दुआएं दिखाई दे रही हैं।

‘मुल्तानी समाज’ की तरफ़ से दिली मुबारकबाद

मुल्तानी समाज की तरफ़ से फैसल मिर्ज़ा को नामांकन दाखिल करने पर दिली मुबारकबाद पेश की जाती है और उनके लिए कामयाबी, नेकनामी तथा अवाम की ख़िदमत की दुआ की जाती है।

साथ ही मरहूम मास्टर जमील साहब के लिए अल्लाह तआला से मग़फ़िरत और बुलंद दरजात की दुआ की जाती है।

दुआ है कि फैसल मिर्ज़ा अपने वालिद-ए-मोहतरम की अच्छी रवायत, सादगी, ख़ुलूस और ख़िदमत के जज़्बे को आगे बढ़ाते हुए वार्ड की अवाम की बेहतरी और ख़िदमत में अपना किरदार अदा करें।


उत्तर प्रदेश डेस्क की ख़ास रिपोर्ट

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Wednesday, September 23, 2026

बिना चंदा-ए-आम व ख़ास लिए, महज़ ₹250 की मेंबरशिप फ़ीस से बिरादरी को डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर मुत्तहिद करने की अनोखी पहल

मुल्क भर में मुस्लिम मुल्तानी लोहार और बढ़ई बिरादरी के अफ़राद को तलाश कर एक डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर जोड़ने का काम — मुल्तानी समाज चैरिटेबल ट्रस्ट के फ़ाउंडर ज़मीर आलम की क़यादत में एक नई मिसाल

नई दिल्ली/उत्तर प्रदेश डेस्क।
मुस्लिम मुल्तानी लोहार और बढ़ई बिरादरी की फ़लाह, तरक़्क़ी, इत्तेहाद और पहचान के लिए मुख़्तलिफ़ तंजीमें अपने-अपने अंदाज़ में काम करती रही हैं। मगर बिरादरी को किसी बड़े चंदा-ए-आम या चंदा-ए-ख़ास के सहारे के बग़ैर, महज़ मामूली मेंबरशिप फ़ीस के ज़रिए एक मुकम्मल डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर मुल्क के मुख़्तलिफ़ हिस्सों से तलाश कर जोड़ने की कोशिश अपने आप में एक नई और ग़ौरतलब पहल है।

"मुल्तानी समाज चैरिटेबल ट्रस्ट" के फ़ाउंडर ज़मीर आलम की क़यादत में शुरू की गई इस पहल का मक़सद सिर्फ़ एक तंजीम की तामीर करना नहीं, बल्कि मुल्क के मुख़्तलिफ़ शहरों, क़स्बों और इलाक़ों में रहने वाले मुस्लिम मुल्तानी लोहार और बढ़ई बिरादरी के अफ़राद को एक ऐसे डिजिटल निज़ाम से जोड़ना है, जहाँ उनकी पहचान, हुनर, कारोबार, सामाजिक सरोकार और बिरादराना ताल्लुक़ात को एक नई पहचान मिल सके।

इस पहल की सबसे अहम बात यह है कि इसमें चंदा-ए-आम या चंदा-ए-ख़ास को बुनियादी सहारा बनाने के बजाय महज़ ₹250 की मेंबरशिप फ़ीस को आधार बनाया गया है। यानी बिरादरी के अफ़राद अपनी हैसियत के मुताबिक़ मामूली मेंबरशिप फ़ीस अदा करके इस डिजिटल मिशन का हिस्सा बन सकते हैं।

पहली मर्तबा लोहार और बढ़ई बिरादरी को एक साथ लेकर चलने की कोशिश

मुल्तानी समाज चैरिटेबल ट्रस्ट की ओर से दिए गए हालिया पैग़ाम में एक और अहम पहलू की तरफ़ तवज्जो दिलाई गई है।

मुल्क में अब तक बनी मुख़्तलिफ़ बिरादराना तंजीमों का तआरुफ़ और उनकी सरगर्मियों का अपना-अपना दायरा रहा है। लेकिन मुल्तानी लोहार और मुल्तानी बढ़ई बिरादरी को एक साथ लेकर चलने और दोनों की सामाजिक व मआशी तरक़्क़ी को एक ही बिरादराना प्लेटफ़ॉर्म पर अहमियत देने की कोशिश को मुल्तानी समाज चैरिटेबल ट्रस्ट अपनी अहम ख़िदमत के तौर पर पेश कर रहा है।

यहाँ यह वाज़ेह करना भी ज़रूरी है कि मुल्तानी लोहार और मुल्तानी बढ़ई एक ही बिरादराना विरासत से जुड़े हुए हैं, मगर दोनों के पेशे, हुनर, कारोबार और रोज़गार के अंदाज़ में फ़र्क़ मौजूद है। लिहाज़ा दोनों बिरादरियों के मआशी और कारोबारी मसाइल, उनके हुनर और उनकी ज़रूरतों को अलग-अलग समझना भी उतना ही ज़रूरी है।

मुल्तानी समाज चैरिटेबल ट्रस्ट का कहना है कि अगर बिरादरी की तरक़्क़ी को मुकम्मल और जामे अंदाज़ में आगे बढ़ाना है तो लोहार के साथ बढ़ई और बढ़ई के साथ लोहार—दोनों को बराबर की अहमियत और नुमाइंदगी देना ज़रूरी है।

"हमने बढ़ई बिरादरी को कभी नज़रअंदाज़ नहीं किया"

ट्रस्ट की तरफ़ से यह भी कहा गया है कि इस मौज़ू पर आने वाले दिनों में मुख़्तलिफ़ तंजीमों और अफ़राद की तरफ़ से बहस हो सकती है। कोई इस पहल की मुख़ालिफ़त करे या अपने-अपने अंदाज़ में इसकी तफ़्सीर करे, मगर एक सवाल अपनी जगह रहेगा कि क्या मुल्तानी बढ़ई बिरादरी की तरक़्क़ी, पहचान और मआशी मज़बूती को उतनी ही अहमियत दी गई, जितनी दी जानी चाहिए थी?

मुल्तानी समाज चैरिटेबल ट्रस्ट का मौक़िफ़ है कि उसने इस सवाल को पहली बार खुलकर बिरादरी के सामने रखने की कोशिश की है और बढ़ई बिरादरी को बिरादराना निज़ाम का बराबर का हिस्सा मानते हुए उसे दरकिनार करने के बजाय साथ लेकर चलने की राह इख़्तियार की है।

ट्रस्ट का कहना है कि इसका मक़सद किसी तंजीम या शख़्स की तन्क़ीद करना नहीं, बल्कि बिरादरी के उन तमाम अफ़राद को एक साथ लाना है जो इल्म, हुनर, कारोबार, रोज़गार और समाजी तरक़्क़ी में अपना किरदार अदा कर रहे हैं।

"पैदायशी इंजीनियर" — बिरादरी के हुनर को नई पहचान देने की कोशिश

मुल्तानी समाज चैरिटेबल ट्रस्ट की तरफ़ से बिरादरी के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले एक ख़ास अल्क़ाब में "पैदायशी इंजीनियर" भी शामिल है।

ट्रस्ट का नज़रिया है कि सदियों से लोहे, लकड़ी, औज़ार, मशीनरी, दस्तकारी और तकनीकी हुनर से जुड़े रहने वाली इस बिरादरी के पारंपरिक फ़न और कारीगरी को सिर्फ़ एक पेशा समझने के बजाय उसके अंदर मौजूद तकनीकी सलाहियत और हुनर को भी पहचान मिलनी चाहिए।

इसी सोच के तहत बिरादरी के लिए "पैदायशी इंजीनियर" का अल्क़ाब इस्तेमाल किया गया, ताकि नई नस्ल को अपने बुज़ुर्गों के हुनर, मेहनत और दस्तकारी की विरासत पर फ़ख़्र महसूस हो और वह आधुनिक तालीम व तकनीक के साथ इस विरासत को आगे बढ़ा सके।

₹250 की मेंबरशिप — डिजिटल इत्तेहाद की तरफ़ एक क़दम

मुल्तानी समाज चैरिटेबल ट्रस्ट की यह डिजिटल पहल सिर्फ़ मेंबरशिप जमा करने तक महदूद नहीं बताई जा रही, बल्कि इसके ज़रिए बिरादरी के अफ़राद को एक-दूसरे से जोड़ने, उनकी पहचान को डिजिटल तौर पर दर्ज करने और मुल्क के मुख़्तलिफ़ हिस्सों में मौजूद बिरादराना नेटवर्क को मज़बूत करने की कोशिश की जा रही है।

एक तरफ़ जहाँ बड़ी-बड़ी तंजीमों के लिए चंदा जमा करना और बड़े इज्लास करना आम बात है, वहीं इस पहल में छोटी मेंबरशिप फ़ीस के ज़रिए ज़्यादा से ज़्यादा अफ़राद को सीधे डिजिटल नेटवर्क का हिस्सा बनाने का तसव्वुर सामने रखा गया है।

यही वजह है कि यह पहल बिरादरी के अंदर एक नई बहस और नई उम्मीद दोनों पैदा कर रही है।

"बिरादरी की ताक़त उसके अफ़राद हैं"

मुल्तानी समाज चैरिटेबल ट्रस्ट का पैग़ाम साफ़ है कि किसी भी बिरादरी की असल ताक़त सिर्फ़ उसकी तादाद में नहीं बल्कि उसके मुत्तहिद, बा-इल्म, हुनरमंद और एक-दूसरे से जुड़े हुए अफ़राद में होती है।

अगर मुल्क के मुख़्तलिफ़ राज्यों और शहरों में रहने वाला एक-एक मुल्तानी अपने दूसरे मुल्तानी से डिजिटल तौर पर जुड़ जाए, एक-दूसरे के कारोबार को जाने, एक-दूसरे के हुनर से वाक़िफ़ हो, नौजवानों को रोज़गार के मौक़े मिलें और बिरादरी के मसाइल को एक साझा प्लेटफ़ॉर्म पर उठाया जा सके, तो यह सिर्फ़ एक डिजिटल डायरेक्टरी नहीं बल्कि बिरादराना इत्तेहाद का एक नया निज़ाम साबित हो सकता है।

23 सितंबर 2026 की ख़बर के बाद सामने आईं कुछ अहम बातें

गुज़िश्ता रोज़ 23 सितंबर 2026 को "मुल्तानी समाज" राष्ट्रीय समाचार पत्रिका के ज़रिए एक ख़बर बिरादरी के सामने रखी गई थी। अब उसी सिलसिले में उस ख़बर से मुताल्लिक़ कुछ अहम और ख़ास पहलुओं को तफ़्सील से पेश किया जा रहा है, ताकि बिरादरी के अफ़राद इस पहल के मक़सद और इसके पीछे की सोच को बेहतर तौर पर समझ सकें।

मुल्तानी समाज चैरिटेबल ट्रस्ट की तरफ़ से कहा गया है कि आने वाले वक़्त में इस डिजिटल मिशन से जुड़ी और भी अहम मालूमात, नए प्रोग्राम, बिरादराना रिकॉर्ड, डिजिटल सहूलियतें और तरक़्क़ी के मंसूबे बिरादरी के सामने रखे जाएंगे।

यह सफ़र किसी एक शख़्स का सफ़र नहीं, बल्कि उन तमाम अफ़राद का साझा सफ़र है जो अपनी बिरादरी को इत्तेहाद, इल्म, हुनर, कारोबार और नई तकनीक के ज़रिए मज़बूत देखना चाहते हैं।

मुल्तानी समाज चैरिटेबल ट्रस्ट का पैग़ाम है कि बिरादरी को सिर्फ़ याद करने की नहीं, बल्कि उसे जोड़ने, समझने और आगे बढ़ाने की ज़रूरत है।

और शायद इसी सोच के साथ एक नया सवाल भी सामने आता है—

क्या वक़्त आ गया है कि मुल्क के हर शहर, हर क़स्बे और हर इलाक़े में रहने वाला मुल्तानी लोहार और बढ़ई अपने दूसरे बिरादर से डिजिटल तौर पर जुड़े और अपनी बिरादरी की एक नई, मुत्तहिद और मज़बूत पहचान का हिस्सा बने?

इस मुहिम का अगला सफ़र क्या होगा और आने वाले दिनों में "मुल्तानी समाज" बिरादरी के लिए कौन-कौन सी नई डिजिटल सहूलियतें लेकर सामने आएगा—इसकी तफ़्सीलात के लिए जुड़े रहिए।


सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार से पंजीकृत, मुल्क की राजधानी नई दिल्ली से शाया होने वाली पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी की क़ौमी समाचार पत्रिका, न्यूज़ पोर्टल और यूट्यूब चैनल "मुल्तानी समाज" के लिए उत्तर प्रदेश डेस्क से प्रधान संपादक ज़मीर आलम की ख़ास रिपोर्ट।

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"मुल्तानी समाज"

अपनी बिरादरी की आवाज़ — अपनी पहचान।

बिरादरी का इकलौता और अनोखा संगठन—जहाँ कोई चौधरी नहीं, सिर्फ़ ख़िदमतगार हैं

2011 में रखी गई एक ऐसी तहरीक की बुनियाद, जिसने पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार-बढ़ई बिरादरी को तंजीम, सहाफ़त और डिजिटल प्लेटफॉर्म से जोड़ने का सफ़र शुरू किया

नई दिल्ली/उत्तर प्रदेश।

किसी भी बिरादरी की तरक़्क़ी सिर्फ़ बड़े-बड़े दावों, जलसों और नारों से नहीं होती, बल्कि इसके लिए ख़ुलूस, सब्र, मेहनत, तंजीमी सोच और लगातार ख़िदमत का जज़्बा दरकार होता है। तारीख़ गवाह है कि जब किसी एक शख़्स के दिल में अपनी क़ौम और बिरादरी के लिए कुछ कर गुजरने का अज़्म पैदा होता है, तो वही छोटी-सी कोशिश आगे चलकर एक बड़ी तहरीक की शक्ल अख़्तियार कर सकती है।

पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार-बढ़ई बिरादरी में ऐसी ही एक तंजीमी कोशिश का आग़ाज़ साल 2011 में हुआ, जब गढ़ी पुख़्ता, ज़िला शामली, उत्तर प्रदेश से ताल्लुक़ रखने वाले और उस वक़्त दिल्ली में मुकीम ज़मीर आलम ने बिरादरी के लिए मुल्कगीर सतह पर काम करने वाली एक तंजीम की बुनियाद रखने का अज़्म किया।

ज़मीर आलम उस वक़्त भी मुख़्तलिफ़ समाजी तंजीमों और अख़बारात से जुड़े हुए थे। उन्होंने दिल्ली में रहने वाले बिरादरी के कई तजुर्बेकार और असरदार अफ़राद से मशवरा किया। मगर हर मशवरा हौसला बढ़ाने वाला नहीं था।

कुछ लोगों ने उन्हें यहाँ तक मशवरा दिया कि "आप भी ख़ामोशी से घर बैठ जाइए। इस बिरादरी के लिए आज तक कोई कुछ नहीं कर सका, बड़े-बड़े सेठ और असरदार लोग मिलकर भी कुछ नहीं कर पाए, फिर आप क्या कर लेंगे?"

लेकिन ज़मीर आलम ने मायूसी को अपने रास्ते की दीवार नहीं बनने दिया।

उन्होंने यह तय किया कि अगर कोई काम आज तक नहीं हुआ, तो इसका मतलब यह नहीं कि वह आगे भी नहीं हो सकता।

17 जून 2011—एक तंजीमी सफ़र का आग़ाज़

इसी अज़्म और ख़िदमत के जज़्बे के साथ 17 जून 2011 को "मुल्तानी समाज चैरिटेबल ट्रस्ट" के नाम से तंजीम की बुनियाद रखी गई।

बाद में यही तारीख़ बिरादरी के लिए "यौमे-तासीस" यानी स्थापना दिवस की हैसियत से अहम होती चली गई। हर साल 17 जून को बिरादरी के अफ़राद अपने-अपने गाँव, क़स्बों और शहरों में पौधारोपण करके इस दिन को मनाते हैं और मुल्क को हरा-भरा रखने का पैग़ाम देते हैं।

यह उस दौर की बात है जब आज की तरह सोशल मीडिया का बोलबाला नहीं था। किसी भी खबर या जानकारी को लोगों तक पहुँचाने के लिए अख़बार और पत्रिकाएँ ही सबसे बड़ा ज़रिया हुआ करती थीं।

सहाफ़त को बनाया बिरादरी की आवाज़

ज़मीर आलम का ताल्लुक़ सहाफ़त से पहले ही था। मुख़्तलिफ़ अख़बारात में काम करने के बाद उन्होंने अपने कई अख़बार भी रजिस्टर्ड कराए।

इसी सहाफ़ती तजुर्बे को बिरादरी की ख़िदमत के साथ जोड़ते हुए 12 नवंबर 2013 को "मुल्तानी समाज" के नाम से पत्रिका का रजिस्ट्रेशन कराया गया।

मक़सद साफ़ था—बिरादरी के मुख़्तलिफ़ हिस्सों में होने वाली सामाजिक, तालीमी, तंजीमी और ख़िदमाती सरगर्मियों की खबरें बिरादरी के हर फ़र्द तक पहुँचाना।

इसी सिलसिले ने आगे चलकर "मुल्तानी डे" की शक्ल अख़्तियार की, जिसे पत्रिका के राष्ट्रीय अधिवेशन के तौर पर बिरादरी में मनाए जाने की रवायत बनी।

एक शहर से पूरे मुल्क तक पहुँचने की कोशिश

तंजीम का दायरा धीरे-धीरे बढ़ता गया। गुजरात, राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, उत्तराखंड, दिल्ली और उत्तर प्रदेश के मुख़्तलिफ़ शहरों में बिरादरी के अफ़राद से राब्ता किया गया।

जहाँ-जहाँ बिरादरी के लोग मिले, वहाँ तंजीम के मक़सद और प्लेटफॉर्म के बारे में बताया गया और उन्हें एक साझा तंजीमी प्लेटफॉर्म से जोड़ने की कोशिश की गई।

वक़्त बदला, दौर बदला और फिर सोशल मीडिया का ज़माना आया।

इस बदलते हुए दौर को समझते हुए बिरादरी को भी डिजिटल दुनिया से जोड़ने की पहल की गई।

बिरादरी का अपना डिजिटल नेटवर्क

बिरादरी की खबरों और जानकारी को डिजिटल तौर पर एक जगह उपलब्ध कराने के लिए "मुल्तानी समाज डॉट कॉम" वेबसाइट तैयार की गई।

रिश्ते-नातों के सिलसिले को आसान बनाने के लिए "रिश्तों की दुनिया डॉट कॉम" के नाम से प्लेटफॉर्म तैयार किया गया, ताकि शादी के लिए मुनासिब रिश्तों की तलाश को आसान बनाया जा सके।

बिरादरी का डिजिटल सर्वे करने और बिरादरी के आंकड़े जमा करने के मक़सद से "मुल्तानी घराना डॉट कॉम" के नाम से भी प्लेटफॉर्म की पहल की गई।

यानी कोशिश सिर्फ़ एक तंजीम बनाने तक महदूद नहीं रही, बल्कि बिरादरी को तंजीम, सहाफ़त, डिजिटल प्लेटफॉर्म और आपसी राब्ते से जोड़ने की कोशिश की गई।

तालीम को फ़रोग़ देने की कोशिश

तंजीम की सरगर्मियों में तालीम को भी अहमियत दी गई।

दसवीं और बारहवीं जमाअत में बेहतर कारकर्दगी करने वाले बिरादरी के बच्चों को "मुल्तानी गौरव अवॉर्ड" से नवाज़ने की रवायत शुरू की गई, ताकि बच्चों में तालीमी मैदान में आगे बढ़ने का हौसला पैदा हो और उनके माता-पिता भी बच्चों की पढ़ाई को लेकर मुतमइन और पुरउम्मीद रहें।

कोरोना वबा के दौर में भी बिरादरी और समाज के लिए अपनी जिम्मेदारियाँ निभाने वाले सैकड़ों कोरोना योद्धाओं को सम्मानित किया गया।

"एकजुटता बढ़ाओ अभियान"—इत्तिहाद का पैग़ाम

बिरादरी में आपसी राब्ता और इत्तिहाद बढ़ाने के लिए हर साल 31 जनवरी से 28 फरवरी तक "एकजुटता बढ़ाओ अभियान" चलाने की पहल की गई।

मक़सद यही था कि बिरादरी के अफ़राद एक-दूसरे के करीब आएँ, आपसी राब्ता मजबूत हो और बिरादरी की सामूहिक तरक़्क़ी के लिए मिल-जुलकर काम किया जाए।

इसी के साथ बिरादरी की खबरों को तेज़ी से पहुँचाने के लिए न्यूज़ चैनल और न्यूज़ पोर्टल की शुरुआत की गई।

सबसे दिलचस्प बात—बिना चंदे के तंजीमी सफ़र

इस तंजीम के बारे में जो बात इसे मुख़्तलिफ़ बनाती है, वह यह दावा किया जाता है कि इसकी बहुत-सी सरगर्मियाँ चंदे के बजाय सालाना सदस्यता शुल्क के ज़रिये चलाने की कोशिश की गईं।

सदस्यता शुल्क 250 रुपये सालाना रखा गया।

यानी कोशिश यह रही कि बिरादरी के अफ़राद अपनी हैसियत के मुताबिक़ मामूली सदस्यता शुल्क के ज़रिये तंजीम का हिस्सा बनें और तंजीमी काम को एक व्यवस्थित आर्थिक आधार मिले।

हर तीन साल बाद नई क़यादत

इस तंजीम की एक और अहम तंजीमी ख़ूबी यह बताई जाती है कि राष्ट्रीय सदर समेत पूरी कार्यकारिणी को हर तीन साल बाद बदलने की व्यवस्था रखी गई।

इसका मक़सद यह है कि तंजीम किसी एक शख़्स या एक ही क़यादत के इर्द-गिर्द महदूद न रहे, बल्कि नई नस्ल और नए लोगों को भी आगे आने का मौक़ा मिले।

90 फ़ीसद काम ऑनलाइन—वक़्त और पैसा दोनों बचाने की कोशिश

डिजिटल दौर के मुताबिक़ तंजीम की ज़्यादातर सरगर्मियों को ऑनलाइन रखने की कोशिश की गई।

बताया जाता है कि तंजीम के लगभग 90 फ़ीसद काम ऑनलाइन किए जाने की नीति अपनाई गई, ताकि बिरादरी के लोगों का कीमती वक़्त और तंजीम का पैसा अनावश्यक बैठकों, सफ़र और दूसरी फिज़ूलखर्चियों में ज़ाया न हो।

तंजीम के फाउंडर ज़मीर आलम की सोच रही कि अगर डिजिटल दौर में कोई काम ऑनलाइन आसानी से हो सकता है तो सिर्फ़ रस्म निभाने के लिए लोगों को दूर-दराज़ से बुलाकर उनका वक़्त और पैसा क्यों खर्च कराया जाए।

"हम ओहदेदार नहीं, ख़िदमतगार हैं"

शायद इस पूरी तंजीमी सोच की सबसे अहम और अलग पहचान यही जुमला है—

"आप बिरादरी के ओहदेदार नहीं, बल्कि ख़िदमतगार हैं।"

तंजीम से जुड़े लोगों को हमेशा यह एहसास दिलाने की कोशिश की जाती है कि किसी ओहदे का मतलब हुक्म चलाना नहीं, बल्कि जिम्मेदारी उठाना है।

सदर होना ख़िदमत है, सेक्रेटरी होना ख़िदमत है, किसी कमेटी का हिस्सा होना ख़िदमत है और बिरादरी का आम फ़र्द होना भी अपनी जगह एक जिम्मेदारी है।

यही वजह है कि इस तंजीमी सोच में "चौधरी" बनने के बजाय "ख़िदमतगार" बनने पर ज़ोर दिया जाता है।

फाउंडर का अपना अलग उसूल

तंजीम के फाउंडर ज़मीर आलम के बारे में यह भी कहा जाता है कि उन्होंने बिरादरी के मुख़्तलिफ़ मंचों पर बुलाए जाने के बावजूद अपनी तंजीमी सोच के मुताबिक़ आम तौर पर डिजिटल प्लेटफॉर्म को प्राथमिकता दी।

उनका मानना रहा कि अगर आज के दौर में लोगों तक अपनी बात पहुँचाने के लिए डिजिटल ज़रिया मौजूद है, तो हर काम के लिए बड़े जलसे, लंबे सफ़र और भारी खर्च की ज़रूरत नहीं होनी चाहिए।

उनकी सोच का केंद्र यही रहा कि बिरादरी का पैसा बिरादरी के काम आए और बिरादरी का वक़्त बिरादरी की तरक़्क़ी में लगे।

एक तंजीम से बढ़कर—एक सोच

आज "मुल्तानी समाज" की कहानी को सिर्फ़ एक तंजीम या एक पत्रिका की कहानी के तौर पर देखना मुकम्मल तस्वीर पेश नहीं करता।

यह सफ़र दरअसल उस सोच की कहानी है जिसमें एक बिरादरी को तंजीम से जोड़ने, सहाफ़त के ज़रिये आवाज़ देने, तालीम को बढ़ावा देने, रिश्तों को आसान बनाने, डिजिटल प्लेटफॉर्म उपलब्ध कराने और आपसी इत्तिहाद को मज़बूत करने की कोशिश की गई।

2011 में जिस सफ़र का आग़ाज़ एक छोटे से तंजीमी ख़याल से हुआ था, वह आगे चलकर मुख़्तलिफ़ डिजिटल और सहाफ़ती प्लेटफॉर्म तक पहुँचा।

इस सफ़र की सबसे अहम बात शायद यही है कि—

ओहदा बड़ा नहीं, ख़िदमत बड़ी होनी चाहिए।

कुर्सी नहीं, जिम्मेदारी अहम होनी चाहिए।

चौधराहट नहीं, ख़िदमतगारी बिरादरी की पहचान होनी चाहिए।

और शायद इसी सोच को तंजीम का सबसे बड़ा पैग़ाम कहा जा सकता है—

"बिरादरी पर हुकूमत करने के लिए नहीं, बिरादरी की ख़िदमत करने के लिए तंजीम बनाई जाती है।"


"मुल्तानी समाज"—बिरादरी की आवाज़, बिरादरी की पहचान

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार से पंजीकृत, मुल्क की राजधानी नई दिल्ली से शाया होने वाली पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार-बढ़ई बिरादरी की क़ौमी समाचार पत्रिका "मुल्तानी समाज", इसके न्यूज़ पोर्टल और यूट्यूब चैनल के ज़रिये बिरादरी की सामाजिक, तालीमी, तंजीमी और दीगर सरगर्मियों को बिरादरी तक पहुँचाने की कोशिश की जाती है।

उत्तर प्रदेश डेस्क से
प्रधान संपादक — ज़मीर आलम
"मुल्तानी समाज" राष्ट्रीय समाचार पत्रिका

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"मुल्तानी समाज"

अपनी बिरादरी की आवाज़ — अपनी पहचान

Tuesday, September 22, 2026

बिरादरी में खुशी की लहर: मुल्तानी समाजसेवी संगठन में बड़ा फेरबदलशाहनवाज मिर्ज़ा बने जनरल सेक्रेटरी, साजिद मिर्ज़ा (दभेड़ी वाले) को मुख्य सलाहकार की ज़िम्मेदारी

नई दिल्ली/उत्तर प्रदेश।
पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी के बीच उस वक़्त खुशी की लहर दौड़ गई, जब “मुल्तानी समाजसेवी संगठन” में संगठनात्मक ज़िम्मेदारियों को लेकर अहम तब्दीली करते हुए शाहनवाज मिर्ज़ा साहब को जनरल सेक्रेटरी और साजिद मिर्ज़ा साहब (दभेड़ी वाले) को मुख्य सलाहकार के ओहदे पर नियुक्त किए जाने का ऐलान किया गया।

बताया गया है कि यह फैसला बिरादरी के कामकाज को और बेहतर तरीके से आगे बढ़ाने, संगठन की गतिविधियों में तेज़ी लाने तथा तमाम साथियों के बीच बेहतर तालमेल और मशवरे को मज़बूत करने की नीयत से लिया गया है।

संगठन से जुड़े ज़िम्मेदारान के मुताबिक़, संगठन के व्हाट्सऐप ग्रुप में एक हज़ार से ज़्यादा साथी जुड़े हुए हैं। इतनी बड़ी तादाद में बिरादरी के लोगों की मौजूदगी अपने आप में संगठन के लिए एक अहम ताक़त है। हालांकि, कुछ ज़िम्मेदार साथियों की किसी वजह से गैर-मौजूदगी के कारण बिरादरी से जुड़े कामों की रफ़्तार प्रभावित न हो और संगठनात्मक ज़िम्मेदारियाँ बेहतर ढंग से निभाई जाती रहें, इसी मक़सद से यह अहम फैसला लिया गया।

मशवरे और इत्तेहाद के साथ लिया गया फैसला

संगठन की ओर से यह भी स्पष्ट किया गया कि नई ज़िम्मेदारियों का फैसला किसी व्यक्ति विशेष को पीछे करने या किसी की हैसियत कम करने की नीयत से नहीं, बल्कि बिरादरी की खिदमत, संगठन की बेहतरी और सामूहिक काम को आगे बढ़ाने के मक़सद से लिया गया है।

बताया गया कि इस सिलसिले में साथियों के साथ मशवरा किया गया और आपसी राय एवं सहमति को सामने रखते हुए नई ज़िम्मेदारियों का ऐलान किया गया है। बिरादरी के बड़े-बुज़ुर्गों, समाजसेवियों और संगठन से जुड़े तमाम साथियों से उम्मीद की गई है कि वे नई ज़िम्मेदारियाँ संभालने वाले दोनों साथियों का सहयोग करेंगे और उन्हें अपनी नेक दुआओं से नवाज़ेंगे।

शाहनवाज मिर्ज़ा को जनरल सेक्रेटरी की अहम ज़िम्मेदारी

शाहनवाज मिर्ज़ा साहब को जनरल सेक्रेटरी की ज़िम्मेदारी सौंपे जाने के बाद उनसे उम्मीद की जा रही है कि वह संगठन के रोज़मर्रा के कामकाज, साथियों के बीच तालमेल, बिरादरी से जुड़े मसाइल और संगठनात्मक गतिविधियों को बेहतर अंदाज़ में आगे बढ़ाने में अपनी भूमिका अदा करेंगे।

जनरल सेक्रेटरी का ओहदा संगठन में अहम ज़िम्मेदारी का ओहदा माना जाता है। लिहाज़ा बिरादरी की उम्मीद है कि शाहनवाज मिर्ज़ा साहब तमाम साथियों को साथ लेकर, आपसी इत्तेहाद और भाईचारे की फ़िज़ा को क़ायम रखते हुए संगठन की ख़िदमत को आगे बढ़ाएंगे।

साजिद मिर्ज़ा को मुख्य सलाहकार की ज़िम्मेदारी

इसी के साथ साजिद मिर्ज़ा साहब (दभेड़ी वाले) को मुख्य सलाहकार की ज़िम्मेदारी सौंपी गई है। उनसे उम्मीद की गई है कि वह अपने तजुर्बे, मशवरे और रहनुमाई के ज़रिए संगठन को आगे बढ़ाने में अपनी अहम भूमिका निभाएंगे।

मुख्य सलाहकार की हैसियत से उनकी ज़िम्मेदारी संगठन से जुड़े अहम मामलों में मशवरा देना, बेहतर फैसलों के लिए अपनी राय पेश करना और बिरादरी के व्यापक हित में ज़िम्मेदारान की रहनुमाई करना होगी।

बिरादरी की तरक़्क़ी के लिए मिल-जुलकर काम करने की अपील

मुल्तानी बिरादरी से जुड़े लोगों का कहना है कि किसी भी सामाजिक संगठन की असल ताक़त उसके ओहदेदारों से ज़्यादा उसके इत्तेहाद, भाईचारे, आपसी एतमाद और सामूहिक सोच में होती है। इसलिए तमाम बिरादराना हज़रात से अपील की गई है कि वह छोटी-बड़ी बातों को आपसी बहस का सबब बनाने के बजाय बिरादरी की तरक़्क़ी और आने वाली नस्लों के बेहतर मुस्तक़बिल के लिए मिल-जुलकर काम करें।

संगठन की ओर से यह उम्मीद भी जताई गई कि नई ज़िम्मेदारियों के बाद संगठन की सरगर्मियों में और तेज़ी आएगी तथा बिरादरी के सामाजिक, तालीमी और फलाही मामलों को बेहतर तरीके से उठाया जा सकेगा।

अल्लाह तआला नई ज़िम्मेदारियाँ संभालने वाले तमाम साथियों को बिरादरी की ख़िदमत करने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए और उनके नेक इरादों में कामयाबी अता करे। आमीन।

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✍️ ख़ास रिपोर्ट

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार से पंजीकृत, मुल्क की राजधानी नई दिल्ली से प्रकाशित/प्रसारित, पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी की क़ौमी समाचार पत्रिका, न्यूज़ पोर्टल और यूट्यूब चैनल “मुल्तानी समाज” के लिए उत्तर प्रदेश डेस्क से प्रधान संपादक ज़मीर आलम की ख़ास रिपोर्ट।

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बिरादरी की ख़िदमत का जज़्बा रखने वालों के लिए खुला रास्ता—मुल्तानी समाज चैरिटेबल ट्रस्ट से जुड़कर अपने शहर में समाजी मिशन को आगे बढ़ाएँ

पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार-बढ़ई बिरादरी के लोगों से अपील—भीड़ नहीं, ख़िदमत के जज़्बे से सरशार चुनिंदा और साफ़-सुथरी छवि वाले लोगों की ज़रूरत

नई दिल्ली। पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार-बढ़ई बिरादरी के सामाजिक, शैक्षिक और सामुदायिक विकास के लिए काम कर रहे मुल्तानी समाज चैरिटेबल ट्रस्ट (रजि.) ऑल इंडिया से जुड़ने के इच्छुक बिरादराना हज़रात लगातार जानकारी हासिल करने के लिए संपर्क कर रहे हैं। बहुत से लोगों का सवाल है कि वे अपने शहर और कस्बे में रहते हुए ट्रस्ट के मिशन का हिस्सा किस तरह बन सकते हैं।

इसी सिलसिले में ट्रस्ट के फाउंडर ज़मीर आलम मुल्तानी की ओर से बिरादरी के लोगों को एक अहम इत्तिला दी गई है कि जो हज़रात अपने शहर या कस्बे में ट्रस्ट के साथ मिलकर समाजी ख़िदमत करना चाहते हैं, वे अपने क्षेत्र के 7, 9 या 11 ज़िम्मेदार लोगों की एक कमेटी गठित कर सकते हैं।

कमेटी में कौन लोग शामिल हों?

ट्रस्ट की ओर से यह कोशिश रहेगी कि कमेटी में ऐसे लोग शामिल हों जो आपस में बेहतर तालमेल रखते हों, बिरादरी की भलाई के लिए एक जैसी सोच और सकारात्मक विचार रखते हों तथा समाजी ख़िदमत के लिए वक़्त देने का जज़्बा रखते हों।

कमेटी में ऐसे लोगों को प्राथमिकता दी जाए जो:

  • समाजी और बिरादराना कामों में दिलचस्पी रखते हों।
  • अपने क्षेत्र में अच्छी और सम्मानजनक पहचान रखते हों।
  • आपसी भाईचारे और इत्तेहाद को अहमियत देते हों।
  • जिम्मेदारी को ईमानदारी और ख़ुलूस के साथ निभाने का जज़्बा रखते हों।
  • बिरादरी के बच्चों की तालीम, रोज़गार, सामाजिक जागरूकता और दूसरे सकारात्मक कार्यों में सहयोग करने के इच्छुक हों।
  • ट्रस्ट के नियमों और नीतियों के मुताबिक काम करने के लिए तैयार हों।

कमेटी बनने के बाद क्या करना होगा?

अपने शहर या कस्बे में कमेटी गठित करने के बाद कमेटी में शामिल सभी सदस्यों की पासपोर्ट साइज़ तस्वीर, आधार कार्ड की दोनों तरफ़ की स्पष्ट तस्वीर और मोबाइल नंबर ट्रस्ट को निर्धारित माध्यम से भेजे जा सकते हैं।

दस्तावेज़ प्राप्त होने और आवश्यक प्रक्रिया पूरी होने के बाद ट्रस्ट के हेड ऑफिस की ओर से संबंधित सदस्यों के लिए आईडी कार्ड, मेंबरशिप सर्टिफिकेट और अथॉरिटी लेटर आदि की प्रक्रिया पूरी की जाएगी।

इसके पश्चात ट्रस्ट की टीम आपसी सहमति से तय किए गए दिन और तारीख़ पर संबंधित शहर या कस्बे में पहुँचकर कमेटी के सदस्यों से मुलाक़ात करेगी और उन्हें ट्रस्ट की नीतियों, उद्देश्यों तथा समाजी मिशन की विस्तृत जानकारी दी जाएगी।

इस मौक़े पर कमेटी के सदस्यों का पगड़ी/साफ़ा पहनाकर और फूल-मालाओं से इस्तक़बाल भी किया जाएगा तथा उन्हें बिरादरी की ख़िदमत और समाजी कार्यों को आगे बढ़ाने के लिए ज़िम्मेदारियाँ सौंपी जाएँगी।

भीड़ नहीं, ख़िदमत का जज़्बा रखने वाले लोग चाहिए

ट्रस्ट के फाउंडर ज़मीर आलम मुल्तानी ने कहा कि हमारा मक़सद किसी भी शहर में महज़ भीड़ इकट्ठा करना नहीं है। हमारी कोशिश यह है कि हर शहर और कस्बे से ऐसे चुनिंदा, ज़िम्मेदार और समाजी ख़िदमत का जज़्बा रखने वाले लोग सामने आएँ जो अपनी ज़िम्मेदारी को पूरी ईमानदारी, ख़ुलूस और लगन के साथ निभा सकें।

उन्होंने कहा कि बिरादरी की तरक़्क़ी केवल किसी एक व्यक्ति या संस्था की कोशिश से मुमकिन नहीं, बल्कि इसके लिए समाज के ज़िम्मेदार लोगों को आगे आकर अपना किरदार अदा करना होगा। अगर हर शहर से कुछ ख़ुलूस रखने वाले लोग समाजी कामों को अपना मिशन समझकर आगे बढ़ें, तो बिरादरी के लिए सकारात्मक और दूरगामी काम किए जा सकते हैं।

हर शहर से उठे ख़िदमत की एक नई आवाज़

मुल्तानी समाज चैरिटेबल ट्रस्ट की कोशिश है कि बिरादरी के अलग-अलग शहरों और कस्बों में ऐसे लोगों का नेटवर्क तैयार हो जो स्थानीय स्तर पर समाजी और बिरादराना गतिविधियों को आगे बढ़ाने में अपना योगदान दे सकें।

इस मुहिम का मक़सद आपसी भाईचारा, इत्तेहाद, तालीम, समाजी जागरूकता और बिरादरी के बेहतर मुस्तक़बिल के लिए सकारात्मक माहौल तैयार करना है।

बिरादरी के तमाम हज़रात से गुज़ारिश है कि अगर आपके अंदर समाजी ख़िदमत का जज़्बा है और आप अपने शहर में बिरादरी के लिए कुछ बेहतर करना चाहते हैं, तो अपने भरोसेमंद साथियों के साथ मशवरा करके एक छोटी और ज़िम्मेदार कमेटी तैयार करें तथा ट्रस्ट से संपर्क करें।

याद रखिए—बिरादरी की ख़िदमत किसी ओहदे की मोहताज नहीं, बल्कि नीयत, ख़ुलूस और अमल की मोहताज है।


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सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार से पंजीकृत, मुल्क की राजधानी नई दिल्ली से प्रसारित पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी की क़ौमी समाचार पत्रिका, न्यूज़ पोर्टल एवं यूट्यूब चैनल "मुल्तानी समाज" के उत्तर प्रदेश डेस्क से प्रधान संपादक ज़मीर आलम की ख़ास रिपोर्ट।

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