Sunday, September 13, 2026

मुल्तानी-डे: 12 नवंबर या 15 अक्टूबर .? तारीख़ के नाम पर बिरादरी में फूट डालने की कोशिश पर ज़मीर आलम मुल्तानी का तीखा हमला

नई दिल्ली। मुस्लिम मुल्तानी लोहार-बढ़ई बिरादरी के बीच “मुल्तानी-डे” को लेकर विवाद अब खुलकर सामने आ गया है। मुल्तानी समाज चैरिटेबल ट्रस्ट (रजि.) ऑल इंडिया की ओर से दावा किया गया है कि बिरादरी के सामाजिक, पारिवारिक एवं प्रतिभाशाली लोगों को मंच देने के उद्देश्य से सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार के तहत वर्ष 2011 में “मुल्तानी समाज” नाम से पत्रिका का पंजीकरण कराया गया था और तभी से पत्रिका एवं तंजीम से जुड़े लोग हर वर्ष 12 नवंबर को अपना वार्षिक अधिवेशन “मुल्तानी-डे” के रूप में मनाते आ रहे हैं।

तंजीम का कहना है कि 12 नवंबर को मुल्तानी-डे के रूप में मनाने की वर्षों पुरानी परंपरा के प्रमाण पत्रिका, वेबसाइट, यूट्यूब चैनल एवं विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध हैं। इसके अलावा तंजीम द्वारा दिल्ली, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, मध्यप्रदेश एवं गुजरात सरकारों को भारतीय पंजीकृत डाक एवं ई-मेल के माध्यम से 12 नवंबर को “मुल्तानी-डे” के रूप में सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज किए जाने की मांग भी पूर्व में की जा चुकी है।

“अचानक नई तारीख़ क्यों?” — ज़मीर आलम मुल्तानी का सवाल

तंजीम के मुताबिक पिछले दो-तीन वर्षों से उत्तर प्रदेश की एक अन्य संस्था द्वारा 15 अक्टूबर को “मुल्तानी-डे” के नाम पर कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। इसे लेकर तंजीम के जिम्मेदार लोगों ने पिछले वर्ष अक्टूबर में ही संबंधित संस्था के एक पदाधिकारी को अपनी आपत्ति से अवगत कराया था।

इसके बावजूद इस वर्ष भी 15 अक्टूबर को मुल्तानी-डे मनाने की तैयारियां किए जाने का आरोप लगाया गया है। तंजीम का कहना है कि इससे बिरादरी के लोगों के बीच भ्रम की स्थिति पैदा हो रही है और समाज को अलग-अलग तारीखों के नाम पर बांटने की कोशिश की जा रही है।

मुल्तानी समाज चैरिटेबल ट्रस्ट (रजि.) ऑल इंडिया से जुड़े ज़मीर आलम मुल्तानी ने इस मामले पर कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि बिरादरी के नाम पर अलग-अलग तारीखें प्रचारित कर समाज को भ्रमित करने और दो हिस्सों में बांटने की कोशिश स्वीकार नहीं की जाएगी।

उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा—

“बिरादरी की पुरानी परंपरा, दस्तावेजी रिकॉर्ड और वर्षों से चले आ रहे कार्यक्रमों को नजरअंदाज कर अचानक नई तारीख को मुल्तानी-डे बताना किसी भी सूरत में उचित नहीं है। अगर किसी संस्था को अपना कार्यक्रम करना है तो वह अपने कार्यक्रम पर ध्यान दे, लेकिन बिरादरी के बीच भ्रम और फूट पैदा करने की कोशिश न करे।”

“बिरादरी झूठे और मनगढ़ंत बहकावे में नहीं आएगी”

ज़मीर आलम मुल्तानी ने कहा कि मुल्तानी समाज जागरूक है और सोशल मीडिया के दौर में किसी भी दावे की सच्चाई दस्तावेजों और पुराने रिकॉर्ड के आधार पर आसानी से सामने आ सकती है। उन्होंने संबंधित संस्था को अपनी “घटिया मानसिकता बदलने” और बिरादरी को बांटने के बजाय समाजहित में काम करने की सलाह दी।

उन्होंने कहा—

“मुल्तानी-डे किसी व्यक्ति या संस्था की निजी जागीर नहीं है, लेकिन इतिहास और परंपरा को बदलने का अधिकार भी किसी को नहीं दिया जा सकता। बिरादरी झूठे, मनगढ़ंत और बहकावे वाले प्रचार में आने वाली नहीं है।”

तंजीम ने स्पष्ट किया है कि 12 नवंबर को मुल्तानी-डे के रूप में मनाने से संबंधित उपलब्ध दस्तावेज, पत्राचार एवं पुराने कार्यक्रमों के प्रमाण आवश्यकता पड़ने पर बिरादरी के सामने सार्वजनिक किए जा सकते हैं।

अब सवाल यह है कि मुल्तानी-डे की तारीख़ को लेकर उठे इस विवाद का सच क्या है और 15 अक्टूबर तथा 12 नवंबर में से किस तारीख़ को बिरादरी की पुरानी परंपरा और उपलब्ध दस्तावेज समर्थन करते हैं? आने वाले दिनों में यह मुद्दा बिरादरी के बीच और अधिक चर्चा का विषय बन सकता है।


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 सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार से पंजीकृत, मुल्क की राजधानी नई दिल्ली से प्रकाशित एवं प्रसारित, पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी की क़ौमी समाचार पत्रिका, न्यूज़ पोर्टल एवं यूट्यूब चैनल “मुल्तानी समाज” की उत्तर प्रदेश डेस्क से प्रधान संपादक ज़मीर आलम मुल्तानी की ख़ास रिपोर्ट।

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