यह सिर्फ एक जुमला नहीं, बल्कि आज के दौर की सबसे बड़ी सच्चाई है। वक्त तेजी से बदल रहा है। दुनिया टेक्नोलॉजी, पढ़ाई और हुनर के दम पर आगे बढ़ रही है, लेकिन अगर कोई समाज अब भी पुरानी सोच, दिखावे और फिजूल रस्मों में उलझा रहे तो उसका पीछे रह जाना तय है।
पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार, बढ़ई बिरादरी के बीच आज सबसे ज्यादा जरूरत इस बात की है कि हम अपनी नई नस्ल को तालीम और हुनर की तरफ लेकर जाएं। क्योंकि अब सिर्फ मेहनत काफी नहीं, मेहनत के साथ इल्म भी जरूरी है।
पढ़ाई ही असली दौलत है
एक वक्त था जब लोग जमीन, दुकान और कारोबार को ही सबसे बड़ी पूंजी समझते थे। लेकिन आज का दौर अलग है। अब वही इंसान आगे बढ़ रहा है जिसके पास तालीम, हुनर और नई सोच है। पढ़ा-लिखा नौजवान नौकरी भी हासिल कर सकता है, कारोबार भी खड़ा कर सकता है और डिजिटल दुनिया में भी अपनी पहचान बना सकता है।
आज कंप्यूटर, अकाउंटिंग, मेडिकल, डिजाइनिंग, मोबाइल टेक्नोलॉजी, ऑनलाइन बिजनेस और सरकारी नौकरियों में हर तरफ मौके मौजूद हैं। जरूरत सिर्फ सही दिशा और मेहनत की है।
सबसे अहम बात यह है कि बेटियों की तालीम को भी उतनी ही अहमियत दी जाए जितनी बेटों की। क्योंकि एक पढ़ी-लिखी बेटी सिर्फ खुद नहीं बदलती, बल्कि पूरे घर और आने वाली नस्लों की सोच बदल देती है। जिस घर की मां तालीमयाफ्ता होती है, वहां बच्चों की परवरिश, तहज़ीब और तरक्की खुद-ब-खुद बेहतर हो जाती है।
हर घर को कोशिश करनी चाहिए कि कम से कम एक बच्चा कॉलेज तक जरूर पढ़े। अगर आर्थिक परेशानी हो तो स्कॉलरशिप, सरकारी योजनाओं और समाजी मदद का सहारा लिया जाए। तालीम पर खर्च कभी बर्बाद नहीं जाता।
शादी में दिखावा समाज को कमजोर कर रहा है
आज समाज के कई घर सिर्फ इसलिए परेशान हैं क्योंकि शादी को जरूरत से ज्यादा मुश्किल और महंगा बना दिया गया है। दो दिन की रस्मों के लिए लोग कई-कई साल तक कर्ज चुकाते रहते हैं।
महंगे बैंक्वेट हॉल, लंबी बारात, जरूरत से ज्यादा खाना, दिखावटी डेकोरेशन, दहेज और “लोग क्या कहेंगे” जैसी सोच ने समाज को आर्थिक रूप से कमजोर कर दिया है। कई गरीब परिवार सिर्फ इन बेकार रस्मों की वजह से बेटियों की शादी तक टाल देते हैं।
हकीकत यह है कि शादी की असली खूबसूरती सादगी, मोहब्बत और आसानी में है, ना कि फिजूल खर्च और दिखावे में।
बदलाव की शुरुआत अपने घर से करें
अगर समाज को बदलना है तो शुरुआत हर इंसान को अपने घर से करनी होगी। शादी को आसान बनाइए। मस्जिद में सादा निकाह और घर या छोटे हॉल में सादा वलीमा भी एक बेहतर और शरीफाना तरीका है। 100 से 150 मेहमान काफी होते हैं, बाकी पैसा बच्चों की पढ़ाई, कारोबार या भविष्य की जरूरतों के लिए बचाया जा सकता है।
सामूहिक निकाह जैसी मुहिम भी समाज के लिए बेहद फायदेमंद साबित हो सकती है। एक ही जगह कई जोड़ों की शादी होने से खर्च कम होता है और गरीब परिवारों पर बोझ भी नहीं पड़ता।
सबसे जरूरी बात यह है कि बेटी को बोझ समझने की सोच खत्म की जाए। बेटियों को इतना काबिल बनाया जाए कि वे जरूरत पड़ने पर खुद अपने पैरों पर खड़ी हो सकें और अपने परिवार का सहारा बन सकें।
इल्म हमेशा साथ रहता है
पैसा कभी कम तो कभी ज्यादा होता रहता है। रस्में और रिवाज भी वक्त के साथ बदल जाते हैं। लेकिन इल्म एक ऐसी दौलत है जो इंसान से कभी जुदा नहीं होती।
आज जरूरत इस बात की है कि अगली शादी में दिखावे के बजाय सादगी को अपनाया जाए, फिजूल खर्ची के बजाय बचत की जाए और उस बचत को बच्चों की तालीम और बेहतर भविष्य पर लगाया जाए। यही सोच मुल्तानी समाज को मजबूती देगी और आने वाली नस्लों को कामयाबी की नई राह दिखाएगी।
सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय भारत सरकार द्वारा पंजीकृत, देश की राजधानी दिल्ली से प्रसारित, पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार, बढ़ई बिरादरी की देश की इकलौती राष्ट्रीय समाचार पत्रिका/न्यूज पोर्टल/यूट्यूब चैनल “मुल्तानी समाज” के लिए राजस्थान से अब्दुल हकीम इमलीवाला की ख़ास रिपोर्ट।
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