मुल्तानी समाज में नई रिवायत ने पकड़ी रफ़्तार, बिरादरी के घरों में 12 नवंबर को जश्न की तैयारियाँ
नई दिल्ली/उत्तर प्रदेश।
पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार, बढ़ई बिरादरी में अपनी सामूहिक पहचान, भाईचारे और खुशियों को एक-दूसरे से जोड़ने की एक खूबसूरत रिवायत लगातार मज़बूत होती जा रही है। बिरादरी के अनेक परिवार अब अपने घरों में होने वाली खुशियों—सगाई, निकाह, अकीकाह और दीगर खुशी के मौकों—को 12 नवंबर यानी “मुल्तानी-डे” के मुबारक दिन के साथ जोड़ने लगे हैं।
बिरादरी के लिए यह दिन महज़ एक तारीख़ नहीं, बल्कि अपनी कौमी पहचान, इत्तेहाद, भाईचारे और आपसी मोहब्बत के इज़हार का एक खास मौक़ा बनता जा रहा है।
12 नवंबर से जुड़ी है ‘मुल्तानी-डे’ की खास पहचान
पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार, बढ़ई बिरादरी की देश की राजधानी नई दिल्ली से संचालित “मुल्तानी समाज चैरिटेबल ट्रस्ट” के मुताबिक, राष्ट्रीय स्तर पर बिरादरी की आवाज़ को एक मंच देने के उद्देश्य से राष्ट्रीय समाचार पत्रिका “मुल्तानी समाज” का पंजीकरण 12 नवंबर को हुआ था।
इसी सिलसिले में ट्रस्ट की ओर से यह ऐलान किया गया कि हर वर्ष पत्रिका के राष्ट्रीय अधिवेशन को “मुल्तानी-डे” के नाम से मनाया जाएगा। इसके बाद से बिरादरी के लोग अपने-अपने गाँव, कस्बों और शहरों में अपने घरों तथा सामाजिक स्तर पर इस दिन को खुशी और मिलन के अवसर के रूप में मनाते आ रहे हैं।
समय के साथ यह दिन बिरादरी के बीच एक सामूहिक पहचान और खुशी के प्रतीक के तौर पर अपनी जगह बनाता गया।
अब निकाह से लेकर अकीकाह तक, खुशियों को ‘मुल्तानी-डे’ से जोड़ने की पहल
इस रिवायत को अब एक नई दिशा मिलती दिखाई दे रही है। बिरादरी के कई परिवार अपने घर में आने वाली खुशियों को 12 नवंबर के मुबारक मौके से जोड़ने लगे हैं।
कहीं सगाई की तारीख़ 12 नवंबर रखी जा रही है तो कहीं निकाह और अकीकाह जैसे मुबारक मौकों को इसी दिन मनाने की तैयारियाँ की जा रही हैं। इस तरह व्यक्तिगत खुशी धीरे-धीरे सामूहिक खुशी में बदलती दिखाई दे रही है।
इस पहल की खूबसूरती यह है कि एक परिवार की खुशी को बिरादरी के दूसरे परिवार भी अपनी खुशी समझकर उसमें शरीक हो सकते हैं। यही जज़्बा किसी भी बिरादरी के सामाजिक रिश्तों को मज़बूत करने में अहम किरदार अदा करता है।
एक तारीख़, एक पहचान और हजारों खुशियाँ
12 नवंबर को लेकर बिरादरी में बढ़ता यह रुझान आने वाले समय में एक ऐसी सामाजिक रिवायत की शक्ल ले सकता है, जिसमें मुल्तानी परिवार अपने घर की खुशियों को एक साझा दिन के साथ जोड़कर पूरी बिरादरी को उस खुशी का हिस्सा बनाएं।
सगाई हो, निकाह हो, अकीकाह हो या किसी और खुशी का मौका—अगर इन खुशियों के साथ “मुल्तानी-डे” का नाम जुड़ता है तो यह दिन परिवार की खुशी के साथ-साथ बिरादरी की एकजुटता और आपसी मोहब्बत का भी प्रतीक बन सकता है।
बिरादरी की नई नस्ल के लिए भी बन सकता है पहचान का माध्यम
आज के दौर में जब नई पीढ़ी अपनी पारिवारिक और बिरादराना रवायतों से जुड़ने के लिए नए माध्यम तलाश रही है, ऐसे सामूहिक आयोजन उन्हें अपनी जड़ों, अपनी तारीख़ और अपनी सामाजिक पहचान से जोड़ने में अहम भूमिका निभा सकते हैं।
“मुल्तानी-डे” को खुशियों से जोड़ने की यह पहल अगर मोहब्बत, भाईचारे और आपसी इत्तेहाद के साथ आगे बढ़ती है, तो यह आने वाली नस्लों के लिए भी एक यादगार सामाजिक रिवायत बन सकती है।
बिरादरी के लोगों का कहना है कि खुशी चाहे छोटी हो या बड़ी, अगर उसमें अपने लोगों की शिरकत और दुआएँ शामिल हो जाएँ तो उसकी खुशी कई गुना बढ़ जाती है। शायद यही वजह है कि अब कई परिवार अपनी खुशियों के लिए 12 नवंबर को एक खास दिन के तौर पर देखने लगे हैं।
‘मुल्तानी समाज’ की ख़ास रिपोर्ट
सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार से पंजीकृत, देश की राजधानी नई दिल्ली से प्रसारित पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी की राष्ट्रीय समाचार पत्रिका, न्यूज़ पोर्टल एवं यूट्यूब चैनल “मुल्तानी समाज” के लिए उत्तर प्रदेश डेस्क से प्रधान संपादक ज़मीर आलम की ख़ास रिपोर्ट।
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