Monday, September 14, 2026

बिरादरी की हर तंजीम हमारी है—दायरा सिमटाए नहीं, बढ़ाएं

कमेटियों और बिरादराने हजरात से ख़ास अपील: किसी एक अंजुमन तक महदूद न रहें, पूरी बिरादरी की ख़िदमत को अपना मिशन बनाएं

नई दिल्ली।
पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार, बढ़ई बिरादराने हजरात से मैं इस ख़ास रिपोर्ट के ज़रिए एक अहम, संजीदा और बिरादराना गुज़ारिश करना चाहता हूं कि हमारी बिरादरी में काम करने वाली हर सामाजिक तंजीम, अंजुमन, कमेटी, संस्था, सोसायटी और ट्रस्ट हमारी अपनी बिरादरी का हिस्सा है। इनके मिशन और काम करने के तरीके अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन मंज़िल एक ही है—बिरादरी की तरक्की, इत्तेहाद, तालीम, समाजी बेदारी और आने वाली नस्लों का बेहतर मुस्तकबिल।

आज हमारी बिरादरी में मुख्तलिफ़ मक़ासिद को लेकर कई तंजीमें मैदान-ए-अमल में हैं। कोई तंजीम अपने शहर या कस्बे तक समाजी ख़िदमत का काम कर रही है, कोई कई शहरों में अपना नेटवर्क कायम कर चुकी है और कोई संस्था पूरे हिंदुस्तान में एक ही दिन बड़े पैमाने पर समाजी प्रोग्राम मुनअक़िद करने की सलाहियत रखती है।

यह मुख्तलिफ़ तंजीमें हमारी बिरादरी की कमजोरी नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक ताक़त बनने का ज़रिया हैं—बशर्ते हम इन्हें एक-दूसरे का मुकाबिल समझने के बजाय एक-दूसरे का मददगार समझें।

जितनी ज्यादा तंजीमें, उतना ज्यादा समाजी दायरा

हमारी बिरादरी लंबे अरसे तक गुरबत, कम तालीमी सहूलियतों और समाजी बेदारी की कमी का सामना करती रही है। यही वजह है कि बहुत से बिरादराने हजरात को अंजुमन, तंजीम, सोसायटी और समाजी संस्थाओं के असल मक़सद और उनके काम करने के तरीके की पूरी जानकारी नहीं मिल सकी।

एक सोच यह भी रही कि अगर आदमी समाजी कामों में लग गया तो फिर अपने घर का निज़ाम कौन संभालेगा?

यह सवाल अपनी जगह वाजिब है। हर इंसान की अपनी रोज़ी-रोटी, कारोबार और खानदान की जिम्मेदारियां हैं। मगर इसका मतलब यह कतई नहीं कि हम समाजी ख़िदमत से दूर हो जाएं।

समाजी ख़िदमत नौकरी नहीं, ज़िम्मेदारी और सदक़ा-ए-जारीया की एक शक्ल हो सकती है।

अगर कोई शख़्स अपनी रोज़मर्रा की जिम्मेदारियों को निभाते हुए बिरादरी की ख़िदमत के लिए वक्त निकाल सकता है, तो उसे अपनी इस खिदमत का दायरा बढ़ाना चाहिए।

एक तंजीम से जुड़े हैं तो दूसरी से जुड़ने में क्या हर्ज है?

यह बात खास तौर पर समझने की जरूरत है कि अगर कोई बिरादर किसी एक तंजीम का ओहदेदार या मेंबर है और उसकी अपनी बिरादरी की कोई दूसरी तंजीम भी उसे अपनी कमेटी में शामिल करना चाहती है, तो उसे महज़ इस वजह से पहली तंजीम छोड़ने की जरूरत नहीं कि अब वह दूसरी तंजीम से भी जुड़ रहा है।

आख़िर ये बिरादरी की सामाजिक तंजीमें हैं, कोई सियासी पार्टी नहीं।

अगर किसी रिश्तेदार या बिरादर की तरफ़ से यह पेशकश आती है कि “आप हमारी तंजीम से जुड़ जाइए, हम आपको फलां कस्बे या शहर की जिम्मेदारी दे देंगे”, तो इसका मतलब यह नहीं होना चाहिए कि पहले से जिस तंजीम में आप ख़िदमत कर रहे हैं, उसे छोड़ दें।

बल्कि जवाब होना चाहिए—

“अगर यह बिरादरी की ख़िदमत का मंच है तो मैं बिरादरी की दूसरी तंजीमों के साथ भी ख़िदमत करूंगा, मगर हर जगह पूरी ईमानदारी और वफ़ादारी के साथ अपनी जिम्मेदारी निभाऊंगा।”

यही सोच हमारे समाज को जोड़ सकती है।

बिरादरी की क्रीम किसी एक तंजीम की मिल्कियत नहीं

हमारी बिरादरी में ऐसे बहुत से काबिल, पढ़े-लिखे, समाजी तौर पर सक्रिय और अपने-अपने मैदान में कामयाब बिरादर मौजूद हैं, जिन्हें मुख्तलिफ़ तंजीमें अपनी कमेटियों में शामिल करना चाहती हैं।

ऐसे बिरादराने हजरात को हम बिरादरी का सरमाया और कोहिनूर हीरे कह सकते हैं।

अगर बिरादरी की एक तंजीम ने किसी काबिल शख़्स को तलाश करके अपनी कमेटी में शामिल किया है और दूसरी तंजीम भी उसी शख़्स को अपनी टीम का हिस्सा बनाना चाहती है, तो इसे किसी टकराव की वजह बनाने के बजाय बिरादरी के लिए एक अच्छी निशानी समझना चाहिए।

क्योंकि वह शख़्स किसी एक तंजीम की मिल्कियत नहीं है।

वह पूरी बिरादरी का बेटा है।

अगर उसकी सलाह, तजुर्बा, काबिलियत और वक्त दो तंजीमों के काम आ सकते हैं तो उसे दो तंजीमों से जुड़ने दीजिए। अगर वह अपनी जिम्मेदारी ईमानदारी से निभा सकता है तो उसे पांच तंजीमों से जुड़ने से भी क्यों रोका जाए?

अपना दायरा एक अंजुमन तक महदूद न करें

हमारी बिरादरी में अगर 15-20 तंजीमें मुख़्तलिफ़ मक़ासिद के साथ समाजी काम कर रही हैं तो बिरादराने हजरात को अपना दायरा किसी एक अंजुमन तक महदूद नहीं करना चाहिए।

बल्कि जहां-जहां उनकी काबिलियत की जरूरत हो, वहां-वहां अपनी सेवाएं पेश करनी चाहिए।

एक तंजीम में रहकर अपना दायरा छोटा करने के बजाय, हर मुनासिब तंजीम से जुड़कर अपनी ख़िदमत का दायरा बड़ा कीजिए।

आप किसी एक कमेटी की शान नहीं हैं।

आप पूरी बिरादरी की आन, बान और शान हैं।

इसलिए जिस भी तंजीम से जुड़ें, शुरुआत में ही साफ़ तौर पर कह दें कि—

“मैं बिरादरी की ख़िदमत के लिए आपके साथ हूं, लेकिन अगर मेरी बिरादरी की कोई दूसरी तंजीम भी मुझे अपनी कमेटी में शामिल करना चाहेगी तो मैं वहां भी अपनी हैसियत और वक्त के मुताबिक़ बिरादरी की ख़िदमत करूंगा।”

इस साफ़गोई से न गलतफ़हमी पैदा होगी और न बाद में किसी को शिकायत का मौका मिलेगा।

तंजीमें समाजी ख़िदमत का मरकज़ बनें, सियासी खींचतान का नहीं

तमाम अंजुमन, तंजीम, कमेटी और संस्था संचालकों से भी अदब के साथ गुज़ारिश है कि अपनी-अपनी संस्थाओं को बिरादरी की ख़िदमत का मरकज़ बनाए रखें।

हमने ये सामाजिक संस्थाएं बिरादरी को जोड़ने के लिए बनाई हैं, एक-दूसरे को बांटने के लिए नहीं।

किसी ओहदेदार या मेंबर का दूसरी बिरादराना तंजीम से जुड़ना बेवफ़ाई नहीं है। अगर वह दोनों जगह ईमानदारी से अपनी जिम्मेदारी निभा रहा है तो यह उसकी समाजी सरगर्मी का दायरा बढ़ना है।

हमें यह भी समझना होगा कि बिरादरी की तंजीमें सियासी पार्टियां नहीं हैं।

यहां मक़सद ओहदा हासिल करना नहीं, बल्कि उस ओहदे को बिरादरी की ख़िदमत का ज़रिया बनाना होना चाहिए।

अगर एक बिरादर दूसरी तंजीम में भी शामिल हो गया तो इसका मतलब यह नहीं कि वह पहली तंजीम का दुश्मन हो गया।

हमारी बिरादरी एक है, इसलिए उसके समाजी मंच भी एक-दूसरे के दुश्मन नहीं, एक-दूसरे के साथी होने चाहिए।

दिल साफ़ रखें, नीयत पाक रखें और हाथ मिलाकर आगे बढ़ें

आज जरूरत इस बात की है कि हम अपने दिलों से छोटी-छोटी गलतफ़हमियां निकालें।

किसी को किसी दूसरी तंजीम में जाते देखकर यह न सोचें कि वह हमारा आदमी नहीं रहा।

बल्कि यह सोचें कि—

“हमारी बिरादरी का एक और बेटा समाजी ख़िदमत के एक और मंच तक पहुंच गया है।”

यही सोच हमारी ताक़त बनेगी।

तमाम तंजीमों के जिम्मेदारान से भी मेरी खास गुज़ारिश है कि दूसरी तंजीमों से जुड़े काबिल और मेहनती बिरादराने हजरात को भी अपनी कमेटियों में शामिल करने में दिल बड़ा रखें।

ओहदा बांटने से तंजीम छोटी नहीं होती, दिल छोटा करने से बिरादरी जरूर छोटी हो जाती है।

आइए, आज से हम यह अहद करें कि बिरादरी की हर तंजीम को अपनी समझेंगे, हर नेक कोशिश की इज़्ज़त करेंगे, एक-दूसरे की कामयाबी पर खुश होंगे और जहां मुमकिन हो, वहां एक-दूसरे का हाथ थामेंगे।

हमारी मंज़िल किसी एक तंजीम को सबसे बड़ा बनाना नहीं, बल्कि पूरी मुल्तानी बिरादरी को मजबूत बनाना होनी चाहिए।

आइए, बिरादरी के लिए एक नई रवायत कायम करें

हम किसी एक अंजुमन के नहीं, पूरी बिरादरी के हैं।

हमारी तंजीमें अलग हो सकती हैं, हमारे काम करने के तरीके अलग हो सकते हैं, हमारे प्रोग्राम अलग हो सकते हैं, लेकिन हमारा समाज एक है, हमारी बिरादरी एक है और हमारी तरक्की का ख्वाब भी एक होना चाहिए।

इसलिए—

तंजीमों की तादाद से मत घबराइए, उनके बीच मोहब्बत और इत्तेहाद पैदा कीजिए।

ओहदों के लिए मुकाबला मत कीजिए, ख़िदमत के लिए आगे आइए।

दूसरी तंजीम से जुड़ने वाले को अपना मुख़ालिफ़ मत समझिए, उसे बिरादरी का ख़ादिम समझिए।

और सबसे बढ़कर—

बिरादरी की ख़िदमत को किसी एक कमेटी की सरहद में कैद मत कीजिए।

आइए, अपनी-अपनी जगह से एक कदम आगे बढ़ाएं, एक-दूसरे के हाथों में हाथ दें और अपनी मेहनत, अपनी काबिलियत और अपनी इत्तेहाद की ताक़त से मुस्लिम मुल्तानी लोहार, बढ़ई बिरादरी के नाम को मुल्क की बुलंदियों तक पहुंचाएं।

यही वक्त की आवाज़ है।
यही बिरादराना तकाज़ा है।
और यही हमारी आने वाली नस्लों के लिए सबसे बड़ा तोहफ़ा होगा।


सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार से पंजीकृत, मुल्क की राजधानी नई दिल्ली से प्रसारित, पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी की मुल्क की इकलौती क़ौमी समाचार पत्रिका, न्यूज़ पोर्टल और यूट्यूब चैनल “मुल्तानी समाज” के लिए उत्तर प्रदेश डेस्क से प्रधान संपादक ज़मीर आलम की ख़ास रिपोर्ट।

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