Sunday, September 13, 2026

‘मुल्तानी-डे’ पर बढ़ा विवाद: तारीख़, पहचान और विरासत को लेकर आमने-सामने बिरादरी के दो दावे

12 नवंबर को मनाए जाने वाले ‘मुल्तानी-डे’ को अक्टूबर में आयोजित करने पर उठे सवाल — ज़मीर आलम का सख़्त एतराज़, बोले: बिरादरी की पहचान और कार्यक्रमों की तारीख़ों को लेकर अब भ्रम बर्दाश्त नहीं

नई दिल्ली।
मुस्लिम मुल्तानी लोहार एवं बढ़ई बिरादरी में इन दिनों ‘मुल्तानी-डे’ की तारीख़ और उसके आयोजन को लेकर एक नया विवाद सामने आया है। एक तरफ़ ‘मुल्तानी समाज’ राष्ट्रीय समाचार पत्रिका के प्रधान संपादक ज़मीर आलम का दावा है कि पत्रिका के सालाना राष्ट्रीय अधिवेशन को वर्षों से 12 नवंबर को ‘मुल्तानी-डे’ के नाम से आयोजित किया जाता रहा है, वहीं दूसरी ओर उत्तर प्रदेश के मुज़फ्फरनगर जनपद से संचालित एक तंजीम द्वारा पिछले दो वर्षों से अक्टूबर में आयोजित कार्यक्रम को ‘मुल्तानी-डे’ के नाम से प्रचारित किए जाने पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं।

मामला महज़ एक कार्यक्रम की तारीख़ का नहीं, बल्कि बिरादरी की पहचान, किसी आयोजन के नाम की परंपरा और उसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि से जुड़ा हुआ बताया जा रहा है।

‘मुल्तानी-डे’ किसकी पहचान?

ज़मीर आलम के अनुसार, ‘मुल्तानी समाज चैरिटेबल ट्रस्ट (रजि.)’ द्वारा प्रकाशित ‘मुल्तानी समाज’ राष्ट्रीय समाचार पत्रिका के सालाना राष्ट्रीय अधिवेशन को 12 नवंबर के दिन ‘मुल्तानी-डे’ के रूप में मनाने की परंपरा वर्षों से चली आ रही है।

उनका कहना है कि इस आयोजन की तारीख़, कार्यक्रमों और इससे संबंधित सामग्री के दस्तावेज़ पत्रिका एवं संबंधित संस्था के पास मौजूद हैं। ऐसे में यदि कोई अन्य संगठन उसी नाम को किसी दूसरी तारीख़ या महीने में अपने कार्यक्रम के लिए इस्तेमाल करता है, तो स्वाभाविक रूप से बिरादरी के बीच यह सवाल उठता है कि एक ही नाम से अलग-अलग तारीख़ों पर आयोजन करने का औचित्य क्या है?

अब्दुल कलाम के नाम से कार्यक्रम से ‘मुल्तानी-डे’ तक — सवाल क्यों उठे?

विवाद का एक अहम पहलू यह भी बताया जा रहा है कि संबंधित तंजीम द्वारा पूर्व में महान वैज्ञानिक एवं भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम के नाम से कार्यक्रम आयोजित किए जाते रहे हैं। आरोप है कि पिछले दो वर्षों से 12 नवंबर से लगभग एक माह पहले अक्टूबर में उसी आयोजन को ‘मुल्तानी-डे’ के नाम से प्रस्तुत किया जाने लगा।

यही बदलाव अब बिरादरी के एक वर्ग के बीच चर्चा और नाराज़गी का विषय बना हुआ है।

ज़मीर आलम का सवाल है कि यदि 12 नवंबर को ‘मुल्तानी समाज’ के राष्ट्रीय अधिवेशन की एक स्थापित परंपरा के तौर पर ‘मुल्तानी-डे’ मनाया जाता रहा है, तो उससे ठीक पहले किसी दूसरी तारीख़ पर उसी नाम का आयोजन करने की आवश्यकता क्यों महसूस हुई?

बिरादरी को जोड़ना है या तारीख़ों के नाम पर बांटना?

ज़मीर आलम ने अपने बयान में कहा कि बिरादरी पहले ही अनेक सामाजिक, तंजीमी और वैचारिक मतभेदों से जूझ रही है। ऐसे समय में किसी कार्यक्रम के नाम और तारीख़ को लेकर ऐसा विवाद पैदा होना, जो समाज के लोगों को दो अलग-अलग खेमों में खड़ा कर दे, किसी भी सूरत में बिरादरी के मुफ़ाद में नहीं है।

उन्होंने कहा कि ‘मुल्तानी-डे’ किसी व्यक्ति की निजी मिल्कियत नहीं, बल्कि बिरादरी की सामूहिक पहचान से जुड़ा नाम है, इसलिए इसके इतिहास और शुरुआत के बारे में बिरादरी के सामने उपलब्ध दस्तावेज़ों और पुराने रिकॉर्ड के आधार पर बात होनी चाहिए।

तंजीम के कार्यक्षेत्र को लेकर भी उठाए गए सवाल

ज़मीर आलम ने संबंधित संगठन के दावों और उसके कार्यक्षेत्र को लेकर भी गंभीर सवाल उठाए हैं। उनका आरोप है कि उत्तर प्रदेश में पंजीकृत संगठन के कार्यक्षेत्र और उसकी वास्तविक गतिविधियों के संबंध में बिरादरी के सामने स्थिति पूरी तरह स्पष्ट नहीं की गई है।

उन्होंने यह भी दावा किया कि संगठन से जुड़े अनेक लोग उत्तर प्रदेश से बाहर के राज्यों से हैं और संगठन के राष्ट्रीय स्तर पर संचालन संबंधी दावों की वास्तविक स्थिति पर स्पष्टता आवश्यक है।

हालांकि इन दावों की कानूनी और प्रशासनिक स्थिति संबंधित पंजीकरण दस्तावेज़ों तथा सक्षम प्राधिकारियों के रिकॉर्ड से ही अंतिम रूप से निर्धारित हो सकती है। इसलिए बिरादरी के सामने भी दस्तावेज़ों के साथ तथ्य रखने की मांग उठ रही है।

दिल्ली में आयोजनों को लेकर भी मांगा गया जवाब

ज़मीर आलम ने संबंधित तंजीम द्वारा दिल्ली में आयोजित किए गए कुछ कार्यक्रमों की बुकिंग एवं आयोजन प्रक्रिया को लेकर भी सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि यदि किसी संस्था का पंजीकरण और घोषित कार्यक्षेत्र किसी विशेष राज्य तक सीमित है, तो दूसरे राज्य में कार्यक्रम आयोजित करने की उसकी कानूनी स्थिति स्पष्ट होनी चाहिए।

उन्होंने संबंधित पक्ष से आग्रह किया कि इन तमाम सवालों का जवाब भावनाओं या आरोप-प्रत्यारोप से नहीं, बल्कि पंजीकरण प्रमाणपत्र, संस्था के नियमावली दस्तावेज़, कार्यक्रमों के रिकॉर्ड और अन्य प्रमाणिक काग़ज़ात के साथ दिया जाए।

‘हमारे पास रिकॉर्ड हैं, जरूरत पड़ी तो सामने रखेंगे’

ज़मीर आलम का कहना है कि ‘मुल्तानी समाज’ के पास ‘मुल्तानी-डे’ के संबंध में पुराने कार्यक्रमों, अधिवेशनों और प्रकाशनों से संबंधित पर्याप्त सामग्री मौजूद है।

उन्होंने कहा कि यदि विवाद केवल गलतफहमी का है तो संबंधित पक्ष को बैठकर बातचीत के ज़रिए उसे दूर करना चाहिए। लेकिन यदि किसी स्थापित आयोजन के नाम और पहचान को जानबूझकर दूसरी तारीख़ पर इस्तेमाल करके बिरादरी में भ्रम पैदा किया जा रहा है, तो इसका विरोध करना उनका संपादकीय और सामाजिक दायित्व है।

सख़्त संदेश: ‘नकल की तारीख़ नहीं, अपनी पहचान बनाइए’

ज़मीर आलम ने अपने सख़्त बयान में कहा कि बिरादरी अब पहले की तरह हर बात आंख बंद करके स्वीकार करने वाली नहीं है। सोशल मीडिया, डिजिटल मीडिया और दस्तावेज़ी रिकॉर्ड के दौर में लोग यह देखने और समझने लगे हैं कि किस कार्यक्रम की शुरुआत कब हुई, उसका नाम किस संदर्भ में रखा गया और उसकी परंपरा कितने समय से चली आ रही है।

उन्होंने संबंधित तंजीम के जिम्मेदार लोगों से कहा कि यदि उनके पास अपने कार्यक्रम और ‘मुल्तानी-डे’ नाम के इस्तेमाल के समर्थन में कोई अलग ऐतिहासिक या दस्तावेज़ी आधार है, तो उसे भी बिरादरी के सामने रखा जाए।

उनका कहना है—

“दूसरों के कार्यक्रमों के नाम और तारीख़ों को अपनाने के बजाय अपनी मेहनत, अपनी सोच और अपनी पहचान से नए कार्यक्रम खड़े कीजिए। बिरादरी को जोड़ना है तो नई मिसाल कायम कीजिए, पहले से चली आ रही पहचान को लेकर टकराव पैदा मत कीजिए।”

कानूनी रास्ता भी खुला रखने की चेतावनी

ज़मीर आलम ने स्पष्ट किया कि यदि भविष्य में ‘मुल्तानी-डे’ के नाम, कार्यक्रम की पहचान अथवा पत्रिका और संस्था से संबंधित किसी स्थापित आयोजन को लेकर कथित रूप से भ्रम फैलाने या भ्रामक प्रचार की स्थिति बनी रहती है, तो उपलब्ध दस्तावेज़ों और लागू क़ानून के तहत उचित कानूनी सलाह लेकर कार्रवाई का विकल्प खुला रखा जाएगा।

उन्होंने कहा कि किसी भी पक्ष को समाज की भावनाओं से खिलवाड़ करने के बजाय संवाद, दस्तावेज़ और प्रमाण की बुनियाद पर अपना पक्ष रखना चाहिए।

अब फैसला नारों से नहीं, रिकॉर्ड से होगा

‘मुल्तानी-डे’ को लेकर पैदा हुआ यह विवाद अब केवल 12 नवंबर बनाम अक्टूबर का सवाल नहीं रह गया है। असल सवाल यह है कि किसी सामाजिक आयोजन की पहचान और उसकी परंपरा का निर्धारण किस आधार पर होगा—दस्तावेज़ों से, पुराने रिकॉर्ड से या केवल प्रचार से?

बिरादरी के जिम्मेदार लोगों के लिए बेहतर रास्ता यही है कि दोनों पक्ष अपने-अपने दावों के समर्थन में प्रमाणिक रिकॉर्ड सामने रखें और आपसी बातचीत से ऐसा समाधान तलाशें जिससे मुल्तानी बिरादरी में इत्तेहाद कायम रहे और किसी को अपनी पहचान के लिए दूसरे से लड़ने की नौबत न आए।

12 नवंबर को मनाए जाने वाले ‘मुल्तानी-डे’ की परंपरा के संबंध में ‘मुल्तानी समाज’ राष्ट्रीय समाचार पत्रिका अपने पुराने रिकॉर्ड और दस्तावेज़ों के आधार पर अपना पक्ष रखने की बात कह रही है। अब देखना यह है कि संबंधित तंजीम इन सवालों का क्या जवाब देती है।


संपादकीय संदेश

मुल्तानी समाज की पहचान किसी एक शख़्स, तंजीम या शहर की जागीर नहीं है। यह पूरी बिरादरी की विरासत है। इसलिए तारीख़ों, नामों और आयोजनों को लेकर पैदा होने वाले हर विवाद का फैसला भावनाओं से नहीं बल्कि सच्चाई, दस्तावेज़ और इतिहास के आईने में होना चाहिए।

ज़मीर आलम
प्रधान-संपादक
‘मुल्तानी समाज’ राष्ट्रीय समाचार पत्रिका

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार से पंजीकृत — नई दिल्ली से प्रसारित

उत्तर प्रदेश डेस्क से विशेष रिपोर्ट


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