हाजी रिज़वान साहब वल्द हाजी खलीक साहब मरहूम (उम्र लगभग 71 वर्ष)
का आज दिन जुमेरात, 22 जनवरी 2026 को बीती रात तक़रीबन 2 बजे
मोहल्ला इकरामपुरा, क़स्बा कैराना, ज़िला शामली (उत्तर प्रदेश) में क़ज़ा-ए-इलाही से इंतिक़ाल हो गया।
मरहूम पाँच भाइयों में सबसे बड़े थे। उनके छोटे भाई
हाजी सत्तार साहब, हाजी ग़फ़्फ़ार साहब, मोहम्मद अदनान साहब हैं, जबकि
मरहूम इस्लाम साहब पहले ही इस फ़ानी दुनिया से रुख़्सत हो चुके हैं।
तीन बहनों में सबसे बड़ी मरहूमा रुक़ैय्या बी थीं, जबकि आयशा बी और ज़ुबैदा बी अल्लाह के फ़ज़्ल से मौजूद हैं।
मरहूम हाजी रिज़वान साहब अपने अख़लाक़, सादगी और नेकदिल शख़्सियत के लिए जाने जाते थे। कम बोलना, सिर्फ़ ज़रूरी और मुद्दे की बात करना, अपनी बात को बेहद संजीदगी से पेश करना—यह उनकी पहचान थी। रोज़ा-नमाज़ के पाबंद, मेहमाननवाज़ और जिंदा-दिल इंसान के तौर पर उन्होंने हर दिल में अपनी जगह बनाई। पल भर में अपनों जैसा एहसास दिला देना उनकी खास ख़ूबी थी।
मरहूम अपने पीछे
एक बेटे मोहम्मद फ़ुरक़ान साहब,
एक बेटी शहनाज़ बी (अहलिया मोहम्मद अकरम साहब, क़स्बा थानाभवन, ज़िला शामली),
पौते-पोतियाँ, नाते-नातिन, अहल-ए-ख़ाना, रिश्तेदार और अज़ीज़-ओ-अक़ारिब को ग़मगीन छोड़कर इस दुनिया से हमेशा के लिए रुख़्सत हो गए।
सऊदी अरब से जनपद मुज़फ्फरनगर, सहारनपुर और बागपत तक अपनी मेहनत, हुनर और ईमानदारी की धाक जमाने वाले मरहूम रिज़वान साहब उस दौर की शख़्सियत थे, जब विदेश जाने की हिम्मत करना भी आसान नहीं था। उन्होंने अपनी ज़िंदगी का तक़रीबन 35 साल सऊदी अरब में खैराद के कारीगर के रूप में गुज़ारे। सऊदी अरब में रहते हुए मशीनरी पार्ट्स के काम के सिलसिले में उन्होंने दर्जनों मुल्कों की खाक छानी। पैदायशी इंजीनियर सिफ़त, मुस्लिम मुल्तानी लोहार बिरादरी का यह चमकता सितारा उस ज़माने में सऊदी अरब की अत्याधुनिक कंप्यूटरीकृत मशीनों पर काम करता रहा, जिस दौर में हम उन मशीनों के बारे में सोच भी नहीं सकते थे।
सबसे बड़ी बात यह रही कि बेरोज़गारी से जूझ रहे अनेकों नौजवानों को उन्होंने बिल्कुल मुफ़्त सऊदी अरब ले जाकर रोज़गार मुहैय्या कराया। ख़ुद भी पूरी जवानी उन्होंने सऊदी अरब में नौकरी करते हुए गुज़ारी और दूसरों के लिए रोज़गार का ज़रिया बनते रहे। उनका इंतेकाल मुल्तानी समाज ही नहीं, बल्कि पूरे इलाक़े के लिए एक बहुत बड़ी कमी है जिसकी भरपाई करना मुमकिन ही नहीं ।
अल्लाह तआला मरहूम की मग़फ़िरत फ़रमाए, उनकी क़ब्र को जन्नत के बाग़ों में से एक बाग़ बनाए और तमाम घर वालों को सब्र-ए-जमील अता फ़रमाए। आमीन।
🕌 जनाज़े की जानकारी
मरहूम की नमाज़-ए-जनाज़ा
बाद नमाज़ ज़ोहर, ठीक डेढ़ बजे
सराय वाली मस्जिद में अदा की जाएगी।
इसके बाद मय्यत को सरकारी अस्पताल के पास, बाढ़ियो वाले क़ब्रिस्तान में सुपुर्द-ए-ख़ाक किया जाएगा।
📞 ज़्यादा मालूमात के लिए राब्ता:
मोहम्मद अकरम साहब (थानाभवन वाले)
मोबाइल: 7017481648
🔔 एक ज़रूरी ऐलान – इंतेकाल की खबर भेजने के लिए अहम् हिदायतें
अक्सर देखा गया है कि इंतेकाल की खबर या तो देर से पहुँचती है या अधूरी होती है, जिससे बिरादरी के लोग जनाज़े में शरीक नहीं हो पाते। इस कमी को दूर करने के लिए “मुल्तानी समाज” राष्ट्रीय समाचार पत्रिका तमाम बिरादराने इस्लाम से गुज़ारिश करती है कि इंतेकाल की खबर भेजते वक़्त नीचे दी गई जानकारी ज़रूर शामिल करें:
1️⃣ मरहूम/मरहूमा का पूरा नाम और वल्दियत/शौहर का नाम
2️⃣ पूरा पता (स्थायी व वर्तमान)
3️⃣ दफ़न का सही वक़्त और क़ब्रिस्तान का नाम
4️⃣ घर के ज़िम्मेदार शख़्स (एक-दो) के मोबाइल नंबर
5️⃣ अगर मर्द का इंतेकाल हुआ हो तो मरहूम का फ़ोटो
6️⃣ इंतेकाल की वजह (अगर मुनासिब हो)
7️⃣ अहल-ए-ख़ाना के नाम — भाई, बहन, वालिदैन, औलाद वगैरह
👉 इन तमाम जानकारियों से खबर मुकम्मल होती है और बिरादरी तक सही वक़्त पर सही सूचना पहुँचती है।
📰 डिस्क्लेमर
पत्रिका में प्रकाशित समस्त लेख, समाचार, विचार, टिप्पणी, प्रेस विज्ञप्ति, विज्ञापन आदि संबंधित लेखक, संवाददाता या विज्ञापनदाता के निजी विचार हैं।
इनसे पत्रिका के संपादक, प्रकाशक, प्रबंधन या संस्थान की सहमति या समर्थन आवश्यक रूप से अभिप्रेत नहीं है।
प्रकाशित सामग्री की सत्यता की ज़िम्मेदारी संबंधित लेखक/विज्ञापनदाता की होगी।
किसी भी विवाद की स्थिति में न्याय क्षेत्र (Jurisdiction) केवल दिल्ली रहेगा।
सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा पंजीकृत
देश की राजधानी दिल्ली से प्रकाशित
पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार-बढ़ई बिरादरी को समर्पित
देश की एकमात्र पत्रिका “मुल्तानी समाज” के लिए
ज़मीर आलम की ख़ास रिपोर्ट
📞 8010884848
🌐 www.multanisamaj.com | www.msctindia.com
✉️ multanisamaj@gmail.com
#multanisamaj
No comments:
Post a Comment