Thursday, February 5, 2026

मुस्लिम मुल्तानी लोहार–बढ़ई बिरादरी मेहनत, हुनर और हिजरत से बनी एक पहचान (भारत में फैलाव की रिवायती कहानी – राज्यवार पूर्वजों के हवाले से)

मुस्लिम मुल्तानी लोहार–बढ़ई बिरादरी की कहानी सिर्फ़ लोहे, लकड़ी या औज़ारों की नहीं है,

यह कहानी है मेहनत की इबादत, हुनर की विरासत और हिजरत के सब्र की।

हमारे बुज़ुर्गों ने सिर्फ़ औज़ार नहीं गढ़े,
उन्होंने अपनी पेशानी के पसीने से समाज में इज़्ज़त, रोज़गार और भरोसे की बुनियाद रखी।
वक़्त बदला, ज़रूरतें बदलीं, मगर कारीगरी और ईमानदारी की रूह वही रही।

मुल्तान की सरज़मीं से निकलकर यह बिरादरी
रोज़ी-रोटी, कारीगरी की मांग और सामाजिक हालात के चलते
हिंदुस्तान के अलग-अलग हिस्सों तक पहुँची।

यह लेख उसी सफ़र को समझने और समझाने की एक अदना-सी कोशिश है।


⚠️ एक ज़रूरी दीनि व हक़ीक़ी वज़ाहत

यहाँ लिखे गए तमाम नाम
रिवायत, इलाक़ाई पहचान और बुज़ुर्गों से चली आ रही बातें हैं।

➡️ यह किसी भी खानदान के लिए अंतिम या क़तई नसब का दावा नहीं है।
हर परिवार का असली शजरा
उसके अपने परदादा, पर-परदादा और प्रमाणित सिलसिले से ही तय होता है।

इस्लाम बिना सबूत नसब जोड़ने की इजाज़त नहीं देता —
और इसी उसूल की पूरी पाबंदी यहाँ रखी गई है।


पंजाब (भारत)

भारत में प्रवेश का पहला पड़ाव

रिवायतों के मुताबिक़
मुल्तान से भारत में दाख़िल होने का पहला बड़ा इलाक़ा पंजाब रहा।
यहीं से मुल्तानी लोहार–बढ़ई बिरादरी ने
अपने हुनर को ज़मीन दी और पहचान पाई।

बुज़ुर्गों में
शेख़ मुल्तान शाह और शेख़ इस्माईल मुल्तानी
के नाम लिए जाते हैं।
लोहे से जुड़ी कारीगरी ने यहीं से मज़बूत शक्ल अख़्तियार की।


राजस्थान

कारीगरी से बनी पहचान

बीकानेर, नागौर, जयपुर और मेवाड़ जैसे इलाक़ों में
मुल्तानी बिरादरी का फैलाव
कारीगरों की क़द्र करने वाली रियासतों से जुड़ा बताया जाता है।

यहाँ
शेख़ सुल्तान अहमद मुल्तानी
और शेख़ बदरुद्दीन मुल्तानी
से जुड़ी रिवायतें मिलती हैं।

राजपूताना दौर में
हुनरमंद हाथ हमेशा इज़्ज़त के साथ देखे गए।


पश्चिमी उत्तर प्रदेश

मज़बूत सामाजिक जड़ें

मेरठ, मुज़फ़्फ़रनगर, शामली, सहारनपुर और बिजनौर
आज भी मुल्तानी लोहार–बढ़ई बिरादरी के
मज़बूत केंद्र माने जाते हैं।

इस फैलाव को
शेख़ क़ासिम मुल्तानी
और शेख़ हबीबुल्लाह मुल्तानी
से जोड़ा जाता है।

यह इलाक़ा
आज भी बिरादरी की सामाजिक, शैक्षिक और पारिवारिक पहचान का गढ़ है।


हरियाणा

मेहनत और रोज़गार का विस्तार

रोहतक, झज्जर, मेवात, सोनीपत और पानीपत
जैसे क्षेत्रों में
मुल्तानी कारीगरों ने खेती और औज़ार निर्माण को अपनाया।

रिवायतों में
शेख़ फ़ज़ल करीम मुल्तानी
और शेख़ नसीरुद्दीन मुल्तानी
के नाम सामने आते हैं।


उत्तराखंड

मैदानों से पहाड़ों तक

हरिद्वार, रुड़की और देहरादून के आसपास
मुल्तानी बिरादरी का पहुँचना
मैदानी इलाक़ों से रोज़गार की तलाश का नतीजा माना जाता है।

यहाँ
शेख़ याक़ूब मुल्तानी
का नाम बुज़ुर्गों की रिवायतों में लिया जाता है।


दिल्ली

शाही दौर और कारीगर

मुग़ल दौर में दिल्ली
हुनरमंद कारीगरों का बड़ा मरकज़ थी।
शहर की तामीर और रोज़मर्रा की ज़रूरतों में
लोहार-बढ़ई की अहम भूमिका रही।

यहाँ
शेख़ सुल्तान अहमद मुल्तानी
और शेख़ हबीबुल्लाह मुल्तानी
से जुड़ी बसावट की बातें मिलती हैं।


गुजरात

व्यापार और हुनर का संगम

अहमदाबाद और सूरत जैसे शहरों में
मुल्तानी बिरादरी का पहुँचना
व्यापार और औज़ार निर्माण से जोड़ा जाता है।

यहाँ
शेख़ क़ासिम मुल्तानी
का नाम रिवायती तौर पर लिया जाता है।


मध्य प्रदेश

मध्य भारत में बसावट

मालवा क्षेत्र, भोपाल और इंदौर के आसपास
उत्तर भारत से आए कारीगरों की बसावट मानी जाती है।

यहाँ
शेख़ नसीरुद्दीन मुल्तानी
और शेख़ बदरुद्दीन मुल्तानी
के नाम प्रचलित हैं।


नतीजा : सच के साथ पहचान

यह पूरी तहरीर
इतिहास, रिवायत और बुज़ुर्गों की बताई बातों पर आधारित है —
न कि किसी एक खानदान के लिए अंतिम नसब।

इसी उसूल पर चलते हुए
“मुल्तानी घराना (SIR – Social Information Register)”
की शुरुआत की जा रही है,
ताकि हर राज्य, हर ज़िला और हर परिवार
अपना अलग, सही और प्रमाणित शजरा
आने वाली नस्लों के लिए महफूज़ कर सके।

अपनी जड़ों को सच के साथ जानना ही असली पहचान है।


✍️ मुल्तानी समाज पत्रिका के लिए

ज़मीर आलम की ख़ास रिपोर्ट

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा पंजीकृत
देश की राजधानी दिल्ली से प्रकाशित
पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार–बढ़ई बिरादरी को समर्पित
देश की एकमात्र पत्रिका — “मुल्तानी समाज”

वेबसाइट:
www.multanisamaj.com
www.msctindia.com

ई-मेल: multanisamaj@gmail.com
संपर्क: 8010884848

#multanisamaj



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