‘मुल्तानी-डे’ को लेकर जारी बहस पर ज़मीर आलम की दो टूक—हर दुनियावी मामले को मज़हब से जोड़कर देखना मुनासिब नहीं
नई - दिल्ली
दीन-ए-इस्लाम, शरीयत और मज़हबी उसूल अपनी जगह मुकम्मल और मोअज़्ज़म हैं। उनमें किसी भी तरह की तब्दीली, तहरीफ़ या मनमानी की न तो गुंजाइश है और न ही ऐसा किया जाना चाहिए। वहीं दुनियावी ज़िंदगी के मामलात, सामाजिक रिश्ते, बिरादरी की गतिविधियां, तालीमी व इज्तिमाई प्रोग्राम और खुशी के मौके मनाने के तौर-तरीके अलग-अलग हो सकते हैं। इसलिए हर दुनियावी मामले को सीधे दीन और मज़हब से जोड़कर देखना भी मुनासिब नहीं।
इन दिनों मुस्लिम मुल्तानी लोहार-बढ़ई बिरादरी में जश्न-ए “मुल्तानी-डे” को लेकर बहस छिड़ी हुई है। इसी सिलसिले में बिरादरी के एक फर्द की करीब नौ मिनट की ऑडियो सामने आई, जिसमें उन्होंने ‘मुल्तानी-डे’ के आयोजन को मज़हब और दीन से जोड़ते हुए आयोजकों के इस्लाम के साथ छेड़छाड़ करने तक की बात कही और दारुल उलूम का हवाला भी दिया।
इस संबंध में ज़मीर आलम ने कहा कि दीन और दुनियावी मामलात के बीच फर्क को समझना बेहद ज़रूरी है। उन्होंने कहा कि हर मसले को दीन के आईने से देखना और हर सामाजिक गतिविधि को मज़हबी मामला बना देना सही रवैया नहीं है। अगर किसी कार्यक्रम में कोई ऐसा अमल हो जो शरीयत के खिलाफ हो, तो उस पर एहतिसाब और इस्लाही बातचीत जरूर होनी चाहिए, लेकिन उससे पहले यह मालूम करना भी जरूरी है कि असल कार्यक्रम की हक़ीक़त और मकसद क्या है।
हमारे बुज़ुर्गों ने जो नहीं किया, क्या हम वह सब छोड़ दें?
अक्सर यह दलील दी जाती है कि हमारे बुज़ुर्गों ने ऐसा नहीं किया, इसलिए हमें भी नहीं करना चाहिए। इस पर गौर करने की जरूरत है कि हमारे बुज़ुर्गों के दौर और आज के दौर में जमीन-आसमान का फर्क है।
हमारे बुज़ुर्गों ने डिजिटल दुनिया नहीं देखी थी। उनके दौर में मोबाइल फोन, इंटरनेट, लैपटॉप और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसी तकनीकें मौजूद नहीं थीं। हवाई जहाज का सफर भी आम ज़िंदगी का हिस्सा नहीं था। तो क्या आज हम इन तमाम दुनियावी सहूलियतों से सिर्फ इसलिए किनारा कर लें कि हमारे बुज़ुर्गों ने इनका इस्तेमाल नहीं किया?
बेशक, दीन के उसूल अपनी जगह अटल हैं, लेकिन दुनियावी ज़िंदगी लगातार बदलती रहती है। इसलिए दीन और दुनिया के दायरे को समझना और दोनों को एक-दूसरे के साथ गड्डमड्ड न करना जरूरी है।
बिरादरी, खानदान और रिश्तेदारी भी दुनियावी मामलात हैं
इंसान की ज़िंदगी सिर्फ व्यक्तिगत इबादत तक महदूद नहीं है। कुनबा, खानदान, रिश्तेदार, पड़ोसी, बिरादरी, कारोबार, तालीम, सामाजिक रिश्ते और इज्तिमाई तरक्की—ये सब दुनियावी ज़िंदगी के अहम पहलू हैं।
हर शख्स चाहता है कि उसकी बिरादरी तरक्की करे, उसके नौजवान आगे बढ़ें, उसकी नई नस्ल तालीम हासिल करे और उसकी बिरादरी की पहचान मुल्क और दुनिया में बेहतर तरीके से सामने आए।
इसी मकसद से अगर कोई जायज़ सामाजिक और बिरादराना कार्यक्रम आयोजित किया जाता है तो उस पर अपनी राय रखना और किसी जायज़ पहलू पर एहतिराज़ जताना अपनी जगह ठीक है, लेकिन हर बात को सीधे इस्लाम और शरीयत के साथ जोड़ देना मामले को जरूरत से ज्यादा पेचीदा बना सकता है।
‘मुल्तानी-डे’ का मकसद क्या है?
जहां तक ‘मुल्तानी-डे’ का सवाल है, आयोजकों की ओर से स्पष्ट किया गया है कि यह किसी जीवित या मरहूम शख्स की याद में मनाया जाने वाला दिन नहीं है।
बताया गया है कि 15 अक्टूबर ‘World Students’ Day’ के अवसर और 12 नवंबर को ‘मुल्तानी समाज’ राष्ट्रीय समाचार पत्रिका के रजिस्ट्रेशन की खुशी में जश्न-ए ‘मुल्तानी-डे’ मनाया जाता है। इसे किसी व्यक्ति की पैदाइश, वफात या शख्सियत से जोड़ना इसका मकसद नहीं है, बल्कि इसे पत्रिका के सालाना जश्न और बिरादरी की सामाजिक पहचान से जोड़कर देखा जाता है।
इसी तरह खुशी के मौके पर जायज़ खाने-पीने की चीज़ें—मसलन मिठाई, शीर, फिरनी, केक, पेस्ट्री या दूसरी हलाल व जायज़ चीज़ें—खाने-खिलाने को भी अपने आप में मज़हबी रस्म करार देना सही नहीं होगा। किसी भी अमल का हुक्म उसके मकसद, तरीके और वास्तविक स्वरूप को देखकर ही तय किया जाना चाहिए।
‘मुल्तानी-डे’ का डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम से कोई संबंध नहीं
यह बात भी साफ कर देना जरूरी है कि ‘मुल्तानी-डे’ का पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम साहब की शख्सियत, उनकी पैदाइश या वफात से कोई ताल्लुक नहीं है। इसे किसी जीवित या मरहूम शख्स की याद के तौर पर पेश करना भी सही जानकारी नहीं होगी।
इसी तरह ‘मुल्तानी-डे’ को किसी मज़हबी त्योहार के तौर पर पेश करना भी आयोजकों के घोषित उद्देश्य के मुताबिक नहीं है। यह ‘मुल्तानी समाज’ राष्ट्रीय समाचार पत्रिका के सालाना सफर और उसकी सामाजिक-पत्रकारीय गतिविधियों से जुड़ा हुआ कार्यक्रम है।
तारीख तय करने की बात पर भी स्थिति साफ हो
ऑडियो में ‘मुल्तानी-डे’ की तारीख तय न किए जाने की बात कही गई है। इस पर भी स्थिति स्पष्ट है कि अगर यह किसी मज़हबी त्योहार का नाम नहीं बल्कि किसी समाचार पत्रिका का सालाना कार्यक्रम है, तो इसकी तारीख आयोजक संस्था अपनी सुविधानुसार पहले से तय कर सकती है।
मज़हबी त्योहारों की तारीख और दुनियावी सामाजिक कार्यक्रम की तारीख—दोनों को एक ही पैमाने से देखना मुनासिब नहीं होगा।
राय देने से पहले मुकम्मल जानकारी जरूरी
बिरादरी में किसी भी मसले पर राय रखना हर शख्स का हक है। लेकिन किसी भी मामले को दीन, शरीयत या इस्लाम से जोड़कर कोई गंभीर बात कहने से पहले उसके तमाम पहलुओं की तहकीक, सही जानकारी और वास्तविक मकसद को समझना भी उतना ही जरूरी है।
दीन की हिफाज़त अपनी जगह हमारी जिम्मेदारी है और बिरादरी की इज्तिमाई तरक्की भी हमारी जिम्मेदारी है। दोनों को आमने-सामने खड़ा करने के बजाय उनके-अपने दायरे को समझना ही बेहतर रास्ता है।
इसलिए ‘मुल्तानी-डे’ को लेकर अगर किसी भाई को कोई शरीयत संबंधी एतराज़ है तो वह इल्मी, तहज़ीबी और दलीली अंदाज़ में अपनी बात रख सकता है। मगर किसी सामाजिक कार्यक्रम को बिना उसकी पूरी हक़ीक़त जाने सीधे इस्लाम के साथ छेड़छाड़ करार देना न तो बिरादराना एकता के लिए मुफीद है और न ही किसी मसले का मुनासिब हल।
इख़्तिलाफ़ हो सकता है, मगर अदब के साथ। राय अलग हो सकती है, मगर तहक़ीक़ और हक़ीक़त के साथ। और सबसे बढ़कर—दीन का अदब भी कायम रहे और बिरादरी की इत्तेहाद व इज्तिमाई तरक्की भी।
📍 विशेष रिपोर्ट
सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार से पंजीकृत, मुल्क की राजधानी नई दिल्ली से प्रसारित, पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी की मुल्क की इकलौती क़ौमी समाचार पत्रिका, न्यूज़ पोर्टल और यूट्यूब चैनल ‘मुल्तानी समाज’ के लिए उत्तर प्रदेश डेस्क से प्रधान संपादक ज़मीर आलम की ख़ास रिपोर्ट।
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