Saturday, October 3, 2026

मुल्तानी-डे पर बिरादरी के चौधरियों की खामोशी क्यों?

जब बिरादरी का एक अहम मसला सामने हो तो 30-40 साल की ख़िदमत का दावा करने वाले जिम्मेदार हज़रात बोलने से क्यों गुरेज़ कर रहे हैं?

ख़ास रिपोर्ट | उत्तर प्रदेश डेस्क

बिरादरी की ख़िदमत, बिरादरी की एकता और बिरादरी के वक़ार की बातें करना आसान है, लेकिन जब बिरादरी के सामने कोई अहम और संवेदनशील मसला खड़ा हो जाए, तब उस मसले पर सही वक़्त में आवाज़ उठाना ही असल ख़िदमत और जिम्मेदारी की पहचान होती है।

आज मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी के सामने "मुल्तानी-डे" से जुड़ा एक ऐसा ही अहम सवाल खड़ा है, जिस पर बिरादरी के बुज़ुर्गों, चौधरियों, ओहदेदारों और प्रभावशाली सामाजिक जिम्मेदारों की खामोशी लगातार सवाल पैदा कर रही है।

बिरादरी में कई ऐसे हज़रात हैं जो अक्सर यह कहते सुनाई देते हैं कि उन्होंने तीन दशक, चार दशक या उससे भी अधिक समय से बिरादरी की ख़िदमत की है। यक़ीनन बिरादरी की ख़िदमत एक क़ाबिले-ए-एहतराम अमल है और जो लोग लंबे अरसे से समाज के लिए काम करते आए हैं, उनका एहतराम किया जाना चाहिए।

लेकिन सवाल यह है कि जब बिरादरी का कोई अहम मामला सामने आए, जब किसी मसले से बिरादरी की एकता, पहचान और आपसी इत्तेहाद प्रभावित होने का अंदेशा पैदा हो, तब वही जिम्मेदार आवाज़ बुलंद करने से क्यों पीछे हट जाते हैं?

क्या ऐसी सूरत में खामोशी ही सबसे बेहतर रास्ता है?

"मुल्तानी-डे" की परम्परा को लेकर उठे सवाल

पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी की राष्ट्रीय समाचार पत्रिका "मुल्तानी समाज" से जुड़े मुल्तानी समाज चैरिटेबल ट्रस्ट द्वारा कई वर्ष पूर्व राष्ट्रीय अधिवेशन के सिलसिले में 12 नवंबर को "मुल्तानी-डे" के नाम से कार्यक्रम आयोजित करने और इसे बिरादरी के बीच पहचान दिलाने की शुरुआत की गई।

समय के साथ यह तारीख और यह नाम बिरादरी के सामाजिक कार्यक्रमों और पहचान के संदर्भ में चर्चा का हिस्सा बनते चले गए।

लेकिन अब कस्बा खतौली, जनपद मुजफ्फरनगर, उत्तर प्रदेश की एक तंजीम द्वारा 15 अक्टूबर को पूर्व राष्ट्रपति एवं महान वैज्ञानिक डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम साहब की यौमे-पैदाइश के मौके पर इसी नाम "मुल्तानी-डे" से कार्यक्रम आयोजित किए जाने की कोशिश की जा रही है।

यहीं से एक अहम सामाजिक सवाल पैदा होता है—

अगर कोई कार्यक्रम एक निर्धारित तारीख और नाम के साथ वर्षों से बिरादरी के एक मंच द्वारा आयोजित होता रहा है, तो उसी नाम को उसकी तय तारीख से ठीक एक माह पहले किसी दूसरे कार्यक्रम के लिए इस्तेमाल किए जाने पर बिरादरी के जिम्मेदार लोगों को कम-से-कम अपनी राय जाहिर नहीं करनी चाहिए?

यह सवाल किसी व्यक्ति या तंजीम की मुखालफत के लिए नहीं, बल्कि बिरादरी की साझा पहचान, सामाजिक परम्परा और भविष्य में पैदा होने वाली गलतफहमियों को रोकने के लिए उठाया जा रहा है।

चौधरियों से सिर्फ इतनी सी गुज़ारिश—बोलिए तो सही!

हम यह नहीं कहते कि कोई किसी से लड़ाई करे।

हम यह भी नहीं कहते कि किसी कार्यक्रम को रोकने के लिए सामाजिक टकराव पैदा किया जाए।

लेकिन इतना तो कहा ही जा सकता है कि—

"भाई, अगर 'मुल्तानी-डे' नाम से कोई कार्यक्रम पहले से एक तारीख के साथ बिरादरी में स्थापित है, तो उसी नाम से ठीक एक माह पहले कार्यक्रम आयोजित करने से भविष्य में भ्रम और मतभेद पैदा हो सकते हैं। लिहाज़ा इस पर आपस में बैठकर बात कर ली जाए।"

क्या इतनी बात कहने के लिए भी किसी चौधरी, बुज़ुर्ग या ओहदेदार को किसी से इजाज़त की जरूरत है?

अगर बिरादरी के बड़े-बड़े जिम्मेदार लोग किसी मसले पर अपनी राय ही जाहिर नहीं करेंगे, तो फिर उनकी चौधराहट, ओहदेदारी और सामाजिक जिम्मेदारी का असल मतलब क्या रह जाता है?

दिल्ली-NCR के जिम्मेदार हज़रात भी खामोश क्यों?

मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी के दिल्ली-NCR समेत विभिन्न इलाकों में ऐसे अनेक सामाजिक रूप से प्रभावशाली और रसूखदार हज़रात मौजूद हैं, जिनका ताल्लुक बड़ौत, खतौली और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के इलाकों से रहा है।

इन बुज़ुर्गों और जिम्मेदार हज़रात से बिरादरी को हमेशा उम्मीद रही है कि जब भी कोई सामाजिक मसला सामने आएगा, वे हिकमत, समझदारी और भाईचारे के साथ अपना किरदार अदा करेंगे।

लेकिन "मुल्तानी-डे" को लेकर सामने आए इस पूरे प्रकरण में जिस तरह की खामोशी दिखाई दे रही है, उसने बिरादरी के आम लोगों को सोचने पर मजबूर कर दिया है।

आख़िर ये खामोशी किस इंतज़ार में है?

क्या किसी बड़े टकराव का इंतज़ार किया जा रहा है?

या फिर यह उम्मीद की जा रही है कि मामला खुद-ब-खुद खत्म हो जाएगा?

अगर ऐसा है तो यह सोच शायद सही नहीं है।

क्योंकि सामाजिक मसले खामोशी से खत्म नहीं होते, बल्कि कई बार खामोशी ही उन्हें आने वाले दिनों में बड़ा विवाद बना देती है।

बिरादरी को जोड़ना है, तो पहले संवाद शुरू कीजिए

आज जरूरत किसी को छोटा या बड़ा साबित करने की नहीं है।

जरूरत है कि बिरादरी के बुज़ुर्ग, चौधरी, ओहदेदार और सामाजिक तंजीमें एक जगह बैठें, एक-दूसरे की बात सुनें और ऐसा रास्ता निकालें जिससे बिरादरी का इत्तेहाद भी कायम रहे और किसी की सामाजिक इज़्ज़त भी प्रभावित न हो।

अगर किसी कार्यक्रम के नाम और तारीख को लेकर गलतफहमी पैदा हो रही है तो उसे बातचीत के जरिए दूर किया जा सकता है।

अगर दो तंजीमें एक ही नाम को लेकर कार्यक्रम करना चाहती हैं तो उनके बीच आपसी मशविरा हो सकता है।

अगर किसी एक नाम की वर्षों पुरानी सामाजिक पहचान है तो उसका भी एहतराम किया जा सकता है।

यही तो बिरादरी के बुज़ुर्गों और चौधरियों का असल किरदार होना चाहिए।

क्या बिरादरी के फैसलों पर भी सवाल उठने चाहिए?

आज आम बिरादरी के बीच एक और सवाल चर्चा का विषय बन रहा है।

जब सामाजिक कार्यक्रमों के नाम और तारीख जैसे अपेक्षाकृत सामान्य मसले पर भी बिरादरी के जिम्मेदार हज़रात अपनी राय सामने रखने से गुरेज़ करें, तो आम लोग यह सवाल करने पर मजबूर होंगे कि—

अगर कल बिरादरी के किसी बड़े और गंभीर मसले पर फैसला लेना पड़ा, तो फैसला किस आधार पर होगा और उसकी जवाबदेही किसकी होगी?

चौधराहट केवल किसी पद, नाम या पहचान का नाम नहीं।

चौधराहट का मतलब है—मुश्किल वक्त में बिरादरी के साथ खड़ा होना, सही बात को सही तरीके से कहना और दो पक्षों के बीच इत्तेहाद कायम कराने की कोशिश करना।

"मुल्तानी समाज" ने अपनी जिम्मेदारी निभाई

इस पूरे मामले को "मुल्तानी समाज" राष्ट्रीय समाचार पत्रिका अपने न्यूज़ पोर्टल और मीडिया प्लेटफॉर्म के माध्यम से पहले भी बिरादरी के सामने रख चुकी है।

हमारा मकसद किसी तंजीम, शख्स या कार्यक्रम की तौहीन करना नहीं है।

हमारा मकसद सिर्फ इतना है कि बिरादरी के सामने पैदा हो रही संभावित गलतफहमी को समय रहते बातचीत और सामाजिक मशविरे के जरिए दूर किया जाए।

लेकिन अगर बिरादरी के बुज़ुर्ग, चौधरी और ओहदेदार अब भी इस मसले पर कोई संज्ञान नहीं लेते, तो आम बिरादरी के बीच यह सवाल उठना लाज़िमी है कि आखिर बिरादरी की आवाज़ कौन बनेगा?

क्या हर मसले पर आम लोगों को ही अपनी आवाज़ उठानी पड़ेगी?

या फिर बिरादरी के जिम्मेदार हज़रात भी अपनी जिम्मेदारी निभाएंगे?

एक सप्ताह—बिरादरी के जिम्मेदारों के नाम

"मुल्तानी समाज" बिरादरी के तमाम बुज़ुर्गों, चौधरियों, ओहदेदारों और सामाजिक जिम्मेदारों से अदब के साथ अपील करता है कि इस मामले पर एक सप्ताह के भीतर अपनी राय और जिम्मेदारी का इज़हार करें।

किसी के खिलाफ नहीं—

बिरादरी के हक़ में।

किसी से लड़ने के लिए नहीं—

बिरादरी को जोड़ने के लिए।

किसी की तौहीन के लिए नहीं—

बिरादरी की पहचान और वक़ार की हिफाज़त के लिए।

अगर इस मुद्दे पर बिरादरी के जिम्मेदार हज़रात कोई पहल करते हैं तो "मुल्तानी समाज" उसका खैरमकदम करेगा और बिरादरी के इत्तेहाद की हर सकारात्मक कोशिश को पूरी इज़्ज़त के साथ जगह देगा।

लेकिन अगर लगातार खामोशी बरकरार रही और कोई जिम्मेदार पहल सामने नहीं आई, तो "मुल्तानी समाज" राष्ट्रीय समाचार पत्रिका अपने स्तर पर उपलब्ध दस्तावेज़ों, पूर्व प्रकाशित सामग्री, तारीखों और संबंधित तथ्यों का जायज़ा लेते हुए इस मामले को सामाजिक एवं आवश्यकतानुसार कानूनी पहलुओं की रोशनी में आगे देखेगी।

क्योंकि किसी भी बिरादरी की ताक़त उसके लोगों की तादाद में नहीं, बल्कि उसके इत्तेहाद, उसूल, आपसी एहतराम और सही वक़्त पर सही बात कहने की हिम्मत में होती है।

आख़िर में चौधरियों से एक सवाल…

अगर आप 30-40 साल से बिरादरी की ख़िदमत कर रहे हैं, तो आज बिरादरी के इस मसले पर आपकी आवाज़ कहाँ है?

अगर आप लड़ नहीं सकते तो कोई बात नहीं—लेकिन क्या आप अपनी बिरादरी के लिए सिर्फ इतना भी नहीं कह सकते कि जो कार्यक्रम वर्षों से एक खास नाम और तारीख के साथ मनाया जाता रहा है, उसी नाम से ठीक एक माह पहले कार्यक्रम आयोजित करने से पैदा होने वाली गलतफहमी पर बातचीत होनी चाहिए?

बिरादरी आपकी तरफ देख रही है…
अब खामोशी नहीं, हिकमत और जिम्मेदारी से बात करने का वक्त है।


सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार से पंजीकृत, मुल्क की राजधानी नई दिल्ली से प्रसारित, पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी की क़ौमी समाचार पत्रिका, न्यूज़ पोर्टल और यूट्यूब चैनल "मुल्तानी समाज" के लिए उत्तर प्रदेश डेस्क से प्रधान संपादक ज़मीर आलम की ख़ास रिपोर्ट।

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