क्या यातायात के नियमों का पालन सिर्फ़ चालान या कार्रवाई के डर से ही होना चाहिए?
या फिर हमें यह समझना चाहिए कि ये नियम हमारी और हमारे अपनों की हिफ़ाज़त के लिए बनाए गए हैं?
हक़ीक़त यह है कि ट्रैफिक पुलिस कोहरा हो या सर्दी, गर्मी हो या बरसात—हर हाल में सड़कों पर खड़ी रहती है। उनका मक़सद हमें रोकना नहीं, बल्कि यह यक़ीन दिलाना होता है कि हम सलामत अपने घर, अपने बीवी-बच्चों और अपने बुज़ुर्गों तक पहुंच सकें। अफ़सोस की बात यह है कि हम में से बहुत-से लोग उनकी मौजूदगी को नज़रअंदाज़ कर देते हैं।
आज शहरों में यह एक आम मंज़र बन गया है कि कुछ नौजवान अपनी बुलेट मोटरसाइकिलों पर मोडिफ़ाइड साइलेंसर लगाकर गोली-नुमा आवाज़ें निकालते हुए ख़ुद को हीरो समझते हैं। मगर क्या उन्होंने कभी यह सोचा है कि सड़क पर चल रहा कोई बुज़ुर्ग, कोई बच्चा या कोई दिल का मरीज़ उस आवाज़ से घबरा कर अपनी जान तक गंवा सकता है?
हीरोगिरी शोर मचाने में नहीं, बल्कि दूसरों की जान की क़द्र करने में है।
इस्लाम हमें सिखाता है कि किसी एक इंसान की जान बचाना पूरी इंसानियत को बचाने के बराबर है। फिर हम कैसे यह सोच सकते हैं कि तेज़ रफ्तार, लापरवाही या नियमों की अनदेखी कोई मामूली बात है?
अक्सर जल्दबाज़ी में लोग ट्रैफिक नियमों को नज़रअंदाज़ कर देते हैं—रेड सिग्नल तोड़ देते हैं, सीट बेल्ट नहीं लगाते, हेलमेट पहनने में कोताही करते हैं। नतीजा यह होता है कि एक छोटी-सी ग़लती ज़िंदगी भर का पछतावा बन जाती है।
आंकड़े साफ़ बताते हैं कि ज़्यादातर सड़क हादसे तेज़ रफ्तार और ग़ैर-ज़िम्मेदार ड्राइविंग की वजह से होते हैं।
अगर हम चार पहिया वाहन चला रहे हैं तो सीट बेल्ट लगाना हमारी ज़िम्मेदारी है।
अगर बाइक चला रहे हैं तो हेलमेट पहनना सिर्फ़ क़ानून नहीं, बल्कि हमारी हिफ़ाज़त का ज़रिया है।
स्पीड ब्रेकर हो या मोड़—रफ्तार कम करना, हॉर्न देकर गाड़ी मोड़ना और सही लेन में चलना—ये सब बातें हमें और दूसरों को हादसों से बचाती हैं।
याद रखिए, यातायात के नियम सरकार या ट्रैफिक पुलिस के फायदे के लिए नहीं बने हैं। ये नियम हमारी सेफ्टी, हमारे घर वालों की ख़ुशी और हमारी ज़िंदगी की सलामती के लिए हैं।
ज़िंदगी बहुत छोटी है—यह कब, कहां और कैसे ख़त्म हो जाए, कोई नहीं जानता। इसलिए अक़्लमंदी इसी में है कि हम खुद भी महफूज़ रहें और दूसरों को भी महफूज़ रखें।
आइए, आज यह अहद करें कि हम यातायात नियमों का पालन डर से नहीं, बल्कि
ज़िम्मेदारी, इंसानियत और दीन की तालीम के तहत करेंगे।
क्योंकि असली समझदारी वही है जो
हमें भी बचाए और दूसरों की जान भी सलामत रखे।
✍️ ज़मीर आलम की ख़ास रिपोर्ट
सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार से पंजीकृत
देश की राजधानी दिल्ली से प्रकाशित
पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार-बढ़ई बिरादरी को समर्पित
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