दुनिया में अगर किसी इबादत को सबसे ज़्यादा रूहानी, पुरअसर और मोहब्बत से भरा सफ़र कहा जाए तो वह “हज” है। हज सिर्फ़ एक सफ़र नहीं बल्कि अल्लाह की बारगाह में हाज़िरी देने का नाम है। यह वह मुक़द्दस इबादत है जहाँ इंसान अपने गुनाहों की माफी मांगता है, अपने रब के सामने झुकता है और दुनिया की तमाम ऊँच-नीच भूलकर सिर्फ़ “लब्बैक अल्लाहुम्मा लब्बैक” की सदाओं में खो जाता है।
ज़िलहिज्जा इस्लामी साल का बेहद बरकतों वाला महीना माना जाता है। इसी महीने में दुनिया भर से लाखों मुसलमान सऊदी अरब के मुक़द्दस शहर मक्का मुकर्रमा पहुँचते हैं और हज की अदायगी करते हैं। अरफात का मैदान वह मुक़ाम है जहाँ इंसानियत, बराबरी और अल्लाह की रहमत का सबसे बड़ा मंज़र दिखाई देता है। सफेद एहराम में लिपटे अमीर-गरीब, छोटे-बड़े, काले-गोरे सब एक साथ खड़े होकर अपने रब से दुआ करते हैं।हज की शुरुआत और हज़रत आदम अलैहिस्सलाम
इस्लामी रिवायतों के मुताबिक़, दुनिया में सबसे पहला इंसान हज़रत आदम अलैहिस्सलाम थे। जन्नत से दुनिया में भेजे जाने के बाद हज़रत आदम और बीबी हव्वा अलैहिस्सलाम एक-दूसरे से जुदा हो गए थे। बाद में अल्लाह के हुक्म से अरफात के मैदान में दोनों की मुलाकात हुई। यही वजह है कि अरफात का मैदान इस्लामी तारीख़ में बेहद अहम मुक़ाम रखता है।
कहा जाता है कि दुनिया का पहला हज भी हज़रत आदम अलैहिस्सलाम ने ही अदा किया था। तभी से लेकर आज तक यह सिलसिला जारी है और क़यामत तक जारी रहेगा इंशाअल्लाह।अरफात का मैदान : हज का सबसे अहम रुक्न
हज का सबसे अहम दिन 9 ज़िलहिज्जा का होता है। इसी दिन लाखों हाजी अरफात के मैदान में जमा होते हैं। इस मौके पर इंसान अपने तमाम गुनाहों की माफी मांगता है। इस दिन की दुआओं को खास कबूलियत हासिल होती है।
हदीस शरीफ में आता है कि “हज अरफात ही है।” यानी अगर किसी का अरफात में ठहरना रह जाए तो उसका हज मुकम्मल नहीं माना जाता। यही वह जगह है जहाँ इंसान अपने रब के सबसे करीब महसूस करता है।मीना, मुज़दलिफा और कुर्बानी
अरफात से लौटने के बाद हाजी मुज़दलिफा में रात गुजारते हैं। यहाँ इबादत की जाती है और शैतान को मारने के लिए कंकड़ियाँ जमा की जाती हैं। इसके बाद मीना में जाकर जमरात पर शैतान को कंकड़ी मारी जाती है।यह अमल इस बात की निशानी है कि इंसान अपने अंदर की बुराइयों, घमंड, लालच और शैतानी ख्यालात को खत्म करने का इरादा कर रहा है। इसके बाद कुर्बानी दी जाती है, जो हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम और हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम की याद को ताज़ा करती है।
हज का पैगाम
हज हमें सब्र, बराबरी, भाईचारे और इंसानियत का पैगाम देता है। यहाँ कोई बड़ा या छोटा नहीं होता, हर इंसान सिर्फ़ अल्लाह का बंदा बनकर आता है।
हज यह सिखाता है कि इंसान दुनिया की दिखावे वाली ज़िंदगी छोड़कर अपने रब से रिश्ता मज़बूत करे, गुनाहों से तौबा करे और इंसानियत की खिदमत में अपनी ज़िंदगी गुज़ारे। आज भी जब अरफात के मैदान में लाखों लोग एक साथ हाथ उठाकर दुआ करते हैं तो ऐसा महसूस होता है जैसे पूरी इंसानियत अपने रब के सामने झुकी हुई है। यही हज की असली रूह है, यही उसकी खूबसूरती और यही उसकी अज़मत है।सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा पंजीकृत, देश की राजधानी दिल्ली से प्रसारित, पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार, बढ़ई बिरादरी की देश की इकलौती राष्ट्रीय समाचार पत्रिका / न्यूज़ पोर्टल / यूट्यूब चैनल “मुल्तानी समाज” के लिए जाफराबाद, नई दिल्ली से मोहम्मद आलम की ख़ास रिपोर्ट।
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