ग़मगीन ख़बर | गढ़ी पुख़्ता, ज़िला शामली, उत्तर प्रदेश
निहायत ही रंज-ओ-ग़म के साथ तमाम बिरादराना हज़रात को यह इत्तिला दी जाती है कि चक्की राहों वाली गली, मोहल्ला कश्यपपुरी, क़स्बा गढ़ी पुख़्ता, ज़िला शामली, उत्तर प्रदेश निवासी जनाब सलीम मिर्ज़ा साहब ‘ड्राइवर’, वल्दियत जनाब बशीर अहमद साहब मरहूम, उम्र तक़रीबन 65 साल, का आज बरोज बुध, बा - तारीख़ 16 सितंबर 2026 को शाम तकरीबन 4:30 बजे पास के एक प्राइवेट हॉस्पिटल में इलाज के दौरान क़ज़ा-ए-इलाही से इंतिक़ाल हो गया।
मरहूम, वसीम ड्राइवर साहब के वालिद-ए-मुहतरम थे। उनके इंतिक़ाल की ख़बर से खानदान, अज़ीज़-ओ-अक़ारिब और बिरादराना हज़रात में ग़म की लहर दौड़ गई है। हर आंख अश्कबार और हर दिल सदमे में है।
नमाज़-ए-जनाज़ा और तदफ़ीन
मय्यत की नमाज़-ए-जनाज़ा कल बरोज जुमेरात, बा - तारीख़ 17 सितंबर 2026 को सुबह 7:00 बजे अदा की जाएगी, जिसके बाद मरहूम को सुपुर्द-ए-ख़ाक किया जाएगा।
तमाम बिरादराना हज़रात से गुज़ारिश है कि जनाज़े में शिरकत फ़रमाकर मरहूम के लिए दुआ-ए-मग़फ़िरत करें और अहले-ख़ाना के ग़म में शरीक हों।
मय्यत को कब्र में उतारते और मिट्टी देते वक़्त
मुसलमान के लिए जनाज़े में शिरकत, मय्यत को कंधा देना, दफ़्न में हिस्सा लेना और उसके लिए दुआ करना बड़ी नेकी का काम है। मय्यत को कब्र में उतारते समय यह दुआ पढ़ी जा सकती है:
بِسْمِ اللّٰهِ وَعَلَىٰ مِلَّةِ رَسُولِ اللّٰهِ ﷺ
“बिस्मिल्लाहि व अला मिल्लति रसूलिल्लाह ﷺ”
अर्थ: “अल्लाह के नाम के साथ और रसूलुल्लाह ﷺ के दीन व तरीक़े पर।”
कब्र में मय्यत को रखने के बाद उसके लिए मग़फ़िरत, रहमत और साबित-क़दमी की दुआ की जाए। मिट्टी देते समय कोई ख़ास लाज़िमी दुआ मुक़र्रर नहीं है; अलबत्ता आम दुआ और इस्तिग़फ़ार करना बेहतर है।
मिट्टी देते समय यह आयत पढ़ी जा सकती है:
مِنْهَا خَلَقْنَاكُمْ وَفِيهَا نُعِيدُكُمْ وَمِنْهَا نُخْرِجُكُمْ تَارَةً أُخْرَىٰ
“इसी मिट्टी से हमने तुम्हें पैदा किया, इसी में तुम्हें लौटाएंगे और इसी से दोबारा तुम्हें निकालेंगे।”
इसके बाद मरहूम के लिए दिल से दुआ करें:
اَللّٰهُمَّ اغْفِرْ لَهٗ وَارْحَمْهٗ، وَعَافِهٖ وَاعْفُ عَنْهٗ، وَأَكْرِمْ نُزُلَهٗ، وَوَسِّعْ مُدْخَلَهٗ۔
“ऐ अल्लाह! मरहूम की मग़फ़िरत फ़रमा, उन पर रहमत फ़रमा, उन्हें आफ़ियत अता फ़रमा, उनसे दरगुज़र फ़रमा, उनकी मेहमाननवाज़ी फ़रमा और उनकी क़ब्र को कुशादा फ़रमा।”
कब्र पर मिट्टी देने के बाद यह दुआ भी की जाए:
اَللّٰهُمَّ ثَبِّتْهُ عِنْدَ السُّؤَالِ، وَاغْفِرْ لَهٗ وَارْحَمْهٗ، وَاجْعَلْ قَبْرَهٗ رَوْضَةً مِّنْ رِّيَاضِ الْجَنَّةِ۔
“ऐ अल्लाह! सवाल के वक़्त उन्हें साबित-क़दम रखना, उनकी मग़फ़िरत फ़रमा, उन पर रहमत फ़रमा और उनकी क़ब्र को जन्नत के बाग़ों में से एक बाग़ बना दे।”
दुआ-ए-मग़फ़िरत
या अल्लाह! जनाब सलीम मिर्ज़ा साहब की पूरी मग़फ़िरत फ़रमा। उनकी तमाम ख़ताओं और कोताहियों से दरगुज़र फ़रमा। उनकी क़ब्र को नूर से मुनव्वर फ़रमा, उसे कुशादा और आरामगाह बना दे। उन्हें सवाल-ए-क़ब्र में आसानी अता फ़रमा, दर्जात बुलंद फ़रमा और उन्हें जन्नतुल फ़िरदौस में आला मुक़ाम अता फ़रमा।
या रब्बुल आलमीन! अहले-ख़ाना, औलाद, अज़ीज़-ओ-अक़ारिब और तमाम मुतअस्सिर हज़रात को सब्र-ए-जमील अता फ़रमा। इस सदमे को बर्दाश्त करने की तौफ़ीक़ दे और मरहूम के लिए की गई तमाम दुआओं को क़ुबूल फ़रमा।
आमीन या रब्बुल आलमीन।
तमाम हज़रात से अपील है कि मरहूम के लिए एक बार सूरह-ए-फ़ातिहा और सूरह-ए-इख़लास पढ़कर दुआ-ए-मग़फ़िरत ज़रूर फ़रमाएँ।
सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार से पंजीकृत, मुल्क की राजधानी नई दिल्ली से प्रसारित, पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी की क़ौमी समाचार पत्रिका, न्यूज़ पोर्टल एवं यूट्यूब चैनल “मुल्तानी समाज” के लिए उत्तर प्रदेश डेस्क से प्रधान संपादक ज़मीर आलम की ख़ास रिपोर्ट।
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