Saturday, October 17, 2026

बागपत में यूसुफ़ साहब और जियाउर रहमान साहब की सरपरस्ती में मुस्लिम मुल्तानी बिरादरी का यादगार इज्तिमा, तीन गरीब बच्चियों के निकाह और कब्रिस्तान के लिए ज़मीन के ऐलान ने जीता सबका दिल

मरहूम हाजी इकराम उल्ला साहब की समाजसेवा की विरासत को आगे बढ़ाने की राह पर जियाउर रहमान साहब — बिरादरी में खिदमत, इत्तेहाद और फलाह-ओ-बहबूद की नई उम्मीद जगी

बागपत, उत्तर प्रदेश। मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी में इत्तेहाद, भाईचारे, समाजी बेदारी और इंसानियत की खिदमत को फरोग देने की गरज़ से 15 अक्टूबर 2026 को बागपत में एक निहायत शानदार, पुरवकार और यादगार प्रोग्राम का इनइकाद किया गया। पूर्व राष्ट्रपति मरहूम डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम साहब की यौमे पैदाइश के मुबारक मौके पर मुनअकिद इस प्रोग्राम ने अपनी शानदार कामयाबी, समाजी पैगाम और खिदमत-ए-खल्क के जज़्बे के सबब बिरादरी के लोगों के दिलों में खास जगह बनाई।

इस यादगार प्रोग्राम के इनइकाद में बिरादरी के उभरते हुए नौजवान जनाब जियाउर रहमान साहब का अहम किरदार रहा, जिन्होंने कम उम्र में ही समाजी फलाह-ओ-बहबूद के मैदान में अपनी दिलचस्पी, मेहनत और जज़्बे का शानदार मुज़ाहिरा किया। बिरादरी के लोगों की बड़ी तादाद में शिरकत और प्रोग्राम के दौरान सामने आए समाजी खिदमत के अहम ऐलानात ने इस इज्तिमा को और भी यादगार बना दिया।

तीन गरीब बच्चियों के निकाह का इंतजाम बना प्रोग्राम की सबसे दिलनशीं बात

इस प्रोग्राम की सबसे खास, काबिल-ए-तारीफ और दिलों को छू लेने वाली बात यह रही कि मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी से ताल्लुक रखने वाले दिल्ली-एनसीआर के मशहूर उद्योगपतियों ने तीन गरीब बच्चियों के निकाह का इंतजाम कराया। निकाह की यह तकरीब निहायत सादगी, वकार और इस्लामी रस्म-ओ-रिवाज के मुताबिक मुकम्मल कराई गई।

आज के दौर में जब गरीब और जरूरतमंद खानदानों के लिए बच्चियों की शादी के अखराजात पूरे करना एक बड़ा मसला बना हुआ है, ऐसे में बिरादरी के साहिब-ए-हैसियत अफराद का आगे बढ़कर जरूरतमंद परिवारों का सहारा बनना यकीनन एक मिसाली समाजी खिदमत है।

इस अमल ने यह पैगाम दिया कि दौलत और हैसियत की असल खूबसूरती जरूरतमंदों के काम आने में है। अगर बिरादरी के साहिब-ए-हैसियत अफराद मिलकर ऐसे नेक कामों को अपना शिआर बना लें, तो न जाने कितने गरीब परिवारों की परेशानियां दूर हो सकती हैं और कितनी ही बेटियों के घर आबाद हो सकते हैं।

बागपत में कब्रिस्तान के लिए जमीन देने के ऐलान से बिरादरी में खुशी की लहर

इस प्रोग्राम को एक और अहम और ऐतिहासिक पहलू उस वक्त हासिल हुआ, जब जनाब जियाउर रहमान साहब की दावत पर उनके पड़ोसी और खानदानी ताल्लुकात रखने वाले जनाब नवाब अहमद हमीद साहब ने प्रोग्राम में शिरकत की और बागपत शहर में मुस्लिम मुल्तानी लोहार बिरादरी की एक पुरानी और अहम जरूरत को सामने रखते हुए कब्रिस्तान के लिए जमीन देने का ऐलान किया।

बागपत शहर में बिरादरी के लिए कब्रिस्तान की जमीन का मसला एक अहम समाजी जरूरत के तौर पर देखा जाता रहा है। ऐसे में जनाब नवाब अहमद हमीद साहब की जानिब से किया गया यह ऐलान प्रोग्राम की अहम पेशरफ्त साबित हुआ और इसने इज्तिमा की खुशी को दोगुना कर दिया।

कब्रिस्तान जैसी बुनियादी जरूरत के लिए जमीन मुहैया कराने की पहल को बिरादरी की आने वाली नस्लों के लिए एक अहम समाजी कदम के तौर पर देखा जा रहा है। इस तरह के नेक इरादे न सिर्फ मौजूदा जरूरतों को पूरा करने में मददगार साबित होते हैं, बल्कि बिरादरी में आपसी हमदर्दी, भाईचारे और इत्तेहाद की बुनियाद को भी मजबूत करते हैं।

जज्बा-ए-खिदमत, पुख्ता इरादा और लगातार मेहनत से मिलती है कामयाबी

कहा जाता है कि जब किसी नेक मकसद के लिए सच्चे दिल से कोशिश की जाती है, तो रास्ते खुद-ब-खुद आसान होने लगते हैं। बागपत का यह प्रोग्राम भी इसी हौसले, मेहनत और समाजी जिम्मेदारी की एक अच्छी मिसाल बनकर सामने आया।

किसी भी तंजीम या समाजी मंच की कामयाबी का असल पैमाना सिर्फ बड़े जलसे या भीड़ नहीं होते, बल्कि यह होता है कि उस कोशिश से समाज के जरूरतमंद तबके को क्या फायदा पहुंचा, लोगों के दरमियान कितना इत्तेहाद पैदा हुआ और बिरादरी की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए कितने कारगर कदम उठाए गए।

बागपत में मुनअकिद इस प्रोग्राम के दौरान गरीब बच्चियों के निकाह का इंतजाम और कब्रिस्तान के लिए जमीन देने का ऐलान इस बात की तरफ इशारा करता है कि अगर समाजी प्रोग्रामों को सही मकसद और खिदमत के जज्बे के साथ मुनअकिद किया जाए, तो उनसे दूरगामी और फायदेमंद नतीजे बरामद हो सकते हैं।

दादा मरहूम हाजी इकराम उल्ला साहब की विरासत को आगे बढ़ाने का जज्बा

जनाब जियाउर रहमान साहब की समाजी सरगर्मियों का जिक्र हो और उनके दादा, बिरादरी के मोअज्जिज और काबिल-ए-एहतराम शख्सियत मरहूम हाजी इकराम उल्ला साहब की याद ताजा न हो, ऐसा मुमकिन नहीं।

हाजी इकराम उल्ला साहब को बिरादरी में इज्जत और एहतराम की निगाह से याद किया जाता है। उनके खानदान से ताल्लुक रखने वाले जनाब जियाउर रहमान साहब की समाजी सरगर्मियों को देखकर बिरादरी के लोगों में यह उम्मीद पैदा हो रही है कि वह अपने बुजुर्गों की नेक रवायतों को आगे बढ़ाते हुए समाजी खिदमत के मैदान में अपना किरदार अदा करते रहेंगे।

जनाब जियाउर रहमान साहब के लिए यह प्रोग्राम कोई पहली समाजी कोशिश नहीं था। इससे पहले भी वह बिरादरी के नौजवानों में खेलों के प्रति दिलचस्पी बढ़ाने, उनकी सलाहियतों को उभारने और आपसी भाईचारे को फरोग देने की गरज़ से बड़े पैमाने पर क्रिकेट टूर्नामेंट मुनअकिद कराते रहे हैं। इसके अलावा बिरादरी की तरक्की और समाजी बेदारी के लिए मुख्तलिफ किस्म की सरगर्मियों में भी दिलचस्पी लेते रहे हैं।

खेलों के मैदान से लेकर समाजी फलाह-ओ-बहबूद के प्रोग्रामों तक उनकी सरगर्मियां इस बात की निशानदेही करती हैं कि बिरादरी के नौजवानों को अगर सही रहनुमाई, मुनासिब मौके और हौसला-अफजाई मिले, तो वह समाज की बेहतरी में अहम किरदार अदा कर सकते हैं।

बिरादरी के लोगों में यह चर्चा भी है कि जनाब जियाउर रहमान साहब अपने दादा मरहूम हाजी इकराम उल्ला साहब के नक्श-ए-कदम पर चलते हुए समाजी खिदमत के इस सिलसिले को आगे बढ़ाने के लिए पुरअज्म हैं।

‘मुल्तानी समाज चैरिटेबल ट्रस्ट’ से जुड़ने की भी चर्चाख़बर की

सूत्रों से मिलने वाली जानकारी के मुताबिक जनाब जियाउर रहमान साहब आने वाले दिनों में दिल्ली-एनसीआर से ताल्लुक रखने वाले अपने कुटुंबियों, रिश्तेदारों और अजीज दोस्तों के साथ ‘मुल्तानी समाज चैरिटेबल ट्रस्ट’ की रुक्नियत हासिल करने की तैयारी में हैं।

अगर यह पेशरफ्त अमली शक्ल इख्तियार करती है, तो बिरादरी के समाजी और फलाही कामों को एक मुनज्जम प्लेटफॉर्म पर आगे बढ़ाने के नए रास्ते खुल सकते हैं। दिल्ली-एनसीआर में रहने वाले बिरादरी के ताजिरों, उद्योगपतियों, नौजवानों और समाजी खिदमतगारों की सलाहियतों को एक जगह जमा करके जरूरतमंद परिवारों की मदद, तालीम की फरोग, गरीब बच्चियों की शादियों में तआवुन और बिरादरी की बुनियादी जरूरतों के हल के लिए मुनज्जम कोशिशें की जा सकती हैं।

अलबत्ता, रुक्नियत के सिलसिले में सामने आई इस जानकारी की औपचारिक तस्दीक और अमली पेशरफ्त का इंतजार रहेगा।

बिरादरी के लिए एक पैगाम — इत्तेहाद, तालीम और खिदमत को बनाएं अपना शिआर

बागपत का यह यादगार इज्तिमा मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी के लिए कई अहम पैगाम छोड़कर गया है। गरीब बच्चियों के निकाह का इंतजाम, कब्रिस्तान के लिए जमीन देने का ऐलान और नौजवानों की समाजी सरगर्मियों में दिलचस्पी, ये तमाम पहलू इस बात की तरफ इशारा करते हैं कि बिरादरी की तरक्की के लिए सिर्फ तकरीरों की नहीं, बल्कि अमली कदमों की जरूरत है।

अगर बिरादरी के ताजिर, उद्योगपति, तालीमयाफ्ता अफराद, नौजवान और समाजी रहनुमा एक-दूसरे के साथ मिलकर काम करें, तो तालीम, रोजगार, गरीबों की मदद, बच्चियों की शादियों, खेलों और दीगर समाजी जरूरतों के सिलसिले में कई बेहतर पहल की जा सकती हैं।

समाज की असल तरक्की उस वक्त मुमकिन होती है, जब साहिब-ए-हैसियत अफराद जरूरतमंदों का सहारा बनें, नौजवान अपनी सलाहियतों को समाज की बेहतरी के लिए इस्तेमाल करें और बुजुर्गों की नेक रवायतों को नई नस्ल तक पहुंचाया जाए।

बागपत का यह प्रोग्राम इसी जज्बा-ए-खिदमत, आपसी इत्तेहाद और बिरादराना हमदर्दी की एक काबिल-ए-तारीफ मिसाल बनकर सामने आया है।


खास रिपोर्ट: ज़मीर आलम, प्रधान संपादक
उत्तर प्रदेश डेस्क — ‘मुल्तानी समाज’

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