कहीं रजिस्टर्ड संस्था के कामकाज पर सवाल, तो कहीं मिर्ज़ा मुल्तानी वेलफेयर सोसाइटी में तानाशाही के आरोप; 3,100 रुपये की रसीद, वोट का अधिकार, कथित आर्थिक अनियमितताओं और राष्ट्रीय नेतृत्व को लेकर सोशल मीडिया पर छिड़ी बहस
उत्तर प्रदेश डेस्क | ख़ास रिपोर्ट
मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी का इतिहास, सामाजिक पहचान, मेहनत, कारोबार और तालीमी विरासत किसी परिचय की मोहताज नहीं है। इस बिरादरी में तालीमयाफ़्ता अफ़राद, वकील, कारोबारी, समाजसेवी, बुद्धिजीवी और समझदार लोगों की कोई कमी नहीं है। इसके बावजूद समय-समय पर बिरादरी के नाम पर गठित सामाजिक संस्थाओं और उनके ज़िम्मेदारों के कामकाज को लेकर ऐसे सवाल सामने आते रहे हैं, जो न केवल आम लोगों के एतमाद को प्रभावित करते हैं, बल्कि आने वाली नस्लों के मुस्तक़बिल के लिए भी फ़िक्र का सबब बनते हैं।
आख़िर सवाल यह है कि बिरादरी के नाम पर तंजीमें बनाने वाले कुछ लोग अपनी ज़िम्मेदारियों को किस तरह निभा रहे हैं? क्या सामाजिक संस्थाएं बिरादरी की एकता, तरक़्क़ी और नुमाइंदगी के लिए बनाई जाती हैं या फिर कुछ अफ़राद के निजी प्रभाव और पद की चाहत तक सिमटकर रह जाती हैं?
इन दिनों सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे मुख़्तलिफ़ पैग़ामात, कथित ऑडियो और वीडियो ने इस बहस को और तेज़ कर दिया है। विशेष रूप से उत्तर प्रदेश के बड़ौत और मुज़फ्फरनगर के खतौली से संबंधित दो संस्थाओं का ज़िक्र करते हुए बिरादरी के लोग कई गंभीर सवाल उठा रहे हैं।
बड़ौत की संस्था से खतौली की सोसाइटी तक, आखिर सवाल क्यों उठ रहे हैं?
सोशल मीडिया पर वायरल एक संदेश में मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी के एक शख़्स ने तल्ख़ अंदाज़ में सवाल उठाया है कि बिरादरी के नाम पर आख़िर कब तक झूठे वादों और ग़लत बयानी का सिलसिला चलता रहेगा?
संदेश में बड़ौत की रजिस्टर्ड संस्था अंजुमन मुल्तानी मुग़ल आह्नग्रान, बड़का मार्ग, बड़ौत के कामकाज को लेकर उठाए जा रहे सवालों का हवाला दिया गया है। वहीं मुज़फ्फरनगर के कस्बा खतौली की मिर्ज़ा मुल्तानी वेलफेयर सोसाइटी को लेकर सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे संदेशों, कथित दस्तावेज़ों और आर्थिक लेन-देन से जुड़े सवालों का भी ज़िक्र किया गया है।
वायरल संदेश लिखने वाले का कहना है कि एक संस्था के कामकाज को लेकर उठे सवालों का सिलसिला अभी थमा भी नहीं था कि दूसरी संस्था को लेकर भी नए विवाद और चर्चाएं सामने आने लगी हैं।
उन्होंने अफ़सोस जताते हुए सवाल किया है कि जब बिरादरी में पढ़े-लिखे, तालीमयाफ़्ता, कारोबारी और समझदार लोग मौजूद हैं तो फिर मुट्ठी भर लोग किस तरह पूरे समाज को अपने दावों और वादों के ज़रिए प्रभावित कर लेते हैं?
संदेश के अंत में लिखा गया एक सवाल विशेष रूप से ध्यान खींचता है—
'ज़रा सोचिए!'
यह सवाल केवल किसी एक संस्था या व्यक्ति से नहीं, बल्कि उन तमाम लोगों से है जो बिरादरी के नाम पर सामाजिक नेतृत्व का दावा करते हैं।
हालांकि, दोनों संस्थाओं के संबंध में लगाए गए आरोपों और अनियमितताओं की स्वतंत्र पुष्टि होना अभी बाक़ी है। संबंधित संस्थाओं का पक्ष भी सामने आना ज़रूरी है।
खतौली की मिर्ज़ा मुल्तानी वेलफेयर सोसाइटी में अंदरूनी मतभेद हुए सार्वजनिक
खतौली की मिर्ज़ा मुल्तानी वेलफेयर सोसाइटी (MMWS) को लेकर सोशल मीडिया पर इन दिनों कई संदेश वायरल हो रहे हैं। इन संदेशों में संगठन के पुराने साथियों की नाराज़गी, मौजूदा नेतृत्व पर तानाशाही के आरोप और राष्ट्रीय स्तर पर चुनावी व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल उठाए गए हैं।
एक वायरल संदेश में मोहतरम जनाब साबिर साहब को संबोधित करते हुए लिखा गया है कि MMWS की बुनियाद में कुछ लोगों का खून, पसीना और पैसा लगा हुआ है। संदेश में हाजी सगीर हसन साहब के योगदान का विशेष रूप से ज़िक्र किया गया है।
वायरल पैग़ाम के अनुसार, संस्था के रजिस्ट्रेशन में हाजी सगीर हसन साहब ने अपनी जेब से रकम खर्च की थी। वर्ष 2018 में दिल्ली में आयोजित सेमिनार और वर्ष 2023 में मिर्ज़ा ग़ालिब ऑडिटोरियम में आयोजित बड़े कार्यक्रम को भी बिरादरी की सामाजिक यात्रा का अहम हिस्सा बताया गया है।
संदेश में दावा किया गया है कि वर्ष 2023 के कार्यक्रम पर लगभग 6 लाख 80 हज़ार रुपये खर्च किए गए, जिनका इंतज़ाम हाजी सगीर हसन साहब, अब्दुल हमीद साहब और दिल्ली के कुछ साथियों के सहयोग से हुआ था।
वहीं, संदेश लिखने वाले ने आरोप लगाया है कि बाद के दौर में कई पुराने और क़ाबिल साथियों को संगठन से अलग कर दिया गया।
पुराने साथियों को हटाने और तानाशाही के आरोप
वायरल संदेशों में इमरान साहब, कामिल साहब, देवबंद के वसीम साहब, सलीम साहब, इनाम साहब और आलम साहब सहित कई लोगों का नाम लिया गया है।
संदेश लिखने वाले का दावा है कि इन लोगों सहित कई साथियों को संगठन से अलग किया गया और सामूहिक मशवरे की व्यवस्था प्रभावित हुई।
उन्होंने मौजूदा नेतृत्व पर तानाशाही का आरोप लगाते हुए संगठन के अंदर कुछ लोगों के प्रभाव को लेकर भी सवाल उठाए हैं।
यहां सवाल उठता है कि जिस संगठन की बुनियाद सामूहिक मेहनत, सहयोग और बिरादरी की ख़िदमत के लिए रखी गई हो, वहां पुराने सहयोगियों और सदस्यों की राय को कितनी अहमियत दी जा रही है?
क्या किसी सामाजिक संस्था का निज़ाम कुछ चुनिंदा लोगों की मर्ज़ी से चलना चाहिए या फिर उसके सभी वैध सदस्यों को निर्णय प्रक्रिया में बराबर का मौक़ा मिलना चाहिए?
सैफ़ी बिरादरी की मिसाल देकर किया जा रहा है आगाह
एक अन्य वायरल संदेश में सैफ़ी बिरादरी के संगठनात्मक मतभेदों की मिसाल देकर मुल्तानी बिरादरी को आगाह किया गया है।
संदेश में दावा किया गया है कि सैफ़ी नाम से संस्था बनने के बाद नेतृत्व को लेकर विवाद पैदा हुए और अलग-अलग लोगों की ओर से राष्ट्रीय सदर होने के दावे किए जाने लगे।
संदेश लिखने वाले ने सवाल उठाया है कि क्या मुल्तानी बिरादरी भी इसी तरह के संगठनात्मक बिखराव की तरफ़ बढ़ रही है?
उन्होंने कहा है कि किसी व्यक्ति की ज़िद या नेतृत्व संबंधी मतभेदों की वजह से पूरी बिरादरी का सामाजिक भविष्य प्रभावित नहीं होना चाहिए।
3,100 रुपये की रसीद और वोट के अधिकार पर जवाब मांगा
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे अहम और आम सदस्यों से सीधे जुड़ा पहलू 3,100 रुपये की रसीद और मतदान के अधिकार को लेकर सामने आया है।
सोशल मीडिया पर वायरल एक संदेश में सवाल किया गया है कि क्या कार्यवाहक सदर बनने के लिए भी पर्चा भरना पड़ता है? क्या कार्यवाहक सदर बनने के लिए 3,100 रुपये की रसीद बनवाना ज़रूरी है?
कुछ लोगों का दावा है कि उनसे यह कहकर पैसे जमा कराए गए थे कि उनकी सदस्यता बनेगी और वे बिरादरी का राष्ट्रीय सदर चुनने के लिए वोट डाल सकेंगे।
अब यही लोग सवाल उठा रहे हैं कि उन्हें केवल रसीद नहीं, बल्कि अपने लोकतांत्रिक अधिकार की स्पष्ट जानकारी चाहिए।
उनका कहना है कि यदि उनसे सदस्यता के नाम पर रकम ली गई है तो उन्हें यह बताया जाए कि उनकी सदस्यता की स्थिति क्या है, मतदाता सूची में उनका नाम शामिल है या नहीं और राष्ट्रीय सदर का चुनाव कब कराया जाएगा?
इस मामले में सोसाइटी के ज़िम्मेदारों को सदस्यता की शर्तें, रसीदों का उद्देश्य, मतदान के पात्र सदस्यों की स्थिति और चुनाव की प्रक्रिया सार्वजनिक करनी चाहिए।
जायज़ सवालों को सियासत बताकर टालने का आरोप
एक वायरल संदेश में अली अंसार साहब को संबोधित करते हुए कहा गया है कि बिरादरी के ग्रुपों में सवाल पूछना कोई बुरी बात नहीं है, बल्कि सवालों का जवाब न देना चिंता का विषय है।
एक दूसरे संदेश में अब्दुल बारी साहब को संबोधित करते हुए सवाल उठाया गया है कि जायज़ सवाल पूछने वालों को समझाने और चुप कराने की कोशिश क्यों की जाती है?
संदेश लिखने वाले का आरोप है कि सवालों को सियासत का नाम देकर टाल दिया जाता है।
उनका कहना है कि अगर कोई व्यक्ति संस्था की सदस्यता, राष्ट्रीय सदर के चयन और आर्थिक पारदर्शिता के बारे में जानकारी मांग रहा है तो उसे बिरादरी विरोधी या सियासत करने वाला क्यों समझा जाए?
बेशक, सवाल करने का हक़ हर सदस्य को है, लेकिन सवालों के जवाब भी तहज़ीब और दलील के साथ दिए जाने चाहिए। यही किसी भी मज़बूत सामाजिक संगठन की पहचान होती है।
राजनीति में भागीदारी का एजेंडा या पद हासिल करने की कोशिश?
दिल्ली से वायरल एक अन्य संदेश में कहा गया है कि राजनीति में भागीदारी सोसाइटी के एजेंडे का हिस्सा है और नेतृत्व की सलाहियत पैदा करने के लिए एक मंच की आवश्यकता होती है।
इसमें कॉलेजों के छात्र संघ चुनाव की मिसाल देते हुए कहा गया है कि जिस तरह छात्र राजनीति से भविष्य के नेता तैयार होते हैं, उसी तरह बिरादरी के लोग भी संगठनात्मक मंच से राजनीतिक समझ विकसित कर सकते हैं।
इसके जवाब में सवाल उठाया गया है कि सामाजिक संस्था का अमीर या सदर तो सभी के मशवरे से चुना जाना चाहिए।
यह बहस अपने आप में अहम है कि बिरादरी को राजनीतिक भागीदारी का मंच देने का मक़सद क्या है और उस मंच का नेतृत्व किस तरह चुना जाएगा?
जातीय पहचान और आने वाली नस्लों के मुस्तक़बिल पर भी सवाल
एक वायरल संदेश में प्रस्तावित जातीय जनगणना का हवाला देते हुए बिरादरी की पहचान को लेकर भी चिंता जताई गई है।
संदेश में पूछा गया है कि मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी के लोग अपनी सामाजिक और जातीय पहचान किस नाम से दर्ज कराएं? क्या बिरादरी के ज़िम्मेदारों ने इस संबंध में कोई जागरूकता अभियान चलाया है?
यह सवाल केवल एक जनगणना तक सीमित नहीं है। यह बिरादरी की पहचान, सामाजिक अधिकारों, सरकारी योजनाओं और आने वाली नस्लों के भविष्य से जुड़ा विषय है।
हालांकि, जनगणना की तारीख़ों और जातीय वर्गीकरण को लेकर किसी भी नतीजे पर पहुंचने से पहले सरकारी अधिसूचना और संबंधित प्रशासनिक दिशा-निर्देशों की पुष्टि ज़रूरी है।
अब बिरादरी के सामने कुछ सीधे सवाल
बड़ौत और खतौली से संबंधित वायरल संदेशों तथा मौजूदा चर्चाओं के बाद बिरादरी के सामने कई सवाल हैं:
- क्या बिरादरी के नाम पर संचालित संस्थाओं की वार्षिक रिपोर्ट और ऑडिट सार्वजनिक किए जाते हैं?
- क्या संस्थाओं के पंजीकृत नियमों के मुताबिक चुनाव कराए जाते हैं?
- सदस्यता के नाम पर ली जाने वाली रकम का पूरा हिसाब सदस्यों को दिया जाता है?
- क्या 3,100 रुपये की रसीद लेने वाले लोगों को मतदान का अधिकार दिया जाएगा?
- पुराने पदाधिकारियों और संस्थापक साथियों को हटाने के क्या लिखित कारण हैं?
- क्या राष्ट्रीय स्तर पर नेतृत्व के चयन के लिए निष्पक्ष और पारदर्शी चुनावी व्यवस्था है?
- बिरादरी की तालीम, रोज़गार, सामाजिक पहचान और राजनीतिक भागीदारी के लिए संस्थाओं की वास्तविक कार्ययोजना क्या है?
- क्या आम बिरादरी को संस्थाओं के अहम फैसलों और आर्थिक गतिविधियों की जानकारी मिलती है?
बिरादरी के समझदार और तालीमयाफ़्ता लोग कब आगे आएंगे?
सबसे अफ़सोसनाक पहलू यह है कि मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी में पढ़े-लिखे, कारोबारी, वकील, तालीमयाफ़्ता और समझदार लोगों की अच्छी तादाद मौजूद है। इसके बावजूद सामाजिक नेतृत्व और संगठनात्मक जवाबदेही के मामलों में आम लोगों की सामूहिक आवाज़ उतनी प्रभावशाली दिखाई नहीं देती, जितनी होनी चाहिए।
आख़िर ऐसा क्यों?
क्या बिरादरी के बुद्धिजीवी और शिक्षित लोग इन मामलों से दूरी बनाए रखेंगे? क्या सामाजिक संस्थाओं के कामकाज को केवल कुछ पदाधिकारियों के भरोसे छोड़ दिया जाएगा? क्या आम सदस्य केवल रसीद कटवाने और कार्यक्रमों में शामिल होने तक सीमित रहेंगे?
समाज को ऐसे नेतृत्व की ज़रूरत है जो सवालों से न घबराए, दस्तावेज़ दिखाने में संकोच न करे, आर्थिक हिसाब देने से पीछे न हटे और किसी भी पद को अपनी निजी जागीर न समझे।
आख़िरी सवाल: बिरादरी की ख़िदमत या कुर्सी की सियासत?
बिरादरी के नाम पर कोई भी संस्था बने, उसका मक़सद लोगों को जोड़ना, तालीम को बढ़ावा देना, कारोबार और रोज़गार के अवसर पैदा करना, सामाजिक अधिकारों के लिए आवाज़ उठाना और आने वाली नस्लों के लिए बेहतर रास्ता तैयार करना होना चाहिए।
यदि किसी संस्था के भीतर मतभेद हैं तो उन्हें बातचीत और मशवरे से हल किया जाना चाहिए। यदि आर्थिक लेन-देन पर सवाल हैं तो हिसाब पेश किया जाना चाहिए। यदि चुनाव पर विवाद है तो पंजीकृत नियमावली के मुताबिक निष्पक्ष प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए।
बिरादरी किसी एक शख़्स, परिवार, गुट या सोसाइटी की जागीर नहीं है। यह हम सबकी साझा पहचान और हमारी आने वाली नस्लों की अमानत है।
आख़िर कब तक बिरादरी के नाम पर बड़े-बड़े दावे होते रहेंगे और आम लोग अपने ही अधिकारों के लिए सवाल पूछते रहेंगे?
अब वक़्त आ गया है कि बिरादरी के नाम पर नेतृत्व का दावा करने वाले हर शख़्स से उसके काम, किरदार, पारदर्शिता और जवाबदेही का हिसाब मांगा जाए।
संपादकीय स्पष्टीकरण: इस रिपोर्ट में बड़ौत की अंजुमन मुल्तानी मुग़ल आह्नग्रान तथा खतौली की मिर्ज़ा मुल्तानी वेलफेयर सोसाइटी के संबंध में सोशल मीडिया पर वायरल संदेशों और उनमें लगाए गए आरोपों को जनचर्चा के रूप में शामिल किया गया है। किसी भी संस्था या व्यक्ति के विरुद्ध धोखाधड़ी अथवा अन्य अनियमितता को न्यायिक या आधिकारिक पुष्टि के बिना सिद्ध तथ्य नहीं माना जाना चाहिए। संबंधित संस्थाओं और पदाधिकारियों का पक्ष प्राप्त होने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।
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उत्तर प्रदेश डेस्क से पत्रकार: अली हसन मुल्तानी
स्थान: बड़ौत, जिला बागपत, उत्तर प्रदेश
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