Thursday, October 22, 2026

प्रधानमंत्री आवास के पास ऐतिहासिक रेस कोर्स मस्जिद पर संकट! छह दिन में परिसर खाली करने के नोटिस से बढ़ा विवाद, बिजली-पानी काटे जाने के भी आरोप

नई दिल्ली | मुल्तानी समाज राष्ट्रीय समाचार पत्रिका

नई दिल्ली में प्रधानमंत्री आवास के निकट स्थित ऐतिहासिक रेस कोर्स मस्जिद को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। मस्जिद से जुड़े लोगों ने परिसर खाली कराने के नोटिस, बिजली-पानी की आपूर्ति बंद किए जाने और नमाज़ियों की आवाजाही प्रभावित होने की शिकायत की है। वहीं, मस्जिद की ऐतिहासिक पहचान, वक्फ से जुड़े दस्तावेज़ और सरकारी भूमि पर अधिकार को लेकर सवाल उठ रहे हैं। इस मामले में जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने भी केंद्र सरकार से हस्तक्षेप की मांग की है।

क्या है पूरा मामला?

राजधानी दिल्ली के लोक कल्याण मार्ग स्थित प्रधानमंत्री के सरकारी आवास के नजदीक रेस कोर्स क्षेत्र में स्थित ऐतिहासिक मस्जिद इन दिनों चर्चा में है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, मस्जिद को लगभग 125 वर्ष पुराना बताया जा रहा है, जबकि कुछ रिपोर्टों में इसके इतिहास को इससे भी अधिक पुराना बताया गया है।

19 अक्टूबर 2026 के आसपास सामने आई खबरों में दावा किया गया कि केंद्र सरकार के भूमि एवं विकास कार्यालय (L&DO) की ओर से मस्जिद परिसर को छह दिनों के भीतर खाली करने का निर्देश दिया गया है। इस घटनाक्रम के बाद मस्जिद के संरक्षण और वहां नमाज़ अदा करने की व्यवस्था को लेकर चिंता बढ़ गई है।

हालांकि, इस मामले में नोटिस जारी होने और उसके स्वरूप को लेकर अलग-अलग रिपोर्टें सामने आई हैं। इसलिए नोटिस की मूल प्रति और प्रशासन का आधिकारिक पक्ष सामने आना महत्वपूर्ण है।

बिजली-पानी बंद होने और नमाज़ियों को परेशानी का दावा

मस्जिद के इमाम मौलाना मोहम्मद हारून तथा मस्जिद से जुड़े लोगों के हवाले से प्रकाशित खबरों में बताया गया है कि परिसर की बिजली और पानी की आपूर्ति बंद कर दी गई है। साथ ही, प्रवेश द्वार बंद किए जाने और नमाज़ियों के आने-जाने में बाधा उत्पन्न होने की शिकायत भी सामने आई है।

रिपोर्टों के अनुसार, बिजली-पानी बंद किए जाने की कार्रवाई 7 अक्टूबर 2026 के आसपास हुई थी। इस स्थिति ने मस्जिद में नियमित रूप से नमाज़ अदा करने वाले लोगों के सामने कठिनाइयां पैदा कर दी हैं।

हालांकि, अधिकारियों की ओर से बिजली-पानी बंद किए जाने के कारण और मस्जिद तक पहुंच सीमित करने के संबंध में सामने आए दावों की स्वतंत्र पुष्टि अभी आवश्यक है।

1977 के वक्फ गजट में दर्ज होने का दावा

इस विवाद का एक महत्वपूर्ण पहलू मस्जिद की कानूनी स्थिति है। मस्जिद के पक्षकारों और दिल्ली वक्फ बोर्ड से जुड़े दस्तावेजों के हवाले से प्रकाशित रिपोर्टों में दावा किया गया है कि मस्जिद और उससे लगे कब्रिस्तान को 8 सितंबर 1977 की दिल्ली प्रशासन की गजट अधिसूचना में वक्फ संपत्ति के रूप में दर्ज किया गया था।

मस्जिद पक्ष इसके अतिरिक्त नई दिल्ली नगरपालिका परिषद (NDMC) की विरासत सूची में शामिल होने का भी हवाला दे रहा है।

दूसरी ओर, भूमि एवं विकास कार्यालय से जुड़े प्रशासनिक पक्ष का कहना है कि संबंधित भूमि सरकारी है और परिसर के उपयोग को लेकर सवाल हैं। इस प्रकार विवाद के केंद्र में सरकारी भूमि की स्थिति, वक्फ संबंधी अभिलेख और ऐतिहासिक स्थल की मान्यता जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे हैं।

इन दावों का अंतिम निष्कर्ष मूल गजट अधिसूचना, भूमि अभिलेखों, विरासत सूची और संबंधित कानूनी आदेशों की जांच के बाद ही निकाला जा सकता है।

जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने केंद्रीय मंत्री से की मुलाकात

इस मामले को लेकर जमीयत उलेमा-ए-हिंद का एक प्रतिनिधिमंडल 19 अक्टूबर 2026 को केंद्रीय अल्पसंख्यक कार्य मंत्री किरेन रिजिजू से मिला। संगठन की आधिकारिक वेबसाइट पर प्रकाशित जानकारी के अनुसार, प्रतिनिधिमंडल ने मस्जिद और उससे लगे कब्रिस्तान के संरक्षण के लिए ज्ञापन सौंपा।

ज्ञापन में बिजली-पानी की आपूर्ति बहाल कराने, नमाज़ अदा करने की व्यवस्था सुनिश्चित करने और मस्जिद को हटाए जाने की आशंका के बीच तत्काल हस्तक्षेप करने की मांग की गई।

इस घटनाक्रम ने मामले को स्थानीय विवाद से आगे बढ़ाकर राष्ट्रीय स्तर पर धार्मिक विरासत और कानूनी अधिकारों से जुड़ी चर्चा का विषय बना दिया है।

राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर भी उठे सवाल

मस्जिद को लेकर विभिन्न राजनीतिक और सामाजिक प्रतिनिधियों ने चिंता जताई है। प्रकाशित रिपोर्टों के अनुसार, AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी सहित अन्य नेताओं ने भी केंद्र सरकार से मामले में हस्तक्षेप करने की अपील की है।

वहीं, दिल्ली वक्फ बोर्ड की ओर से भी मस्जिद के संरक्षण की मांग किए जाने की खबर सामने आई है। टाइम्स ऑफ इंडिया की 21 अक्टूबर की रिपोर्ट के अनुसार, बोर्ड ने संबंधित अधिकारियों को पत्र लिखकर मस्जिद की सुरक्षा और बिजली-पानी की आपूर्ति बहाल करने के लिए हस्तक्षेप का अनुरोध किया।

इसी रिपोर्ट में सरकारी सूत्रों के हवाले से यह भी कहा गया कि L&DO ने मस्जिद को कोई औपचारिक नोटिस जारी नहीं किया था। ऐसे में नोटिस की वास्तविक स्थिति और किसी औपचारिक ध्वस्तीकरण आदेश की मौजूदगी की स्पष्ट पुष्टि बेहद जरूरी है।

ऐतिहासिक धरोहर और धार्मिक स्थल के संरक्षण का सवाल

रेस कोर्स मस्जिद का मामला केवल एक इमारत को खाली कराने तक सीमित नहीं है। इससे जुड़े सवालों में धार्मिक स्थल का उपयोग, वक्फ संपत्ति के अभिलेख, सरकारी भूमि के अधिकार, विरासत संरक्षण और नमाज़ियों की धार्मिक गतिविधियां शामिल हैं।

यदि मस्जिद से संबंधित ऐतिहासिक और कानूनी दस्तावेज उपलब्ध हैं, तो उनकी निष्पक्ष जांच करके सभी संबंधित पक्षों को अपना पक्ष रखने का अवसर दिया जाना चाहिए। साथ ही, किसी भी कार्रवाई के संबंध में पारदर्शिता और लागू कानूनों का पालन सुनिश्चित होना चाहिए।

मुल्तानी समाज की ओर से महत्वपूर्ण अपील

‘मुल्तानी समाज’ राष्ट्रीय समाचार पत्रिका का मानना है कि ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व के स्थलों से जुड़े विवादों का समाधान तथ्यों, दस्तावेजों, कानून और संवाद के आधार पर होना चाहिए। इस मामले में भी प्रशासन, वक्फ से संबंधित संस्थाओं और मस्जिद प्रबंधन के बीच स्पष्ट संवाद आवश्यक है।

मामले की निष्पक्ष जांच, मस्जिद की कानूनी स्थिति की स्पष्टता और नमाज़ियों को होने वाली परेशानियों का समाधान प्राथमिकता होनी चाहिए। यदि किसी पक्ष के पास वैध दस्तावेज हैं, तो उन्हें संबंधित प्राधिकरण और न्यायिक मंच के समक्ष प्रस्तुत करके कानूनी समाधान प्राप्त किया जाना चाहिए।

फिलहाल सबसे अहम सवाल यही है कि रेस कोर्स मस्जिद की वास्तविक कानूनी स्थिति क्या है, खाली कराने संबंधी नोटिस किस प्राधिकरण ने किस आधार पर जारी किया और ऐतिहासिक स्थल के संरक्षण के लिए आगे क्या कदम उठाए जाएंगे। इन सवालों का जवाब संबंधित आधिकारिक दस्तावेजों और प्रशासन के स्पष्ट बयान से ही मिल सकेगा।

स्रोत: NDTV, द न्यू इंडियन एक्सप्रेस, टाइम्स ऑफ इंडिया तथा जमीयत उलेमा-ए-हिंद की आधिकारिक वेबसाइट पर प्रकाशित रिपोर्टें एवं जानकारी।

मुल्तानी समाज | राष्ट्रीय समाचार पत्रिका

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