### *एक शेर ने महफ़िल का माहौल बदल दिया! अदब और एहतराम की बहस के बीच कमेटी की क़यादत पर उठने लगे सवाल, सदर से इस्तीफ़े और बहिष्कार तक की मांग*
**जलालाबाद, शामली (उत्तर प्रदेश)।** मुस्लिम मुल्तानी लोहार, बढ़ई बिरादरी के सामाजिक और तंजीमी हलक़ों में इन दिनों 15 अक्टूबर 2026 को क़स्बा जलालाबाद के **जोया पैलेस** में आयोजित एक सम्मेलन को लेकर चर्चा गर्म है। सम्मेलन में कैराना लोकसभा क्षेत्र की सांसद इकरा हसन को भी मदऊ किया गया था। कार्यक्रम के दौरान सांसद के इस्तक़बाल में पढ़े गए एक शेर को लेकर ऐसा विवाद खड़ा होने की बात सामने आई है, जिसने बिरादरी के भीतर अदब, एहतराम, तंजीमी ज़िम्मेदारी और क़यादत के तौर-तरीक़ों पर बहस छेड़ दी है।
मामले को लेकर बिरादरी के कुछ जिम्मेदारों ने नाराज़गी का इज़हार किया है। वहीं, कुछ लोगों की तरफ़ से कमेटी के सदर के रवैये पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। हालांकि, इस पूरे मामले में संबंधित सदर साहब और सांसद इकरा हसन का आधिकारिक पक्ष सामने आना अभी बाक़ी है।
### क्या है पूरा मामला?
मिली जानकारी के मुताबिक, 15 अक्टूबर को जलालाबाद स्थित **जोया पैलेस** में खतौली से ताल्लुक़ रखने वाली मुस्लिम मिर्ज़ा मुल्तानी लोहार, बढ़ई बिरादरी की एक तंजीम का सम्मेलन आयोजित किया गया था। कार्यक्रम में बिरादरी के लोगों के अलावा कैराना की लोकप्रिय सांसद इकरा हसन को भी शिरकत के लिए आमंत्रित किया गया था।
प्रत्यक्षदर्शियों के हवाले से बताया जा रहा है कि सांसद इकरा हसन कार्यक्रम में कुछ देर से पहुँचीं। उनके आने पर तंजीम के सदर साहब ने मंच से उनका इस्तक़बाल करते हुए कथित तौर पर यह शेर पढ़ा—
**“सनम देर कर दी आते-आते!”**
बस, इसी शेर को लेकर महफ़िल में मौजूद कुछ लोगों की भौंहें तन गईं। बिरादरी के कुछ लोगों ने इसे एक महिला जनप्रतिनिधि के इस्तक़बाल के लिए मुनासिब अल्फ़ाज़ नहीं माना और सवाल उठाया कि सार्वजनिक मंच पर किसी सम्मानित महिला सांसद के लिए ऐसे अल्फ़ाज़ का इस्तेमाल करना क्या अदब और तहज़ीब के तक़ाज़ों के मुताबिक़ था?
प्रत्यक्षदर्शियों के हवाले से यह भी दावा किया जा रहा है कि इस मौक़े पर सांसद की प्रतिक्रिया सहज नहीं थी, लेकिन उन्होंने सार्वजनिक कार्यक्रम की नज़ाकत को देखते हुए अपनी नाराज़गी ज़ाहिर नहीं की। हालांकि, सांसद की वास्तविक प्रतिक्रिया के बारे में उनकी तरफ़ से कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है।
### इस्तक़बाल का शेर या अदब की हदों से आगे बढ़ती ज़बान?
इस पूरे मामले में सबसे अहम सवाल यही उठ रहा है कि किसी भी तंजीम के सदर और मंच संचालक की ज़िम्मेदारी महज़ मेहमानों का स्वागत करना नहीं, बल्कि अपने अल्फ़ाज़ से कार्यक्रम की गरिमा बनाए रखना भी है।
सामाजिक हलक़ों में चर्चा है कि अगर किसी मेहमान के आने में देर हो जाए, तो उसका इस्तक़बाल ख़ुशआमदीद, इज़्ज़त-अफ़ज़ाई और दुआओं के अल्फ़ाज़ से भी किया जा सकता है। ऐसे में एक महिला जनप्रतिनिधि के लिए इस्तेमाल किए गए शेर को लेकर सवाल उठना लाज़िमी है।
हालांकि, किसी शेर का मतलब उसके संदर्भ और कहने के अंदाज़ से भी तय होता है। लिहाज़ा, पूरे वाक़ये की निष्पक्ष पड़ताल और संबंधित पक्षों का मौक़िफ़ सामने आना ज़रूरी है।
### कार्यक्रम के बाद भी नहीं थमा विवाद, जिम्मेदारों ने जताई नाराज़गी!
सूत्रों और बिरादरी के कुछ जिम्मेदारों के मुताबिक़, कार्यक्रम की समाप्ति के बाद इस शेर को लेकर कमेटी के कुछ लोगों ने सदर साहब के सामने अपनी नाराज़गी ज़ाहिर की। उनका कहना बताया जा रहा है कि बिरादरी के मंच पर किसी मेहमान के स्वागत में ऐसे अल्फ़ाज़ का इस्तेमाल नहीं होना चाहिए था, जिनसे उसकी गरिमा या सम्मान को ठेस पहुँचने की आशंका हो।
आरोप है कि सदर साहब ने अपनी ग़लती स्वीकार करने के बजाय आपत्ति जताने वाले जिम्मेदारों को ही गलत ठहराना शुरू कर दिया। इसी कथित रवैये ने मामले को और तूल दे दिया।
बिरादरी के कुछ लोगों का कहना है कि अगर किसी तंजीम के अंदर उसके कामकाज और ज़बान के इस्तेमाल पर सवाल उठाने वालों को ही ग़लत ठहराया जाने लगे, तो आपसी मशवरे और इस्लाही अमल की गुंजाइश कम हो जाती है।
हालांकि, सदर साहब का पक्ष सामने आने के बाद ही इस विवाद की पूरी तस्वीर स्पष्ट हो सकेगी।
### अली हसन का आरोप—‘हिटलरशाही’ के रवैये से परेशान हैं लोग!
बिरादरी के जिम्मेदार अली हसन साहब ने कथित तौर पर सदर साहब के काम करने के अंदाज़ पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उनका आरोप है कि सदर साहब का रवैया लंबे समय से हठधर्मिता वाला रहा है और तंजीम में दूसरे लोगों की राय को अहमियत नहीं दी जाती।
अली हसन के मुताबिक़, बिरादरी के कार्यक्रमों और तंजीमी गतिविधियों को लेकर भी मतभेद रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि दूसरी तंजीम के कार्यक्रमों की नकल करके उन्हें अपना बताने जैसी शिकायतें भी सामने आती रही हैं।
इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है। संबंधित सदर साहब का पक्ष सामने आने पर ही इनकी वास्तविक स्थिति स्पष्ट होगी।
### अज़हर खान ने उठाया महिला सम्मान का सवाल
बिरादरी के एक अन्य जिम्मेदार अज़हर खान साहब का कहना है कि किसी भी जनप्रतिनिधि का इस्तक़बाल करते समय अल्फ़ाज़ का चुनाव बेहद एहतियात से होना चाहिए। उनका मानना है कि सार्वजनिक मंच पर महिला जनप्रतिनिधि के लिए इस्तेमाल की जाने वाली ज़बान में अदब, एहतराम और पेशेवर शाइस्तगी झलकनी चाहिए।
अज़हर खान के मुताबिक़, इस मामले में इस्तेमाल किए गए शेर को लेकर जो नाराज़गी सामने आई है, उसे हल्के में लेने के बजाय तंजीम के जिम्मेदारों को गंभीरता से विचार करना चाहिए।
उन्होंने यह भी कहा कि तंजीम की साख उसके ओहदेदारों के व्यवहार और सार्वजनिक आचरण से बनती है। इसलिए पद पर बैठे व्यक्ति से दूसरों के मुकाबले अधिक संजीदगी और जवाबदेही की उम्मीद की जाती है।
### अकील अहमद की मांग—ऐसे रवैये पर हो जवाबदेही!
बिरादरी के एक अन्य शख़्स अकील अहमद ने इस मामले में सख़्त रुख़ अपनाते हुए कहा कि यदि किसी ओहदेदार के आचरण से बिरादरी की साख प्रभावित होती है, तो उस पर तंजीम के बुज़ुर्गों और जिम्मेदारों को गौर करना चाहिए।
उनका कहना है कि इस मामले में उचित कार्रवाई होनी चाहिए और यदि जांच में सदर साहब का रवैया अनुचित पाया जाता है, तो उनके पद पर बने रहने के बारे में भी फैसला किया जाना चाहिए।
अकील अहमद ने कथित तौर पर ऐसे सदर का सामाजिक बहिष्कार किए जाने की मांग भी उठाई है। हालांकि, यह उनकी निजी राय है और किसी सामूहिक फैसले की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
### मक़सूद अहमद ने किया आगाह—मामला बढ़ा तो बिरादरी की साख पर पड़ेगा असर
मक़सूद अहमद का कहना है कि तंजीम के पढ़े-लिखे लोगों और बुज़ुर्गों को इस पूरे मामले पर जल्द बैठकर मशवरा करना चाहिए। उनके मुताबिक़, किसी एक शख़्स की ज़िद या आपसी मतभेद अगर पूरे समाज की प्रतिष्ठा को प्रभावित करने लगें, तो उसका नुकसान किसी एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता।
उन्होंने मामले को आपसी बातचीत, निष्पक्ष जांच और तंजीमी उसूलों के मुताबिक़ हल करने की ज़रूरत पर ज़ोर दिया।
### एहसान अली की मांग—सदर साहब ख़ुद दें इस्तीफ़ा!
बिरादरी के जिम्मेदार एहसान अली का कहना है कि किसी भी ओहदे की असल अहमियत उस पर बैठे व्यक्ति के किरदार, व्यवहार और जवाबदेही से होती है। उनके मुताबिक़, अगर सदर साहब को लगता है कि उनके रवैये से बिरादरी के जिम्मेदारों का भरोसा कम हुआ है, तो उन्हें अपने पद के बारे में गंभीरता से विचार करना चाहिए।
एहसान अली ने कथित तौर पर सदर साहब से तत्काल इस्तीफ़ा देने और किसी ऐसे व्यक्ति को ज़िम्मेदारी सौंपने की मांग की है, जिसे बिरादरी के लोग स्वीकार करते हों।
उन्होंने चेतावनी दी कि यदि इस मामले का संतोषजनक समाधान नहीं निकाला गया, तो विरोध करने वाले लोग पूरी कमेटी के बहिष्कार का रास्ता भी अपना सकते हैं। फिलहाल, किसी औपचारिक बहिष्कार या नई कमेटी के गठन की पुष्टि नहीं हुई है।
### क्या नई तंजीम के गठन की तैयारी है?
इस पूरे विवाद के बाद बिरादरी के कुछ जिम्मेदारों के बीच एक नई कमेटी गठित करने को लेकर विचार-विमर्श होने की चर्चा भी सामने आ रही है। हालांकि, नई कमेटी के गठन, उसके सदस्यों या किसी आधिकारिक निर्णय की पुष्टि नहीं हो सकी है।
यदि वास्तव में ऐसा कोई कदम उठाया जाता है, तो यह केवल एक शेर पर उपजा विवाद नहीं, बल्कि बिरादरी के भीतर क़यादत, प्रतिनिधित्व और तंजीमी जवाबदेही को लेकर गहरे मतभेदों का संकेत हो सकता है।
दूसरी तरफ़, किसी भी नई तंजीम के गठन से पहले सभी पक्षों को आपसी बातचीत, दस्तावेज़ी तथ्यों और बिरादरी के व्यापक हितों को सामने रखकर निर्णय लेना चाहिए, ताकि विवाद का हल निकालने के बजाय नए विवाद पैदा न हों।
### बिरादरी के सामने बड़ा सवाल—ओहदा बड़ा या उसूल?
जलालाबाद के इस सम्मेलन से जुड़ा विवाद कई अहम सवाल छोड़ रहा है। क्या सामाजिक तंजीमों के ओहदेदारों को सार्वजनिक मंच पर अपनी ज़बान और व्यवहार के प्रति अधिक जवाबदेह नहीं होना चाहिए? क्या किसी विवाद पर सवाल उठाने वाले जिम्मेदारों की बात सुनी जानी चाहिए या उन्हें ही गलत ठहरा दिया जाना चाहिए? और क्या बिरादरी के भीतर मतभेदों को आपसी मशवरे से हल करना बेहतर नहीं होगा?
मुस्लिम मुल्तानी लोहार, बढ़ई बिरादरी के लिए यह वाक़या इस लिहाज़ से भी अहम है कि सामाजिक एकता केवल बड़े-बड़े सम्मेलनों और मंचों से नहीं, बल्कि आपसी एहतराम, बुज़ुर्गों की इज़्ज़त, महिलाओं की गरिमा और जिम्मेदाराना व्यवहार से मज़बूत होती है।
**याद रहे, अदब किसी ओहदे का मोहताज नहीं और जवाबदेही किसी एक तंजीम तक महदूद नहीं।** बिरादरी की साख उसी वक़्त बुलंद होती है, जब उसके जिम्मेदार अपने अल्फ़ाज़, अपने अमल और अपने फैसलों से मिसाल क़ायम करते हैं।
अब देखना यह है कि इस विवाद पर संबंधित सदर साहब क्या मौक़िफ़ अपनाते हैं, तंजीम के बुज़ुर्ग क्या फैसला करते हैं और क्या यह मामला आपसी मशवरे से सुलझता है या बिरादरी के भीतर एक नए तंजीमी विवाद की शक्ल अख़्तियार करता है।
**नोट:** इस रिपोर्ट में उल्लिखित आरोप और प्रतिक्रियाएँ संबंधित व्यक्तियों के हवाले से प्राप्त जानकारी पर आधारित हैं। संबंधित सदर साहब और सांसद इकरा हसन का पक्ष प्राप्त होने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।
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**रिपोर्ट: सादिक मुल्तानी**
उप -संपादक, उत्तर प्रदेश डेस्क
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सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार से पंजीकृत, नई दिल्ली से प्रकाशित एवं प्रसारित, मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी की क़ौमी आवाज़।
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