Thursday, October 22, 2026

प्रधानमंत्री आवास के पास ऐतिहासिक रेस कोर्स मस्जिद पर संकट! छह दिन में परिसर खाली करने के नोटिस से बढ़ा विवाद, बिजली-पानी काटे जाने के भी आरोप

नई दिल्ली | मुल्तानी समाज राष्ट्रीय समाचार पत्रिका

नई दिल्ली में प्रधानमंत्री आवास के निकट स्थित ऐतिहासिक रेस कोर्स मस्जिद को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। मस्जिद से जुड़े लोगों ने परिसर खाली कराने के नोटिस, बिजली-पानी की आपूर्ति बंद किए जाने और नमाज़ियों की आवाजाही प्रभावित होने की शिकायत की है। वहीं, मस्जिद की ऐतिहासिक पहचान, वक्फ से जुड़े दस्तावेज़ और सरकारी भूमि पर अधिकार को लेकर सवाल उठ रहे हैं। इस मामले में जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने भी केंद्र सरकार से हस्तक्षेप की मांग की है।

क्या है पूरा मामला?

राजधानी दिल्ली के लोक कल्याण मार्ग स्थित प्रधानमंत्री के सरकारी आवास के नजदीक रेस कोर्स क्षेत्र में स्थित ऐतिहासिक मस्जिद इन दिनों चर्चा में है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, मस्जिद को लगभग 125 वर्ष पुराना बताया जा रहा है, जबकि कुछ रिपोर्टों में इसके इतिहास को इससे भी अधिक पुराना बताया गया है।

19 अक्टूबर 2026 के आसपास सामने आई खबरों में दावा किया गया कि केंद्र सरकार के भूमि एवं विकास कार्यालय (L&DO) की ओर से मस्जिद परिसर को छह दिनों के भीतर खाली करने का निर्देश दिया गया है। इस घटनाक्रम के बाद मस्जिद के संरक्षण और वहां नमाज़ अदा करने की व्यवस्था को लेकर चिंता बढ़ गई है।

हालांकि, इस मामले में नोटिस जारी होने और उसके स्वरूप को लेकर अलग-अलग रिपोर्टें सामने आई हैं। इसलिए नोटिस की मूल प्रति और प्रशासन का आधिकारिक पक्ष सामने आना महत्वपूर्ण है।

बिजली-पानी बंद होने और नमाज़ियों को परेशानी का दावा

मस्जिद के इमाम मौलाना मोहम्मद हारून तथा मस्जिद से जुड़े लोगों के हवाले से प्रकाशित खबरों में बताया गया है कि परिसर की बिजली और पानी की आपूर्ति बंद कर दी गई है। साथ ही, प्रवेश द्वार बंद किए जाने और नमाज़ियों के आने-जाने में बाधा उत्पन्न होने की शिकायत भी सामने आई है।

रिपोर्टों के अनुसार, बिजली-पानी बंद किए जाने की कार्रवाई 7 अक्टूबर 2026 के आसपास हुई थी। इस स्थिति ने मस्जिद में नियमित रूप से नमाज़ अदा करने वाले लोगों के सामने कठिनाइयां पैदा कर दी हैं।

हालांकि, अधिकारियों की ओर से बिजली-पानी बंद किए जाने के कारण और मस्जिद तक पहुंच सीमित करने के संबंध में सामने आए दावों की स्वतंत्र पुष्टि अभी आवश्यक है।

1977 के वक्फ गजट में दर्ज होने का दावा

इस विवाद का एक महत्वपूर्ण पहलू मस्जिद की कानूनी स्थिति है। मस्जिद के पक्षकारों और दिल्ली वक्फ बोर्ड से जुड़े दस्तावेजों के हवाले से प्रकाशित रिपोर्टों में दावा किया गया है कि मस्जिद और उससे लगे कब्रिस्तान को 8 सितंबर 1977 की दिल्ली प्रशासन की गजट अधिसूचना में वक्फ संपत्ति के रूप में दर्ज किया गया था।

मस्जिद पक्ष इसके अतिरिक्त नई दिल्ली नगरपालिका परिषद (NDMC) की विरासत सूची में शामिल होने का भी हवाला दे रहा है।

दूसरी ओर, भूमि एवं विकास कार्यालय से जुड़े प्रशासनिक पक्ष का कहना है कि संबंधित भूमि सरकारी है और परिसर के उपयोग को लेकर सवाल हैं। इस प्रकार विवाद के केंद्र में सरकारी भूमि की स्थिति, वक्फ संबंधी अभिलेख और ऐतिहासिक स्थल की मान्यता जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे हैं।

इन दावों का अंतिम निष्कर्ष मूल गजट अधिसूचना, भूमि अभिलेखों, विरासत सूची और संबंधित कानूनी आदेशों की जांच के बाद ही निकाला जा सकता है।

जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने केंद्रीय मंत्री से की मुलाकात

इस मामले को लेकर जमीयत उलेमा-ए-हिंद का एक प्रतिनिधिमंडल 19 अक्टूबर 2026 को केंद्रीय अल्पसंख्यक कार्य मंत्री किरेन रिजिजू से मिला। संगठन की आधिकारिक वेबसाइट पर प्रकाशित जानकारी के अनुसार, प्रतिनिधिमंडल ने मस्जिद और उससे लगे कब्रिस्तान के संरक्षण के लिए ज्ञापन सौंपा।

ज्ञापन में बिजली-पानी की आपूर्ति बहाल कराने, नमाज़ अदा करने की व्यवस्था सुनिश्चित करने और मस्जिद को हटाए जाने की आशंका के बीच तत्काल हस्तक्षेप करने की मांग की गई।

इस घटनाक्रम ने मामले को स्थानीय विवाद से आगे बढ़ाकर राष्ट्रीय स्तर पर धार्मिक विरासत और कानूनी अधिकारों से जुड़ी चर्चा का विषय बना दिया है।

राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर भी उठे सवाल

मस्जिद को लेकर विभिन्न राजनीतिक और सामाजिक प्रतिनिधियों ने चिंता जताई है। प्रकाशित रिपोर्टों के अनुसार, AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी सहित अन्य नेताओं ने भी केंद्र सरकार से मामले में हस्तक्षेप करने की अपील की है।

वहीं, दिल्ली वक्फ बोर्ड की ओर से भी मस्जिद के संरक्षण की मांग किए जाने की खबर सामने आई है। टाइम्स ऑफ इंडिया की 21 अक्टूबर की रिपोर्ट के अनुसार, बोर्ड ने संबंधित अधिकारियों को पत्र लिखकर मस्जिद की सुरक्षा और बिजली-पानी की आपूर्ति बहाल करने के लिए हस्तक्षेप का अनुरोध किया।

इसी रिपोर्ट में सरकारी सूत्रों के हवाले से यह भी कहा गया कि L&DO ने मस्जिद को कोई औपचारिक नोटिस जारी नहीं किया था। ऐसे में नोटिस की वास्तविक स्थिति और किसी औपचारिक ध्वस्तीकरण आदेश की मौजूदगी की स्पष्ट पुष्टि बेहद जरूरी है।

ऐतिहासिक धरोहर और धार्मिक स्थल के संरक्षण का सवाल

रेस कोर्स मस्जिद का मामला केवल एक इमारत को खाली कराने तक सीमित नहीं है। इससे जुड़े सवालों में धार्मिक स्थल का उपयोग, वक्फ संपत्ति के अभिलेख, सरकारी भूमि के अधिकार, विरासत संरक्षण और नमाज़ियों की धार्मिक गतिविधियां शामिल हैं।

यदि मस्जिद से संबंधित ऐतिहासिक और कानूनी दस्तावेज उपलब्ध हैं, तो उनकी निष्पक्ष जांच करके सभी संबंधित पक्षों को अपना पक्ष रखने का अवसर दिया जाना चाहिए। साथ ही, किसी भी कार्रवाई के संबंध में पारदर्शिता और लागू कानूनों का पालन सुनिश्चित होना चाहिए।

मुल्तानी समाज की ओर से महत्वपूर्ण अपील

‘मुल्तानी समाज’ राष्ट्रीय समाचार पत्रिका का मानना है कि ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व के स्थलों से जुड़े विवादों का समाधान तथ्यों, दस्तावेजों, कानून और संवाद के आधार पर होना चाहिए। इस मामले में भी प्रशासन, वक्फ से संबंधित संस्थाओं और मस्जिद प्रबंधन के बीच स्पष्ट संवाद आवश्यक है।

मामले की निष्पक्ष जांच, मस्जिद की कानूनी स्थिति की स्पष्टता और नमाज़ियों को होने वाली परेशानियों का समाधान प्राथमिकता होनी चाहिए। यदि किसी पक्ष के पास वैध दस्तावेज हैं, तो उन्हें संबंधित प्राधिकरण और न्यायिक मंच के समक्ष प्रस्तुत करके कानूनी समाधान प्राप्त किया जाना चाहिए।

फिलहाल सबसे अहम सवाल यही है कि रेस कोर्स मस्जिद की वास्तविक कानूनी स्थिति क्या है, खाली कराने संबंधी नोटिस किस प्राधिकरण ने किस आधार पर जारी किया और ऐतिहासिक स्थल के संरक्षण के लिए आगे क्या कदम उठाए जाएंगे। इन सवालों का जवाब संबंधित आधिकारिक दस्तावेजों और प्रशासन के स्पष्ट बयान से ही मिल सकेगा।

स्रोत: NDTV, द न्यू इंडियन एक्सप्रेस, टाइम्स ऑफ इंडिया तथा जमीयत उलेमा-ए-हिंद की आधिकारिक वेबसाइट पर प्रकाशित रिपोर्टें एवं जानकारी।

मुल्तानी समाज | राष्ट्रीय समाचार पत्रिका

Wednesday, October 21, 2026

खतौली की घटना से लें सबक: बिरादरी की फ़िक्र से पहले अपनी औलाद की तरबियत पर दें तवज्जोह

नौजवानों की मोबाइल गतिविधियों पर नज़र रखें वालिदैन, बहन-बेटियों की काउंसलिंग करें और घरों को टूटने से बचाने में निभाएँ ज़िम्मेदारी

फर्ज़ी सोशल मीडिया आईडी, ब्लैकमेलिंग और अश्लील तस्वीरों की धमकी जैसे मामले पूरे समाज के लिए तश्वीशनाक — मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी के वालिदैन, बुज़ुर्गों और ज़िम्मेदारों के लिए ग़ौर-ओ-फ़िक्र का पैग़ाम

ख़ास रिपोर्ट | ज़मीर आलम, प्रधान संपादक | उत्तर प्रदेश डेस्क, मुल्तानी समाज

खतौली, मुज़फ्फरनगर (उत्तर प्रदेश)। आज के डिजिटल दौर में मोबाइल फोन, इंटरनेट और सोशल मीडिया हमारी ज़िंदगी का अहम हिस्सा बन चुके हैं। जहाँ इन सहूलतों ने इल्म, कारोबार, रोज़गार और एक-दूसरे से राब्ते के नए रास्ते खोले हैं, वहीं इनका ग़लत इस्तेमाल कई घरों की खुशियों, नौजवानों के मुस्तक़बिल और परिवारों की इज़्ज़त के लिए गंभीर चुनौती बनता जा रहा है। खास तौर पर फर्ज़ी सोशल मीडिया आईडी बनाकर किसी को परेशान करना, ब्लैकमेल करना, बदनामी की धमकी देना और निजी तस्वीरों का ग़लत इस्तेमाल करना बेहद अफ़सोसनाक और संजीदा मामले हैं।

उत्तर प्रदेश के मुज़फ्फरनगर ज़िले के खतौली से सामने आई एक घटना ने इसी मसले पर ग़ौर करने की ज़रूरत को फिर उजागर किया है। उपलब्ध समाचार विवरण के मुताबिक, खतौली के मोहल्ला बिद्दीवाड़ा में एक युवती के नाम से कथित तौर पर फर्ज़ी इंस्टाग्राम आईडी बनाकर उसे ब्लैकमेल करने और एआई (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) की मदद से आपत्तिजनक तस्वीरें तैयार करके अपलोड करने की धमकी देने का मामला सामने आया। आरोप है कि युवती से पैसों की मांग भी की गई।

समाचार में आरोपी की पहचान अनस, उम्र लगभग 26 वर्ष, पुत्र रईस आज़म, निवासी मोहल्ला बिद्दीवाड़ा, खतौली के रूप में बताई गई है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, पीड़िता की शिकायत पर खतौली थाने में एफआईआर संख्या 340/2026 दर्ज की गई। रिपोर्ट में आईटी एक्ट की धाराओं 66D और 67 का उल्लेख है। इसके बाद पुलिस ने मिशन शक्ति और एंटी रोमियो टीम की कार्रवाई के दौरान आरोपी को गिरफ्तार किए जाने की जानकारी दी है।

यहाँ यह स्पष्ट करना ज़रूरी है कि मामले से जुड़े आरोपों, पुलिस कार्रवाई और अदालत में दोषसिद्धि के बीच फ़र्क़ होता है। अंतिम अपराध साबित होना न्यायिक प्रक्रिया पर निर्भर करता है। इसलिए किसी भी व्यक्ति के बारे में अंतिम फ़ैसला अदालत के निर्णय के आधार पर ही किया जाना चाहिए।

लेकिन इस मामले का एक बड़ा सामाजिक पहलू भी है। सवाल सिर्फ़ एक घटना का नहीं, बल्कि उस सोच और लापरवाही का है जिसके चलते कुछ लोग सोशल मीडिया को किसी की इज़्ज़त से खेलने, उसे डराने या उससे नाजायज़ फ़ायदा उठाने का ज़रिया समझ बैठते हैं। ऐसी हरकतें किसी भी सूरत में क़ाबिले-क़ुबूल नहीं हो सकतीं।

बिरादरी के नाम पर तक़रीर करने से पहले अपने घर की ज़िम्मेदारी भी समझें

मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी के तमाम बुज़ुर्गों, वालिदैन, नौजवानों और समाजी तंजीमों से एक संजीदा अपील है कि बिरादरी की तरक़्क़ी, इत्तेहाद और इस्लाह की बातें ज़रूर करें, लेकिन इसके साथ अपने घरों की हालत, बच्चों की तरबियत और परिवारों के माहौल पर भी पूरी तवज्जोह दें।

आज कुछ लोग बिरादरी के व्हाट्सऐप ग्रुपों में घंटों एक-दूसरे की कमियां निकालने, कमेटियों पर तनक़ीद करने और मुख़्तलिफ़ तंजीमों के दरमियान तनाज़े को बढ़ाने में अपनी क़ीमती ऊर्जा खर्च करते हैं। इख़्तिलाफ़ होना कोई नई बात नहीं है। हर समाज में राय का फ़र्क़ हो सकता है और तंजीमों के कामकाज पर सवाल उठाना भी जायज़ है, बशर्ते बातचीत तहज़ीब, दलील और शालीनता के दायरे में हो।

मगर ग़ौर करने की बात यह है कि अगर हम रोज़ाना कई घंटे बिरादरी के ग्रुपों में दूसरों की ग़लतियाँ तलाशने में लगा रहे हैं, तो क्या हमारे पास अपने बच्चों के साथ बैठने, उनकी बातें सुनने, उनकी परेशानियाँ समझने और उनकी रहनुमाई करने का वक़्त भी है?

बिरादरी की इस्लाह का आग़ाज़ अपने घर से होना चाहिए। अपने बच्चों को अच्छा इंसान बनाना, उन्हें सही और ग़लत की पहचान कराना, दूसरों की इज़्ज़त करना सिखाना और उन्हें डिजिटल दुनिया के ख़तरों से आगाह करना भी समाजी ख़िदमत का ही हिस्सा है।

याद रखिए, बिरादरी की मज़बूती सिर्फ़ बड़े-बड़े दावों और व्हाट्सऐप पर लिखे पैग़ामों से नहीं आती; इसकी बुनियाद अच्छे अख़लाक़, बेहतर तरबियत और ज़िम्मेदार परिवारों से बनती है।

वालिदैन से ख़ास गुज़ारिश: बच्चों को वक़्त दें, सिर्फ़ नसीहत नहीं

आज के दौर में बच्चों के हाथों में मोबाइल फोन बहुत कम उम्र में आ जाता है। ऑनलाइन गेमिंग, इंस्टाग्राम, फेसबुक, व्हाट्सऐप और दूसरे डिजिटल प्लेटफॉर्म उनके रोज़मर्रा के मामूल का हिस्सा बन चुके हैं। ऐसे में वालिदैन की ज़िम्मेदारी पहले से कहीं ज़्यादा बढ़ गई है।

माँ-बाप को चाहिए कि वे अपने बच्चों की ज़िंदगी से बेख़बर न रहें। उनके दोस्तों, ऑनलाइन गतिविधियों, पढ़ाई, रोज़गार और रोज़मर्रा की परेशानियों के बारे में जानकारी रखें। इसका मतलब यह नहीं कि हर बच्चे को शक की निगाह से देखा जाए या उसकी हर बात पर पाबंदी लगा दी जाए। बल्कि ऐसा माहौल बनाया जाए कि बच्चा किसी परेशानी, ग़लती, धमकी या ब्लैकमेलिंग का शिकार होने पर सबसे पहले अपने वालिदैन से बात करने में महफ़ूज़ महसूस करे।

बच्चों से मोहब्बत के साथ बातचीत करें। उन्हें समझाएँ कि इंटरनेट पर हर शख़्स भरोसे के क़ाबिल नहीं होता। फर्ज़ी नाम, नक़ली तस्वीरें और झूठी पहचान बनाकर लोग दूसरों को अपने जाल में फँसाने की कोशिश कर सकते हैं।

वालिदैन अपने बच्चों को यह भी समझाएँ कि किसी अनजान व्यक्ति के साथ निजी तस्वीरें, वीडियो, घर का पता, स्कूल-कॉलेज की जानकारी, ओटीपी या दूसरी संवेदनशील जानकारी साझा न करें। अगर कोई धमकी दे, पैसों की मांग करे या तस्वीरें वायरल करने की बात कहे, तो डरकर उसकी बात मानने के बजाय तुरंत किसी भरोसेमंद बड़े और ज़रूरत पड़ने पर पुलिस से मदद लें।

बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा के लिए घर में साफ़ और उम्र के मुताबिक़ नियम तय किए जा सकते हैं। स्क्रीन टाइम, रात के वक़्त मोबाइल के इस्तेमाल और अनजान लोगों से ऑनलाइन राब्ते के बारे में परिवार में खुलकर बात होनी चाहिए।

मोबाइल की सुरक्षा के नाम पर बच्चों को बेइज़्ज़त करना, मारपीट करना या उनकी निजता को बिला वजह कुचलना सही रास्ता नहीं है। बेहतर तरीका भरोसा, समझदारी, निगरानी और खुली बातचीत का है।

नौजवानों से अपील: मोबाइल आपकी सहूलत है, किसी की ज़िंदगी बर्बाद करने का हथियार नहीं

मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी के तमाम नौजवानों से भी गुज़ारिश है कि वे अपनी डिजिटल ज़िंदगी को संजीदगी से लें। सोशल मीडिया पर किसी के नाम से फर्ज़ी आईडी बनाना, किसी की तस्वीर के साथ छेड़छाड़ करना, एआई की मदद से नक़ली अश्लील तस्वीरें तैयार करना, किसी को बदनाम करने की धमकी देना या पैसे वसूलने की कोशिश करना महज़ मज़ाक नहीं, बल्कि गंभीर और संभावित रूप से दंडनीय हरकतें हैं।

किसी लड़की या महिला की इज़्ज़त से खेलना, उसे डराना या उसकी निजी जानकारी का ग़लत इस्तेमाल करना न इंसानियत के मुताबिक़ है और न ही इस्लामी अख़लाक़ के मुताबिक़।

कुरआन-ए-करीम में दूसरों की तौहीन, बदगुमानी और ग़ीबत से बचने की तालीम दी गई है। हदीस की तालीम भी मुसलमान को अपनी ज़बान और अमल से दूसरों को महफ़ूज़ रखने की तरफ़ रहनुमाई करती है। लिहाज़ा एक मुसलमान नौजवान को चाहिए कि वह अपने किरदार, अपनी ज़बान और अपने डिजिटल अमल से दूसरों के लिए अमन और इत्मीनान का सबब बने।

नौजवानों को यह भी समझना चाहिए कि ऑनलाइन की गई हरकत का असर सिर्फ़ स्क्रीन तक महदूद नहीं रहता। किसी की तस्वीर या वीडियो का ग़लत इस्तेमाल उसकी मानसिक हालत, पढ़ाई, नौकरी, रिश्तों और पूरे परिवार पर गहरा असर डाल सकता है।

अगर कोई शख़्स किसी दूसरे की तस्वीर या वीडियो से छेड़छाड़ करता है, तो यह सोच लेना कि तकनीक की मदद से पहचान छिप जाएगी, ख़तरनाक ग़लतफ़हमी है। डिजिटल गतिविधियों की जाँच की जा सकती है और शिकायत मिलने पर क़ानूनी कार्रवाई भी हो सकती है।

मोबाइल का पासवर्ड और डिजिटल सुरक्षा: भरोसा भी, ज़िम्मेदारी भी

अक्सर घरों में बच्चों के मोबाइल इस्तेमाल को लेकर मतभेद पैदा होते हैं। कुछ वालिदैन चाहते हैं कि बच्चों के फोन का पासवर्ड उन्हें मालूम हो, जबकि नौजवान अपनी निजता को अहमियत देते हैं।

इस मसले का बेहतर हल आपसी भरोसे और ज़िम्मेदारी में है। परिवारों में यह सहमति बनाई जा सकती है कि नाबालिग बच्चों के मोबाइल और ऑनलाइन खातों की सुरक्षा के लिए वालिदैन को मुनासिब जानकारी और निगरानी का अधिकार हो। नौजवान भी अपने घरवालों के साथ ऐसा भरोसेमंद रिश्ता बनाएँ कि किसी परेशानी की सूरत में मदद लेने से न हिचकिचाएँ।

हर परिवार अपनी परिस्थितियों के मुताबिक़ नियम बना सकता है। लेकिन यह याद रहे कि पासवर्ड जान लेना ही अच्छी तरबियत की गारंटी नहीं है। असल मक़सद बच्चों में ऐसी समझ पैदा करना है कि वे वालिदैन की मौजूदगी में भी और उनकी गैरमौजूदगी में भी सही रास्ता चुनें।

अपने मोबाइल पर मज़बूत पासवर्ड रखें, दो-स्तरीय सुरक्षा (टू-फैक्टर ऑथेंटिकेशन) चालू करें और अनजान लिंक पर क्लिक करने से बचें। सोशल मीडिया की प्राइवेसी सेटिंग्स दुरुस्त रखें तथा अपनी निजी तस्वीरों और जानकारी को महफ़ूज़ रखें।

याद रहे, एहतियात कमज़ोरी नहीं, बल्कि अक़्लमंदी की निशानी है।

बहन-बेटियों के रिश्ते और घर-परिवार: मशवरा दें, मगर दबाव नहीं

हमारे समाज में शादी-ब्याह और घर-गृहस्थी को बहुत अहमियत हासिल है। परिवारों के बीच रिश्ते जोड़ना, नए घर बसाना और आपसी मोहब्बत को बढ़ावा देना एक नेक समाजी काम है। मगर शादी के बाद किसी बेटी को पेश आने वाली परेशानी को नज़रअंदाज़ करना या हर हाल में उसे ससुराल भेजने पर ज़ोर देना भी सही नहीं।

अगर किसी बहन या बेटी के वैवाहिक जीवन में तनाव पैदा हो, तो वालिदैन और बुज़ुर्गों को चाहिए कि वे उसकी बात इत्मीनान से सुनें। दोनों पक्षों की बात समझें और ज़रूरत पड़ने पर किसी समझदार, निष्पक्ष काउंसलर या भरोसेमंद विशेषज्ञ से मशवरा लें।

बेटियों को सिर्फ़ यह कह देना कि हर हाल में घर बचाओ, पर्याप्त नहीं है। उन्हें अपने हक़ूक़, अपनी सुरक्षा, इज़्ज़त और ज़िम्मेदारियों के बारे में भी समझाया जाना चाहिए। इसी तरह बेटों को भी अपनी बीवी के हक़ूक़, सम्मान, भावनाओं और घरेलू ज़िम्मेदारियों की अहमियत समझनी चाहिए।

किसी रिश्ते को बचाने की कोशिश तभी बेहतर नतीजा दे सकती है जब दोनों पक्ष इज़्ज़त, अमन और सुधार की नीयत से आगे बढ़ें। अगर किसी घर में हिंसा, ज़बरदस्ती, गंभीर उत्पीड़न या सुरक्षा का ख़तरा हो, तो पीड़ित को महज़ समाज के डर से उसी माहौल में रहने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए। ऐसी सूरत में पहले सुरक्षा और ज़रूरी क़ानूनी मदद को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

बेटी को मायके में सहारा देना उसकी नाकामी नहीं, बल्कि वालिदैन की मोहब्बत और ज़िम्मेदारी है। उसी तरह रिश्तों में मामूली मतभेदों को समझदारी से हल करने की कोशिश करना भी अहम है। मक़सद किसी को दबाना नहीं, बल्कि घरों में इज़्ज़त, सुकून और इंसाफ़ क़ायम करना होना चाहिए।

एआई और फर्ज़ी तस्वीरों का ख़तरा: हर घर तक पहुँचाएँ जागरूकता

पहले किसी की तस्वीर का ग़लत इस्तेमाल करने के लिए अलग-अलग तस्वीरों को जोड़ना या उनमें बदलाव करना पड़ता था। अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मदद से ऐसी तस्वीरें और वीडियो तैयार किए जा सकते हैं जो देखने में असली लगें, जबकि उनका वास्तविकता से कोई ताल्लुक़ न हो।

इस तकनीक का इस्तेमाल इल्म, कारोबार, तालीम और रचनात्मक कामों में फ़ायदेमंद हो सकता है। लेकिन किसी की इजाज़त के बग़ैर उसकी तस्वीर से अश्लील सामग्री बनाना, उसे फैलाना या ऐसी सामग्री के ज़रिये ब्लैकमेल करना बेहद गंभीर मामला है।

समाज को यह बात समझनी होगी कि इंटरनेट पर दिखाई देने वाली हर तस्वीर सच नहीं होती। किसी व्यक्ति के बारे में कोई तस्वीर, वीडियो या स्क्रीनशॉट सामने आए तो उसकी तस्दीक़ किए बग़ैर उसे आगे भेजना या उसके आधार पर किसी की इज़्ज़त पर हमला करना ग़लत है।

अगर किसी के साथ ऐसी हरकत होती है, तो उसे शर्मिंदगी या बदनामी के डर से ख़ामोश रहने की ज़रूरत नहीं। धमकी देने वाले को पैसे देना समस्या का स्थायी हल नहीं है। उपलब्ध चैट, प्रोफ़ाइल लिंक, संदेश, तारीख़ और दूसरे सबूत सुरक्षित रखें। आपत्तिजनक सामग्री को आगे साझा न करें और संबंधित प्लेटफॉर्म तथा साइबर अपराध शिकायत व्यवस्था के ज़रिये मदद लें।

अगर कोई ब्लैकमेलिंग का शिकार हो जाए तो क्या करे?

ऐसी स्थिति में घबराहट और बदनामी का डर इंसान को ग़लत फ़ैसले लेने पर मजबूर कर सकता है। इसलिए परिवारों और नौजवानों को कुछ ज़रूरी बातें मालूम होनी चाहिए:

  1. ब्लैकमेलर की मांग पूरी न करें: पैसे देने या उसकी दूसरी शर्तें मानने से वह दोबारा मांग कर सकता है।
  2. सबूत सुरक्षित रखें: चैट, यूज़रनेम, प्रोफ़ाइल लिंक, धमकी भरे संदेश और भुगतान संबंधी जानकारी का रिकॉर्ड रखें।
  3. खाते की सुरक्षा बढ़ाएँ: पासवर्ड बदलें, दो-स्तरीय सुरक्षा चालू करें और संदिग्ध खातों की रिपोर्ट करें।
  4. भरोसेमंद व्यक्ति को बताएँ: पीड़ित को अकेला न छोड़ें और उसकी बात को संजीदगी से सुनें।
  5. पुलिस या साइबर अपराध व्यवस्था से संपर्क करें: भारत में साइबर अपराध की शिकायत के लिए आधिकारिक पोर्टल cybercrime.gov.in का इस्तेमाल किया जा सकता है। तत्काल पुलिस सहायता की ज़रूरत हो तो 112 पर संपर्क किया जा सकता है।
  6. पीड़ित की पहचान महफ़ूज़ रखें: उसकी तस्वीरें, निजी संदेश या पहचान उजागर करने वाली जानकारी को सोशल मीडिया पर वायरल न करें।

खास तौर पर लड़कियों और महिलाओं के मामलों में परिवार का रवैया बेहद अहम है। अगर पीड़िता को ही दोषी ठहराया जाएगा, तो वह आगे मदद लेने से डर सकती है। इसलिए परिवार को उसके साथ खड़ा होना चाहिए और दोषी की जवाबदेही तय कराने में उसका साथ देना चाहिए।

बिरादरी के बुज़ुर्गों और तंजीमों के ज़िम्मेदारों से भी अपील

मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी की समाजी तंजीमों, कमेटियों, पंचायतों और ज़िम्मेदार शख़्सियतों को चाहिए कि वे सिर्फ़ इजलास, जलसों और तंजीमी सरगर्मियों तक अपनी ज़िम्मेदारी महदूद न रखें।

अपने-अपने इलाक़ों में डिजिटल सुरक्षा, नौजवानों की तरबियत, घरेलू रिश्तों की बेहतरी और महिलाओं के हक़ूक़ पर जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जाएँ। वालिदैन और नौजवानों के लिए ऐसे प्रोग्राम हों जिनमें उन्हें बताया जाए कि सोशल मीडिया का सुरक्षित इस्तेमाल कैसे किया जाए और ब्लैकमेलिंग या ऑनलाइन उत्पीड़न की स्थिति में मदद कहाँ से मिलेगी।

बिरादरी के व्हाट्सऐप ग्रुपों को भी सकारात्मक कामों के लिए इस्तेमाल किया जाए। एक-दूसरे की तौहीन, बेबुनियाद इल्ज़ामात और तंजीमी खींचतान के बजाय तालीम, रोज़गार, कारोबार, स्वास्थ्य, क़ानूनी जागरूकता और बच्चों की तरबियत पर बातचीत हो।

अगर कोई कमेटी समाज के लिए काम कर रही है, तो उसके काम का जायज़ा दलील और शालीनता के साथ लिया जा सकता है। लेकिन तंजीमी इख़्तिलाफ़ को इस हद तक न बढ़ाया जाए कि अपने घर, अपने बच्चे और अपनी पारिवारिक ज़िम्मेदारियाँ पीछे छूट जाएँ।

बिरादरी के हर ज़िम्मेदार व्यक्ति को ख़ुद से सवाल करना चाहिए कि वह समाज में नफ़रत बढ़ा रहा है या सुधार का रास्ता खोल रहा है।

वालिदैन के नाम एक ख़ास पैग़ाम

ऐ तमाम माँ-बाप! आपकी औलाद अल्लाह की तरफ़ से एक अमानत है। उसे सिर्फ़ अच्छा पहनाना, अच्छा खिलाना, स्कूल-कॉलेज भेजना और कारोबार के क़ाबिल बनाना ही आपकी ज़िम्मेदारी नहीं। उसे अच्छा इंसान बनाना, दूसरों की इज़्ज़त करना सिखाना, सही और ग़लत की पहचान कराना और मुश्किल वक़्त में उसका सहारा बनना भी उतना ही ज़रूरी है।

अपने बेटों को सिखाएँ कि किसी की बेटी भी किसी की अमानत और इज़्ज़त है। किसी महिला को परेशान करना, उसका पीछा करना, उसकी तस्वीरों का ग़लत इस्तेमाल करना या उसे धमकी देना मर्दानगी नहीं, बल्कि अख़लाक़ी गिरावट है।

अपनी बेटियों को भी डिजिटल सुरक्षा, आत्मसम्मान, अपने हक़ूक़ और मुश्किल हालात में मदद माँगने के तरीक़ों से आगाह करें। उन्हें ऐसा भरोसा दें कि वे किसी परेशानी को छिपाने के बजाय आपके सामने खुलकर रख सकें।

बच्चों की दोस्ती, पढ़ाई, संगत और ऑनलाइन गतिविधियों में दिलचस्पी लें, मगर उनकी हर बात को शक की नज़र से देखने के बजाय उन्हें समझने की कोशिश करें। घर में ऐसा माहौल बनाइए जहाँ नसीहत के साथ मोहब्बत हो, अनुशासन के साथ इंसाफ़ हो और ग़लती पर सुधार का मौक़ा भी मिले।

अगर हम अपने घरों में बेहतर तरबियत, आपसी भरोसा और ज़िम्मेदारी का माहौल क़ायम कर लें, तो बहुत-सी परेशानियों से बचाव मुमकिन है।

आख़िरी गुज़ारिश: किसी एक घटना को पूरी बिरादरी की पहचान न बनने दें

खतौली की इस घटना को लेकर पूरे खतौली शहर या पूरी मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी को इल्ज़ाम देना दुरुस्त नहीं होगा। किसी एक व्यक्ति के कथित अमल को पूरी क़ौम की पहचान नहीं बनाया जाना चाहिए। मगर ऐसी घटना से सबक़ लेना और भविष्य में इस तरह के वाक़ियात की रोकथाम के लिए कोशिश करना हर घर और समाज की साझा ज़िम्मेदारी है।

हमें अपने बच्चों को सिर्फ़ कामयाब कारोबारी, इंजीनियर, डॉक्टर या पेशेवर नहीं बनाना, बल्कि उन्हें ईमानदार, बा-अख़लाक़, ज़िम्मेदार और दूसरों के हक़ूक़ का एहतराम करने वाला इंसान भी बनाना है।

बिरादरी की इज़्ज़त सिर्फ़ नाम और पहचान से नहीं, बल्कि उसके अफ़राद के किरदार, इल्म, अख़लाक़ और समाज के प्रति ज़िम्मेदारी से बनती है।

आइए, आज यह अहद करें कि हम दूसरों की कमियाँ गिनाने से पहले अपने घरों की ज़िम्मेदारियाँ पूरी करेंगे; बिरादरी के ग्रुपों में तनाज़े बढ़ाने के बजाय इस्लाह की बात करेंगे; अपने बच्चों को मोबाइल देंगे तो उसके सही इस्तेमाल की तालीम भी देंगे; और किसी बहन-बेटी या परिवार के साथ परेशानी पेश आने पर तौहीन करने के बजाय इंसाफ़ और मदद का रास्ता अपनाएँगे।

खतौली जैसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए सिर्फ़ अफ़सोस करना काफ़ी नहीं। हमें अपने घरों, अपनी तरबियत, अपने रवैये और अपनी समाजी ज़िम्मेदारियों में सकारात्मक बदलाव लाना होगा।

यही हमारे घरों की हिफ़ाज़त, हमारी बिरादरी की बेहतरी और आने वाली नस्लों के महफ़ूज़ मुस्तक़बिल की बुनियाद है।


प्रस्तुति: मुल्तानी समाज — राष्ट्रीय समाचार पत्रिका, न्यूज़ पोर्टल एवं यूट्यूब चैनल

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार से पंजीकृत, मुल्क की राजधानी नई दिल्ली से प्रसारित, पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी की क़ौमी समाचार पत्रिका “मुल्तानी समाज” के लिए उत्तर प्रदेश डेस्क से प्रधान संपादक ज़मीर आलम की ख़ास रिपोर्ट।

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🥀 इंतिक़ाल की दर्दनाक ख़बर: कोटा के अब्दुल सलाम साहब का इंतिक़ाल, बिरादरी में ग़म की लहर

इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन।

मरहूम अब्दुल ग़फ़्फ़ार मोटियार साहब (छावनी वाले) के बड़े फ़र्ज़ंद जनाब अब्दुल सलाम साहब ने दुनिया-ए-फ़ानी को कहा अलविदा; अल्लाह तआला मरहूम की मग़फ़िरत फ़रमाए और तमाम अहल-ए-ख़ाना को सब्र-ए-जमील अता फ़रमाए। आमीन या रब्बुल आलमीन।

कोटा, राजस्थान। निहायत ही रंज-ओ-ग़म और दिली अफ़सोस के साथ तमाम बिरादराना हज़रात को इत्तिला दी जाती है कि आज दिन बुध, बा-तारीख़ 21 अक्टूबर 2026 को राजस्थान के शहर कोटा में मरहूम जनाब अब्दुल ग़फ़्फ़ार मोटियार साहब (छावनी वाले) के बड़े फ़र्ज़ंद, जनाब अब्दुल सलाम साहब का क़ज़ा-ए-इलाही से इंतिक़ाल हो गया है।

इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन। बेशक हम सब अल्लाह ही के हैं और उसी की तरफ़ लौटकर जाने वाले हैं।

जनाब अब्दुल सलाम साहब के इंतिक़ाल की ख़बर से उनके अहल-ए-ख़ाना, अज़ीज़-ओ-अक़ारिब, दोस्तों, अहबाब और मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी में ग़म और अफ़सोस की लहर दौड़ गई है। इस मुश्किल घड़ी में मरहूम के तमाम घर वालों और रिश्तेदारों के साथ हमारी दिली हमदर्दी और ताज़ियत है।

🥀 कोटा शहर के क़ब्रिस्तान में होगी तदफ़ीन

मिली जानकारी के मुताबिक़, मरहूम जनाब अब्दुल सलाम साहब की मैय्यत को आज दिन जुमेरात बा - तारीख़ 22 अक्टूबर 2026 को चाँदघाटा कब्रिस्तान कोटा, राजस्थान में सुपुर्द-ए-ख़ाक किया जाएगा। 

तमाम बिरादराना हज़रात से गुज़ारिश है कि जनाज़े में शिरकत फ़रमाएँ, मरहूम के लिए दुआ-ए-मग़फ़िरत करें और उनके अहल-ए-ख़ाना को इस सदमे को बर्दाश्त करने के लिए सब्र की तौफ़ीक़ अता फ़रमाने की दुआ करें।

🤲 मरहूम की मग़फ़िरत के लिए दुआ

या अल्लाह! जनाब अब्दुल सलाम साहब की मुकम्मल मग़फ़िरत फ़रमा। उनकी तमाम ख़ताओं और कोताहियों को माफ़ फ़रमा, उनकी क़ब्र को नूर से मुनव्वर फ़रमा और उसे जन्नत के बाग़ों में से एक बाग़ बना दे।

ऐ अल्लाह! उनकी क़ब्र को वसीअ फ़रमा, उसमें राहत, सुकून और रौशनी अता फ़रमा। क़ब्र की तन्हाई को अपनी रहमत से दूर फ़रमा और मरहूम को सवालात-ए-क़ब्र के वक़्त साबित-क़दम रख।

या रब्बुल आलमीन! मरहूम को जन्नतुल फ़िरदौस में आला मक़ाम अता फ़रमा, उनके दरजात बुलंद फ़रमा और उन्हें अपने महबूब हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा ﷺ की शफ़ाअत नसीब फ़रमा।

ऐ अल्लाह! मरहूम के वालिद मरहूम जनाब अब्दुल ग़फ़्फ़ार मोटियार साहब के फ़र्ज़ंद की इस जुदाई पर तमाम घर वालों, अहल-ए-ख़ाना, अज़ीज़-ओ-अक़ारिब और चाहने वालों को सब्र-ए-जमील अता फ़रमा। उनके दिलों को सुकून दे और इस ग़म को बर्दाश्त करने की हिम्मत अता फ़रमा।

आमीन सुम्मा आमीन, या रब्बुल आलमीन।

🤲 नमाज़-ए-जनाज़ा और मैय्यत को सुपुर्द-ए-ख़ाक करने की दुआएँ

मुसलमान भाइयों से गुज़ारिश है कि जनाज़े में शरीक होकर सुन्नत के मुताबिक़ नमाज़-ए-जनाज़ा अदा करें और मरहूम के लिए ख़ुलूस-ए-दिल से मग़फ़िरत की दुआ करें।

नमाज़-ए-जनाज़ा में चौथी तकबीर के बाद सलाम फेरने से पहले यह दुआ पढ़ी जा सकती है:

اللَّهُمَّ لَا تَحْرِمْنَا أَجْرَهُ وَلَا تَفْتِنَّا بَعْدَهُ وَاغْفِرْ لَنَا وَلَهُ

तर्जुमा: ऐ अल्लाह! हमें उनके अज्र से महरूम न फ़रमा, उनके बाद हमें आज़माइश में न डाल और हमारी तथा उनकी मग़फ़िरत फ़रमा।

मैय्यत को क़ब्र में उतारते वक़्त यह दुआ पढ़ना मस्नून है:

بِسْمِ اللَّهِ وَعَلَى مِلَّةِ رَسُولِ اللَّهِ ﷺ

तर्जुमा: अल्लाह के नाम के साथ और रसूलुल्लाह ﷺ के दीन और तरीक़े पर।

क़ब्र में मैय्यत को रखने के बाद अल्लाह तआला से उसकी मग़फ़िरत, साबित-क़दमी और रहमत की दुआ की जाए।

दफ़्न के बाद मरहूम के लिए यह दुआ करें:

اللَّهُمَّ اغْفِرْ لَهُ وَثَبِّتْهُ عِنْدَ السُّؤَالِ

तर्जुमा: ऐ अल्लाह! इनकी मग़फ़िरत फ़रमा और सवाल के वक़्त इन्हें साबित-क़दम रख।

अल्लाह तआला मरहूम की क़ब्र को नूर से भर दे, उनकी आख़िरत आसान फ़रमाए और उन्हें अपनी बेपनाह रहमत के साये में जगह अता फ़रमाए। आमीन।

नोट: जनाज़े के वक़्त और दफ़्न की जगह के संबंध में अंतिम जानकारी की तस्दीक़ के बाद ही आगे प्रसारित करें।


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🌹 मुस्लिम मुल्तानी लोहार बिरादरी में निकाह की पुरमस्सरत इत्तिला 🌹

मोहम्मद रज़ा की शादी शाहीना बानो से 2 जनवरी 2027 को उदयपुर में होगी; खानदान में खुशी का माहौल

بِسْمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيْمِ

الصَّلَاةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُولَ اللّٰهِ ﷺ

अस्सलामु अलैकुम व रहमतुल्लाहि व बरकातुहू!

तमाम मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरान की ख़िदमत में अदब व एहतराम के साथ एक पुरमस्सरत इत्तिला पेश की जाती है कि अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त के फ़ज़्लो करम, हुज़ूर नबी करीम ﷺ के सदक़े और वालिदैन की दुआओं से उस्ता खानदान में निकाह की खुशियों का मुबारक मौक़ा आने वाला है।

खानदान के बुज़ुर्ग मरहूम हज़रत मोहम्मद इस्माइल उस्ता के पोते और जनाब साबिर हुसैन उस्ता के फ़रज़ंद मोहम्मद रज़ा का निकाह, जनाब अब्दुल ग़फ़्फ़ार साहब मोटियार, उदयपुर की नेक सीरत बेटी शाहीना बानो के साथ तय पाया है। यह पुरमस्सरत तक़रीब 2 जनवरी 2027, बरोज़ शनिचर, बाद नमाज़-ए-अस्र, राजस्थान के शहर उदयपुर में मुनअक़िद होगी।

इस मुबारक मौक़े पर उस्ता खानदान की जानिब से तमाम अज़ीज़ो-अक़ारिब, रिश्तेदारों, दोस्तों और मुस्लिम मुल्तानी लोहार बिरादरी के तमाम हज़रात को इस ख़ुशी में शरीक होने की दावत दी जाती है।

🌹 निकाह की तफ़सील 🌹

  • दूल्हा: मोहम्मद रज़ा
  • वालिद: जनाब साबिर हुसैन उस्ता
  • दुल्हन: शाहीना बानो
  • वालिद: जनाब अब्दुल ग़फ़्फ़ार साहब मोटियार
  • तारीख़-ए-निकाह: 2 जनवरी 2027, बरोज़ शनिचर
  • वक़्त: बाद नमाज़-ए-अस्र
  • मक़ाम: नया RTO ऑफिस रोड के पास, रूप नगर कच्ची बस्ती, उदयपुर, राजस्थान।

🌹 दुआगो व दावत देने वाले 🌹

साबिर हुसैन, जाकिर हुसैन और आबिद हुसैन

मरहूम मोहम्मद इस्माइल उस्ता और मरहूम नासिर हुसैन उस्ता के खानदान के तमाम अफ़राद की जानिब से इस मुबारक तक़रीब में शिरकत की पुरख़ुलूस दावत पेश की जाती है।

🌹 उस्ता खानदान के अफ़राद 🌹

जाहिद हुसैन, शाहिद हुसैन, आकिब हुसैन, इसरार अहमद, मोहम्मद जुनैद, मोहम्मद अनस और मोहम्मद जुबैर समेत खानदान के तमाम अफ़राद इस ख़ुशी के मौक़े पर अपनी नेक तमन्नाओं और दुआओं के साथ शामिल हैं।

🌹 नूर-ए-चश्म 🌹

मोहम्मद रेहान, मोहम्मद अदनान, मोहम्मद साद, मोहम्मद जैद, मोहम्मद मुदस्सिर, मोहम्मद रियान, मोहम्मद शायन, मोहम्मद हम्ज़ा और मोहम्मद सफ़वान।

🌹 नन्ही इल्तिजा 🌹

सारा नूर और मोहम्मद सफ़वान की जानिब से भी इस मुबारक मौक़े पर तमाम हज़रात की दुआओं और नेक ख़्वाहिशात का इस्तिक़बाल है।

🤲 दुआओं की दरख़्वास्त 🤲

अल्लाह तआला से दुआ है कि वह इस निकाह को दोनों खानदानों के लिए ख़ैर व बरकत, खुशी और रहमत का ज़रिया बनाए। दूल्हा-दुल्हन की ज़िंदगी को मोहब्बत, मवद्दत, रहमत, सुकून और ख़ुशहाली से भर दे। दोनों को एक-दूसरे के हुक़ूक़ अदा करने, नेक रास्ते पर चलने और दीन व दुनिया की भलाइयाँ हासिल करने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए।

अल्लाह तआला इस नए सफ़र को मुबारक फ़रमाए, दोनों को सलामती के साथ ज़िंदगी गुज़ारने और नेक व सालेह औलाद से नवाज़े। आमीन या रब्बुल आलमीन!


📰 मुल्तानी समाज — राष्ट्रीय समाचार पत्रिका की ख़ास रिपोर्ट

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार से पंजीकृत, नई दिल्ली से प्रसारित मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी की क़ौमी समाचार पत्रिका, न्यूज़ पोर्टल और यूट्यूब चैनल ‘मुल्तानी समाज’ के लिए उत्तर प्रदेश डेस्क से प्रधान संपादक ज़मीर आलम की ख़ास रिपोर्ट।

‘मुल्तानी समाज’ की जानिब से मोहम्मद रज़ा और शाहीना बानो को निकाह की पेशगी मुबारकबाद और दोनों खानदानों को दिली मुबारकबाद पेश की जाती है। दुआ है कि यह मुबारक रिश्ता दोनों परिवारों के लिए हमेशा ख़ुशियों, इज़्ज़त, आपसी मोहब्बत और बरकत का सबब बना रहे।

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इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन बड़ौत में 19 वर्षीय मोहम्मद आरिश का इंतिक़ाल, गुलाब नबी साहब के पोते के रुख़्सत होने से बिरादरी में ग़म की लहर

लंबी बीमारी के बाद आज सुबह 7 बजे ली आख़िरी साँस, अल्लाह तआला मरहूम की मग़फ़िरत फ़रमाए और तमाम पसमांदगान को सब्र-ए-जमील अता फ़रमाए — आमीन या रब्बुल आलमीन।

बड़ौत, ज़िला बागपत (उत्तर प्रदेश)।
निहायत ही रंज-ओ-ग़म और दिली अफ़सोस के साथ तमाम मुस्लिम मुल्तानी लोहार, बढ़ई बिरादराना हज़रात को इत्तिला दी जाती है कि आज बरोज़ बुध, बा-तारीख़ 21 अक्टूबर 2026 को गली नम्बर 6, गुराना रोड, क़स्बा बड़ौत, ज़िला बागपत, उत्तर प्रदेश के साकिन, जनाब गुलाब नबी साहब डूडूखेड़ा वालों के पोते और जनाब मोहम्मद मैनुद्दीन साहब के फ़रज़ंद, लगभग 19 वर्षीय मोहम्मद आरिश साहब का तवील बीमारी के चलते आज सुबह क़रीब 7 बजे क़ज़ा-ए-इलाही से इंतिक़ाल हो गया है।

इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन।

बेशक हम सब अल्लाह ही के हैं और उसी की तरफ़ हमें लौटकर जाना है। यह दुनिया फ़ानी है और मौत एक ऐसी हक़ीक़त है जिससे किसी को फ़रार नहीं। मगर कमसिनी में किसी नौजवान का दुनिया-ए-फ़ानी से रुख़्सत हो जाना वालिदैन, अहल-ए-ख़ाना, अज़ीज़-ओ-अक़ारिब और तमाम चाहने वालों के लिए बेहद दर्दनाक सदमा होता है। मोहम्मद आरिश साहब के इंतिक़ाल की ख़बर से उनके घराने और बिरादरी के लोगों में ग़म और अफ़सोस की कैफ़ियत है।

इस मुश्किल घड़ी में दुआ है कि अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त अपने फ़ज़्ल-ओ-करम से मरहूम को अपनी बेपनाह रहमतों के साये में जगह अता फ़रमाए, उनकी तमाम ख़ताओं से दरगुज़र फ़रमाए और उनके घरवालों को इस सदमे को बर्दाश्त करने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए।

मरहूम की मग़फ़िरत के लिए ख़ुसूसी दुआ

ऐ अल्लाह! ऐ तमाम जहानों के परवरदिगार! तू बड़ा ग़फ़ूर-ओ-रहीम है। अपने महबूब हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा ﷺ के सदक़े में मरहूम मोहम्मद आरिश साहब की मुकम्मल मग़फ़िरत फ़रमा।

या अल्लाह! मरहूम पर अपनी ख़ास रहमत नाज़िल फ़रमा, उनकी लग़ज़िशों से दरगुज़र फ़रमा, उनकी नेकियों को क़ुबूल फ़रमा और उन्हें जन्नतुल फ़िरदौस में आला मक़ाम अता फ़रमा। उनकी क़ब्र को नूर से मुनव्वर फ़रमा और उसे जन्नत के बाग़ों में से एक बाग़ बना दे।

या अल्लाह! मरहूम के वालिदैन, दादा-दादी, तमाम घरवालों, रिश्तेदारों और अज़ीज़ों को सब्र-ए-जमील अता फ़रमा। उनके दिलों को सुकून दे, इस अज़ीम सदमे को बर्दाश्त करने की हिम्मत अता फ़रमा और उन्हें अपनी रहमत से मायूस न होने देना।

आमीन या रब्बुल आलमीन।

तदफ़ीन के वक़्त के मुताल्लिक़ अहम इत्तिला

ख़बर लिखे जाने तक मरहूम मोहम्मद आरिश साहब की नमाज़-ए-जनाज़ा और तदफ़ीन का वक़्त मालूम नहीं हो सका है। जैसे ही घरवालों या ज़िम्मेदार अफ़राद की तरफ़ से सही इत्तिला हासिल होगी, उसे ख़बर में अपडेट कर दिया जाएगा।

तमाम बिरादराना हज़रात से गुज़ारिश है कि तदफ़ीन के वक़्त की तस्दीक़शुदा इत्तिला हासिल होने पर जनाज़े में शरीक होकर मरहूम के लिए दुआ-ए-मग़फ़िरत करें और ग़मज़दा ख़ानदान के साथ ताज़ियत व दिलजोई का इज़हार फ़रमाएँ।

दफ़्न और क़ब्र में उतारने के वक़्त की मस्नून दुआएँ

जब किसी मुसलमान को क़ब्र में उतारा जाए, तो यह दुआ पढ़ना मस्नून है:

بِسْمِ اللّٰهِ وَعَلَىٰ مِلَّةِ رَسُولِ اللّٰهِ ﷺ

तर्जुमा: अल्लाह के नाम के साथ और रसूलुल्लाह ﷺ के दीन व तरीक़े पर।

दफ़्न के बाद मरहूम के लिए मग़फ़िरत और साबित-क़दमी की दुआ करनी चाहिए। रसूलुल्लाह ﷺ से साबित है कि आप ﷺ दफ़्न से फ़ारिग़ होने के बाद फ़रमाते थे कि अपने भाई के लिए मग़फ़िरत माँगो और उसके लिए साबित-क़दमी की दुआ करो, क्योंकि अब उससे सवाल किया जा रहा है।

इस मौक़े पर तमाम हाज़िरीन अपने हाथ उठाकर या दिल ही दिल में मरहूम के लिए दुआ करें:

اللّٰهُمَّ اغْفِرْ لَهُ وَارْحَمْهُ وَثَبِّتْهُ عِنْدَ السُّؤَالِ

तर्जुमा: ऐ अल्लाह! उनकी मग़फ़िरत फ़रमा, उन पर रहम फ़रमा और सवाल के वक़्त उन्हें साबित-क़दम रख।

क़ब्र पर मिट्टी डालते वक़्त की दुआ

क़ब्र पर मिट्टी डालते वक़्त क़ुरआन-ए-करीम की यह आयत याद रखना मुनासिब है:

مِنْهَا خَلَقْنَاكُمْ وَفِيهَا نُعِيدُكُمْ وَمِنْهَا نُخْرِجُكُمْ تَارَةً أُخْرَىٰ

तर्जुमा: इसी ज़मीन से हमने तुम्हें पैदा किया, इसी में तुम्हें लौटाएँगे और इसी से तुम्हें दोबारा निकालेंगे।
(सूरह ताहा, आयत 55)

क़ब्र पर मिट्टी डालते वक़्त इस आयत को पढ़ना अहल-ए-इल्म के यहाँ मअरूफ़ अमल है। इसे हर मिट्टी डालने वाले के लिए लाज़िमी या फ़र्ज़ न समझा जाए।

ऐ अल्लाह! इस मिट्टी को मरहूम के हक़ में सुकून और रहमत का ज़रिया बना। उनकी क़ब्र को तंगियों से महफ़ूज़ फ़रमा, उसे नूर से भर दे और क़यामत के दिन उन्हें अपने नेक बंदों के साथ उठाना।

आमीन सुम्मा आमीन।

बिरादराना हज़रात से ख़ुसूसी गुज़ारिश

तमाम मुस्लिम मुल्तानी लोहार, बढ़ई बिरादराना हज़रात से गुज़ारिश है कि इस ग़म की घड़ी में मरहूम के ख़ानदान को अपनी दुआओं में याद रखें। अल्लाह तआला हम सबको ईमान पर ज़िंदगी और ईमान पर ख़ातिमा नसीब फ़रमाए तथा हमारे तमाम मरहूमीन की मग़फ़िरत फ़रमाए।

इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन।


ख़ास रिपोर्ट — उत्तर प्रदेश डेस्क

ज़मीर आलम
प्रधान संपादक
“मुल्तानी समाज” राष्ट्रीय समाचार पत्रिका

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार से पंजीकृत, देश की राजधानी नई दिल्ली से प्रसारित, पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी की क़ौमी समाचार पत्रिका, न्यूज़ पोर्टल एवं यूट्यूब चैनल — “मुल्तानी समाज”

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Tuesday, October 20, 2026

मक्का मुकर्रमा की मस्जिद में कथित अश्लील हरकत के मामले में दो बांग्लादेशी नागरिकों को मौत की सज़ा-ए-इदाम दी गई

सोशल मीडिया पर शौहर-बीवी, आठ साल की बच्ची और हज यात्रियों से जुड़ी कहानियों की हक़ीक़त क्या है? जानिए सऊदी हुकूमत के एलान और बांग्लादेशी मीडिया की रिपोर्टों के आधार पर पूरी ख़बर

नई दिल्ली | मुल्तानी समाज विशेष रिपोर्ट

मस्जिदों की हुरमत, मुक़द्दस मक़ामात का अदब और सोशल मीडिया पर फैलने वाली ख़बरों की सच्चाई को लेकर एक अहम मामला चर्चा में है। सऊदी अरब के मक्का मुकर्रमा क्षेत्र में दो बांग्लादेशी नागरिकों को मस्जिद के अंदर कथित तौर पर अश्लील हरकत करने के मामले में अदालत से मौत की सज़ा सुनाए जाने के बाद 14 अक्टूबर 2026 को सज़ा-ए-इदाम दी गई। सऊदी अरब के गृह मंत्रालय के बयान के मुताबिक़, अदालत ने मामले की संगीनियत और वाक़िये के मुक़द्दस मक़ाम व वक़्त से जुड़े होने को सज़ा की वजह बताया।

हालाँकि, इस मामले को लेकर सोशल मीडिया पर कई तरह के दावे किए जा रहे हैं। कहीं दोनों को शौहर-बीवी बताया जा रहा है, कहीं उनके आठ साल की बच्ची होने का दावा किया जा रहा है, तो कहीं यह कहा जा रहा है कि वे हज के लिए सऊदी अरब गए थे और मस्जिद में एक-दूसरे को चूमने के कारण उन्हें मौत की सज़ा दी गई।

लेकिन इन तमाम दावों को एक ही साँस में सच मान लेना दुरुस्त नहीं होगा। उपलब्ध आधिकारिक बयान में न तो कथित हरकत की पूरी तफ़सील दी गई है और न ही दोनों के आपसी रिश्ते, निकाह या औलाद के बारे में कोई तस्दीक़ की गई है। लिहाज़ा, किसी भी अपुष्ट दावे को यक़ीनी हक़ीक़त बनाकर पेश करना पत्रकारिता के उसूलों के ख़िलाफ़ होगा।

कौन थे दोनों बांग्लादेशी नागरिक?

सऊदी अरब के गृह मंत्रालय के बयान और बांग्लादेशी मीडिया की रिपोर्टों में दोनों की पहचान नज़रुल इस्लाम अब्दुल बासिर और सिति अख़्तर के नाम से की गई है। कुछ रिपोर्टों में महिला का नाम स्वीटी अख़्तर भी लिखा गया है।

सऊदी गृह मंत्रालय के मुताबिक़, सुरक्षा अधिकारियों ने दोनों को गिरफ़्तार किया, तफ़्तीश के बाद मामला संबंधित अदालत में पेश किया गया और अदालत ने आरोप साबित होने पर मौत की सज़ा सुनाई। बाद में फ़ैसले को संबंधित न्यायिक प्राधिकरण से बरक़रार रखे जाने और शाही आदेश जारी होने के बाद 14 अक्टूबर 2026 को मक्का क्षेत्र में सज़ा लागू की गई।

इस मामले में एक अहम बात यह भी है कि बांग्लादेश के जेद्दा स्थित कॉन्सुलेट जनरल ने कहा कि उसे सज़ा लागू किए जाने से पहले इसकी इत्तिला नहीं दी गई थी। कॉन्सुलेट ने सऊदी अधिकारियों से औपचारिक जानकारी माँगी थी। इस पहलू ने मामले की क़ानूनी कार्रवाई और क़ौंसुलर जानकारी को लेकर भी सवाल खड़े किए हैं।

स्रोत: बांग्लादेशी समाचार पत्र द डेली स्टार और द बिज़नेस स्टैंडर्ड, 15–16 अक्टूबर 2026 की रिपोर्टें।

क्या दोनों शौहर-बीवी थे या गर्लफ्रेंड-बॉयफ्रेंड?

सोशल मीडिया पर इस मामले के साथ सबसे ज़्यादा चर्चा दोनों के आपसी रिश्ते को लेकर हो रही है। कुछ पोस्ट में उन्हें शादीशुदा जोड़ा बताकर यह दावा किया जा रहा है कि उनकी आठ साल की एक बेटी भी थी। दूसरी ओर, कुछ पोस्ट में उन्हें गर्लफ्रेंड और बॉयफ्रेंड कहा जा रहा है।

लेकिन उपलब्ध आधिकारिक बयान से इन दोनों में से किसी दावे की पुष्टि नहीं होती। इसलिए यह कहना कि वे निश्चित रूप से शौहर-बीवी थे या निश्चित रूप से गर्लफ्रेंड-बॉयफ्रेंड थे, अभी उपलब्ध जानकारी से आगे बढ़कर दावा करना होगा।

इसी तरह, यह कहना भी सही नहीं होगा कि उन्हें केवल एक-दूसरे को चूमने की वजह से मौत की सज़ा दी गई। सऊदी अधिकारियों ने कथित हरकत को अश्लील या अनैतिक कृत्य बताया है, लेकिन उसकी सटीक प्रकृति का सार्वजनिक रूप से विस्तृत ब्योरा नहीं दिया है।

सऊदी अरब में मौत की सज़ा क्यों दी गई?

सऊदी गृह मंत्रालय के बयान के मुताबिक़, अदालत ने मामले की संगीनियत और उस वक़्त व मक़ाम की हुरमत के उल्लंघन को ध्यान में रखते हुए सज़ा सुनाई। रिपोर्टों में सज़ा को ताज़ीर के तहत बताया गया है। इस्लामी क़ानूनी परंपरा में ताज़ीर उन अपराधों के लिए न्यायिक विवेक के तहत दी जाने वाली सज़ा को कहा जाता है जिनकी सज़ा निर्धारित हुदूद की श्रेणी में नहीं आती।

हालाँकि, इस मामले में अदालत के विस्तृत फ़ैसले, सभी साक्ष्यों और कानूनी दलीलों का पूरा सार्वजनिक रिकॉर्ड उपलब्ध न होने के कारण यह कहना मुनासिब नहीं होगा कि मुक़दमे की हर क़ानूनी बारीकी सामने आ चुकी है।

यह भी समझना ज़रूरी है कि सऊदी अरब में किसी ख़ास अपराध के लिए मौत की सज़ा दिए जाने की ख़बर से यह नतीजा नहीं निकाला जा सकता कि मस्जिद में हर प्रकार की ग़लत हरकत की क़ानूनी सज़ा अनिवार्य रूप से मौत ही है। सज़ा का निर्धारण संबंधित क़ानून, आरोप, साक्ष्य और अदालत के फ़ैसले के अनुसार होता है।

मस्जिद की हुरमत और इस्लामी तहज़ीब

इस्लाम में मस्जिद को इबादत, ज़िक्र, तिलावत और अल्लाह तआला की बंदगी का मुक़द्दस मक़ाम माना गया है। मस्जिद में दाख़िल होने से लेकर वहाँ बैठने, बातचीत करने और इबादत करने तक, हर मामले में अदब, पाकीज़गी और दूसरों के हुक़ूक़ का ख़याल रखना चाहिए।

मक्का मुकर्रमा और मस्जिद अल-हराम की धार्मिक अहमियत तमाम मुसलमानों के दिलों में ख़ास मुक़ाम रखती है। ऐसे मुक़द्दस मक़ामात का एहतराम करना हर मुसलमान की धार्मिक और अख़लाक़ी ज़िम्मेदारी है।

क़ुरआन-ए-करीम में अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है:

“और जो अल्लाह की निशानियों की ताज़ीम करता है, तो बेशक यह दिलों के तक़वे से है।”

— सूरह अल-हज्ज, आयत 32

इसलिए मस्जिदों का एहतराम, वहाँ के आदाब की पाबंदी और पाकीज़गी का ख़याल रखना हमारी दीनदाराना ज़िंदगी का अहम हिस्सा है।

सोशल मीडिया पर ख़बर साझा करने वालों के लिए अहम पैग़ाम

आज के दौर में सोशल मीडिया पर कोई भी तस्वीर, वीडियो या सनसनीख़ेज़ दावा कुछ ही मिनटों में लाखों लोगों तक पहुँच जाता है। मगर किसी ख़बर का तेज़ी से फैलना उसके सही होने की दलील नहीं है।

इस मामले में भी तीन बातों को अलग-अलग समझना ज़रूरी है:

  1. पुष्ट जानकारी: सऊदी गृह मंत्रालय ने दो बांग्लादेशी नागरिकों को मस्जिद में कथित अनैतिक कृत्य के मामले में मौत की सज़ा दिए जाने और 14 अक्टूबर 2026 को सज़ा लागू किए जाने की जानकारी दी है।
  2. अभी अपुष्ट दावे: दोनों के शादीशुदा होने या गर्लफ्रेंड-बॉयफ्रेंड होने, उनकी आठ साल की बच्ची होने और केवल एक-दूसरे को चूमने के कारण सज़ा मिलने की बातों की उपलब्ध आधिकारिक बयान से पुष्टि नहीं होती।
  3. क़ानूनी प्रक्रिया से जुड़े सवाल: बांग्लादेशी कॉन्सुलेट ने पहले से इत्तिला न दिए जाने की बात कही और सऊदी अधिकारियों से जानकारी माँगी। इसलिए इस मामले के सभी पहलुओं को पूरी तरह स्पष्ट मान लेना भी उचित नहीं होगा।

किसी भी व्यक्ति के बारे में अपुष्ट इल्ज़ाम फैलाने से उसकी इज़्ज़त, उसके परिवार और समाज पर बुरा असर पड़ सकता है। इस्लाम भी बिना तहक़ीक़ के किसी ख़बर को आगे बढ़ाने से बचने की तालीम देता है।

क़ुरआन-ए-करीम में इरशाद है:

“ऐ ईमान वालो! अगर तुम्हारे पास कोई फ़ासिक़ ख़बर लेकर आए, तो तहक़ीक़ कर लिया करो।”

— सूरह अल-हुजुरात, आयत 6

इसलिए किसी भी ख़बर को साझा करने से पहले उसके स्रोत, तारीख़ और विश्वसनीयता की जाँच करना बेहद ज़रूरी है।

मुल्तानी समाज का पैग़ाम

मस्जिद की हुरमत और इस्लामी आदाब का एहतराम करना हर मुसलमान की ज़िम्मेदारी है। साथ ही, इंसाफ़, तहक़ीक़ और सच्चाई को भी उतनी ही अहमियत दी जानी चाहिए।

किसी अदालत के फ़ैसले पर चर्चा करते समय न तो अपुष्ट बातों को यक़ीनी हक़ीक़त बनाकर पेश करना चाहिए और न ही किसी व्यक्ति या परिवार के बारे में बग़ैर प्रमाण के फ़ैसला सुनाना चाहिए।

दीन हमें अदब सिखाता है, अख़लाक़ हमें ज़िम्मेदारी का एहसास दिलाता है और सच्चाई हमें बिना तहक़ीक़ के किसी नतीजे पर पहुँचने से रोकती है।

अल्लाह तआला हम सबको मस्जिदों की हुरमत करने, सही और ग़लत में फ़र्क़ समझने, सच्ची बात कहने और हर मामले में इंसाफ़ व हक़ का साथ देने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए। आमीन।


विशेष रिपोर्ट: ज़मीर आलम
प्रधान संपादक — मुल्तानी समाज राष्ट्रीय समाचार पत्रिका
नई दिल्ली डेस्क

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार से पंजीकृत, नई दिल्ली से प्रसारित, पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी की क़ौमी समाचार पत्रिका, न्यूज़ पोर्टल एवं यूट्यूब चैनल — “मुल्तानी समाज”

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सार्वजनिक सूचना पर्स (बटुआ) गुम होने के संबंध में

सर्वसाधारण को सूचित किया जाता है कि मैं अलीहसन मुल्तानी पुत्र हबीब अहमद, निवासी बड़का मार्ग, बड़ौत, जिला बागपत, उत्तर प्रदेश, दिनांक 20 अक्टूबर 2026 को शाम लगभग 5:30 बजे किसी कार्य से नगर क्षेत्र बड़ौत के बाजार में गया था। इसी दौरान मेरा पर्स (बटुआ) कहीं गुम हो गया।

गुम हुए पर्स में 700 रुपये नकद, मेरा आधार कार्ड, पैन कार्ड, मतदाता पहचान पत्र, सलाम खाकी न्यूज़ का पत्रकारिता पहचान पत्र, कारोबारी एवं राजनीतिक विजिटिंग कार्ड सहित अनेक महत्वपूर्ण कागजात मौजूद थे।

पर्स की काफी तलाश की गई, लेकिन अभी तक उसका कोई पता नहीं चल पाया है।

अतः सर्वसाधारण से विनम्र अनुरोध है कि यदि किसी सज्जन को उक्त पर्स अथवा उसमें रखे कागजात मिलें, तो कृपया नीचे दिए गए मोबाइल नंबर पर संपर्क करके पर्स लौटाने की कृपा करें। इस नेक कार्य के लिए मैं आपका सदैव आभारी रहूँगा।

सूचनाकर्ता: अलीहसन मुल्तानी
पता: बड़का मार्ग, बड़ौत, जिला बागपत, उत्तर प्रदेश
मोबाइल नंबर: 9027004684