Wednesday, October 28, 2026

हाजी नज़ीर अहमद साहब की समझदारी और नेक पहल से साढ़े चार साल पुराने मियां-बीवी के विवाद का ख़ातमा, दोनों ख़ानदानों में सुलह की राह हमवार

जलालाबाद के वरिष्ठ समाजसेवी हाजी नज़ीर अहमद साहब की कोशिशों से मुक़दमेबाज़ी में उलझे दो ख़ानदानों के दरमियान हुआ आपसी सुलहनामा, बिरादरी में अमन, इत्तेहाद और भाईचारे का पैग़ाम

जलालाबाद, ज़िला शामली, उत्तर प्रदेश।

मियां-बीवी के दरमियान पैदा होने वाले इख़्तिलाफ़ात अगर वक़्त रहते समझदारी, सब्र और आपसी बातचीत के ज़रिए हल कर लिए जाएँ, तो न सिर्फ़ एक घर को बिखरने से बचाया जा सकता है, बल्कि दोनों ख़ानदानों को भी परेशानी, तनाव और लंबी मुक़दमेबाज़ी से निजात मिल सकती है। इस्लाम भी आपसी सुलह, मोहब्बत, रहमदिली और रिश्तों की हिफ़ाज़त का पैग़ाम देता है।

इसी नेक सोच और समाजी ख़िदमत की एक मिसाल बुधवार, 28 अक्टूबर 2026 को कस्बा जलालाबाद, ज़िला शामली, उत्तर प्रदेश में देखने को मिली। यहाँ के वरिष्ठ समाजसेवी हाजी नज़ीर अहमद साहब की कोशिशों से पिछले साढ़े चार साल से चले आ रहे एक मियां-बीवी के विवाद को आपसी बातचीत और समझाइश के ज़रिए सुलझाने में कामयाबी मिली। दोनों पक्षों के दरमियान आपसी सुलहनामा कराया गया और उनके बीच जारी विवाद को ख़त्म करने की दिशा में अहम क़दम उठाया गया।

साढ़े चार साल से परेशान थे दोनों ख़ानदान

मिली जानकारी के मुताबिक़, यह मामला पिछले तक़रीबन साढ़े चार साल से चला आ रहा था। इस दौरान दोनों पक्षों के बीच कई मर्तबा अलग-अलग पंचायतें हुईं और मामले को आपसी तौर पर सुलझाने की कोशिशें भी की गईं, लेकिन कोई ठोस नतीजा सामने नहीं आ सका। हालात ऐसे बने कि मामला अदालत और क़ानूनी मुक़दमेबाज़ी तक जा पहुँचा, जिससे दोनों पक्षों को लंबे अरसे तक परेशानी का सामना करना पड़ा।

बताया गया है कि मियां पक्ष का ताल्लुक़ कस्बा गंगोह, ज़िला सहारनपुर से है, जबकि बीवी पक्ष गाँव चिलकाना, ज़िला सहारनपुर, उत्तर प्रदेश का रहने वाला है। दोनों पक्ष अपने-अपने मामलों में मुक़दमेबाज़ी का सामना कर रहे थे।

हाजी नज़ीर अहमद साहब ने दोनों पक्षों को बुलाकर की समझाइश

इसी दौरान किसी शख़्स के ज़रिए दोनों पक्षों को कस्बा जलालाबाद के वरिष्ठ समाजसेवी हाजी नज़ीर अहमद साहब के बारे में जानकारी मिली। इसके बाद दोनों पक्षों को उनके आवास पर बुलाया गया, जहाँ हाजी साहब ने दोनों की बात सुनी और उन्हें समझाया-बुझाया।

उन्होंने आपसी इख़्तिलाफ़ात को बातचीत, सब्र, समझदारी और आपसी रज़ामंदी से हल करने की कोशिश की। उनकी कोशिशों से दोनों पक्षों के दरमियान सुलह की राह निकली और आपसी सुलहनामा कराया गया। इस तरह लंबे समय से चले आ रहे विवाद को आपसी सहमति से निपटाने की दिशा में अहम कामयाबी हासिल हुई।

यह पहल इस बात की याद दिलाती है कि जब समाज के ज़िम्मेदार और समझदार लोग ख़ुलूस-ए-नियत के साथ आगे आते हैं, तो कई बार सालों से उलझे मसलों को भी बातचीत के ज़रिए हल करने का रास्ता निकल सकता है।

इससे पहले भी कई मियां-बीवी के मामले सुलझा चुके हैं हाजी साहब

बताया जाता है कि हाजी नज़ीर अहमद साहब इससे पहले भी कई मियां-बीवी के मामलों में आपसी सुलह कराने और पारिवारिक इख़्तिलाफ़ात को दूर करने की कोशिशें कर चुके हैं। उनकी यह समाजी ख़िदमत परिवारों के बीच बातचीत, आपसी समझ और भाईचारे को बढ़ावा देने की अहमियत को उजागर करती है।

समाज में ऐसे लोगों की कोशिशें क़ाबिल-ए-तारीफ़ हैं, जो लोगों को आपसी दुश्मनी और खींचतान से निकालकर सुलह, अमन और इत्तेहाद की तरफ़ लाने में अपना वक़्त लगाते हैं। घरेलू मामलों में समझदारी और ज़िम्मेदारी के साथ की गई मध्यस्थता कई परिवारों को मानसिक परेशानी और लंबे विवादों से राहत दिलाने में मददगार साबित हो सकती है।

अलबत्ता, पारिवारिक मामलों में सुलह हमेशा दोनों पक्षों की स्वतंत्र रज़ामंदी, इज़्ज़त और क़ानूनी हुक़ूक़ की हिफ़ाज़त के साथ होनी चाहिए। अदालत में चल रहे मुक़दमों की औपचारिक समाप्ति के लिए जहाँ ज़रूरी हो, वहाँ संबंधित अदालत की क़ानूनी प्रक्रिया पूरी करना भी अहम है।

दोनों ख़ानदानों के लिए ख़ास दुआ

इस मौक़े पर दुआ है कि अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त हाजी नज़ीर अहमद साहब को उनकी नेक कोशिशों का बेहतरीन अज्र अता फ़रमाए। अल्लाह तआला उन्हें सेहत-ओ-आफ़ियत, लंबी उम्र, रिज़्क़ में बरकत और ख़िदमत-ए-ख़ल्क़ के लिए और ज़्यादा हौसला अता फ़रमाए।

अल्लाह पाक मियां-बीवी और दोनों ख़ानदानों के दरमियान मोहब्बत, सुकून, इज़्ज़त और भरोसा क़ायम फ़रमाए। दिलों से नाराज़गी और कड़वाहट दूर फ़रमाकर आपसी रिश्तों में ख़ैर-ओ-बरकत अता करे। अगर दोनों ने अपने रिश्ते को आगे बढ़ाने का फ़ैसला किया है, तो अल्लाह उनके घर को मोहब्बत, रहमत और सुकून का मरकज़ बनाए तथा उन्हें एक-दूसरे के हुक़ूक़ अदा करने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए।

आमीन या रब्बुल आलमीन।


विशेष रिपोर्ट: ज़मीर आलम, प्रधान संपादक
उत्तर प्रदेश डेस्क — मुल्तानी समाज

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार से पंजीकृत, देश की राजधानी नई दिल्ली से प्रसारित, पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी की क़ौमी समाचार पत्रिका, न्यूज़ पोर्टल एवं यूट्यूब चैनल “मुल्तानी समाज”।

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🥀 इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन 🥀निहायत ही रंज-ओ-ग़म के साथ इंतिक़ाल की इत्तिला जनाब शब्बीर अहमद साहब का इंतिक़ाल, आज बाद नमाज़-ए-मग़रिब होगी तदफ़ीन

अल्लाह तआला मरहूम की मग़फ़िरत फ़रमाए, उनकी क़ब्र को नूर से मुनव्वर फ़रमाए और तमाम पसमांदगान को सब्र-ए-जमील अता फ़रमाए। आमीन या रब्बुल आलमीन।

निहायत ही रंज-ओ-ग़म और अफ़सोस के साथ तमाम मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादराना हज़रात को इत्तिला दी जाती है कि आज बुधवार, 28 अक्टूबर 2026, दोपहर पौने एक बजे (12:45 बजे) गाँव अब्दाननगर, ब्लॉक व तहसील ऊन, ज़िला शामली, उत्तर प्रदेश के साकिन, जनाब शब्बीर अहमद साहब वल्द जनाब अलीहसन साहब (साकिन गाँव पिंडौरा) उम्र तक़रीबन 70 साल, का क़ज़ा-ए-इलाही से इंतिक़ाल हो गया है।

इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन।

मरहूम के इंतिक़ाल की ख़बर से अहल-ए-ख़ानदान, अज़ीज़-ओ-अक़ारिब और बिरादराना हज़रात में ग़म की लहर दौड़ गई है। यह दुनिया फ़ानी है और हर जान को एक दिन अपने रब की तरफ़ लौटकर जाना है। अल्लाह तआला ने क़ुरआन-ए-पाक में इरशाद फ़रमाया है कि हर जान को मौत का मज़ा चखना है।

इस पुरदर्द मौक़े पर हम तमाम अहल-ए-ख़ानदान और ग़मज़दा लवाहिक़ीन के साथ दिली ताज़ियत का इज़हार करते हैं और बारगाह-ए-इलाही में दुआगो हैं कि अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त मरहूम की मग़फ़िरत फ़रमाए, उनकी ख़ताओं और लग़ज़िशों से दरगुज़र फ़रमाए तथा उन्हें जन्नतुल फ़िरदौस में आला मक़ाम अता फ़रमाए। आमीन।

🕌 नमाज़-ए-जनाज़ा और तदफ़ीन की इत्तिला

मौसूल होने वाली इत्तिला के मुताबिक़, मरहूम जनाब शब्बीर अहमद साहब की मय्यत को आज बाद नमाज़-ए-मग़रिब सुपुर्द-ए-ख़ाक किया जाएगा। तमाम बिरादराना हज़रात से गुज़ारिश है कि वक़्त निकालकर नमाज़-ए-जनाज़ा में शरीक हों, मरहूम के हक़ में दुआ-ए-मग़फ़िरत करें और इस दुख की घड़ी में अहल-ए-ख़ानदान को तसल्ली दें।

नोट: नमाज़-ए-जनाज़ा और तदफ़ीन के मुकम्मल वक़्त व मक़ाम की तस्दीक़ के लिए नीचे दिए गए नंबर पर राब्ता फ़रमाएँ।

राब्ता बराए मालूमात:

मोहम्मद इमरान साहब
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🤲 मरहूम के लिए दुआ-ए-मग़फ़िरत

اللَّهُمَّ اغْفِرْ لَهُ وَارْحَمْهُ وَعَافِهِ وَاعْفُ عَنْهُ

तर्जुमा: ऐ अल्लाह! मरहूम की मग़फ़िरत फ़रमा, उन पर रहम फ़रमा, उन्हें आफ़ियत अता फ़रमा और उनसे दरगुज़र फ़रमा।

ऐ अल्लाह! जनाब शब्बीर अहमद साहब की तमाम छोटी-बड़ी ख़ताओं को माफ़ फ़रमा। उनकी नेकियों को क़ुबूल फ़रमा, उनके दर्जात बुलंद फ़रमा और उन्हें अपनी बेपनाह रहमत के साये में जगह अता फ़रमा। उनकी आख़िरत को बेहतर फ़रमा और उन्हें जन्नतुल फ़िरदौस में आला से आला मक़ाम नसीब फ़रमा। आमीन।

🤲 मय्यत को क़ब्र में उतारते वक़्त की दुआ

بِسْمِ اللَّهِ وَعَلَى مِلَّةِ رَسُولِ اللَّهِ ﷺ

तर्जुमा: अल्लाह के नाम के साथ और रसूलुल्लाह ﷺ के दीन व तरीक़े पर।

🤲 दफ़्न के बाद की दुआ

اللَّهُمَّ اغْفِرْ لَهُ، اللَّهُمَّ ثَبِّتْهُ عِنْدَ السُّؤَالِ

तर्जुमा: ऐ अल्लाह! इनकी मग़फ़िरत फ़रमा और सवाल के वक़्त इन्हें साबितक़दम रख।

ऐ अल्लाह! इनकी क़ब्र को जन्नत के बाग़ों में से एक बाग़ बना दे। क़ब्र की तंगी और तन्हाई को अपनी रहमत से दूर फ़रमा। क़ब्र को नूर से भर दे और इसे सुकून व राहत का ठिकाना बना दे। मरहूम को क़ब्र के अज़ाब से महफ़ूज़ फ़रमा और रोज़-ए-क़ियामत अपने महबूब नबी हज़रत मुहम्मद ﷺ की शफ़ाअत नसीब फ़रमा। आमीन या रब्बुल आलमीन।

🤲 मिट्टी देते वक़्त पढ़ी जाने वाली आयत

مِنْهَا خَلَقْنَاكُمْ وَفِيهَا نُعِيدُكُمْ وَمِنْهَا نُخْرِجُكُمْ تَارَةً أُخْرَىٰ

तर्जुमा: इसी ज़मीन से हमने तुम्हें पैदा किया, इसी में तुम्हें वापस लौटाएँगे और इसी से तुम्हें दोबारा निकालेंगे।

(सूरह ताहा, आयत 55)

अल्लाह तआला तमाम अहल-ए-ईमान को मौत की हक़ीक़त समझने, नेक आमाल की तौफ़ीक़ पाने और ईमान पर ख़ातिमा नसीब फ़रमाए। मरहूम के घरवालों को सब्र-ए-जमील और इस सदमे को बर्दाश्त करने की हिम्मत अता फ़रमाए। आमीन सुम्मा आमीन।


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सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार से पंजीकृत तथा मुल्क की राजधानी नई दिल्ली से प्रसारित, पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी की क़ौमी समाचार पत्रिका, न्यूज़ पोर्टल और यूट्यूब चैनल “मुल्तानी समाज” के लिए उत्तर प्रदेश डेस्क से प्रधान संपादक ज़मीर आलम की ख़ास रिपोर्ट।

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अल्लाह तआला मरहूम को जन्नतुल फ़िरदौस में आला मक़ाम अता फ़रमाए और तमाम लवाहिक़ीन को सब्र-ए-जमील अता फ़रमाए। आमीन।

Monday, October 26, 2026

💔 इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन 💔इंतज़ार साहब के इंतिक़ाल से मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी में ग़म की लहर, मरहूम की मग़फ़िरत के लिए दुआओं की दरख़्वास्त

शामली, उत्तर प्रदेश।

निहायत ही रंज-ओ-ग़म और दिली अफ़सोस के साथ तमाम मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादराना हज़रात को यह इत्तिला दी जाती है कि आज दिन मंगल, बा-तारीख़ 27 अक्टूबर 2026 को दिल्ली रोड, गाँव खेड़ी, ज़िला शामली, उत्तर प्रदेश में जनाब महफ़ूज़ साहब मरहूम, साकिन नगला जसौई, के बड़े साहबज़ादे जनाब इंतज़ार साहब का क़ज़ा-ए-इलाही से इंतिक़ाल हो गया है।

इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन।

बेशक हम सब अल्लाह तआला ही के हैं और उसी की तरफ़ हमें लौटकर जाना है। इंतज़ार साहब के इंतिक़ाल की ख़बर से अहल-ए-ख़ाना, अज़ीज़-ओ-अक़ारिब और बिरादरी के लोगों में ग़म और अफ़सोस की लहर दौड़ गई है। यह दुनिया फ़ानी है और हर जान को मौत का ज़ायका चखना है। मगर किसी अपने के दुनिया से रुख़्सत हो जाने का सदमा दिल को ग़मगीन कर देता है।

इस पुरदर्द मौक़े पर हम तमाम अहल-ए-ख़ाना, रिश्तेदारों और ग़मज़दा ख़ानदान के साथ अपनी दिली हमदर्दी और ताज़ियत का इज़हार करते हैं। अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त तमाम पसमांदगान को सब्र-ए-जमील अता फ़रमाए और इस सदमे को बर्दाश्त करने की तौफ़ीक़ बख़्शे। आमीन या रब्बुल आलमीन।

🤲 मरहूम की मग़फ़िरत के लिए ख़ास दुआ

या अल्लाह! जनाब इंतज़ार साहब की मुकम्मल मग़फ़िरत फ़रमा। उनकी तमाम ख़ताएँ और लग़ज़िशें माफ़ फ़रमा। उनकी क़ब्र को नूर से मुनव्वर फ़रमा, उसे जन्नत के बाग़ों में से एक बाग़ बना दे और क़ब्र की तंगी, वहशत और तमाम तकलीफ़ों से महफ़ूज़ फ़रमा।

ऐ अल्लाह! मरहूम के साथ रहमत और करम का मामला फ़रमा। उनकी नेकियों को क़ुबूल फ़रमा, उनकी बुराइयों से दरगुज़र फ़रमा और उन्हें अपनी बेपनाह रहमत के साये में जगह अता फ़रमा। उनके दर्जात बुलंद फ़रमा और उन्हें जन्नतुल फ़िरदौस में आला मक़ाम अता फ़रमा।

ऐ अल्लाह! जब मरहूम को क़ब्र में उतारा जाए, तो उनकी क़ब्र को सुकून और नूर से भर दे। उन्हें सवालात-ए-क़ब्र के वक़्त साबित-क़दम रख और अपनी रहमत से कामयाबी अता फ़रमा। क़ब्र को उनके लिए आराम और राहत का ठिकाना बना दे। आमीन सुम्मा आमीन।

🤲 दफ़ीने और मिट्टी देने के वक़्त की मस्नून दुआएँ

जब मरहूम को क़ब्र में उतारा जाए, तो यह दुआ पढ़ना मसनून है:

بِسْمِ اللّٰهِ وَعَلَىٰ مِلَّةِ رَسُولِ اللّٰهِ ﷺ

बिस्मिल्लाहि व अला मिल्लति रसूलिल्लाह ﷺ।

तर्जुमा: अल्लाह के नाम के साथ और रसूलुल्लाह ﷺ के दीन व तरीक़े पर।

क़ब्र पर मिट्टी डालते वक़्त क़ुरआन-ए-करीम की इस आयत को याद किया जाता है:

مِنْهَا خَلَقْنَاكُمْ وَفِيهَا نُعِيدُكُمْ وَمِنْهَا نُخْرِجُكُمْ تَارَةً أُخْرَىٰ

मिन्हा ख़लक़नाकुम व फ़ीहा नुईदुकुम व मिन्हा नुख़रिजुकुम तारतन उख़रा।

तर्जुमा: इसी ज़मीन से हमने तुम्हें पैदा किया, इसी में तुम्हें वापस लौटाएँगे और इसी से तुम्हें दोबारा निकालेंगे।

क़ब्र पर मिट्टी डालते और दफ़ीने के बाद मरहूम के लिए मग़फ़िरत, रहमत और साबित-क़दमी की दुआ की जाए। अल्लाह तआला मरहूम को अपने जवार-ए-रहमत में जगह अता फ़रमाए। आमीन।

📢 दफ़ीने का वक़्त बाद में बताया जाएगा

ख़बर लिखे जाने तक मरहूम इंतज़ार साहब के दफ़ीने का वक़्त मुकर्रर नहीं हो पाया था। जैसे ही दफ़ीने के वक़्त के बारे में तस्दीक़शुदा इत्तिला हासिल होगी, उसे इसी ख़बर में अपडेट कर दिया जाएगा। तमाम बिरादराना हज़रात से गुज़ारिश है कि ताज़ा इत्तिला के लिए इस ख़बर पर नज़र रखें।

अल्लाह तआला मरहूम की मग़फ़िरत फ़रमाए, उनके अहल-ए-ख़ाना को सब्र-ए-जमील अता फ़रमाए और तमाम ग़मज़दा लोगों को इस सदमे को बर्दाश्त करने की हिम्मत बख़्शे। आमीन या रब्बुल आलमीन।


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रुड़की में मोहम्मद रिहान और ज़ैनब रज़ा की दावत-ए-वलीमा की पुरवक़ार तक़रीब, बिरादरी की मुमताज़ शख़्सियात ने की शिरकत

हाजी नूर मोहम्मद साहब स्टेयरिंग वाले, जफ़र मिर्ज़ा, हाजी नसीम अहमद, वसीम अहमद, इनाम अहमद और इक़बाल डीलर समेत बिरादरी की जानी-मानी हस्तियों ने दूल्हा-दुल्हन को दी मुबारकबाद, ख़ुशहाल ज़िंदगी के लिए कीं नेक दुआएँ

रुड़की, उत्तराखंड | मुल्तानी समाज | उत्तराखंड डेस्क

अली हसन मुल्तानी की ख़ास रिपोर्ट

रुड़की। मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी में शादी-ब्याह की तक़रीबात आपसी मोहब्बत, भाईचारे, ख़ुलूस और बिरादराना इत्तेहाद की ख़ूबसूरत मिसाल पेश करती हैं। इसी सिलसिले में रविवार, 25 अक्टूबर 2026 को उत्तराखंड के रुड़की में मोहम्मद रिहान और ज़ैनब रज़ा की दावत-ए-वलीमा की पुरमसर्रत तक़रीब का एहतिमाम किया गया। इस मुबारक मौक़े पर बिरादरी की जानी-मानी शख़्सियात, बुज़ुर्गों और अज़ीज़-ओ-अक़ारिब ने शिरकत करके दोनों ख़ानदानों को दिली मुबारकबाद पेश की और नवदंपति की ख़ुशहाल ज़िंदगी के लिए नेक दुआएँ कीं।

शशी गार्डन (राज़ महल होटल) में सजी वलीमे की महफ़िल

शादी के दावतनामे के मुताबिक, दावत-ए-वलीमा की तक़रीब शशी गार्डन (राज़ महल होटल), देहरादून रोड, रुड़की, उत्तराखंड में आयोजित की गई। दावतनामे में खाने का वक़्त शाम 7 बजे दर्ज था।

इस ख़ुशनुमा मौक़े पर रिश्तेदारों, दोस्तों और बिरादरी के लोगों ने शिरकत करके दूल्हा-दुल्हन और उनके अहल-ए-ख़ाना की ख़ुशियों में हिस्सा लिया। तक़रीब के दौरान आपसी मोहब्बत, अपनाइयत और भाईचारे का माहौल रहा। हाज़िरीन ने नवदंपति को मुबारकबाद पेश करते हुए उनके मुस्तक़बिल के लिए नेक ख़्वाहिशात का इज़हार किया।

ज़मीर आलम समेत बिरादरी की अज़ीम शख़्सियात की शिरकत

इस पुरवक़ार तक़रीब में मुल्तानी समाज चैरिटेबल ट्रस्ट के फ़ाउंडर ज़मीर आलम, खजांची हाजी नूर मोहम्मद साहब स्टेयरिंग वाले, जफ़र मिर्ज़ा, हाजी नसीम अहमद, वसीम अहमद, इनाम अहमद और इक़बाल डीलर समेत बिरादरी की जानी-मानी हस्तियाँ मौजूद रहीं।

तमाम हज़रात ने दूल्हा-दुल्हन को शादी की दिली मुबारकबाद पेश की और उनके लिए ख़ैर-ओ-बरकत की दुआएँ कीं। बिरादरी की इन मुमताज़ शख़्सियात की मौजूदगी ने तक़रीब को और भी ख़ुशनुमा बनाया।

ऐसी सामाजिक तक़रीबात बिरादरी के लोगों को एक-दूसरे के क़रीब लाने, आपसी ताल्लुक़ात को मज़बूत करने और ख़ुशी व ग़म के मौक़ों पर एक-दूसरे का साथ निभाने का पैग़ाम देती हैं। बुज़ुर्गों की दुआएँ और अज़ीज़ों की मोहब्बत किसी भी ख़ानदानी ख़ुशी को यादगार बना देती हैं।

मोहम्मद रिहान और ज़ैनब रज़ा के निकाह की ख़ुशियाँ

शादी के दावतनामे में दर्ज तफ़सील के मुताबिक, दूल्हे मोहम्मद रिहान, मोहम्मद शकील अहमद के बेटे और मरहूम अब्दुल लतीफ़ के पोते हैं, जबकि दुल्हन ज़ैनब रज़ा, मरहूम मोहम्मद यूसुफ़ की बेटी हैं और मेरठ, उत्तर प्रदेश से ताल्लुक़ रखती हैं।

दोनों ख़ानदानों के लिए यह मौक़ा ख़ुशी, नई उम्मीदों और ज़िंदगी के एक नए सफ़र का आग़ाज़ है। दावत-ए-वलीमा की इस तक़रीब में बिरादरी की शख़्सियात ने नवदंपति के लिए नेक ख़्वाहिशात पेश करते हुए दुआ की कि अल्लाह तआला उनके रिश्ते को मोहब्बत, भरोसे, इज़्ज़त और सुकून से भर दे।

इस्लामी तालीमात में निकाह को एक पाकीज़ा रिश्ता और ज़िम्मेदारी भरा अहद माना गया है। मियाँ-बीवी के दरमियान मोहब्बत, रहमत, एक-दूसरे के हुक़ूक़ की अदायगी और मुश्किल व आसान वक़्त में साथ निभाना ख़ुशहाल ज़िंदगी की बुनियाद है।

नवदंपति के लिए ख़ुसूसी दुआ

रसूलुल्लाह ﷺ से निकाह के मौक़े पर सिखाई गई मुबारक दुआ है:

بَارَكَ اللَّهُ لَكَ، وَبَارَكَ عَلَيْكَ، وَجَمَعَ بَيْنَكُمَا فِي خَيْرٍ

तर्जुमा: अल्लाह तआला तुम्हारे लिए बरकत अता फ़रमाए, तुम पर अपनी बरकतें नाज़िल करे और तुम दोनों को भलाई के साथ एक-दूसरे के साथ रखे।

दुआ है कि अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त वलीद रिहान और ज़ैनब रज़ा की ज़िंदगी को रहमतों, बरकतों और ख़ुशियों से भर दे। दोनों के दरमियान हमेशा मोहब्बत, वफ़ादारी, एहतराम और हमदर्दी क़ायम रखे। उन्हें एक-दूसरे के लिए सुकून और राहत का ज़रिया बनाए, उनके घर को ख़ुशहाल रखे और दोनों ख़ानदानों के दरमियान हमेशा प्यार व इत्तेफ़ाक़ बाक़ी रखे।

आमीन या रब्बुल आलमीन।

मुल्तानी समाज की जानिब से वलीद रिहान और ज़ैनब रज़ा तथा दोनों ख़ानदानों को शादी की पुरख़ुलूस मुबारकबाद पेश की जाती है।


मुल्तानी समाज — अपनी बिरादरी की आवाज़, अपनी पहचान

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार से पंजीकृत, मुल्क की राजधानी नई दिल्ली से प्रसारित, पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी की क़ौमी समाचार पत्रिका, न्यूज़ पोर्टल और यूट्यूब चैनल।

उत्तराखंड डेस्क से अली हसन मुल्तानी की ख़ास रिपोर्ट।

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मुज़फ्फरनगर में अज़ीम मिर्ज़ा की बारात का इस्तक़बाल, आज दिल्ली में होगी दावत-ए-वलीमा की महफ़िल

मोहम्मद आलम पूर्व चेयरमैन MSCT, रेशमा ज़मीर खजांची मुल्तानी समाज चैरिटेबल ट्रस्ट समेत बिरादरी की मुमताज़ शख़्सियात ने बारात में की शिरकत, दूल्हा-दुल्हन की ख़ुशहाल ज़िंदगी के लिए कीं नेक दुआएँ

मुज़फ्फरनगर/नई दिल्ली।

मुल्तानी समाज | उत्तर प्रदेश डेस्क से प्रधान संपादक ज़मीर आलम की ख़ास रिपोर्ट

मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी में शादी-ब्याह के मौक़े ख़ुशी, मोहब्बत, भाईचारे, आपसी इत्तेहाद और ख़ानदानी रिश्तों की मज़बूती का पैग़ाम लेकर आते हैं। इन्हीं ख़ुशनुमा जज़्बात के साथ अज़ीम मिर्ज़ा और बुशरा मिर्ज़ा की शादी की ख़ुशियों के सिलसिले में रविवार, 25 अक्टूबर 2026 को मुज़फ्फरनगर में बारात का इस्तक़बाल किया गया। इस पुरमसर्रत मौक़े पर बिरादरी की मुमताज़ शख़्सियात और अज़ीज़-ओ-अक़ारिब ने शिरकत करके दोनों ख़ानदानों को मुबारकबाद पेश की और नवदंपति के लिए नेक ख़्वाहिशात का इज़हार किया।

तेजस बैंक्वेट हॉल, मुज़फ्फरनगर में बारात की पुरवक़ार महफ़िल

मसूल जानकारी और शादी के निमंत्रण-पत्र के मुताबिक, रविवार, 25 अक्टूबर 2026 को मुज़फ्फरनगर स्थित तेजस बैंक्वेट हॉल में अज़ीम मिर्ज़ा की बारात पहुँची। इस मौक़े पर ख़ानदान के लोगों, रिश्तेदारों और बिरादरी के अफ़राद ने बारात का इस्तक़बाल किया और शादी की ख़ुशियों में शरीक होकर अपनी मोहब्बत और अपनाइयत का इज़हार किया।

इस ख़ुशी की महफ़िल में मोहम्मद आलम, पूर्व चेयरमैन MSCT, तथा रेशमा ज़मीर, खजांची मुल्तानी समाज चैरिटेबल ट्रस्ट, समेत बिरादरी की अज़ीम शख़्सियात ने शिरकत की। उनकी मौजूदगी ने इस पारिवारिक तक़रीब को सामाजिक अपनाइयत और भाईचारे की ख़ूबसूरत मिसाल बनाया।

इस मौक़े पर दूल्हे और दोनों ख़ानदानों को दिली मुबारकबाद पेश की गई तथा दुआ की गई कि अल्लाह तआला इस नए रिश्ते को मोहब्बत, इज़्ज़त, सुकून और बरकतों से मालामाल फ़रमाए।

मरहूम मोहम्मद हसन के पोते हैं अज़ीम मिर्ज़ा

शादी के निमंत्रण-पत्र में दर्ज तफ़सील के मुताबिक, अज़ीम मिर्ज़ा, मोहम्मद ग़फ़्फ़ार अहमद के बेटे और मरहूम मोहम्मद हसन के पोते हैं, जबकि बुशरा मिर्ज़ा, मोहम्मद शहज़ाद की बेटी हैं।

दोनों ख़ानदानों के लिए यह मौक़ा ख़ुशी, नई उम्मीदों और एक नए सफ़र की शुरुआत का है। शादी जैसे मुबारक मौक़े पर बुज़ुर्गों की दुआएँ, अज़ीज़ों की मोहब्बत और बिरादरी के लोगों की शिरकत ख़ुशियों को दोगुना कर देती है। ऐसी तक़रीबात आपसी ताल्लुक़ात को मज़बूत करने और बिरादराना इत्तेहाद को फ़रोग़ देने में अहम किरदार अदा करती हैं।

आज दिल्ली में सजेंगी दावत-ए-वलीमा की ख़ुशियाँ

बारात की ख़ुशियों के बाद आज, सोमवार, 26 अक्टूबर 2026 को शाम 7 बजे से अज़ीम मिर्ज़ा और बुशरा मिर्ज़ा की दावत-ए-वलीमा का एहतिमाम किया गया है।

शादी के दावतनामे के मुताबिक, वलीमे की तक़रीब का मुक़ाम है:

इश्वर वाटिका (Ishwar Vatika)
मेन नांगलोई, नजफ़गढ़ रोड,
निलोठी मोड़, नई दिल्ली – 110041।

दावत-ए-वलीमा मुस्लिम समाज की एक अहम और मुबारक परंपरा है, जिसमें निकाह की ख़ुशी को अज़ीज़-ओ-अक़ारिब और दोस्तों के साथ साझा किया जाता है। यह मौक़ा नए जोड़े के लिए नेक दुआएँ करने, दोनों ख़ानदानों के दरमियान मोहब्बत बढ़ाने और सामाजिक रिश्तों को मज़बूती देने का ज़रिया भी बनता है।

नवदंपति के लिए दिली मुबारकबाद और ख़ुसूसी दुआ

मुल्तानी समाज की जानिब से अज़ीम मिर्ज़ा और बुशरा मिर्ज़ा को शादी की पुरख़ुलूस मुबारकबाद पेश की जाती है। दुआ है कि अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त दोनों के दरमियान हमेशा उल्फ़त, मोहब्बत, भरोसा, एहतराम और हमदर्दी क़ायम रखे। उनकी ज़िंदगी को सुकून, ख़ुशहाली और बेशुमार बरकतों से भर दे तथा दोनों ख़ानदानों के दरमियान प्यार, इत्तेफ़ाक़ और ख़ैर-ओ-बरकत हमेशा बाक़ी रखे।

रसूलुल्लाह ﷺ से निकाह के मौक़े पर सिखाई गई मुबारक दुआ है:

بَارَكَ اللَّهُ لَكَ، وَبَارَكَ عَلَيْكَ، وَجَمَعَ بَيْنَكُمَا فِي خَيْرٍ

तर्जुमा: अल्लाह तुम्हारे लिए बरकत अता फ़रमाए, तुम पर अपनी बरकतें नाज़िल करे और तुम दोनों को भलाई के साथ एक-दूसरे के साथ रखे।

अल्लाह तआला अज़ीम मिर्ज़ा और बुशरा मिर्ज़ा के इस पाकीज़ा रिश्ते को हमेशा क़ायम-ओ-दायम रखे, दोनों को एक-दूसरे के लिए राहत-ओ-सुकून का ज़रिया बनाए, नेकियों और ख़ुशियों से नवाज़े तथा उनकी ज़िंदगी को रहमतों से भर दे। आमीन या रब्बुल आलमीन।


मुल्तानी समाज की ख़ास पेशकश

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Sunday, October 25, 2026

जलालाबाद सम्मेलन में ‘सनम देर कर दी आते-आते’ के शेर पर छिड़ा बिरादराना घमासान! महिला सांसद इकरा हसन के इस्तक़बाल में पढ़े गए अशआर पर उठे सवाल, सदर साहब के रवैये से नाराज़ हुए तंजीम के जिम्मेदार

### *एक शेर ने महफ़िल का माहौल बदल दिया! अदब और एहतराम की बहस के बीच कमेटी की क़यादत पर उठने लगे सवाल, सदर से इस्तीफ़े और बहिष्कार तक की मांग*

**जलालाबाद, शामली (उत्तर प्रदेश)।** मुस्लिम मुल्तानी लोहार, बढ़ई बिरादरी के सामाजिक और तंजीमी हलक़ों में इन दिनों 15 अक्टूबर 2026 को क़स्बा जलालाबाद के **जोया पैलेस** में आयोजित एक सम्मेलन को लेकर चर्चा गर्म है। सम्मेलन में कैराना लोकसभा क्षेत्र की सांसद इकरा हसन को भी मदऊ किया गया था। कार्यक्रम के दौरान सांसद के इस्तक़बाल में पढ़े गए एक शेर को लेकर ऐसा विवाद खड़ा होने की बात सामने आई है, जिसने बिरादरी के भीतर अदब, एहतराम, तंजीमी ज़िम्मेदारी और क़यादत के तौर-तरीक़ों पर बहस छेड़ दी है।

मामले को लेकर बिरादरी के कुछ जिम्मेदारों ने नाराज़गी का इज़हार किया है। वहीं, कुछ लोगों की तरफ़ से कमेटी के सदर के रवैये पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। हालांकि, इस पूरे मामले में संबंधित सदर साहब और सांसद इकरा हसन का आधिकारिक पक्ष सामने आना अभी बाक़ी है।

### क्या है पूरा मामला?

मिली जानकारी के मुताबिक, 15 अक्टूबर को जलालाबाद स्थित **जोया पैलेस** में खतौली से ताल्लुक़ रखने वाली मुस्लिम मिर्ज़ा मुल्तानी लोहार, बढ़ई बिरादरी की एक तंजीम का सम्मेलन आयोजित किया गया था। कार्यक्रम में बिरादरी के लोगों के अलावा कैराना की लोकप्रिय सांसद इकरा हसन को भी शिरकत के लिए आमंत्रित किया गया था।

प्रत्यक्षदर्शियों के हवाले से बताया जा रहा है कि सांसद इकरा हसन कार्यक्रम में कुछ देर से पहुँचीं। उनके आने पर तंजीम के सदर साहब ने मंच से उनका इस्तक़बाल करते हुए कथित तौर पर यह शेर पढ़ा—

**“सनम देर कर दी आते-आते!”**

बस, इसी शेर को लेकर महफ़िल में मौजूद कुछ लोगों की भौंहें तन गईं। बिरादरी के कुछ लोगों ने इसे एक महिला जनप्रतिनिधि के इस्तक़बाल के लिए मुनासिब अल्फ़ाज़ नहीं माना और सवाल उठाया कि सार्वजनिक मंच पर किसी सम्मानित महिला सांसद के लिए ऐसे अल्फ़ाज़ का इस्तेमाल करना क्या अदब और तहज़ीब के तक़ाज़ों के मुताबिक़ था?

प्रत्यक्षदर्शियों के हवाले से यह भी दावा किया जा रहा है कि इस मौक़े पर सांसद की प्रतिक्रिया सहज नहीं थी, लेकिन उन्होंने सार्वजनिक कार्यक्रम की नज़ाकत को देखते हुए अपनी नाराज़गी ज़ाहिर नहीं की। हालांकि, सांसद की वास्तविक प्रतिक्रिया के बारे में उनकी तरफ़ से कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है।

### इस्तक़बाल का शेर या अदब की हदों से आगे बढ़ती ज़बान?

इस पूरे मामले में सबसे अहम सवाल यही उठ रहा है कि किसी भी तंजीम के सदर और मंच संचालक की ज़िम्मेदारी महज़ मेहमानों का स्वागत करना नहीं, बल्कि अपने अल्फ़ाज़ से कार्यक्रम की गरिमा बनाए रखना भी है।

सामाजिक हलक़ों में चर्चा है कि अगर किसी मेहमान के आने में देर हो जाए, तो उसका इस्तक़बाल ख़ुशआमदीद, इज़्ज़त-अफ़ज़ाई और दुआओं के अल्फ़ाज़ से भी किया जा सकता है। ऐसे में एक महिला जनप्रतिनिधि के लिए इस्तेमाल किए गए शेर को लेकर सवाल उठना लाज़िमी है।

हालांकि, किसी शेर का मतलब उसके संदर्भ और कहने के अंदाज़ से भी तय होता है। लिहाज़ा, पूरे वाक़ये की निष्पक्ष पड़ताल और संबंधित पक्षों का मौक़िफ़ सामने आना ज़रूरी है।

### कार्यक्रम के बाद भी नहीं थमा विवाद, जिम्मेदारों ने जताई नाराज़गी!

सूत्रों और बिरादरी के कुछ जिम्मेदारों के मुताबिक़, कार्यक्रम की समाप्ति के बाद इस शेर को लेकर कमेटी के कुछ लोगों ने सदर साहब के सामने अपनी नाराज़गी ज़ाहिर की। उनका कहना बताया जा रहा है कि बिरादरी के मंच पर किसी मेहमान के स्वागत में ऐसे अल्फ़ाज़ का इस्तेमाल नहीं होना चाहिए था, जिनसे उसकी गरिमा या सम्मान को ठेस पहुँचने की आशंका हो।

आरोप है कि सदर साहब ने अपनी ग़लती स्वीकार करने के बजाय आपत्ति जताने वाले जिम्मेदारों को ही गलत ठहराना शुरू कर दिया। इसी कथित रवैये ने मामले को और तूल दे दिया।

बिरादरी के कुछ लोगों का कहना है कि अगर किसी तंजीम के अंदर उसके कामकाज और ज़बान के इस्तेमाल पर सवाल उठाने वालों को ही ग़लत ठहराया जाने लगे, तो आपसी मशवरे और इस्लाही अमल की गुंजाइश कम हो जाती है।

हालांकि, सदर साहब का पक्ष सामने आने के बाद ही इस विवाद की पूरी तस्वीर स्पष्ट हो सकेगी।

### अली हसन का आरोप—‘हिटलरशाही’ के रवैये से परेशान हैं लोग!

बिरादरी के जिम्मेदार अली हसन साहब ने कथित तौर पर सदर साहब के काम करने के अंदाज़ पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उनका आरोप है कि सदर साहब का रवैया लंबे समय से हठधर्मिता वाला रहा है और तंजीम में दूसरे लोगों की राय को अहमियत नहीं दी जाती।

अली हसन के मुताबिक़, बिरादरी के कार्यक्रमों और तंजीमी गतिविधियों को लेकर भी मतभेद रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि दूसरी तंजीम के कार्यक्रमों की नकल करके उन्हें अपना बताने जैसी शिकायतें भी सामने आती रही हैं।

इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है। संबंधित सदर साहब का पक्ष सामने आने पर ही इनकी वास्तविक स्थिति स्पष्ट होगी।

### अज़हर खान ने उठाया महिला सम्मान का सवाल

बिरादरी के एक अन्य जिम्मेदार अज़हर खान साहब का कहना है कि किसी भी जनप्रतिनिधि का इस्तक़बाल करते समय अल्फ़ाज़ का चुनाव बेहद एहतियात से होना चाहिए। उनका मानना है कि सार्वजनिक मंच पर महिला जनप्रतिनिधि के लिए इस्तेमाल की जाने वाली ज़बान में अदब, एहतराम और पेशेवर शाइस्तगी झलकनी चाहिए।

अज़हर खान के मुताबिक़, इस मामले में इस्तेमाल किए गए शेर को लेकर जो नाराज़गी सामने आई है, उसे हल्के में लेने के बजाय तंजीम के जिम्मेदारों को गंभीरता से विचार करना चाहिए।

उन्होंने यह भी कहा कि तंजीम की साख उसके ओहदेदारों के व्यवहार और सार्वजनिक आचरण से बनती है। इसलिए पद पर बैठे व्यक्ति से दूसरों के मुकाबले अधिक संजीदगी और जवाबदेही की उम्मीद की जाती है।

### अकील अहमद की मांग—ऐसे रवैये पर हो जवाबदेही!

बिरादरी के एक अन्य शख़्स अकील अहमद ने इस मामले में सख़्त रुख़ अपनाते हुए कहा कि यदि किसी ओहदेदार के आचरण से बिरादरी की साख प्रभावित होती है, तो उस पर तंजीम के बुज़ुर्गों और जिम्मेदारों को गौर करना चाहिए।

उनका कहना है कि इस मामले में उचित कार्रवाई होनी चाहिए और यदि जांच में सदर साहब का रवैया अनुचित पाया जाता है, तो उनके पद पर बने रहने के बारे में भी फैसला किया जाना चाहिए।

अकील अहमद ने कथित तौर पर ऐसे सदर का सामाजिक बहिष्कार किए जाने की मांग भी उठाई है। हालांकि, यह उनकी निजी राय है और किसी सामूहिक फैसले की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।

### मक़सूद अहमद ने किया आगाह—मामला बढ़ा तो बिरादरी की साख पर पड़ेगा असर

मक़सूद अहमद का कहना है कि तंजीम के पढ़े-लिखे लोगों और बुज़ुर्गों को इस पूरे मामले पर जल्द बैठकर मशवरा करना चाहिए। उनके मुताबिक़, किसी एक शख़्स की ज़िद या आपसी मतभेद अगर पूरे समाज की प्रतिष्ठा को प्रभावित करने लगें, तो उसका नुकसान किसी एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता।

उन्होंने मामले को आपसी बातचीत, निष्पक्ष जांच और तंजीमी उसूलों के मुताबिक़ हल करने की ज़रूरत पर ज़ोर दिया।

### एहसान अली की मांग—सदर साहब ख़ुद दें इस्तीफ़ा!

बिरादरी के जिम्मेदार एहसान अली का कहना है कि किसी भी ओहदे की असल अहमियत उस पर बैठे व्यक्ति के किरदार, व्यवहार और जवाबदेही से होती है। उनके मुताबिक़, अगर सदर साहब को लगता है कि उनके रवैये से बिरादरी के जिम्मेदारों का भरोसा कम हुआ है, तो उन्हें अपने पद के बारे में गंभीरता से विचार करना चाहिए।

एहसान अली ने कथित तौर पर सदर साहब से तत्काल इस्तीफ़ा देने और किसी ऐसे व्यक्ति को ज़िम्मेदारी सौंपने की मांग की है, जिसे बिरादरी के लोग स्वीकार करते हों।

उन्होंने चेतावनी दी कि यदि इस मामले का संतोषजनक समाधान नहीं निकाला गया, तो विरोध करने वाले लोग पूरी कमेटी के बहिष्कार का रास्ता भी अपना सकते हैं। फिलहाल, किसी औपचारिक बहिष्कार या नई कमेटी के गठन की पुष्टि नहीं हुई है।

### क्या नई तंजीम के गठन की तैयारी है?

इस पूरे विवाद के बाद बिरादरी के कुछ जिम्मेदारों के बीच एक नई कमेटी गठित करने को लेकर विचार-विमर्श होने की चर्चा भी सामने आ रही है। हालांकि, नई कमेटी के गठन, उसके सदस्यों या किसी आधिकारिक निर्णय की पुष्टि नहीं हो सकी है।

यदि वास्तव में ऐसा कोई कदम उठाया जाता है, तो यह केवल एक शेर पर उपजा विवाद नहीं, बल्कि बिरादरी के भीतर क़यादत, प्रतिनिधित्व और तंजीमी जवाबदेही को लेकर गहरे मतभेदों का संकेत हो सकता है।

दूसरी तरफ़, किसी भी नई तंजीम के गठन से पहले सभी पक्षों को आपसी बातचीत, दस्तावेज़ी तथ्यों और बिरादरी के व्यापक हितों को सामने रखकर निर्णय लेना चाहिए, ताकि विवाद का हल निकालने के बजाय नए विवाद पैदा न हों।

### बिरादरी के सामने बड़ा सवाल—ओहदा बड़ा या उसूल?

जलालाबाद के इस सम्मेलन से जुड़ा विवाद कई अहम सवाल छोड़ रहा है। क्या सामाजिक तंजीमों के ओहदेदारों को सार्वजनिक मंच पर अपनी ज़बान और व्यवहार के प्रति अधिक जवाबदेह नहीं होना चाहिए? क्या किसी विवाद पर सवाल उठाने वाले जिम्मेदारों की बात सुनी जानी चाहिए या उन्हें ही गलत ठहरा दिया जाना चाहिए? और क्या बिरादरी के भीतर मतभेदों को आपसी मशवरे से हल करना बेहतर नहीं होगा?

मुस्लिम मुल्तानी लोहार, बढ़ई बिरादरी के लिए यह वाक़या इस लिहाज़ से भी अहम है कि सामाजिक एकता केवल बड़े-बड़े सम्मेलनों और मंचों से नहीं, बल्कि आपसी एहतराम, बुज़ुर्गों की इज़्ज़त, महिलाओं की गरिमा और जिम्मेदाराना व्यवहार से मज़बूत होती है।

**याद रहे, अदब किसी ओहदे का मोहताज नहीं और जवाबदेही किसी एक तंजीम तक महदूद नहीं।** बिरादरी की साख उसी वक़्त बुलंद होती है, जब उसके जिम्मेदार अपने अल्फ़ाज़, अपने अमल और अपने फैसलों से मिसाल क़ायम करते हैं।

अब देखना यह है कि इस विवाद पर संबंधित सदर साहब क्या मौक़िफ़ अपनाते हैं, तंजीम के बुज़ुर्ग क्या फैसला करते हैं और क्या यह मामला आपसी मशवरे से सुलझता है या बिरादरी के भीतर एक नए तंजीमी विवाद की शक्ल अख़्तियार करता है।

**नोट:** इस रिपोर्ट में उल्लिखित आरोप और प्रतिक्रियाएँ संबंधित व्यक्तियों के हवाले से प्राप्त जानकारी पर आधारित हैं। संबंधित सदर साहब और सांसद इकरा हसन का पक्ष प्राप्त होने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।

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**रिपोर्ट: सादिक मुल्तानी**
उप -संपादक, उत्तर प्रदेश डेस्क
**‘मुल्तानी समाज’ — राष्ट्रीय समाचार पत्रिका, न्यूज़ पोर्टल एवं यूट्यूब चैनल**

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार से पंजीकृत, नई दिल्ली से प्रकाशित एवं प्रसारित, मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी की क़ौमी आवाज़।

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इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन💔 रूड़की के मोहम्मद युसुफ़ साहब उर्फ़ बबलू के भांजे का मुंबई में इंतिक़ाल, देहरादून में आज होगी सुपुर्द-ए-ख़ाक की रस्म

अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त मरहूम की मग़फ़िरत फ़रमाए, उनकी क़ब्र को नूर से मुनव्वर फ़रमाए और तमाम अहले-ख़ाना को सब्र-ए-जमील अता फ़रमाए। आमीन या रब्बुल आलमीन।

रूड़की/देहरादून, 25 अक्टूबर 2026।

निहायत ही रंज-ओ-ग़म और दिली अफ़सोस के साथ तमाम मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादराना हज़रात को यह इत्तिला दी जाती है कि मोहल्ला चौर खाला बल्लुपुर देहरादून, उत्तराखंड निवासी जनाब मोहम्मद युसुफ़ साहब उर्फ़ बबलू (बंदूक साज़), साकिन रूड़की, ज़िला हरिद्वार, उत्तराखंड के भांजे सुहैल मिर्ज़ा का आज दिन इतवार, 25 अक्टूबर 2026 को मुंबई में क़ज़ा-ए-इलाही से इंतिक़ाल हो गया है। मरहूम मुंबई में रोज़गार के सिलसिले में काम करते थे। अफ़सोस कि इस फ़ानी दुनिया में उनकी ज़िंदगी का सफ़र मुकम्मल हो गया और वह अपने ख़ालिक़-ए-हक़ीक़ी से जा मिले।

सुहैल मिर्ज़ा वालिदा रिहाना बी उम्र तकरीबन 45-50 साल इस दुखद ख़बर से उनके रिश्तेदारों, अज़ीज़-ओ-अक़ारिब और तमाम जानने वालों में ग़म की लहर दौड़ गई है।

🕌 आज बाद नमाज़-ए-असर होगी सुपुर्द-ए-ख़ाक की रस्म

मिली हुई मालूमात के मुताबिक़, मरहूम की मैय्यत को आज बाद नमाज़-ए-असर, कब्रिस्तान इंदर रोड, देहरादून, उत्तराखंड में सुपुर्द-ए-ख़ाक किया जाएगा।

तमाम मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादराना हज़रात से गुज़ारिश है कि जो हज़रात जनाज़े में शरीक हो सकते हैं, वह जनाज़े की नमाज़ में शिरकत फ़रमाएँ, मरहूम के लिए दुआ-ए-मग़फ़िरत करें और इस दुख की घड़ी में अहले-ख़ाना के ग़म में शरीक होकर इंसानियत, भाईचारे और बिरादराना हमदर्दी का सबूत दें।

🤲 मरहूम के लिए दुआ-ए-मग़फ़िरत

या अल्लाह! मरहूम की मुकम्मल मग़फ़िरत फ़रमा। उनकी तमाम छोटी-बड़ी ख़ताओं और लग़ज़िशों को अपने फ़ज़्ल-ओ-करम से माफ़ फ़रमा। उनकी नेकियों को क़ुबूल फ़रमा और उन्हें जन्नतुल फ़िरदौस में आला मुक़ाम अता फ़रमा। आमीन।

🤲 जनाज़े की नमाज़ में पढ़ी जाने वाली दुआ

अगर मरहूम बालिग़ मर्द हैं, तो जनाज़े की नमाज़ में पढ़ी जाने वाली मशहूर दुआ यह है:

اللَّهُمَّ اغْفِرْ لِحَيِّنَا وَمَيِّتِنَا وَشَاهِدِنَا وَغَائِبِنَا وَصَغِيرِنَا وَكَبِيرِنَا وَذَكَرِنَا وَأُنْثَانَا

तर्जुमा: ऐ अल्लाह! हमारे ज़िंदा और मरहूम, मौजूद और ग़ैर-मौजूद, छोटे और बड़े, मर्द और औरत सबकी मग़फ़िरत फ़रमा।

नोट: जनाज़े की दुआ मरहूम की उम्र और हालत के मुताबिक़ पढ़ी जाती है। ऊपर दी गई दुआ का इस्तेमाल आम दुआ के तौर पर भी किया जा सकता है।

🤲 मैय्यत को क़ब्र में उतारते वक़्त की दुआ

मैय्यत को क़ब्र में उतारते वक़्त यह दुआ पढ़ना मशरूअ है:

بِسْمِ اللَّهِ وَعَلَى مِلَّةِ رَسُولِ اللَّهِ ﷺ

तर्जुमा: अल्लाह के नाम के साथ और रसूलुल्लाह ﷺ के दीन व तरीक़े पर।

🤲 मिट्टी देते वक़्त की याददिहानी और दुआ

क़ब्र पर मिट्टी डालते वक़्त अल्लाह तआला की तरफ़ रुजू करते हुए मौत और आख़िरत को याद किया जाए। क़ुरआन-ए-पाक की यह आयत पढ़ना मसनून है:

مِنْهَا خَلَقْنَاكُمْ وَفِيهَا نُعِيدُكُمْ وَمِنْهَا نُخْرِجُكُمْ تَارَةً أُخْرَىٰ

तर्जुमा: इसी मिट्टी से हमने तुम्हें पैदा किया, इसी में तुम्हें वापस लौटाएँगे और इसी से तुम्हें दोबारा निकालेंगे।

(सूरह ताहा, आयत 55)

क़ब्र पर मिट्टी देने के बाद मरहूम के लिए दुआ-ए-मग़फ़िरत और साबित-क़दमी की दुआ करना भी मुस्तहब है।

🤲 दफ़्न के बाद मरहूम के लिए दुआ

اللَّهُمَّ اغْفِرْ لَهُ وَثَبِّتْهُ عِنْدَ السُّؤَالِ

तर्जुमा: ऐ अल्लाह! इनकी मग़फ़िरत फ़रमा और सवाल के वक़्त इन्हें साबित-क़दम रख।

ऐ अल्लाह! मरहूम की क़ब्र को जन्नत के बाग़ों में से एक बाग़ बना दे। क़ब्र की तन्हाई को अपनी रहमत से दूर फ़रमा, उनकी क़ब्र को वसीअ और रौशन फ़रमा और उन्हें हश्र के दिन अपने महबूब बंदों के साथ उठाना। उनके घर वालों को इस सदमे को बर्दाश्त करने की हिम्मत, सब्र और सुकून अता फ़रमा।

आमीन सुम्मा आमीन, या रब्बुल आलमीन।

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सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार से पंजीकृत, मुल्क की राजधानी नई दिल्ली से प्रसारित, पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी की क़ौमी समाचार पत्रिका, न्यूज़ पोर्टल और यूट्यूब चैनल "मुल्तानी समाज" के लिए उत्तर प्रदेश डेस्क से प्रधान संपादक ज़मीर आलम की ख़ास रिपोर्ट।

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