Monday, September 21, 2026

मुल्तानी-डे की तारीख़ पर बढ़ता इख़्तिलाफ़, 12 नवंबर की रवायत या अक्टूबर में अलग-अलग कार्यक्रम ?—मुल्तानी बिरादरी में उठ रहे सवालों पर गौर करने की ज़रूरत

नई दिल्ली/उत्तर प्रदेश डेस्क।

पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी में इन दिनों एक सामाजिक और तंजीमी मसले को लेकर चर्चा तेज़ होती जा रही है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश समेत मुल्क के मुख़्तलिफ़ शहरों में काम कर रही कई सामाजिक तंजीमों की ओर से अक्टूबर माह में “मुल्तानी-डे” के नाम से कार्यक्रम आयोजित किए जाने की घोषणाओं के बाद बिरादरी के एक तबके में यह सवाल उठ रहा है कि आखिर “मुल्तानी-डे” की तारीख़ क्या है और इसकी असल रवायत किस तारीख़ से जुड़ी हुई है?

कुछ तंजीमों की ओर से 15 अक्टूबर, 19 अक्टूबर और अक्टूबर माह की अन्य तारीख़ों में कार्यक्रम आयोजित करने की घोषणाएं सामने आने के बाद यह बहस और भी ज़ोर पकड़ रही है। दूसरी तरफ़ “मुल्तानी समाज” राष्ट्रीय समाचार पत्रिका से जुड़े आयोजकों का कहना है कि उनके द्वारा 12 नवंबर को “जश्ने मुल्तानी-डे” मनाने की रवायत लंबे अरसे से चली आ रही है।

12 नवंबर की रवायत का क्या है दावा?

“मुल्तानी समाज” की ओर से उपलब्ध कराई गई जानकारी के मुताबिक, मुल्तानी समाज चैरिटेबल ट्रस्ट (रजि.), जो नई दिल्ली से संचालित समाजसेवी संगठन है, ने वर्ष 2011 में अपनी बिरादरी के नाम पर “मुल्तानी समाज” नामक पत्रिका के पंजीकरण की प्रक्रिया पूरी की थी।

उस दौर में सोशल मीडिया आज की तरह आम नहीं था। बिरादरी के लोगों के बीच सामाजिक गतिविधियों, शादी-ब्याह, ताज़ियत, ख़ुशी और दूसरे सामाजिक मामलों की जानकारी पहुंचाने में पत्रिकाओं और समाचार-पत्रों का अहम किरदार हुआ करता था।

इसी सिलसिले में “मुल्तानी समाज” राष्ट्रीय समाचार पत्रिका से जुड़े पदाधिकारियों के मुताबिक, पत्रिका के राष्ट्रीय अधिवेशन और बिरादरी की एकजुटता के प्रतीक के तौर पर हर वर्ष 12 नवंबर को “जश्ने मुल्तानी-डे” मनाने की रवायत शुरू की गई।

इस जश्न की ख़ास बात क्या रही?

“मुल्तानी-डे” के इस जश्न की एक ख़ास बात यह बताई जाती है कि इसके लिए किसी एक शहर, मैदान या हॉल को स्थायी आयोजन स्थल नहीं बनाया गया।

बल्कि बिरादरी के लोगों को यह पैग़ाम दिया गया कि मुल्क के किसी भी हिस्से में रहने वाला मुल्तानी भाई—चाहे वह गांव में हो, कस्बे में हो, शहर में हो या विदेश में—अपने घर और अपने इलाके में अपनी सहूलियत के मुताबिक इस दिन को मनाए।

कहीं क़ुरआन-ए-पाक की तिलावत के साथ दुआ की जाती है, कहीं सामाजिक बैठक होती है, कहीं मिठाई तक़सीम की जाती है और कुछ नौजवान इस दिन को अपने अंदाज़ में केक काटकर भी मनाते हैं।

यानी इस जश्न को किसी एक मंच या किसी एक शहर तक महदूद रखने के बजाय इसे पूरी बिरादरी से जोड़ने की कोशिश किए जाने का दावा किया जाता है।

फिर अक्टूबर की तारीख़ों पर क्यों उठ रहे हैं सवाल?

बिरादरी में मौजूदा बहस का असल केंद्र यही सवाल है।

“मुल्तानी समाज” से जुड़े लोगों का कहना है कि जब 12 नवंबर को “मुल्तानी-डे” के नाम से एक रवायत पहले से चली आ रही है और बिरादरी के लोगों को इसकी जानकारी भी है, तो अक्टूबर में इसी नाम से अलग-अलग कार्यक्रम आयोजित करने की ज़रूरत और वजह क्या है?

वहीं दूसरी ओर, अक्टूबर में कार्यक्रम आयोजित करने वाली तंजीमों के अपने सामाजिक और तंजीमी कारण हो सकते हैं। इसलिए इस मामले में किसी भी पक्ष की मंशा पर अंतिम राय कायम करने के बजाय तारीख़, इतिहास और कार्यक्रम की रवायत को सामने रखकर बिरादरी के बुज़ुर्गों और जिम्मेदार लोगों के बीच बातचीत होना ज़रूरी दिखाई देता है।

बुज़ुर्गों के किरदार पर भी उठ रहे सवाल

मुल्तानी बिरादरी में जब भी किसी मामले को लेकर इख़्तिलाफ़ पैदा होता रहा है, बुज़ुर्गों, उलेमा, सामाजिक कार्यकर्ताओं और जिम्मेदार लोगों से यह उम्मीद की जाती रही है कि वे दोनों पक्षों को बैठाकर बातचीत के ज़रिए कोई रास्ता निकालें।

लेकिन मौजूदा विवाद को लेकर कुछ लोगों का कहना है कि जिन बुज़ुर्गों और सामाजिक हस्तियों से बीच-बचाव की उम्मीद की जा रही थी, उनकी तरफ़ से अभी तक कोई ऐसा साझा प्रयास सामने नहीं आया जिससे इस मसले को आपसी बातचीत से हल किया जा सके।

ऐसे में सवाल यह भी है कि अगर एक ही बिरादरी के लोग एक ही नाम से अलग-अलग तारीख़ों पर कार्यक्रम करेंगे, तो इससे इत्तेहाद बढ़ेगा या इख़्तिलाफ़?

मसला तारीख़ से ज़्यादा बिरादरी के इत्तेहाद का है

दरअसल, “मुल्तानी-डे” की बहस को केवल तारीख़ का विवाद समझना शायद इस पूरे मामले को छोटा कर देना होगा।

मुल्तानी बिरादरी देश के अलग-अलग हिस्सों में आबाद है और बड़ी संख्या में लोग रोज़गार, कारोबार और दूसरी वजहों से मुल्क के मुख़्तलिफ़ शहरों के अलावा विदेशों में भी रहते हैं।

ऐसे में किसी भी सामाजिक जश्न की असल खूबसूरती उसी वक्त कायम रह सकती है जब वह इत्तेहाद, भाईचारे, मोहब्बत और आपसी एहतराम का ज़रिया बने।

अगर एक ही बिरादरी के अलग-अलग संगठन एक ही नाम को अलग-अलग तारीख़ों और अलग-अलग बैनरों के साथ मनाएंगे, तो स्वाभाविक रूप से बिरादरी के आम लोगों के बीच यह सवाल पैदा होगा कि आखिर असल रवायत क्या है?

क्या दोनों पक्ष एक साथ बैठ सकते हैं?

मौजूदा हालात में सबसे अहम सवाल यही है कि क्या मुल्तानी बिरादरी की तमाम तंजीमें इस मसले को अनाना और तंजीमी मतभेद बनाने के बजाय आपसी मशवरे से हल कर सकती हैं?

अगर अक्टूबर में कार्यक्रम आयोजित करने वाली तंजीमें और 12 नवंबर की रवायत का दावा करने वाले आयोजक एक मेज़ पर बैठकर इतिहास, दस्तावेज़, पुरानी रवायत और कार्यक्रम की शुरुआत से संबंधित रिकॉर्ड सामने रखें, तो शायद इस बहस का कोई सम्मानजनक रास्ता निकाला जा सकता है।

आख़िरकार जश्न किसी एक शख़्स, संस्था या शहर की मिल्कियत नहीं होता; बिरादरी की तारीख़ और रवायत पूरी बिरादरी की अमानत होती है।

बिरादरी से एक सीधा सवाल

आज मुल्तानी बिरादरी के सामने सवाल यह नहीं होना चाहिए कि कौन किसके साथ है?

सवाल यह होना चाहिए कि—

“मुल्तानी-डे” की बुनियादी रवायत कब शुरू हुई?
उसकी तारीख़ का दस्तावेज़ी आधार क्या है?
और अगर 12 नवंबर से यह जश्न मनाया जाता रहा है तो अक्टूबर में उसी नाम से नए कार्यक्रम शुरू करने की ज़रूरत क्यों महसूस हुई?

इन सवालों का जवाब बहस, तकरार या इल्ज़ाम से नहीं, बल्कि दस्तावेज़, तारीख़ और आपसी मशविरे से मिलना चाहिए।

हमारा मक़सद टकराव नहीं, तजवीज़ और इत्तेहाद है

“मुल्तानी समाज” की ओर से कहा गया है कि इस रिपोर्ट का मक़सद किसी तंजीम, शख़्स या बिरादरी के किसी फर्द की तौहीन करना नहीं, बल्कि एक ऐसे सामाजिक मसले को सामने लाना है जिस पर बिरादरी के लोग चर्चा कर रहे हैं।

अगर किसी दूसरी तंजीम के पास “मुल्तानी-डे” की तारीख़, उसके आरंभ या उसके कार्यक्रम की कोई अलग दस्तावेज़ी रवायत मौजूद है, तो उसे भी बिरादरी के सामने लाया जाना चाहिए।

क्योंकि सच अगर दस्तावेज़ में मौजूद है तो उसे सामने आने से किसी को डर नहीं होना चाहिए।

बिरादरी का इत्तेहाद तारीख़ की बहस से बड़ा है और आपसी भाईचारा हर तंजीमी इख़्तिलाफ़ से ऊपर है।

अब फैसला मुल्तानी बिरादरी के संजीदा, समझदार और जागरूक अफ़राद को करना है कि “मुल्तानी-डे” की इस रवायत को एक तारीख़ और एक साझा मंच के तहत आगे बढ़ाया जाए या अक्टूबर और नवंबर में अलग-अलग कार्यक्रमों के रूप में मनाया जाए।

आपकी राय क्या है? अपनी बेबाक लेकिन तहज़ीब के दायरे में राय कमेंट में ज़रूर दें।


विशेष रिपोर्ट
उत्तर प्रदेश डेस्क
ज़मीर आलम, प्रधान संपादक

“मुल्तानी समाज”
सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार से पंजीकृत, मुल्क की राजधानी नई दिल्ली से प्रसारित, पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार (बढ़ई) बिरादरी की क़ौमी समाचार पत्रिका, न्यूज़ पोर्टल एवं यूट्यूब चैनल।

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