Wednesday, September 23, 2026

बिरादरी का इकलौता और अनोखा संगठन—जहाँ कोई चौधरी नहीं, सिर्फ़ ख़िदमतगार हैं

2011 में रखी गई एक ऐसी तहरीक की बुनियाद, जिसने पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार-बढ़ई बिरादरी को तंजीम, सहाफ़त और डिजिटल प्लेटफॉर्म से जोड़ने का सफ़र शुरू किया

नई दिल्ली/उत्तर प्रदेश।

किसी भी बिरादरी की तरक़्क़ी सिर्फ़ बड़े-बड़े दावों, जलसों और नारों से नहीं होती, बल्कि इसके लिए ख़ुलूस, सब्र, मेहनत, तंजीमी सोच और लगातार ख़िदमत का जज़्बा दरकार होता है। तारीख़ गवाह है कि जब किसी एक शख़्स के दिल में अपनी क़ौम और बिरादरी के लिए कुछ कर गुजरने का अज़्म पैदा होता है, तो वही छोटी-सी कोशिश आगे चलकर एक बड़ी तहरीक की शक्ल अख़्तियार कर सकती है।

पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार-बढ़ई बिरादरी में ऐसी ही एक तंजीमी कोशिश का आग़ाज़ साल 2011 में हुआ, जब गढ़ी पुख़्ता, ज़िला शामली, उत्तर प्रदेश से ताल्लुक़ रखने वाले और उस वक़्त दिल्ली में मुकीम ज़मीर आलम ने बिरादरी के लिए मुल्कगीर सतह पर काम करने वाली एक तंजीम की बुनियाद रखने का अज़्म किया।

ज़मीर आलम उस वक़्त भी मुख़्तलिफ़ समाजी तंजीमों और अख़बारात से जुड़े हुए थे। उन्होंने दिल्ली में रहने वाले बिरादरी के कई तजुर्बेकार और असरदार अफ़राद से मशवरा किया। मगर हर मशवरा हौसला बढ़ाने वाला नहीं था।

कुछ लोगों ने उन्हें यहाँ तक मशवरा दिया कि "आप भी ख़ामोशी से घर बैठ जाइए। इस बिरादरी के लिए आज तक कोई कुछ नहीं कर सका, बड़े-बड़े सेठ और असरदार लोग मिलकर भी कुछ नहीं कर पाए, फिर आप क्या कर लेंगे?"

लेकिन ज़मीर आलम ने मायूसी को अपने रास्ते की दीवार नहीं बनने दिया।

उन्होंने यह तय किया कि अगर कोई काम आज तक नहीं हुआ, तो इसका मतलब यह नहीं कि वह आगे भी नहीं हो सकता।

17 जून 2011—एक तंजीमी सफ़र का आग़ाज़

इसी अज़्म और ख़िदमत के जज़्बे के साथ 17 जून 2011 को "मुल्तानी समाज चैरिटेबल ट्रस्ट" के नाम से तंजीम की बुनियाद रखी गई।

बाद में यही तारीख़ बिरादरी के लिए "यौमे-तासीस" यानी स्थापना दिवस की हैसियत से अहम होती चली गई। हर साल 17 जून को बिरादरी के अफ़राद अपने-अपने गाँव, क़स्बों और शहरों में पौधारोपण करके इस दिन को मनाते हैं और मुल्क को हरा-भरा रखने का पैग़ाम देते हैं।

यह उस दौर की बात है जब आज की तरह सोशल मीडिया का बोलबाला नहीं था। किसी भी खबर या जानकारी को लोगों तक पहुँचाने के लिए अख़बार और पत्रिकाएँ ही सबसे बड़ा ज़रिया हुआ करती थीं।

सहाफ़त को बनाया बिरादरी की आवाज़

ज़मीर आलम का ताल्लुक़ सहाफ़त से पहले ही था। मुख़्तलिफ़ अख़बारात में काम करने के बाद उन्होंने अपने कई अख़बार भी रजिस्टर्ड कराए।

इसी सहाफ़ती तजुर्बे को बिरादरी की ख़िदमत के साथ जोड़ते हुए 12 नवंबर 2013 को "मुल्तानी समाज" के नाम से पत्रिका का रजिस्ट्रेशन कराया गया।

मक़सद साफ़ था—बिरादरी के मुख़्तलिफ़ हिस्सों में होने वाली सामाजिक, तालीमी, तंजीमी और ख़िदमाती सरगर्मियों की खबरें बिरादरी के हर फ़र्द तक पहुँचाना।

इसी सिलसिले ने आगे चलकर "मुल्तानी डे" की शक्ल अख़्तियार की, जिसे पत्रिका के राष्ट्रीय अधिवेशन के तौर पर बिरादरी में मनाए जाने की रवायत बनी।

एक शहर से पूरे मुल्क तक पहुँचने की कोशिश

तंजीम का दायरा धीरे-धीरे बढ़ता गया। गुजरात, राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, उत्तराखंड, दिल्ली और उत्तर प्रदेश के मुख़्तलिफ़ शहरों में बिरादरी के अफ़राद से राब्ता किया गया।

जहाँ-जहाँ बिरादरी के लोग मिले, वहाँ तंजीम के मक़सद और प्लेटफॉर्म के बारे में बताया गया और उन्हें एक साझा तंजीमी प्लेटफॉर्म से जोड़ने की कोशिश की गई।

वक़्त बदला, दौर बदला और फिर सोशल मीडिया का ज़माना आया।

इस बदलते हुए दौर को समझते हुए बिरादरी को भी डिजिटल दुनिया से जोड़ने की पहल की गई।

बिरादरी का अपना डिजिटल नेटवर्क

बिरादरी की खबरों और जानकारी को डिजिटल तौर पर एक जगह उपलब्ध कराने के लिए "मुल्तानी समाज डॉट कॉम" वेबसाइट तैयार की गई।

रिश्ते-नातों के सिलसिले को आसान बनाने के लिए "रिश्तों की दुनिया डॉट कॉम" के नाम से प्लेटफॉर्म तैयार किया गया, ताकि शादी के लिए मुनासिब रिश्तों की तलाश को आसान बनाया जा सके।

बिरादरी का डिजिटल सर्वे करने और बिरादरी के आंकड़े जमा करने के मक़सद से "मुल्तानी घराना डॉट कॉम" के नाम से भी प्लेटफॉर्म की पहल की गई।

यानी कोशिश सिर्फ़ एक तंजीम बनाने तक महदूद नहीं रही, बल्कि बिरादरी को तंजीम, सहाफ़त, डिजिटल प्लेटफॉर्म और आपसी राब्ते से जोड़ने की कोशिश की गई।

तालीम को फ़रोग़ देने की कोशिश

तंजीम की सरगर्मियों में तालीम को भी अहमियत दी गई।

दसवीं और बारहवीं जमाअत में बेहतर कारकर्दगी करने वाले बिरादरी के बच्चों को "मुल्तानी गौरव अवॉर्ड" से नवाज़ने की रवायत शुरू की गई, ताकि बच्चों में तालीमी मैदान में आगे बढ़ने का हौसला पैदा हो और उनके माता-पिता भी बच्चों की पढ़ाई को लेकर मुतमइन और पुरउम्मीद रहें।

कोरोना वबा के दौर में भी बिरादरी और समाज के लिए अपनी जिम्मेदारियाँ निभाने वाले सैकड़ों कोरोना योद्धाओं को सम्मानित किया गया।

"एकजुटता बढ़ाओ अभियान"—इत्तिहाद का पैग़ाम

बिरादरी में आपसी राब्ता और इत्तिहाद बढ़ाने के लिए हर साल 31 जनवरी से 28 फरवरी तक "एकजुटता बढ़ाओ अभियान" चलाने की पहल की गई।

मक़सद यही था कि बिरादरी के अफ़राद एक-दूसरे के करीब आएँ, आपसी राब्ता मजबूत हो और बिरादरी की सामूहिक तरक़्क़ी के लिए मिल-जुलकर काम किया जाए।

इसी के साथ बिरादरी की खबरों को तेज़ी से पहुँचाने के लिए न्यूज़ चैनल और न्यूज़ पोर्टल की शुरुआत की गई।

सबसे दिलचस्प बात—बिना चंदे के तंजीमी सफ़र

इस तंजीम के बारे में जो बात इसे मुख़्तलिफ़ बनाती है, वह यह दावा किया जाता है कि इसकी बहुत-सी सरगर्मियाँ चंदे के बजाय सालाना सदस्यता शुल्क के ज़रिये चलाने की कोशिश की गईं।

सदस्यता शुल्क 250 रुपये सालाना रखा गया।

यानी कोशिश यह रही कि बिरादरी के अफ़राद अपनी हैसियत के मुताबिक़ मामूली सदस्यता शुल्क के ज़रिये तंजीम का हिस्सा बनें और तंजीमी काम को एक व्यवस्थित आर्थिक आधार मिले।

हर तीन साल बाद नई क़यादत

इस तंजीम की एक और अहम तंजीमी ख़ूबी यह बताई जाती है कि राष्ट्रीय सदर समेत पूरी कार्यकारिणी को हर तीन साल बाद बदलने की व्यवस्था रखी गई।

इसका मक़सद यह है कि तंजीम किसी एक शख़्स या एक ही क़यादत के इर्द-गिर्द महदूद न रहे, बल्कि नई नस्ल और नए लोगों को भी आगे आने का मौक़ा मिले।

90 फ़ीसद काम ऑनलाइन—वक़्त और पैसा दोनों बचाने की कोशिश

डिजिटल दौर के मुताबिक़ तंजीम की ज़्यादातर सरगर्मियों को ऑनलाइन रखने की कोशिश की गई।

बताया जाता है कि तंजीम के लगभग 90 फ़ीसद काम ऑनलाइन किए जाने की नीति अपनाई गई, ताकि बिरादरी के लोगों का कीमती वक़्त और तंजीम का पैसा अनावश्यक बैठकों, सफ़र और दूसरी फिज़ूलखर्चियों में ज़ाया न हो।

तंजीम के फाउंडर ज़मीर आलम की सोच रही कि अगर डिजिटल दौर में कोई काम ऑनलाइन आसानी से हो सकता है तो सिर्फ़ रस्म निभाने के लिए लोगों को दूर-दराज़ से बुलाकर उनका वक़्त और पैसा क्यों खर्च कराया जाए।

"हम ओहदेदार नहीं, ख़िदमतगार हैं"

शायद इस पूरी तंजीमी सोच की सबसे अहम और अलग पहचान यही जुमला है—

"आप बिरादरी के ओहदेदार नहीं, बल्कि ख़िदमतगार हैं।"

तंजीम से जुड़े लोगों को हमेशा यह एहसास दिलाने की कोशिश की जाती है कि किसी ओहदे का मतलब हुक्म चलाना नहीं, बल्कि जिम्मेदारी उठाना है।

सदर होना ख़िदमत है, सेक्रेटरी होना ख़िदमत है, किसी कमेटी का हिस्सा होना ख़िदमत है और बिरादरी का आम फ़र्द होना भी अपनी जगह एक जिम्मेदारी है।

यही वजह है कि इस तंजीमी सोच में "चौधरी" बनने के बजाय "ख़िदमतगार" बनने पर ज़ोर दिया जाता है।

फाउंडर का अपना अलग उसूल

तंजीम के फाउंडर ज़मीर आलम के बारे में यह भी कहा जाता है कि उन्होंने बिरादरी के मुख़्तलिफ़ मंचों पर बुलाए जाने के बावजूद अपनी तंजीमी सोच के मुताबिक़ आम तौर पर डिजिटल प्लेटफॉर्म को प्राथमिकता दी।

उनका मानना रहा कि अगर आज के दौर में लोगों तक अपनी बात पहुँचाने के लिए डिजिटल ज़रिया मौजूद है, तो हर काम के लिए बड़े जलसे, लंबे सफ़र और भारी खर्च की ज़रूरत नहीं होनी चाहिए।

उनकी सोच का केंद्र यही रहा कि बिरादरी का पैसा बिरादरी के काम आए और बिरादरी का वक़्त बिरादरी की तरक़्क़ी में लगे।

एक तंजीम से बढ़कर—एक सोच

आज "मुल्तानी समाज" की कहानी को सिर्फ़ एक तंजीम या एक पत्रिका की कहानी के तौर पर देखना मुकम्मल तस्वीर पेश नहीं करता।

यह सफ़र दरअसल उस सोच की कहानी है जिसमें एक बिरादरी को तंजीम से जोड़ने, सहाफ़त के ज़रिये आवाज़ देने, तालीम को बढ़ावा देने, रिश्तों को आसान बनाने, डिजिटल प्लेटफॉर्म उपलब्ध कराने और आपसी इत्तिहाद को मज़बूत करने की कोशिश की गई।

2011 में जिस सफ़र का आग़ाज़ एक छोटे से तंजीमी ख़याल से हुआ था, वह आगे चलकर मुख़्तलिफ़ डिजिटल और सहाफ़ती प्लेटफॉर्म तक पहुँचा।

इस सफ़र की सबसे अहम बात शायद यही है कि—

ओहदा बड़ा नहीं, ख़िदमत बड़ी होनी चाहिए।

कुर्सी नहीं, जिम्मेदारी अहम होनी चाहिए।

चौधराहट नहीं, ख़िदमतगारी बिरादरी की पहचान होनी चाहिए।

और शायद इसी सोच को तंजीम का सबसे बड़ा पैग़ाम कहा जा सकता है—

"बिरादरी पर हुकूमत करने के लिए नहीं, बिरादरी की ख़िदमत करने के लिए तंजीम बनाई जाती है।"


"मुल्तानी समाज"—बिरादरी की आवाज़, बिरादरी की पहचान

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार से पंजीकृत, मुल्क की राजधानी नई दिल्ली से शाया होने वाली पैदायशी इंजीनियर मुस्लिम मुल्तानी लोहार-बढ़ई बिरादरी की क़ौमी समाचार पत्रिका "मुल्तानी समाज", इसके न्यूज़ पोर्टल और यूट्यूब चैनल के ज़रिये बिरादरी की सामाजिक, तालीमी, तंजीमी और दीगर सरगर्मियों को बिरादरी तक पहुँचाने की कोशिश की जाती है।

उत्तर प्रदेश डेस्क से
प्रधान संपादक — ज़मीर आलम
"मुल्तानी समाज" राष्ट्रीय समाचार पत्रिका

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